कोलकाता : पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में कोरोना वायरस से बचने के लिए सामजिक दूरी का अनुपालन करने और सार्वजनिक परिवहन के विकल्प के तौर पर लोग साइकिल को प्रमुखता दे रहे हैं और यही वजह है कि इसकी बिक्री बढ़ गई है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पुलिस से आह्वान किया है कि वह शहर की सड़कों पर साइकिलों के लिए अधिक स्थान सुनिश्चित करें। इस बीच साइकिल चालकों के संगठन ने कहा कि उनकी मांग प्रमुख मार्गों पर विशेष साइकिल लेन बनाने की है जो अभी तक पूरी नहीं की गयी है। उन्होंने बताया कि कई लोग 8,000 से 15,000 रुपये कीमत की आधुनिक खूबियों वाली साइकिलें खरीद रहे हैं।
प्रमुख बाइक ब्रांड फायरबॉक्स के अधिकारी ने बताया, ‘‘सभी डीलर बिक्री दोगुनी होने की जानकारी दे रहे हैं ….. और इस चलन में तेजी आ रही है।’’
मध्य कोलकाता के बेंटिंक स्ट्रीट और वाटरलू स्ट्रीट के साइकिल विक्रेताओं ने भी पुष्टि की कि साइकिल की बिक्री में तेजी आई है क्योंकि अब काम पर साइकिल से जाना फैशन हो गया है और रोजाना खरीदने के लिए पूछताछ करने वालों की संख्या बढ़ रही है।
कोलकाता के उत्तर स्थित सोदपुर में मॉर्डन साइकिल मार्ट के मालिक विकास शाह ने कहा कि कोविड-19 संकट से पहले 6,000 से 20,000 रुपये मूल्य की सात से दस साइकिलें बिकती थी, लेकिन एक जून से दुकान खुलने के बाद हम रोजना दोगुनी संख्या में साइकिलें बेच रहे हैं और खरीदारों में युवा और अधेड़ दोनों शामिल हैं।
इस बीच, पर्यावरण अनुकूल यात्रा को प्रोत्साहित करने वाले साइकिल संगठन ने कोलकाता में तत्काल साइकिल को समर्पित लेन बनाने की मांग की है। संगठन की यह मांग कोलकाता पुलिस द्वारा 10 जून को जारी अधिसूचना के बाद आई जिसमें शहर की सड़कों पर साइकिल चलाने की अनुमति दी गई है।
संगठन ने कहा कि अधिसूचना में फ्लाइओवर आदि पर साइकिल चलाने की अनुमति का जिक्र नहीं किया गया है।
अनुप तापदार ने कहा कि अगर सरकार साइकिल चलाने को सक्रिय होकर प्रोत्साहित करती है, तो यह कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ाई में भी मददगार होगा क्योंकि लोगों का इससे व्यायाम होगा और उनकी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ेगी। तापदार की उम्र 70 वर्षीय हैं।
चलो! रजनी ढालि का बेटा अलाउद्दीन आया है
अलाउद्दीन ढालि शेख गा रहे हैं। नजरें उदास हैं और स्वर अस्त होते सूर्य की तरह मद्धिम। फिर भी गीत का हर मर्मस्पर्शी भाव उजागर हो रहा है,
हे नाथ! यदि इस भव सागर में भेजते हो दोबारा,
कृष्ण भक्त मां के गर्भ से ही जन्म दिलाना मेरा।
कृष्ण और राम, दोनों के प्रेम के दीवाने हैं अलाउद्दीन। उनकी भक्ति में हृदय को तपाकर जीवन के 93 बसंत पार कर चुके हैं। जीवन के शेष दिनों के लिए उनका एकमात्र सहारा हैं, ब्रज के ब्रजदानंदन। वह कौन हैं? कहां हैं? उनके दर्शन के लिए पलक-पांवड़े बिछाकर अब भी प्रतीक्षा कर रहे अलाउद्दीन गाते हैं,
हे प्रभु, रूप तुम्हारा निहारता रहूं,
और रहूं उसी वृक्ष के नीचे,
हे दयाल गुरु, पृथ्वी का चिर कंगाल बना दो मुझे…
पचास के दशक में बंगाल के ग्रामीण जीवन में तरजा गान और कवि गान मनोरंजन के लोकप्रिय साधन थे। इनमें कलाकार गायन के बीच तर्कों से एक-दूसरे को पछाड़ने की कोशिश करते। प्रतिद्वंद्वी से सवाल-जवाब होता। इसका जादू लोगों के सिर चढ़कर बोलता था। ऐसे ही वातावरण में उन दिनों के मशहूर कलाकार रजनी ढालि के पुत्र अलाउद्दीन ने तालीम लेनी शुरू की। उनके पिता के गुरु हेमचंद्र सिंह ने उन्हें तरजा गान की बारीकियां सिखाईं।
अलाउद्दीन ने सैकड़ों-हजारों टीका-टिप्पणियों के साथ रामायण, महाभारत, गीता, पुराण में महारत हासिल की। उन्हें सफलता भी हाथों-हाथ मिली। अविभाजित 24 परगना ज़िला, नदिया, बीरभूम, बांकुरा, दुमका से उन्हें बुलावा आने लगा। उनके पीछे-पीछे भक्तों की टोली दौड़ पड़ती। लोग कहते, ‘चलो-चलो, तरजा गान की महफिल में रजनी ढालि का बेटा आया है।’
लोकप्रियता में अलाउद्दीन अपने पिता से भी आगे निकल गए। ऐसा हो पाया उनकी निस्वार्थ कृष्ण भक्ति और भगवान रामचंद्र के प्रति अनुराग के कारण। वह प्रेम आज भी कायम है। उस प्रेम और भक्ति का एक स्वरूप यह भी है कि जीवन की इस शाम में वह गा रहे हैं,
बार-बार भावना आती है भक्तों का संग पाऊं,
मैं का अभिमान त्याग कर प्रणाम जनाऊं,
कृष्ण भक्तों के चरणों में…
राम ने ऐसा क्यों कहा होगा
तरजा गान के लिए अलाउद्दीन ने देशभर में प्रचलित अलग-अलग विचारों और शैलियों वाली रामायण कंठस्थ कर डालीं। कृतिबासी रामायण, तुलसीदासी रामायण, राम रसायन, अद्भुत रामायण से लेकर योगवशिष्ठ रामायण तक पर उनकी गहरी पकड़ है।
इन्हें पढ़ने के दौरान योगवशिष्ठ के एक अंश ने उनके मन में सवाल खड़ा कर दिया। 14 वर्ष के वनवास पर जाने से पहले माता कौशल्या ने राम के हाथ में एक कटोरी दूध थमाया था। उस दूध को ग्रहण न कर राम अपनी माता से बोले- 14 वर्ष के लिए गृह त्याग कर रहा हूं। आप मुझे बताइए, इस समय सुस्वादु गोमांस मुझे कौन देगा?
