Wednesday, April 22, 2026
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मुंशी जी के जीवन से कुछ किस्से

हिंदी के उपन्यास सम्राट कहे जाने वाले मुंशी प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को बनारस के लमही गांव में हुआ था। प्रेमचंद ने हिंदी साहित्य के खजाने को लगभग एक दर्जन उपन्यास और करीब 250 लघु-कथाओं से भरा है। प्रेमचंद के बचपन का नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। आज मुंशी प्रेमचंद के बिना हिंदी की कल्पना भी करना मुश्किल है, लेकिन लेखन की शुरुआत प्रेमचंद ने उर्दू से की थी। उन्होंने पहला उपन्यास उर्दू में लिखा था। उन्होंने ‘सोज-ए-वतन’ नाम की कहानी संग्रह भी छापी थी जो काफी लोकप्रिय हुई।
मुंशी प्रेमचंद की रचनाओं के बारे में तो काफी पढ़ा और लिखा गया है। लेकिन उनके निजी जीवन के बारे में लोगों को बहुत कुछ मालूम नहीं है। उनके जीवन के अनछुए पहलू को उनकी पत्नी शिवरानी देवी ने अपनी पुस्तक ‘प्रेमचंद: घर में’ उजागर किया है। आइए आज उनके जीवन के अनछुए पहलुओं को जानते हैं…

जब एक लड़के के कान काट दिए
एक बार बचपन में वह मोहल्ले के लड़कों के साथ नाई का खेल खेल रहे थे। मुंशी प्रेमचंद नाई बने हुए थे और एक लड़के का बाल बना रहे थे। हजामत बनाते हुए उन्होंने बांस की कमानी से गलती से लड़के का कान ही काट डाला।

भड़क गया इंस्पेक्टर
उन दिनों मुंशी प्रेमचंद शिक्षा विभाग के डेप्युटी इंस्पेक्टर थे। एक दिन इंस्पेक्टर स्कूल का निरीक्षण करने आया। उन्होंने इंस्पेक्टर को स्कूल दिखा दिया। दूसरे दिन वह स्कूल नहीं गए और अपने घर पर ही अखबार पढ़ रहे थे। जब वह कुर्सी पर बैठकर अखबार पढ़ रहे थे तो सामने से इंस्पेक्टर की गाड़ी निकली। इंस्पेक्टर को उम्मीद थी कि प्रेमचंद कुर्सी से उठकर उसको सलाम करेंगे। लेकिन प्रेमचंद कुर्सी से हिले तक नहीं। यह बात इंस्पेक्टर को नागवार गुजरी। उसने अपने अर्दली को मुंशी प्रेमचंद को बुलाने भेजा। जब मुंशी प्रेमचंद गए तो इंस्पेक्टर ने शिकायत की कि तुम्हारे दरवाजे से तुम्हारा अफसर निकल जाता है तो तुम सलाम तक नहीं करते हो। यह बात दिखाती है कि तुम बहुत घमंडी हो। इस पर मुंशी प्रेमचंद ने जवाब दिया, ‘जब मैं स्कूल में रहता हूं, तब तक ही नौकर रहता हूं। बाद में मैं अभी अपने घर का बादशाह बन जाता हूं।’

शराब और मुंशी प्रेमचंद 
सन् 1924 में ‘माधुरी’ ऑफिस की कुछ किताबें बोर्ड मंजूर कराने बेदार साहब के यहां प्रयाग गए थे। बेदार साहब खुद बड़े शराबी थे। उन्होंने खुद भी पिया और मुंशी प्रेमचंद को भी पिला दिया। वह लेट से घर आए तो दरवाजा बच्चों ने खेला। बच्चों ने मां को पहले बता दिया था कि पिता जी पीकर आए हैं। यह सुनते ही शिवरानी देवी जान-बूझकर सो गईं। सुबह उन्होंने पत्नी से शिकायत की तो पत्नी ने कहा कि आप शराब पीकर आए थे, इसी वजह से दरवाजा नहीं खोला। अगर दोबारा भी पीकर आएंगे तो मैं दरवाजा नहीं खोलूंगी। उस पर उन्होंने आगे से नहीं पीने का वादा किया। लेकिन एक बार फिर पीकर आगए। पत्नी शिवरानी देवी ने फिर से दरवाजा नहीं खोला। दूसरी बार के बाद फिर उन्होंने कभी शराब नहीं पी।

जब हिंदू सभा वाले हो गए नाराज
उन्होंने एक लेख लिखा था जिस पर हिंदू सभा वाले नाराज हो गए थे। इस पर उनकी पत्नी ने उनसे पूछा कि आप ऐसा लिखते ही क्यों है कि लोग भड़क जाते हैं और आपके दुश्मन बन जाते हैं। इस पर उन्होंने जवाब दिया, ‘लेखक को पब्लिक और गर्वनमेंट अपना गुलाम समझती है। आखिर लेखक भी कोई चीज़ है। वह सभी की मर्जी के मुताबिक लिखे तो लेखक कैसा? लेखक का अस्तित्व है। गवर्नमेंट जेल में डालती है, पब्लिक मारने की धमकी देती है, इससे लेखक डर जाये और लिखना बन्द कर दे?’

