Sunday, July 5, 2026
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निर्मला सीतारमण: 50 साल बाद किसी महिला के हाथ में वित्त मंत्रालय की कमान

नयी दिल्ली :   भाजपा की कद्दावर नेता निर्मला सीतारमण को मोदी सरकार में वित्त मंत्रालय दिया गया है। इसी के साथ वह देश की दूसरी महिला वित्त मंत्री बन गई हैं। गुरुवार को शपथ लेने बाद शुक्रवार को उन्हें वित्त मंत्रालय की कमान सौंपी गई। वित्त मंत्रालय के साथ निर्मला को कॉरपोरेट मामलों का मंत्री भी बनाया गया है। इससे पहले देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी 1970 से 1971 तक एक साल के लिए देश की वित्त मंत्री थीं। निर्मला को पिछली सरकार में रक्षा मंंत्री और उससे पहले कॉरपोरेट कार्य का मंत्री बनाया गया था। साल 2006 में वह भाजपा का हिस्सा बनीं और तभी से पार्टी से जुड़ी हुई हैं।  निर्मला को वित्त मंत्रालय सौंपने के पीछे एक बड़ी वजह है। उन्होंने अपनी स्नातक और मास्टर की पढ़ाई अर्थशास्त्र में की है। मास्टर्स की डिग्री जेएनयू से ली है। जेएनयू से ही उन्होंने एम फिल की पढ़ाई की। उनके पति पी. प्रभाकर भी आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू के सूचना सलाहकार रहे थे।  मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में निर्मला सीतारमण रक्षा मंत्री थीं। तब भी निर्मला दूसरी ऐसी महिला रहीं, जिन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बाद रक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाली थी। पिछली सरकार में रक्षा मंत्री के तौर पर निर्मला ने अच्छा काम किया था। इस बार उन्हें वित्त मंत्रालय का कार्यभार सौंपा गया।  साल 2010 से लेकर 2014 तक निर्मला भाजपा की प्रवक्ता भी रहीं। 2016 से कर्नाटक से वो राज्यसभा की सदस्य थीं और साल 2014 से 2016 तक आंध्र प्रदेश से राज्यसभा की सदस्य रहीं।

फैशन को दें थोड़ा ऑर्गेनिक टच

फैशन ऐसा होना चाहिए जिसमें कुदरत से प्यार छलके। पर्यावरण संरक्षण की बात होती है तो गो ग्रीन की बात चलती है तो हर चीज हरे रंग से रंग दी जाती है मगर यह पर्यावरण के अनुकूल नहीं है। जरा सोचिए क्या जब केमिकल नहीं होते थे तो चीजें कम खूबसूरत होती थीं…नहीं..प्रकृति को साथ लेकर भी फैशन को शानदार बनाया जा सकता है। मसलन, रंग से लेकर फैब्रिक तक ऑर्गेनिक हो तो थोड़ी सी कोशिश से हम और आप पर्यावरण को सुरक्षित बना सकते हैं –
जिस तरह ऑर्गेनिक फूड लोगों की जिंदगी का हिस्सा बनता जा रहा है, उसी तरह फैशन में भी ऑर्गेनिक का जलवा छाने लगा है। कम केमिकल्स और प्राकृतिक रंगों के इस्तेमाल से बने फैब्रिक में कई नए प्रयोग किए जा रहे हैं।
ऑर्गेनिक या सस्टेनेबल फैशन में कार्बनिक कॉटन, बैंबू फैब्रिक और हाथ से बुनी खादी का उपयोग किया जाता है। इसमें रंग भी प्राकृतिक तत्वों से निकाले जाते हैं। इस तरह के फैब्रिक त्वचा के लिए अच्छे होते हैं क्योंकि इनसे स्किन एलर्जी की संभावना नहीं रहती। खासतौर पर गर्मियों में तो यह फैब्रिक बहुत अनुकूल रहता है। गहरे रासायनिक रंगों और केमिकल ट्रीटमेंट का चलन अब कम हो गया है। इसकी जगह हैंडमेड कॉटन।  बाँस की छाल से बने इको फ्रेड्ली कपड़े फैशन को नया आयाम दे रहे हैं। इसके लाभ देख कर लोग अब ऑर्गेनिक व इको फ्रेंड्ली कपड़ों की माँग कर रहे हैं। कुछ लोग इसे फैशन स्टेटमेंट की तरह देख रहे हैं तो कुछ जागरूकता का नतीजा मानते हैं। कई देसी-विदेशी ब्रैंड्स ऑर्गेनिक की राह पर चल पड़े हैं। सेहत और पर्यावरण को देखते हुए इस फैशन से रीजनल क्राफ्ट को फिर से जीवित कर पाने की उम्मीद जग रही है।
अब टेक्सटाइल और फैशन डिजाइनर डाइंग में होने वाले केमिकल्स के प्रयोग से बचना चाहते हैं। समस्या का समाधान यही है कि ऑर्गेनिक रंगों का अधिकाधिक इस्तेमाल किया जाए। हर्बल तत्वों से बुने गए कपड़े शहरी लोगों के लिए नई चीज हैं जिसे लोग तेजी से अपनाने लगे हैं।
हल्दी से पीला, टमाटर से लाल, शलजम से बैंगनी, इंडिगो से नीला रंग..ऐसे कई उपाय हैं कि अब रंगों को भी पर्यावरण अनुकूल बनाया जा सकता है।
चूंकि ऑर्गेनिक फैब्रिक महँगा होता है इसलिए बड़ी आबादी तक इसकी पहुँच भी मुश्किल होती है। ऑर्गेनिक रंग या प्रिंट्स भारतीय संस्कृति में लंबे समय से चलन में हैं। मैं इसे उपयोग में लाने को उत्सुक हूँ। यह फैब्रिक मुलायम और आरामदेह होता है। लोगों की प्राथमिकता में यह शामिल हो सके, इसके लिए अभी कुछ और प्रयास करने होंगे।