अलाउद्दीन को इस बात ने परेशान कर दिया कि राम ने ऐसी बात क्यों कही होगी। इसका अर्थ समझने के लिए वह कई विद्वानों से मिले। इसी क्रम में वह जा पहुंचे कलना के सिधेश्वरी मंदिर के पंडित हाराधन गोस्वामी के पास। अलाउद्दीन ने अनुरोध किया, इस रहस्य को खोल दीजिए कि असल में स्वादिष्ट गोमांस है क्या? पंडित हाराधन ने बताया कि इसकी कई व्याख्याएं हैं। गो शब्द के एक से अधिक अर्थ हैं और जो इस शब्द का अर्थ जिस रूप में लेगा, वह वही अर्थ निकालेगा। उन्होंने अलाउद्दीन से कहा था कि इसके बारे में ज्यादा चिंता मत करो।
ऐसी कई बातें हैं अलाउद्दीन के जीवनधारा की। तत्कालीन रचनाओं में उनके जोड़ की कोई दूसरी नहीं दिखती। प्रतिस्पर्धा के मंच पर विरोधियों को काबू करने में वह प्रभावशाली टिप्पणी करते हैं,
पेड़ पर बेल पके हैं,
डाल पर बैठे कौए सोचते हो क्या,
पपीता नहीं जो चोंच मारकर खा लोगे,
नहीं चलेगी तुम्हारी चतुराई।
एक मेडल और वह भी कोई ले गया
अलाउद्दीन ने सैकड़ों छंद रच डाले। उनके तमाम गीत लोग शीतकालीन नलेन यानी गुड़ की तरह लिए घूमते हैं। और ख़ुद उनका ठिकाना गांव कालना के जीवधरा में टीन के एक छप्पर के नीचे है। सम्मान की बात करें तो वर्ष 1980 में राज्य सरकार की ओर से श्रेष्ठ तरजा गायक के तौर पर चांदी का एक मेडल और मानपत्र मिला था। वह मेडल भी कोई ले गया। वैसे भी फकीर के लिए संपत्ति की क्या ज़रूरत! जो राम और कृष्ण से नेह लगा बैठा हो, उसका हृदय सोना-चांदी तोड़ सकता है भला?
कविगान के ज्यादातर कलाकार मुस्लिम संप्रदाय से हैं। कवि सम्राट सुमानि दामान, अब्दुल जब्बर, गोपाल शेख से लेकर साहेब जान शेख तक, सभी तरजा कलाकार के रूप में जाने जाते हैं। ये सभी कलाकार मनोयोग से रामायण, महाभारत और गीता पाठ कर रहे। वे जानते हैं कि बंगाल के गांवों में रहने वालों के मनोरंजन के लिए ऐसे ही साहित्य पाठ की आवश्यकता है।
एक सवाल उठता है कि मुस्लिम होने पर भी इतनी कृष्ण और राम भक्ति? कहीं कोई समस्या नहीं हुई? अलाउद्दीन का जवाब है, नहीं। बल्कि वह तो भक्तों की ओर से मिला सम्मान आज भी याद करते हैं। एक बार वह कविगान की महफिल में भाग लेने के लिए नदिया के हरिपुर गए थे। तब रमजान का महीना चल रहा था। हिंदुओं ने वहां उनका जो आदर-सत्कार किया, उसे वह आज तक नहीं भूले। जिस तरह नहीं भूल पाए हैं शांतिपुर के न्यू बॉयज क्लब का कार्यक्रम। वहां भी आयोजकों ने उनके रोजे का पूरा ध्यान रखा था।
फिर सवाल उठता है कि संगीत में जीवन समर्पण, काव्य रचना, कृष्ण प्रेम और लोगों के मनोरंजन का मोल क्या दो हज़ार रुपये मासिक होना चाहिए? बता दें कि अलाउद्दीन को सरकारी कलाकार भत्ता के तौर पर एक हज़ार और अतिरिक्त भत्ता के तौर पर एक हज़ार रुपये मिलते हैं। इतने से काम चल सकता है क्या? अलाउद्दीन ढालि शेख साहेब ने ब्रजेंद्रनंदन को स्मरण कर फिर गीत में जवाब दिया,
हे दयानिधान! मैं नहीं चाहता रुपये-पैसे और नहीं चाहता अभिमान,
गूंथता रहूं कृष्ण नाम की माला, देकर मन और प्राण।
बातचीत में दोपहर हो चली है। पश्चिम की ओर से सूर्य की किरणें टीन की दीवार में छेद खोजकर अंदर आ रही हैं। अलाउद्दीन के मुखमंडल पर जीवन तृप्ति की आभा झलक रही है।
एक साथ 12 लोगों को करेगी सैनिटाइज कोलकाता : पश्चिम बंगाल के पूर्वी बर्दवान जिले स्थित एक निजी स्कूल के कुछ स्टूडेंट्स ने शैक्षणिक संस्थान में प्रवेश करने वाले लोगों को कीटाणुरहित करने के लिए एक ‘आयुर्वेदिक सैनिटाइजेशन टनल’ का निर्माण किया है। मंगलवार को मेमरी क्रिस्टल मॉडल स्कूल के एक प्रवक्ता के मुताबिक इस टनल के जरिए एक बार में बारह लोगों को कीटाणुरहित किया जा सकता है। आयुर्वेदिक तेल का किया इस्तेमाल
उन्होंने यह भी बताया कि इसका निर्माण स्कूल में टेक्नोलॉजी क्लब की कार्यशाला में टीचर्स की देखरेख में आयुर्वेदिक तेल, मेन्थॉल और थाइम ऑयल के द्वारा किया गया था। प्रवक्ता ने कहा कि, “टनल में प्रवेश करने वाले लोगों पर हर्बल कीटाणुनाशक का स्वचालित रूप से छिड़काव होता है।” हानिकारक केमिकल रहित है टर्नल
