Tuesday, April 21, 2026
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‘चीन की जगह भारत को विनिर्माण का केंद्र बनाने को इच्छुक हैं 200 अमेरिकी कम्पनियां’

वाशिंगटन : अमेरिका की करीब 200 कंपनियां अपना विनिर्माण केंद्र आम चुनाव के बाद चीन से भारत ले जाना चाहती हैं। अमेरिका और भारत के संबंधों को मजबूत बनाने की पैरवी करने वाले स्वयंसेवी समूह यूएस-इंडिया स्ट्रेटजिक एंड पार्टनरशिप फोरम ने यह टिप्पणी की है। समूह ने कहा कि चीन की जगह कोई अन्य विकल्प तलाश कर रही कंपनियों के लिये भारत में शानदार अवसर उपलब्ध हैं। समूह के अध्यक्ष मुकेश अघी ने कहा कि कई कंपनियां उनसे बात कर रही हैं और पूछ रही हैं कि भारत में निवेश कर किस तरह से चीन का विकल्प तैयार किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि समूह नयी सरकार को समूह सुधारों को तेज करने तथा निर्णय लेने की प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने का सुझाव देगा। उन्होंने पीटीआई भाषा को एक साक्षात्कार में कहा, ‘‘मुझे लगता है कि यह संवेदनशील है। हम प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता लाने तथा 12 से 18 महीने में इसे अधिक परामर्श योग्य बनाने का सुझाव देंगे। हम देख रहे हैं कि ई-कॉमर्स, डेटा का स्थानीय स्तर पर भंडारण आदि जैसे निर्णयों को अमेरिकी कंपनियां स्थानीय कारक न मानकर अंतरराष्ट्रीय कारक मान रही हैं।’ यह पूछे जाने पर कि निवेश आकर्षित करने के लिये नयी सरकार को क्या करना चाहिये, अघी ने कहा कि नयी सरकार को सुधार की गति तेज करनी चाहिये, निर्णय लेने की प्रक्रिया में पारदर्शिता लानी चाहिये तथा अधिक पक्षों के साथ परामर्श पर जोर देना चाहिये। उन्होंने भारत और अमेरिका के बीच मुक्त व्यापार समझौते की भी पैरवी की।

चिकित्सा विज्ञान की श्रेष्ठता को पछाड़ 27 साल बाद कोमा से लौटी महिला

नयी दिल्ली : संयुक्त अरब अमीरात की एक महिला ने चिकित्सा विज्ञान की प्रधानता को धता बताते हुए 27 साल बाद अपनी चेतना को वापस पा लिया। दरअसल महिला 27 साल पहले एक सड़क हादसे का शिकार हो गई थीं। दिमाग में गंभीर चोट लगने से वह कोमा में चली गई थीं। मुनिरा अब्दुल्ला का वर्ष 1991 में सड़क दुर्घटना में जख्मी होने के बाद वह सालों तक अचेत रहीं। घटना के 27 साल बाद जून 2018 में पहली बार अब्दुल्ला ने जर्मनी के एक क्लिनिक में अपनी आंखें खोलीं। डॉक्टर वहां सालों से उनका उपचार कर रहे थे। महिला के 32 वर्षीय बेटे ओमर ने कहा, ‘मैंने उनको लेकर कभी हार नहीं मानी, क्योंकि मुझे हमेशा ऐसा लगता था कि एक दिन वह जरूर उठकर बैठेंगी।’ महिला के साथ जब यह हादसा हुआ तब ओमर चार साल के थे। डॉक्टर मुलर ने कहा, ‘महिला के चामत्कारिक रूप से ठीक होने का पहला संकेत पिछले साल दिखाई पड़ा, जब अब्दुल्ला ने अपने बेटे का नाम लेना शुरू किया। पहले तो हमें विश्वास नहीं हुआ, लेकिन आखिर में यह साफ हो गया कि वह अपने बेटे का ही नाम ले रही थीं।’ डॉक्टरों ने बताया कि उसके दो हफ्ते बाद महिला कुरान की आयतें दोहराने लगी, जो उन्होंने दशकों पहले सीखी थीं। अब्दुल्ला जैसे केस में ठीक होने की उम्मीद बेहद कम रहती है। ऐसे चंद लोग ही हैं, जो इस अवस्था में स्वस्थ हो पाए हैं। ऐसा एक मशहूर केस टेरी वॉलिस का है, जिन्होंने कोमा में जाने के दो दशक बाद पहला शब्द ‘मॉम’ बोला था। मुनिरा अब्दुल्ला संयुक्त अरब अमीरात लौट चुकी हैं और अबू धाबी में उनका इलाज चल रहा है।

