Friday, June 19, 2026
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पहली बार 500 अरब डॉलर के पार पहुंचा देश का फॉरेक्स रिजर्व

नयी दिल्ली : देश का (विदेशी पूंजी भंडार) फॉरेक्स रिजर्व पहली बार बढ़कर 500 अरब डॉलर के पार पहुंच गया। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा शुक्रवार को जारी आंकड़े के मुताबिक 5 जून को समाप्त सप्ताह में देश का फॉरेक्स रिजर्व 8.22 अरब डॉलर बढ़कर501.70 अरब डॉलर पर पहुंच गया। विदेशी मुद्रा भंडार (एफसीए) में भारी बढ़ोतरी ने फॉरेक्स रिजर्व के उछाल में प्रमुख भूमिका निभाई।
विदेशी मुद्रा भंडार 8.42 अरब डॉलर बढ़कर 463.63 अरब डॉलर का हुआ। 29 मई को समाप्त सप्ताह में फॉरेक्स रिजर्व 3.44 अरब डॉलर बढ़कर 493.48 अरब डॉलर का हो गया था। 5 जून को समाप्त सप्ताह में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 8.42 अरब डॉलर बढ़कर 463.63 अरब डॉलर का हो गया। फॉरेक्स रिजर्व में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी विदेशी मुद्रा भंडार की है। विदेशी मुद्रा भंडार को यूं तो डॉलर में अभिव्यक्त किया जाता है लेकिन मुद्रा भंडार में यूरो, पाउंड और येन भी शामिल होते हैं और इनके मूल्य में उतार-चढ़ाव का भी विदेशी मुद्रा भंडार पर असर दिखता है।
स्वर्ण भंडार का मूल्य 32.9 करोड़ डॉलर घटकर 32.352 अरब डॉलर रह गया
स्वर्ण भंडार का मूल्य इस दौरान 32.9 करोड़ डॉलर घटकर 32.352 अरब डॉलर रह गया। अंतरराष्ट्र्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) में भारत के विशेष निकासी अधिकार इस दौरान 1 करोड़ डॉलर बढ़कर 1.44 अरब डॉलर पर पहुंच गया। साथ ही आईएमएफ में भारत की आरक्षित स्थिति भी 12 करोड़ डॉलर बढ़कर 4.28 अरब डॉलर की हो गयी।

कोलकाता पुलिस ने अवसादग्रस्त लोगों की तरफ बढ़ाया मदद का हाथ

कोलकाता : कोलकाता पुलिस ने अवसाद ग्रस्त लोगों की तरफ मदद का हाथ बढ़ाया है। पुलिस आयुक्त अनुज शर्मा ने खुद ट्वीट करके मदद के लिए 100 नंबर पर डायल करने को कहा है। पुलिस आयुक्त का यह ट्वीट बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत के डिप्रेशन का शिकार होकर आत्महत्या कर लेने के बाद आया है। 34 वर्षीय अभिनेता का शव रविवार दोपहर मुम्बई के बांद्रा इलाके में स्थित उनके फ्लैट से पंखे से लटकती हालत में बरामद हुआ था। अनुज शर्मा ने ट्वीट के साथ दिवंगत अभिनेता की तस्वीर और पिछले साल प्रदर्शित हुई उनकी फिल्म ‘छिछोरे’ का मशहूर डायलॉग भी पोस्ट किया है, जो इस तरह है-‘जिंदगी में अगर कुछ ज्यादा इंपोर्टेंट है, तो वह है खुद जिंदगी।’
पुलिस आयुक्त ने कहा-‘ बोलिए! अपनी बातों को रखिए! भावनाओं को बहने दीजिए! सुरंग के अंत में हमेशा प्रकाश होता है! किसी भी तरह की परेशानी में # डायल 100 कीजिए। हम आपके लिए हैं।’

शेयर चैट का ‘प्लेज टू डोनेट’ अभियान सफल

11,000 यूज़र्स ने रक्तदान करने की शपथ ली
1.5 करोड़ से ज्यादा लोग 12 भाषाओं के माध्यम से इस कैम्पेन से जुड़े

कोलकाता : भारतीय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ने आज अपने अभियान #प्लेज टू डोनेट’ के परिणामों की घोषणा की जिसका समापन 14 जून 2020 को हुआ है। 12 भाषाएं बोलने वाले 11,478 शेयरचैट यूज़र्स ने रक्तदान करने की शपथ ली है और वे इस बात पर राज़ी हुए हैं कि संबंधित सामाजिक विकास संगठन उनसे सम्पर्क कर सकते हैं। यूज़र्स ने शेयरचैट प्लैटफार्म पर एक वैबकार्ड द्वारा यह शपथ ली। इस वेबकार्ड ने 12 भाषाएं बोलने वाले प्रयोक्ताओं से 35 लाख व्यूज़ प्राप्त किए। इसके अलावा, शेयरचैट यूज़र्स रक्तदान संबंधी विषयों पर बातचीत में भी शामिल हुए और उन्होंने अपना दृष्टिकोण रखा। विश्व रक्तदाता दिवस पर #प्लेज टू डोनेट’ अभियान के इर्दगिर्द 25,000 से अधिक यूजीसी पोस्ट शेयर की गयी जिनमें रक्तदान के बारे में उपयोगी जानकारी दी गयी, रक्तदान से संबंधित गलतफहमियों को दूर किया गया तथा प्रयोक्ताओं ने रक्तदान करते हुए अपनी सेल्फी भी शेयर की जिससे प्लेटफॉर्म पर इस मुद्दे से बहुत से लोग जुड़े। शेयरचैट प्लेटफॉर्म पर रक्तदान संबंधी कॉन्टेंट पोस्ट को 1.5 लाख से ज्यादा बार शेयर किया गया और 1.2 करोड़ से अधिक व्यूज़ मिले।
भारतीय सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म शेयरचैट ने 11 जून 2020 को #प्लेज टू डोनेट’ कैम्पेन की घोषणा की थी ताकि रक्तदान के बारे में जागरुकता फैलाई जा सके।लइस कैम्पेन का लक्ष्य था यूज़र्स को रक्तदान हेतु प्रोत्साहित करना और उन्हें रक्तदान गतिविधियों के साथ जोड़ना ताकि देश में रक्त की कमी को पूरा करने में योगदान दिया जा सके। 11 जून 2020 से शुरु हुई यह चार दिवसीय कैम्पेन इस पर केन्द्रित थी की शेयरचैट के यूज़र्स रक्तदान कर के देश के लिए अपना जुड़ाव और जिम्मेदारी प्रदर्शित करें। इस मुहिम को शेयरचैट पर बहुत अच्छी प्रतिक्रिया मिली।