आमतौर पर, सोडियम हाइपोक्लोराइट का उपयोग कीटाणुनाशक के रूप में किया जाता है। इसकी मदद से बने सैनिटाइजिंग सल्यूशन से मनुष्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इससे पहले कोलकाता के बिड़ला इंडस्ट्रियल एंड टेक्नोलॉजिकल म्यूजियम में आयुर्वेदिक सैनिटाइजेशन टनल स्थापित किया गया था।
नयी दिल्ली : सीआईसीएसई बोर्ड के 10वीं और 12वीं के छात्र बची हुई बोर्ड की परीक्षा ना देने का विकल्प चुन सकते है और प्री -बोर्ड या स्कूल में हुई परीक्षाओं के आधार पर उन्हें अंक दिए जाएंगे।कोविड-19 के बढ़ते मामलों के मद्देनजर एक अभिभावक ने अदालत में परीक्षाएं रद्द कराने की मांग करते हुए याचिका दायर की थी,जिसके जवाब में बोर्ड ने बंबई उच्च न्यायालय के समक्ष सोमवार को यह प्रस्ताव दाखिल किया।
छात्रों को 22 जून तक अपने संबंधित स्कलों में इसकी जानकारी देनी होगी
काउंसिल फॉर द इंडियन स्कूल सर्टिफिकेट एग्जामिनेशन (सीआईएससीई) के मुख्य कार्यकारी एवं सचिव, गैरी एराथून के अनुसार छात्रों को 22 जून तक अपने संबंधित स्कलों में इसकी जानकारी देनी होगी। कोरोना वायरस से निपटने के लिए लगाए गए लॉकडाउन के कारण कुछ परीक्षाएं स्थगित कर दी गई थीं,जो अब एक से 14 जुलाई के बीच होंगी। हालांकि कई अभिभावक उन्हें रद्द करने की मांग कर रहे हैं।
ये विकल्प केवल लंबित परीक्षाओं के लिए
एराथून ने कहा कि छात्रों को दो विकल्प दिए जाएंगे, या तो वे पुनर्निर्धारित परीक्षाएं दें या फिर प्री-बोर्ड या स्कूल में हुई परीक्षाओं के आकलन के आधार पर अंक लेने का विकल्प चुनें। ये विकल्प केवल लंबित परीक्षाओं के लिए है, जिन विषयों की परीक्षाएं हो चुकी हैं उनके परिणाम परीक्षाओं के आधार पर ही दिए जाएंगे। बोर्ड ने साथ ही स्पष्ट कर दिया की छात्र विषयों के आधार पर विकल्प का चयन नहीं कर सकते।केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) के विपरित सीआईएससीई सभी लंबित विषयों की परीक्षा आयोजित कर रहा है।सीबीएसई केवल उच्च शिक्षा संस्थानों में पदोन्नति और प्रवेश के लिए महत्वपूर्ण 29 विषयों में परीक्षा आयोजित करेगा।
कहते हैं कि सवाल उठने चाहिए पर हमें भूलने की आदत है और इसलिए हम कई घटनाओं को जोड़कर चीजें नहीं देखते मगर सुशांत सिंह राजपूत जैसे तेजी से उभरते सितारे का अचानक डूब जाना यूँ ही नहीं है। बस हुआ यह है कि हमने सोचा नहीं कभी…मगर उनकी मौत ने एक बार फिर बॉलीवुड के प्रिविलेज क्लब और बाहरी विवाद को हवा दे दी है। कुछ शत्रु सामने होते हैं और कुछ ऐसे होते हैं जो आपसे पूरी मिठास और सादगी से बात करेंगे मगर वही लोग आपको किनारा भी कर देते हैं और किनारे हो भी जाते हैं और एक दिन आप खुद ही अलग हो जाते हैं। हमने कभी सवाल नहीं उठाया क्यों…संजय दत्त, सलमान खान, शाहरुख खान, आमिर और वरुण से लेकर सूरज पंचोली तक को बॉलीवुड में इतना महत्व मिलता है। आखिर किसी का कॅरियर संवारने और बिगाड़ने वाले सलमान खान और करण जौहर होते कौन हैं…सब जानते हैं कि अरिजीत सिंह और विवेक ओबेराय के पीछे वह कैसे पड़े हैं….मगर फर्क नहीं पड़ता और नतीजा सामने है।
शैलेन्द्र सिंह
आज जब लिखने जा रही हूँ तो एक कड़ी से दूसरी कड़ी मिलाती चली गयी और तब लग रहा है कि मुम्बई की मायानगरी में तो प्रतिभाओं का कत्ल करने की लम्बी परम्परा रही है। या तो आप किसी प्रिविलेज क्लब का हिस्सा बनिए या फिर बॉलीवुड से विदा लीजिए…और मराठी मानुष होने के नाम पर इन सबको सरकारी मदद भी खूब मिलती है। ये अचानक नहीं है….बाकायदा उनको परेशान किया जाता है…उनकी फिल्में बन्द करवायी जाती हैं…उनको अलग – थलग किया जाता है..औऱ यह सब वर्चस्व की लड़ाई का हथियार है। आप याद करेंगे तो पायेंगे…कि गुरुदत्त, संजीव कुमार, मीना कुमारी जैसे कलाकारों की जिन्दगी एक जैसी ही जुड़ी है।
