Thursday, July 2, 2026
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आठ साल की उम्र में पदक जीत रहा है निशानेबाजी का ‘वंडर ब्वाय’

नयी दिल्ली : आठ बरस की उम्र में जब हमउम्र बच्चे कार्टून या मोबाइल देखने में मसरूफ रहते है, पिथौरागढ का दिव्यांश जोशी निशानेबाजी रेंज पर कड़ी मेहनत करता है ताकि अपनी बहन की तरह भविष्य में भारत की पदक उम्मीद बन सके ।
भारत के सीमावर्ती पिथौरागढ जिले में कक्षा चार के छात्र दिव्यांश ने इंटर स्कूल और इंटर कालेज राज्य स्तरीय निशानेबाजी स्पर्धा में 50 मीटर राइफल प्रोन में स्वर्ण पदक जीता । उनकी बड़ी बहन यशस्वी राष्ट्रीय स्तर की निशानेबाज है और अभी तक विभिन्न राष्ट्रीय और प्रदेश स्तर के टूर्नामेंटों में चार स्वर्ण समेत 16 पदक जीत चुकी है । अपने पिता मनोज जोशी के मार्गदर्शन में निशानेबाजी के गुर सीख रहे दोनों भाई बहनों ने अक्तूबर में भोपाल में होने वाले राष्ट्रीय स्कूली खेलों के लिये क्वालीफाई कर लिया है । यशस्वी ने 25 मीटर पिस्टल में स्वर्ण और 10 मीटर पिस्टल में कांस्य पदक जीता । मनोज जोशी ने कहा ,‘‘पिछले एक साल से दिव्यांश ने अपनी बहन को देखकर निशानेबाजी शुरू की । लोग हैरान हो जाते थे कि बित्ती भर का लड़का राइफल कैसे उठा लेता है । वैसे वह प्रोन पोजिशन में खेलता है लेकिन अब ‘हैंड होल्ड’ करने लगा है । उसने 200 में से 168 अंक लेकर स्वर्ण जीता ।’’ ‘पिस्टल किंग’ जसपाल राणा को अपना आदर्श मानने वाले दिव्यांश के शेड्यूल के बारे में पूछने पर उन्होंने कहा ,‘‘ वैसे तो हमने घर में भी एक रेंज बनाई हुई है लेकिन फायर आर्म रेंज अलग है जहां कुल 13 बच्चे अभ्यास करते हैं । दिव्यांश सुबह एक घंटा और शाम को दो घंटा रेंज पर बिताता है और बहुत तेजी से सीख रहा है। ’यह पूछने पर कि इतनी कम उम्र में खेल में पदार्पण करने से क्या पढाई बाधित नहीं होती, उन्होंने कहा ,‘‘ वह टीवी और मोबाइल से दूर रहता है जिससे अभ्यास का समय निकल पाता है । पढाई पर असर तो पड़ता है लेकिन मैनेज हो जाता है । वैसे भी विदेशों में इसी उम्र से बच्चे तैयारी करने लगते हैं ताकि बड़े बेसिक्स मजबूत हो जायें । मैं भी उसी दिशा में इसे तैयार कर रहा हूं ।’’
ओलंपिक में भारत ने निशानेबाजी में अभी तक एक स्वर्ण (अभिनव बिंद्रा 2008) , दो रजत (राज्यवर्धन सिंह राठौड़ 2004 और विजय कुमार 2012) और एक कांस्य (गगन नारंग 2012) पदक जीता है । राष्ट्रमंडल खेलों और एशियाई खेलों में भी निशानेबाजी में भारत का प्रदर्शन अच्छा रहा है । जोशी की अकादमी में बच्चों को कोचिंग और उपकरण की सुविधा निशुल्क है लेकिन प्रायोजन के अभाव में वह ज्यादा बच्चों को प्रवेश नहीं दे पा रहे । उन्होंने केंद्र और प्रदेश सरकार से वित्तीय सहायता की गुजारिश की है । अब तक उनके प्रशिक्षु राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर 25 से अधिक पदक जीत चुके हैं । उन्होंने कहा ,‘‘ इस इलाके में प्रतिभाओं की कमी नहीं है लेकिन हमारे पास संसाधन सीमित है । मैने पूर्व खेलमंत्री विजय गोयल से मदद माँगी थी । वित्तीय सहायता मिलने पर हम काफी होनहार निशानेबाज दे सकते हैं ।’’

एक मित्र की तरफ से एक मित्र को स्नेह भरी सौगात

कवि नवल

हिन्दी के वरिष्ठ कवि -कथाकार, उपन्यासकार, नाटककार और चित्रकार आदरणीय आलोक शर्मा के 84वें वर्ष -प्रवेश कवि नवल ने यह लेख अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा। वे शतायु हों और स्वस्थ -प्रसन्न रहकर दीर्घ काल तक साहित्य सृजन करते रहें । हम इसे साभार आपको पढ़वा रहे हैं..यह समकालीन साहित्य का दस्तावेज है और एक मित्र की तरफ से एक मित्र को स्नेह भरी सौगात –

आलोक शर्मा : तल्लीनता उनका नैसर्गिक गुण है !

कुछ लोग बहुत देर तक चुप नहीं बैठ सकते । इसका मतलब यह नहीं कि वे वाचाल होते हैं, वरन् कुदरत ने उनके भीतर इतनी ऊर्जा भरी होती है कि वे बिना ख़ुद को अभिव्यक्त किए जी नहीं सकते! यह जिजीविषा उनकी पहचान के साथ जुड़ी होती है।

आलोक शर्मा एक ऐसे अनोखे रचनाकार हैं, जो अपने भीतर के रंगों को बाहर लाने के लिए अलग-अलग कूचियों या विधाओं का इस्तेमाल करते रहते हैं ।

अपने लेखन की शुरुआत उन्होंने एक रहस्य उपन्यास लिखकर की थी, लेकिन जब उनके साहित्यकार मित्रों का दायरा बढ़ा, जिनमें अधिकांश कवि थे, उन्होंने कविता लिखनी शुरू की और देखते –देखते उन्होंने अपना पहला कविता संकलन ” आयाम ” स्वटंकित निकाला और उसकी सिर्फ़ तीस प्रतियाँ तैयार कीं । जिल्दबंदी भी ख़ुद की और हर प्रति का कोलाजनुमा चित्र भी बनाया । उनकी व्यवहारिक बुद्धि ने उन्हें रास्ता सुझाया और उन्होंने आयाम संकलन की प्रतियाँ हिन्दी के शीर्ष रचनाकारों के पास भेज दीं । इस नायाब तोहफ़े को पाकर हर बड़े रचनाकार ने बधाई का उन्हें पत्र लिखा, जिसके अंश उन्होंने अपनी अगली मुद्रित पुस्तक में प्रकाशित भी किए ।

आलोक ने एक संवादहीन गम्भीर नाटक लिखा ” चेहरों का जंगल ” , जिसे सुनकर मोहन राकेश ने कहा था, यह आइडिया तो मैं चुराऊंगा , आलोक !

