टालाहसी : सुपरकंडिक्टिविटी की महत्वपूर्ण थ्योरी देने के लिए साल 1972 में भौतिकी विज्ञान के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित जॉन रॉबर्ट श्रिफर का निधन हो गया। वह 88 वर्ष के थे। परिवार के सदस्यों ने बताया कि श्रिफर का फ्लोरिडा के टालाहसी में शनिवार को एक नर्सिंग केंद्र में नींद में ही निधन हो गया। उनके परिवार में तीन बच्चे हैं।
श्रिफर को जॉन बार्डीन और लियोन कूपर के साथ बीसीएस थ्योरी विकसित करने के लिए भौतिकी विज्ञान में संयुक्त रूप से नोबेल पुरस्कार मिला था। यह सुपरकंडिक्टिविटी की पहली सफल माइक्रोस्कोपिक थ्योरी मानी जाती है। साल 2005 में उन्हें 161 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से कार चलाकर एक व्यक्ति की हत्या करने और सात अन्य लोगों को घायल करने के जुर्म में दो साल की जेल की सजा सुनाई गई थी।
नोबेल पुरस्कार विजेता भौतिकी विज्ञानी श्रिफर का देहांत
एपल एक अरब डॉलर में खरीदेगा इंटेल का स्मार्टफोन मोडेम कारोबार
नयी दिल्ली : महंगे स्मार्टफोन एवं अन्य उपकरण बनाने वाली कंपनी एपल ने एक अरब डॉलर में इंटेल का स्मार्टफोन मोडेम कारोबार खरीदने की घोषणा की है। दोनों कंपनियों ने इसको लेकर समझौता किया है। यह सौदा इस साल की अंतिम तिमाही में पूरा होने का अनुमान है। एपल ने कहा कि इस सौदे से इंटेल की बौद्धिक संपदा, उपकरण और पट्टे भी शामिल हैं। सौदे के तहत इंटेल के करीब 2,200 कर्मचारी एपल से जुड़ेंगे। एपल ने कहा कि इस सौदे के बाद उसके पास वायरलेस प्रौद्योगिकी के पेटेंट की संख्या बढ़कर 17 हजार से अधिक हो जाएगी। इसके बाद इंटेल स्मार्टफोन के अलावा अन्य उपकरणों के लिये ही मोडेम बनाएगी।
इंटेल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी बॉब स्वान ने कहा, ‘‘इस सौदे से हमें 5जी नेटवर्क के लिये प्रौद्योगिकी विकसित करने पर ध्यान केंद्रित करने में मदद मिलेगी। हमें इस बात का भरोसा है कि एपल मोबाइल मोडेम टीम को उपयुक्त माहौल प्रदान करने में सक्षम रहेगी।’’ एपल के वरिष्ठ उपाध्यक्ष (हार्डवेयर प्रौद्योगिकी) जॉनी स्रोउजी ने कहा, ‘‘हमने इंटेल के साथ वर्षों से काम किया है। हमें मालूम है कि इंटेल की इस टीम के पास उपभोक्ताओं को विश्वस्तरीय अनुभव देने वाली प्रौद्योगिकी डिजायन करने का जज्बा है। हम इस बात से उत्साहित हैं कि इतने सारे शानदार अभियंता हमारी कंपनी से जुड़ रहे हैं।’’ उल्लेखनीय है कि स्मार्टफोन मोडेम/चिप बनाने में शीर्ष कंपनी फॉक्सकॉन और एपल के बीच पिछले कुछ समय से विवाद चल रहा है। एपल अभी तक चिप के मामले में फॉक्सकॉन पर निर्भर रहते आयी है। हालांकि कंपनी ने हालिया समय में इस बात के संकेत दिये थे कि वह चिप के मामले में आत्मनिर्भर होने को इच्छुक है। इंटेल ने भी स्मार्टफोन मोडेम कारोबार के बजाय 5जी से जुड़ी प्रौद्योगिकी पर ध्यान केंद्रित करने की इच्छा जाहिर की थी।
कम्पनी संशोधन विधेयक 2019 को लोकसभा की मंजूरी
नयी दिल्ली : लोकसभा ने कम्पनी (संशोधन) विधेयक 2019 को मंजूरी प्रदान की जो कम्पनी संशोधन दूसरा अध्यादेश 2019 का स्थान लेगा। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सदन में विधेयक पर हुई चर्चा का जवाब देते हुए कहा कि विधेयक में प्रस्तावित संशोधन व्यापार सुगमता (ईज ऑफ डूइंग बिजनेस) के लिए है।
उन्होंने कहा कि 2013 में कांग्रेस नीत संप्रग सरकार ने कम्पनी अधिनियम पारित किया था जिसमें लगातार संशोधन की मांगें उठती रहीं। उन्होंने कहा कि इस तरह के संशोधनों को सरकार अपनी इच्छा से नहीं लाती बल्कि सभी हितधारकों की माँगों के अनुरूप लाया जाता है। सीतारमण ने इस संबंध में लाये गये अध्यादेश को लेकर कुछ विपक्षी सदस्यों के सवाल पर कहा कि तात्कालिक जरूरत के लिए अध्यादेश दोबारा लाना पड़ा था और यह जल्द समाप्त होने वाला है, इसलिए सरकार विधेयक लेकर आई है ताकि फिर से अध्यादेश का रास्ता नहीं अपनाना पड़े।
कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व (सीएसआर) के प्रावधान पर विभिन्न सदस्यों के प्रश्नों के उत्तर में वित्त मंत्री ने कहा कि सीएसआर के लिए कम्पनियों को तीन साल की अवधि दी गयी है और पहले साल में उन्हें इस बारे में निर्णय लेने की प्रक्रिया पूरी करनी है। उन्होंने साफ किया कि पांच करोड़ रुपये का राजस्व अर्जित करने वाली, एक हजार करोड़ रुपये के कारोबार वाली कंपनियों को सीएसआर की गतिविधियों को दिखाना होगा और इस बारे में केवल स्पष्टीकरण से काम नहीं चलेगा। मंत्री के जवाब के बाद सदन ने ध्वनिमत से विधेयक को पारित किया। विधेयक के उद्देश्यों एवं कारणों के अनुसार इसके माध्यम से कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 2 के खंड 41 का संशोधन करने की बात कही गई है जिससे केंद्र सरकार को कुछ कंपनियों को भिन्न भिन्न वित्तीय वर्ष रखने देने का अधिकार दिया गया है।