जानबूझकर कर्ज न चुकाने वालों नामों का खुलासा करे आरबीआई : सुप्रीम कोर्ट

नयी दिल्ली : भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत जानबूझकर कर्ज न चुकाने वालों समेत बैंकों व अन्य वित्तीय संस्थानों की वार्षिक ऑडिट रिपोर्ट का खुलासा करना ही होगा। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि राष्ट्रीय आर्थिक हित का हवाला देकर आरबीआई आरटीआई के तहत बैंकों की वार्षिक जांच रिपोर्ट आदि का खुलासा करने से इनकार नहीं कर सकती, जब तक कोई कानून उसके आड़े नहीं आ रहा हो। जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस एमआर शाह की पीठ ने आरटीआई के तहत बैंकों से संबंधित सूचना का खुलासा करने के लिए आरबीआई से अपनी नीति की समीक्षा करने के भी निर्देश दिए। पीठ ने कहा कि यह कानून के तहत उसकी ड्यूटी की बाध्यता है। साथ ही आरबीआई को 30 दिसंबर, 2016 को जारी उस डिस्क्लोजर (प्रकटन) नीति को वापस करने का आदेश दिया है जिसमें जानबूझकर कर्ज न चुकाने वालों, बैंकों की वार्षिक जांच रिपोर्ट आदि से संबंधित जानकारी का खुलासा नहीं करने की बात थी। आरबीआई का कहना था कि इस नीति के तहत इन जानकारियों का खुलासा न करना उसके नियंत्रण और नियम के तहत है। पीठ ने इस पर नाराजगी जताई कि 16 दिसंबर 2015 के उसके आदेश का पालन नहीं किया गया। अपने आदेश में कोर्ट ने आरटीआई के तहत आरबीआई को बैंकों व अन्य वित्तीय संस्थानों की वार्षिक जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक करने का आदेश दिया था। पीठ ने कहा कि आरटीआई के तहत आरबीआई बैंकों की वार्षिक रिपोर्ट समेत अन्य जानकारी को सार्वजनिक करने के लिए बाध्य है, बशर्ते कोई मामला देश की सुरक्षा से जुड़ा न हो। हमारे आदेश का पालन न किए जाने पर हम सख्त रुख अपना सकते थे लेकिन अब आरबीआई को डिस्क्लोजर पॉलिसी को वापस लेने का आखिरी मौका देते हैं। कोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि फिर से आदेश की अवहेलना की गई तो वह उसे बेहद गंभीरता से लेगा। दिसंबर, 2015 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद आरबीआई 30 दिसंबर, 2016 को डिस्क्लोजर पॉलिसी लेकर आई थी। इसमें आरटीआई के तहत सभी जानकारी का खुलासा न करने की बात थी।
अवमानना याचिका दायर की थी
2015 के आदेश का पालन नहीं करने पर आरटीआई कार्यकर्ताओं सुभाष चंद्र अग्रवाल, गिरीश मित्तल समेत अन्य ने आरबीआई के खिलाफ अवमानना याचिका दायर की थी। याचिका में कहा गया था कि आरबीआई ने आर्थिक हित, व्यावसायिक विश्वास, भरोसे का संबंध या जनहित का हवाला देते हुए जानकारी देने से इनकार कर दिया। याचिकाकर्ताओं ने आरबीआई से आईसीसीआई बैंक, आईसीआईसीआई बैंक, एक्सिस बैंक, एचडीएफसी बैंक और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की वार्षिक जांच रिपोर्ट के अलावा सहारा समूह की कंपनियों से संबंधित जानकारी मांगी थी। एक अन्य याचिकाकर्ता ने विदेशी डेरिवेटिव कांट्रेक्ट मामलों में देश को हुए 32000 करोड़ रुपये के नुकसान के बारे में बैंकवार जानकारी मांगी थी।

पीएम मोदी ने जिनके पैर छुए, उनके आगे इंग्लैंड भी झुका

 वाराणसी :   प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाराणसी लोकसभा सीट से परचा दाखिल करने के बाद जिन अन्नपूर्णा शुक्ला के पांव छुए थे, उन्होंने ही इंग्लैंड को भी झुकने के लिए मजबूर कर दिया था। अन्नपूर्णा की ही देन है कि आज दुनिया भर के हर ‘बेबी फ़ूड’ पर लिखा होता है कि ‘मां का दूध बच्चे के लिए सबसे उपर्युक्त आहार है’. अन्नपूर्णा वाराणसी लोकसभा सीट पर 2019 के चुनावों के लिए इस बार पीएम मोदी की चार प्रस्तावकों में से एक हैं.
आपने अक्सर बेबी फ़ूड प्रोडक्ट्स पर लिखा देखा होगा कि, ‘मां का दूध नवजात के लिए बेहद जरूरी है क्योंकि यह बच्चों में रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास करता है।’ खासकर बच्चों के लिए आने वाले दूध के पाउडर के डब्बों पर ये ज़रूर लिखा रहता है। अन्नपूर्णा शुक्ला ने ही अपनी रिसर्च में पाया था कि माँ के दूध से बेहतर नवजात बच्चों के लिए कुछ भी नहीं है। इस रिसर्च के सामने आने के बाद ब्रिटेन की सबसे बड़ी बेबी फूड कंपनी ने इस बात को अपने हर प्रोडक्ट की पैकेजिंग के साथ छापना शुरू किया था।

बता दें कि अन्नपूर्णा की रिसर्च को ध्यान में रखकर ही ड़ब्ल्यूएचओ (वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन) ने नवजात के लिए छह महीनों तक मां का दूध ज़रूरी करार दिया था। उनकी ये रिसर्च साल 1969-72 में ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में प्रकाशित हुई थी। ये उनकी पीएचडी का रिसर्च टॉपिक भी था। अन्नपूर्णा बताती हैं कि हमने पाया था कि जो लोग नवजात के स्तनपान पर ध्यान नहीं दे रहे थे उनके बच्चे ओवरवेट और कम सक्रिय थे। इन रिसर्च के बाद कुछ बेबी फ़ूड कंपनियों ने तो ये सन्देश छापने पर सहमति दे दी थी लेकिन कुछ ऐसा करने पर ऐतराज जाता रहे थे जिन्हें ड़ब्ल्यूएचओ के निर्देशों के बाद ऐसा करना पड़ा था।
अन्नपूर्णा ने एक अंग्रेजी अखबार से बातचीत में बताया कि जब मोदी ने उनके पांव छुए तो उन्होंने सिर्फ इतना कहा- ‘तुम और ऊंचे शिखर पर जाओगे।’ बता दें कि अन्नपूर्णा शुक्ला को मदन मोहन मालवीय की मानस पुत्री माना जाता है। अन्नपूर्णा शुक्ला बीएचयू महिला महाविद्यालय की प्रोफ़ेसर रही हैं और उन्होंने मेडिकल की पढ़ाई भी बीएचयू से ही की है। अन्नपूर्णा लहुराबीर स्थित काशी अनाथालय की संस्था वनिता पॉलीटेक्निक की मानद निदेशिका भी हैं। अन्नपूर्णा शुक्ला के पति बीएन शुक्ला गोरखपुर विवि के कुलपति रह चुके हैं और रूस में भारत के राजनयिक भी रहे हैं।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के पहले स्वतंत्रता सेनानी तिलका मांझी