जब तक चेहरों का जंगल छप कर आता , मोहन राकेश का संवादहीन नाटक छपकर आ गया । मोहन राकेश लिक्खाड़ तो थे ही , आलोक मन मसोस कर रह गए ! इस घटना का ज़िक्र मनमोहन ठाकौर साहब ने अपनी आत्मकथा ” अन्तरंग ” में किया है ।

अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का आलोक को ज़बरदस्त अभ्यास है। एक ज़माने में जब वे काॅफ़ी हाउस आते तो काॅफ़ी पीते-बातें करते खाली सिगरेट के पैकेट से कभी ऊँट, कभी घोड़ा, कभी गधा , कभी जिराफ़ बनाया करते । गधा-घोड़ा बनाने में उनकी तल्लीनता इतनी अधिक होती थी कि वे काॅफ़ी पीना भूल जाया करते । काॅफ़ी हाउस के बैरे उनके प्रशंसक तो थे ही , सिगरेट के पैकेट से बनी उनकी कलाकृति को वे सँभाल कर रखते और अगले दिन उनको ही भेंट में नज़र करते !

अपने पहले टंकित-अंकित कविता संग्रह आयाम की वजह से तत्कालीन हिन्दी रचनाकारों के बीच वे अपनी पहचान तो बना ही चुके थे, अपने संवादहीन नाटक ” चेहरों का जंगल ” के ज़रिए बंगाली रंगकर्मियों के बीच भी प्रसिद्ध हो गए , जिनमें शंभु मित्र और ऋत्विक घटक अधिक उल्लेखनीय हैं ।

यह तल्लीनता उनका नैसर्गिक गुण है। वे किसी भी काम में हाथ लगाकर उसे अधूरा नहीं छोड़ते । वे अपने आप में इतना रमे होते हैं कि उन्हें बाहर की दुनिया में कदम रखने में कुछ वक्त लग ही जाता है । अक्सर वे दूसरों की बातों को उतने मनोयोग से सुन नहीं पाते क्योंकि वे ख़ुद के मोनोलाॅग में चले जाते हैं यानी उनकी चुप्पी सही माने में चुप्पी नहीं होती । एक अनभिव्यक्त संवाद उनके भीतर चलता रहता है ।

आलोक अनन्त ऊर्जा के मालिक हैं और उसी ऊर्जा के कारण बहुआयामी कल्पना के स्वामी भी । मैंने आज तक ऐसा ऊर्जावान व्यक्ति नहीं देखा जो सोते-जागते कुछ-न-कुछ करता रहता हो!

पिछले दिनों अपनी किसी कविता को सुनाने से पहले उन्होंने एक टिप्पणी की कि यह कविता स्वप्न में लिखी थी । ‘ लिखी थी ‘ से लोगों को उनके जागने का भ्रम हो सकता है । वे कहना यह चाहते थे कि उन्होंने स्वप्न में ख़ुद को कविता लिखते हुए देखा और स्वप्न -भंग होने पर उसे काग़ज़ पर लिपिबद्ध किया ।

उनकी स्मरणशक्ति भी अद्भुत है और किस्सा सुनाने की शैली भी वैसी ही मोहक । कविता या गद्य सुनाते वक्त वे एक सम्मोहन रचते हैं और यह स्वभाव उन्हें प्रकृति से वरदान के रूप में मिला है ।

अपने अतीन्द्रिय जगत में नख-शिख डूबे आलोक अवचेतन मन के सिद्ध कलाकार हैं, जिनका वाह्य जगत से सिर्फ़ इतना नाता है कि उनका एक शरीर है, शरीर से बँधे कुछ कर्म हैं, कुछ रिश्ते हैं, जिनका निर्वाह करने की कोशिश तो करते हैं लेकिन शायद पूरा न्याय नहीं कर पाते!

स्वभावतः आलोक शर्मा प्रयोगधर्मा कवि हैं । लोगों का ध्यान आकृष्ट करने के लिए वे ऐसा नया भी कुछ कर गुज़रते हैं कि वे हास्यास्पद दीखने लगें, लेकिन इस बात की चिन्ता उन्हें नहीं होती । एक ज़माने में उन्होंने पण्डितराज जगन्नाथ पर थीसिस लिखनी शुरू कर दी, जबकि उनकी स्कूली शिक्षा तब तक किसी तरह से ले-दे कर मैट्रिकुलेशन तक थी ।

उनका अवचेतन उनको हमेशा कन्ट्रोल करता रहता है और यही उनके लेखन का महत्वपूर्ण बिन्दु है । यह बिन्दु उन्हें अनेक स्तरों पर उद्वेलित किये रहता है जैसे कोई कुम्भकार नये-नये बर्तन , खिलौने या कभी -कभी बेतुके आकार तक उगलता रहता है ।

प्रकृति -बिम्बों से उनका गहरा रिश्ता इसलिए भी बन पाया कि उनके आरम्भिक जीवन की ग्रामीण स्मृतियाँ उनके पास सुरक्षित रह पायीं । यह स्मृति -सम्पदा आलोक शर्मा के पूरे व्यक्तित्व की अथाह पूँजी है ।

अभी हाल ही में उनका एक नया उपन्यास आया है ” उनकी ज़िन्दगी के दिन” जिसकी पृष्ठभूमि उनके मन में बस रहे किसी गाँव पर आधारित है ।

हिन्दी का पहला बैले “एक पंछी की हत्या ” और विश्व के कुछ महान कवियों की कविताओं की अनुवाद- पुस्तक भी पिछले दिनों ही प्रकाशित हुई है । इसी संग्रह में आलोक जी ने अपनी कुछ चुनी हुई कविताएँ इसलिए दीं ताकि पाठक विश्व -स्तर के कवियों के साथ हिन्दी कविता का भी रसास्वादन कर सकें !