गुरुदत्त से वहीदा रहमान और मीना कुमारी से धर्मेन्द्र जैसे कलाकारों का कॅरियर बना मगर सफल होने के बाद इनका दूर होना भी एक सच है। इस दौर में हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि गुरुदत्त के समकालीन राजकपूर थे जिनके पीछे पृथ्वीराज कपूर थे और आज कपूर खानदान का सिक्का चलता है। क्या प्रतियोगिता की भावना इतनी भयानक है कि आप सामने डटे रहने की जगह प्रतियोगी को हटाने की कोशिश करते रहे हैं। अक्सर यह कहा जाता रहा है कि आत्महत्या करने वाले ने शराब पीनी शुरू कर दी थी मगर वह ऐसा क्यों करने लगा था…इस पर हमने कभी विचार नहीं किया। मनहर उधास, शैलेन्द्र सिंह, सुमन कल्याणपुर जैसे दिग्गज गायक मुम्बई की मायानगर में लम्बा सफर तय क्यों नहीं कर सके..यह हमारे ध्यान में नहीं आया। जब टीवी पर लाइव होकर कोमल नाहटा जैसे फिल्म समीक्षक गायक अभिजीत को उनकी औकात याद दिलाने की बात कहते हैं तो हमें यह समझना चाहिए कि वह किसके भरोसे पर इतनी बड़ी बात कह रहे हैं।
गायक शैलेंद्र सिंह का। शैलेंद्र सिंह मुंबई में ही जन्मे, यहीं पढ़े लिखे और फिर पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट में दाखिला पाने में सफल रहे। पुणे वह गए थे एक्टिंग की ट्रेनिंग करने, लौट के आए तो वह कुछ फिल्मों में एक्टर बने भी। रेखा के भी हीरो बने फिल्म एग्रीमेंट में। लेकिन शैलेंद्र सिंह को दुनिया ने जाना उनकी मखमली आवाज की वजह से। वह आवाज जिसकी कशिश को सबसे पहले पहचाना शो मैन राजकपूर ने। शैलेंद्र सिंह को अपने करियर में लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, बप्पी लाहिड़ी और राम लक्ष्मण जैसे गुणी संगीतकारों का खूब साथ मिला। शैलेंद्र सिंह का नाम ऋषि कपूर के बाद मिथुन चक्रवर्ती की आवाज बनकर भी खूब चमका, लेकिन खुद शैलेंद्र सिंह बताते हैं कि उनके साथ उनके करियर के शीर्ष पर सियासत हो गई। वह नाम तो किसी का नही लेते उदाहरण के लिए जहरीला इंसान का सुपरहिट गीत ओ हंसनी मेरी हंसनी कहां उड़ चली शैलेंद्र सिंह को गाना था, लेकिन उसे किशोर कुमार से गवा लिया गया। यही हाल फिल्म राजा का हुआ। इसके दो गीत जो शैलेंद्र को गाने थे किशोर कुमार से गवा लिए गए और तो और ऋषिकपूर और डिंपल कपाड़िया की फिल्म सागर के गीत शैलेंद्र को गाने थे। इस फिल्म का प्रीमियर शैलेंद्र के ही गाए गीत पास आओ ना से हुआ लेकिन बाकी के गीतों में किशोर की आवाज थी।
परवीन बॉबी
परवीन बॉबी की बात की जाये तो वह किसी भी अपनी समकालीन अभिनेत्रियों से कम नहीं थीं। सुन्दरता के साथ अभिनय भी उनका उम्दा था मगर ऐसा क्यों हुआ कि उन्होंने अमिताभ बच्चन पर सवाल उठाए…महेश भट्ट ने उनको धोखा दिया था। ये सब जानते हैं..वह मानसिक तौर पर बीमार हुईं मगर हमने कभी नहीं सोचा कि यह हुआ कैसे….आखिर कोई तो वजह रही होगी…मगर किसी ने उनकी बात का भरोसा नहीं किया…परवीन बॉबी से लेकर रेखा तक…याद कीजिए कि ये अरुणा ईरानी ही थीं जिन्होंने अमिताभ के साथ काम करना स्वीकार किया…अरुणा ईरानी, नूतन, वहीदा रहमान, परवीन बॉबी से लेकर उनकी पत्नी जया बच्चन और रेखा तक अमिताभ के कॅरियर की सीढ़ियाँ रहीं। आज ये सब परदे से दूर हैं और अमिताभ महानायक हैं…अपने दबदबे के कारण इन्होंने भी बहुत से रहस्य दबाए हैं..क्या वाकई अमिताभ महानायक हैं…. अमिताभ का आवरण भव्य हो सकता है…मगर वे अन्दर से खोखले हैं…वे खुद उत्तर प्रदेश से हैं…मगर आज तक अपने गृह राज्य में एक स्टूडियो तक उनसे नहीं खोला गया… पूछा जाना चाहिए कि उनके समकालीन विनोद खन्ना को क्यों अवसाद में जाना पड़ा…ये मायानगरी है….यहाँ कोई किसी को रास्ता नहीं देता। परवीन बॉबी की मौत तो और भी भयावह तथा दर्दनाक रही। परवीन बॉबी अपने रहस्यमयी जीवन के साथ ही परवीन बॉबी की मौत भी कुछ रहस्यमयी ही रही। बताया जाता है कि इनके दरवाजे पर तीन दिन के दूध व अखबार पड़े देख उनकी आवासीय सोसायटी के सचिव ने पुलिस को सूचित किया। जिसके बाद पुलिस द्वारा 22 जनवरी 2005 को मुंबई के अपने अपार्टमेंट में उनके मृत पाने की सूचना पूरे भारत को मिली थीअपने समय की बेहद हसीन और हॉट कलाकारों में से एक परबीन बॉबी ने बहुत कम समय में ही बहुत कुछ पा लिय़ा था। अपने समय में उन्होंने कई ब्लाक ब्लास्टर फिल्में की हैं। लैला मजनू और अँखियों के झरोखों से फेम रंजीता को “अँखियों के झरोखों से” के लिए बेस्ट एक्ट्रेस, “पति, पत्नी और वो” तथा 1982 की फिल्म “तेरी कसम” के लिए बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस के तौर पर फिल्म फेयर पुरस्कारों के लिए नामांकित हुई थीं, लेकिन उन्हें एक बार भी पुरस्कार नहीं मिल पाया। विद्या सिन्हा का नाम भी इस कड़ी में शामिल है।