पर्यावरण के अनुकूल बने घरों की जरूरत

ग्रीन होम न केवल पर्यावरण अनुकूल होते हैं, बल्कि ये आज के समय की माँग भी हैं। स्वास्थ्य कारणों के चलते लोग अब इस तरह के घरों को तरजीह दे रहे हैं। शुरुआत में ये घर महंगे लग सकते हैं, लेकिन लंबे समय में इनमें रहने का बड़ा फायदा मिलता है। ग्रीन होम बिजली के बिल में 20-30 फीसदी की बचत कराने में मदद करता है। यह केवल उदाहरण है. इसके अलावा भी आपको कर्इ तरह के फायदे मिलते हैं –
1. बिजली की बचत ग्रीन होम में रहते हुए खरीदारों को कई तरह के फायदे मिलते हैं। इसमें सबसे महत्वपूर्ण है बिजली की बचत। ज्यादा खपत के चलते गर्मियों में अक्सर बिजली और पानी का बिल बढ़ जाता है। ग्रीन होम का निर्माण इस तरह से किया जाता है कि उन्हें प्राकृतिक रोशनी और हवा मिले। बिजली की मांग को कम करने के लिए इनमें सोलर पैनल का इस्तेमाल किया जाता है। इससे बिजली का बिल कम करने में मदद मिलती है।
2. पानी की बचत बढ़ते प्रदूषण और आबादी ने पानी के स्रोतों पर दबाव डाला है। कई शहरों में पानी की पहले से ही किल्लत है इसलिए इसे बचाना महत्वपूर्ण है। वॉटर हार्वेस्टिंग जैसे तरीके पानी की लागत को 30 से 50 फीसदी तक कम कर सकते हैं। ग्रीन होम न केवल पानी की लागत को घटाता है बल्कि इस सीमित प्राकृतिक संसाधन को बचाने में भी मदद करता है। बेंगलुरु के वैज्ञानिक एआर शिवकुमार अपने घर में पाइप्ड वाटर सप्लार्इ का इस्तेमाल नहीं करते हैं। वह कहते हैं कि किसी भी शहर के संसाधन सीमित हैं। इन्हें संभालकर खर्च करने की जरूरत है।
3. अच्छी आबोहवा घर में अच्छी आबोहवा का आनंद लेने के लिए महत्वपूर्ण है कि उसे इस तरह बनाया गया हो कि उसमें हवा आने-जाने का रास्ता कहीं बाधित नहीं होता हो। घर में पौधे हवा को साफ करते हैं इसलिए पौधे जरूर लगे होने चाहिए। शेड्स का इस्तेमाल कर गर्मी के थपेड़ों को रोका जा सकता है। सोलर चिमनी और एग्ज्हौस्ट फैन भी हवा की गुणवत्ता को बढ़ा देते हैं। शिवकुमार कहते हैं कि आप प्रकृति के जितना करीब जाते हैं। वह भी आपके पास उतना ही करीब आती है। पर्यावरण अनुकूल विकल्पों को अपनाना हम सबके फायदे में है।
4. प्राकृतिक रोशनी घर में प्राकृतिक रोशनी आने का सबसे बड़ा रास्ता हैं खिड़कियां। आपको घर की खिड़कियां चौबीस घंटे बंद करके नहीं रखनी चाहिए। अलबत्ता इनके रास्ते सूरज की रोशनी घर में आने देनी चाहिए। अपने ड्रॉइंग रूम और बेडरूम में अधिकतम प्राकृतिक रोशनी आने का रास्ता खोलने के लिए आप प्राकृतिक पेंट और हल्के रंगों का इस्तेमाल कर सकते हैं। फिर रोशनी के लिए इलेक्ट्रिक अप्लायंस पर आपकी निर्भरता कम हो जाएगी।
5. स्वस्थ जीवनशैली में मददगार जब सेहत का सवाल आता है तो जरूरी है कि घर में साफ हवा आती-जाती हो। वह प्रदूषण फैलाने वाले कैमिकल से मुक्त हो. ग्रीन होम में आपको स्वस्थ जीवनशैली को बनाए रखने में मदद मिलती है। पौधों और सौर ऊर्जा से घर के अंदर का वातावरण शुद्ध रहता है।
6. अच्छी रीसेल वैल्यू भी मिलती है। ग्रीन होम केवल पर्यावरण अनुकूल ही नहीं होते हैं बल्कि ये ज्यादा आकर्षक भी होते हैं। संभावित खरीदार को ये ज्यादा लुभाते हैं। कारण है कि ये कर्इ तरह के खर्चों को बचाते हैं। अगर ग्रीन होम अच्छी तरह से मेनटेन है तो उसकी रीसेल वैल्यू बढ़ जाती है।

