Thursday, July 2, 2026
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देश की पहली महिला डीजीपी कंचन चौधरी भट्टाचार्य का निधन

मुम्बई : देश और उत्तराखंड की पहली महिला डीजीपी कंचन चौधरी भट्टाचार्य का सोमवार देर रात मुंबई में निधन हो गया। वे लंबे समय से बीमार थीं और यहां के एक निजी अस्पताल में उनका इलाज जारी था। उत्तराखंड के पुलिस महानिदेशक अशोक कुमार ने इस बात की पुष्टि करते हुए बताया कि कंचन का मुंबई के अस्पताल में लंबी बीमारी के बाद सोमवार रात को निधन हो गया।
2004 में बनीं थीं पुलिस महानिदेशक
1973 बैच की महिला आईपीएस ऑफिसर कंचन ने साल 2004 में उत्तराखंड की पुलिस महानिदेशक बन कर इतिहास रच दिया था। वे देश की पहली महिला थीं जो इस पद तक पहुंची थीं। 31 अक्टूबर 2007 को वे पुलिस महानिदेशक के पद से ही रिटायर हुई थीं। बताया जा रहा है कि तभी से वे मुंबई में रह रही थीं।
लोकसभा चुनाव भी लड़ा था
कंचन चौधरी भट्टाचार्य ने राजनीति की तरफ भी रुख किया था और सेवानिवृत्त होने के बाद 2014 में उन्होंने लोकसभा चुनाव लड़ा था। आम आदमी पार्टी के टिकट से उन्होंने उत्तराखंड के हरिद्वार लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा था लेकिन वे इस दौरान हार गई थीं।

राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने टीबी रोग से पीड़ित एक बच्ची को लिया गोद

लखनऊ : राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने रविवार को राजभवन में आयोजित एक कार्यक्रम में टीबी रोग से ग्रसित एक बच्ची मोहसिना (काल्पनिक नाम) को गोद लिया तथा इसी के साथ ही टीबी रोग से ग्रसित 21 अन्य बच्चों को राजभवन के सभी अधिकारियों ने सहयोग की दृष्टि से गोद लिया।
गोद लेने वाले अधिकारियों का यह दायित्व होगा कि वे बच्चों को सरकारी दवा सुचारू रूप से मिलती रहे तथा बच्चा नियमित रूप से दवा का प्रयोग करें और पौष्टिक आहार का सेवन करे। इसका ध्यान रखेंगे। राज्यपाल ने यह भी सलाह दी कि बच्चों की शिक्षा में कोई व्यवधान हो तो उसका भी निस्तारण किया जाये। उन्होंने कहा कि गोद लेना कोई उपकार नहीं है। जागृत समाज का फर्ज है कि समाज स्वस्थ हो।