लॉकडाउन के बाद आत्मनिर्भर भारत के लिए एसोचैम ने बढ़ाया हाथ

कोलकाता : एसोचैम ने हाल ही में “द बियॉन्ड द लॉकडाउन” के तहत एक वेब सम्मेलन आयोजित किया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य नीति निर्धारकों को एक ऐसी प्रभावी नीति बनाने में सहयोग देना था जिससे भारत में निवेश आकर्षित करने में मदद मिल सके। इस अवसर पर , खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव मनोज जोशी, विद्युत मंत्रालय के संयुक्त सचिव घनश्याम प्रसाद. वाणिज्य मंत्रालय के अतिरिक्त महानिदेशक, डीजीटीआर, डॉ. राजीव अरोड़ा, खनन मंत्रालय में आर्थिक सलाहकार आलोक चन्द्रा ने विचार रखे। कृषि, खाद्य प्रसंस्करण. मेक इन इंडिया के लिए भारत में अन्वेषण, स्व-विश्वसनीय पावर वैल्यू चेन: भारत की सक्षम नीति और आयात प्रतिस्थापन के लिए कार्यान्वयन के उपाय और रणनीतियों समेत कई अन्य मुद्दों पर चर्चा की गयी।
इस अवसर पर, एसोचैम के अध्यक्ष डॉ। निरंजन हीरानंदानी ने कहा, “जैसा कि दुनिया एक कठिन परिस्थिति से गुजर रही है, हम देख सकते हैं कि बहुत सारे अवसर विश्व स्तर के साथ-साथ भारत में भी उभर रहे हैं। इस संदर्भ में, भारत सरकार भारतीय अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने के लिए उपाय कर रही है और विदेशी निवेशकों को भारत को निवेश के लिए संभावित गंतव्य के रूप में देखने और व्यापार जारी रखने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए उपाय कर रही है। हम उद्योग और अर्थव्यवस्था को समर्थन देने के लिए कोविड – 19 महामारी के बीच भारत सरकार द्वारा उठाए गए समयबद्ध उपायों की सराहना करते हैं। वर्तमान क्षण भारत के लिए एक अवसर प्रदान करता है जो एक विनिर्माण-अनुकूल वातावरण बनाकर और भारत में इकाइयों की स्थापना के लिए वैश्विक खिलाड़ियों के लिए आकर्षक सौदों की पेशकश करके समृद्ध लाभांश प्राप्त कर सकता है। ” एसोचेम के महासचिव दीपक सूद ने कहा, “वर्तमान स्थिति भारत में निवेश को आकर्षित करने और मेक इन इंडिया के मिशन को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक कौशल सेट सहित प्रचुर संसाधनों की उपलब्धता के कारण भारत को एक अवसर प्रदान करती है। ” एसोचेम के सीनियर वाइस प्रेसीडेंट विनीत अग्रवाल ने कहा, “देश में अर्थव्यवस्था के लिए कठिन समय का सामना करना पड़ता है, लेकिन यह भारत में वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं को लाने और विनिर्माण अनुकूल वातावरण बनाने जैसे अवसर पैदा करता है”
महामारी के बाद आरटीई (रेडी टू ईट) और आरटीसी (रेडी टू कुक) बाजार के लिए आगामी आगामी अवसर स्थानीय और साथ ही वैश्विक खाद्य उद्योग को पूरा करने के लिए हैं। भारत से आलू के आम और खट्टे भोजन के खाद्य समूहों और फसलों की एक बड़ी निर्यात बाजार क्षमता है, जिसे टैप किया जा सकता है। साथ ही समुद्री निर्यात बढ़ रहा है। इन सुधारों की मदद से खाद्य मूल्य श्रृंखला के पिछड़े एकीकरण को बढ़ाया जाएगा। निजी क्षेत्र इन नीतियों की मदद से आपूर्ति की क्षमता निर्माण में निवेश करेगा। किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य मिलेगा। बासमती के अलावा विभिन्न प्रकार के चावल जो दुनिया के अन्य हिस्सों में लोकप्रिय हैं, स्थानीय और वैश्विक बाजार में एक अवसर है।