अपराजिता की तरफ से कवि को जन्मदिन की हार्दिक बधाई व नवल सर के साथ आपकी मित्रता यूँ ही बनी रहे,

(आलेख कवि नवल सर की फेसबुक वॉल से और तस्वीर नीलांबर की वॉल से)

 

प्राकृतिक संसाधनों से सफल उद्यमी बनने का हुनर सिखा रहा आईआईएम काशीपुर

नयी दिल्ली : उत्तराखंड स्थित भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम), काशीपुर सरसों की चटनी, छतों पर कम खर्च में बगीचा लगाने की तकनीक, घास काटने की सस्ती मशीन जैसे उत्पाद बनाने वाले स्टार्टअप को तकनीकी और प्रबंधकीय प्रशिक्षण के साथ सफल उद्यमी बनने का रास्ता दिखा रहा है। राज्य के उधम सिंह नगर जिले में स्थित प्रबंधन संस्थान का कहना है कि इस पहल से जहां एक तरफ देश में उद्यमी तैयार होंगे, वहीं दूसरी तरफ उत्तराखंड समेत देश में रोजगार सृजन और कृषि विकास तथा किसानों की आय बढ़ाने में भी मदद मिलेगी। इस पहल के तहत प्रबंधन संस्थान ने देश में उद्यमियों को तैयार करने के लिये हाल ही में पालना (इनक्यूबेशन) केंद्र के रूप में उद्यमिता विकास और नवप्रवर्तन फाउंडेशन (एफआईईडी) का गठन किया है। इसकी शुरुआत करते हुए, संस्थान देश भर से कृषि क्षेत्र से जुड़े 40 स्टार्टअप का चयन कर उन्हें अपने उत्पादों के विपणन और भावी विकास के गुर सिखाने में जुटा है। इस बारे में संस्थान के निदेशक प्रोफेसर कुलभूषण बलूनी ने फोन पर ‘भाषा’ से बातचीत में कहा, ‘‘इस पहल का मकसद उत्तराखंड के साथ देश में उद्यमिता संस्कृति को बढ़ावा देना है। हमने फिलहाल कृषि, पर्यटन, दस्तकारी, आयुर्वेद और शिक्षा के क्षेत्र में काम करने का फैसला किया है। इसकी शुरुआत हमने कृषि क्षेत्र से की है।’’ उन्होंने कहा कि इसके लिये हमने विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, कृषि मंत्रालय के साथ गठजोड़ किया है। साथ ही हम उत्तराखंड सरकार के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। एफआईईडी के प्रभारी प्रोफेसर सफल बत्रा ने कार्यक्रम के बारे में विस्तार से बताते हुए कहा, ‘‘हमने इस दिशा में राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (आरकेवीवाई), रफ्तार के तहत कृषि विभाग के साथ मिलकर पहला कार्यक्रम शुरू किया है। इसके तहत देश भर से कृषि क्षेत्र में काम कर रहे 350 स्टार्टअप में से 40 का चयन कर उन्हें पालना केंद्र एफआईईडी में प्रशिक्षण देना शुरू किया है।’ उन्होंने बताया कि 20 अगस्त से शुरू यह कार्यक्रम दो महीने के लिये है। इस दौरान उन्हें प्रबंधकीय, तकनीकी प्रशिक्षण के साथ हरसंभव सहायता दी जाएगी। इसके लिये हर दिन बाहर से उद्यमियों और विशेषज्ञों को बुलाकर उन्हें जानकारी उपलब्ध करायी जा रही है।
संस्थान, प्रशिक्षण के लिये चुने गये स्टार्टअप को 10,000 रुपये मासिक वजीफा भी दे रहा है। स्टार्टअप को प्रशिक्षण देने की जरूरत के बारे में पूछे जाने पर बत्रा ने कहा, ‘‘इन लोगों ने पाचन क्रिया में उपयोगी बेहतर गुणवत्ता वाली हल्दी और सरसों की चटनी, घास काटने की सस्ती मशीन, गधी के दूध का साबुन, जैविक खेती, कम खर्च में छतों-बरामदों पर बगीचा लगाने की तकनीक जैसे उत्पाद बनाये, लेकिन उन्हें यह नहीं पता कि अब आगे क्या करना है? स्टार्टअप को यह नहीं पता कि उत्पादों का विपणन कैसे किया जाए? उन्हें इस प्रशिक्षण से आगे की तरक्की और सफल उद्यमी बनने का रास्ता मिलेगा।’’
इसके लाभ के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि ये स्टार्टअप अगर क्षमता अनुसार काम करेंगे तो बड़ी संख्या में रोजगार सृजित होंगे। अगर इन्हीं 40 स्टार्टअप को लिया जाए तो इनके पूर्ण रूप से काम करने पर 4,000 तक रोजगार सृजित होने का अनुमान है। इसके साथ ही ये किसानों से सरसों या उनकी दूसरी उपज खरीदेंगे, उन्हें खेती की सस्ती तकनीक उपलब्ध कराएंगे, इससे किसानों को भी लाभ होगा और आय बढ़ेगी।’’ एक सवाल के जवाब में बत्रा ने कहा कि ये स्टार्टअप उत्तराखंड समेत 15 राज्यों से हैं और कृषि के विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। प्रशिक्षण पूरा होने के बाद इनकी जरूरत के अनुसार इन्हें 5 लाख रुपये से लेकर 25 लाख रुपये तक का वित्तपोषण मिलेगा।