इसमें कम्पनियों के रजिस्टर से कंपनी का नाम हटाने के लिये कार्रवाई आरंभ करने के लिये पंजीयक को सशक्त करने वाले अधिनियम की धारा 12 का संशोधन करने की बात कही गयी है, यदि कम्पनी इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार कोई कारोबार नहीं कर रही है ।
‘उरी…’, ‘विलेज रॉकस्टार’ एएससीटीए की ‘सर्वश्रेष्ठ एशियन फिल्म’ पुरस्कार के लिये नामित
मेलबर्न : ऑस्ट्रेलियन एकेडमी ऑफ सिनेमा एंड टेलीविजन आर्ट्स (एएसीटीए) ने आदित्य धर की पहली फिल्म ‘उरी : द सर्जिकल स्ट्राइक’, रीमा दास की ‘विलेज रॉकस्टार’ और वासन बाला निर्देशित एक्शन-कॉमेडी फिल्म ‘मर्द को दर्द नहीं होता’ को ‘सर्वश्रेष्ठ एशियन फिल्म पुरस्कार, 2019’ के लिये नामित फिल्मों की अंतिम सूची के लिए चयनित किया है।
इन नामों की घोषणा हाल में शंघाई में एक कार्यक्रम के दौरान की गयी, जहां एएसीटीए अपने ‘एशिया इंटरनेशनल इंगेजमेंट प्रोग्राम’ के तहत ‘चाइना ऑस्ट्रेलिया फिल्म फोरम’ और पैनल चर्चा का आयोजन कर रहा था। 19 एशियाई क्षेत्रों की पिछले साल की बेहतरीन फिल्मों को सम्मानित करने के उद्देश्य से ‘एएसीटीए सर्वश्रेष्ठ एशियन फिल्म पुरस्कार’ का गठन किया गया है जो ऑस्ट्रेलिया में एशियाई फिल्मों बढ़ती लोकप्रियता को दर्शाता है। धर ने कहा, ‘‘ऑस्ट्रेलिया के सबसे बड़े फिल्म पुरस्कार ‘एएसीटीए अवार्ड्स’ के लिये चुना जाना मेरे लिये बहुत रोमांचकारी है। यह पुरस्कार ऑस्ट्रेलिया में ऑस्कर के समान है। मैं बहुत सम्मानित महसूस कर रहा हूं और इस प्रतिस्पर्धा में अपनी फिल्म को देखकर मुझे बहुत हर्ष महसूस हो रहा है।’’
पाकिस्तान ने पिछले 16 महीनों में भारत से किया 250 करोड़ रुपये के टीकों का आयात
इस्लामाबाद : पाकिस्तान ने पिछले 16 महीनों के दौरान भारत से 250 करोड़ रुपये से अधिक के रेबीज रोधी तथा विष रोधी टीकों की खरीदारी की है। एक स्थानीय अखबार ने यह खबर दी है। पाकिस्तान के अखबार ‘द नेशन’ के अनुसार पाकिस्तान में पर्याप्त मात्रा में टीके नहीं बनने के कारण उसने पिछले 16 महीनों में भारत से 3.6 करोड़ डॉलर यानी 250 करोड़ रुपये से अधिक के टीकों का आयात किया है।
पाकिस्तान के सांसद रहमान मलिक ने भारत से खरीदी जा रही दवाओं की मात्रा और इनके मूल्य के बारे में सवाल किया। इसके बाद राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा मंत्रालय ने संसद की स्थायी समिति को इस बारे में जानकारी दी। मंत्रालय ने कहा कि रेबीजरोधी और विषरोधी दोनों तरह के टीके देश में बनाए जाते हैं। हालांकि इससे मांग की पूर्ति नहीं हो पा रही है। इस कारण भारत से इन्हें आयात किया जा रहा है।
ब्रिटेन की भारतीय मूल की पहली गृह मंत्री बनीं प्रीति पटेल, जावेद को मिला वित्त मंत्रालय
लंदन : टेरेसा मे की ब्रेक्जिट नीति की मुखर आलोचक रहीं प्रीति पटेल ने ब्रिटेन के नये प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन की कैबिनेट में गृह मंत्री के रूप में कार्यभार संभाला। इसके साथ ही वह ब्रिटेन में भारतीय मूल की पहली गृह मंत्री बन गई हैं। प्रीति पाकिस्तानी मूल के साजिद जावेद की जगह लेंगी, जिन्हें वित्त मंत्रालय का प्रभार सौंपा गया है। जावेद नस्लीय अल्पसंख्यक समुदाय से आने वाले ब्रिटेन के पहले वित्त मंत्री हैं।
प्रीति कंजरवेटिव पार्टी नेतृत्व के लिए ‘‘बैक बोरिस’’ अभियान की प्रमुख सदस्य थीं और पहले से संभावना थी कि उन्हें नयी कैबिनेट में कोई बड़ी जिम्मेदारी दी जा सकती है। प्रीति ने कहा कि गृह मंत्री की जिम्मेदारी सौंपे जाना सम्मान की बात है।
उन्होंने कहा, ‘‘मैं अपने देश एवं हमारे लोगों को सुरक्षित रखने और सड़कों पर बढ़ रहे अपराधों को रोकने के लिए हर संभव कोशिश करूंगी। मैं आगे आने वाली चुनौतियों से निपटने के लिए तैयार हूं।’
टेरेसा मे की कैबिनेट से ब्रेक्जिट मंत्री के तौर पर इस्तीफा देने वाले डोमिनिक राब को विदेश मंत्री बनाया गया हैं। वह टोरी नेतृत्व के मुकाबले में जॉनसन के प्रतिद्वंद्वी रहे जेरेमी हंट की जगह लेंगे। लिज ट्रुस को अंतरराष्ट्रीय व्यापार मंत्री और बेन वालेस को रक्षा मंत्री नियुक्त किया गया है। एंड्रिया लीडसम को व्यापार मंत्री बनाया गया है।
कुछ पदों में बदलाव नहीं किया गया हैं जिनमें स्वास्थ्य मंत्री और ब्रेक्जिट मंत्री के पद शामिल हैं। मैट हैनकॉक स्वास्थ्य मंत्री और स्टीफन बारक्ले ब्रेक्जिट मंत्री बने रहेंगे। प्रीति ने अपनी नियुक्ति की घोषणा से कुछ घंटे पहले कहा था, ‘‘यह महत्वपूर्ण है कि कैबिनेट आधुनिक ब्रिटेन और आधुनिक कंजरवेटिव पार्टी को प्रदर्शित करे।’’ गुजराती मूल की नेता प्रीति ब्रिटेन में भारतीय मूल के लोगों के सभी प्रमुख कार्यक्रमों में अतिथि होती हैं और उन्हें ब्रिटेन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उत्साही प्रशंसक के रूप में देखा जाता है।
उच्चतम न्यायालय ने रद्द किया आम्रपाली का पंजीयन और संपत्तियों का पट्टा