साल 1857 में मंगल पांडे की बन्दुक से निकली गोली ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ़ विद्रोह का आगाज़ किया। इस विद्रोह को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का पहला विद्रोह माना जाता है और मंगल पांडे को प्रथम क्रांतिकारी। हालांकि, 1857 की क्रांति से लगभग 80 साल पहले बिहार के जंगलों से अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ़ जंग छिड़ चुकी थी। इस जंग की चिंगारी फूंकी थी एक आदिवासी नायक, तिलका मांझी ने, जो असल मायनों में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के पहले क्रांतिकारी थे। भले ही आपको हमारे इतिहास में तिलका मांझी के योगदान का कोई ख़ास उल्लेख न मिले, पर समय-समय पर कई लेखकों और इतिहासकारों ने उन्हें ‘प्रथम स्वतंत्रता सेनानी’ होने का सम्मान दिया है। महान लेखिका महाश्वेता देवी ने तिलका मांझी के जीवन और विद्रोह पर बांग्ला भाषा में एक उपन्यास ‘शालगिरर डाके’ की रचना की। एक और हिंदी उपन्यासकार राकेश कुमार सिंह ने अपने उपन्यास ‘हुल पहाड़िया’ में तिलका मांझी के संघर्ष को बताया है। तिलका मांझी का जन्म 11 फरवरी, 1750 को बिहार के सुल्तानगंज में ‘तिलकपुर’ नामक गाँव में एक संथाल परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम सुंदरा मुर्मू था। वैसे उनका वास्तविक नाम ‘जबरा पहाड़िया’ ही था। तिलका मांझी नाम तो उन्हें ब्रिटिश सरकार ने दिया था। पहाड़िया भाषा में ‘तिलका’ का अर्थ है गुस्सैल और लाल-लाल आँखों वाला व्यक्ति। साथ ही वे ग्राम प्रधान थे और पहाड़िया समुदाय में ग्राम प्रधान को मांझी कहकर पुकारने की प्रथा है। तिलका नाम उन्हें अंग्रेज़ों ने दिया। अंग्रेज़ों ने जबरा पहाड़िया को खूंखार डाकू और गुस्सैल (तिलका) मांझी (समुदाय प्रमुख) कहा। ब्रिटिशकालीन दस्तावेज़ों में भी ‘जबरा पहाड़िया’ का नाम मौजूद हैं पर ‘तिलका’ का कहीं उल्लेख नहीं है।

तिलका मांझी की प्रतिमा

तिलका ने हमेशा से ही अपने जंगलो को लुटते और अपने लोगों पर अत्याचार होते हुए देखा था। गरीब आदिवासियों की भूमि, खेती, जंगली वृक्षों पर अंग्रेज़ी शासकों ने कब्ज़ा कर रखा था। आदिवासियों और पर्वतीय सरदारों की लड़ाई अक्सर अंग्रेज़ी सत्ता से रहती थी, लेकिन पर्वतीय जमींदार वर्ग अंग्रेज़ी सत्ता का साथ देता था। धीरे-धीरे इसके विरुद्ध तिलका आवाज़ उठाने लगे। उन्होंने अन्याय और गुलामी के खिलाफ़ जंग छेड़ी। तिलका मांझी राष्ट्रीय भावना जगाने के लिए भागलपुर में स्थानीय लोगों को सभाओं में संबोधित करते थे। जाति और धर्म से ऊपर उठकर लोगों को देश के लिए एकजुट होने के लिए प्रेरित करते थे। साल 1770 में जब भीषण अकाल पड़ा, तो तिलका ने अंग्रेज़ी शासन का खज़ाना लूटकर आम गरीब लोगों में बाँट दिया। उनके इन नेक कार्यों और विद्रोह की ज्वाला से और भी आदिवासी उनसे जुड़ गये। इसी के साथ शुरू हुआ उनका ‘संथाल हुल’ यानी कि आदिवासियों का विद्रोह। उन्होंने अंग्रेज़ों और उनके चापलूस सामंतो पर लगातार हमले किए और हर बार तिलका मांझी की जीत हुई। साल 1784 में उन्होंने भागलपुर पर हमला किया और 13 जनवरी 1784 में ताड़ के पेड़ पर चढ़कर घोड़े पर सवार अंग्रेज़ कलेक्टर ‘अगस्टस क्लीवलैंड’ को अपने जहरीले तीर का निशाना बनाया और मार गिराया। कलेक्टर की मौत से पूरी ब्रिटिश सरकार सदमे में थी। उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि जंगलों में रहने वाला कोई आम-सा आदिवासी ऐसी हिमाकत कर सकता है। साल 1771 से 1784 तक जंगल के इस बेटे ने ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध लंबा संघर्ष किया। उन्होंने कभी भी समर्पण नहीं किया, न कभी झुके और न ही डरे। उन्होंने स्थानीय सूदखोर ज़मींदारों एवं अंग्रेज़ी शासकों को जीते जी कभी चैन की नींद सोने नहीं दिया। अंग्रेज़ी सेना ने एड़ी चोटी का जोर लगा लिया, लेकिन वे तिलका को नहीं पकड़ पाए। ऐसे में, उन्होंने अपनी सबसे पुरानी नीति, ‘फूट डालो और राज करो’ से काम लिया। ब्रिटिश हुक्मरानों ने उनके अपने समुदाय के लोगों को भड़काना और ललचाना शुरू कर दिया। उनका यह फ़रेब रंग लाया और तिलका के समुदाय से ही एक गद्दार ने उनके बारे में सूचना अंग्रेज़ों तक पहुंचाई। सूचना मिलते ही, रात के अँधेरे में अंग्रेज़ सेनापति आयरकूट ने तिलका के ठिकाने पर हमला कर दिया। लेकिन किसी तरह वे बच निकले और उन्होंने पहाड़ियों में शरण लेकर अंग्रेज़ों के खिलाफ़ छापेमारी जारी रखी। ऐसे में अंग्रेज़ों ने पहाड़ों की घेराबंदी करके उन तक पहुंचने वाली तमाम सहायता रोक दी। इसकी वजह से तिलका मांझी को अन्न और पानी के अभाव में पहाड़ों से निकल कर लड़ना पड़ा और एक दिन वह पकड़े गए। कहा जाता है कि तिलका मांझी को चार घोड़ों से घसीट कर भागलपुर ले जाया गया। 13 जनवरी 1785 को उन्हें एक बरगद के पेड़ से लटकाकर फांसी दे दी गई थी। जिस समय तिलका मांझी ने अपने प्राणों की आहुति दी, उस समय मंगल पांडे का जन्म भी नहीं हुआ था। ब्रिटिश सरकार को लगा कि तिलका का ऐसा हाल देखकर कोई भी भारतीय फिर से उनके खिलाफ़ आवाज़ उठाने की कोशिश भी नहीं करेगा। पर उन्हें यह कहाँ पता था कि बिहार-झारखंड के पहाड़ों और जंगलों से शुरू हुआ यह संग्राम, ब्रिटिश राज को देश से उखाड़ कर ही थमेगा। तिलका के बाद भी न जाने कितने आज़ादी के दीवाने हंसते-हंसते अपनी भारत माँ के लिए अपनी जान न्योछावर कर गये। आज़ादी की इस लड़ाई में अनगिनत शहीद हुए, पर इन सब शहीदों की गिनती जबरा पहाड़िया उर्फ़ तिलका मांझी से ही शुरू होती है। तिलका मांझी आदिवासियों की स्मृतियों और उनके गीतों में हमेशा ज़िंदा रहे। न जाने कितने ही आदिवासी लड़ाके तिलका के गीत गाते हुए फांसी के फंदे पर चढ़ गए। अनेक गीतों तथा कविताओं में तिलका मांझी को विभिन्न रूपों में याद किया जाता है-

