Friday, April 24, 2026
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गरबा में रहे आपके फैशन की धूम

नवरात्रि आ गयी है। गरबा और डांडिया की मस्ती सिर चढ़कर बोल रही है तो आप भी चला दीजिए अपने फैशन का जादूू जमकर कुछ ऐसे –

केड़ियो संग धोती पैंट    – ये परिधान चलन में है। गरबे में लहंगे के बजाय केड़ियो और धोती पेैट भी पहन सकती हैं। पारंपरिक भी लगता है और ख़ूबसूरत भी। बॉर्डर पर टैसल और जूलरी में बड़े झुमके और नेकलेस गरबा लुक पूरा करेंगे।

चनिया-चोली के नए रंग – नियॉन कलर पसंद हैं तो लहंगे के लिए इनका चुनाव कर सकती हैं। इसके साथ चोली और जूलरी पारंपरिक रखें। चोली में पॉम-पॉम बॉर्डर लगा सकती हैं। ये इन दिनों स्टाइल का प्रतीक बने हुए हैं। कुछ नया पहनना चाहती हैं तो पारंपरिक चोली के बजाय पेप्लम चोली या पेप्लम कुर्ती पहनें। मिरर वर्क जैकेट डालकर नए तरह का लुक पाएं।

6 मीटर लहंगा – घेरदार लहंगे में इस बार 6 मीटर लहंगा नया है। प्रयोग करना चाहती हैं तो अलग-अलग रंगों में रफल लेयर लगा सकती हैं। पारंपरिक जूलरी के साथ ये चनिया-चोली खूब फबेगी।

डबल लेयर चनिया – इस तरह की चनिया-चोली में लहंगा डबल लेयर में होता है। लहंगा का बॉर्डर सामान्य से अधिक चौड़ा रहता है और पहली लेयर पर सेल्फ प्रिंट होता है। गहरे रंग के लहंगे के साथ कॉन्ट्रास्ट चोली पहन सकती हैं। कमर की ओर हैवी टैसल लटकाकर नवेला लुक पाया जा सकता है।

गरबा प्रिंट – नवरात्र में गरबा प्रिंट चनिया-चोली की मांग सबसे अधिक होती है। हल्के रंग के लहंगे पर चटख रंग का गरबा प्रिंट बहुत खिलता है। इसके साथ मल्टी कलर चोली और रंगीन टैसल का बॉर्डर लगाकर इसकी शोभा बढ़ा सकती हैं। चटख रंग का लहंगा पहनना चाहती हैं तो इस पर हल्केरंग की चोली का चयन कर सकती हैं।

कुछ और तरीके  – गरबा के पुराने कपड़े निकालिए। यदि पुराने कपड़ों में कुछ दाग हों या थोड़े फट गए हों तो उन पर कूल पैच लगाकर और ज्यादा ट्रेंडिंग बना सकती हैं। परम्परागत लुक पाने के लिए गोटा या मिरर वर्क से भी परिधान को दीजिए नया रूप।

आप अपनी मम्मी या दादी के कपड़े भी स्टाइलिश तरीके से पहन सकती हैं। लाल या सफ़ेद जामदानी ढूंढने की कोशिश करें। पुरानी साड़ी को स्कर्ट या पैंट के ऊपर भी पहन सकती हैं। या तो पुराने कपड़ों को री-स्टाइल भी कर सकती हैं।

अगर  जमकर नाचने की तैयारी है तो कॉटन फैब्रिक पहनें। कॉटन त्वचा के लिए सही होता है। जल्दी सूख जाता है। तो पसीने से गीले रहने की परेशानी से भी बचा जा सकता है। आप शिफॉन और जॉर्जेट भी पहन सकती हैं।

शर्ट्स-टॉप्स लहंगा या पेंट्स के साथ पहनें। पेप्लम टॉप्स और क्रॉप टॉप्स किसी भी स्टाइल या कलर के स्कर्ट और दुपट्टे के साथ मैच कर सकती हैं। अपने पापा की ओवरसाइज चेक शर्ट भी पहन सकती हैं।

बांधनी, लेहरिया, इक्कत, मधुबनी और एम्ब्रायडरी का एक अलग ही लुक आता है। चाहे कितने भी नए ट्रेंड्स क्यों न आ जाएं, ये कुछ ऐसे इंडियन फैब्रिक्स और डिज़ाइन है जो सदाबहार रहेंगे। आप इन मटेरियल का सिर्फ दुपट्टा या कमरबंध भी पहन सकती हैं।

 वैसे तो गरबा में सभी अपना लुक बहुत ज़्यादा हाइलाइटेड और ओवर रखना पसंद करते हैं लेकिन फिर पसीने के कारण सब गड़बड़ हो जाता है। इसलिए अपने लुक को मिनिमल रखें। हल्के फैब्रिक्स पहनें ताकि आपकी त्वचा बी सांस ले सके। फंकी ज्वैलरी भी पहन सकती हैं।

आज कल टीशर्ट या शर्ट हर ड्रेस को कम्पलीट कर सकती हैं। आप शर्ट पर स्किनी दुपट्टा ड्रेप करके बढ़िया इंडो-वेस्टर्न लुक पा सकती हैं। इससे आप सबसे अलग दिखेंगी।

मोनोक्रोम चनिया चोली पर भारी जेवर पहन सकती हैं। यह ट्रेंड में है। साथ ही वैस्ट बैग्स और जूती या मोजड़ी भी पहनी जा सकती हैं।

पैन्ट्स के ऊपर साइड से स्लिट वाला स्कर्ट या लहंगा पहन सकती हैं। पूरे 9 दिन आप डिफरेंट प्रिंट्स और पैटर्न्स पहन सकते हैं। स्ट्राइप्स, चेक और पोल्का डॉट्स प्रिंट्स चुन सकते हैं। ड्रापकॉर्नर्स, हाई-लो पैटर्न्स पहन सकते हैं।

(साभार – दैनिक भास्कर)

ढाक : आनन्द गुप्ता की दो कविताएँ

आनन्द गुप्ता

ढाक
(बंगाल में पूजा आयोजन के समय बजने वाला वाद्ययंत्र)
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1.
उपनगरीय रेलगाड़ियों के हर डिब्बे में
आज ढाक की गूँज है
हर डिब्बे के एक हिस्से पर
कतार से सजे हैं ढाक
सुदूर गाँवों से
हर साल अपने कंधों पर
ढेर सारे कष्ट और उम्मीदों का बोझ लिए
चले आते हैं ढाकी
नित्य यात्रियों की घुड़कियाँ और गालियाँ
आज बेअसर है ढाकियों पर
शंकु के चोट पड़ते ही ढाक पर
डम-डमा-डम-डम की आवाज निकलती है
और डिब्बे में दुर्गा पूजा की खुमारी छा जाती है
एक बारगी निःशब्दता
और फिर उल्लास
आनंद ही आनंद
ताल पर ताल देते लोग
सच भी है
चोट मन पर हो या ढाक पर
कुछ चोटों से
कितना कुछ बदल जाता है अचानक।