‘आर्मी फॉर अवाम’ के सहारे सेना जीतेगी कश्मीरियों का दिल

चंडीगढ़ : पिछले दिनों अनुच्छेद 370 में संशोधन के बाद से अपने खिलाफ सोशल मीडिया पर फैलाए जा रहे दुष्प्रचार का जवाब सेना ‘आर्मी फॉर अवाम’ अभियान के जरिए देगी। इस अभियान से सेना अपनी एक अलग छाप लोगों के बीच छोड़ने में जुट गई है। सेना विभिन्न सामाजिक कार्यों के बूते आवाम को यह बताने में जुटी है कि जवान सिर्फ सरहदों की रक्षा के लिए ही नहीं, बल्कि लोगों के कल्याण और विपरीत परिस्थितियों में उनकी हर संभव मदद के लिए हमेशा तत्पर हैं। सरहदों की रक्षा के साथ-साथ सेना के जवान कैसे देशभर में लोगों की सेवा में जुटे हैं, इसका प्रचार अब सोशल मीडिया पर और ज्यादा किया जाएगा। ताकि सोशल मीडिया पर भ्रामक प्रचार के जरिए सेना की छवि खराब करने वाले तत्वों को मुहंतोड़ जवाब दिया जा सके। देश के विभिन्न राज्यों में बाढ़ के हालात है। ऐसे हालातों में सेना और वायुसेना के जवान बाढ़ में फंसे लोगों के लिए देवदूत बनकर पहुँचे और उन्हे वहाँ से निकालकर उनकी जान बचाई। इस दौरान सेना ने कई दुर्गम इलाकों में पहुंचकर लोगों को मदद पहुँचाई।सेना की एक विशेष विंग द्वारा तेजी से सैन्य जवानों के इस तरह के विभिन्न रेस्कयू ऑपरेशनों को सोशल मीडिया पर वायरल किया जा रहा है, ताकि जवानों के जनसेवा के प्रति जज्बे का प्रचार किया जा सके। इस दौरान घाटी में सेना का खास फोकस रहेगा। अनुच्छेद 370 में संशोधन के बाद से घाटी में सेना को लेकर खूब दुष्प्रचार किया जा रहा है। सोशल मीडिया पर सेना से जुड़ी कई भ्रामक प्रकार की जानकारियों को तेजी से वायरल किया जा रहा है, ताकि इंडियन आर्मी की छवि को खराब किया जा सके। लेकिन सेना अब इसका जवाब अपने किए गए कामों के प्रचार से देगी।
देश के विभिन्न राज्यों में सेना द्वारा चलाए गए रेस्कयू ऑपरेशन की फोटो व विवरण वायरल किया जा रहा है। बारामूला में भारतीय सेना द्वारा कश्मीरी युवाओं के लिए आयोजित की गई ‘नारवाव क्रिकेट लीग’ का प्रचार। कुपवाड़ा के एक गांव में सेना ने एक युवाओं के लिए एक मिलन कार्यक्रम रखा, जिसमें उन्हें बताया गया कि कैसे उन्हे एंटी नेशनल एक्टिविटी से बचना है।
बारामूला के डांगीवाचा में बुजुर्ग-यूथ सम्मेलन करवाया गया, सेना ने इस जरिए लोगों को साकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ने को प्रेरित किया।
गाँव चंडीगाम की कश्मीरी बेटियों के लिए सेना ने मार्शल आर्ट्स शिविर आयोजित किया। कुपवाड़ा में सेना ने कश्मीरी युवाओं के लिए ‘लोलाब किंगडम फुटबाल चैंपियनशिप’ व ‘हबीबुल्लाह मैमोरियल फुटबाल कप’ का आयोजन किया।
घाटी के गाँव मारकूल में जमाती समर्थकों की एक बैठक आयोजित की, जिसमें उन्हे अपने इलाकों में हालात सामन्य रखने की जिम्मेदारी सौंपी गई। अखनूर के चकभगवान क्षेत्र में सेना की ओर से जरूरतमंद लोगों को सहायक सामग्री बांटी गई। इस तरह काफी ऐसे सामाजिक कार्य हैं, जिसका प्रचार सेना द्वारा खूब किया जा रहा है।

पिता चलाते हैं होटल, माँ ने शुरू कराई तीरंदाजी और तीन साल में बन गयी विश्व चैंपियन