रायपुर में नीलांबर द्वारा रंग विनोद का आयोजन, सम्मानित किये गये कवि विनोद कुमार शुक्ल

रायपुर : नीलांबर कोलकाता द्वारा हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि एवं लेखक विनोद कुमार शुक्ल पर केंद्रित कार्यक्रम ‘रंग विनोद’ का आयोजन रायपुर के वृंदावन सभागार में 21 अप्रैल को किया गया।कार्यक्रम के आरंभ में उनके जीवन एवं रचनाकर्म पर आधारित ‘हम जैसा उन्हें जानते हैं’ शीर्षक से नीलांबर द्वारा निर्मित एक वीडियो फिल्म दिखाई गई।स्वागत वक्तव्य देते हुए नीलांबर संस्था के अध्यक्ष यतीश कुमार ने कहा कि संस्था हमेशा साहित्य के उत्थान के लिए प्रयासरत है।उन्होंने बताया है कि नीलांबर द्वारा प्रत्येक वर्ष किसी एक महत्वपूर्ण रचनाकार के समग्र रचनाकर्म पर आधारित कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे । इसी श्रृंखला का यह पहला आयोजन है।इस कार्यक्रम की अध्यक्षता हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि एवं आलोचक अशोक वाजपेयी ने की। इस कार्यक्रम के व्याख्यान सत्र में विनोद कुमार शुक्ल के रचना कर्म को समग्रता से देखने का प्रयास किया गया।इस सत्र के मुख्य वक्ता थे नरेश सक्सेना, बसंत त्रिपाठी, संजीव बख्शी, गीत चतुर्वेदी, शाश्वत गोपाल शुक्ल, आशीष मिश्र और योगेश तिवारी। सभी वक्ताओं ने उनके रचना कर्म के विभिन्न पहलुओं पर सारगर्भित चर्चा की।
सर्वप्रथम शाश्वत गोपाल शुक्ल ने अपने पिता विनोद कुमार शुक्ल के जीवन एवं रचनाकर्म से जुड़े कई संस्मरण सुनाए।उन्होंने कहा कि पिताजी ने घर पर पढ़ने का संस्कार दिया।मुक्तिबोध और हरिशंकर परसाई से हमारा साक्षात्कार उन्हीं के मार्फत हुआ। युवा आलोचक योगेश तिवारी ने विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यासों में प्रकृति चित्रण पर विस्तार से बताते हुए कहा कि उनके उपन्यासों की दुनिया जादुई यथार्थ रचते हैं। उनके उपन्यासों की प्रकृति अज्ञेय की असाध्य वीणा की तरह है। विनोद कुमार शुक्ल की भाषा पर प्रकाश डालते हुए युवा आलोचक आशीष मिश्र ने कहा कि वे भाषा की स्वाभाविकता को तोड़ते हैं। उन्हें पढ़ते हुए रघुवीर सहाय याद आते हैं।इनकी कविताओं के बिम्ब विस्तार से खुलते हैं।यह वस्तुसत्ता का सूक्ष्म अन्वेषण है।कथाकार संजीव बख्शी जी ने विनोद कुमार शुक्ल की कविता में छत्तीसगढ़ को रेखांकित किया। उनकी कविता ‘रायपुर-बिलासपुर संभाग’ के संदर्भ के आधार पर उनकी कविता और भाषा में छत्तीसगढ़ी शब्द शक्ति पर प्रकाश डाला।अन्य कविताओं में छत्तीसगढ़ी समाज जिस तरह आया उसे विस्तार से व्यक्त किया।वे छत्तीसगढ़ी सरलता, सहजता के चितेरे हैं।बसंत त्रिपाठी ने विनोद कुमार शुक्ल के ‘जादुई यथार्थ’ पर प्रकाश डाला। उनके उपन्यासों में अविश्वसनीय चित्र हैं जो विमुग्धकारी है।वे ‘लकड़ी की बंदूक’ से धायं की आवाज निकालने वाले लेखक हैं।वे उपन्यास कहते हैं, लिखते नहीं।गीत चतुर्वेदी ने विनोद कुमार शुक्ल की कविता में प्रेम पर प्रकाश डाला।उनकी कविता में जहाँ प्रेम नहीं हो वहां भी वे प्रेम स्थापित कर लेते हैं ।उनकी कविताओं में अबोध प्रेम की भावना अधिक है।उनकी कविताएं मनुष्य को देखने की दृष्टि है। उनकी कविताओं में सूक्ष्म काया का प्रेम है। उनकी कविता में घर पृथ्वी की तरह आता है और प्रेम भी उसी तरह आता है।उनकी कविता में प्रेम सर्वकल्याणकारी तत्व की तरह रहा है। उन्होंने कविता के आस्वादन की परंपरा को बदल दिया।वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना ने उनके आरंभिक दिनों को रेखांकित किया।

