कोलकाता : आयुर्वेद भारत की प्राचीन और कारगर उपचार पद्धति है। कोरोना काल में इसका प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखायी पड़ा। इसे और बड़े फलक पर ले जाने के लिए हाल ही में आयुष मंत्रालय द्वारा ग्लोबल आयुषमेला आयोजित हुआ और इस आयोजन में ऐसोचेम ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। विशेषज्ञों ने इस बात को स्वीकार किया कि “ग्लोबल आयुषमेला” में कहा कि कोरोना आयुर्वेद और योग आदि की प्रभावकारिता और प्रासंगिकता को प्रदर्शित करने के लिए भेष में एक आशीर्वाद साबित हुआ है। पूरी दुनिया को आधुनिक समय जो अब नई रोशनी में देखने लगा है।
एसोचैम ने भारत सरकार, आयुष मंत्रालय, भारत को ‘ग्लोबल आयुषमेला’ आयोजित करने के लिए, एक तीन दिवसीय आभासी एक्सपो का आयोजन करने के लिए, एक मंच योग्य हिस्सेदारी धारकों को नेटवर्क प्रदान करने, शिक्षा को प्रोत्साहित करने और उद्योग के नेताओं को सम्मानित करने के लिए भागीदारी की । तीन दिवसीय कार्यक्रम में सरकार, उद्योग और शिक्षाविदों के प्रमुख व्यक्तित्वों और विशेषज्ञों का एक समूह शामिल जिसने पैनल चर्चा, व्याख्यान और प्रासंगिक विषयों पर बातचीत की। ऐसोचेम द्वारा संकलित ‘उत्तर पूर्व के लिए ग्रामीण विकास के लिए औषधीय पौधे ’नामक एक शोध रिपोर्ट प्रधानमंत्री कार्य़ालय के राज्य मंत्री तथा प्रमुख अतिथि डॉ. जितेंद्र सिंह, प्रधानमंत्री कार्यालय को प्रदान की गयी। आयुष मंत्रालय के सचिव राजेश कोटेचा ने इस अवसर पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि
आयुर्वेदिक प्रतिरक्षा बढ़ाने के क्षेत्र में भारत का गढ़ हमें वर्तमान और भविष्य की मांगों को पूरा करने के लिए एक मजबूत स्थिति में रखता है। सरकार विभिन्न योजनाओं के माध्यम से इस उभरते उद्योग की वृद्धि का समर्थन कर रही है और 4000 करोड़ की घोषणा की गयी है, जो आयुष्मान क्षेत्र के लिए विशेष रूप से औषधीय पौधों के लिए आत्मानिर्भव्य के तहत घोषित की गयी है। ”“औषधीय पौधों की 10 लाख हेक्टेयर की खेती जल्द ही एक वास्तविकता होगी और आयुष क्षेत्र के विकास में सहायता के लिए स्टार्टअप इन्क्यूबेशन सेंटर होंगे। अगले छह महीने में देश में पाँच ऐसे इन्क्यूबेशन सेंटर आएंगे। साथ ही, इस क्षेत्र में पूरे देश में 68 शोध अध्ययन किए जा रहे हैं। ये सभी मंत्रालय और सरकार की ओर से दायर अपनी सही जगह देने की प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं। आयुष में बढ़ती दिलचस्पी के साथ, अब निजी खिलाड़ियों सहित सभी साझेदारों के लिए एक साझा आम सपने की दिशा में काम करने का समय है, जो देश में और उससे आगे की वृद्धि आयु है।