अंधविश्वास के खिलाफ
एक बार किसी बात पर उनकी पत्नी ने जब भगवान का नाम लिया तो उन्होंने कहा कि भगवान मन का भूत है, जो इंसान को कमजोर कर देता है। स्वावलंबी मनुष्य ही की दुनिया है। अंधविश्वास में पड़ने से तो रही-सही अक्ल भी चली जाती है।  इस पर उनकी पत्नी ने कहा, गांधीजी तो दिन-रात ‘ईश्वर-ईश्वर’ चिल्लाते रहते हैं। जवाब में प्रेमचंद बोले, वह एक प्रतीक भर है। वह देख रहे हैं कि जनता अभी बहुत सचेत नहीं है। और फिर तो जनता सदियों से भगवान पर विश्वास किए चली आ रही है। जनता एकाएक अपने विचार बदल नहीं सकती है। अगर एकाएक जनता को कोई भगवान से अलग करना चाहे तो यह संभव भी नहीं। इसी से वे भी शायद भगवान का ही सहारा लेकर चल रहे हैं।

(साभार – नवभारत टाइम्स)

कारगिल विजय दिवस के गौरवमय 20 साल

कारगिल भारतीय इतिहास में सेना की शौर्य गाथा है । 1999 में 26 जुलाई को भारत के वीर सपूतों ने कारगिल की चोटियों से पाकिस्तानी फौज को खदेड़कर तिरंगा फहराया था। इन 10 बातों से जानिए कारगिल युद्ध की वीरता भरी कहानी…
– भारत और पाकिस्तान के बीच 1999 में कारगिल युद्ध हुआ था। 8 मई 1999 में ही इसकी शुरुआत हो चुकी थी, जब पाकिस्तानी सैनिकों और कश्मीरी आतंकियों को कारगिल की चोटी पर देखा गया था।
– कारगिल में घुसपैठ की सबसे पहले जानकारी ताशी नामग्याल नामक एक स्थानीय चरवाहे ने दी थी, जो कि कारगिल के बाल्टिक सेक्टर में अपने नए याक की तलाश कर रहे थे। याक की खोज के दौरान उन्हें संदिग्ध पाक सैनिक नजर आए थे।
– 3 मई को पहली बार भारतीय सेना को गश्त के दौरान पता चला था कि कुछ लोग वहां पर हरकत कर रहे हैं। पहली बार द्रास, काकसार और मुश्कोह सेक्टर में पाकिस्तानी घुसपैठियों को देखा गया था।
– भारतीय सेना ने 9 जून को बाल्टिक क्षेत्र की 2 चौकियों पर कब्जा कर लिया। फिर 13 जून को द्रास सेक्टर में तोलोलिंग पर कब्जा ‍जमाया। हमारी सेना ने 29 जून को दो अन्य महत्वपूर्ण चौकियों 5060 और 5100 पर कब्जा कर अपना परचम फहरा दिया।
– 11 घंटे लड़ाई के बाद पुन: टाइगर हिल्स पर भारतीय सेना का कब्जा हो गया, फिर बटालिक में स्थित जुबर हिल को भी कब्जाया गया।
– 1999 में हुए कारगिल युद्ध में आर्टिलरी तोप से 2,50,000 गोले और रॉकेट दागे गए थे। 300 से अधिक तोपों, मोर्टार और रॉकेट लॉन्चरों से रोज करीब 5,000 बम फायर किए गए थे।
– 26 जुलाई 1999 के दिन भारतीय सेना ने कारगिल युद्ध के दौरान चलाए गए ‘ऑपरेशन विजय’ को सफलतापूर्वक अंजाम देकर भारत भूमि को घुसपैठियों के चंगुल से मुक्त कराया था।
– कारगिल की ऊंचाई समुद्र तल से 16,000 से 18,000 फुट ऊपर है, ऐसे में उड़ान भरने के लिए विमानों को करीब 20,000 फुट की ऊंचाई पर उड़ना पड़ता है।
– कारगिल युद्ध में मिराज के लिए महज 12 दिन में लेजर गाइडेड बम प्रणाली तैयार की गई थी। भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तानी सैनिकों के खिलाफ मिग-27 और मिग-29 विमानों का प्रयोग किया था।
– कारगिल की पहाड़ियों पर भारत और पाकिस्तान के बीच हुए इस युद्ध में लगभग 2 लाख भारतीय सैनिकों ने भाग लिया था। इसमें करीब 527 सैनिक शहीद हुए थे।

बाल गंगाधर तिलक व चन्द्रशेखर आजाद : एक ने दिया स्वराज्य का मंत्र तो दूजे ने सिखाया बलिदान