80 और 90 के दशक में ऋषि कपूर और जीतेन्द्र से लेकर धर्मेन्द्र के जमाने में मिथुन चक्रवर्ती जैसे अभिनेता के लिए जगह बनाना आसान नहीं रहा होगा। यही वह समय है जब बॉलीवुड कपूर, चोपड़ा और उसके बाद खान परिवार के कब्जे में चला गया और इस सूची में आज करण जौहर का नाम सबसे आगे शामिल है। एक बात गौर कीजिए कि प्रतियोगिता होती थी और उपेक्षा भी होती थी मगर इस दौर में आत्महत्या जैसी घटनाएँ न के बराबर हुईं मगर दिल का दौरा पड़ता रहा। बॉलीवुड की हिंसक प्रतियोगिता और भाई – भतीजावाद के कारण हत्या या आत्महत्या (?) का काला दौर दिव्या भारती के साथ शुरू होता है।
श्रीदेवी का विकल्प मानी जाती थीं दिव्या भारती
दिव्या भारती की तुलना श्रीदेवी से की जाती थी। अपने समय की मशहूर अदाकारा रहीं इन दोनों ही अभिनेत्रियों में कई समानताएं थी। जहाँ एक ओर श्रीदेवी भारतीय सिनेमा की पहली महिला सुपरस्टार बनीं तो वही दिव्या भारती ऐसी अभिनेत्री बन गईं थीं जिसके साथ काम करने के लिए डायरेक्टरों की लाइन लगी। दिव्या केवल नौवीं क्लास में थीं जब फिल्म निर्माताओं और निर्देशकों ने उनसे संपर्क किया और उन्हें फिल्मों में काम करने का ऑफर दिया। इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि उनकी शक्ल उस समय की सबसे सफल अभिनेत्री श्रीदेवी से मिलती जुलती थी। खूबसूरती और जबरदस्त एक्टिंग से मन मोह लेने वाली दिव्या अपने ही घर की खिड़की से नीचे गिर गईं। जाँच में सामने आया कि वह शराब के नशे में थी, जिसकी वजह से वे अपने घर की बालकनी से फिसलकर नीचे गिर गयी। महज 3 साल के सिनेमाई करियर में दिव्या ने 22 फिल्मों में काम किया। उनकी पॉप्युलैरिटी का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि दिव्या की 13 बॉलिवुड फिल्मों में से 12 हिट या सुपरहिट रहीं। बताया जाता है कि जब दिव्या की दुर्घटना में मौत हुई तब उनकी झोली में 20 से ज्यादा फिल्में थीं। 10 मई 1992 को फिल्म प्रोड्यूसर साजिद नाडियाडवाला से दिव्या की शादी हुई। लेकिन इसके 11 महीने बाद ही उनकी मौत की खबर ने कुछ सेकेंड्स के लिए ही सही सिनेमा प्रेमियों की सांसें रोक दी। सिल्क स्मिता
सिल्क स्मिता पर बेस्ड फिल्म द डर्टी पिक्चर बनी थी, जो सिल्क की जिंदगी के उतार चढ़ाव को बताती है। 80 और 90 के दशक में करोड़ों दिलों पर राज करने वाली सिल्क एक अच्छे मुकाम पर थीं वहीं किसी को उम्मीद नहीं थी कि वो गरीब घर में पली बढ़ी उसके बाद अपनी संभाल नहीं पाई मगर उपेक्षा और शोषण इनकी जिन्दगी का हिस्सा रहा।
सिल्क स्मिता
जिया खान
जिया खान बॉलीवुड में एक उभरता हुआ चेहरा थी उन्होंने सन 2007 में अमिताभ बच्चन के साथ फिल्म निशब्द से अपने फिल्मी करियर की शुरूआत की थी लेकिन उन्होंने वर्ष 2016 में आत्म हत्या कर ली। इस अभिनेत्री 25 साल की उम्र में ही गजनी जैसी सुपरहिट फिल्मों में काम भी किया और 2010 में आयी फिल्म हाउसफुल भी सुपरहिट रही। जिया की मौत आज भी एक गुत्थी बनी हुई है। जिया खान ने साल 2013 में आत्महत्या की थी। जिया की लाश उनके मुंबई के जुहू स्थित घर में मिली थीं। जिया खान की मौत के एक हफ्ते बाद उनकी बहन कविता को छह पन्नों का एक लेटर मिला। इस लेटर में जिया की हेंडराइटिंग साफ नजर आ रही थी। हालांकि, इस लेटर में किसी का नाम नहीं लिखा था। लेकिन, ये जिया के बॉयफ्रेंड सूरज पंचोली की तरफ इशारा कर रहा था और सलमान इनको ही प्रोमोट कर रहे हैं।