(साभार – इकोनॉमिक टाइम्स)

बच्चों की आर्थिक जरूरतों के लिए जरूरी है तैयार रहना

माता-पिता बनना परम आनंद है, हालांकि यह अक्सर अतिरिक्त जिम्मेदारियों के साथ आता है। इन कर्तव्यों के बीच वित्तीय चुनौतियां आपकी समस्याओं को बढ़ा सकती हैं। इसके लिए, आपको स्पष्ट वित्तीय लक्ष्य बनाने होंगे और वित्तीय विशेषज्ञ की मदद से इसे हासिल करना होगा।
यह आपको आने वाली संभाव्य चुनौतियों के लिए मानसिक रूप से सचेत करता है, और आप इसके लिए व्यापक तैयारी कर पाते हैं। यह एक मात-पिता के रूप मे आपका आत्म-विश्वास बढ़ाता है और आप एक बच्चे को दुनिया मे लाने के लिए स्वयं को तैयार कर पाते हैं। यह आपको वित्तीय रूप से मजबूत बनाता है, और आपकी वित्तीय चिंताओं को कम करता है। इसकी वजह से आपकी अनावश्यक चिंताएँ कम होती हैं और आप बच्चे कि देखभाल पर पूरा ध्यान लगा पाते हैं। यह आपके खर्चों और आय के बीच नियंत्रण स्थापित करता है और आप अपनी आय का सही प्रबंधन कर पाते हैं।
आप अपनी योजना को तीन हिस्सों मे विभाजित कर सकते हैं। पहला, शिशु के जन्म के पहले। दूसरा, जन्म के बाद के दो साल और तीसरा, आगे के भविष्य के लिए। अपनी योजना को तीन हिस्सों मे बाँटना आपको बेहतर तरीके से तैयार होने मे मदद करता है। शिशु के जन्म के पहले
शिशु के जन्म के पहले की देखभाल सीधे तौर पर माँ से संबंधित है। माँ का ख्याल रखना बहुत महत्वपूर्ण है ताकि वह एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दे पाए। बच्चा जितना स्वस्थ होगा, आप उतने ही चिंतामुक्त रहेंगे। माँ की सभी आहार संबंधी आवश्यकताएँ पूरी करें, जरूरी आयरन या प्रोटीन पूरक देते रहना आवश्यक है। जन्म के बाद के दो साल यह अवधि सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहाँ आपको बहुत सारी चीजों का प्रबंधन करना होता है। बच्चे के दुनिया मे आने के बाद जिन खर्चों का सामना करना पड़ता है, उसमें प्रमुख हैं:
बच्चे का आहार : पहले छह महीने के लिए बच्चा पूर्णतः माँ के दूध पर ही निर्भर होता है। उसके बाद उसे अन्य आहार-संबंधी पूरक दिए जाते हैं। यदि किसी कारणवश माँ स्तनपान कराने मे सक्षम नहीं हो पाती है, तो कृत्रिम पूरक काफी ख़र्चीले हो सकते हैं।
डायपर : डायपर एक बच्चे की मूलभूत आवश्यकता है। बच्चे को संक्रमण से बचाने के लिए नियमित अंतराल पर डायपर बदलना जरूरी है। बढ़ते बच्चे के साथ डायपर का साइज़ और कीमत दोनों बढ़ते हैं।
कपड़े : जैसे-जैसे बच्चा बढ़ता है, उसके लिए ढेरों नए कपड़े की आवश्यकता होती है।