स्वराज्य का मंत्र दे गये बाल गंगाधर तिलक

पत्रकारिता में इन्होंने राष्ट्रप्रेम का स्वर भरा

भारत के स्वतंत्रता सेनानियों में बाल गंगाधर तिलक का नाम बड़े ही सम्मान से लिया जाता है। वे हिन्दुस्तान के एक प्रमुख नेता, समाज सुधारक और स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने हमारे देश को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्‍त करवाने में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई थी। बाल गंगाधर तिलक का जन्म 23 जुलाई 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरि के चिक्कन गांव में जन्‍म हुआ था। पिता गंगाधर रामचंद्र तिलक एक धर्मनिष्ठ ब्राह्मण थे। अपने परिश्रम के बल पर शाला के मेधावी छात्रों में बाल गंगाधर तिलक की गिनती होती थी। वे पढ़ने के साथ-साथ प्रतिदिन नियमित रूप से व्यायाम भी करते थे अतः उनका शरीर स्वस्थ और पुष्ट था।
सन्‌ 1879 में उन्होंने बीए तथा कानून की परीक्षा उत्तीर्ण की। घर वाले और उनके मित्र-संबंधी यह आशा कर रहे थे कि तिलक वकालत कर धन कमाएंगे और वंश के गौरव को बढ़ाएंगे, परंतु तिलक ने प्रारंभ से ही जनता की सेवा का व्रत धारण कर लिया था। परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने अपनी सेवाएं पूर्ण रूप से एक शिक्षण संस्था के निर्माण को दे दीं। सन्‌ 1880 में न्यू इंग्लिश स्कूल और कुछ साल बाद फर्ग्युसन कॉलेज की स्थापना की। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के वे पहले लोकप्रिय नेता थे। उन्होंने सबसे पहले ब्रिटिश राज के दौरान पूर्ण स्वराज की मांग उठाई। लोकमान्य तिलक ने जनजागृति का कार्यक्रम पूरा करने के लिए महाराष्ट्र में गणेश उत्सव तथा शिवाजी उत्सव सप्ताह भर मनाना प्रारंभ किया। इन त्योहारों के माध्यम से जनता में देशप्रेम और अंग्रेजों के अन्यायों के विरुद्ध संघर्ष का साहस भरा गया। तिलक के क्रांतिकारी कदमों से अंग्रेज बौखला गए और उन पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चलाकर 6 साल के लिए ‘देश निकाला’ का दंड दिया और बर्मा की मांडले जेल भेज दिया गया। इस अवधि में तिलक ने गीता का अध्ययन किया और ‘गीता रहस्य’ नामक भाष्य भी लिखा। तिलक के जेल से छूटने के बाद जब उनका ‘गीता रहस्य’ प्रकाशित हुआ तो उसका प्रचार-प्रसार आंधी-तूफान की तरह बढ़ा और जनमानस उससे अत्यधिक आंदोलित हुआ।
तिलक ने मराठी में ‘मराठा दर्पण’ व ‘केसरी’ नाम से दो दैनिक समाचार पत्र शुरू किए, जो जनता में काफी लोकप्रिय हुए। जिसमें तिलक ने अंग्रेजी शासन की क्रूरता और भारतीय संस्कृति के प्रति हीनभावना की बहुत आलोचना की। सच्चे जननायक तिलक को लोगों ने आदर से ‘लोकमान्य’ की पदवी दी थी। ऐसे वीर लोकप्रिय स्वतंत्रता सेनानी लोकमान्य तिलक का निधन मुंबई में 1 अगस्त 1920 को हुआ।
आज भी सारे देश में तिलक का वह कथन ख्यात है।
-‘स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, और मैं इसे लेकर रहूँगा।’

 