पंतजलि विश्वविद्यालय के उप कुलपति आचार्य बालकृष्ण ने कहा, ‘आज हम सीधे तौर पर एक करोड़ से अधिक परिवारों के साथ जुड़े हुए हैं और विभिन्न तरीकों से कुल मिलाकर 50 करोड़ से अधिक लोगों तक पहुँच चुके हैं। ये सभी स्थापित चीजें हैं इसलिए मैं सभी से हमारे पारंपरिक ज्ञान और दवाओं से अधिकतम लाभ प्राप्त करने का अनुरोध करता हूँ। ”
“अब लोगों ने कोरोनिल को एक निवारक दवा के रूप में और एक सुरक्षा कवच के रूप में भी स्वीकार कर लिया है। मुझे यह साझा करने में खुशी हो रही है कि प्रसिद्ध अणु अंतरराष्ट्रीय पत्रिका ने कोरोनिल शोध कार्य को स्वीकार कर लिया है और एक या दो दिन में उनकी वेबसाइट पर प्रकाशित होगा। इससे न केवल कोरोनिल बल्कि इसके पीछे जाने वाले व्यापक शोध कार्य को और अधिक स्वीकृति मिलेगी। ” उसने जोड़ा।
भारतीय चिकित्सा और होम्योपैथी की भारतीय प्रणालियों की सार्वभौमिक अच्छाई और लाभों के बारे में बात करते हुए, डॉ। निरंजनहिरनंदानी, अध्यक्ष एसोचैम ने कहा, “आयुर्वेद और प्रतिरक्षा कोरोनोवायरस के साथ लड़ाई के लिए एक शाखा है। हमें एक समग्र अनुमोदन की आवश्यकता है।
ग्लोबल आयुष मेला के आयोजन में एसोचेम ने की आयुष मंत्रालय की मदद
एसोचेम देगा रियल एस्टेट और ग्रीन बिल्डिंग सेक्टर में पुरस्कार
कोलकाता : एसोचेम और केन्द्रीय आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय के साथ अनूठी पहल की है। भारत के शीर्ष उद्योग निकाय ने भारत के पहले रियल्टी एंड सस्टेनेबिलिटी कंफ्लुएंस एंड अवार्ड्स 2020 की घोषणा की है, जो रियल एस्टेट कम्पनियों तथा पेशेवरों के योगदान को पहचानने के लिए है। 27 नवम्बर से 3 दिसम्बर 2020 तक 7 दिनों का लंबा मेगा प्लेटफॉर्म उन कुछ प्रमुख मुद्दों पर भी ध्यान केंद्रित करेगा जो इन क्षेत्रों में दिक्कतों का सामना कर रहे हैं और विभिन्न महत्वपूर्ण मामलों पर विचार-विमर्श करने के लिए हितधारकों, नीति निर्माताओं और उद्योग के नेताओं को एक वैश्विक मंच प्रदान करेंगे। रियल एस्टेट क्षेत्र की वृद्धि और स्थिरता के लिए।
एसोचेम के अध्यक्ष डॉ. निरंजन हीरनंदानी ने इस पहल की घोषणा करते हुए बताया कि कोविड -19 से पहले, अचल संपत्ति के बुनियादी ढांचे पट्टे पर देने वाली गतिविधि, नयी परियोजनाओं की शुरुआत, उपलब्ध पूंजी और बाजार की मजबूत मांग के साथ मजबूत थे। महामारी के कारण, रियल एस्टेट क्षेत्र भी बुरी तरह प्रभावित हुआ है। काम की कमी के कारण अपने गृहनगर में श्रम का प्रवासन भी अर्थव्यवस्था पर इसका प्रभाव पड़ा और अचल संपत्ति में भावनाओं को प्रभावित किया। हालांकि, हाल ही में अर्थव्यवस्था के फिर से खोलने के कारण, रियल्टी क्षेत्र ने भी पुनरुद्धार की प्रक्रिया शुरू कर दी है। ”एसोचेम के महासचिव दीपक सूद ने कहा, “भारत में रियल एस्टेट सेक्टर 2030 तक 1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है। 2025 तक, यह देश की जीडीपी में 13 प्रतिशत का योगदान देगा। इस क्षेत्र के विकास को आगे बढ़ाने के लिए हितधारकों के लिए इस तरह एक मंच पर आना महत्वपूर्ण है। मेरा दृढ़ता से मानना है कि इस क्षेत्र में बहुत सी नौकरियों का उत्पादन करने और हमारी अर्थव्यवस्था को आवश्यक गति प्रदान करने की क्षमता है। ”जेम एसोचेम, नारेडको.सीबीआरई और हीरानंदानी ग्रुपहावे जैसे विभिन्न शीर्ष संगठनों ने समय पर पहल के लिए हाथ मिलाया।