प्रत्युषा बनर्जी, सिल्क स्मिता, मनप्रीत ग्रेवाल, कुशल पंजाबी…ये सब गौर कीजिए कि सब उभरते हुए सितारे थे…प्रतिभा की कमी नहीं थी और लोकप्रिय भी थे…मेरी समझ में नहीं आता कि ये सब के सब अवसाद में कैसे गये…काम क्यों नहीं मिल रहा था…वह कौन था या है जो रास्ते में इनके अड़चनें डाले जा रहा था या है। आखिर सुशांत सिंह राजपूत जैसे लोकप्रिय सितारे क्यों लिखना पड़ा कि उनके प्रशंसक उनकी फिल्में देखें वरना उनको इंडस्ट्री से बाहर कर दिया जाएगा…वह जिस ऊँचाई पर थे और उनमें जितनी प्रतिभा थी…वह किसी भी खान और कपूर या स्टार किड्स को पीछे छोड़ सकते थे…बॉलीवुड आपको अपनाता है मगर तब तक अपनाता है, जब तक आप उसका अहसान मानें, उनके इशारों पर नाचें और सबसे बड़ी बात पीछे ही रहें…आगे न निकलें…।
जिया खान
इस आत्महत्या ने बॉलीवुड के पावर कैंप के निर्मम तरीकों पर चर्चा छेड़ दी है। खास कर उन युवाओं के लिए जो पूरे भारत से बाहरी लोग के तौर पर अपने सपनों को साकार करने के लिए इस उद्योग में आते हैं और जिनका इस जगत में कोई गॉडफादर नहीं होता, उनके साथ कैसा बर्ताव होता है। फिल्म और टेलीविजन उद्योग की यह आम बात है कि जब तक आप उद्योग के किसी लोकप्रिय शख्स की संतान नहीं हैं, तब तक उन्हें आपकी कोई परवाह नहीं है और यह कतई नई बात नहीं है। यह पिछले कई दशकों से चला आ रहा है। इस पर चर्चा तब शुरू हुई, जब अभिनेत्री कंगना रनौत ने कुछ समय पहले कॉफी विद करण शो, जिसके मेजबान खुद करण जौहर हैं, उनको भाई-भतीजावाद का गॉडफादर कहा था, जो इंडस्ट्री में आने वाले स्टार किड्स की मदद करते हैं और उनके शुरुआती करियर बनाने में मदद करते हैं।
इस मामले में सुशांत और उनकी प्रतिभा दोनों असाधारण थे। वह इंजीनियरिंग में बेहतर करियर बनाने के लिए बिहार से आए थे, फिर बॉलीवुड के सितारों की सूची में तेजी से प्रवेश करने से पहले उन्होंने बैकअप डांसर और टीवी पर आने के लिए संघर्ष किया। उनका बॉलीवुड का छोटा छह साल का करियर साल 2013 में शहरी मल्टीप्लेक्स हिट फिल्म काई पो चे से शुरू होकर, उनकी अंतिम रिलीज फिल्म, जो पिछले साल बम्पर हिट हुई थी छिछोरे थी। इस फिल्म में उन्होंने साबित कर दिया कि वह असाधारण अभिनेता हैं। तो फिर अभी सोशल मीडिया पर यह खबर क्यों वायरल हो रही है कि बॉलीवुड के सभी शक्तिशाली बैनरों ने उनका बहिष्कार कर दिया था?
इस सिद्धांत को राजनेता संजय निरुपम के शब्दों से मजबूती मिलती है, जिन्होंने अपने ट्वीट में कहा कि सुशांत ने छिछोरे फिल्म की सफलता के बाद सात फिल्में खो दीं थी, जिसे वे साइन कर चुके थे। निरुपम ने पोस्ट किया, उन्होंने सिर्फ छह महीने में कई फिल्मों को खो दिया। क्यों? फिल्म उद्योग की निर्ममता बहुत अलग स्तर पर काम करती है और उस निर्ममता ने एक प्रतिभाशाली व्यक्ति की जान ले ली। आखिर क्यों उन्होंने इन प्रोजेक्ट्स को खो दिया? बीते कुछ सालों में सुनी सुनाई बातों के अनुसार, सुशांत को कई बड़े बैनर की फिल्मों से रिप्लेस कर दिया गया था, जिसमें संजय भंसाली की गोलियों की रासलीला राम-लीला और आदित्य चोपड़ा की बेफिक्रे संयोग से दोनों फिल्मों में सुशांत को हटा कर रणवीर सिंह को लिया गया, जो कथित तौर पर सेल्फमेड स्टार हैं, लेकिन अनिल कपूर के घराने से ताल्लुक रखते हैं। वह सोनम कपूर के रिश्ते में भाई लगते हैं।
कुशल पंजाबी
क्या बॉलीवुड का विकल्प नहीं हो सकता?
मेरा सीधा सवाल यह है कि क्या हम अपने घरों की छतों को सूना करके अपने बच्चों को अवसाद में घिरने के लिए और इस राजनीति के भंवर में छोड़ने जा रहे हैं? क्या हमें हार मान लेनी चाहिए? आखिर क्यों हम बॉलीवुड का विकल्प नहीं खोज सकते और यूँ कहें कि हम खुद क्यों नहीं बन सकते। प्रतिभाओं की कमी नहीं है हमारे पास और हर घटिया प्रचार का जवाब भी दिया जा सकता है। सुशांत की मौत ने सवाल ही नहीं छोड़े बल्कि झकझोर कर सोचने पर मजबूर कर दिया है कि कब तक यह घटिया राजनीति चलेगी। क्या जरूरी है की सिर्फ मुम्बई ही हिन्दी फिल्मों का गढ़ हो?