नयी दिल्ली : कोमालिका के लिए अंडर-18 विश्व चैंपियन बनना किसी बड़ी राहत से कम नहीं है। कुछ माह पहले ही 17 साल की इस तीरंदाज ने दीपिका कुमारी जैसी तीरंदाज के साथ ओलंपिक क्वालिफाइंग सीनियर विश्व चैंपियनशिप के लिए भारतीय टीम में जगह बना ली, लेकिन इतने बड़े मंच पर यह तीरंदाज दबाव में बिखर गयी।
नतीजन पुरुष ओलंपिक क्वालिफाई कर गए और महिला टीम रह गई, लेकिन थोड़े ही समय में कोमालिका ने पहली बार सब जूनियर विश्व चैंपियनशिप के लिए टीम में जगह बनाई और यहां वह दीपिका के बाद विश्व चैंपियन बनने वाली देश की दूसरी तीरंदाज बन गयीं। कोमालिका ने मेड्रिड से खुलासा किया उन्हें फिट रहने के लिए माँ ने 2012 में तीरंदाजी शुरू कराई। तब उन्हें जमेशदपुर में पास की ही अकादमी में लकड़ी का धनुष पकड़ा दिया गया। कुछ समय बाद उन्हें इस खेल में मजा आने लगा और उन्होंने नेशनल खेलने की ठानी। 2016 तक वह इंडियन राउंड (लकड़ी के धनुष से) में ही खेलती रहीं। इसी दौरान दीपिका के कोच धर्मेंद्र तिवारी की उन पर नजर पड़ी। धर्मेंद्र बताते हैं कि उनके कहने पर ही 2016 में कोमालिका को टाटा अकादमी के लिए ट्रायल दिलाया गया। यहां वह चयनित हो गयीं। तब से वह उन्हीं के पास हैं। अकादमी ने उन्हें महंगा रीकर्व धनुष दे रखा है। इसी से उन्होंने यह पदक जीता है। धर्मेंद्र मानते हैं कि कोमालिका के लिए यह पदक बहुत बड़ा है। अब उसके दिमाग से सीनियर विश्व चैंपियनशिप की विफलता को बोझ हट गया होगा। 12वीं की छात्रा कोमालिका पढ़ाई में भी होशियार हैं। उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा 85 प्रतिशत अंकों से पास की हैं। उनके पिता घनश्याम बारू एक छोटा से होटल चलाते हैं जबकि मां आंगनवाड़ी में सेविका हैं। घनश्याम और धर्मेंद्र के मुताबिक कोमालिका हमेशा मुस्कराती है। जिस काम को भी हाथ लगाती है उसे पीछे नहीं छोड़ती है। स्कूल में वह एथलेटिक्स में भी अच्छी थी। अध्यापक ने उसे एथलेटिक्स में आने को कहा, लेकिन मां ने उसे तीरंदाजी में ही बने रहने को कहा।