कोविड -19 युद्ध में आगे आये डीएफपीसीएल तथा उसकी सीएसआर फर्म इशान्य फाउंडेशन

कोलकाता : दीपक फर्टलाइजर्स एंड पेट्रोकेमिकल्स कॉरपोरेशन लिमिटेड (डीएफपीसीएल) और उसकी सीएसआर एजेन्सी इशान्य फाउंडेशन कोविड -19 की मुहिम में आगे आये हैं। कम्पनी ने महाराष्ट्र सरकार को राज्य के स्वास्थ्यकर्मियों को 2500 पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विप्मेंट (पीपीई किट), बृहन्मुम्बई म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन (बीएमसी) को 4 एम्बुलेंस, मुख्यमंत्री कार्य़ालय सह अन्य सरकारी एजेन्सियों को 1 हजार लीटर आईपीए बेस्ड सैनेटाइजर प्रदान किये। डीएफपीसीएल के कर्मचारियों ने भी महाराष्ट्र मुख्यमंत्री राहत कोष में 38.70 लाख रुपये प्रदान किये। कम्पनी ने सेना आपदा के दौरान सेना में सैनेटाइजर बनाने के लिए कच्चा माल दिया। इस अवसर पर आयोजित कार्य़क्रम में मुख्य मंत्री उद्धव ठाकरे समेत कई अन्य मंत्री मुम्बई की मेयर किशोरी पेडनेकर उपस्थित थे। इन सबने डीएफपीसीएल के प्रतिनिधियों विजय जोशी और जयश्री कटकर को धन्यवाद ज्ञापित किया। इस अवसर पर डीएफपीसीएल के चेयरमैन व प्रबन्ध निदेशक शैलेश सी मेहता ने और सहयोग करने का आश्वासन दिया। कम्पनी ने प्रवासी श्रमिकों तथा पुलिस कर्मियों को भी सहयोग दिया। अब तक 4 हजार फेस मास्क वितरित किये जा चुके हैं।

शुभ सृजन क्लब की ओर से ऑनलाइन काव्य-पाठ का आयोजन

कोलकाता : कोलकाता की साहित्यिक संस्था ‘शुभजिता’ की शाखा ‘शुभ सृजन क्लब’ की ओर से ‘ऑनलाइन काव्य-पाठ’ का आयोजन किया गया।इस पर कई कवि और कवियत्रियों ने वर्तमान समय की परिस्थितियों पर रचित कविताओं का पाठ किया। संकट के बीच इस प्रकार का सांस्कृतिक आयोजन युवाओं के लिये सृजनशील बने रहने का मार्ग प्रशस्त करता है। इस कार्यक्रम का संयोजन सुषमा कनुप्रियाऔर इसका  संचालन प्रीति साव ने किया। इस अवसर पर संगीता जायसवाल,राहुल गौड़,पंकज सिंह,मधु सिंह,निखिता पाण्डेय,प्रीति साव,पार्वती शाॅ,प्रीति कुमारी साव,संचिता सिंह,नैना प्रसाद आदि ने अपनी बेहतरीन रचनाओं की प्रस्तुति दी।कोरोना काल के समय में ऐसे कार्यक्रम हम सभी में आशा की किरण भरते हैं और आगे बढ़ने के लिये प्रोत्साहित करते हैं।कार्यक्रम का धन्यवाद ज्ञापन सुषमा कनुप्रिया ने किया।

ब्राह्मण साहित्य को जानिए

यज्ञों एवं कर्मकाण्डों के विधान एवं इनकी क्रियाओं को भली-भांति समझने के लिए ही इस ब्राह्मण ग्रंथ की रचना हुई। यहाँ पर ‘ब्रह्म’ का शाब्दिक अर्थ हैं- यज्ञ अर्थात् यज्ञ के विषयों का अच्छी तरह से प्रतिपादन करने वाले ग्रंथ ही ‘ब्राह्मण ग्रंथ’ कहे गये। ब्राह्मण ग्रन्थों में सर्वथा यज्ञों की वैज्ञानिक, अधिभौतिक तथा अध्यात्मिक मीमांसा प्रस्तुत की गयी है। यह ग्रंथ अधिकतर गद्य में लिखे हुए हैं। इनमें उत्तरकालीन समाज तथा संस्कृति के सम्बन्ध का ज्ञान प्राप्त होता है। प्रत्येक वेद (संहिता) के अपने-अपने ब्राह्मण होते हैं। ब्राह्मण ग्रन्थो से हमें परीक्षित के बाद और बिम्बिसार के पूर्व की घटनाओं का ज्ञान प्राप्त होता है। ‘ऐतरेय ब्राह्मण’ में ‘राज्याभिषेक’ के नियम दिये गये हैं। प्राचीन इतिहास के साधन के रूप में ‘वैदिक साहित्य’ में ‘ऋग्वेद’ के बाद ‘शतपथ ब्राह्मण’ का स्थान है। शतपथ ब्राह्मण में गंधार, शल्य, कैकेय, कुरू, पांचाल, कोशल, विदेश आदि राजाओं के नाम का उल्लेख है।

वेद और संबंधित ब्राह्मण
वेद सम्बन्धित ब्राह्मण
1- ऋग्वेद

ऐतरेय ब्राह्मण, शांखायन या कौषीतकि ब्राह्मण

2- शुक्ल यजुर्वेद
शतपथ ब्राह्मण

3- कृष्ण यजुर्वेद
तैत्तिरीय ब्राह्मण

4- सामवेद
पंचविंश या ताण्ड्य ब्राह्मण, षडविंश ब्राह्मण, सामविधान ब्राह्मण, वंश ब्राह्मण, मंत्र ब्राह्मण, जैमिनीय ब्राह्मण

5- अथर्ववेद
गोपथ ब्राह्मण

पृष्ठभूमि
उत्तर वैदिककाल में, जब वैदिक संहिताएँ धीरे-धीरे दुर्बोध होती चली गईं, मन्त्रार्थ-ज्ञान केवल कुछ विशिष्ट व्यक्तियों तक सीमित रह गया, उस समय यह आवश्यकता गहराई से अनुभव की गई कि वेद-मन्त्रों की विशद व्याख्या की जाय्। यही स्थिति वैदिक-यज्ञों के कर्मकाण्ड की भी थी। सुदीर्घकाल तक यागों का अनुष्ठान मौखिक ज्ञान के आधार पर ही होता रहा, लेकिन शनै:शनै यज्ञ-विधान जब जटिल और संश्लिष्ट प्रतीत होने लगा तथा स्थान-स्थान पर सन्देह और शंकाओं का प्रादुर्भाव होने लगा, तब इस सन्दर्भ में स्थायी आधार की आवश्यकता अनुभव हुई। ब्रह्मवादियों (यज्ञवेत्ताओं) के मध्य यागीय विसंगतियों के निराकरण के लिए सम्पन्न चर्चा-गोष्ठियों, परिसंवादों तथा सघन विचार-विमर्श ने ब्राह्मण-ग्रन्थों के प्रणयन का मार्ग विशेष रूप से प्रशस्त किया। किसी भी युग के साहित्य के मूल में, तत्कालीन सांस्कृतिक विचारधारा, राजनीतिक और सामाजिक सक्रियता, आस्थाओं, आदर्शों एवं मूल्यों की अभिव्यक्ति का दुर्निवार्य आग्रह स्वभावत: सत्रिहित रहता है। ब्राह्मण-साहित्य के अन्तर्दर्शन की पृष्ठभूमि में भी, निश्चित ही यह आकांक्षा निहित रही है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि वेद-मन्त्रों की सुगम व्याख्या करने, यज्ञीय विधि-विधान के सूक्ष्मातिसूक्ष्म पक्षों को निरूपित करने तथा समकालीन वैचारिक आन्दोलन को दिशा देने की भावना मुख्य रूप से ब्राह्मण ग्रन्थों के साक्षात्कार की पृष्ठभूमि में निहित रही है।