आप कहेंगे यूटोपिया है, मैं कहती हूँ सपना है। हमारे पास प्रतिभा है, हुनर है क्या पटना और राँची जैसे शहरों में स्टूडियो नहीं बनाये जा सकते, इससे क्या भोजपुरी अश्लीलता के भंवर से नहीं छुड़ाई जा सकेगी। क्यों हर बात के लिये दिल्ली और मुम्बई का चेहरा देखा जाये। ये क्या अवसर में नहीं बदला जा सकता। अगर यू पी, बिहार और झारखण्ड के साथ बंगाल व पूरा उत्तर – पूर्व मिल जाए तो हम पूरे भारत को बदल सकते हैं। कमजोरी नहीं, अपनी ताकत देखने का समय है। मत भूलिए मुंबई और दिल्ली ने ये जगह कोलकाता से ली है, कोलकाता की बांग्ला फिल्में बॉलीवुड का जीवन बनी हैं। ये टाकीज, फिल्म और संगीत का गढ है मगर हम हिन्दी फिल्मों के विकास की उम्मीद बंगाल से न तो कर सकते हैं और न ही जायज है। हिन्दी फिल्में देखना, और हिन्दी को अपना लेना, दो अलग बातें हैं मगर बिहार, यू पी और झारखण्ड की तो ये समान भाषा है। अगर फिल्मों का विकल्प वेब सीरीज बन सकती है तो बॉलीउड का विकल्प भी सम्भव है, ये बस जिद, जिगर, मेहनत और जज्बे के साथ सरकारी सहयोग की बात है।
यही हमारी प्रतिभाओं का सम्मान होगा। (इनपुट इंटरनेट से) (https://hindi.sakshi.com/editors-picks/2019/10/04/shailendra-singh-birthday-special)
कोझीकोड : कोझीकोड के कुट्टीचिरा में एक मस्जिद ने कोरोना वायरस महामारी के बीच भीड़ से बचने का एक अनूठा तरीका खोजा है। मस्जिद चलाने वाली समिति ने लोगों को नमाज अदा करने के लिए स्मार्ट कार्ड जारी करना शुरू कर दिया है और साथ ही शारीरिक दूरी को प्रोत्साहित किया है।
समिति ने मस्जिद के आसपास के लोगों को संख्याओं के साथ स्मार्ट कार्ड दिए हैं। जो मस्जिद परिसर में प्रवेश करता है, उसे अपने हाथों को सैनिटाइजर के साथ रगड़ना पड़ता है। उन्हें कैमरे पर अपनी पहचान भी बतानी होती है। इसके लिए एक स्वचालित प्रणाली को रखा गया है। मस्जिद कमेटी का हिस्सा रहे मुहम्मद सज्जाद ने कहा कि इसके लिए पता और फोन नंबर डालने की भी जगह दी गई है। अगली बार उन्हें अपना स्मार्ट कार्ड नंबर देना होगा इसके साथ ही अन्य विवरण अपने आप भर जाएंगे।
उन्होंने कहा कि कार्ड स्वाइप करने के बाद मस्जिद का दरवाजा अपने आप खुल जाएगा। हम दरवाजों पर लगे सेंसर में फिट हो गए हैं। हमने मस्जिद क्षेत्र के अंदर भी निशान बनाए हैं, ताकि लोग सामाजिक दूरी के नियमों का पालन कर सकें।”
कुछ दिनों पहले केरल सरकार ने एक दिशा-निर्देश तैयार किया है, जिसमें 9 जून से पूजा स्थलों, मॉल और रेस्तरां को दिशा-निर्देशों और सामाजिक दूरियों के मानदंडों के अनुसार खोलने की अनुमति दी गई है। दिशानिर्देशों के अनुसार, गर्भवती महिलाओं और सह-रुग्णताओं वाले लोगों को पूजा के किसी भी स्थान पर नहीं जाना चाहिए। लक्षणों वाले लोगों को अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। जानकारी के लिए बता दें कि देश में कोरोना वायरस के मामले तेजी से फैल रहे हैं। इस वक्त देश में कोरोना संक्रमितों की संख्या 3 लाख का आंकड़ा पार कर चुकी है। ऐसे में सरकार ने पांचवी बार लॉकडाउन की अवधि को बढ़ाते हुए इसे 31 जून तक के लिए लागू कर दिया है।
भुवनेश्वर : ओडिशा स्थित महानदी में डूबा एक पांच सौ साल पुराना मंदिर मिला है। नदी घाटी में मौजूद ऐतिहासिक विरासत का दस्तावेजीकरण कर रहे विशेषज्ञों ने यह जानकारी दी। ओडिशा में इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट ऐंड कल्चर हेरिटेज (इनटैक) के परियोजना समन्वयक अनिल धीर ने बताया कि 60 फीट ऊंचा मंदिर माना जा रहा है कि करीब 500 साल पुराना है और हाल में परियोजना के तहत इसका पता लगाया गया।
उन्होंने रविवार को बताया कि मंदिर कटक के पद्मावती इलाके के बैदेश्वर के नजदीक बीच नदी में मिला है।
धीर ने बताया कि मस्तक की निर्माण शैली और मंदिर को बनाने में इस्तेमाल सामग्री से प्रतीत होता है कि 15 वीं या 16वीं सदी के शुरुआत में इसका निर्माण किया गया है।
उन्होंने कहा कि इंटैक मंदिर को दूसरे स्थान पर स्थानांतरित करने के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) से संपर्क करेगा।
धीर ने कहा कि हम जल्द ही एएसआई को पत्र लिख कर मंदिर को उचित स्थान पर स्थानांतरित करने का अनुरोध करेंगे क्योंकि उनके पास इसकी तकनीक है। राज्य सरकार को भी इस मामले को एएसआई के समक्ष उठाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि अब तक इंटैक ने दस्तावेजीकरण परियोजना के तहत महानदी में मौजूद 65 प्राचीन मंदिरों का पता लगाया है। धीर ने बताया कि इनमें से कई मंदिर हीराकुंड जलाश्य में हैं जिन्हें वहां से हटा कर उनका पुर्निर्माण किया जा सकता है।
इंटैक के परियोजना सहायक दीपक कुमार नायक ने स्थानीय विरासत जानकार रविंद्र राणा की मदद से मंदिर का पता लगाया। उन्होंने कहा कि उन्हें मंदिर की मौजूदगी की जानकारी है। यह मंदिर गोपीनाथ देव को समर्पित है।