10 हजार शवों का अंतिम संस्कार कर चुके हैं अयूब अहमद

मैसूर : लावारिस शवों के अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी उठाते हैं अय्यूब अहमद। अब तक 10 हजार शवों का अंतिम संस्कार कर चुके हैं। वह बताते हैं, “जब मैंने पहली बार एक लावारिस शव का अंतिम संस्कार कराया, तो अचानक मेरे आसपास सबकुछ बदल गया। लोग मुझसे कतराने लगे। उन्होंने मुझसे बात करना छोड़ दिया। मैं अक्सर रात में अकेले होने पर रोता था। पर इस काम को लेकर मेरा मन और मजबूत हो गया था। यह काम करते हुए एक वक्त ऐसा आया, जब लोग मुझे देखते ही मुँह मोड़ लेते थे। लेकिन मैंने इसे जारी रखा। मैं कर्नाटक के मैसूर का रहने वाला हूं। मैंने सिर्फ दूसरी कक्षा तक पढ़ाई की है और छोटे-मोटे काम करके अपना और परिवार का पेट पालता हूं। मैंने अपनी कमाई को तीन भागों में बांट दिया है, अपने परिवार के लिए, मृत शरीर के अंतिम संस्कार के लिए और फुटपाथ पर रहने वाले लोगों की मदद के लिए। यह तब शुरू हुआ, जब मैं नई कार खरीदने के लिए बस से गुंदलुपेट जा रहा था। रास्ते में मैंने देखा कि एक जगह भीड़ जमा है। बस की खिड़की से देखा, तो मालूम हुआ कि एक शव वहां पड़ा हुआ है। कुछ समय बाद जब मैं अपनी कार से वापस लौटा, तो देखा कि शव अब भी वहीं पड़ा हुआ है। किसी ने भी, पुलिस में जानकारी देने की जहमत नहीं उठाई। मैंने उस शव को अपनी बांहों में उठाया और उसे कार में डालकर शवदाह गृह ले जाकर उसका अंतिम संस्कार कराया। तब तक मुझे इसके परिणाम की भनक नहीं थी। घर वापस आने के बाद मैंने जब यह घटना बताई, तो हर कोई गुस्से में था। मुझे बहुत बुरा लगा, मुझे इस कारण मैसूर छोड़ना पड़ा। मैं कुछ समय के लिए बंगलूरू चला आया। और फिर एक दिन जब मैं सिलिकॉन सिटी में लालबाग घूमने गया तो रास्ते में एक शव दिखा। मैं पिछला अनुभव भूल नहीं पाया था, इसलिए दुविधा में फंस गया। आखिरकार एक रिक्शे पर ले जाकर पुलिस की मौजूदगी में उसका भी अंतिम संस्कार कराया। पर मैंने सोंच लिया था कि किसी भी तरह से ऐसे लोगों की मदद करूंगा। मैं दोबारा मैसूर लौट आया। यहां आकर ने माता-पिता से कहा कि मैं यह काम जारी रखना चाहता हूं। उन्होंने कहा, यदि तुम्हें कोई शव दिखाई पड़े, तो उसका चेहरा नहीं देखना चाहिए, कि तुम उसे जानते हो या नहीं, बल्कि मृत व्यक्ति के परिजनों की खोज करनी चाहिए। मेरे माता-पिता चाहते थे कि मेरा नाम अच्छी चीजों के लिए जाना जाए। मेरी मां कहती थीं कि अच्छे कामों को दुनिया देखती और सराहना करती है। अफसोस कि जब मेरा वक्त आया, तब मेरी मां नहीं है। पर उन्हीं के प्रोत्साहन से यह यात्रा अनवरत जारी है। शादी के बाद जब पत्नी को मेरे इस काम के बारे में पता चला, तो उसने सवाल उठाने की जगह मेरा सहयोग किया। वह मुझे कभी नहीं रोकती। यहां तक कि अगर मुझे सुबह तीन बजे कॉल आती है, तो वह मुझे जैकेट पहनकर बाहर जाने के लिए कहती है। यह काम करते हुए मुझे तकरीबन बीस साल हो चुके हैं। पुलिस विभाग की सहायता से मैंने तकरीबन 10 हजार लावारिस शवों का अंतिम संस्कार कराया है। अब लोग इस काम के लिए आर्थिक मदद करते हैं। इस काम के साथ मैं बेघर लोगों के लिए भोजन और कपड़ों के साथ ही अनाथ बच्चों स्कूल भेजने की व्यवस्था भी करता हूं। मैं अपनी कार को ही, बतौर एम्बुलेंस उपयोग करता हूं। कभी-कभी लोगों को अपने काम को पहचानने और प्यार करने के लिए अपनी मृत्यु तक इंतजार करना पड़ता है। मैं अपने जीवन काल में लोगों का बेशुमार प्यार पाने को अपना सौभाग्य मानता हूँ।
(साभार- अमर उजाला)