                                                                                                                                साहसी क्रांतिकारी थे चंद्रशेखर आजाद

महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर ‘आजाद’ का जन्म 23 जुलाई 1906 को श्रीमती जगरानी देवी व पंडित सीताराम तिवारी के यहां भाबरा (झाबुआ, मध्यप्रदेश) में हुआ था। वे पंडित रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ की हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) में थे और उनकी मृत्यु के बाद नवनिर्मित हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी/ एसोसिएशन (HSRA) के प्रमुख चुने गए थे। मात्र 14 वर्ष की आयु में अपनी जीविका के लिए नौकरी आरंभ करने वाले आजाद ने 15 वर्ष की आयु में काशी जाकर शिक्षा फिर आरंभ की और लगभग तभी सब कुछ त्यागकर गांधीजी के असहयोग आंदोलन में भाग लिया। 1921 में मात्र 13 साल की उम्र में उन्हें संस्कृत कॉलेज के बाहर धरना देते हुए पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। पुलिस ने उन्हें ज्वॉइंट मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया। जब मजिस्ट्रेट ने उनका नाम पूछा, तो उन्होंने जवाब दिया- ‘आजाद’। मजिस्ट्रेट ने पिता का नाम पूछा, तो उन्होंने जवाब दिया- स्वाधीनता। मजिस्ट्रेट ने तीसरी बार घर का पता पूछा, तो उन्होंने जवाब दिया- जेल। उनके जवाब सुनने के बाद मजिस्ट्रेट ने उन्हें 15 कोड़े लगाने की सजा दी। हर बार जब उनकी पीठ पर कोड़ा लगाया जाता, तो वे ‘महात्मा गांधी की जय’ बोलते। थोड़ी ही देर में उनकी पूरी पीठ लहूलुहान हो गई। उस दिन से उनके नाम के साथ ‘आजाद’ जुड़ गया।
आजाद को मूलत: एक आर्य समाजी साहसी क्रांतिकारी के रूप में ही ज्यादा जाना जाता है। यह बात भुला दी जाती है कि रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाकुल्लाह खान के बाद की क्रांतिकारी पीढ़ी के सबसे बड़े संगठनकर्ता आजाद ही थे। भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव सहित सभी क्रांतिकारी उम्र में कोई ज्यादा फर्क न होने के बावजूद आजाद की बहुत इज्जत करते थे। उन दिनों भारतवर्ष को कुछ राजनीतिक अधिकार देने की पुष्टि से अंग्रेजी हुकूमत ने सर जॉन साइमन के नेतृत्व में एक आयोग की नियुक्ति की, जो ‘साइमन कमीशन’ कहलाया। समस्त भारत में साइमन कमीशन का जोरदार विरोध हुआ और स्थान-स्थान पर उसे काले झंडे दिखाए गए। जब लाहौर में साइमन कमीशन का विरोध किया गया तो पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर बेरहमी से लाठियां बरसाईं। पंजाब के लोकप्रिय नेता लाला लाजपतराय को इतनी लाठियां लगीं कि कुछ दिनों के बाद ही उनकी मृत्यु हो गई। चंद्रशेखर आजाद, भगतसिंह और पार्टी के अन्य सदस्यों ने लालाजी पर लाठियां चलाने वाले पुलिस अधीक्षक सांडर्स को मृत्युदंड देने का निश्चय कर लिया।
चंद्रशेखर ‘आजाद’ ने देशभर में अनेक क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लिया और अनेक अभियानों का प्लान, निर्देशन और संचालन किया। पंडित रामप्रसाद बिस्मिल के काकोरी कांड से लेकर शहीद भगत सिंह के सांडर्स व संसद अभियान तक में उनका उल्लेखनीय योगदान रहा है। काकोरी कांड, सांडर्स हत्याकांड व बटुकेश्वर दत्त और भगत सिंह का असेंबली बमकांड उनके कुछ प्रमुख अभियान रहे हैं।
देशप्रेम, वीरता और साहस की एक ऐसी ही मिसाल थे शहीद क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद। 25 साल की उम्र में भारतमाता के लिए शहीद होने वाले इस महापुरुष के बारे में जितना कहा जाए, उतना कम है। अपने पराक्रम से उन्होंने अंग्रेजों के अंदर इतना खौफ पैदा कर दिया था कि उनकी मौत के बाद भी अंग्रेज उनके मृत शरीर को आधे घंटे तक सिर्फ देखते रहे थे। उन्हें डर था कि अगर वे पास गए तो कहीं चंद्रशेखर आजाद उन्हें मार ना डालें। एक बार भगतसिंह ने बातचीत करते हुए चंद्रशेखर आजाद से कहा, ‘पंडितजी, हम क्रांतिकारियों के जीवन-मरण का कोई ठिकाना नहीं, अत: आप अपने घर का पता दे दें ताकि यदि आपको कुछ हो जाए तो आपके परिवार की कुछ सहायता की जा सके।’ चंद्रशेखर सकते में आ गए और कहने लगे, ‘पार्टी का कार्यकर्ता मैं हूं, मेरा परिवार नहीं। उनसे तुम्हें क्या मतलब? दूसरी बात, उन्हें तुम्हारी मदद की जरूरत नहीं है और न ही मुझे जीवनी लिखवानी है। हम लोग नि:स्वार्थ भाव से देश की सेवा में जुटे हैं, इसके एवज में न धन चाहिए और न ही ख्याति।’
27 फरवरी 1931 को जब वे अपने साथी सरदार भगतसिंह की जान बचाने के लिए आनंद भवन में नेहरूजी से मुलाकात करके निकले, तब पुलिस ने उन्हें चंद्रशेखर आजाद पार्क (तब एल्फ्रैड पार्क) में घेर लिया। बहुत देर तक आजाद ने जमकर अकेले ही मुकाबला किया। उन्होंने अपने साथी सुखदेवराज को पहले ही भगा दिया था। आखिर पुलिस की कई गोलियां आजाद के शरीर में समा गईं। उनके माउजर में केवल एक आखिरी गोली बची थी। उन्होंने सोचा कि यदि मैं यह गोली भी चला दूंगा तो जीवित गिरफ्तार होने का भय है। अपनी कनपटी से माउजर की नली लगाकर उन्होंने आखिरी गोली स्वयं पर ही चला दी। गोली घातक सिद्ध हुई और उनका प्राणांत हो गया पुलिस पर अपनी पिस्तौल से गोलियां चलाकर ‘आजाद’ ने पहले अपने साथी सुखदेव राज को वहां से सुरक्षित हटाया और अंत में एक गोली बचने पर अपनी कनपटी पर दाग ली और ‘आजाद’ नाम सार्थक किया। 27 फरवरी 1931 को चंद्रशेखर आजाद के रूप में देश का एक महान क्रांतिकारी योद्धा देश की आजादी के लिए अपना बलिदान दे गया, शहीद हो गया। उनको श्रद्धांजलि देते हुए कुछ महान व्यक्तित्व के कथन निम्न हैं-
* चंद्रशेखर की मृत्यु से मैं आहत हूं। ऐसे व्यक्ति युग में एक बार ही जन्म लेते हैं। फिर भी हमें अहिंसक रूप से ही विरोध करना चाहिए। -महात्मा गांधी
* चंद्रशेखर आजाद की शहादत से पूरे देश में आजादी के आंदोलन का नए रूप में शंखनाद होगा। आजाद की शहादत को हिन्दोस्तान हमेशा याद रखेगा। -पंडित जवाहरलाल नेहरू
* देश ने एक सच्चा सिपाही खोया। -मुहम्मद अली जिन्ना
* पंडितजी की मृत्यु मेरी निजी क्षति है। मैं इससे कभी उबर नहीं सकता। -महामना मदन मोहन मालवीय

(साभार – वेबदुनिया)