2.
शियालदह स्टेशन के हर चप्पे पर
आज सिर्फ ढाकों की अनुगूँज है
जो पहुँच रही है दिग्-दिगंत तक….
हर ढाकी अपने ढाक को
पूरे जोश से बजाता
उसकी ताल पर झूमता है
पूजा आयोजकों का ध्यान
अपनी ओर खींचने की कोशिश करता है
विज्ञापन और बाज़ार के इस दौर में
ढाकियों के लिए यही सुख की बात है
कि दुर्गा की हर प्रतिमा को किसी ढाकी का इंतजार है।
ढाक के साथ ताल मिलाता
बजता है कासर
बजती है कुरकुरी
धाई कुरकुर धाँग कुरकुर
ढाकी के शंकु की
ढाक पर की गई हर चोट
तय करेगी उसका भाव
भाग्यवानों के हाथ लगेंगे बड़े आयोजक
बीस-पच्चीस हजार में सौदा तय होगा
दस-पंद्रह हजार में कुछ निपटेंगे
भाग्यवानों की झुंड से बाहर जो बचेंगे
मन मारते हुए जाएंगे पाँच हजार से भी नीचे पर
कुछ सपने टूटेंगे
कुछ आशाएँ
इस साल फिर से ज़मींदोज़ होंगे।

3.
ढाकी ने ढाक बजाया
माँ दुर्गा की आँखों में चमक आ गई
थोड़ा और भयभीत हुआ महिषासुर
देवी माँ के संतान हर्षित हुए
ढाकी के थिरकते पाँव की लय के साथ
पंडाल में मौजूद हर बच्चा नाचता है
नाचते हैं बूढ़े और जवान
झूमती हुई नाचती हैं स्त्रियाँ
अपने दोनों हाथों में धुनुची लिए
पूजा करता युवक नाचता है
थिरक उठी है धरती
थिरक उठता है आसमान
थिरक उठती हैं फिजाएँ
कोलकाता की हर सड़क और गलियाँ थिरक रही हैं!
पुजारियों के निरंतर मंत्रोच्चार
और धुनुची से निकलते धुएं से आच्छादित
पूरा पंडाल
नाच रहा है ढाकी के थाप पर।

4.
रूपनारायण नदी के उस पार दूर से आ रही
ढाक की आवाज़ पर
नाच रहे हैं नंग धड़ंग बच्चे
कर रहे हैं
ढाक बजाने
कोलकाता गए बाबा का इंतजार
विजया दशमी के बाद
बाबा ढाक बजाकर बख्शीश के साथ
बाबुओं से माँग लाएंगे पुराने कपड़े
पड़ेंगे उनके तन पर वस्त्र
जो अगले साल बाढ़ तक उनके काम आएंगे
भव्य पंडालों में ढाक पर पड़ती हर चोट को
अपने सीने पर सहते कितने बाबा
हर साल की तरह इस साल भी
जीवन के धुसर सपनों पर रफू लगाएंगे
टूटे घरों पर छप्पर डाले जाएंगे
कुछ कर्ज उतारे जाएंगे
एक और दुर्गा पूजा यूँ ही बीत जाएगी उनके जीवन में।

दुर्गापूजा और नवरात्रि पर जब करनी हो पेटपूजा

मिष्टी पुलाव

सामग्री : घी 3 बड़े चम्मच तेज पत्ता 2 बड़े हरी इलायची 5-6 काली इलायची 2-3 दालचीनी 2 टुकड़े लौंग: 7-8 जावित्री 1 केसर 3-4 किस्में अदरक 1 चम्मच बासमती चावल 1 कप काजू 12-16 किशमिश ¼ कप पिस्ता 12-16 चीनी 2 बड़े चम्मच नमक 2 चम्मच जायफल ¼ छोटा चम्मच केसर 1 चुटकी या हल्दी पाउडर: 1-2 चम्मच
विधि : मिष्टी पुलाव रेसिपी बनाने के लिए सबसे पहले एक बड़े बर्तन में समा के चावल को पानी में डालकर 10 मिनट के लिए भिगो कर रख दें। इसके बाद एक कढ़ाही में घी गर्म करें, उसमें साबुत मसाले और सूखे मेवे डालकर सुनहरा होने तक भून लें। अब कढ़ाही में समा के चावल डालकर कुछ देर भून लें।  इसके बाद एक अलग बर्तन में पानी गर्म करें, फिर चावलों में चीनी, केसर और पहले से गर्म किया गया पानी मिलाकर मध्यम-तेज आंच पर 8-10 मिनट तक पकाएं।  मिष्टी पुलाव के पकने के बाद उसमें जायफल का पाउडर डालकर हल्के हाथ से चलाएं और 10 मिनट के लिए ढककर रख दें।  अब तैयार मिष्टी पुलाव को प्लेट में निकालें और गर्मागर्म माँ दुर्गा को भोग लगाएं।

सुझाव : मिटटी के बर्तन में बनाने से स्वाद और बढ़ जायेगा।

फलाहारी जलेबी

सामग्री :  1 कटोरी सिंघाड़े का आटा 3 बड़ी चम्मच दही, पानी अवश्यक्तानुसार चाशनी के लिए 1 कटोरी चीनी 1/2 कटोरी पानी 1 चम्मच नीम्बू का रस 8-10 केसर के धागे तलने के लिए तेल या घी।

विधि : फलाहारी जलेबी बनाने के लिए सबसे पहले एक बड़े बर्तन में सिंघाड़े का आटा और दही डालकर अच्छे से फेंट लें। इसके बाद मिश्रण में थोड़ा-थोड़ा पानी मिलाते हुए एक गाढ़ा घोल तैयार कर लें। अब इस घोल को 6-8 घंटे तक सेट होने के लिए अलग रख दें। इसके बाद एक बड़े बर्तन में चीनी और पानी डालकर चाशनी बनाएं, थोड़ा नींबू डालकर बची हुई खराब चीनी  को एक चम्मच की मदद से अलग कर दें। अब एक छोटी कटोरी में पानी में केसर के धागों को डालकर रंग आने तक अलग रख दें। चाशनी बनने पर उसमें केसर का रंग वाला पानी डालकर कुछ देर और पकाएं। 8 घंटो बाद फलाहारी जलेबी के मिश्रण को एक नोजल वाली बोतल में भरकर ढक्कन को टाईट बंद करें। अब एक कढ़ाही में घी गर्म करें और फिर उसमें बोतल की मदद से छोटी या बड़े आकार की जलेबी बना लें। इसके बाद जलेबियों को धीमी आंच पर सुनहरा होने तक दोनों तरफ से पलटते हुए सेंक लें। अब सिकी हुई जलेबियों को चाशनी में 5 मिनट के लिए डालें और प्लेट में निकाल लें।  अब तैयार और गर्मागर्म फलाहारी जेलबी का मां दुर्गा को भोग लगाएं और लुत्फ उठाएं।

सुझाव : आप प्लास्टिक बोतल की जगह पर साफ कपड़ा भी उपयोग कर सकते हैं। याद रखें की मिश्रण को टाइट करके ही जलेबी बनाएं। कपड़े में नीचे की ओर छोटा छेद जरुर करें।