नयी दिल्ली : उच्चतम न्यायालय ने कर्ज में फंसी कंपनी आम्रपाली समूह का रीयल एस्टेट नियमन प्राधिकरण (रेरा) के तहत पंजीयन रद्द कर दिया। न्यायालय ने नोएडा और ग्रेटर नोएडा प्राधिकरणों से आम्रपाली की संपत्तियों के लिये मिले पट्टे भी रद्द कर दिये।
न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा और न्यायमूर्ति उदय यू. ललित की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए आम्रपाली समूह की सभी लंबित परियोजनाओं को पूरा करने के लिये एनबीसीसी को नियुक्त किया है। पीठ ने अधिवक्ता आर. वेंकटरमणी को कोर्ट रिसीवर नियुक्त किया। वेंकटरमणी को आम्रपाली की संपत्तियों के सारे अधिकार मिल जाएंगे।
न्यायालय ने कहा कि वेंकटरमणी के पास यह अधिकार रहेगा कि वह बकाया वसूली के लिये आम्रपाली की संपत्तियों की बिक्री के लिये तीसरे पक्ष से करार कर सकेंगे। पीठ ने कहा कि विदेशी विनिमय प्रबंधन अधिनियम (फेमा) तथा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के प्रावधानों का उल्लंघन कर घर खरीदारों के पैसे का हेर-फेर किया गया। न्यायालय ने प्रवर्तन निदेशालय को आम्रपाली के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक अनिल शर्मा तथा कंपनी के अन्य निदेशकों और वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा किये गये कथित मनी लौंड्रिंग (धन शोधन) की जांच का भी निर्देश दिया है।
न्यायालय ने कहा कि नोएडा और ग्रेटर नोएडा के प्राधिकरणों ने आम्रपाली के साथ सांठगांठ करके उसे मकान खरीदारों के पैसे की हेर-फेर करने में मदद की और कानून के हिसाब से काम नहीं किया। न्यायालय ने मकान खरीदारों को राहत देते हुए नोएडा और ग्रेटर नोएडा के प्राधिकरणों से कहा कि वे आम्रपाली समूह की विभिन्न परियोजनाओं में पहले से रह रहे मकान खरीदारों को आवास पूर्ण होने संबंधी प्रमाणपत्र सौंपे।
ये खुदकुशी सवाल खड़े करती है हमारी व्यवस्था और समाज पर
इस देश को कॉफी का चस्का लगाने वाले वी.जी. सिद्धार्थ ने जिन्दगी से हार मान ली। यह एक हृदय विदारक दिल तोड़ने वाली घटना है। कर्ज के बोझ और साझेदारों के दबाव ने एक होनहार उद्यमी इस देश से छीन लिया। उन्होंने जाते – जाते जो पत्र लिखा है, वह एक भयानक हकीकत से रूबरू करवाता है। आयकर विभाग के दबाव का भी जिक्र है। सिद्धार्थ की खुदकुशी ने एक साथ बहुत से सवाल खड़े कर दिये हैं…आर्थिक, सामाजिक और मानसिक हैं ये प्रश्न। ये घटना हमारी पूरी व्यवस्था और समाज पर प्रश्न चिह्न है। एक तरफ विजय माल्या और नीरव मोदी जैसे कारोबारी हैं जो रातोंरात हजारों करोड़ रुपये की ठगी कर के देश से फरार होते हैं और दूसरी तरफ सिद्धार्थ जैसे लोग हैं जो एक – एक पैसा जोड़ते हैं, हजारों लोगों को रोजगार देते हैं, जीने की उमंग जगाते हैं और खुद व्यवस्था के आगे हार मान लेते हैं…यह दोष किसका है? क्या इस तरह हम आर्थिक प्रगति कर पाएँगे…अगर उद्यमी ही मजबूत न हुए तो इस देश की गाड़ी कैसे मजबूत होगी..यह सवाल तो खड़ा होता है। इस देश में श्रमिकों के प्रति सहानुभूति रहती है, होनी चाहिए मगर सवाल यह भी है कि अगर पूँजीपति ही नहीं होंगे तो आप काम कहाँ करेंगे? क्या इसके बाद आयकर के लिए बेवजह दबाव डालने वाले अधिकारियों पर नकेल कसी जायेगी? अगर यही स्थिति रही तो कोई भी युवा कैसे किसी व्यवसाय के लिए आगे बढ़ेगा? बात सिर्फ इतनी सी नहीं है, बात उस मानसिक व सामाजिक दबाव की है जो पुरुषों को विरासत से मिलती आ रही है। खुद को मजबूत रखने का दबाव, हमेशा जिम्मेदारी लेने का दबाव और सारा बोझ अपने कन्धे पर रखने का दबाव उनको इस परम्परा से मिलता है। इस समाज ने रोने को कमजोरी की निशानी बताया है मगर हमें यह याद रखना होगा कि हम सब इन्सान हैं…हमारी क्षमताएँ हैं, सीमाएँ हैं, हम सफल हो सकते हैं और असफल भी हो सकते हैं। अपना गम, अपनी तकलीफें बाँटना सीखिए… जितनी काउंसिलिंग स्त्रियों की होती है, उतनी ही काउंसिलिंग की जरूरत पुरुषों को भी है..। हमें स्त्री विमर्श के साथ आज पुरुष विमर्श की भी जरूरत है। एक के बाद एक ऐसी परिस्थितियाँ बन रही हैं कि दूर तक सिर्फ संशय है। राजनीतिक दबाव एक बड़ा फैक्टर है। वी.जी. सिद्धार्थ कर्नाटक के पूर्व सीएम एमएस कृष्णा के दामाद थे…जाहिर है कि उन पर विरोधियों की नजर रही होगी और कृष्णा के दुश्मनों की भी…मगर राजनीतिक मुकाबलेबाजी का यह बेहद घिनौना रंग है। राजनीति का यह घिनौना रंग उन्नाव में भी दिख रहा है जहाँ लड़कियों की रक्षा का दम भरने वाली योगी सरकार फिलहाल अपने विधायक को बचाती नजर आ रही है…मामला अब सुप्रीम कोर्ट में है..व्यवस्था की इस गड़बड़ी के बीच तीन तलाक बिल का पारित होना एक नयी उम्मीद लेकर आया है मगर सवाल तो अब भी वहीं है….ये कैसा देश बना रहे हैं हम…। आज मैथिलीशरण गुप्त याद आ रहे हैं..
इस देश को हे दीनबन्धो, आप फिर अपनाइए
भगवान भारतवर्ष को फिर, पुण्यभूमि बनाइए।।
हमें साहित्य को परर्फॉमिंग आट्रर्स से जोड़ना होगा
प्र. कहानी लिखना कैसे शुरू किया?