चन्द्रयान की बुनियाद और भावी भारत का स्वप्न देखने वाले एपीजे अब्दुल कलाम

‘भारत रत्न’ से नवाजे गए पूर्व राष्ट्रपति, स्वर्गीय डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का आज ही के दिन ’27 जुलाई 2015′ को आईआईटी गुवाहाटी में संबोधन के दौरान देहांत हो गया था। दुनिया से चले जाने के बाद भी उनके किए गए काम, उनकी सोच और उनका सम्पूर्ण जीवन देश के लिए प्रेरणास्रोत है। आइए, देश के महान राष्ट्र निर्माता के बारे में जानें कुछ बेहद रोचक बातें :
डॉक्टर अब्दुल कलाम वह व्यक्ति थे जो बनना तो पायलट चाहते थे लेकिन किन्हीं कारणों से पायलट नहीं बन पाए। फिर हार नहीं मानते हुए जीवन ने उनके सामने जो रखा उन्होंने उसे ही स्वीकार कर साकार कर दिखाया। उनका मानना था कि जीवन में कुछ भी यदि आप पाना चाहते हैं तो आपका बुलंद हौसला ही आपके काम आएगा।
अब्दुल कलाम का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम् के एक गांव में हुआ था। उनका पूरा नाम ‘अबुल पक्कीर जैनुलआबेदीन अब्दुल कलाम’ था।
उनके परिवार में पांच भाई और पांच बहनें थी और उनके पिता मछुआरों को बोट किराए पर देकर घर चलाते थे। उनके पिता ज्यादा पढ़े-लिखे तो नहीं थे लेकिन ऊंची सोच वाले व्यक्ति थे। कलाम का बचपन आर्थिक तंगी में बीता।
वे पढ़ने के बाद सुबह रामेश्वरम के रेलवे स्टेशन और बस अड्डे पर जाकर समाचार पत्र एकत्र करते थे। अब्दुल कलाम अखबार लेने के बाद रामेश्वरम शहर की सड़कों पर दौड़-दौड़कर सबसे पहले उसका वितरण करते थे। बचपन में ही आत्मनिर्भर बनने की तरफ उनका यह पहला कदम था।
कलाम ने अपनी आरंभिक शिक्षा रामेश्वरम् में पूरी की, सेंट जोसेफ कॉलेज से ग्रेजुएशन की डिग्री ली और मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्त की।
2002 में राष्ट्रपति बनने के बाद भी उनके दरवाजे सदा आमजन के लिए खुले रहते थे। कई पत्रों का जबाव तो स्वयं अपने हाथों से लिखकर देते थे।
देश के सर्वोच्च पद यानी 11वें राष्ट्रपति की शपथ लेने के बाद उन्होंने देश के हर वैज्ञानिक का सर फक्र से ऊंचा कर दिया।
कलाम को विद्यार्थियों के प्रति विशेष प्रेम था। जिसे देखकर संयुक्त राष्ट्र ने उनके जन्मदिन को ‘विद्यार्थी दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया।
मिसाइल मैन के नाम से जाने जाने वाले ए.पी.जे. अब्दुल कलाम भारतीय मिसाइल प्रोग्राम के जनक कहे जाते हैं।
अब्दुल कलाम भारत के राष्ट्र निर्माताओं में से एक है, उन्हें ‘पीपुल्स प्रेसिडेंट’ भी कहा जाता है।
उनकी लिखी हुई पुस्तकें विंग्स ऑफ फायर, इंडिया 2020, इग्नाइटेड माइंड, माय जर्नी आदि है। अब्दुल कलाम को 48 यूनिवर्सिटी और इंस्टीट्यूशन से डाक्टरेट की उपाधि मिली है।
भारत में अब्दुल कलाम उन चुनिंदा लोगों में से जिन्हें सभी सर्वोच्च पुरस्कार मिले। 1981 में पद्म भूषण, 1990 में पद्म विभूषण, 1997 में भारत रत्न से सम्मानित हुए।
27 जुलाई 2015 को आईआईटी गुवाहटी में संबोधित करते समय उन्हें दिल का दौरा पड़ा और हमने देश के महान राष्ट्र निर्माता खो दिया।

भारतीय राजनीति के चार दिग्गज एक साथ दुनिया से हुए विदा

नयी दिल्ली : भारतीय राजनीति में शनिवार और रविवार सियासी मातम के दिन रहे। पिछले दो दिनों में हिंदुस्तान की सियासत में रसूख रखने वाले, अवाम की आवाज बनने वाले, जनता के बीच के नेता और जमीन से उठकर भारतीय राजनीति के सियासी फलक पर छा जाने वाले दिग्गज नेता दुनिया को अलविदा कहकर आसमान की अनन्त गहराइयों में विलीन हो गए। ये सभी अपनी पार्टी में भी खासा दमखम रखते थे और अपने क्षेत्रों में भी इनकी बेहतर पकड़ थी।

शीला दीक्षित
शीला दीक्षित का गत शनिवार को दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। उन्होंने 81 साल की उम्र में अंतिम सांस ली। निधन के वक्त वह दिल्ली प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्ष थी और पूरे दमखम के साथ विपक्षियों को चुनौती देने में जुटी हुई थी। शीला दीक्षित ने साल 1998 से 2013 तक के अपने 15 साल के शासन के दौरान दिल्ली का चेहरा पूरी तरह से बदलकर रख दिया। अपने विनम्र स्वभाव से उन्होंने न सिर्फ आम लोगों का दिल जीता, बल्कि विरोधी भी उनके काम और लगन के कायल हैं। दिल्ली में विभिन्न क्षेत्रों में बुनियादी स्तर पर काम कराए और सड़कों व फ्लाईओवरों के निर्माण से उन्होंने शहर के बुनियादी ढांचे में एक क्रांतिकारी बदलाव किए। उन्होंने बेहतर पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम, दिल्ली मेट्रो के साथ ही स्वास्थ्य और शैक्षणिक क्षेत्र के विकास में भी काफी काम किया।

मांगे राम गर्ग
दिल्ली भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष मांगे राम गर्ग का गत रविवार को निधन हो गया।दिल्ली भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष मांगे राम गर्ग के निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गहरा शोक जताया है। उन्होंने ट्विट कर कहा कि मांगे राम के निधन से पार्टी को बहुत बड़ी क्षति हुई है। वे निस्वार्थ भाव से काम करते थे। वे जमीनी स्तर से जुड़े नेता थे। मांगे राम समाज सेवा के लिए हमेश तत्पर रहते थे।गर्ग ने दिल्ली की जनता और पार्टी के लिए जो काम किया है वह वर्षों तक याद किया जाता रहेगा। पीएम मोदी ने एक अन्य ट्वीट में कहा कि मांगे राम गर्ग का दिल्ली से गहरा नाता था और उन्हें शहर के लोगों की निस्वार्थ भाव से सेवा करते थे। उन्होंने दिल्ली में भाजपा को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