ब्राह्मण शब्द का अर्थ
मन्त्र-भाग से अतिरिक्त शेष वेद-भाग ब्राह्मण है, जैसा कि जैमिनि का कथन है-‘शेषे ब्राह्मणशब्द’।[1] माधवाचार्य तथा सायणाचार्य ने भी इसी लक्षण से सहमति व्यक्त की है।[2] कोश ग्रन्थों के अनुसार वेद-भाग का ज्ञापक ‘ब्राह्मण’ शब्द नपुंसक लिङ्ग में व्यवहार्य है।[3] इसका अपवाद केवल महाभारत का एक स्थल है, जहाँ पुल्लिंग में भी यह प्रयुक्त है।[4] ग्रन्थ के अर्थ में ‘ब्राह्मण’ शब्द का प्राचीन प्रयोग तैत्तिरीय संहिता में है।[5] पाणिनीय अष्टाध्यायी[6], निरुक्त[7] तथा स्वयं ब्राह्मण ग्रन्थों में तो एतद्विषयक पुष्कल प्रयोग दृष्टिगोचर होते हैं।[8] व्युत्पत्ति की दृष्टि से यह ‘ब्रह्म’ शब्द से ‘अण्’ प्रत्यय लगकर निष्पन्न हुआ है। इस सन्दर्भ में सत्यव्रत सामश्रमी का अभिमत है कि ‘ब्राह्मण’ शब्द से ही प्रोक्त अर्थ में ‘अण्’ प्रत्यय लगकर ‘ब्राह्मण’ शब्द बना है।[9] ‘ब्रह्म’ शब्द के दो अर्थ हैं- मन्त्र तथा यज्ञ।[10] इस प्रकार ब्राह्मण वे ग्रन्थ विशेष हैं, जिनमें याज्ञिक दृष्टि से मन्त्रों की विनियोगात्मिका व्याख्या की गई है।[11] जिन मनीषियों ने ब्राह्मणों का मन्त्रवत् प्रामाण्य स्वीकार नहीं किया है, वे भी इन्हें वेद-व्याख्यान रूप मानते हैं।[12]

श्रुतिरूपता
आचार्य आपसम्ब ने मन्त्रभाग के साथ ही ब्राह्मणभाग को भी वेद ही माना है-मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् (यज्ञपरिभाषा)। इसी का अनुसरण करते हुए शबरस्वामी पितृभूति, शंकराचार्य, भट्ट कुमारिल, भवस्वामी, देवस्वामी, विश्वरूप, मेधातिथि, कर्क, धूर्तस्वामी, देवत्रात, वाचस्पति मिश्र, राजशेखर, रामानुज, उवट, मस्करी और सायणाचार्य सहित बहुसंख्यक महान् आचार्यों और भाष्यकारों ने मन्त्र-संहिताओं के साथ ही ब्राह्मणों की भी श्रुतिरूपता पर बल दिया है।[13] पाणिनी और पतञ्जलि की भी यही अवधारणा है। इस आस्था का एक प्रमुख हेतु यह भी है कि आरण्यक और अधिकांश उपनिषद-ग्रन्थ ब्राह्मण-ग्रन्थों के ही अन्तिम भाग हैं और भारतीय दर्शनों का विशाल प्रासाद उपनिषदों की ही आधारभित्ति पर निर्मित है। ब्रह्मसूत्र, गीता और अन्य दार्शनिक सूत्रग्रन्थ पग-पग पर इनके प्रामाण्य पर अवलम्बित हैं। ऐसी स्थिति में भाष्यकर शंकराचार्य द्वारा ताण्ड्य ब्राह्मण के उद्धरण को ‘ताण्डिनां श्रुति:’ रूप में उपस्थापित करना स्वाभाविक ही था। आज भी वेदज्ञों का एक विशाल वर्ग इस मान्यता पर श्रद्धावान् दिखलाई देता है।[14]