मेरा बचपन उत्तर प्रदेश के गाँव में बीता है। प्राथमिक शिक्षा गाँव के ही स्कूल में हुई। वह गाँव जो, बिजली, पानी जैसी तमाम मौलिक सुविधाओं से वंचित रहा। सूर्य की रोशनी के बाद लालटेन, डिबरी का प्रकाश और कुआँ, गड़ही, नहर आदि ही सामान्य जन – जीवन के जल स्त्रोत के आधार थे। कृषि ही उनकी जीविका का प्रमुख साधन थी। गाँव के गिने -चुने परिवार ही थे जिनके पास पक्के मकान थे और घर में शहर जाकर कमाने जैसे व्यक्ति और कमाई भी। सौभाग्य से हमारा परिवार उन कुछ गिने -चुने परिवारों में से था जिन्हें शिक्षा की विरासत मिली थी और आर्थिक आधार भी मजबूत था। तब, जब गाँव में लड़कियाँ छोटे भाई -बहनों को खिलाने, खाना पकाने और सिलाई कढ़ाई सीखकर विवाह हेतु सुयोग्य तैयार की जाती थीं, हमें पढ़ने का मौका मिला। बचपन के दिनों में ही जीवन के जमीनी जद्दोजहद को बड़े निकट से देखा और महसूस किया था। उसके बाद जब कोलकाता आना हुआ और पढ़ने के लिए आर्य कन्या महाविद्यालय में दाखिला हुआ तब भी आस – पास की जिन्दगियाँ, विशेषकर स्त्री जीवन और उसके संघर्ष, जो गाँव से लेकर शहर तक किसी न किसी रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते रहे, ने मेरे मन को सबसे अधिक छुआ। इस तरह कहानी लिखने की शुरुआत हुई। विधिवत कहानी लिखना मैंने स्नातक की पढ़ाई के दौरान शुरू किया था। कभी – कभी कोई एक कहानी लिखने में पूरी रात बीत जाती थी। कहानी का प्रकाशन सर्वप्रथम एम.ए. के दौरान हुआ। ‘समकालीन संचेतना’ पत्रिका में कई कहानियाँ प्रकाशित हुईं। कई प्रतियोगिताओं में कहानियाँ पुरस्कृत हुईं। एम.ए. के उपरान्त जब मेरा विवाह हुआ तो पहली बार मेरे स्वर्गीय श्वसुर जी ने विवाह के अवसर पर ही मेरी कुछ कहानियों का सँग्रह प्रकाशित कर सभी मेहमानों को उपहार दिया था। ‘स्मृतियों के कुहासे में’ सँग्रह का शीर्षक था और उसममें लगभग 8-10 कहानियाँ थीं।
प्र. समकालीन साहित्य को लेकर आपके क्या विचार हैं?
यह अत्यन्त गम्भीर प्रश्न है। साहित्य वस्तुतः समाज से विलग नहीं होता। समुद्र – बादल और वर्षा की तरह इनके अपने अनन्य रिश्ते होते हैं। एक का अस्तित्व, रूप-स्वरूप, दूसरे के अस्तित्व और रूप – स्वरूप की अनिवार्य शर्त बन जाता है। इसी के बीच ‘कुछ बेहतर’ की चाह सदैव परिवर्तन की दिशा निर्धारित करती रहती है। यह अकाट्य सत्य है कि ‘एक समय का’ ‘सबकुछ’ न ही सुन्दर होता है और न ही असुन्दर होता है। वैसे ही उसकी ‘शिवता’ के बारे में भी कहा जा सकता है लेकिन हाँ, यह भी उतना ही सत्य है कि सतत एक प्रचेष्टा हमेशा सत्य, शिव और सुन्दर की ओर प्रवाहमान होती है। मैंने कभी भी समय को ‘अच्छा’ या ‘बुरा’ नहीं समझा है। वैसे ही साहित्य को भी पूरा का पूरा अपनी जमात में ‘त्याज्य’ या ‘वरेण्य’ नहीं माना है। सबकी अपनी मौजदूगी की वजहें हैं। इस परिप्रेक्ष्य में हमारा, आज का समकालीन साहित्य काफी बड़े पैमाने पर, बड़े फलक को आत्मसात किये हुए है।
प्र. क्या साहित्यिक कृतियों की सम्यक आलोचना नहीं हो पा रही है या नये लेखकों की उपेक्षा की जा रही है?
इस प्रश्न में दो प्रश्न हैं। जहाँ तक साहित्यिक कृतियों की सम्यक आलोचना का प्रश्न है तो मैं समझती हूँ कि पूरी तरह से इसका उत्तर हाँ या न में नहीं हो सकता है। ऐसा नहीं है कि आज साहित्यिक कृतियों की आलोचना नहीं हो रही है लेकिन यह भी ठीक है कि साहित्यिक कृतियाँ जिस गम्भीर और सम्यक आलोचना दृष्टि की अपेक्षा रखती हैं, कभी – कभी उससे वंचित रह जाती हैं। वैसे भी हमारे समाज में बीमार और डॉक्टर के अनुपात की तरह रचनाकार और आलोचक का अनुपात भी विचारणीय है। अब मैं आपके प्रश्न के दूसरे हिस्से पर आती हूँ। इसका उत्तर भी बहुत सीधे शब्दों में नहीं दिया जा सकता क्योंकि यह प्रश्न सिर्फ आज का प्रश्न नहीं है। यह एक शाश्वत अथवा कहें कि हर समय का प्रश्न है। साहित्य जगत की अपनी खूबियाँ, खामियाँ और उनसे निर्मित परिपाटियाँ हैं। मेरा मानना है कि किसी सवाल का उत्पन्न होना ही अपने आप में उसके जवाब की हल्की प्रतिध्वनि हुआ करता है। बावजूद इसके मीडिया और जनसंचार के तमाम सुलभ माध्यमों ने हर व्यक्ति को यह मौका प्रदान किया है कि वह स्वयं को उद्घाटित कर सके। स्वीकार और अस्वीकार किए जाने की दंगल तो नये लेखकों के साथ जुड़ी ही रहती है, फिर भी आज का समय इस मामले में पहले से कहीं ज्यादा उदार दृष्टिगोचर होता है। यह एक शुभ लक्षण है।
प्र. आपकी कितनी पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं?
‘स्मृतियों के कुहासे में’ (जो अप्राप्य है) को छोड़ दें तो मेरी अभी तक कुल चार पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें दो कहानी सँग्रह ‘अंतराल’ और ‘कतरा -कतरा जिन्दगी’ हैं। एक आलोचनात्मक पुस्तक ‘अज्ञेय की कहानियों का पुनर्पाठ’ और एक सम्पादित पुस्तक ‘अपने – अपने अज्ञेय’ हैं। मैंने रंजन बंद्योपाध्याय के दो बांग्ला उपन्यास ‘आमि रवि ठाकुरेर बोउ’ और ‘कादम्बरी देवीर सुसाइड नोट’ का हिन्दी में अनुवाद भी किया है जो राजकमल से प्रकाशनाधीन है। उम्मीद है कि इस वर्ष के अन्त तक यह पुस्तक भी पाठकों के हाथ में होंगी।
प्र. आज के महिला लेखन के बारे में क्या कहना चाहेंगी?