खिलौने: बच्चे को व्यस्त रखने के लिए और उसकी सक्रियता बढ़ाने के लिए खिलौने बहुत महत्वपूर्ण हैं।
जरूरी वस्तुएं: समय के साथ कुछ वस्तुओं की मांग उत्पन्न होती है। उदाहरण के तौर पर जब खाना छोर कर खिलाना हो तो ब्लेंडर की आवश्यकता हो सकती है।
फर्नीचर : आधुनिक समय मे बच्चे को ध्यान मे रखते हुए बनाए गए फ़र्निचर मौजूद हैं। यदि आप महंगे फ़र्निचर न भी खरीदें तो झूला इत्यादि खरीदने की आवश्यकता हो सकती है।
आया या नर्स: बच्चे और स्वयं के देखभाल के लिए आया या नर्स की आवश्यकता हो सकती है।
टीकाकरण : सम्पूर्ण टीकाकरण आवश्यक है। यह पहले महीने से लेकर 10-12 साल तक देने वाले टीके हो सकते हैं। सामान्यतया पहले दो साल के अंदर सभी प्रमुख टीके दिए जाते हैं।
डॉक्टर की फीस: बच्चे के स्वास्थ्य जांच के लिए आपको बार-बार डॉक्टर के पास जाना पड़ सकता है।
बच्चे की जन्मदिन पार्टी : बच्चे का आना खुशी लेकर आता है और लोग यह खुशी बाँटना चाहते हैं। यह पार्टी जन्म के तुरंत बाद या एक पहले जन्मदिवस पर हो सकती है। यह एक खर्चीला समारोह हो सकता है।यदि आगे के भविष्य को ध्यान मे रख जाए, तो इसमें स्कूल और पढ़ाई से संबंधित खर्चे शामिल हैं। आधुनिक समय मे शिक्षा सस्ती नहीं रह गई है। आप जितना खर्च कर सकते हैं, उस अनुसार विकल्प मौजूद हैं। इसके अलावा यदि आप बच्चे को खेल-कूद या या अन्य रचनात्मक गतिविधियों मे डालते हैं, तो उसमें मे भी अतिरिक्त खर्च होता है। यदि आप बच्चे को उच्च शिक्षा को भी ध्यान मे रखते हुए योजना बना रहे हैं तो, आने वाले 18 -20 सालों में होने वाले खर्चों के प्रति भी सावधान रहना आवश्यक है।
आप कुछ वित्तीय लक्ष्य निर्धारित कीजिए। इन लक्ष्यों को लघु अवधि योजनाओं और लम्बी अवधि वाली योजनाओं में बाँटिए। बच्चे का टीकाकरण, बर्थडे पार्टी इत्यादि शॉर्ट टर्म गोल्स हो सकते हैं और उच्च शिक्षा, बच्चे का विवाह आदि लॉन्ग टर्म गोल्स।
लघु अवधि योजनाओं  के लिए आपको ऐसे निवेश करने होंगे जो जल्द परिणाम दे जबकि लम्बी अवधि वाली योजनाओं के लिए आपको लंबे समय के निवेश के बारे मे सोचना होगा। लॉन्ग टर्म गोल्स एक शिशु बीमा पॉलिसी लेना फायदेमंद है, जबकि शॉर्ट टर्म गोल्स के लिए फिक्स्ड डिपॉजिट्स, छोटे निवेश या लोन इत्यादि के बारे मे विचार किया जा सकता है।
लक्ष्य निर्धारित करना महत्वपूर्ण है। यदि आपका लक्ष्य स्पष्ट नहीं है तो आप किसी आर्थिक सलाहकार से मिल सकते हैं। वो आपको उपलब्ध विकल्पों के बारे मे बता सकते हैं और आप अपनी सुविधानुसार अपने विकल्पों का चयन कर सकते हैं।
(साभार – दैनिक भास्कर)