रिश्ते को छुपाने से अच्छा हैं उसे जाहिर करना: दुती

नयी दिल्ली : समलैंगिक रिश्ते का खुलासा करने वाली भारत की पहली एथलीट दुती चंद ने कहा कि उनके लिए रिश्ते को सर्वाजनिक करना छुपाने से बेहतर है। दुती ने मई में ओड़िशा के अपने गांव की एक महिला के साथ अपने रिश्ते को सार्वजनिक करके सुर्खियां बटोरी थीं। उनके इस फैसले के बाद परिवार ने उन से नाता तोड़ने जबकि उनकी बड़ी बहन ने अलग होने की धमकी दी थी लेकिन दुती पर इसका कोई असर नहीं हुआ। दुती ने उस महिला के साथ घर बसाने की इच्छा जाहिर की। अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में देश के लिए कई पदक जीतने वाली 23 साल की इस फर्राटा धावक ने कहा, ‘‘ मेरी निजी जिंदगी के कारण अब मेरे ऊपर कोई दबाव नहीं है क्योंकि मैंने इसका खुलासा कर दिया है। दरअसल जब तक मैंने इसे छुपा रखा था तब तक मैं डर रही थी और दबाव महसूस करती थी।’’
उन्होंने कहा, ‘‘ इस रिश्ते को सार्वजनिक करने के बाद कई लोगों ने मुझ से बात कि और मेरा समर्थन किया। उन्होंने मेरे प्रयास की सराहना की जिससे मुझे अच्छा महसूस हुआ।’’ दुती हाल ही में विश्व यूनिवर्सिटी खेलों में 100 मीटर की दौड़ में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला ट्रैक और फील्ड खिलाड़ी बनी है। पिछले महीने नपोली में हुए इन खेलों में दुती ने 11.32 सेकेंड का समय निकालकर रेस जीती । वह मंगलवार से लखनऊ में खेले जाने वाले राष्ट्रीय अंतर-राज्यीय चैम्पियनशिप में भाग लेंगी जहां उनका लक्ष्य अगले महीने दोहा में खेले जाने वाले विश्व चैम्पियनशिप के लिए क्वालीफाई करना होगा। राष्ट्रीय रिकार्डधारी (100 मीटर की दौड़ 11.26 सेकेंड में) दुती ने कहा, ‘‘ मैं राष्ट्रीय अंतर-राज्यीय चैम्पियनशिप में भाग ले रही हूं और मैं अपको भरोसा देती हूं कि आप मेरे समय में सुधार देखेंगे।’’ विश्व चैम्पियनशिप के लिए क्वालीफाइंग समय 11.24 सेकेंड है।दुती का लक्ष्य अगले साल तोक्यो में होने वाले ओलंपिक खेलों के लिए क्वालीफाई करना है। महिलाओं के 100 मीटर रेस के लिए ओलंपिक क्वालीफाई के लिए 11.15 सेकेंड का समय रखा गया है। दुती ने कहा, ‘‘ओलंपिक के लिए क्वालीफाई करना और प्रतिस्पर्धा करना हर खिलाड़ी का सपना होता है और मैं अलग नहीं हूं। मैं निश्चित रूप से अपने देश के लिए पदक जीतना चाहूंगी और इसके लिए मेरी तैयारियां जोरों पर हैं।’’

बांग्ला फिल्म का सह निर्माण करेंगे भंडारकर

कोलकाता : जाने माने फिल्मकार सत्यजीत रे ने विभूति भूषण बंदोपाध्याय की 1932 के उपन्यास ‘अपराजितो’ पर आधारित ‘अपूर संसार’ का निर्माण किया था और अब 60 साल बाद मधुर भंडारकर इसी उपन्यास पर आधारित बांग्ला फिल्म ‘अभिजात्रिक’ (अपु की जीवन यात्रा) का सहनिर्माण करने वाले हैं। इस श्वेत श्याम फिल्म का निर्देशन युवा फिल्मकार शुभ्रजीत मित्रा करेंगे और निर्माण भंडारकर करेंगे। मित्रा ने बताया, ‘‘फिल्म की कहानी विभूति भूषण बंदोपाध्याय के उपन्यास का अंतिम भाग है, जिसे अपु की तीन संस्करणों वाली फिल्मों में नहीं दर्शाया गया है। यह फिल्म अपु, उनके बेटे की जीवन यात्रा को दर्शाती है और यह उस जगह से शुरू होती जहां से अपु का संसार (अपुर संसार) खत्म होती है। यह फिल्म महान फिल्मकार (रे) को श्रद्धांजलि होगी।’’ निर्देशक ने कहा कि फिल्म में अपु अपने बेटे की आँखों से अपने बचपन को जियेगा, जिसमें वह बनारस और अपने गांव निश्चिंदीपुर की यात्रा करेगा।