हर रूप में हर सम्बन्ध निभाने वाले श्रीकृष्ण

भगवान विष्‍णु के अवतार श्रीकृष्‍ण का जीवन किसी सबक से कम नहीं. उनके सबक समझने में आसान होने के बावजूद बेहद अर्थपूर्ण हैं। श्री कृष्ण ने अपने जीवन में हर सम्बन्ध को उदारता, स्नेह व प्रेम से परिभाषित किया है और उसे ईमानदारी से निभाया है। सबसे अच्छी बात यह है कि उनके सम्बन्धों में बन्धन नहीं है..अपने अस्तित्व बनाये रखने के लिए जगह है..आइए सीखे श्रीकृष्ण से सम्बन्धों को निभाना
मैत्री – भगवान श्रीकृष्‍ण और सुदामा की मित्रता हमें बचपन से इसलिए पढ़ाई-सिखाई जाती है, क्योंकि वो हमें रिश्तों की कद्र करना और दोस्तों के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहने के लिए प्रेरित करती हैं, साथ ही ऊँच-नीच, अमीरी-गरीबी, छोटे-बड़े की पाबंदियों से दूर दोस्ती सबसे अहम रिश्ता भी यह कृष्‍ण-सुदामा ने हमें सिखाया। सुदामा, कृष्ण के बचपन के मित्र थे। वह बहुत ही गरीब व्‍यक्ति थे, लेकिन कृष्ण ने अपनी मैत्री के बीच कभी धन व हैसियत को नहीं आने दिया। वे अर्जुन के भी बहुत अच्छे मित्र थे और द्रौपदी के भी बहुत अच्‍छे सखा गोविन्द थे।
प्रेम – कृष्‍ण के बहुत सारे प्रशंसक और प्‍यार करने वाले थे. लेकिन वृंदावन में राधा के प्रति उनका प्‍यार जीवन का सबसे महत्‍वपूर्ण हिस्‍सा रहा है, जहाँ वह नंद और यशोदा द्वारा लाए गए थे। वृन्दावन में कृष्ण ने राधा के साथ प्रेम लीला रचाई. केवल राधा ही कृष्ण की दीवानी नहीं थी, बल्कि वृन्दावन की कई गोपियां कृष्ण को मन ही मन ही मन अपना मान चुकी थी। वे राधा व गोपियों के साथ मिलकर रास लीला रचाते थे। कृष्ण के प्रेम में सम्मान था, आधिपत्य की भावना नहीं इसलिए वह आज भी अलग हैं।
माता-पिता  – भले ही श्री कृष्ण देवकी व वासुदेव के पुत्र कहलाते हैं, लेकिन उनका पालन-पोषण यशोदा व नंद ने किया था। भगवान कृष्ण ने देवकी व यशोदा दोनों मांओं को अपने जीवन में बराबर का स्थान दिया और दोनों के प्रति अपने कर्तव्यों को बखूबी निभाया।
गुरू के प्रति आदर – भगवान विष्णु का अवतार रूप होने के बावजूद, श्री कृष्ण के मन में अपने गुरुओं के लिए बहुत सम्मान था। अपने अवतार रूप में वे जिन भी संतों से मिले उनका उन्होंने पूर्ण सम्मान किया। आश्रम में कृष्ण-बलराम और सुदामा ने एक साथ वेद-पुराण का अध्ययन प्राप्त किया था। दीक्षा के उपरांत कृष्ण ने गुरुमाता को गुरु दक्षिणा देने की बात कही। इस पर गुरुमाता ने कृष्ण को अद्वितीय मान कर गुरु दक्षिणा में उनका पुत्र वापस माँगा, जो प्रभास क्षेत्र में जल में डूबकर मर गया था। गुरुमाता की आज्ञा का पालन करते हुए कृष्ण ने समुद्र में मौजूद शंखासुर नामक एक राक्षस का पेट चीरकर एक शंख निकाला, जिसे “पांचजन्य” कहा जाता था। इसके बाद वे यमराज के पास गए और संदीपन ऋषि का पुत्र वापस लाकर गुरुमाता को सौंप दिया।
श्रीकृष्ण बतौर गुरू – महाभारत के रण में श्रीकृष्ण ने बतौर गुरू पांडवों का साथ दिया था. अर्जुन को युद्ध की बारीक रणनीतियां श्रीकृष्ण ने ही बताई थी। पांडवों की जीत में श्रीकृष्ण की सबसे अहम भूमिका रही थी इसलिए श्रीकृष्ण को एक अच्छा गुरू कहना गलत नहीं होगा।
भाई – कृष्ण और बलराम के बारे में सब जानते हैं मगर अपनी बहन सुभद्रा के प्रति भी वे उदार रहे। सुभद्रा के प्रेम का सम्मान करते हुए अर्जुन से विवाह को न सिर्फ सहमति दी बल्कि उसके सम्मान और अधिकारों की रक्षा के लिए चट्टान बनकर खड़े रहे।
प्रजा के रक्षक – मथुरा से दूर अपनी प्रजा की रक्षा के लिए श्रीकृष्ण ने न सिर्फ द्वारका बसायी बल्कि उसे समृद्ध भी बनाया। यही कारण है कि युग बीत जाने पर भी द्वारका एक महत्वपूर्ण स्थान रही है।

कृष्ण इनको रखते हैं हमेशा साथ

वासुदेव श्रीकृष्ण को पिता, सखी और गुरु से मिले उपहार उनके व्यक्तित्व से जुड़ते गए। 13 की उम्र तक उन्हें ऐसी 6 चीजें मिल चुकी थीं। इनमें से कुछ मामूली थीं, पर कृष्ण ने इन्हें अंत तक अपने पास रखा।