स्तनपान कक्ष पाने वाला देश का पहला स्मारक बनेगा ताजमहल

आगरा : ताजमहल देश का पहला स्मारक होगा, जहाँ महिलाओं को स्तनपान कराने के लिए ब्रेस्टफीडिंग रूम बनाए जाएंगे। इसके अलावा आगरा के किला और फतेहपुर सीकरी में भी ऐसी ही सुविधा दी जाएगी। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के अधिकारी वसंत कुमार स्वर्णकार ने बताया कि सीढ़ियों के नीचे छिपकर स्तनपान कराती महिला को देखकर यह ख्याल आया है। स्वर्णकार के मुताबिक, बेबी फीडिंग रूम उन लाखों मांओं के लिए मददगार साबित होंगे, जो बच्चों को यहां लेकर आती हैं। स्तनपान कराना हर मां का अधिकार है। मेरा मानना है कि उनके लिए उचित व्यवस्था होनी चाहिए। मैं उनके लिए कुछ करना चाहता हूं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के मुताबिक, भारत में 36 हजार से अधिक स्मारकों में से ताजमहल पहला ऐसा है, जहां इस तरह की सुविधा दी जाएगी। वसंत कुमार का कहना है कि दुनिया के दूसरे स्मारक भी प्रेरणा लेंगे और ब्रेस्टफीडिंग रूम बनाएंगे। पिछले साल बेस्टफीडिंग से जुड़ा एक मामला कोलकाता में सामने आया था। पूर्वी कोलकाता के एक मॉल में बच्चे को स्तनपान कराने के लिए मां को टॉयलेट में ले जाने को कहा गया था। शिकायत के बाद भी सुनवाई नहीं हुई थी। नतीजन महिला ने उस मॉल के सामने धरना दिया था।

सनबर्न से बचाएँगे ये कुदरती तरीके

चिलचिलाती धूप में सनबर्न होना सामान्य समस्या है। गर्मी के मौसम में सूरज की किरणों से त्वचा को जलने से बचाना थोड़ा मुश्किल ही है, लेकिन सनबर्न से त्वचा को राहत देने के लिए कुछ जबरदस्त नुस्खे आप जरूर आजमा सकते हैं –
1 गुलाब जल में तरबूज का रस मिलाएं, अब इसे 15 से 20 मिनट चेहरे पर लगाकर रखें फिर चेहरा धोलें। इससे सनबर्न का असर खत्म हो जाएगा।
2 एक चम्मच शहद में दो चम्मच नींबू का रस मिलाएं, इसे 15 से 20 मिनट चेहरे पर लगाकर रखें फिर चेहरा धोलें।आप इसे रोजाना अपने चेहरे पर लगा सकते हैं।
3 खीरे की लुगदी को दही में मिलाकर इस मिश्रण को भी 20 मिनट तक चेहरे पर लगाकर रख सकते है।
4 सनबर्न का त्वचा पर असर कम करने के लिए कॉटन की मदद से ठंडा दूध भी चेहरे पर लगा सकते है। ऐसा नियमित करने से त्वचा की रंगत निखारने में भी मदद मिलती है।
5 मुट्ठी भर तिल को पीसें, फिर इसे आधे कप पानी में मिलाकर 2 घंटे के लिए रखकर छोड़ दीजिए। फिर इसके पानी को छानकर इससे चेहरा साफ कर लीजिए, सनबर्न में फायदा होगा।

देश में होगी अब कृत्रिम बारिश, भाप को बदला जाएगा पानी में, कहते हैं ‘क्लाउड सीडिंग’

सूखे की मार झेल रहे महाराष्ट्र के किसानों को राहत देने के लिए राज्य सरकार ने कृत्रिम बारिश (क्लाउड सीडिंग) कराने का फैसला किया है। राज्य सरकार ने इसके लिए 30 करोड़ रुपये का फंड आवंटित किया है। यह दूसरा मौका है जब राज्य में कृत्रिम बारिश करवाने की तैयारी की जा रही है। इससे पहले साल 2015 में राज्य सरकार ने नासिक में यह प्रयास किया था। लेकिन, तकनीकी खामियों के चलते यह काम नहीं कर सकी थी। जानिए कृत्रिम बारिश के बारे में –
बिना बादल के क्लाउड सीडिंग होना मुश्किल
मौसम का पूर्वानुमान लगाने वाली निजी एजेंसी स्काईमेट के वॉइस प्रेसीडेंट और चीफ मेट्रोलॉजिस्ट महेश पलावत ने बताया कि क्लाउड सीडिंग के लिए बादल होना जरूरी होते हैं। बिना बादल के क्लाउड सीडिंग नहीं की जा सकती। बादल बनने पर सिल्वर आयोडाइड और दूसरी चीजों का छिड़काव किया जाता है। जिससे भाप पानी की बूंदों में बदलती है। इसमें भारीपन आता है और गुरुत्वाकर्षण के कारण यह पानी की बूंदों के रूप में पृथ्वी पर गिरती हैं। पलावत के अनुसार, भारत में क्लाउड सीडिंग का सफलता का प्रतिशत ज्यादा नहीं है लेकिन बादल साथ दें तो इसे करना सम्भव है। महाराष्ट्र के विदर्भ में जून के पहले सप्ताह में बादल बनने की संभावना है, ऐसे में यदि क्लाउड सीडिंग करवाई जाती है तो इसका फायदा मिल सकता है।