उन्होंने युवा अवस्था में लिखी कविताओं और संस्मरणों को रोचकता से प्रस्तुत किया ।वे साधारण को असाधारण तरीके से प्रस्तुत करने वाले हिंदी के अकेले कवि हैं।उनकी कविता भाषा के व्याकरण को लगातार बदलती रहती है। अशोक बाजपेयी ने हिंदी कविता की परंपरा में विनोद कुमार शुक्ल की जगह तलाशते हुए कहा कि वे गोत्रहीन और वंशहीन कवि हैं।साहित्य में उनका कोई पूर्वज नहीं है।वे अतियथार्थ के कवि हैं। उनमें किसी नाटकीयता का उद्यम नहीं है। वे स्थानीयता के लिहाज से मुक्तिबोध और श्रीकांत वर्मा से भी बड़े कवि हैं। उनकी कविता में पारंपरिक रस फिट नहीं बैठते हैं इसलिए मैं इसे एक नया रस मानते हुए ‘विनोद रस’ कहता हूँ। वे विचारशील कवि हैं एवं उनकी कविता का भूगोल आश्चर्यजनक है। व्याख्यान सत्र का संचालन संजय राय ने किया।
दूसरे सत्र की शुरुआत विनोद कुमार शुक्ल की कविता ‘हताश से एक व्यक्ति बैठ गया था’ पर नीलांबर द्वारा निर्मित वीडियो के प्रदर्शन से हुआ। इसके बाद नीलांबर की टीम द्वारा उनके साहित्य के हिस्सों को लेकर बने कोलाज एवं उनकी कहानी ‘गोष्ठी’ पर इसी नाम से बनी फिल्म प्रदर्शित की गयी, जिसे ऋतेश पांडेय ने निर्देशित किया है। इस फिल्म में मूख्य भूमिका निभाई ऋतेश पांडेय, यतीश कुमार, विमलेश त्रिपाठी,स्मिता गोयल,विशाल पांडेय एवं दीपक कुमार ठाकुर ने।विमलेश त्रिपाठी ने विनोद कुमार शुक्ल पर लिखी कविता सुनाई।कार्यक्रम के अंत में उनके रचनाकर्म के सहयात्री रहे नरेश सक्सेना के हाथों मानपत्र एवं अशोक वाजपेयी के हाथों स्मृति चिन्ह देकर विनोद कुमार शुक्ल का सम्मान किया गया।मान पत्र का पाठ अनिला राखेचा ने किया। विनोद कुमार शुक्ल की पत्नी सुधा शुक्ल का सम्मान रंगकर्मी एवं अभिनेत्री कल्पना झा द्वारा किया गया । इस कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण रहा विनोद कुमार शुक्ल का कविता पाठ।धन्यवाद ज्ञापन छत्तीसगढ़ फिल्म और विजु़अल आर्ट सोसायटी के अध्यक्ष सुभाष मिश्र ने किया। सत्र का संचालन आनंद गुप्ता और ममता पांडेय ने किया। इस अवसर पर छत्तीसगढ़ और देश के विभिन्न हिस्सों से भारी संख्या में आए साहित्यप्रेमी मौजूद थे।कार्यक्रम के संयोजन में मनोज झा एवं अभिषेक पांडेय की महत्वपूर्ण भूमिका रही।कार्यक्रम के आयोजन में छत्तीसगढ़ फिल्म एंड विजु़अल आर्ट सोसायटी ने सहयोग किया।