नागल ने जीता सेट और दिल , फेडरर ने मैच

न्यूयार्क : सुमित नागल ने जज्बा और जुझारूपन दिखाकर ग्रैंडस्लैम में अपने पदार्पण की स्वप्निल शुरुआत करते हुए दिग्गज रोजर फेडरर से पहला सेट जीता लेकिन आखिर में उन्हें यूएस ओपन के पहले दौर के इस मैच में हारकर बाहर होना पड़ा। भारत में बहुचर्चित इस मैच में झज्जर के 22 वर्षीय नागल ने सोमवार की रात को अपनी प्रतिभा की झलक दिखाने के बाद आर्थर ऐस स्टेडियम में खेला गया यह मुकाबला 4-6, 6-1, 6-2, 6-4 से गंवाया। नागल पिछले 20 वर्षों में ग्रैंडस्लैम के पुरूष एकल मुख्य ड्रा में एक सेट जीतने वाले केवल चौथे भारतीय हैं। इसकी विशेषता यह रही कि यह सेट उन्होंने फेडरर के खिलाफ जीता जिनके नाम पर 20 ग्रैंडस्लैम खिताब दर्ज हैं। पिछले दो दशक में नागल से पहले ग्रैंडस्लैम टूर्नामेंट में केवल सोमदेव देवबर्मन, युकी भांबरी और साकेत मयनेनी ही एक सेट जीतने में कामयाब रहे थे। क्वालीफाईंग के जरिये यूएस ओपन के मुख्य ड्रा में जगह बनाने वाले नागल को न सिर्फ 58,000 डालर की धनराशि मिलेगी बल्कि उन्हें इस मैच से जो अनुभव मिला वह आगे भी उनके काम आएगा। फेडरर ने कहा, ‘‘यह मेरे लिये मुश्किल सेट था। उसने बहुत अच्छा खेल दिखाया और उसे श्रेय जाता है। मैं कई गेंद को खेलने से चूक गया और मैं गलतियों में कमी करने पर ध्यान दे रहा था। उम्मीद है कि आगे मैं बेहतर प्रदर्शन करूंगा।’’ फेडरर से पूछा गया कि क्या एकबारगी उन्हें लगा कि वह नागल नहीं बल्कि नडाल के खिलाफ खेल रहे हैं क्योंकि दोनों के नाम के हिज्जों में केवल ‘डी’ और ‘जी’ का अंतर है। इस पर स्विस दिग्गज ने कहा, ‘‘नहीं। यह आप लोगों और सोशल मीडिया के लिये है। मैं जंग खा गया था।’’ मैच में फेडरर की शुरुआत अच्छी नहीं रही लेकिन नागल के लिये तो यह शानदार आगाज था। इस भारतीय ने पहला सेट जीतकर दर्शकों को हैरान कर दिया। उन्होंने तीसरे गेम में फेडरर के डबल फाल्ट का फायदा उठाकर ब्रेक प्वाइंट लिया।
फेडरर जब एटीपी रैंकिंग में 190वें नंबर के खिलाड़ी को समझने की कोशिश कर रहे थे तब नागल ने अपने रिटर्न और फोरहैंड से सभी का ध्यान अपनी तरफ खींचा। अभी फेडरर और दर्शक कुछ समझ पाते कि नागल ने दूसरी बार उनकी सर्विस तोड़ दी। इसके बाद उन्होंने 0-30 से पिछड़ने के बाद अपनी सर्विस बचायी। नागल ने अपने करारे शॉट से फेडरर को नेट पर आने का मौका नहीं दिया। इस बीच फेडरर अपनी गलतियों पर काबू पाने के लिये संघर्ष कर रहे थे। फेडरर ने पहले सेट में 19 सहज गलतियां की जबकि नागल ने इस बीच केवल नौ ऐसी गलतियां की। इसके बाद उम्मीदें बढ़ गयी लेकिन फेडरर ने खुद को संभाला और फिर नागल को अपना असली खेल दिखाया। उन्होंने पहले से बेहतर सर्विस करनी शुरू की और नेट पर आकर अंक बनाने शुरू कर दिये। दूसरे सेट में जल्द ही वह 5-0 से आगे हो गये और सातवें गेम में उन्होंने यह सेट जीतकर स्कोर 1-1 से बराबर कर दिया। इस बीच नागल ने छह सेट प्वाइंट बचाये और दो बार उनके पास ब्रेक प्वाइंट का मौका भी आया। नागल अब भी चुनौती दे रहे थे लेकिन फेडरर अपने रंग में लौट आये थे। तीसरे और चौथे सेट में भी कहानी वैसे ही आगे बढ़ी। नागल ने कुछ अंक जुटाये लेकिन मुकाबला अब एकतरफा दिखने लगा था। बीस बार के ग्रैंडस्लैम चैंपियन ने मैच के लिये सर्विस की तो नागल ने कुछ अच्छे रिटर्न से 0-40 का स्कोर कर दिया। फेडरर ने पांच ब्रेकप्वाइंट बचाकर आखिर में मैच अपने नाम किया। यह मैच दो घंटे 25 मिनट तक चला। नागल हालांकि दर्शकों का दिल जीतने में सफल रहे। वह कुछ आटोग्राफ देकर और तालियों के बीच आर्थर ऐस स्टेडियम से बाहर गये।

सुमित नागल: पिता के संघर्ष और जी-तोड़ मेहनत की आंच में पका टेनिस खिलाड़ी

साल का आखिरी टेनिस ग्रैंड स्लैम यूएस ओपन सोमवार से शुरू हो चुका है। टेनिस के इस प्रतिष्ठित इवेंट से अपना ग्रैंडस्लैम डेब्यू करने वाले सुमित नागल ने अपने पहले ही मैच में दुनिया के महानतम खिलाड़ी रोजर फेडरर को पहले सेट में हराकर सभी को चौंका दिया। पहला सेट गंवाने के बाद फेडरर जरूर मैच (4-6, 6-1, 6-2, 6-4) जीतने में कामयाब रहे, लेकिन दिल तो नागल जीत चुके थे। एकाएक पूरी दुनिया में चर्चित हो चुके नागल की कहानी बेहद दिलचस्प है।
बचपन में पिता का हाथ पकड़कर पहुँचे कोर्ट
बचपन में जिस रोजर फेडरर के स्टाइल को कॉपी करते थे, उन्हीं को पहले सेट में हराना वाकई किसी सुखद अनुभूति से कम नहीं। 22 वर्षीय सुमित हरियाणा के झज्जर जिले के छोटे से गांव जैतपुर से हैं। सेना की शिक्षा कोर से हवलदार के रूप में सेवानिवृत्त पिता सुरेश नागल को छोड़कर परिवार में किसी को भी खेलों में जरा सी भी दिलचस्पी नहीं। बस फिर क्या था फौजी पिता ने बेटे को टेनिस खिलाड़ी बनाने की ठानी और परिवार समेत दिल्ली के नांगलोई में आकर रहने लगे। 16 अगस्त 1997 को जन्में सुमित की उम्र उस वक्त आठ वर्ष रही होगी।
महेश भूपति ने दिया आकार
अपोलो टायर टैलेंट सर्च प्रतियोगिता में सुमित चुन लिए गए। दो साल तक उन्होंने स्पॉन्सर किया। इसके बाद सुमित का वक्त तब पलटा जब उनकी जिंदगी में दिग्गज टेनिस खिलाड़ी महेश भूपति की एंट्री हुई। भूपित की एकेडमी में उन्होंने ट्रेनिंग ली। सुमित, महेश भूपति को अपना मेंटोर मानते हैं। सुमित कहते हैं- ‘भूपति मेरे मेंटोर हैं और हमेशा रहेंगे। मैं करीब 10 साल का था, तब उनकी एकेडमी में पहली बार गया था। उन्होंने मेरे खेल को निखारा। उन्होंने ही मुझे स्पॉन्सर भी किया था।’
1998 के बाद दोहराया इतिहास
सुमित नागल 2015 में जूनियर ग्रैंडस्लैम खिताब जीतने वाली छठे भारतीय बने थे, उन्होंने वियतना के नाम हाओंग लि के साथ मिलकर विम्बलडन में लड़कों के वर्ग का युगल खिताब जीता था। जब अंतिम क्वॉलिफाइंग दौर में ब्राजील के जोआओ मेनेजेस के खिलाफ एक सेट गंवाने के बाद वापसी करते हुए दो घंटे 27 मिनट में 5-7 6-4 6-3 से जीत हासिल की तब वह प्रजनेश के बाद यूएस ओपन मुख्य ड्रॉ 2019 में खेलने वाले दूसरे भारतीय खिलाड़ी बन गए, 1998 के बाद पहली बार ग्रैंडस्लैम में भारत के दो खिलाड़ियों ने भाग लिया, इससे पहले महेश भूपति और लिएंडर पेस विम्बलडन में खेले थे।