स्वरूप और उनके प्रवचनकर्ता
ब्राह्मण-ग्रन्थों का वर्तमान स्वरूप प्रवचनात्मक और व्याख्यात्मक है। विधियों और उनके हेतु प्रभृति का निरूपण प्रवचनात्मक अंशों में है तथा विनियुक्त मन्त्रों के औचित्य का प्रदर्शन व्याख्यात्मक ढ़ग से है। दीर्घकाल तक मौखिक परम्परा से प्रचलित यज्ञीय कर्मकाण्ड का संकलन तो इनमें है ही, ब्रह्मवादियों के मध्य विद्यमान वाद-विवाद के अंशों की झलक भी यत्र-तत्र मिल जाती है। आधुनिक युग में, स्वामी दयानन्द सरस्वती और उनके आर्य समाज में दीक्षित विद्वानों ने, ब्राह्मण-ग्रन्थों को वेद न मानकर वेदव्याख्यान ग्रन्थ भर माना है। इन विचारकों की दृष्टि में, पशु-हिंसा और कहीं-कहीं यागगत अश्लील कृत्यों का उल्लेख ब्राह्मण ग्रन्थों को अपौरुषेय वेद की श्रेणी में सम्मिलित करने में बाधक है। इस विवाद में उलझे बिना भी, यह स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि मन्त्र-संहिताओं की तुलना में ये वेद नहीं, तो ‘वेदकल्प’ तो हैं ही। ब्राह्मण-ग्रन्थों को श्रुतिस्वरूप स्वीकार करने वाले मनीषियों ने संहितावत् इन्हें भी अपौरुषेय ही माना है। उनकी मान्यता है कि इनका भी साक्षात्कार किया गया। जिन व्यक्तियों के नाम इनसे सम्बद्ध हैं, वे इनके रचयिता न होकर प्रवचनकर्ता ऋषि अथवा आचार्य हैं, जिन्होंने इन्हें संप्रेषित किया। भिन्न-भिन्न ब्राह्मण-ग्रन्थों के प्रवक्ता भी पृथक्-पृथक् हैं, जिनका परिचय उन ब्राह्मण ग्रन्थों के विशिष्ट विवरण के साथ प्रदेय है। यों संक्षेप में इतना ही कहा जा सकता है कि प्रवचनकर्ताओं में से कुछ ॠषि श्रेणी के हैं और अन्य आचार्य-परम्परा के। शतपथ के प्रवचनकर्ता याज्ञवल्क्य ॠषि हैं तो ऐतरेय ब्राह्मण के प्रवक्ता महिदास आचार्य माने जाते हैं।

प्रतिपाद्य विषय
उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि ब्राह्मणग्रन्थों का मुख्य विषय यज्ञ का सर्वांगपूर्ण निरूपण है। इस याग-मीमांसा के दो प्रमुख भाग हैं- विधि तथा अर्थवाद। ‘विधि’ से अभिप्राय है यज्ञानुष्ठान कब, कहाँ और किन अधिकारियों के द्वारा होना चाहिए। याग-विधियाँ अप्रवृत्त कर्मादि में प्रवृत्त कराने वाली तथा अज्ञातार्थ का ज्ञापन कराने वाली होती हैं। इन्हीं के माध्यम से ब्राह्मणग्रन्थ कर्मानुष्ठानों में प्रेरित करते हैं, जैसा कि आपस्तम्ब का यज्ञपरिभाषा[15] में कथन है-‘कर्मचोदना ब्राह्मणानि’। विधि का स्तुति और निन्दारूप में पोषण तथा निर्वाह करने वाले ब्राह्मणगत अन्य विषय अर्थवाद कहलाते हैं अर्थवादपरक वाक्यों में यज्ञनिषिद्ध वस्तुओं की निन्दा तथा यज्ञोपयोगी वस्तुओं की प्रशंसा रहती है। इस प्रकार के वाक्यों की विधि-वाक्यों के साथ ‘एकवाक्यता’ का उपपादन मीमांसकों ने किया है-विधिना तु एकवाक्यत्वात् स्तुत्यर्थेन विधीनां स्यु:[16] उनके अनुसार विधि और अर्थवाद वचनों के मध्य परस्पर शेषशेषिभाव अथवा अङ्गाङिगभाव है। अत: शबरस्वामी के मतानुसार वस्तुत: विधियाँ ही अर्थवादादि के रूप में ब्राह्मण ग्रन्थों में दस प्रकार से व्यवह्रत हुई हैं-
हेतुर्निर्वचनं निन्दा प्रशंसा संशयो विधि:।
परक्रिया पुराकल्पो व्यवधारणकल्पना॥
उपमानं दशैवैते विधयो ब्राह्मणस्य तु।
एतद्वै सर्ववेदेषु नियतं विधिलक्षणम्[17]
इनका सोदाहरण स्पष्टीकरण इस प्रकार है-

हेतु
कर्मकाण्ड सम्बन्धी किसी विशिष्ट विधि की पृष्ठभूमि में निहित कारणवत्ता का निर्देश, यथा ‘तेन ह्यन्नं क्रियते'[18], अर्थात् सूप से होम करना चाहिए, क्योंकि उससे अन्न को तैयार किया जाता है।

निर्वचन
व्युत्पत्ति के माध्यम से याग में प्रयोज्य पदार्थ की सार्थकता का निरूपण, यथा-तद्दध्नो दधित्वम्[19] यही दही का दहीपन है।

निन्दा
किसी अप्रशस्त वस्तु की निन्दा कर याग में उसकी अनुपादेयता का प्रतिपादन करना; यथा-‘अमेध्या वै माषा:'[20] उड़द यज्ञ की दृष्टि से अनुपादेय है।

प्रशंसा
वायु के निमित्त क्यों यागानुष्ठान किया जाय, इसका प्रतिपादन इस रूप में किया गया है कि वायु शीघ्रगामी देवता है-वायुर्वै क्षेपिष्ठा देवता।[21]

संशय
इसका तात्पर्य है सन्देह, जैसे यजमान के भीतर यह सन्देह उत्पन्न हो जाए कि मैं होम करूँ कि नहीं? तदव्यचिकित्सज्जुहुवानी इमा हौषादूम्।[22]

विधि
औदुम्बरी (गूलर की वह शाखा, जिसके नीचे बैठकर उदगातृमण्डल सामगान करता है) कितनी बड़ी होनी चाहिए, इस विषय में यह विधान मिलता है कि वह यजमान के परिमाण (नाप) की होनी चाहिए-यजमानेन सम्मिता औदुम्बरी भवति।[23]

परकृति
इसका अभिप्राय है दूसरे का कार्य, यथा-माषानेव मह्यं पचति[24] वह मेरे लिए उड़द ही पकाता है।