आज का महिला लेखन अत्यन्त समृद्ध है। मुझे लगता है कि आज की महिलाओं ने स्वयं को अभिव्यक्त करने के लिए साहित्य की सभी विधाओं को चुना और माध्यम बनाया है। कहानी, उपन्यास, नाटक, कविता, रिपोर्ताज, डायरी, संस्मरण, यहाँ तक कि आलोचना के क्षेत्र में भी बड़ी समर्थता के साथ स्वयं को स्थापित किया है। समाज की तमाम बुलन्दियों की तरह साहित्यिक बुलन्दियों पर भी अपने परचम लहराये हैं। यह अत्यन्त सन्तोषजनक है कि आज की तारीख का कोई भी मुकम्मलसाहित्यिक अनुष्ठान बिना महिला की भागीदारी के पूरा नहीं होता। आप देखें कि आज की महिलाओं का लेखन आपको चमत्कृत करेगा। महिलाओं ने अपने लेखन को अद्भुत विस्तार दिया है। उनकी चेतना, संवेदनशीलता, अभिव्यक्ति की दक्षता, सब कुछ उन्हें श्रेष्ठ रचनाकार के रूप मे प्रतिष्ठित कर रहा है। 150 -200 पृष्ठों के उपन्यास, 5 -6 पन्नों की कहानियाँ, डायरी के आधे-अधूरे पृष्ठ, चेतना, संवेदना और भावना की त्रिवेणी के बहुतेरे अनछुए आयाम खोल देते हैं।
प्र. आज का स्त्री विमर्श किस तरह का विमर्श है और घरेलू स्त्रियों से जुड़े प्रश्नों पर आज का साहित्य कहाँ तक बात कर पाया है?
कई बार जैसे कोई आन्दोलन या मुहिम भटकाव का शिकार हो जाते हैं, वैसे ही विमर्श भी अपनी तमाम बेहद जरूर बातों के बाद भी हम भटक जाते हैं। चिन्तन के स्तर पर बहुत गम्भीर विमर्श कई बार उथली और सतही बातों में फंसकर अपनी रूपरेखा अथवा प्रारूप से भिन्न शक्ल अख्तियार कर लेते हैं। मुझे लगता है कि स्त्री विमर्श भी इसका अपवाद नहीं है। स्त्रियों की पीड़ा, उनकी संवेदना, उनके संघर्ष, उनकी अस्मिता, उनकी चेतना, उनकी स्वतन्त्रता की भाव भूमि से जिस विमर्श को सम्पृक्त होना चाहिए, वही अक्सर उनके बाह्य रूपाकार की ज्यामिति सुलझाने में व्यस्त दिखता है। ‘स्त्री आत्मा’ की मुक्ति, ‘देह की मुक्ति’ का विमर्श बन जाती है। ‘स्त्री मन का सुख’ ‘स्त्री मन की स्वाधीनता’ ‘दैहिक सुख’ ‘दैहिक स्वाधीनता’ की राह पकड़ लेता है। रिश्तों के प्रति नकार, परिवार की उपेक्षा, सम्बन्धों में धैर्यहीनता, सब प्रकार से ‘स्व’ की सन्तुष्टि का उतावलापन न जाने इस विमर्श को किस राह पर ले जा रहा है। तसल्ली इस बात की है कि ऐसी परिस्थितियों में भी अभी भी कई स्त्री विमर्श पर काम करने वाली लेखिकाएँ स्त्री विमर्श को उसके सच्चे अर्थों में ही खंगाल रही हैं। ऐसे प्रयास निश्चय ही सतह की काई को काट सकने में समर्थ होंगे और स्त्री विमर्श भटकावों से होता हुआ ही सही, किन्तु गन्तव्य तक अवश्य पहुँचेगा।
जहाँ तक घरेलू स्त्रियों से जुड़े प्रश्नों पर साहित्य के बात करने का सवाल है तो एक बात पहले स्पष्ट करना चाहूँगी कि स्त्री मात्र के साथ घर एक अद्भुत ढंग से जुड़ा होता है। चाहे कामकाजी स्त्रियाँ हों अर्थात जो घर के बाहर दफ्तर, स्कूल, कॉलेज में कार्यरत हैं, हों अथवा घरेलू स्त्रियाँ, जिन्हें आज हम ‘होम मेकर’ कहते हैं, वे हों। ऐसे कई सन्दर्भ होते हैं जहाँ इनकी समस्यायें अथवा संघर्ष एक जैसे होते हैं जिसमें मुझे लगता है कि सबसे बड़ी बाात इनके सम्मान और स्वाभिमान की होती है। ऐसा नहीं है कि साहित्य इनसे सरोकार रखने वाले प्रश्नों पर बात नहीं करता लेकिन हाँ, यह अवश्य है कि ज्यादातर ये प्रश्न सहानुभूति, दया, अथवा देयता के आलोकपुंज में रखे जाते रहे हैं। वहाँ भी स्त्री किसी न किसी दाता के प्रति नतमस्तक ही रही है।
आज का समय इस दृष्टि से काफी बदल गया है। स्त्रियाँ अपने सन्दर्भों के साथ स्वयं उपस्थित हो रही हैं। अपने संघर्ष, अपनी समस्यायें, स्वयं उद्घाटित भी कर रही हैं और सुलझा भी रही हैं। स्त्रियाँ स्वयं साहित्य की बाँह धर अपने घर का कोना -कोना दिखाने को तत्पर हो रही हैं।
प्र.बाजारवाद को आप किस रूप में देखती हैं?
मुझे लगता है कि आज हम जहाँ खड़े हैं, वहाँ से बाजारवाद को नकारना अथवा उसकी उपेक्षा करना एकदम असम्भव है। यह उस दुधारी तलवार की तरह है जिसे बरतने का शऊर सीखना अत्यन्त आवश्यक है। बाजारवाद अब बाजार से उठकर हमारे साथ हमारे घरों में स्थायी रूप से बस रहा है। ऐसी स्थिति में हमें एकमात्र साहित्य ही इसके साथ इसके बीच सुरक्षित मनुष्य बने रहने में मदद कर सकता है।
प्र. युवा पीढ़ी में क्या साहित्य के प्रति उदासीनता है? अगर हाँ तो इसका जिम्मेदार कौन है और स्थिति से कैसे निपटा जा सकता है?