– आनंद गुप्ता
नीलांबर कोलकाता

स्त्री मन की कथा है कतरा कतरा जिन्दगी

कोलकाता : कलकत्ता गर्ल्स कॉलेज के हिंदी विभाग की ओर से युवा लेखिका शुभ्रा उपाध्याय के नवीनतम कहानी संग्रह ‘ कतरा कतरा जिंदगी ‘ पर एक परिचर्चा का आयोजन किया गया । स्वागत वक्तव्य देते हुए कॉलेज की प्राचार्य डॉ. सत्या उपाध्याय ने कहा कि हिंदी विभाग की ओर से नए रचनाकारों की पुस्तकों पर चर्चा के लिए एक श्रृंखला का आयोजन किया गया है ताकि पठन-पाठन के साथ रचनात्मकता पर चर्चा हो सके,इसी कड़ी में यह परिचर्चा आयोजित की गई है । उन्होंने कहा कि शुभ्रा उपाध्याय हमारे समय की संभावनाशील कथाकार हैं ।डॉ मृत्युंजय पांडे ने कहा कि शुभ्रा उपाध्याय की कहानियों में जीवन की छोटी सी छोटी घटना का जिक्र है। डॉ. गीता दुबे ने कहा कि शुभ्रा उपाध्याय की कहानियों में स्त्री मन की कथा का आख्यान है,वे स्त्रियों के मन की बात को बेबाकी से कहती हैं ।नाटककार उमा झुनझुनवाला ने उनकी भाषा और कहन शैली को काव्यात्मक और बिम्बात्मक मानते हुए कहा कि उनकी कहानियों में पाठकों को बांधने की क्षमता है।प्रो आशुतोष सिंह ने कहा कि शुभ्रा उपाध्याय का यह संग्रह स्त्री लेखन को व्यापक बनाने की दिशा में सार्थक प्रयास है। लेखिका में ईमानदारी के साथ संवेदना का प्रबल आग्रह है। आलोचक प्रियंकर पालीवाल ने कहा कि शुभ्रा उपाध्याय की कहानियां परिपक्व और पठनीय है । पुस्तक की लेखिका शुभ्रा उपाध्याय ने सभी अपनों के प्रति आभार प्रकट करते हुए कहा कि मेरे आसपास की घटनाओं ने कुछ लिखने के लिए प्रेरित किया है। अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए सेराज खान बातिश ने सभी वक्ताओं और लेखिका के विचारों पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इस पुस्तक में सामाजिक मूल्यों के प्रति गहरी आस्था है। कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ धनंजय साव एवं धन्यवाद ज्ञापन प्रो अम्बर चौधरी ने दिया ।इस अवसर पर डॉ इतु सिंह, प्रो. संजय कुमार जायसवाल, राज्यवर्धन, जीतेंद्र जीतांशु,सुफिया यास्मीन,प्रो रूद्राक्षा पांडेय, सुषमा त्रिपाठी, मधु सिंह, राहुल गौड़ सहित सैकड़ों छात्र एवं साहित्य प्रेमी उपस्थित थे ।

इतिहास की नजर से इतिहास को देखती एक किताब

हम भारतीय अगर किसी चीज को गम्भीरता से नहीं लेते तो वह हमारा इतिहास है। ऐसे में अपनी ऐतिहासिक विरासतों को हम कितनी गम्भीरता से लेते हैं, यह भी जाहिर है मगर इतिहास के प्रति आम आदमी को जागरुक करने में बड़ी भूमिका होती है किसी पुरात्वविद की। वह सच पर से परदा उठाता है और धरोहरों को सहेजता है। राजनीति और धर्म के घालमेल के बीच इस देश में यह काम कितना मुश्किल है और जोखिम भरा है, यह बात समझ आती है जब हम के के मुहम्मद की किताब मैं हूँ भारतीय पढ़ते हैं। लेखक के अनुसार मार्क्सवादी विचार के प्रख्यात इतिहासकारों का सामना भी उनको करना पड़ा है और इस क्रम में हैरतअंगेज तरीके से जो नाम सामने आता है, वह प्रो. इरफान हबीब का है। हबीब और मुहम्मद के तीखे मतभेदों की कहानी इस किताब में है और लेखक ने तो हबीब को षडयंत्रों का आचार्य तक कह डाला है। मुहम्मद ने बाबरी मस्जिद समस्या को एक साम्प्रदायिक समस्या के रूप में प्रचारित करने के लिए हबीब को आड़े हाथों लिया है तो हिन्दुत्ववादियों की बुद्धिहीनता को कोसने से भी नहीं चूके हैं। मुहम्मद को मुगल भारत में पहले ईसाई चर्च की खोज करने का भी श्रेय प्राप्त है। जिन्दगी में गुजरे रास्ते, मिले हुए लोग, किये गये यज्ञ, किताब का सार भी यही है। वह बताते हैं कि अपने कार्यकाल में हिन्दू और मुस्लिम चश्मे से अपने काम को नहीं देखा और अप्रिय सत्य कहते रहे इसलिए वे किसी के प्रिय न हो सके। मुहम्मद को उनकी माँ मुसलियार यानी एक प्रकार का मुस्लिम धार्मिक पुरोहित बनाना चाहती थीं। आप दुर्लभ मूर्तियों के बेचने के गोरख धंधे के बारे में जान पाते हैं। आपको पता चलता है कि भारत में 10 लाख में बिकने वाली मूर्ति अमेरिका में जाकर 10 करोड़ की हो जाती है। मुहम्मद कहते हैं, हमारे पुराणों और इतिहास में बताए गए महत्वपूर्ण क्षेत्रों का उत्खनन करके इतिहास की सच्चाई सामने दिखाने में विलम्ब हो गया है। हस्तिनापुर, मथुरा जैसे इलाकों की स्थिति शोचनीय है। मुहम्मद ने वैशाली में केसरिया स्तूप का पता लगाया। इतिहास के राजनीतिक दुरुपयोग पर बात करते हुए वे बताते हैं कि किस तरह सारनाथ के बौद्ध स्तूप को लेकर उन पर राजनीतिक दबाव डाला गया। इसी प्रकार ताज कॉरिडोर में मायावती के कुछ अफसरों ने दबाव डाला। वे ताज परिसर में 200 से अधिक व्यापार समुच्चय बनाना चाहते थे मगर तब आगरा परिमण्डल के अधीक्षण पुरात्वविद के रूप में मुहम्मद ने इसकी अनुमति नहीं दी। इसी मामले पर तत्कालीन भाजपा – मायावती सरकार गिरी भी थी।