पुराकल्प
तात्पर्य है पुराना आख्यान, जैसे-पुरा ब्राह्मणा अभैषु:[25] प्राचीन काल में ब्राह्मण डर गये।

व्यवधारणकल्पना
अभिप्राय है विशेष प्रकार का निश्चय करना। इसका उदाहरण है कि जितने घोड़ों का प्रतिग्रह करे, उतने ही वरुणदेवताक चतुष्कपालों से याग करे-यावतोऽश्वान् प्रतिगृह्णीयात्तावतो वरुणान् चतुष्कपालार्न्निवपेत्।[26]

उपमान
शबरस्वामी ने यद्यपि इसका उदाहरण नहीं दिया है, तथापि छान्दोग्य उपनिषद[27] के इस अंश को प्रस्तुत किया जा सकता है-
स यथा शकुनि: सूत्रेण प्रबद्धो दिशं दिशं पतित्वा अन्यत्रायतनमलब्ध्वा बन्धनमेवोपश्रयते, एवमेव खलु सोम्य! तन्मनो दिशं दिशं पतित्वाऽन्यत्रायतन्मलब्ध्वा प्राणमेवोपश्रयते, प्राणबन्धनं हि सोम्य! मन इति।
-हे सोम्य! जैसे धागे से बँधा हुआ पक्षी हर दिशा की ओर जाकर और अन्यत्र आश्रय न पाकर बन्धन का अवलम्ब लेता है; इसी प्रकार से है सोम्य! यह मन विभिन्न दिशाओं में भटकने के बाद वहाँ, आश्रय न पाकर इस प्राण का अवलम्बन ग्रहण करता है। हे सोम्य! मन का बन्धन प्राण है।

विधि और अर्थवाद-वाक्यों की एकवाक्यता को स्पष्ट करने के लिए ताण्ड्य महाब्राह्मण से एक उदाहरण प्रस्तुत है- षष्ठ अध्याय के सप्तम खण्ड में अग्निष्टोमानुष्ठान की प्रक्रिया में बहिष्पवमान स्तोत्र के निमित्त अध्वर्यु की प्रमुखता में उद्गाता प्रभृति पाँच ॠत्विजों के सदोमण्डप से चात्वाल-स्थान तक प्रसर्पण का विधान है-बहिष्पवमानं प्रसर्पन्ति। इस प्रसर्पण के सन्दर्भ में दो नियम विहित हैं- क्वाण (मृदुपदन्यासपूर्वक) प्रसर्पण तथा वाङनियमन्। साथ ही पाँचों ॠत्विजों-अध्वर्यु, प्रस्तोता, उद्गाता, प्रतिहर्ता तथा ब्रह्मा के एक दूसरे के पीछे इसी क्रम से पंक्तिबद्ध होकर चलने का विधान है, क्योंकि यह पंक्ति है।[28] वहीं इन नियमों के पालन से यज्ञ की शान्ति बनी रहने, और अन्य लाभों तथा हेतुओं का उल्लेख है। नियमों का पालन न करने से अनेकविध अनर्थों की सम्भावना भी उल्लिखित है। इस प्रकार ब्राह्मण-ग्रन्थों में यागानुष्ठान की विभिन्न विधियों के निरूपण में प्रशंसा और निन्दा ही नहीं, उनके औचित्य-बोधक हेतु भी दिये गये हैं। उदाहरणार्थ अग्निष्टोम याग के ही प्रसंग में ताण्ड्य-ब्राह्मण में उद्गाता के द्वारा सदोमण्डप में औदुम्बरी[29] के उच्छ्रयण का विधान करते समय कहा गया है कि प्रजापति ने देवों के निमित्त अर्क् का जो विभाजन किया, उसी से उदुम्बर की उत्पत्ति हुई। अत: उदुम्बर वृक्ष प्रजापति से सम्बद्ध है और उद्गाता का भी उससे सम्बन्ध है, इसलिए जब वह औदुम्बरी का उच्छ्रयण रूप प्रथम कृत्य करता है, तब वह उसी प्रजापति नाम्नी अधिष्ठात्री दैवी शक्ति के द्वारा अपने को आर्त्विज्य-हेतु वरण कर लेता है। इसी प्रसंग में द्रोणकलशप्रोहण, जिस कृत्य के अन्तर्गत द्रोणकलश में सोम रस चुराकर रथ के नीचे रखा जाता है, का समर्थन एक आख्यायिका के द्वारा किया गया है। तदनुसार प्रजापति ने अनेक होने के लिए सृष्टि-कामना की। सृष्टिविषयक विचार करते ही उनके मस्तक से आदित्य की उत्पत्ति हुई। आदित्य ने स्वयं उत्पन्न होने के लिए प्रजापति के शिर को छिन्न कर दिया। वह छिन्न-भिन्न मूर्द्धा ही द्रोणकलश हो गया, जिसमें देवों ने शुभ्रवर्ण के चमकते हुए सोमरस को ग्रहण किया।[30] इस आख्यायिका के माध्यम से द्रोणकलश और तत्रस्थ सोमरस में सर्जनाशक्ति से ओतप्रोत श्रेष्ठ मानसिक सामर्थ्य के अस्तित्व का उपपादन किया गया है।