क्या होती है कृत्रिम वर्षा
कृत्रिम वर्षा (क्लाउड सीडिंग) एक ऐसी तकनीक है, जिसके जरिए बादलों की भौतिक अवस्था में कृत्रिक तरीके से बदलाव लाया जाता है। ऐसी स्थिति पैदा की जाती है, जिससे वातावरण बारिश के अनुकूल बने। इसके जरिए भाप को वर्षा में बदला जाता है। इस प्रक्रिया में सिल्वर आयोडाइड और सूखे बर्फ को बादलों पर फेंका जाता है। यह काम एयरक्राफ्ट या आर्टिलरी गन के जरिए होता है। कुछ शोधों के बाद हाइग्रस्कापिक मटेरियल जैसे नमक का भी इसमे इस्तेमाल होने लगा है। जल प्रबंधक अब इसे ठंड में स्नोफॉल बढ़ाने के लिए भी इस्तेमाल करने पर देखने लगे हैं।

किसने यह शुरू की?
इस पद्धति को सबसे पहले जनरल इलेक्ट्रिक (GE) के विंसेंट शेफर और नोबल पुरस्कार विजेता इरविंग लेंगमुइर ने सुनिश्चित किया था। शेफर ने जुलाई 1946 में क्लाउड सिडिंग का सिद्धांत खोजा। 13 नवंबर 1946 को क्लाउड सीडिंग के जरिए पहली बार न्यूयॉर्क फ्लाइट के जरिए प्राकृतिक बादलों को बदलने का प्रयास हुआ।जनरल इलेक्ट्रिक लैब द्वारा फरवरी 1947 में बाथुर्स्ट, ऑस्ट्रेलिया में क्लाउड सीडिंग का पहला प्रदर्शन किया गया था।
कहाँ-कहाँ इस्तेमाल हो रहा?
विश्व मौसम संगठन के अनुसार, अभी तक 56 देश कृत्रिम बारिश का इस्तेमाल कर चुके हैं। इसमें संयुक्ति अरब अमीरात से लेकर चीन तक शामिल हैं। यूएई ने जहां पानी की कमी दूर करने के लिए इसका इस्तेमाल किया गया तो वहीं चाइना ने 2008 में समर ओलम्पिक की ओपनिंग सेरेमनी के पहले प्रदूषण को खत्म करने के लिए इसका इस्तेमाल किया था। यूएस में स्की रिसोर्ट के जरिए क्लाउड सीडिंग का इस्तेमाल स्नोफॉल के लिए भी किया जाता है। वहीं चाइना अब सूखे से बचने के लिए इस सिस्टम का इस्तेमाल कर रहा है।
यह तरीका कितना काम करता है?
ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, स्पेन और यूएस सभी इस पद्धति का परीक्षण कर चुके हैं। अबूधाबी के रेगिस्तान में भी इसका इस्तेमाल हो चुका है। हालांकि बारिश होने के लिए यह जरूरी है कि वायुमंडल में थोड़ी नमी हो। इस प्रक्रिया तीन चरणों में होती है। पहले चरण में हलचल पैदा की जाती है। दूसरा चरण बिल्डिंग अप कहलाता है और तीसरे में केमिकल छोड़े जाते हैं।

(साभार – दैनिक भास्कर)