  1. बांसुरी : नंदबाबा ने गोकुल में कृष्ण को बांसुरी दी। तब कृष्ण तीन-चार साल के थे। यह उनका सबसे प्यारा खिलौना बन गया। यही बांसुरी कृष्ण की जीवनभर की संगिनी बनी।
  2. वैजयंती माला : कृष्ण ने जब पहली बार रासलीला खेली थी, तब राधा ने उन्हें वैजयंती माला पहनाई थी। उम्र आठ-दस साल थी। वैजयंती माला यानी -‘विजय दिलाने वाली माला।
  3. मोरपंख : कृष्ण आठ-दस साल के थे तो रासलीला के लिए वृंदावन गए। यहीं पहली बार राधा ने मुकुट पर मोरपंख लगाया था। कृष्ण ने स्त्री के इस सृजन को हमेशा के लिए मस्तक पर जगह दी।
  4. अजितंजय धनुषपांचजन्य शंख तब कृष्ण 11-12 साल के थे। उज्जैन में गुरु सांदीपनि के आश्रम में पढ़ रहे थे। गुरु पुत्र दत्त का शंखासुर ने अपहरण कर लिया। कृष्ण उसे बचाकर लाए तो गुरु ने उन्हें अजितंजय धनुष भेंट किया। शंखासुर वध से कृष्ण को शंख मिला, जिसे सांदीपनि ने पांचजन्य नाम दिया।
  5. सुदर्शन चक्र : कृष्ण 12-13 साल थे, तब परशुराम से मिलने उनकी जन्मस्थली जानापाव (इंदौर) गए थे। वहां परशुराम ने कृष्ण को उपहार में सुदर्शन चक्र दिया। शिव ने यह चक्र त्रिपुरासुर वध के लिए बनाया था और विष्णु को दे दिया था। कृष्ण के पास आने के बाद यह उनके पास ही रहा।

स्रोत: युगंधर (शिवाजी सावंत), श्री कृष्ण लीला (वनमाली)

(साभार – दैनिक भास्कर)

नहीं रहे मशहूर दिग्गज संगीतकार खय्याम

मुम्बई : ख्ययाम के नाम से मशहूर संगीतकार मोहम्मद जहूर खय्याम हाशमी का सोमवार रात करीब 9:30 बजे मुंबई के सुजॉय अस्पताल में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। वह 92 साल के थे और कुछ समय से फेफड़े के संक्रमण से पीड़ित थे। परिवार के सूत्रों ने बताया कि सांस लेने में तकलीफ के कारण उन्हें पिछले हफ्ते अस्पताल में भर्ती कराया गया था। खय्याम ने ‘कभी-कभी, हीर-रांझा और ‘उमराव जान’ जैसी कई हिट फिल्में दीं। उन्‍हें ‘कभी-कभी’ और ‘उमराव जान’ जैसी फिल्मों के लिए फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला था। खय्याम ने अपने करियर की शुरुआत 1947 में की थी। साल 1961 में आई फिल्म शोला और शबनम में संगीत देकर खय्याम को पहचान मिलनी शुरू हुई। आखिरी खत, कभी-कभी, त्रिशूल, नूरी, बाजार, उमराव जान और यात्रा जैसी फिल्मों में धुनें दीं। मोहम्मद जहूर खय्याम ने संगीत की दुनिया में अपना सफर 17 साल की उम्र में लुधियाना से शुरू किया था। उन्हें अपने करियर का पहला बड़ा ब्रेक ब्लॉकबस्टर मूवी ‘उमराव जान’ से मिला था, जिसके गाने आज भी बॉलीवुड में और लोगों के दिलों में जगह बनाए हुए हैं।