नायक ने कहा, प्राचीन काल में इस इलाके को ‘सप्तपाटन’ के नाम से जाना जाता था। हालांकि, प्रलयकारी बाढ़ के कारण नदी के रास्ता बदलने से पूरा गांव ही डूब गया।
उन्होंने बताया कि 19वीं सदी में मंदिर में स्थापित अराध्य देवता की मूर्ति को स्थानांतरित कर ऊंचे स्थान पर स्थापित किया गया और मौजूदा समय में वह प्रतिमा पद्मावती गांव के गोपीनाथ देव मंदिर में स्थापित है।
धीर ने बताया कि इंटैक ओडिशा ने अपनी परियोजना के तहत महानदी घाटी स्थित विरासतों के दस्तावेजीकरण का काम पिछले साल शुरू किया था। उन्होंने बताया कि महानदी के उद्गम स्थल से लेकर समुद्र में मिलने तक के 1,700 किलोमीटर के रास्ते में मौजूद सभी स्पष्ट और गैर स्पष्ट विरासत का विधिवत सर्वेक्षण किया जा रहा है और यह अंतिम चरण में है।
धीर ने बताया कि अगले साल कई भागों में करीब 800 स्मारकों पर रिपोर्ट जारी की जाएगी। इंटैक की राज्य समन्वयक अमिया भूषण त्रिपाठी ने बताया कि भारत में किसी नदी का इस तरह का यह पहला अध्ययन है और न्यास ने पायलट परियोजना के तहत यह किया है।
पुरानी जगन्नाथ सड़क और प्राची घाटी के दस्तावेजीकरण परियोजना का नेतृत्व कर चुके धीर ने कहा कि महानदी की संपन्नता और विविधिता का अभी तक ठीक से अध्ययन नहीं किया गया है। उन्होंने कहा कि कई प्राचीन स्मारक या तो नष्ट हो गए हैं जर्जर अवस्था में हैं। धीर ने कहा कि हीराकुड बांध की वजह से करीब 50 प्राचीन मंदिर नष्ट हो गए हैं।
मुम्बई : बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत ने रविवार को बांद्रा स्थित अपने अपार्टमेंट में कथित तौर पर फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। वह 34 वर्ष के थे। पश्चिमी क्षेत्र के अतिरिक्त पुलिस आयुक्त मनोज शर्मा ने बताया, ‘‘उन्होंने बांद्रा में अपने आवास पर आत्महत्या कर ली। हमारी टीम वहां है।’’
बड़े पर्दे पर राजपूत की आखिरी फिल्म नितेश तिवारी निर्देशित ‘‘छिछोरे’’ थी। गौरतलब है कि उनकी मैनेजर 28 वर्षीय दिशा सालियान ने नौ जून को एक इमारत से छलांग लगाकर आत्महत्या कर ली थी।
टेलीविजन धारावाहिक ‘‘पवित्र रिश्ता’’ में निभाए किरदार से मशहूर हुए अभिनेता ने 2013 में ‘‘काई पो छे!’’ से फिल्मी करियर की शुरुआत की थी। उन्होंने ‘‘शुद्ध देसी रोमांस’’, ‘‘एम एस धोनी : द अनटोल्ड स्टोरी’’, ‘‘राबता’’, ‘‘केदारनाथ’’ और ‘‘सोनचिड़िया’’ जैसी फिल्मों में काम किया था।
रोजवेल : सेकंड लेफ्टिनेंट अनमोल नारंग वेस्ट प्वाइंट स्थित अमेरिकी सैन्य अकादमी से स्नातक की डिग्री प्राप्त करने वाली पहली सिख महिला बनकर शनिवार को इतिहास रचेंगी। नारंग का जन्म अमेरिका में हुआ और उनकी परवरिश जॉर्जिया के रोजवेल में हुई। उन्होंने जॉर्जिया प्रौद्योगिकी संस्थान से स्नातक की पढ़ाई की और उसके बाद वेस्ट प्वाइंट गईं जहां वह परमाणु इंजीनियरिंग में शनिवार को स्नातक की डिग्री हासिल करेंगी।
वह वायु रक्षा प्रणाली में करियर बनाना चाहती हैं। न्यूयॉर्क स्थित गैर लाभकारी संस्था ‘सिख कोलिशन’ द्वारा जारी एक विज्ञप्ति में नारंग ने कहा, ‘‘मैं बहुत उत्साहित हूं कि वेस्ट प्वाइंट से स्नातक करने का मेरा ख्वाब पूरा होगा। यह मेरे लिए गर्व की बात है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘जॉर्जिया में मेरे समुदाय ने मुझमें जो भरोसा दिखाया और मुझे जो सहयोग दिया, वह मेरे लिए बहुत मायने रखता है। मैं अभिभूत हूं कि इस लक्ष्य तक पहुंचकर मैं अन्य सिख अमेरिकियों को यह दिखा रही हूं कि किसी के लिए भी करियर में कोई भी रास्ता चुनना मुमकिन है।’’
अधिकारियों ने बताया कि नारंग ओकलाहोमा में बेसिक ऑफिसर लीडरशिप कोर्स पूरा करेंगी और इसके बाद उन्हें जनवरी में जापान के ओकीनावा में पहली तैनाती के लिए भेजा जाएगा।
मुम्बई : भारत के प्रथम श्रेणी के सबसे वयोवृद्ध क्रिकेटर वसंत रायजी का शनिवार को निधन हो गया। वह 100 साल के थे। उनके परिवार में पत्नी और दो बेटियां है। उनके दामाद सुदर्शन नानावती ने बताया, ‘दक्षिण-मुंबई के वालकेश्वर के अपने घर में तड़के दो बजकर बीस मिनट पर नींद में ही उनका निधन हो गया।’
दाएं हाथ के बल्लेबाज रायजी ने 1940 के दशक में नौ प्रथम श्रेणी मैच खेले। उन्होंने कुल 277 रन बनाए जिसमें उनका सर्वाधिक स्कोर 68 रन था। उन्होंने 1939 में क्रिकेट क्लब ऑफ इंडिया की टीम के लिए पदार्पण किया और वह नागपुर में मध्य प्रांत तथा बरार के खिलाफ खेलने टीम का हिस्सा थे।
मुंबई के लिए उन्होंने 1941 में पदार्पण किया और विजय मर्चेंट की अगुवाई में पश्चिमी भारत के खिलाफ मैदान में उतरे। रायजी क्रिकेट इतिहासकार और चार्टर्ड अकाउंटेंट भी थे। वह जब 13 साल के थे तब भारतीय टीम ने बॉम्बे जिमखाना में अपना पहला टेस्ट मैच खेला था।