लेखक इस सन्दर्भ में आदिवासियों की भूमिका की प्रशंसा करते हैं जहाँ उन्होंने 100 से अधिक मंदिरों का जीर्णोद्धार किया। डाकुओं की मदद से वटेश्वर मंदिर को दोबारा सँवारा गया। इस मामले में उन्होंने ज्योतिराजे सिन्धिया और यशोधरा राजे सिन्धिया के सहयोग की सराहना की है। बात जब दिल्ली के पुराने किले की आते है तो हमें मुहम्मद के माध्यम से पता चलता है कि इस किले की ध्वनि व प्रकाश प्रस्तुति में इन्द्रप्रस्थ का उल्लेख ही नहीं है जबकि महाभारत कालीन धूसर मृतभांड इस किले में मिलते हैं। एक महत्वपूर्ण बात यह है कि हमारे पास शिव और गंगा की नगरी काशी का मह्त्व बताने वाला एक भी सँग्रहालय नहीं है क्योंकि हम इतिहास को इतिहास की तरह नहीं देखते बल्कि एक साम्प्रदायिक दृष्टिकोण के साथ देखते हैं। मुहम्मद एक बड़ी बात कहते हैं, -प्रतीकों को हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई कहकर बाँट देना इतिहास के साथ भद्दा मजाक है। बाबरी मस्जिद प्रकरण में वे वामपंथी इतिहासकारों को लेकर सवाल उठाते हैं जिन्होंने उग्रपंथी मुस्लिम गुट की मदद करते हुए बाबरी मस्जिद नहीं छोड़ने को कहा। मुहम्मद के मुताबिक 15 दिसम्बर 1990 को उन्होंने बयान दिया कि बाबरी मस्जिद के नीचे मंदिर के अंशों को उन्होंने खुद देखा है। कुल मिलाकर यह किताब उन तमाम पहलुओं को उठाती है जिनसे मुहम्मद खुद गुजरे हैं, जिनको यह कहने में गुरेज नहीं कि भाजपा सरकार के समय में ऐतिहासिक स्थलों तथा इमारतों के संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया गया। मुझे लगता है कि एक पुरात्वविद कहीं अधिक निष्पक्षता के साथ चीजों को देखता है क्योंकि वह उसका ध्येय है माध्यम नहीं। किताब में तस्वीरों के माध्यम से मुहम्मद द्वारा ऐतिहासिक इमारतों की कायापलट दिखायी गयी है, उनकी उपलब्धियाँ भी हैं। मतभेद अपनी जगह हैं मगर कई रहस्यों को यह किताब खोलती है।। इस किताब से गुजरना एक अच्छा अनुभव रहा। ऐसी किताबें लिखी भी जानी चाहिए और पढ़ी भी जानी चाहिए।
मैं हूँ भारतीय
के के मुहम्मद
प्रभात प्रकाशन

लोकतन्त्र और चुनाव

सिम्पी मिश्रा

भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में चुनाव आज भी अपने मूल रीति-नीति को नहीं अपना पा रहा है. अब इसे हमारे देश का दुर्भाग्य कहें या दलदली राजनीति का प्रतिफल , यह जनता और राजनेता स्वयं तय करें तो बेहतर होगा! आमतौर पर चुनाव का मूल केंद्रबिंदु राष्ट्र, समाज और जनता के मूल मुद्दों को देखना, समझना उन्हें महसूस करना और सत्ता प्राप्ति के पंचवर्षीय कार्यकालों के दौरान उन तमाम समस्याओं का समाधान करना होना चाहिए  परन्तु यहाँ  मामला एकदम इसके उलट दिखाई देता है। सवा सौ करोड़ जनता वाले इस देश में 29 राज्यों के लगभग 500-600 व्यक्ति महज अपना पद- रुतबा और अपनी तिजोरी को लक्ष्य मानकर उन्हें बनाने और बचाने के लिए जाने कितने वादें, झूठ फरेब, घड़ियाली आँसू, दो चार दस पद यात्राएं, अपशब्द, बेतुके, विषाक्त, हीनता-नीचता, अमर्यादित भाषा, उपाधियों एवं जुमलों से परिपूर्ण गलाफाड़ भाषण देने को अनिवार्य प्रक्रिया मानकर दंगे, फसाद भड़का कर अपनी रोटी सेंकने में विश्वास रखते हैं और कदाचित इसको लक्ष्य मानकर चंद दिनों की “जी तोड़ मेहनत” करके अगले पाँच सालों तक इसका फल भी जम कर खाते हैं एवं अपने घर-परिवार, रिश्ते-नातेदारों, करीबियों को खिलाते भी हैं और जनता वापस से चली जाती है वहीं जहां ये राजनेता चाहते हैं  ‘भाड़’ में।

यदि हम तनिक भी सचेतनता की दृष्टि से जाति, धर्म,वर्ग और लिंग के घेरे से बाहर निकल कर देखें तो वर्तमान समय में किसी भी पार्टी के घोषणा पत्र में जनता की वास्तविक और जमीनी समस्याओं से जुड़े मुद्दें नजर नहीं आयेंगे। हर जगह सिर्फ एक-दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप , बेतुकी बातें और बड़प्पन वाले जुमले ही कभी टिमटिम करते तो कभी भकभकातें हुए आँखों को चौंधियाने वाले प्रतीत होते हैं. हर संस्था यहां किसी न किसी अन्य संस्था का या तो चाटुकार या तो धुर विरोधी ही नज़र आता है।

हर दल हरेक पार्टी भ्रष्टाचार और एक से बढ़ कर एक जुमलेबाज़ी के अथाह समुद्र में गोते लगाता नजर आता है।  मूलभूत समस्याएं जैसे – रोजगार , शिक्षा, स्वास्थ्य इत्यादि गड़े मुर्दे की भांति ही नज़र आते हैं। चुनाव आते ही इन मुर्दों के ताबूत को कभी-कभी साफ़ सफाई के बहाने याद कर लिया जाता है किन्हीं तथाकथित सजग और जनप्रिय ‘नेता’ के द्वारा, तत्पश्चात परिणाम वही “ढाक के तीन पात” रहते है।