यह प्रश्न मुझे बिल्व पत्र की तरह दिख रहा है। तीन प्रश्न। युवा पीढ़ी साहित्य के प्रति एकदम उदासीन है, यह नहीं कहा जा सकता। हाँ, थोड़ी लापरवाही युवा पीढ़ी में साहित्य के प्रति जरूर देखी जा सकती है लेकिन अभी भी आप देखिए तो साहित्य विपुल पैमाने पर रचा भी जा रहा है और पढ़ा भी जा रहा है। मुझे तो युवा पीढ़ी इस मामले में भी बड़ी सकारात्मक और रचनात्मक दिखती है। थोड़ी बात उसकी लापरवाही पर करें जिसे आप उदासीनता कह रही हैं, वस्तुतः आज की जीवनचर्या (लाइफस्टाइल) ही एकदम बदल गयी है। मीडिया और जन संचार ने जीवन में नयी क्रान्ति लाकर इसे आमूलचूल परिवर्तित कर दिया है। आज हर व्यक्ति में, मैं विशेषकर युवा बच्चों की बात कर रही हूँ, उसके पास स्मार्टफोन है जिसमें दुनिया भर की जानकारियाँ भरी हुई हैं। ई लाइब्रेरी सुलभ है। आज बच्चे पुस्तकें खरीदने और पढ़ने की अपेक्षा मोबाइल में ही पत्रिकाएँ व पुस्तकें डाउनलो़ड कर रहे हैं, पढ़ रहे हैं। हाँ, यह सत्य है कि यदि हम साहित्य के पठन – पाठन को प्रकाशित पुस्तकों के फॉर्म में देखना चाहते हैं। युवा पीढ़ी को पुस्तकालयों के रीडिंग रूम में में घंटों बैठा हुआ देखना चाहते हैं तो यह अवश्य कम हुआ है लेकिन समाप्त एकदम नहीं। इसके पीछे भी हमारी आज की जीवनचर्या ही काम कर रही है। जीवन की गतिशीलता तीव्र हो गयी है। व्यस्तताएं बढ़ गयी हैं। इसमें संचार क्रान्ति ने सब कुछ इन्सटेंट मुहैया करवा रखा है और तो और घर -परिवार के बुजुर्ग अभिभावक भी पुस्तकों का साथ छोड़ स्मार्टफोन और लैपटॉप की गिरफ्त में आते जा रहे हैं। पुस्तकों के साथ रहने, पुस्तकों को पढ़ने का ‘संस्कार’ भी विलीन होता जा रहा है जिसे हमें युवा पीढ़ी तक पहुँचाना था। अब मैं कह सकती हूँ कि युवा पीढ़ी में यदि कहीं थोड़ी -बहुत साहित्य के प्रति उदासीनता है भी तो वह हमारी परिस्थितियों के साथ -साथ हमारी भी देन है।
जहाँ तक निपटने का प्रश्न है तो सबसे पहले हमें यह समझना और समझाना होगा कि तमाम तकनीकी हमारे जीवन के साधन हैं, साध्य नहीं। ये हमारे जीवन को सरल बनाने के लिए हैं, खोखला करने के लिए नहीं। माध्यम को माध्यम की तरह इस्तेमाल किया जाए, उसे उद्देश्य न बनने दिया जाए्। द्वितीयतः हम अभिभावक – शिक्षक जनों की जिम्मेदारी है कि बच्चों को साहित्य से परिचित करवायें। उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित करें। सभी महत्वपूर्ण अवसरों पर उपहारों के साथ पुस्तकों को भी उपहार में देने – लेने के प्रति उत्साहित करें, साहित्य चर्चा करें।
प्र. साहित्य को आम जनता के बीच में कैसे स्थापित किया जाए?
आम जनता के बीच पहुँचने वाले साहित्य की अप्रतिम मिसाल है रामचरित मानस, सूर और मीरा के पद, कबीर के दोहे, प्रेमचन्द की कहानियाँ। मुझे लगता है कि थोड़ी सी सतर्कता और जागरुकता आवश्यक है इसके लिए। आप यदि देखें तो ‘रामचरित मानस’ के जन – जन तक पहुँचने में रामलीलाओं का अद्भुत योगदान है। अखण्ड पाठ का आयोजन, गायन, गायन प्रतियोगितायें इत्यादि इसे आम जन के बीच स्थापित करती हैं और सब कुछ अत्यन्त सहज रूप में्। हमें साहित्य को परर्फॉमिंग आट्र्स से जोड़ना होगा, साहित्यिक कृतियों का मंचन, पाठ, गायन, जैसे आयोजन इसमें बड़ी भूमिका निभा सकते हैं्। आज के समय में फिल्म एक अत्यन्त सशक्त माध्यम है। साहित्यिक कृतियों पर फिल्म निर्माण को प्रोत्साहन मिलना चाहिए। आप महत्वपूर्ण पाश्चात्य फिल्मों पर गौर करें, प्रायः फिल्में ऐसी कृतियों पर आधारित होती है जो जनसामान्य के मनोरंजन के साथ उनके रुचि परिष्करण और संस्करण का भी काम करती हैं। सामाजिक, धार्मिक तथा अन्य उत्सवों एवं अनुष्ठानों में साहित्यिक कार्यक्रमों को शामिल किया जाये।
प्र. हमारे पाठकों को आप क्या सन्देश देना चाहेंगी?