गर्मियों का इको फ्रेंडली फ्रिज है मटका, घड़ा, सुराही

 गर्मी का मौसम आते ही अधिकांश घरों में स्टील, तांबे के मटके हटाकर मिट्टी के घड़े में पानी रखना शुरू कर दिया जाता है। आखिर इस मौसम में ठंडे पानी की सबसे ज्यादा आवश्यकता होती है। मिट्टी के घड़े में पानी न केवल प्राकृतिक तरीके से ठंडा रहता है बल्कि इसमें भरा पानी आपकी सेहत भी सलामत रखता है। आइए, जानते हैं उन्हीं के बारे में –
 इसमें मृदा के गुण भी होते हैं जो पानी की अशुद्ध‍ियों को दूर करते हैं और लाभकारी मिनरल्स प्रदान करते हैं। शरीर को विषैले तत्वों से मुक्त कर आपकी प्रतिरक्षा प्रणाली को बेहती बनाने में यह पानी फायदेमंद होता है।
फ्रिज के पानी की अपेक्षा यह अधिक फायदेमंद है क्योंकि इसे पीने से कब्ज और गला खराब होने जसी समस्याएं नहीं होती। इसके अलावा यह सही मायने में शरीर को ठंडक देता है।
इस पानी का पीएच संतुलन सही होता है। मिट्टी के क्षारीय तत्व और पानी के तत्व मिलकर उचित पीएच बेलेंस बनाते हैं जो शरीर को किसी भी तरह की हानि से बचाते हैं और संतुलन बिगड़ने नहीं देते।
 मिट्टी के घड़े का पानी पीना सेहत के लिए फायदेमंद है। इसका तापमान सामान्य से थोड़ा ही कम होता है जो ठंडक तो देता ही है, चयापचय या पाचन की क्रिया को बेहतर बनाने में मदद करता है। इसे पीने से शरीर में टेस्टोस्टेरॉन का स्तर भी बढ़ता है।
ये हैं मटके के अन्य प्रकार
मार्केट में मटके के अलावा मिट्टी की सुराही, टंकी, जग, बोतल आदि भी मौजूद हैं। टंकी में टोंटी लगी होने के कारण पानी निकालने के लिए उसे बार-बार नहीं खोलना पड़ता। सुराही में मटके की अपेक्षा ज्यादा पानी ठंडा होता है। वहीं बोतल को आप अपने साथ ऑफिस भी ले जा सकते हैं।रख-रखाव हो सही
– मटके में रखा पानी देर तक ठंडा रहे इसके लिए उसे ऐसी जगह पर रखा जाए जहां वह हिल-डुल न सके। किसी स्टैंड का प्रयोग करें। साथ ही इसे ढकने के लिए मिट्टी का ही ढक्कन यूज करें।
– मटके को हमेशा ऐसी जगह रखा जाना चाहिए जहां छांव हो और हवा भी आती रहे।
– अगर मटका खुले में रखा है तो उसके मुंह के ऊपर कॉटन का कपड़ा गीला करके रख दें। इससे पानी ठंडा बना रहता है और अंदर कोई कीड़ा या चींटी भी नहीं जाएगी।
– वैसे तो मटके का पानी रोजाना बदलना चाहिए। लेकिन अगर संभव न हो तो इसमें भरे पानी का एक हफ्ते से ज्यादा दिन तक प्रयोग नहीं करें। एक हफ्ते बाद पानी को हर हाल में बदल लेना चाहिए।


ऐसे करें मटके की सफाई
काई लगने पर

कई बार मटके में अंदर काई भी लग जाती है। इसे स्क्रब ब्रश से साफ करें। काई साफ करने के लिए ठंडा या हल्का गर्म, कैसा भी पानी इस्तेमाल कर सकते हैं।
साधारण सफाई
मटके को साफ करते समय हल्के गर्म पानी का इस्तेमाल करें। साफ हाथों को मटके के अंदर डालकर उसकी अंदरूनी दीवारों को हल्के गर्म पानी से साफ कर दें। बाद में साफ हल्के गर्म पानी से खंगाल लें। मटके को धूप में सूखने के लिए छोड़ दें। सूखने पर फिर से पानी भर लें।खरीदते वक्त इन बातों का रखें ध्यान
– मटका खरीदते समय उसे किसी कॉइन से हल्का-सा बजाकर देखें। अगर उसमें से टन की तेज आवाज आ रही है तो मटका टूटा-फूटा नहीं है।
– किसी भी प्रकार के मटके पर अगर कोई चमक दिखाई दे तो उसे न खरीदें। पारंपरिक (लकड़ी या उपलों) रूप से पके मटकों पर कोई चमक नहीं होती। ऐसी चमक के लिए रंग या वार्निश का प्रयोग किया जाता है, जो सेहत के लिए नुकसानदायक है। इन मटकों के पानी से अजीब सी दुर्गंध भी आती है।

गर्मियों के दिन हैं, आम के स्वाद में घोलें मिठास

आम पेड़ा


सामग्री : खोया- 200 ग्राम, पिसी शक्कर- 50 ग्राम, आम का रस- 200 मिली, इलायची पाउडर- छोटा चम्मच, अखरोट, बादाम व पिस्ता- कुटा हुआ।
विधि : कड़ाही में खोया भूनते हुए थोड़ा-थोड़ा आम का रस डालकर मिलाएं। जब मिश्रण अच्छी तरह भुन जाए तब पिसी शक्कर, इलायची पाउडर, कुटा हुआ अखरोट, बादाम व पिस्ता चूरा मिलाएं। थोड़ी देर इसे भूनें। जब मिश्रण कड़ाही की तली छोड़ने लगे तब इसे आंच से उतार दें और ठंडा होने दें। तैयार मिश्रण के पेड़े बना लें। ऊपर से अखरोट, बादाम और पिस्ता का चूरा लगाएं।