रामचन्द्र पासवान

बिहार के समस्तीपुर से सांसद और लोक जनशक्ति पार्टी के वरिष्ठ नेता रामचन्द्र पासवान का रविवार दोपहर निधन हो गया। उनको 12 जुलाई की रात दिल का दौरा पड़ने के बाद दिल्ली के राम मनोहर लोहिया (आरएमएल) अस्पताल में भर्ती कराया गया था। रामचंद्र पासवान लोजपा प्रमुख और केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान के भाई थे।

एके राय

कोयला नगरी धनबाद के पूर्व सांसद और जाने-माने कम्युनिस्ट चिंतक कॉमरेड एके राय का रविवार को निधन हो गया। रविवार सुबह 11:15 बजे वह धनबाद में बीसीसीएल के सेंट्रल हॉस्पिटल में उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर से पूरे कोयलांचल में शोक की लहर दौड़ गयी। मुख्यमंत्री रघुवर दास ने पूर्व सांसद एके राय के निधन पर शोक जताया।

बिजली महादेव : जहाँ शिवलिंग पर हर बारह साल में गिरती है बिजली

कुल्लू : भारत में कई अद्भुत मंदिर हैं। उन्हीं में से एक है हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में स्थित बिजली महादेव। कुल्लू का पूरा इतिहास बिजली महादेव से जुड़ा हुआ है। कुल्लू शहर में ब्यास और पार्वती नदी के संगम के पास एक ऊंचे पर्वत पर बिजली महादेव का प्राचीन मंदिर है। पूरी कुल्लू घाटी में ऐसी मान्यता है कि यह घाटी एक विशालकाय सांप के आकार की है। इस सांप का वध भगवान शिव ने किया था।

जिस स्थान पर मंदिर है वहां शिवलिंग पर हर बारह साल में बिजली गिरती है। बिजली गिरने से मंदिर का शिवलिंग खंडित हो जाता है। यहां के पुजारी खंडित शिवलिंग के टुकड़े एकत्रित कर मक्खन के साथ इसे जोड़ देते हैं। कुछ ही माह बाद शिवलिंग ठोस रूप में परिवर्तित हो जाता है। इस शिवलिंग पर हर बारह साल में बिजली क्यों गिरती है और इस जगह का नाम कुल्लू कैसे पड़ा इसके पीछे एक पौराणिक कथा है।
कुलान्त राक्षस ने लिया था अजगर का रूप – कुल्लू घाटी के लोग बताते हैं कि बहुत पहले यहां कुलान्त नामक दैत्य रहता था। दैत्य कुल्लू के पास की नागणधार से अजगर का रूप धारण कर मंडी की घोग्घरधार, लाहौल स्पीति सेमथाण गांव आ गया। दैत्य रूपी अजगर कुण्डली मार कर ब्यास नदी के प्रवाह को रोक कर इस जगह को पानी में डुबोना चाहता था। इसके पीछे उसका उद्देश्य यह था कि यहां रहने वाले सभी जीव-जंतु पानी में डूब कर मर जाएंगे। भगवान शिव कुलान्त की इस योजना से चिंतित हो गए थे। अजगर के कान में धीरे से बोले शिव बड़े जतन के बाद भगवान शिव ने उस राक्षस रूपी अजगर को अपने विश्वास में लिया। शिव ने उसके कान में कहा कि तुम्हारी पूंछ में आग लग गई है। इतना सुनते ही जैसे ही कुलान्त पीछे मुड़ा तभी शिव ने उसके सिर पर त्रिशूल से वार कर दिया। त्रिशूल के प्रहार से कुलान्त मारा गया। कुलान्त के मरते ही उसका शरीर एक विशाल पर्वत में बदल गया।
उसका शरीर धरती के जितने हिस्से में फैला हुआ था वह पूरा का पूरा क्षेत्र पर्वत में बदल गया। कुल्लू घाटी का बिजली महादेव से रोहतांग दर्रा और उधर मंडी के घोग्घरधार तक की घाटी कुलान्त के शरीर से निर्मित मानी जाती है। कुलान्त से ही कुलूत और इसके बाद कुल्लू नाम के पीछे यही किवदंती कही जाती है। शिव ने इंद्र से बिजली गिराने प्रार्थना की थी कुलान्त दैत्य के मरने के बाद शिव ने इंद्र से कहा कि वे बारह साल मेंएक बार इस जगह पर बिजली गिराया करें। हर बारहवें साल में यहां बिजली गिरती है। इस बिजली से शिवलिंग चकनाचूर हो जाता है। शिवलिंग के टुकड़े इकट्ठा करके स्थानीय पुजारी उन टुकड़ों को मक्खन से जोड़कर फिर से लिंग के तौर पर स्थापित कर देता है। कुछ समय बाद पिंडी अपने पुराने स्वरूप में आ जाती है। बिजली शिवलिंग पर ही क्यों गिरती है? बिजली शिवलिंग पर गिरने के बारे में कहा जाता है कि भगवान शिव नहीं चाहते चाहते थे कि जब बिजली गिरे तो जन धन को इससे नुकसान पहुंचे। भोलेनाथ लोगों को बचाने के लिए इस बिजली को अपने ऊपर ले लेते हैं। इसी वजह से भगवान शिव को यहां बिजली महादेव कहा जाता है। भादौ के महीने में यहां मेलासा लगा रहता है। कुल्लू शहर से बिजली महादेव की पहाड़ी लगभग सात किलोमीटर है। शिवरात्रि पर भी यहां भक्तों की भीड़ उमड़ती है। सर्दियों में होती है यहां भारी बर्फबारी यह जगह समुद्र स्तर 2450 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। सर्दी के मौसम में यहां भारी बर्फबारी होती है। इस पूरे क्षेत्र की तरह ही कुल्लू में भी महादेव प्रिय देवता हैं। कहीं वे सयाली महादेव के रूप में प्रतिष्ठित हैं तो कहीं ब्राणी महादेव के रूप में। कहीं वेजुवाणी महादेव हैं तो कहीं बिजली महादेव। बिजली महादेव का अपना ही महात्म्य व इतिहास है। ऐसा लगता है कि बिजली महादेव के इर्द-गिर्द समूचा कुल्लू का इतिहास घूमता है। हर मौसम में दूर-दूर से लोग बिजली महादेव के दर्शन करने आते हैं।