कहते हैं कि साहित्य हमें जीने का सलीका सिखाता है। वस्तुतः वह हमारे मन को उदार बनाता है। हमारे मन के कलुष को धोकर उसे तमाम जानी – अनजानी ग्रन्थियों से मुक्त करता है। हमें एक दूसरे से जोड़ता है। एक दूसरे तक पहुँचने का रास्ता निर्मित करता है। एक दूसरे की व्यथा, पीड़ा, दुःख की आँच को महसूस करने का सामर्थ्य प्रदान करता है। इस प्रकार अन्ततः हमें एक बेहतर मनुष्य बनाता है। अनुरोध करना चाहूँगी कि कृपया साहित्य से स्वयं जुड़ें और दूसरों को भी जोड़ें।
मेरी पहली रचना

उस वक्त मेरी उम्र कोई १३ साल की रही होगी। हिन्दी बिल्कुल न जानता था। उर्दू के उपन्यास पढ़ने-लिखने का उन्माद था। मौलाना शरर, पं० रतननाथ सरशार, मिर्जा रुसवा, मौलवी मुहम्मद अली हरदोई निवासी, उस वक्त के सर्वप्रिय उपन्यासकार थे। इनकी रचनाएँ जहाँ मिल जाती थीं, स्कूल की याद भूल जाती थी और पुस्तक समाप्त करके ही दम लेता था। उस जमाने में रेनाल्ड के उपन्यासों की धूम थी। उर्दू में उनके अनुवाद धड़ाधड़ निकल रहे थे और हाथों-हाथ बिकते थे। मैं भी उनका आशिक था। स्व० हजरत रियाज़ ने जो उर्दू के प्रसिद्ध कवि थे और जिनका हाल में देहान्त हुआ है, रेनाल्ड की एक रचना का अनुवाद ‘हरम सरा’ के नाम से किया था। उस जमाने में लखनऊ के साप्ताहिक ‘अवध-पंच’ के सम्पादक स्व० मौलाना सज्जाद हुसेन ने, जो हास्यरस के अमर कलाकार हैं, रेनाल्ड के दूसरे उपन्यास का अनुवाद ‘धोखा’ या ‘तिलस्मी फ़ानूस’ के नाम से किया था। ये सारी पुस्तकें मैंने उसी जमाने में पढ़ीं और पं० रतननाथ सरशार से तो मुझे तृप्ति न होती थी। उनकी सारी रचनाएँ मैंने पढ़ डालीं। उन दिनों मेरे पिता गोरखपुर में रहते थे और मैं भी गोरखपुर ही के मिशन स्कूल में आठवें में पढ़ता था, जो तीसरा दरजा कहलाता था। रेती पर एक बुकसेलर बुद्धिलाल नाम का रहता था। मैं उसकी दूकान पर जा बैठता था और उसके स्टाक से उपन्यास ले-लेकर पढ़ता था; मगर दूकान पर सारे दिन तो बैठ न सकता था, इसलिए मैं उसकी दूकान से अँग्रेजी पुस्तकों की कुंजियाँ और नोट्स लेकर अपने स्कूल के लडक़ों के हाथ बेचा करता था और इसके मुआवजे में दूकान से उपन्यास घर लाकर पढ़ता था। दो-तीन वर्षों में मैंने सैकड़ों ही उपन्यास पढ़ डाले होंगे। जब उपन्यासों का स्टाक समाप्त हो गया, तो मैंने नवलकिशोर प्रेस से निकले हुए पुराणों के उर्दू अनुवाद भी पढ़े, और ‘तिलस्मी होशरुबा’ के कई भाग भी पढ़े। इस वृहद् तिलस्मी ग्रन्थ के १७ भाग उस वक्त निकल चुके थे और एक-एक भाग बड़े सुपररायल के आकार के दो-दो हज़ार पृष्ठों से कम न होगा। और इन १७ भागों के उपरान्त उसी पुस्तक के अलग-अलग प्रसंगों पर पचीसों भाग छप चुके थे। इनमें से भी मैंने पढ़े। जिसने इतने बड़े ग्रन्थ की रचना की, उसकी कल्पना-शक्ति कितनी प्रबल होगी, इसका केवल अनुमान किया जा सकता है। कहते हैं, ये कथाएँ मौलाना फैजी ने अकबर के विनोदार्थ फारसी में लिखी थीं। इनमें कितना सत्य है, कह नहीं सकता; लेकिन इतनी वृहद् कथा शायद ही संसार की किसी भाषा में हो। पूरी एंसाइक्लोपीडिया समझ लीजिए। एक आदमी तो अपने ६० वर्ष के जीवन में उनकी नकल भी करना चाहे, तो नहीं कर सकता। रचना तो दूसरी बात है।
उसी जमाने में मेरे एक नाते के मामू कभी-कभी हमारे यहाँ आया करते थे। अधेड़ हो गये थे; लेकिन अभी तक बिन-ब्याहे थे। पास में थोड़ी-सी जमीन थी, मकान था, लेकिन घरनी के बिना सब कुछ सूना था। इसलिए घर पर जी नहीं लगता था। नातेदारियों में घूमा करते थे, और सबसे यही आशा रखते थे, कि कोई उनका ब्याह करा दे। इसके लिए सौ-दो-सौ खर्च करने को भी तैयार थे। क्यों उनका ब्याह नहीं हुआ, यह आश्चर्य था। अच्छे-खासे हृष्ट-पुष्ट आदमी थे, बड़ी-बड़ी मूँछें, औसत कद, साँवला रंग। गाँजा पीते थे, इससे आँखें लाल रहती थीं। अपने ढंग के धर्मनिष्ठ भी थे। शिवजी को रोजाना जल चढ़ाते थे। और माँस मछली नहीं खाते थे।
आख़िर एक बार उन्होंने भी वही किया, जो बिन-ब्याहे लोग अक्सर किया करते हैं। एक चमारिन के नयन-बाणों से घायल हो गये। वह उनके यहाँ गोबर पाथने, बैलों को सानी-पानी देने और इसी तरह के दूसरे फुटकर कामों के लिए नौकर थी। जवान थी, छबीली थी, और अपने वर्ग की अन्य रमणियों की भाँति प्रसन्न मुख और विनोदनी थी। ‘एक समय सखि सुअरि सुन्दरि’ वाली बात थी। मामू साहब का तृषित हृदय मीठे जल की धारा देखते ही फिसल पड़ा। बातों-बातों में उससे छेड़छाड़ करने लगे। वह इनके मन का भाव ताड़ गयी। ऐसी अल्हड़ न थी। और नखरे करने लगी। केशों में तेल भी पडऩे लगा, चाहे सरसों का ही क्यों न हो। आँखों में काजल भी चमका, ओठों पर मिस्सी भी आयी, और काम में ढिलाई भी शुरू हुई। कभी दोपहर को आयी और झलक दिखाकर चली गयी, कभी साँझ को आयी और एक तीर चलाकर चली गयी। बैलों को सानी-पानी मामू साहब खुद दे देते, गोबर दूसरे उठा ले जाते, युवती से बिगड़ते क्योंकर? वहाँ तो अब प्रेम उदय हो गया था। होली में उसे प्रथानुसार एक साड़ी दी; मगर अबकी गजी की साड़ी न थी, खूबसूरत-सी सवा दो रुपये की चुँदरी थी। होली की त्योहारी भी मामूल से चौगुनी दी। और यह सिलसिला यहाँ तक बढ़ा कि वह चमारिन ही घर की मालकिन हो गयी।
एक दिन सन्ध्या-समय चमारों ने आपस में पंचायत की। बड़े आदमी हैं तो हुआ करें, क्या किसी की इज्जत लेंगे! एक इन लाला के बाप थे कि कभी किसी मेहरिया की ओर आँख उठाकर न देखा, (हालाँकि यह सरासर ग़लत था) और एक यह हैं कि नीच जाति की बहू-बेटियों पर भी डोरे डालते हैं! समझाने-बुझाने का मौका न था। समझाने से लाला मानेंगे तो नहीं, उलटे और कोई मामला खड़ा कर देंगे। इनके कलम घुमाने की तो देर है। इसलिए निश्चय हुआ कि लाला साहब को ऐसा सबक देना चाहिए कि हमेशा के लिए याद हो जाए। इज्जत का बदला खून ही चुकाता है, लेकिन मरम्मत से भी कुछ उसकी पुरौती हो सकती है।
दूसरे दिन शाम को जब चम्पा मामू साहब के घर में आयी तो उन्होंने अन्दर का द्वार बन्द कर दिया। महीनों के असमंजस और हिचक और धार्मिक संघर्ष के बाद आज मामू साहब ने अपने प्रेम को व्यावहारिक रूप देने का निश्चय किया था। चाहे कुछ हो जाय, कुल मरजाद रहे या जाय, बाप-दादा का नाम डूबे या उतराय!