महानगर में खुला गंगाराम अस्पताल का स्तन कैंसर व प्लास्टिक सर्जरी उपचार केन्द्र

कोलकाता : कोयटम्बूर के गंगाराम हॉस्पिटल ने स्तन कैंसर व प्लास्टिक सर्जरी के उपचार हेतु महानगर के सॉल्टलेक इलाके में एक आउटरीच सेन्टर खोला है। 500 बिस्तरों वाले इस विश्वविख्यात अस्पताल के इस कोलकाता केन्द्र का उद्घाटन अस्पताल के प्लास्टिक सर्जरी विभाग के अध्यक्ष डॉ. राजा सत्पथी, अस्पताल के वरिष्ठ सलाहकार प्लास्टिक सर्जन डॉ. हरि वेंकटरमणी, अस्पताल के सलाहकार ऑन्कोप्लास्टिक ब्रेस्ट सर्जन व एस्थेटिक सर्जन डॉ. राजा शानमुगा ने किया। यह अस्पताल हर साल 11 हजार प्लास्टिक सर्जरियाँ करता है। अस्पताल के पास 66 देशों और 134 भारतीय शहरों से 1600 चिकित्सक अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। अस्पताल में हाथ की सर्जरी, ट्रॉमा रिकन्सट्रक्टिव सर्जरी, माइक्रो सर्जरी, कॉस्मेटिक सर्जरी, डायबिटिक फूट समेत कई प्रकार की शल्य चिकित्सा होती है। स्तन कैंसर होने की स्थिति में आमतौर पर महिलाओं के शल्य चिकित्सा के कारण निकाल देने पड़ते हैं मगर इस अस्पताल में ब्रेस्ट रिकन्सट्रक्शन की भी वैकल्पिक व्यवस्था है यानी इस पर महिलाओं को निर्णय लेने की सुविधा है।

जन्म लेते ही उठा माँ का साया, न्यायाधीश ने स्तनपान कराकर नवजात को लिया गोद

आणंद : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान को साकार करते हुए गुजरात के एक जिला विकास अधिकारी और उनकी न्यायाधीश पत्नी ने एक नवजात बच्ची को गोद लिया है। न्यायाधीश चित्रा ने गोद लेने से पहले बच्ची को स्तनपान भी कराया। दरअसल, बच्ची को जन्म देने के बाद मां की मौत हो गयी थी, जिसके बाद बच्ची के पालन-पोषण को लेकर परिवार परेशान था। गुजरात के आणंद के जिला विकास अधिकारी अमित प्रकाश यादव और उनकी न्यायाधीश पत्नी चित्रा ने दुनिया में आंख खोलते ही मां का साया खोने वाली नवजात बच्ची को गोद लिया है। दोनों ने नवजात के उज्ज्वल भविष्य की जिम्मेदारी उठाने का फैसला मिलकर किया। दरअसल, आणंद के पास स्थित वासद गांव के आरोग्य केंद्र अस्पताल में एक महिला ने अपनी तीसरी बेटी को जन्म देने के बाद दम तोड़ दिया था। नवजात अपनी मां का स्तनपान भी नहीं कर पाई थी। बच्ची की मां की मौत के बाद बच्ची के पिता दुखी थे। उनको इस बात की चिंता सताने लगी कि दो बेटियाँ पहले से हैं और अब तीसरी बेटी का पालन-पोषण कैसे होगा? वो अपनी नवजात बच्ची के भविष्य को लेकर चिंतित थे। वहीं, जब इस घटना की जानकारी आणंद के जिला विकास अधिकारी अमित प्रकाश यादव को मिली, तो वो फौरन अस्पताल पहुँच गए। वहाँ उन्होंने जब पूरी घटना को जाना और नवजात बच्ची को देखा, तो उनका दिल पसीज गया। अमित प्रकाश यादव ने इस घटना की पूरी जानकारी अपनी पत्नी चित्रा को दी। इसके बाद दोनों फिर अस्पताल पहुँचे, जहा चित्रा ने बच्ची को स्तनपान कराया। इसके बाद नवजात के परिवार की हालत को देखते हुए अमित प्रकाश यादव और उनकी पत्नी चित्रा ने बच्ची को अपनाने का फैसला ले लिया. इसके बाद बच्ची के पिता और परिवार की सहमति से दोनों ने नवजात को गोद ले लिया। बच्ची का जन्म मही नदी के किनारे स्थित वासद गाँव के अस्पताल में हुआ था, जिसके चलते बच्ची का नाम ‘माही’ रखा दिया. अमित प्रकाश यादव और चित्रा का डेढ़ साल का बेटा भी है।