हमारे देश को आलोकित करे विकास का सन्तुलित मॉडल

ये त्योहारों का मौसम है और मौसम का कहर ऐसा है कि त्योहार फीके लगने लगे हैं। बेतरतीब विकास ने हमें दिया क्या है, क्या हमने एक बार भी इस बारे में सोचा है। बेमौसम की बारिश बाढ़ बन गयी है…घर डूब रहे हैं..सड़कें नदियों में तब्दील हो चुकी हैं…कई जानें जा चुकी हैं मगर इसका जिम्मेदार कौन है..यह भी हमें सोचना चाहिए..प्लास्टिक पैकेट फेंकते समय शायद हमारे जेहन में न आया हो..अवैध निर्माण करते समय शायद आपने इसके दुष्परिणामों के बारे में न सोचा हो मगर यह जो हो रहा है, वह हमारे और आपकी गलतियों का ही नतीजा है। जो शहर गंगा के किनारे स्थित हैं, वहाँ पर ऊँची – ऊँची इमारतें, शॉपिंग मॉल खड़े हो रहे हैं और आप इसे विकास कहते हैं मगर यह विकास किस कीमत पर हो रहा है..ये अब समझ में आ जाना चाहिए। यह सही है कि मशीनें हमारे काम को आसान बना रही हैं मगर इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि मनुष्य की जरूरत ही नहीं बल्कि उसके प्रति जो आत्मीयता और विश्वास मशीनों पर अति निर्भरता ने छीन लिया है…उनका वह काम छीन लिया है…जिसे पुश्तों से वह करते चले आ रहे थे…अब समय आ गया है कि हम अपनी गलतियों को सुधार लें..कोई भी चीज अच्छी या बुरी नहीं होती मगर जब आप उस पर इतने निर्भर हो जाएँ कि अपना विवेक और अपनी संवेदना सब कुछ खोने लगें, जब आपकी आदमीयत पर वह चीज भारी पड़ने लगे तो हमें समझ आ जाना चाहिए कि अब अपनी जड़ों की तरफ लौटने का समय आ गया है। आप प्लास्टिक की जगह फिर से केले और साल के पत्तों को दीजिए…प्लास्टिक की थैलियों की जगह जूट, कपड़ा और कागज इस्तेमाल करें। मिट्टी की कटलरी यानी टेराकोटा कटलरी को अपनाएँ और अनुसन्धान ऐसा हो कि कागज या कपड़े को वाटरप्रूफ बनाया जाए। जल संचय की तकनीक हर घर में अपनायी जाए और बारिश के पानी को सहेजने के तरीके अपनाए जाएँ। ऐसे छोटे -छोटे प्रयास हमें और हमारे शहरों को बचा सकते हैं। तो इस बार विजयादशमी पर प्लास्टिक और मशीनों पर अत्याधिक निर्भरता का ही वध करें और विजयादशमी बनाएँ…विकास का सन्तुलित मॉडल हमारे देश को आलोकित करे। इसी कामना के साथ आपकी अपराजिता एक नयी सज-धज, नये नाम के साथ आ रही है…स्नेह बनाए रखिएगा

सरल, सहज, दृढ़ता और सादगी के प्रतीक शास्त्री जी

देश को ‘जय जवान जय किसान’ देने वाले पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की पूरी जिंदगी सादगी और ईमानदारी की मिसाल थी। चाहे साल 1965 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध में उनके नेतृत्व की बात हो या फिर रेल दुर्घटना के बाद उनका रेल मंत्री के पद से इस्तीफा लाल बहादुर शास्त्री ने सार्वजनिक जीवन में श्रेष्ठता के जो प्रतिमान स्थापित किए उसके बहुत कम उदाहरण आज दिखाई देते हैं। ऐसे ही कुछ प्रेरक प्रसंग –
नहीं करते थे सरकारी गाड़ी का इस्तेमाल
लाल बहादुर शास्त्री के बेटे सुनील शास्त्री ने अपनी किताब ‘लाल बहादुर शास्त्री, मेरे बाबूजी’ में देश के पूर्व प्रधानमंत्री के जीवन से जुड़े कई आत्मीय प्रसंग साझा किए हैं। उन्होंने अपनी किताब में लिखा है कि उनके पिता सरकारी खर्चे पर मिली कार का प्रयोग नहीं करते थे। एक बार उन्होंने अपने पिता की कार चला ली तो उन्होंने किलोमीटर का हिसाब कर पैसा सरकारी खाते में जमा करवाया था।
पत्नी के लिए नहीं ली महंगी साड़ी
शास्त्रीजी एक बार अपनी पत्नी और परिवार की अन्य महिलाओं के लिए साड़ी खरीदने मिल गए थे। उस वक्त वह देश के प्रधानमंत्री भी थे। मिल मालिक ने उन्हें कुछ महंगी साड़ी दिखाई तो उन्होंने कहा कि उनके पास इन्हें खरीदने लायक पैसे नहीं हैं। मिल मालिक ने जब साड़ी उपहार में देनी चाही तो उन्होंने इसके लिए सख्ती से इनकार कर दिया।
घर से हटवा दिया था सरकारी कूलर
शास्त्रीजी मन और कर्म से पूरे गांधीवादी थे। एक बार उनके घर पर सरकारी विभाग की तरफ से कूलर लगवाया गया। जब देश के पूर्व प्रधानमंत्री को इस बारे में पता चला तो उन्होंने परिवार से कहा, ‘इलाहाबाद के पुश्तैनी घर में कूलर नहीं है। कभी धूप में निकलना पड़ सकता है। ऐसे आदतें बिगड़ जाएंगी।’ उन्होंने तुरंत सरकारी विभाग को फोन कर कूलर हटवा दिया।
फटे कुर्ते से बनवाते थे रुमाल
शास्त्रीजी बहुत कम साधनों में अपना जीवन जीते ते। वह पत्नी को फटे हुए कुर्ते दे दिया करते थे। उन्हीं पुराने कुर्तों से रुमाल बनाकर उनकी पत्नी उन्हें प्रयोग के लिए देती थीं।
अकाल के दिनों में रखा था एक दिन का व्रत
अकाल के दिनों में जब देश में भुखमरी की विपत्ति आई तो शास्त्रीजी ने कहा कि देश का हर नागरिक एक दिन का व्रत करे तो भुखमरी खत्म हो जाएगी। खुद शास्त्रीजी नियमित व्रत रखा करते थे और परिवार को भी यही आदेश था।
शिक्षा में सुधारों के थे हिमायती
शास्त्रीजी के बेटे सुनील शास्त्री कहते हैं, ‘बाबूजी देश में शिक्षा सुधारों को लेकर बहुत चिंतित रहते थे। अक्सर हम भाई-बहनों से कहते थे कि देश में रोजगार के अवसर बढ़ें इसके लिए बेहतर मूल्यपरकर शिक्षा की जरूरत है।’
शास्त्रीजी की मेज पर रहती थी हरी दूब
पिता के संस्मरण पर लिखी किताब में शास्त्रीजी के बेटे सुनील शास्त्री ने बताया, ‘बाबूजी की टेबल पर हमेशा हरी घास रहती थी। एक बार उन्होंने बताया था कि सुंदर फूल लोगों को आकर्षित करते हैं लेकिन कुछ दिन में मुरझाकर गिर जाते हैं। घास वह आधार है जो हमेशा रहती है। मैं लोगों के जीवन में घास की तरह ही एक आधार और खुशी की वजह बनकर रहना चाहता हूं।’
(साभार – नवभारतटाइम्स.कॉम )