 

आम खीर


सामग्री : आम का गूदा- 1 कप, फुल क्रीम दूध-1 लीटर, कंडेंस्ड मिल्क- 2 बड़े चम्मच, चावल- 4 बड़े चम्मच भिगोए हुए, पिसी शक्कर- कप, पिस्ता- 1 बड़ा चम्मच कटा हुआ, बादाम- 1 बड़ा चम्मच कटा हुआ।
विधि : दूध और चावल को भारी तले के बर्तन में उबालें। धीमी आंच पर चावल गलने और गाढ़ा होने तक पकाएं। कंडेंस्ड मिल्क और पिसी शक्कर डालकर अच्छी तरह से मिलाएं। आंच से उतारकर मिश्रण को ठंडा होने दें। इसमें आम का गूदा मिलाएं। कटा पिस्ता और बादाम ऊपर से डालकर परोसें।

सौहार्द की जिम्मेदारी किसी एक की नहीं, सबकी है

बंगाल की राजनीति इन दिनों राम के नाम पर चल रही है और सरकारी सहिष्णुता का एक नया चेहरा सामने आ रहा है। धर्मनिरपेक्ष और बौद्धिक बंगाल में राम के नाम पर बवाल हो रहा है और राज्य की मुखिया हिन्दीभाषियों के खिलाफ जितना गुबार था, सब अपशब्दों में बहा रही हैं। संविधान ने सबको धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार दिया है और जय श्री राम का नारा भी नया नहीं है। याद रखने वाली बात है कि 1992 में जब बाबरी मस्जिद प्रकरण हुआ तब यहाँ वाममोर्चा की सरकार थी मगर इस तरह की नौबत तब नहीं आयी थी। भाजपा के सहारे जब ममता सत्ता की सीढ़ियाँ चढ़ीं तब भी जय श्री राम के नारे लगते थे, तब भी उनको परहेज नहीं हुआ मगर आज है क्योंकि वर्चस्व टूटता नजर आ रहा है। इस पूरे प्रकरण में जो बात सबसे दुःखद है, वह है इस राज्य में बंगाली और गैर बंगाली का विभाजन, दीदी..आज यही कर रही हैं और इसी पर राजनीतिक रोटियाँ सेंकी जा रही हैं। अगर यह विवाद और गहराता है तो बंगाल में गृह युद्ध की स्थिति आ सकती है और तब केन्द्र को हस्तक्षेप करना पड़ सकता है। दिक्कत यह है कि भाषा और संस्कृति को आधार बनाकर हिन्दीभाषी समाज को अलगाने की जो कोशिश की जा रही है, उसे बुद्धिजीवियों के एक वर्ग का समर्थन भी मिल रहा है। यही विडम्बना है कि इस समाज का बुद्धिजीवी वर्ग अपने हितों को पहले देखता रहा है, वह सत्ता के खिलाफ कभी खड़ा नहीं होता मगर प्रतिरोध करने वालों के सामने बाधक वही हैं। आश्चर्य की बात यह है कि जो ममता अलग राज्यों के मामले में मदद करने की बात घोषणापत्र में करती हैं, उनको दार्जिलिंग के अलग होने से तकलीफ है। दरअसल, यह तकलीफ वर्चस्व की है और यह समय है कि यह तय हो कि बंगाल इस देश का हिस्सा है या वह अलग ही किसी देश के रूप में स्वीकृत होता जा रहा है? यह प्रश्न जातीयता और राष्ट्रीयता के टकराव का भी है। क्या जातीय चेतना इस कदर हावी होने की इजाजत है कि देश पीछे छूट जाये..आखिर अपने ही देश में दोयम दर्जे का नागरिक क्यों बनें..यूपी, बिहार व झारखंड के लोग…स्थिति और विकट हो सकती है मगर सम्भव है कि इसी से कोई रास्ता निकले..यही वह बंगाल है जिसने हिन्दी प्रदेश को उर्वर किया…आखिर क्या वजह है कि जातीयता के नाम पर हम संकुचित होते जाए..क्या होगा जब हिन्दी प्रदेशों में भी इस तरह की आवाजें उठने लगें…दोनों ही सूरतें गलत है…हमें अब रुककर सोचने की जरूरत है कि हम कहाँ जा रहे हैं..और कहाँ पहुँचेंगे…तुष्टीकरण की राजनीति ने ही यह हाल किया है और इसे रोका न गया तो स्थिति और विकट होगी इसलिए समस्या के तूल पकड़ने के पहले समाधान खोजना होगा क्योंकि सौहार्द की जिम्मेदारी किसी एक की नहीं, हम सबकी है।