इस प्रकार विधि-निर्देश के समानान्तर ही ब्राह्मण-ग्रन्थ उनकी उपयुक्तता भी विभिन्न प्रकार से बतला देते हैं। इस सन्दर्भ में यागों, उनकी अनुष्ठान-विधियों, द्रव्यों, सम्बद्ध देवों और विनियुक्त मन्त्रों का छन्द आदि के द्वारा औचित्य-निरूपण करते समय ब्राह्मण-ग्रन्थों के रचयिता मानवीय भावनाओं और मनोविज्ञान का सदैव ध्यान रखते हुए यजमान के सम्मुख उस कृत्य विशेष के अनुष्ठान से होने वाली लाभ-हानि का यथावत् विवरण प्रस्तुत करने का प्रयत्न करते हैं। अग्निष्टोम याग का अनुष्ठान व्यक्ति क्यों करें? उससे क्या लाभ हो सकता है? इसे जाने बिना व्यक्ति मानवीय स्वभाव के अनुसार यज्ञ में प्रवृत्त ही नहीं हो सकता। इस बिन्दु पर ब्राह्मणग्रन्थ उसे आश्वस्त कर देते हैं कि यह वस्तुत: समस्त फलों का साधन होने के कारण मुख्य है, इसके विपरीत अन्य याग एक-एक फल देने वाले हैं, इसलिए अग्निष्टोम के अनुष्ठान से समस्त फल प्राप्त होते हैं।[31] इस सामान्य निर्देश के अनन्तर विस्तार से यह बतलाया गया है कि इसके अनुष्ठान से पशु-समृद्धि, ब्रह्मवर्चस्-प्राप्ति आदि पृथक्-पृथक् फलों की प्राप्ति भी हो सकती है।

जहाँ तक विभिन्न यज्ञ-कृत्यों में विनियुक्त मन्त्रों के औचित्यप्रदर्शन की बात है, ब्राह्मणग्रन्थ उस बिन्दु के अनावरण का पूर्ण प्रयत्न करते हैं, जिसके कारण उस मन्त्रविशेष का किसी कृत्यविशेष में विनियोग किया गया है। ब्राह्मण-ग्रन्थों की पारिभाषिक शब्दावली में यह रूप-समृद्धि कहलाती है। रूप-समृद्धि, जिसका स्थूल अभिप्राय क्रियमाण कर्म के साथ विनियुक्त मन्त्र का अत्यन्त घनिष्ठ सम्बन्ध है, से स्वयं यज्ञ समृद्ध होता है।[32] इस प्रकार रूप-स्मृद्धि का वास्तविक तात्पर्य तत्तत् विशिष्ट कृत्य के सन्दर्भ में विनियुक्त मन्त्र की सार्थकता का प्रदर्शन है। जहाँ सीधे विनियुक्त स्तोत्रिया के अर्थ से औचित्य की प्रतीति नहीं हो पाती, वहाँ ब्राह्मणग्रन्थ मन्त्रगत देवों से कृत्य को सम्बद्ध करते हैं। उदाहरण के लिए किसी दीर्घरोगी की रोग-निवृत्ति के लिए[33] में ‘आ नो मित्रावरुणा घृतैर्गव्यूतिमुक्षतम्। मध्वा रजांसि सुक्रतू'[34] मन्त्र का विनियोग है। आपातत: इस ऋक् के अर्थ से रोग-निवृत्ति का सम्बन्ध प्रतीत नहीं होता है, किन्तु यहाँ भी प्रकारान्तर से सम्बन्ध निरूपित है। ताण्ड्य ब्राह्मणकार का कथन है कि दीर्घरोगी के प्राण और अपान अपक्रान्त हो जाते हैं, जबकि प्राण और अपान की समान स्थिति पर ही आरोग्य निर्भर है। प्राण और अपान की तथाकथित समस्थिति मित्र और वरुण की अनुकूलता पर अवलम्बित है, क्योंकि इन दोनों से उनका घनिष्ठ सम्बन्ध है। प्राणापान वस्तुत: अहोरात्ररूप है और दिन के देव मित्र है तथा रात्रि के वरुण। इन दोनों के आनुकूल्य अर्जुन से शरीर में प्राण और अपान की यथावत् स्थिति बनी रहती है। अत: दीर्घरोगी की रोग-निवृत्ति के सन्दर्भ में उपर्युक्त ऋक् का गान सर्वथा उपयुक्त है। इनके साथ ही ब्राह्मणग्रन्थों में निरुक्तियाँ और आख्यायिकाएं भी पुष्कल परिमाण में प्राप्त होती हैं।

(साभार – भारतकोश)

कोलकाता में बिक रहा है 15 मसालों से निर्मित ‘इम्युनिटी संदेश’

कोलकाता : कोरोना वायरस महामारी से जूझ रही पूरी दुनिया में इस वक्त लोग इम्युनिटी यानी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए अपने खानपान में कई चीज़ों को शामिल कर रहे हैं. भारत में भी इम्युनिटी बढ़ाने को लेकर काफी चर्चा हो रही है. सरकार ने भी अपनी तरफ से उन उपायों को बताया है, जिससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाया जा सके. लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि किसी मिठाई से भी आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ सकती है.
दरअसल पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में मिठाई की एक दुकान में इम्युनिटी बढ़ाने की मिठाई बेची जा रही है. इस मिठाई को ‘इम्युनिटी संदेश’ नाम दिया गया है. कोरोना वायरस के दौर में लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने का दावा करने वाली इस एक मिठाई की कीमत 25 रुपये रखी गयी है. ‘इम्युनिटी संदेश’ दुकान के मालिक का कहना है, “रोग प्रतिरोधक क्षमता ही एकलौता वो रास्ता है, जिससे में कोरोना वायरस से लड़ सकते हैं. अभी तक इसकी कोई वैक्सीन नहीं आई है. इसलिए हम इस मिठाई को लेकर आए हैं. इसे 15 अलग अलग तरह के मसालों से बनाया गया है. हर संदेश (मिठाई) की कीमत 25 रुपये है.” आपको बता दें कि इससे पहले डेयरी उत्पाद बनाने वाली कंपनी अमूल ने लोगों की इम्युनिटी बढ़ाने के मकसद से बाज़ार में हल्दी, तुलसी और अदरक वाला रेडी टू ड्रिंक दूध उतारा था।