गाँव, पर्यावरण और विकास पर गाँधी के विचार

भावना मासीवाल
बापू का देश अहिंसा, निस्वार्थ, आत्मबल, स्थानीयता, स्वावलंबन का देश है। वह विचारों से आधुनिक मगर देशज संस्कृति का वाहक है। सिद्धांत से अधिक व्यवहार में जीता है। बापू के यहां आचरण की पद्धति मनुष्य को कर्तव्य मार्ग की ओर ले जाती है। बापू ने अपना संपूर्ण जीवन इसी कर्तव्य मार्ग को समर्पित किया और जन-जन में आचरण की शुद्धता का सिद्धांत दिया। बापू के यहां आचरण की शुद्धता सत्यता, सादगी, स्वावलंबन और नैतिकता है। यह मूल मंत्र आजीवन बापू के साथ रहा और इसी मंत्र को उन्होंने जीवन और राष्ट्र का मंत्र बनाया। बापू कहते हैं कि “हमारी सभ्यता का सार तत्व यही है कि हम अपने सार्वजनिक या निजी, सभी कामों में नैतिकता को सर्वोपरि स्थान दें”। वहीं आज हम इसका अभाव पाते हैं क्योंकि आज लोभ, लाभ और भौतिक सुख ही व्यक्ति के लिए सर्वोच्च है। पूंजीवाद व्यक्ति की इन्हीं इच्छाओं व लालसाओं का परिणाम हैं। बापू ने आधुनिक सभ्यता को अनैतिक व शैतानी सभ्यता कहा और लिखा- “पाश्विक भूख को बढ़ाने की और उसकी स्ंतुष्टि के लिए आकाश–पाताल के कुलावे मिलाने की इस पागल दौड़ की हृदय से निंदा करता हूं। अगर आधुनिक सभ्यता यहीं हैं…तो मैं इसे शैतानी ही कहूंगा” प्रकृति पर स्वामितत्व व अधिकार की लालसा का परिणाम गांधी जानते थे इसी कारण उन्होंने आधुनिक भौतिक सुखवाद की नीतियों का विरोध किया है।
शहरों का निर्माण नहीं था गाँधी का विकास, मास प्रोडक्शन के खिलाफ थे महात्मा गांधी
विकास का आधुनिक मॉडल मनुष्य और प्रकृति दोनों के शोषण पर आश्रित है। विकास, आज विनाश की अवधारणा में तब्दील हो चुका है। गांधी अपने समय में भी विकास की इन आधुनिक नीतियों से वाकिफ थे इसीलिए उन्होंने ‘मास प्रोडक्शन’ के स्थान पर ‘मासेज प्रोड्क्शन’ द्वारा विकास की बात कही। उनके विचारों से विकास केवल उद्योगों को स्थापित करने व बड़े-बड़े औद्योगिक प्लांट लगाने, अधिक से अधिक परियोजनाओं को लागू करने से संभव नहीं था, उनकी विकास योजनाओं में शहरों का निर्माण व विकास भर नहीं था न ही भौतिक समृद्धि मात्र थी, उनके विकास की योजनाओं में गांव भी सम्मिलित थे और पर्यावरण का सहयोग अनिवार्य था। आज इसे ‘सस्टेनेबल डेवलेपमेंट’ के अंतर्गत पढ़ा और पढ़ाया जाता है। बापू विकास और पर्यावरण पर अपने समय में साथ लेकर चलने की बात कर रहे थे। बापू कहते हैं कि “मेरा विरोध यंत्रों के लिए नहीं है, बल्कि यंत्रों के पीछे जो पागलपन चल रहा हैं, उसके लिए हैं…। उनसे मेहनत जरूर बचती है, लेकिन लाखों लोग बेकार होकर भूखों मरते हुए सड़क पर भटकते हैं। समय और श्रम की बचत तो मैं भी चाहता हूँ, परंतु वह किसी खास वर्ग की नहीं..”।
बापू के लिए विकास केवल एक ढ़ांचा भर नहीं था बल्कि उसमें मनुष्य का भी विकास था।
बापू के लिए विकास केवल एक ढ़ांचा भर नहीं था बल्कि उसमें मनुष्य का भी विकास था। बापू को अपने समय के औद्योगिक विकास व आधुनिक सभ्यता की इन आधुनिक व नवीन तकनीकों का अंदेशा रहा होगा तभी उन्होंने गांवों को महत्व देते हुए स्थानीयता की बात कही, क्योंकि पूंजीवाद ने सबसे पहले यूरोप और फिर उपनिवेशों में गांवों को तबाह किया। उसकी सभी आर्थिक नीतियां शहरीकरण व औद्योगिक विकास या कहें कि ‘पूंजी’ को केंद्र में रखकर बनाई गई थी। बेरोजगारी और शक्ति के केंद्रीकरण को जिसने बढ़ावा दिया। गाँधी समझ रहे थे कि ‘शहर केंद्रित आधुनिक सभ्यता गांवों को उखाड़ कर ही आगे बढ़ सकती है। इसीलिए वह गांवों पर विशेष ध्यान देते हैं और लिखते हैं–“बंबई की मिलों में जो मजदूर काम करते हैं, वे गुलाम बन गए हैं। जो औरतें उनमें काम करती हैं उनकी हालत देखकर कोई भी कांप उठेगा”। गांवों से शहरों की ओर बढ़ता पलायन स्थानीयता की नीति के अभाव से उपजा है। वर्तमान समय में बुनियादी सुविधाओं और रोजगार का अभाव पलायन का मुख्य कारण बनकर उभर रहा है।
बापू ने मशीनों का नहीं, उन्हें संचालित करने वाली लोभी मानसिकता का विरोध किया
बापू ने मशीनों का विरोध नहीं किया बल्कि उसे संचालित करने वाली लोभी और स्वार्थी मानसिकता का विरोध किया है। क्योंकि इन्हीं ने विकास की नीतियों में गांव के गांव उजाड़ उन्हें औद्योगिक क्षेत्र में परिवर्तित कर दिया हैं। विकास के नाम पर सारी धरती सीमेंट से भर दी। इसका भयानक प्रभाव बदलते पर्यावरण पर देखा जा सकता है। आज देश ही नहीं बल्कि दुनिया के हर कोने में जल, जंगल और जमीन को बचाने का संघर्ष चल रहा हैं। यह जनता की समाजिक, सांस्कृतिक व सामुदायिक धरोहर हैं। दुर्भाग्यवश यह वैश्विक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था को संचालित करने वाली ताकतों के हाथों में हैं। वैश्विक अर्थव्यवस्था या आधुनिक सभ्यता ने पूरी दुनिया में फासीवाद को जन्म दिया है, जिससे पूरी दुनिया सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संकटों से जूझ रही हैं।
गांधी समझ रहे थे कि ‘शहर केंद्रित आधुनिक सभ्यता गांवों को उखाड़ कर ही आगे बढ़ सकती है।’
आधुनिक विकास कि नीतियों ने पूंजी के संरक्षण को बढ़ावा दिया। पूंजी के संरक्षण ने उपनिवेशवादी नीतियों को बढ़ावा दिया। इसी ने प्राकृतिक संपदा पर अधिकार के प्रश्न को बढ़ावा दिया। इसी अधिकार और स्वामितत्व के प्रश्न ने हिंसा को वैश्विक धरातल पर शक्ति का सबसे बड़ा हथियार बना दिया। आज विकसित राष्ट्रों का शक्ति के बल पर विकासशील व कमजोर राष्ट्रों पर अतिक्रमण कर उनकी प्राकृतिक संपदा पर स्वामितत्व स्थापित करने की बढ़ती अधिकार नीति इसी का परिणाम हैं फिर चाहे वह 19 वीं शताब्दी में यूरोप की ‘गुआनों’ की खास जरूरत हो जिसने उस पर कब्ज़े की राजनीति को अपनाते हुए उसके उर्वरक के प्राकृतिक संसाधनों का उपभोग अपने हित में किया। फिर चाहे वह 21वीं शताब्दी का ‘क्योटो प्रोटोकॉल’ का समझौता हो जिसके तहत विकासशील देशों पर ऊर्जा के कम खपत का दबाव डाला जाना हैं दूसरी तरफ सर्वाधिक ऊर्जा के उपभोगी विकसित राष्ट्रों द्वारा तटस्थ भूमिका निभाते हुए कोई स्वीकृति नहीं देना है या अमरीका का ईरान, ईराक व सीरिया पर हमला। जिनके पीछे के कारण जो भी रहे हो परंतु हिंसा उस पर अधिकार का प्रमुख शस्त्र रहा हैं। इसी तरह नदियों पर स्वामित्व का प्रश्न फिर चाहे वह चीन और भारत के मध्य ब्रहमपुत्र