सर ब्रैडमैनः वो पारी जिसके रन लिखते-लिखते स्कोरर थक गया पर डॉन नहीं

25 अगस्त 2019 अगस्त को हेडिंग्ले का लीड्स मैदान एक शानदार मैच का गवाह बना। पहली पारी में मात्र 67 रन पर ऑलआउट होने वाली इंग्लैंड की टीम ने दूसरी पारी में 359 रन के मुश्किल लग रहे स्कोर को हासिल कर इतिहास के पन्नों में इस मैच को दर्ज करा दिया और इसके सूत्रधार रहे इंग्लिश टीम के ऑलराउंडर बेन स्टोक्स। स्टोक्स ने अद्भुत शतकीय पारी खेलकर हारे हुए मैच को इंग्लैंड की झोली में डाल दिया।
लीड्स के मैदान के लिए ये सब देखना कोई नया नहीं था, उसने तो एक ऐसी पारी देखी है, जो आज भी एक रिकॉर्ड है और लोग जब उस पारी के बारे में सुनते हैं, तो उनके मुंह खुले ही रह जाते हैं। ये पारी आज से करीब 89 साल पहले इसी लीड्स के मैदान पर खेली गई थी, जिस मैदान पर स्टोक्स ने ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाजों को नाको चने चबवा दिए। विश्व क्रिकेट में एक बल्लेबाज हुआ, दाएं हाथ का। कहा जाता है कि जब वह पिच पर बल्लेबाजी कर रहा होता था, तो गेंद सीमा रेखा के बाहर इस तरह पहुंचती, मानो न्यूटन का ग्रेविटेशनल लॉ गेंद को खींच रहा हो।
तेज गेंदबाजों के खिलाफ उसकी कलाई ऐसे घूमती मानों कलाई पर मक्खन लगा कर उतरा हो और गेंद खूद-ब-खूद बाउंड्री का रास्ता ढूंढ लेती। उस खिलाड़ी ने जितना भी क्रिकेट खेला आने वाली पीढ़ी के क्रिकेटरों के लिए बेंचमार्क सेट कर गया। वह खिलाड़ी जिसका नाम क्रिकेट के शब्दकोश का हिस्सा बन गया है और उस खिलाड़ी का नाम है सर डॉन ब्रैडमैन। 27 अगस्त 1908 को उनका जन्म ऑस्ट्रेलिया के कूटामुंडरा में हुआ था। उनके जन्मदिन पर उनकी एक पारी की कहानी, जो आज भी एक रिकॉर्ड है, इस फटाफट क्रिकेट को दौर में भी कोई भी बल्लेबाज उस रिकॉर्ड तक नहीं पहुंच पाया है। तो जरा अपने दिमाग को ब्रैडमैन की ब्लैक एंड व्हाईट तस्वीरों के इर्द गिर्द घुमाइए और इस ऐतिहासिक पारी की कहानी सुनिए…
11 जुलाई, 1930 एशेज सीरीज का तीसरा मैच, ऑस्ट्रेलियाई कप्तान विलियम मॉल्डन वुडफुल ने टॉस जीता और सपाट दिख रही पिच पर पहले बल्लेबाजी करने का फैसला किया, लेकिन उनका फैसला मैच की 11वी गेंद पर गलत साबित होने की ओर बढ़ा गया, जब सलामी बल्लेबाज ऑर्ची जैक्शन पवेलियन लौट गए।
इसके बाद एक 21 साल का एक युवा बल्लेबाज लीड्स की पहली सुबह 11 गेंदों के बाद बल्लेबाजी करने के लिए ड्रेसिंग रूम से निकला और दिन का खेल खत्म होने के बाद वह नाबाद 309 रन पीटकर लौटा। ये बल्लेबाज कोई और नहीं बल्कि सर डॉन ब्रैडमैन थे। उनके तिहरे शतक के बाद पूरा क्रिकेट जगत सकते में था, एक दिन में तीन सौ रन…कहा जाता है कि लीड्स में तीसरे टेस्ट से पहले ब्रैडमैन ने कोई भी प्रैक्टिस नहीं की थी। लंदन में दूसरा टेस्ट जीतने के बाद वह साथी खिलाड़ियों के साथ उस साल के विंबलडन के फाइनल मैच का लुत्फ उठाया था और उसके बाद भी वह कुछ दिन क्रिकेट से दूर ही रहे।
लंदन टेस्ट में ब्रैडमैन ने 254 रन की पारी खेली थी, लेकिन लीड्स टेस्ट से पहले उन्होंने बैट को हाथ तक नहीं लगाया। शायद क्रिकेट से ब्रेक ने उन्हें बेहतर तैयारी का मौका दिया और जब वह लीड्स के मैदान पर उतरे, तो पूरी दुनिया उनकी खतरनाक बैटिंग को देखकर हैरान रह गई। ब्रैडमैन की उस प्रलय वाली पारी के तीन दशक बाद साल 1965 में इंग्लैंड के तेज गेंदबाज रहे हेरोल्ड लारवुड ने अपनी आत्मकथा में दावा किया कि उन्होंने ब्रैडमैन को बिना खाता खोले ही विकेट की पीछे कैच करा दिया था। विकेट के पीछे और आसपास खड़े सभी खिलाड़ियों ने अपील की थी पर अंपायर ने इसपर ध्यान नहीं दिया।
उन्होंने लिखा कि, मेरे मन में कोई संदेह नहीं था कि वह स्पष्ट रूप से आउट थे। विकेट के आस-पास सभी ने अपील की, यहां तक कि जैक होब्स ने भी, जो सबसे निष्पक्ष व्यक्ति थे, जिनसे मैं क्रिकेट के मैदान पर मिला था। बाद में मैच की रिकॉर्डिंग्स को देखा गया तो मालूम हुआ की लारवूड से गलती हुई थी। उन्होंने ब्रैडमैन को खाता खोलने से पहले गेंदबाजी नहीं की थी और पूरी पारी के दौरान जैक हॉब्स ने या तो कवर में या फिर एक्सट्रा कवर बाउंड्री पर फील्डिंग की थी, विकेट के पीछे कभी नहीं। यह हुआ या नहीं, इसका ब्रैडमैन पर बहुत कम प्रभाव पड़ा। लंच तक वह नाबाद 105 रन बनाकर अपने प्रसिद्ध साथी विक्टर ट्रम्पर और चार्ली मैकार्टनी के साथ मिलकर टेस्ट मैच के पहले दिन ही लंच से पहले शतक बनाने वाले बल्लेबाज बन गए।
फिल्डर के गुस्से पर भारी ब्रैडमैन की मुस्कान
डॉन के बल्ले से पहला गलत स्ट्रोक 141 पर निकला, जब उन्होंने गेंद को मिड-ऑन की ओर खेला, लेकिन गेंद सुरक्षित रूप से जमीन पर गिर गई। चाय तक उन्होंने दोहरा शतक जड़ दिया था। छह बजे से ठीक पहले 273 पर इंग्लैंड के खिलाड़ियों को खुद को आउट करने का एक वास्तविक मौका दिया। विकेटकीपर जॉर्ज डकवर्थ ने जॉर्ज गीरी की गेंद पर एक मुश्किल कैच पकड़ा, लेकिन गेंद जमीन को छू गई, डॉन मुस्कुराए, और डकवर्थ गुस्से में उन्हें देखते रह गए। दिन के अंत तक, ब्रैडमैन 309 रन पर नाबाद थे और एंग्लो-ऑस्ट्रेलियन क्रिकेट में पहला तिहरा शतक जमाने के बाद, रेगी फोस्टर के 287 के रिकॉर्ड को तोड़ा। स्क्वायर कट, लेग में हूक और हिट ऑन ड्राइव जैसे शानदार शॉट खेला था ब्रैडमैन ने अपनी पारी में।
द टाइम्स के अनुसार, उन स्ट्रोक्स का जिक्र करने के लिए, जिनसे उन्होंने अपने अधिकांश रन बनाए, इसके लिए आपको पूरी एशेज की श्रृंखला से गुजरना पड़ेगा। उन्होंने अपनी पहले दिन की पारी में 42 चौके लगाए थे। किसी भी समय उन्होंने जोखिम लेने के लिए कुछ भी नहीं किया, और वह दिन में सिर्फ तीन बार गेंद को हवा में खेले थे। यह वास्तव में उस दौर से लेकर अबतक की शानदार पारियों मे एक है। कहा जाता है कि जब दिन में तीन सौ रन बनाकर एकदम ताजे मिजाज के साथ ब्रैडमैन मैदान से लौटे, लेकिन मैदान में खड़े अंपायर, मौजूद दर्शक सबके सब बेहद ही थके थे। अगर किसी व्यक्ति की सबसे ज्यादा हालत खराब थी, वह था स्कोरर, जो स्कोर बोर्ड को चला रहा था। अगले दिन ब्रैडमैन 334 के स्कोर पर आउट हो गए। डॉन ब्रैडमैन ने अपने करियर में 52 टेस्ट खेले और उनकी 80 पारियों में 29 शतक और 13 अर्धशतक की मदद से कुल 6996 रन बनाए। ये आँकड़े आज भी उनके सर्वश्रेष्ठ होने की कहानी बयां करते हैं, लेकिन यह महान खिलाड़ी अपने आखिरी मैच में शून्य पर पवेलियन लौट गया। तारीख थी 14 अगस्त 1948 यानि जब हिन्दुस्तान अपनी आजादी की पहली सालगिरह मनाने की तैयारी कर रहा था, तब क्रिकेट के एक कोहिनूर ने उसे अलविदा कह दिया। जिसके नाम से क्रिकेट को सम्मान मिला, जिसने सैकड़ों खिलाड़ियों को क्रिकेट के लिए प्रेरित किया।