95 प्रतिशत तक पानी बचाने वाली नल की टोंटी बनाई, हर घर में रोजाना 35 लीटर की बचत होगी

चेन्नई : जलसंकट से जूझ रहे चेन्नई के वैल्लोर जिले में हाल ही में ट्रेन से 25 लाख लीटर पानी पहुँचाया गया। चेन्नई के ज्यादातर शहरों में जलस्तर काफी हद तक नीचे गिर चुका है। बारिश होने के बाद ऐसी स्थिति दोबारा न बने, इसके लिए मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के इंजीनियरों ने ऐसी डिवाइस (नोजल) बनाई है, जो 95% तक पानी की बर्बादी को रोक सकती है। हर घर में रोजाना 35 लीटर पानी की बचत कर सकती है।
नल से एक मिनट में 600 मिली पानी निकलता है
नोजल को ऑटोमाइजेशन तकनीक से तैयार किया गया है। इस तकनीक के कारण नल से एक मिनट में 600 मिली पानी निकलता है, जबकि सामान्य नल से 1 मिनट में 12 लीटर पानी निकल जाता है। इससे 95% तक पानी बचा सकते हैं। इसे ऐसे समझिए- एक बार हाथ धोने पर औसतन 600 मिली पानी खर्च होता है। नई डिवाइस का इस्तेमाल किया जाए तो हाथ धोने पर 15-20 मिली पानी खर्च होगा।
स्टार्टअप के संस्थापक अरुण सुब्रमण्यन के मुताबिक, डिवाइस प्लंबर के बिना नल में महज 30 सेकंड में फिट की जा सकती है। नोजल पूरी तरह तांबे का बना है। यह मेटल पानी की क्वालिटी को सुधारने के साथ हार्ड वॉटर के लिए भी बेहतर है। डिवाइस पानी की एक बूंद को छोटी‌-छोटी बूंदों में तोड़ती है, ताकि नल से निकलने वाला पानी जल्द से जल्द अधिक हिस्से को कवर कर सके। इसकी शुरुआत भी थोड़ी अलग थी। अरुण के मुताबिक, मेरी पड़ोसी पर्यावरणविद नजीबा जबीर ने मुझसे कहा कि उन्हें किचन के लिए ऐसी डिवाइस की जरूरत है जो पानी बचा सके। इसके बाद हमने बनाने की तैयारी शुरू की। वैज्ञानिकों ने ऑटोमाइजेशन तकनीक को 1950 में विकसित किया था। इसके तहत पानी का दबाव जितना बढ़ेगा, उतनी बचत की जा सकेगी। यही डिवाइस का आधार है।
प्रोटोटाइप करने में लगे 6 महीने
इसका पहला प्रोटोटाइप तैयार करने में 6 महीने का समय लगा। इसकी टेस्टिंग पड़ोसियों से कराई गई लेकिन ज्यादा कामयाबी नहीं मिली। लोगों ने इसमें कई बदलाव करने का सुझाव दिया। कुछ महीनों की मेहनत के बाद इसे और बेहतर बनाया गया। इसे तैयार करने में इंस्टीट्यूट के स्टूडेंट और स्टार्टअप के काे-फाउंडर रोशन कार्तिक का भी अहम योगदान रहा। मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के प्रोफेसर ने डिवाइस देखने के बाद इसे लोगों तक पहुंचाने की सलाह दी। नजीबा जबीर की आर्थिक मदद से स्टार्टअप की शुरुआत हुई।

5 साल की हुई रिवॉल्वर ‘निर्भीक’, अब तक 2500 बिकीं

नयी दिल्ली : महिलाओं की आत्मरक्षा के लिए ऑर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड कानपुर द्वारा साल 2014 में लॉन्च रिवॉल्वर निर्भीक के अब तक 2500 यूनिट को बेचा जा चुका है। इस रिवॉल्वर को चर्चित निर्भया कांड के बाद लॉन्च किया गया था। वजन में बहुत हल्की होने कारण इसे महिलाओं ने भी खूब पसंद किया।
इस रिवॉल्वर का वजन 500 ग्राम और टैक्स के बाद की कीमत 1 लाख 14 हजार रुपये है। बिना जीएसटी के इस रिवॉल्वर का मूल्य 1 लाख 20 हजार रुपये है। आकार में छोटी होने कारण इस रिवॉल्वर को महिलाएं अपने हैंड पर्स में रखकर भी ले जा सकती हैं। इसके अलावा इस रिवॉल्वर का रखरखाव भी कम है। यह 15 मीटर दूर स्थित अपने लक्ष्य को आसानी से भेद सकती है। जबकि फायर करने के दौरान इसका रिक्वॉयल यानी झटका देने की दर भी अन्य रिवॉल्वरों से कम है।
तकनीकी विशेषताएं
निर्भीक रिवॉल्वर
निर्भीक रिवॉल्वर – फोटो : सोशल मीडिया
कैलिबर 7.65 मिलीमीटर
वजन 0.525 किलोग्राम
कुल आकार 177.8 मिलीमीटर
बैरल की लंबाई 120.63 मिलीमीटर
मारक क्षमता 15 मीटर
साइट साइड ब्लेड
फीड रिवाल्विंग चेंबर (सिक्स राउंड)