नदी पर बिजली परियोजना का विवाद हो या पाकिस्तान और भारत के मध्य ‘झेलम’ नदी विवाद हो। ये सभी मुद्दे आज प्रकृति पर स्वामितत्व के प्रश्न को उजागर करते हैं। प्रकृति पर मनुष्य की निर्भरता व अधिक से अधिक उपभोग की लालसा ने अधिकार को बढ़ावा दिया हैं। अधिकार सुख ने शस्त्रों के निर्माण व सैन्यकरण की नीतियों को जन्म दिया जिसने हिंसा को बढ़ावा दिया हैं। राष्ट्रों के मध्य शक्ति केन्द्रीकरण की होड़ और अधिक से अधिक शस्त्रों का निर्माण आज स्वयं को शक्तिशाली सिद्ध करने की प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दे रहा हैं। भले ही हम प्रथम व द्वितीय विश्व युद्धों के परिणामों से गुजर चुके हैं जिसमें 1918 में जर्मनी की हार के साथ प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति की घोषणा होती हैं साथ ही द्वितीय विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि भी तैयार होती हैं। वही स्थिति आज की है दो विश्वयुद्धों का दंश झेलने के उपरांत भी आए दिन किसी न किसी राष्ट्र द्वारा शस्त्र निर्माण व परीक्षण की खबर देखी व सुनी जा रही हैं। शस्त्रों का यह बढ़ता प्रयोग परमाणु और न्यूक्लियर शक्ति के रूप में देखा जा सकता हैं। जो प्रकृति पर दबाव डाल रहा है और उस पर अतिक्रमण को बढ़ा रहा हैं। जिसका प्रभाव तीसरे विश्वयुद्ध की रूपरेखा का निर्माण है।
गाँधी का मनुष्य को उपभोग के नियमन और इच्छाओं के नियंत्रण का संदेश आज मानवता की रक्षा के लिए पर्यावरणवाद का महत्वपूर्ण सिद्धांत बनकर उभर रहा हैं। गांधी ने लिखा जो लोग तलवार के साथ जीते हैं तलवार द्वारा ही मारे जाते हैं
आज इसी से विश्व में हिंसा को बढ़ावा मिला। हिंसा चाहे कोरिया में हो या सीरिया में या अन्य किसी भी राष्ट्र में। परिणाम मनुष्य जाति का विनाश ही है। गांधी लिखते हैं ‘…जो लोग तलवार के साथ जीते हैं, वे लोग तलवार द्वारा ही मारे भी जाते हैं।…मैंने अहिंसा का रास्ता तो इसीलिए चुना हैं क्योकि मैं शस्त्रों की निष्फलता को पूरी तरह से समझ चुका हूं’। आज के भूमंडलीकरण को हम विश्व ग्राम की परिकल्पना से जोड़ कर देखते हैं तो उसके लिए विकास केवल उत्पादन व मुनाफे तक ही सीमित हैं। इस सीमित दृष्टि ने ही आर्थिक मंदी की स्थिति को पैदा किया हैं जिस पर गांधी का मानना था कि ‘मशीनीकरण वहां ठीक हैं जहां काम की तुलना में काम करने वालों की कमी हो। उस स्थिति में जबकि काम की अपेक्षा उपलब्ध श्रमिकों की संख्या ज्यादा हो, जैसा कि भारत में है’ आर्थिक असमानता, मंदी और बेरोज़गारी को बढ़ाता हैं। इसका अन्य कारण विकसित राष्ट्रों द्वारा भरपूर उत्पादन किया जाना हैं और तीसरी दुनिया जिसे विकासशील और गरीब राष्ट्रों के रूप में जाना जाता है, उनके बाज़ारों में बेचना हैं। भविष्य में संभावित इस चुनौती से निपटने के लिए गांधी ने स्थानीयता का समर्थन करते हुए स्थानीय स्तर पर माल के उत्पादन तथा उपभोग पर बल दिया और कहा-‘जब माल का उत्पादन तथा उपभोग दोनों ही स्थानीय स्तर पर होने लगेंगे, तब किसी भी कीमत पर उत्पादन बढ़ाने की होड़ रूकेगी और हमारी वर्तमान अर्थव्यवस्था की सभी समस्याओं का अंत हो जाएगा’ इसका उदाहरण क्यूबा हैं। क्यूबा की अर्थव्यवस्था पूर्णत सोवियत यूनियन पर आश्रित थी, जो सोवियत यूनियन के विघटन के पश्चात चरमराती हैं। ऐसी स्थिति में क्यूबा वैश्विक विकास की दौड़ से निकल स्थानीय विकास की नीतियों को अपनाता हैं व नियोजित तरीकों से स्थानीय स्तर पर उत्पादन को बढ़ावा देता हैं। इस तरह क्यूबा स्वयं अपनी अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाकर विकास की नई राह को अपनाता हैं। बापू का स्थानीयता व गांवों के प्रति लगाव अर्थव्यवस्था के इन्हीं परिणामों की देन है जिनकी उन्हें भविष्य में संभावना थी।
गांधी का मनुष्य को उपभोग के नियमन और इच्छाओं के नियंत्रण का संदेश आज मानवता की रक्षा के लिए पर्यावरणवाद का महत्वपूर्ण सिद्धांत बनकर उभर रहा हैं। इसका कारण प्रकृति पर मनुष्य की अत्यधिक निर्भरता और अंध विकास की नीतियां हैं। ऐसा नहीं हैं कि गांधी ने आधुनिक सभ्यता के अस्तित्व को ही नकारा हो उन्होंने कुछ खास बिंदुओं पर इसका विरोध किया है। साथ ही यह भी माना की पश्चिम में ऐसी बहुत सी चीजें हैं जिन्हें ग्रहण करने से हमारा लाभ हो सकता हैं। इसलिए हमें अपने ज्ञान और बुद्धि के सभी दरवाजे खुले रखने चाहिए। गांधी कहते हैं कि “मैं नहीं चाहता कि मेरा घर चारों ओर से दीवारों से घिरा हो और उसकी सभी खिड़किया बंद हों। मैं चाहता हूँ कि सभी देशों कि संस्कृतियों की सुवासित वायु मेरे घर के चारों ओर बहे। लेकिन मैं ऐसी किसी वायु से अपने पांव नहीं उखड़ने दूंगा। मुझे औरों के घर में दस्तन्दाज, भिखारी या गुलाम बनकर रहने से इंकार हैं।” इसी तरह वह मशीनों के प्रयोग व प्रगति का विरोध नहीं करते ना ही विकास को अनावश्यक मानते हैं बल्कि उनका मानना हैं कि ‘मशीनों ने ऐसी कोई गड़बड़ी नहीं की हैं जिसे सुधारा न जा सके। दरअसल जरूरत तो यह हैं कि दिमागी सोच को ठीक किया जाए।’ गांधी का स्थानीयता, ग्राम स्वराज्य व स्वदेशी विकास की नीतियों का उद्देश्य एक ओर गांवो में कुटीर उद्योगो व हस्तशिल्प कौशल को बढ़ावा देना व गांव के हर व्यक्ति को रोज़गार उपलब्ध कराना था। इसका परिणाम गांवों से शहरों की ओर रोज़गार के सिलसिले में बढ़ते पलायन को कम करना व गांवों में परिवार व उनकी संस्कृति को बचाए रखने का प्रयास था। इसके साथ ही शहरों में बढ़ती जनसंख्या व बेरोजगारी की समस्या को नियंत्रित कर अर्थव्यवस्था को स्थिरता प्रदान करना भी था।
गांधी का आत्मनियंत्रण, अहिंसा व नैतिकता का मंत्र मनुष्य व राष्ट्र के मध्य बढ़ती हिंसा को कम कर सकता है। गांधी कहते कि ‘प्रत्येक अधिकार का जन्म कर्तव्य की कोख से ही होता है इसलिए दूसरों का भी इस अधिकार का उपभोग करना संभव हैं, इसलिए हरएक को अपने अधिकार का उपयोग उसमें अभिप्रेत कर्तव्य का भान रख कर करना चाहिए’। ‘Your liberty of swing your hand ends where tip of my nose begins’ यदि प्रत्येक व्यक्ति व राष्ट्र अपनी स्वतन्त्रता की सीमाओं से परिचित हो व उनकी स्वतंत्रता अन्य की स्वतन्त्रता को बाधित न करे। ऐसे में हिंसा स्वत: ही समाप्त हो सकती हैं।
(यह आलेख अमर उजाला से लिया गया है)