(साभार – अमर उजाला)

युद्धस्थल भूचरमोरी पर 2300 महिलाओं ने तलवार रास गरबा कर बनाया विश्व रिकॉर्ड

जामनगर :  गुजरात में भूचरमोरी स्थित युद्ध मैदान में शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए 2300 राजपूत बेटियों और महिलाओं ने तलवार रास गरबा कर वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया। 428 साल पहले शहीद हुए योद्धाओं को श्रद्धांजलि देने के लिए 16 जिलों की बेटियां और महिलाएं एकत्रित हुईं। उनकी उम्र 13 से 52 साल के बीच थी। यह कार्यक्रम अखिल गुजरात राजपूत युवा संघ ने किया था। संघ के प्रमुख अधिकारी महिपत सिंह जडेजा ने कहा- “वैसे तो हर साल राजपूतों के शौर्य और बलिदान की याद में कई कार्यक्रम होते हैं, लेकिन इसने कीर्तिमान बना दिया। एक बड़े मैदान में महिलाएं एक साथ नृत्य कर रही थीं।
योद्धाओं की याद में तलवार रास गरबा
दस्तावेजों के अनुसार, यहां करीब 428 साल पहले मुगलों से जंग हुई थी। बादशाह मुजफ्फर को जामनगर के राजपूत राजा ने अपनी शरण में लिया था। बादशाह मुजफ्फर मुगलों से बचते फिर रहे थे।

आरती में ताली बजाने से बढ़ती है रोग प्रतिरोधक क्षमता

आमतौर पर भगवान की स्तुति करने वक्त ताली बजाने का प्रचलन है। श्रीमद्भागवत के अनुसार कीर्तन में ताली की प्रथा भक्त प्रह्लाद ने शुरू की थी क्योंकि, जब वे भगवान का भजन करते थे तो जोर-जोर से नाम संकीर्तन भी करते थे तथा साथ-साथ ताली भी बजाते थे। इसके बाद अन्य लोग भी उनकी तरह करने लगे। सामान्यत: हम किसी भी मंदिर में आरती के समय सभी को ताली बजाते देखते हैं और हम भी ताली बजाना शुरू कर देते हैं। ऐसा करने से हमारे शरीर को कई लाभ प्राप्त होते हैं। हमारे शरीर के 29 एक्यूप्रेशर पॉइंटस हमारे हाथों में होते है। प्रेशर पॉइंट को दबाने से संबंधित अंग तक रक्त और ऑक्सीजन का संचार अच्छे से होने लगता है। एक्यूप्रेशर के अनुसार इन सभी दबाव बिंदु को सही तरीके से दबाने का सबसे सहज तरीका है ताली। हथेली पर दबाव तभी अच्छा बनता है जब ताली बजाते हुए हाथ लाल हो जाए, शरीर से पसीना आने लगे। इससे आंतरिक अंगों में ऊर्जा भर जाती है और सभी अंग सही ढंग से कार्य करने लग जाते है।
तीन तरह से बजायी जाती है ताली
1. ताली में बाएं हाथ की हथेली पर दाएं हाथ की चारों अंगुलियों को एक साथ तेज दबाव के साथ इस प्रकार मारा जाता है कि दबाव पूरा हो और आवाज अच्छी आए। इस प्रकार की ताली से बाएं हथेली के फेफड़े, लीवर, पित्ताशय, गुर्दे, छोटी आंत व बड़ी आंत तथा दाएं हाथ की अंगुली के साइनस के दबाव बिंदु दबते हैं और इससे इन अंगों तक खून का प्रवाह तीव्र होने लगता है। इस प्रकार की ताली कब्ज, एसिडिटी, मूत्र, संक्रमण, खून की कमी व श्वांस लेने में तकलीफ जैसे रोगों में राहत मिलती है। इस प्रकार की ताली तब तक बजानी चाहिए जब तक हथेली लाल न हो जाए।