उधर चमारों का जत्था ताक में था ही। इधर किवाड़ बन्द हुए, उधर उन्होंने द्वार खटखटाना शुरू किया। पहले तो मामू साहब ने समझा, कोई असामी मिलने आया होगा, किवाड़ बन्द पाकर लौट जाएगा; लेकिन जब आदमियों का शोरगुल सुना तो घबड़ाये। जाकर किवाड़ों की दराज से झाँका। कोई बीस-पचीस चमार लाठियाँ लिए द्वार रोके खड़े किवाड़ों को तोडऩे की चेष्टा कर रहे थे। अब करें तो क्या करें? भागने का कहीं रास्ता नहीं, चम्पा को कहीं छिपा नहीं सकते। समझ गये कि शामत आ गयी। आशिकी इतनी जल्दी गुल खिलाएगी यह क्या जानते थे, नहीं इस चमारिन पर दिल को आने ही क्यों देते। उधर चम्पा इन्हीं को कोस रही थी-तुम्हारा क्या बिगड़ेगा, मेरी तो इज्जत लुट गयी। घर वाले मूड़ ही काटकर छोड़ेंगे, कहती थी, कभी किवाड़ बन्द न करो, हाथ-पाँव जोड़ती थी, मगर तुम्हारे सिर पर तो भूत सवार था। लगी मुँह में कालिख कि नहीं?
मामू साहब बेचारे इस कूचे में कभी न आये थे। कोई पक्का खिलाड़ी होता तो सौ उपाय निकाल लेता; लेकिन मामू साहब की तो जैसे सिट्टी-पिट्टी भूल गयी। बरौठ में थर-थर काँपते ‘हनुमान-चालीसा’ का पाठ करते हुए खड़े थे। कुछ न सूझता था।
और उधर द्वार पर कोलाहल बढ़ता जा रहा था, यहाँ तक कि सारा गाँव जमा हो गया। बाम्हन, ठाकुर, कायस्थ सभी तमाशा देखने और हाथ की खुजली मिटाने के लिए आ पहुँचे। इससे ज्यादा मनोरंजक और स्फूर्तिवद्र्धक तमाशा और क्या होगा कि एक मर्द एक औरत के साथ घर में बन्द पाया जाए! फिर वह चाहे कितना ही प्रतिष्ठित और विनम्र क्यों न हो, जनता उसे किसी तरह क्षमा नहीं कर सकती। बढ़ई बुलाया गया, किवाड़ फाड़े गये और मामू साहब भूसे की कोठरी में छिपे हुए मिले। चम्पा आँगन में खड़ी रो रही थी। द्वार खुलते ही भागी। कोई उससे नहीं बोला। मामू साहब भागकर कहाँ जाते? वह जानते थे, उनके लिए भागने का रास्ता नहीं है। मार खाने के लिए तैयार बैठे थे। मार पडऩे लगी और बेभाव की पडऩे लगी। जिसके हाथ जो कुछ लगा-जूता, छड़ी, छाता, लात, घँूसा अस्त्र चले। यहाँ तक मामू साहब बेहोश हो गये और लोगों ने उन्हें मुर्दा समझकर छोड़ दिया। अब इतनी दुर्गति के बाद वह बच भी गये, तो गाँव में नहीं रह सकते और उनकी जमीन पट्टीदारों के हाथ आएगी।
इस दुर्घटना की खबर उड़ते-उड़ते हमारे यहाँ भी पहुँची। मैंने भी उसका खूब आनन्द उठाया। पिटते समय उनकी रूप-रेखा कैसी रही होगी, इसकी कल्पना करके मुझे खूब हँसी आयी।
एक महीने तक तो वह हल्दी और गुड़ पीते रहे। ज्योंही चलने-फिरने लायक हुए, हमारे यहाँ आये। यहाँ अपने गाँव वालों पर डाके का इस्तग़ासा दायर करना चाहते थे।
अगर उन्होंने कुछ दीनता दिखायी होती, तो शायद मुझे हमदर्दी हो जाती; लेकिन उनका वही दम-खम था। मुझे खेलते या उपन्यास पढ़ते देखकर बिगडऩा और रोब जमाना और पिताजी से शिकायत करने की धमकी देना, यह अब मैं क्यों सहने लगा था! अब तो मेरे पास उन्हें नीचा दिखाने के लिए काफी मसाला था!
आखिर एक दिन मैंने यह सारी दुर्घटना एक नाटक के रूप में लिख डाली और अपने मित्रों को सुनायी। सब-के-सब खूब हँसे। मेरा साहस बढ़ा। मैंने उसे साफ-साफ लिखकर वह कापी मामू साहब के सिरहाने रख दी और स्कूल चला गया। दिल में कुछ डरता भी था, कुछ खुश भी था और कुछ घबराया हुआ भी था। सबसे बड़ा कुतूहल यह था कि ड्रामा पढक़र मामू साहब क्या कहते हैं। स्कूल में जी न लगता था। दिल उधर ही टँगा हुआ था। छुट्टी होते ही घर चला गया। मगर द्वार के समीप आकर पाँव रुक गये। भय हुआ, कहीं मामू साहब मुझे मार न बैठें; लेकिन इतना जानता था कि वह एकाध थप्पड़ से ज्यादा मुझे मार न सकेंगे, क्योंकि मैं मार खाने वाले लडक़ों में न था।
मगर यह मामला क्या है! मामू साहब चारपाई पर नहीं हैं, जहाँ वह नित्य लेटे हुए मिलते थे। क्या घर चले गये? आकर कमरा देखा वहाँ भी सन्नाटा। मामू साहब के जूते, कपड़े, गठरी सब लापता। अन्दर जाकर पूछा। मालूम हुआ, मामू साहब किसी जरूरी काम से घर चले गये। भोजन तक नहीं किया।
मैंने बाहर आकर सारा कमरा छान मारा मगर मेरा ड्रामा-मेरी वह पहली रचना-कहीं न मिली। मालूम नहीं, मामू साहब ने उसे चिरागअली के सुपुर्द कर दिया या अपने साथ स्वर्ग ले गये?
(साभार – हिन्दी समय)