अभावों के बीच प्रेम कहानी कहता नाटक “हजारों ख्वाहिशें ऐसी”

विगत 20 सितम्बर को लिटिल थेस्पियन ने अपनी 25वीं सालगिरह के अवसर पर अकादेमी ऑफ़ फाइन आर्ट्स में उमा झुनझुनवाला द्वारा लिखित व निर्देशित संगीतात्मक नाटक हज़ारां ख़्वाहिशां मंचन किया| राजस्थान की पृष्ठभूमि पर आधारित “हजारों ख्वाहिशें ऐसी” लोक शैली में लिखा गया नाटक है जिसमें समाज में व्याप्त आर्थिक विषमता के कारण उत्पन्न भाव-प्रतिभाव हैं| इस नाटक में प्रेम कहानी है जहाँ अभिलाषाओं और धन-दौलत के मध्य द्वंद्व है जो गीतों के माध्यम से बड़ी सरलता से कथा को आगे बढ़ाती चलती है| राह चलते एक दिन शहर के सबसे बड़े अमीर सेठ निहालचंद को एक ग़रीब लड़की चारुधरा में अपनी मृतक बेटी की झलक दिखाई देती है| वह उसे अपनी बेटी के रूप में अपना लेता है| चारुधरा का एक प्रेमी किशन भी होता है मगर अपनी अमीरी के रुतबे के कारण उसे नहीं अपना पाता| चारुधरा अचानक मिले सुख और ऐश्वर्य के कारण ग़रीबी तो भुला देती है मगर किशन को नहीं भूला पाती है| अपने दत्तक पिता से जब चारुधरा किशन के साथ विवाह की इच्छा जाहिर करती है तो वे नहीं मानते और एक लम्बी बहस के बाद चारुधरा को उसके पुराने घर वापस भेज देते हैं…. लेकिन चारुधरा से जो वात्सल्य सुख मिला था निहालचंद को उसे किसी भी हाल में दोबारा खोना नहीं चाहता और इसीलिए दोनों को अपना लेता है|
नाटक का आकर्षण दृश्यों में बदलाव था जहाँ गानों के मध्य भांड बड़ी खूबसूरती से नाचते हुए आते हैं और सेट में परिवर्तन कर दृश्य को कभी हवेली तो कभी चारुधरा का ग़रीब घर और कभी किसी रास्ते में बदल देते हैं| वेशभूषा में राजस्थान का सौन्दर्य झलकता हुआ नज़र आता है| इस नाटक में संगीत बड़ा ही शानदार है| संगीत की परिकल्पना संगीत नाट्य अकादेमी से पुरस्कृत मुरारी राय चौधुरी ने की है| गीतों को गाया है – अवन्ती भट्टाचार्य और आनन्दवर्द्धन ने| प्रकाश-संयोजन भी दृश्यों को संवेदनशील बनाने में सफल हैं|