कहीं न कहीं जनता की भी उदासीनता इसका एक कारण है परन्तु इससे कही अधिक यह ‘दलदली राजनीति’ और ‘वंश के दंश’ से आहत जुगलबंदी का परिणाम है। कभी कभी ऐसा प्रतीत होता है कि ‘लोकतंत्र का यह महापर्व’ जिसे हम चुनाव कहते है वह महज सतारूढ़ होने की लाॅटरी हो गई है या यूँ कहें कि बाहुबलियों और समर्थ व्यक्तियों द्वारा अपनी किस्मत को आजमाने का पंचवर्षीय अनुष्ठान बन गया है जिसमें हर प्रत्याशी येन-केण-प्रकारेण सफल होना चाहता है, जिसमें जनता एवं उनके और तमाम जरूरी मुद्दें इस अनुष्ठान की हवन सामग्री बन जाती है जिसे इनके चुनाव प्रचार के सभारुपी कुंड में ‘स्वाहा-स्वाहा’ के मंत्र के साथ प्रविष्ट किया जाता है और सत्तासीन सरकारों का जो दावा होता है  कि विगत पाँच सालों में उनकी उपलब्धियां ‘ऐसी रही –वैसी रही’ वो महज इस आयोजित अनुष्ठान का वो बासी प्रसाद सिद्ध होता है जिसे जाने कितने आशावादी भक्तों की हथेली प्राप्त भी नहीं कर पाती , न जाने कितने मुंह भी  इस प्रसाद से अछूते रह जाते हैं!

तो इस तरह ये चुनावी महापर्व (अनुष्ठान) खुद ही एक दायरे में जाने कितनी वर्जनाओं में जकड़ा हुआ है तो फिर इसका फल भला विशुद्ध कैसे हो! ये हम जनता जनार्दन स्वयं अनुमान लगा सकते हैं। अतः आवश्यकता इस बात की है कि “चुनाव को महज चुनाव” ही रहने दिया जाए। इसे ना तो भगवा में रंग कर देखा  जाय, ना ही बिना सोचे समझे हाथ का साथ मिलना चाहिये, ना बिना आकलन के लाल मान लिया जाए , ना ही बिना पड़ताल के हरा बना दिया जाय अर्थात इसे इसकी ‘सफेदी’ मतलब मूल तिरंगे के रूप  में ही रहने दिया जाय एवं “जनता का जनता के लिए जनता के द्वारा” उक्ति के वास्तविक स्वरुप तक पहुँचने दिया जाय। तभी चुनाव का यह महापर्व सफल और सार्थक हो सकता है।

 

नेताओं से बदलाव की उम्मीद छोड़िए..खुद आगे बढ़िए

ये मई बहुत ऐतिहासिक होने जा रही है,,न सिर्फ इसलिए कि देश को एक नयी सरकार मिलेगी बल्कि यह हमारे देश की विकास की दिशा भी तय करेगी। एक मतदाता के तौर पर जनता की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। बहरहाल, चुनाव के नतीजों पर कुछ भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि जनता का मूड क्या है, कोई नहीं जानता मगर बतौर नागरिक हमारी जिम्मेदारी जरूर है कि हम ऐसी सरकार चुनें जो हमारे देश को समृद्ध ही न करे बल्कि सुरक्षित भी करे। सुरक्षा ही विकास और समृद्धि का आधार है। यकीन नहीं होता तो सीरिया और इराक जैसे उदाहरण हमारे सामने हैं, सुरक्षा की चूक कितनी भारी पड़ सकती है, यह हमने मुम्बई आतंकी हमले में देखा और इस वक्त श्रीलंका को यह बात समझनी है। जब देश सुरक्षित होंगे तो हमारी धरती भी सुरक्षित होगी…दिक्कत यह है कि इसे लेकर हमारे देश में पक्ष – विपक्ष हर ओर से बयानबाजी खूब हो रही है। भाषणों का स्तर गिरा है, नितान्त व्यक्तिगत हमले हो रहे हैं और अभद्र व जातिवाद को उकसाने वाली राजनीति हो रही है। दरअसल, हम जातिवादी सोच में बँधे हैं इसलिए पार्टियों को इतनी हिम्मत होती है कि वे कायस्थ, हिन्दू, मुसलमान देखकर प्रत्याशी चुनती हैं..सोच रही हूँ कि क्या वह दिन कभी आएगा जब हम इन संर्कीणताओं से दूर होंगे। जो चीजें नेताओं का कर्तव्य हैं, वह निभा दें तो अब हमें उपलब्धि लगने लगी है और नेताओं के लिए उनकी परम्परागत सीट अपनी पैतृक सम्पत्ति लगने लगी है। यही कारण हैं कि देर से बेड टी मिलती है तो मुनमुन सेन जैसी अभिनेत्री सांसदों को हिंसा नहीं दिखती और दिखती भी है तो वह बहुत छोटी बात होती है। यह सोच चाहे किसी भी दल की हो मगर अन्ततः हमारे देश को एक बार तो उसी राजशाही की ओर ले ही जा रही है जिससे हम पूरे 200 साल संघर्ष करने के बाद आजाद हुए। सच तो यह है कि हमें अब नेताओं से बदलाव की उम्मीद छोड़ देनी चाहिए और खुद को बदलना होगा..अच्छे लोगों को राजनीति में आना होगा और पूरे संकल्प के साथ आगे आना होगा तभी हम आगे बढ़ सकेंगे और एक स्वस्थ व सकारात्मक सोच के साथ देश को आगे ले जा सकेंगे..आप तैयार हैं न।