ढाई महीने के बाद खुला कलकत्ता उच्च न्यायालय

कोलकाता : कलकत्ता उच्च न्यायालय में गुरुवार को ढाई महीने के बाद सामान्य कामकाज बहाल हुआ। कोरोना वायरस के संकट को देखते हुए उच्च न्यायालय बंद था। मुख्य न्यायाधीश टी. बी. एन. राधाकृष्णन और अन्य पीठों के समक्ष कुछ मामलों की सुनवाई हुई, जिस दौरान कुछ वकील मौजूद रहे। महामारी को देखते हुए सुरक्षा मुद्दों का हवाला देते हुए कलकत्ता उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन ने निर्देश के कारण अधिकतर वकील अदालत में सुनवाई के लिए नहीं आ रहे हैं। कोविड-19 महामारी के कारण वकील उजले कमीज और उजले कॉलर बैंड के नये ड्रेस में उपस्थित हुए। प्रवेश द्वारों पर वकीलों, वादी और अदालत के कर्मचारियों के शरीर का तापमान मापने के लिए थर्मल स्कैनर का प्रयोग किया गया। अदालत से आने-जाने के लिए उच्च न्यायालय के अधिकारियों ने सरकारी बसों का इंतजाम किया है।

स्कंद पुराण में उल्लेख है रहस्यमयी रंग बदलने वाली लोनार झील का

महाराष्ट्र के बुलढाना जिले में स्थित लोनार नामक जगह पर एक झील है जिसे लोणार सरोवर कहते हैं। हाल ही में इसका पानी नीले से गुलाबी रंग में बदल गया है। आओ जानते हैं कि क्यों रहस्यमयी मानी जाती है लोनार झील , ऋग्वेद और स्कंद पुराण से लोनार का संबंध क्या है और लोनार लेक का इतिहास क्या है जानिए इस झील के बारे में 5 खास बातें।

1. उल्का पिंड से बनी झील : वैज्ञानिक कहते हैं कि यह झील एक उल्कापिंड के धारती से टकराने से बनी है। अनुमानित रूप से यह 10 लाख टन वजनी उल्कापिंड 22 किलोमीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से धरती से टकराई थी जिसके चलते 10 किलोमिटर के क्षेत्र में धूल का गुब्बार छा गया था। जब यह धरती से टकराई तो 18000 डीग्री तापमान उत्पन्न हुआ जिसके कारण उल्का जलकर खाक हो गई और यहां 150 मीटर गहरा गोल गड्ढा बन गया। लोनार झील 5 से 8 मीटर तक खारे पानी से भरी हुई है।
2. कितनी पुरानी है झील : 2010 से पहले माना जाता था कि यह झील 52 हजार साल पूरानी हैं लेकिन हालिया हुए शोध के अनुसार यह झील लगभग 5 लाख 70 हजार वर्ष पुरानी है। इसकी गहराई करीब 150 मीटर बताई जाती है और इसका व्यास 1.2 किलोमीटर है। हालांकि कुछ वैज्ञानिकों का अभी भी मानना है कि यह झील 35-50 हजार वर्ष पूरानी है।
3. हिन्दू शास्त्रों में जिक्र : इस झील का हिन्दू वेद और पुराणों में भी जिक्र होना बताया जाता है। कहते हैं कि इसका ऋग्वेद, स्कंद पुराण और पद्म पुराण में जिक्र है। इस झील के संबंध में स्कंद पुराण में एक कथा मिलती है कि इस क्षे‍त्र में कभी लोनासुर नामक एक असुर रहता था जिसके अत्याचार से सभी दु:खी थे। देवतानों ने भगवान विष्णु से लोनासुर के आतंक से मुक्ति की विनति की तो भगवान विष्णु ने एक सुंदर युवक उत्पन किया और उसका नाम दैत्यसुदन रखा। दैत्यसुदन ने पहले लोनासुर की दोनों बहनों को अपने प्रेमजाल में फांस और फिर उनकी मदद से उस एक मांद का मुख्यद्वार खोल दिया, जिसमें लोनासुर छिपा बैठा था। दैत्यसुदन और लोनासुर में भयंकर युद्ध हुआ और अंतत: लोनासुर मारा गया। वर्तमान में लोनार झील लोनासुर की मांद है और लोनार से लगभग 36 किमी दूर स्थित दातेफाल की पहाड़ी में उस मांद का ढक्कन स्थित है। पुराण में झील के पानी को लोनासुर का रक्त और उसमें मौजूद नमक को लोनासुर का मांस बताया गया है।
4. अजीब कुआं : इस झील के पास एक कुआँ मौजूद है जिसके आधे हिस्से का पानी खारा और आधे का मीठा है। इसी कारण इसे सास-बहु का कुआं भी कहते हैं। यह भी
कहा जाता है कि लोणासुर का वध करने के चलते उसका रक्त भगवान के अंगुठे में लग गया था जिसे हटाने के लिए भगवान ने यहां अंगुठा रगड़ा जिससे यह गड्डा बन गया जो अब कुएँ के रूप में विद्यमान है।
5. झील के पास है कई प्राचीन मंदिर : इस झील के आसपास चारों ओर ऊंचे ऊंचे पहाड़ है। पहाड़ों पर चढ़ने के बाद उतरकर इस झील के पास जाने के लिए करीब आधा किलोमीटर का रास्ता तय करना होता है फिर इस झील के किनारे पहुंचा जाता है। इस झील के तट पर शिवजी का एक प्राचीन मंदिर है। पहड़ा पर चड़ने और उतरने के रास्ते के बीच में कई प्राचीन मंदिर और खंडहर हमें मिलेंगे जिसने के बारे कहा जाता है कि यह एक हजार वर्ष पूर्व यादव राजाओं ने बनवाए थे।
यहाँ स्थित मंदिर भगवान सूर्य, शिव, विष्णु, दुर्गा और नृसिंह भगवान को समर्पित हैं। कहते हैं कि यह प्राचीनकाल में कई ऋषि मुनियों की तपोभूमि की रही है। पर्यटन की दृष्टि से यह एक हिन्दू धार्मिक स्थल है।
(साभार – वेबदुनिया में प्रकाशित अनिरुद्ध जोशी का आलेख)