2. थप्पी ताली- ताली में दोनों हाथों के अंगूठों से लेकर कनिष्ठिका तक सभी अंगुलियां अपने समानांतर दूसरे हाथ की अंगुलियों पर पड़ती हो एवं हथेली-हथेली पर पड़ती हो। इस प्रकार की ताली कान, आंख, कंधे, मस्तिष्क, मेरूदंड के सभी बिंदुओं पर दबाव डालती है। इस ताली का सर्वाधिक फायदा सोल्जर, डिप्रेशन, अनिद्रा, स्लिप डिस्क, स्पोगोलाइसिस, आंखों की कमजोरी जैसी समस्याओं में होता है। एक्यूप्रेशर चिकित्सकों की राय में इस ताली को भी तब तक बजाया जाना चाहिए जब तक कि हथेली लाल न हो जाए। इस प्रकार की ताली की आवाज बहुत तेज व दूर तक जाती है।

3. ग्रिप ताली – इस प्रकार की ताली में हथेली को हथेली पर क्रॉस की आकृति में मारा जाता है। इससे किसी विशेष रोग में लाभ तो नहीं मिलता है, लेकिन यह ताली उत्तेजना बढ़ाने का कार्य करती है। इससे अन्य अंगों के दबाव बिंदु सक्रिय होने लगते हैं। यह ताली सम्पूर्ण शरीर को सक्रिय करने में मदद करती है। यदि इस तरह ज्यादा समय तक ताली बजाई जाए तो शरीर में पसीना आने लगता है जिससे कि शरीर के विषैले तत्व पसीने से बाहर आ जाते हैं। इस तरह त्वचा स्वस्थ रहती है। इस तरह ताली बजाने से न सिर्फ रोगों से रक्षा होती है, बल्कि कई रोगों का इलाज भी हो जाता है।

बेहतर होता है रक्त संचार
1. ताली बजाने से खून में बुरे कोलेस्ट्रॉल की मात्रा कम होती है, जिससे हार्ट अटैक जैसी समस्या की आशंका कम हो जाती है। ताली बजाने से शरीर में रक्त का संचार अच्छे से होता है जिससे फेफड़ों में अस्थमा संबंधित रोग का खतरा भी टलता है।

2. तेज ताली बजाने से आंख, कान, दिमाग, रीढ़ की हड्डी, कंधे आदि सभी बिंदुओं पर प्रभाव पड़ता है जिससे तनाव, अनिद्रा, आंखों की कमजोरी, पुराना सिर दर्द, जुकाम, बालों का झड़ना जैसी समस्या से राहत मिलती है।

3. ताली से मांसपेशियां प्रभावित होती हैं जिससे पूरे शरीर में ऊर्जा का संचार अच्छे से होता है। इतना ही नहीं नियमित ताली की आदत से खून में सफेद कणों को ताकत मिलती है जिससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।

(साभार – दैनिक भास्कर)

’83’ में बोमन ईरानी की एंट्री, बनेंगे कमेंटेटर फारुख इंजीनियर

मुम्बई : भारतीय क्रिकेट टीम की पहली विश्व कप जीत पर बन रही फिल्म ’83’ की टीम में बोमन ईरानी की एंट्री हो गई है। रणवीर सिंह ने कबीर खान और बोमन के साथ अपनी एक तस्वीर इंस्टाग्राम पर शेयर की है। जिसमें तीनों लॉर्ड्स ग्राउंड में नजर आ रहे हैं। बोमन फिल्म में पूर्व क्रिकेटर फारुख इंजीनियर का रोल निभाएंगे। विश्व कप के दौरान मिले थे बोमन : बोमन ने फारुख के किरदार को लेकर मुंबई मिरर को दिए साक्षात्कार में बताया कि रोल की तैयारी के लिए वे इंग्लैंड में हुए क्रिकेट विश्वकप 2019 के दौरान मैनचेस्टर में फारुख से मिले थे और उनके साथ उनके घर में कुछ दिन बिताए थे। इतना ही नहीं दोनों ने भारत-पाकिस्तान का मैच भी साथ ही देखा था।
फारुख इंजीनियर ने भारत के लिए 46 टेस्ट खेले। फारुख ने पहला मैच 1961 में इंग्लैंड के खिलाफ कानपुर में खेला था और आखिरी टेस्ट वेस्टइंडीज के खिलाफ 1975 में मुंबई में खेला था। उन्होंने भारत के लिए 5 वनडे भी खेले हैं। 81 साल के फारुख ने टेस्ट में 2611 और वनडे में 114 रन बनाए।
फारुख के बारे में ये किस्सा मशहूर है कि 1983 वर्ल्ड कप के फाइनल मैच के दौरान बीबीसी के कमेंट्री बॉक्स में इंग्लैंड के ब्रायन जॉन्सटन ने उन पर तंज कसा था। ब्रायन ने कहा था- अगर भारत विश्वकप जीतता है तो क्या पीएम इंदिरा गांधी भारत में एक दिन का सार्वजनिक अवकाश घोषित करेंगी? इंजीनियर ने भी मजाक में जवाब दिया था कि- इसमें कोई शक नहीं और कुछ ही मिनटों में इंदिरा गाँधी के कार्यालय से एक सन्देश कमेंटेटर टीम को भेजा गया। इंदिरा गांधी की ने ब्रायन और फारुख की बातचीत सुनी थी और वास्तव में टीम इंडिया की जीत के बाद उन्होंने छुट्टी की घोषणा कर दी थी।