अमेजन एलेक्सा भारतीयों से हिन्दी में करेगी बात

अमेजन के वॉयस कंट्रोल इनेबल डिवाइस में एलेक्सा अब हिन्दी में बात करेगी। कंपनी ने बताया कि उसके डेवलपर्स अब भारतीय ग्राहकों के लिए एलेक्सा स्किल किट तैयार कर रेह हैं, जिसमें वो ग्राहकों से हिन्दी में बात करेगी। अमेजन के मुताबिक भारत में सबसे अधिक बोली जाने वाली हिंदी भाषा में एलेक्सा यूजर्स के लिए दिलचस्प एक्सपीरियंस देने के लिए तैयार है।
कम्पनी भारत में हिन्दी भाषी ग्राहकों के लिए एलेक्सा के डिवाइस को विकसित करना चाहती है, जिसके लिए वह केवल एलेक्सा वॉयस सर्विस (एवीएस) डेवलपर्स से इसे जल्द बनाने का अनुरोध कर सकती है। एलेक्सा स्किल किट (एएसके) फ्री, सेल्फ सर्विस एपीआईएस और टूल का संग्रह है। वर्तमान में एलेक्सा 80 देशों में उपलब्ध है और 14 से ज्यादा अलग-अलग भाषाएं बोलती है। पिछले साल अमेजन ने ‘क्लियो’ नाम की नई स्किल कैटेगरी डेवलप की थी। इसके जरिए ग्राहक एलेक्सा को हिन्दी और अन्य भाषाएं सिखा सकते थे। एलेक्सा के भाषा मॉडल को सुधारना और इसे दूसरी भाषाओं में बातचीत सिखाना क्लियो का मकसद था। हिंदी के अलावा यूजर्स एलेक्सा के अंग्रेजी के बयानों का जवाब तमिल, मराठी, कन्नड़, बंगाली, तेलुगू, गुजराती और दूसरी अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में दे सकते थे।

शिवालय / केरल में वडकुनाथ के रुप में पूजे जाते हैं शिव, यहां है घी का शिवलिंग

केरल के त्रिशूर जिले में 1000 साल पुराना वडकुनाथन मंदिर स्थित है। इसे टेंकैलाशम और तमिल भाषा में ऋषभाचलम् भी कहते हैं। यह देवस्थल केरल के सबसे पुराने और उत्तम श्रेणी के मंदिरों में गिना जाता है। यह स्थान उत्कृष्ट कला और वास्तु कला के लिए प्रसिद्ध है, जो केरल की प्राचीन शैली को भली भांति दर्शाता है। वडकुनाथन का अर्थ उत्तर के नाथ है जो केदारनाथ हो सकता है।
प्राकृतिक सुंदरता से घिरा हुआ वडकुनाथन मंदिर
आध्यात्मिक और शांति पूर्ण परिवेश देता है। मान्यता है कि इसकी स्थापना भगवान परशुराम द्वारा की गई थी। यह भी कहा जाता है कि आदि शंकराचार्य के माता-पिता ने संतान प्राप्ति के लिए यहां अनुष्ठान किया था। मंदिर को संरक्षण के लिए यूनेस्को का उत्कृष्टता पुरस्कार मिल चुका है। मंदिर पुरानी परंपराओं तथा वास्तु शास्त्र की संरक्षण तकनीकों के ज्ञान को समेटे हुए है।
शिवलिंग की जगह नजर आता है घी का टीला
धार्मिक परंपरा के अनुसार शिवलिंग का घी से अभिषेक किया जाता है। पूरी तहर घी से ढंके होने के कारण शिवलिंग दिखाई नहीं देता। घी की एक मोटी परत हमेशा इस विशाल लिंग को ढंकी रहती है। यह एकमात्र मंदिर है जहां शिवलिंग दिखाई नहीं देता। भक्तों को यहां केवल 16 फीट ऊँचा घी का टीला ही नजर आता है। यह बर्फ से ढंके कैलाश पर्वत का प्रतिनिधित्व करता है। ऐसा माना जाता है कि यहां चढ़ाने वाले वाले घी में कोई गंध नहीं होती और यह गर्मियों के दौरान भी पिघलता नहीं है।
हाथियों को खिलाया जाता है खाना
मंदिर में हर साल आनापुरम महोत्सव आयोजित किया जाता है, जिसमें हाथियों को खाना खिलाया जाता है। इस महोत्सव की शुरुआत में सबसे छोटे हाथी को भोजन देकर हाथियों का भोज शुरू किया जाता है। यह प्राचीन मंदिर विशाल पत्थर की दीवारों से घिरा है। मंदिर परिसर के अंदर चार गोपूरम चार मुख्य दिशाओं में मौजूद हैं। यानी प्रवेश द्वार है। दक्षिण और उत्तर दिशा के गोपूरम प्रतिबंधित है वहीं पूर्व और पश्चिम दिशा वाले गोपूरम से मंदिर में प्रवेश मिलता है।

(साभार – दैनिक भास्कर)