सागर सेनगुप्ता (निहालचंद), कुसुम वर्मा (चारुधरा), पार्वती शॉ (भैरवी), नीलांजन चटर्जी (किशन) हीना परवेज़ (रामप्यारी), शबरीन खातून (देवमती), अभिक महतो (सांगजी) ने अपने अभिनय को जीवंत किया तथा भांडों के रूप में शुभांकर शीट, मो. आतिफ अंसारी, सुमित गोस्वामी, मो. अरशद सादिक, प्रणय साहा, मारूफ खान, नाज़ आलम, तन्मय सिंह, इम्तियाज़ आलम ने अच्छा काम किया| एक बेहतरीन प्रस्तुति के लिए निर्देशिका-लेखिका उमा झुनझुनवाला के साथ लिटिल थेस्पियन को बहुत बहुत बधाई|
लिटिल थेस्पियन के बारे में : लिटिल थेस्पियन कलकत्ता महानगर की प्रख्यात हिन्दी नाट्य-संस्था है जिसने 1994 से लगातार नाट्य-प्रस्तुतियाँ देकर भारतीय रंगमंच में अपने लिए एक अलग जगह बनाई है l संस्थापक अजहर आलम और उमा झुनझुनवाला हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओं में नियमित प्रदर्शन करते रहते हैं| अजहर आलम कुशल अभिनेता और कल्पनाशील निर्देशक हैं उमा निर्देशन और अभिनय के साथ साथ संगठनात्मक काम, कार्यशालाओं का सञ्चालन आदि में भी संलग्न रहती हैं| नाट्य-प्रस्तुतियों के अलावा वक्तृता और सेमिनार भी आयोजित करते हैं| इसके साथ ही लिटिल थेस्पियन हर साल राष्ट्रीय नाट्य उत्सव का आयोजन करता है जिसमें थिएटर जगत की नामचीन हस्तियाँ तथा विख्यात नाटक देशभर से एक मंच पर एकत्रित होते हैं| कोलकाता में ये अपनी तरह का हिंदी का एकलौता राष्ट्रीय नाट्य उत्सव है जो 2010 से लगातार आयोजित किया जा रहा है| इस वर्ष नौवां नाट्य उत्सव नवम्बर से है|
समीक्षक
गुंजन अज़हर
छात्रा, शिक्षायतन कॉलेज

गोइन्का पुरस्कारों के लिए प्रविष्टियां आमंत्रित

कमला गोइन्का फाउण्डेशन अहिन्दीभाषी क्षेत्रों में हिन्दी के प्रसार के लिए लगातार काम कर रही है और इसी क्रम में साहित्य श्रेणी में दिये जाने वाले विभिन्न पुरस्कारों के लिए फाउंडेशन ने प्रविष्टियाँ माँगी है। कमला गोइन्का फाउण्डेशन के प्रबंध न्यासी श्री श्यामसुन्दर गोइन्का ने एक प्रेस विज्ञप्ति द्वारा बताया है कि दक्षिण भारत के हिन्दी साहित्यकारों के लिए निम्न पुरस्कारों की प्रविष्टियां मंगाई गयी हैं। जो हिन्दी भाषी साहित्यकार अहिन्दी भाषी क्षेत्रों में पिछले 10 वर्षों या अधिक अवधि से हिन्दी साहित्य की सेवा व सृजन कर रहे हैं वे भी इन पुरस्कारों के हकदार होंगे। ऐसे हिन्दी किंवा अहिन्दी भाषी दोनों इन पुरस्कारों के लिए अपनी प्रविष्टियां भेज सकते हैं। इक्कीस हजार राशि का “बाबूलाल गोइन्का हिन्दी साहित्य पुरस्कार” (दक्षिण भारत के साहित्यकारों द्वारा सर्वश्रेष्ठ प्रकाशित मूल हिन्दी पुस्तक के लिए)।  इस पुरस्कार के तहत सिर्फ मूल हिन्दी कृति ही भेजनी होगी। इक्कीस हजार राशि का “पिताश्री गोपीराम गोइन्का हिन्दी-कन्नड़ अनुवाद पुरस्कार” (सर्वश्रेष्ठ प्रकाशित हिन्दी से कन्नड़ या कन्नड़ से हिन्दी में अनूदित पुस्तक के लिए) इक्कीस हजार राशि का “बालकृष्ण गोइन्का अनुदित साहित्य पुरस्कार” (सर्वश्रेष्ठ प्रकाशित हिन्दी से तमिल या तमिल से हिन्दी में अनूदित पुस्तक के लिए) इक्कीस हजार राशि का “सत्यनारायण गोइन्का अनुदित साहित्य पुरस्कार” (सर्वश्रेष्ठ प्रकाशित हिन्दी से मलयालम या मलयालम से हिन्दी में अनूदित पुस्तक के लिए। उपरोक्त पुरस्कारों के लिए 2009-2019 के बीच की अवधि में प्रकाशित पुस्तक की चार-चार प्रतियां (अनुवादित कृति की चार प्रति तथा मूलकृति जिसका अनुवाद किया है उसकी चार प्रति) प्रस्ताव-पत्र एवं पासपोर्ट आकार की दो फोटो बैंगलोर कार्यालय में 31 दिसंबर 2019 तक भेजने का आग्रह किया है।
 प्रविष्टि-पत्र, नियमावली एवं अधिक जानकारी के लिए बेंगलुरू कार्यालय में सचिव कमलेश यादव से 99000202161

आँखों की अन्धेरी रात को अपनी शिक्षा से जीवन की भोर बनातीं मौश्री

दीपक राम

मौश्री को प्राप्त हो चुके हैं ये सम्मान

वर्ष 2012 में बेस्ट इम्पलाई इन डिसएबल्टिज फिल्ड स्टेट अवार्ड (फीमेल कैटगरी)
वर्ष 2014 में बेस्ट इम्पलाई इन इंडिया नेशनल अवार्ड (फीमेल कैटगरी)
वर्ष 2015 में आनन्द सम्मान
वर्ष 2019- दिशा सम्मान

“खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले खुदा बंदे से खुद पूछे बता तेरी रजा क्या है।’ यह वह पँक्तियाँ हैं जो किसी में भी जोश भर दें मगर इस जोश के लिए भी हौसलों की जरूरत पड़ती है। वह हौसला जो अन्धेरे को भी जगमगाती रोशनी बना दे। आज हम आपको ऐसी ही एक ओजस्विनी से मिलवाने जा रहे हैं और यह प्रेरक कहानी लाये हैं पत्रकार दीपक राम। यह लेख ओजस्विनी मौश्री वशिष्ट से उनके साक्षात्कार पर आधारित है।
हावड़ा के सलकिया की रहने वाली मौश्री बचपन से ही नेत्रहीन हैं मगर उनका हौसला हमेशा रोशनी से भरा रहा। शायद यही कारण है कि उन्होंने अपने लक्ष्य के लिए सदा प्रयास किया और नेत्रहीनता को इसके बीच कभी आने नहीं दिया। जब चिकित्सकों ने हाथ खड़े कर दिये और मौश्री के अभिभावकों को उनकी पढ़ाई बंद करने की नसीहत दी, तब भी मौश्री ने हिम्मत नहीं हारी और उनके इस जीवन युद्ध में उनको हमेशा उनके पिता का साथ मिला। मौश्री को घर बैठना गवारा नहीं था। उसने जीवन की पटरी पर सरपट दौड़ लगाने के लिए शिक्षा को ही हथियार बनाया। यही कारण है कि आज मौश्री को किसी के सहारे की जरूरत नहीं। वह अपने सपने को जी रही है। अपनी पढ़ाई की बदौलत ही आज मौश्री को किसी पहचान की जरूरत नहीं है। वह आज एक प्रोफेसर बन बच्चों को कानून का ज्ञान दे रही हैं। दरअसल मौश्री को रेटिना पिगमेंटोसा नामक आँख की एक गम्भीर बीमारी है जिसका पता मौश्री के 6 वर्ष की आयु में ही चला था। साल 1997 था जब मौश्री के आँखों के इस रोग का पता चला था। इसके बाद जीवन में अंधकार ही नजर आ रहा था। माइनस 10 पावर के चश्मे के सहारे मौश्री ने जैसे-तैसे अपनी माध्यमिक तक की पढ़ाई तो पूरा कर ली, लेकिन इसके बाद दोनों आँखों की रोशनी पूरी तरह चली गयी। इसके बाद ही मौश्री के जीवन की असली जंग शुरू होती है।
मौश्री ने बताया कि माध्यमिक की परीक्षा के बाद दोनों आँखों की रोशनी पूरी तरह चले जाने के बाद इलाज कहीं नहीं हो रहा था। कोलकाता के एक से बढ़कर एक नेत्र चिकित्सकों के पास पहुँचे किन्तु कोई फायदा नहीं हुआ। चिकित्सक मात्र यही कहते रहे कि रेटिना पिगमेंटोसा का कोई इलाज नहीं है। इतना ही नहीं चिकित्सकों ने मौश्री की पढ़ाई बंद करवाने की नसीहत भी दे डाली। मौश्री बताती हैं, ‘इस दौरान हमें हौसलों को बढ़ाने वालों की जरूरत थी किन्तु मेरे साथ ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। हालाँकि हमने हिम्मत नहीं हारी। घर वालों का सहारा मिला पढ़ाई जारी रखी।’
पूरी किताब करनी पड़ती थी रिकार्ड
1997-98 का समय था जब टेप-कैसेट का दौर था। पढ़ाई को जारी रखने के लिए पापा ब्लैंक कैसेट यानी खाली कैसेट खरीद कर लाते औैर पढ़ाई की पूरी किताब इस कैसेट में रिकार्ड की जाती थी। मौश्री ने बताया कि उसने कभी भी सजेशन के सहारे पढ़ाई नहीं की। पापा और मामा जब किताब को कैसेट में रिकार्ड कर देते तो उसे सुन-सुन कर याद कर लेती थी। याद तो कर लेती लेकिन इसके बाद भी परीक्षा में लिखने की होती थी समस्या। हालाँकि इससे भी निपटने के लिए हमने एक लिखने वाले यानी राइटर का सहारा लेना पड़ता था।
मौश्री को कई कड़वे अनुभवों से गुजरना पड़ा है। स्थिति ऐसी थी कि जब रोग का इलाज नहीं हो पा रहा था तो कोलकाता के सभी चिकित्सकों ने हाथ खड़े कर दिये थे और मौश्री के अभिभावकों को उस पर और खर्च न करने तक की नसीहत दे डाली थी और यह भी कह डाला था कि वे उसे शिक्षा न दें। इतना ही नहीं चिकित्सकों ने ये भी बोला था कि बेटी पर खर्च करने के बजाय उसके नाम पर कुछ पैसे जमा कर रखें मगर मौश्री के पिता तमाम बाधाओं के बावजूद अपनी बेटी के साथ खड़े रहे। वह बताती हैं, “इसके बाद हम इलाज के लिए चेन्नई के एल.जी.प्रसाद आई इंस्टीट्यूट गये और वहाँ के चिकित्सकों ने मौश्री की शिक्षा जारी रखने को कहते हुए हौसला बढ़ाया।’
मौश्री ने कलकत्ता विश्वविद्यालय से ऑनर्स की डिग्री हासिल की मगर यह तो बस एक शुरुआत थी। इसके बाद उन्होंने 2003 में वकालत और इसके बाद एम.ए, एलएलएम, मास्टर ऑफ सोशल वर्क और डॉक्टरेट की पढ़ाई राज्य के विभिन्न विश्‍वविद्यालयों से की। फिलहाल वह वर्तमान में साउथ कोलकाता लॉ कॉलेज में सहायक प्रोफेसर के तौर पर नियुक्त हैं। मौश्री की नयी किताब शीघ्र ही प्रकाशित होने वाली है।
क्या है रेटिना पिगमेंटोसा रोग
रेटिना पिगमेंटोसा आँखों की सेहत को लगातार बिगाड़ने वाला एक गम्भीर रोग है। हालांकि यह एक विरल रोग है मगर आनुवांशिक है, मतलब एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जाता है। इसके लक्षण बचपन से ही दिखने लगते हैं। जिनको या कम रोशनी में दृष्टि में कमी या दूर दृष्टि दोष होता है, वह इसके मरीज हैं मगर इस रोग का कोई कारगर इलाज नहीं है।

2018-19 में आठ गुना बढ़कर 11,200 करोड़ रुपये हुआ मोबाइल हैंडसेट निर्यात

नयी दिल्ली : वित्त वर्ष 2018-19 में मोबाइल हैंडसेट का निर्यात आठ गुना से अधिक बढ़कर 11,200 करोड़ रुपये पर पहुंच गया। यह पहली बार है जब मोबाइल हैंडसेट का निर्यात आयात से अधिक हो गया है। इंडियन सेल्युलर एंड इलेक्ट्रॉनिक्स एसोसिएशन (आईसीईए) के अनुसार, अप्रैल से जुलाई 2019 के दौरान हैंडसेट निर्यात करीब सात हजार करोड़ रुपये पर पहुंच गया है। इससे चालू वित्त वर्ष में हैंडसेट निर्यात का आंकड़ा 25 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच जाने का अनुमान है। आईसीईए के चेयरमैन पंकज महेंद्रू ने कहा, ‘‘मोबाइल हैंडसेट विनिर्माण उद्योग का रथ दौड़ रहा है। 2017-18 की तुलना में 2018-19 में निर्यात में 800 प्रतिशत तेजी देखने को मिली है। यह बेहतर भविष्य की दिशा में अच्छी शुरुआत है।आईसीईए के अनुसार, 2014-15 में देश में 5.80 करोड़ हैंडसेट का विनिर्माण हुआ जिनकी कुल कीमत 18,900 करोड़ रुपये थी। नोकिया संयंत्र के बंद होने के बाद हैंडसेट निर्यात लगभग शून्य पर आ गया था। 2018-19 में विनिर्माण बढ़कर 29 करोड़ इकाइयों पर पहुंच गया, जिनकी कुल कीमत 1.81 लाख करोड़ रुपये रही। महेंद्रू ने कहा, ‘‘घरेलू माँग में आयात की हिस्सेदारी 2014-15 में करीब 80 प्रतिशत थी जो 2018-19 में गिरकर महज छह प्रतिशत रह गयी। इससे मोबाइल हैंडसेट आयात को शुद्ध रूप से शून्य करने का काम अधिक तेजी से पूरा होने की उम्मीद है।’’