डॉ. बी. बी. सिंह को मिलेगा ग्लोबल टीचर अवार्ड 2020
कोलकाता : महानगर के आदर्श हिन्दी हाई स्कूल, खिदिरपुर. उच्च माध्यमिक के हेडमास्टर डॉ. बृज भूषण सिंह को 2020 का ग्लोबर टीचर अवार्ड प्रदान किये जाने की घोषणा की गयी है। डॉ. सिंह को सारी दुनिया के 110 देशों की सूची से चुने गये शिक्षकों में शामिल हैं, जिनको यह सम्मान मिलेगा।

ए के एस एडुकेशन अवार्ड्स द्वारा दिया जाने वाले इस पुरस्कार का तीसरा संस्करण आगामी 22 नवम्बर को आयोजित होगा। गौरतलब है कि डॉ. सिंह को एनसीसी में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए भी सराहना मिलती रही है। इस ऑनलाइन पुरस्कार समारोह का सोशल मीडिया माध्यमों पर प्रसारण होगा और लाइव स्ट्रीमिंग होगी।
ज्योतिषी भाग्य वक्ता होता है, भाग्य विधाता नहीं
मुम्बई की रहने वाली सुनीता सुराना एक साथ कई क्षेत्रों मे सक्रिय हैं। वे नेचुरोपैथी डॉक्टर और ज्योतिषी हैं मगर उनको रसोई और ग्राफिक्स दोनों का शौक है। युग्म ऐस्ट्रो कन्सल्टेंसी और क्रेजी फॉर चॉकलेट्स की प्रमुख सुनीता सुराना से शुभजिता की बातचीत हुई, पेश हैं प्रमुख अंश –
अपने बारे में बताइये?
मेरा नाम सुनीता सुराना है। मैं एक नेचुरोपैथी डॉक्टर हूँ। 9 साल से ज्योतिष और वास्तुशास्त्र का अभ्यास कर रही हूँ।
आप ज्योतिषी हैं, यहाँ महिलाएं कम हैं, आपका अनुभव कैसा रहा?
सही है ज्योतिष के क्षेत्र में महिलाएं बहुत काम हैं। हालांकि टैरो कार्ड्स पढ़ने के क्षेत्र में बहुत महिलाएं हैं पर वैदिक ज्योतिष और वास्तु के क्षेत्र में महिलाएं कम दिखती हैं। बतौर महिला इस क्षेत्र में मुझे अपनी पहचान बनाने में वक़्त लगा लेकिन सटीक भविष्यवाणी एवं लोगो की समस्याओं के प्रति सफतापूर्वक किए गए बदलावों ने रास्ते सुगम बना दिए।
वास्तु और कुंडली एक दूसरे की पूरक हैं।
ज्योतिष में विज्ञान और अन्ध विश्वास को लेकर संशय है?
अंकशास्त्र भी कहीं कहीं पर व्यक्ति को पहचानने में मदद करता है। पर मेरा अनुभव कुंडली और वास्तु को एक साथ लेकर चलने में सटीक रहा। कभी कभी एक दूसरे के अभाव में भविष्यवाणी सही नहीं बैठती। यह सत्य है कि आज भी कुछ लोग ज्योतिष को अन्धविश्वास मानते हैं। पर मैं अपने अनुभव से यह दावे के साथ कह सकती हूं कि यह सत्य है। सही गणना करने पर मनुष्य के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन किए जा सकते हैं। उनकी तकलीफों को कम किया जा सकता है।
ज्योतिष क्या भाग्यवाद सिखाता है?
ज्योतिषी भाग्य वक्ता होता है भाग्य विधाता नहीं। एक सुयोग्य ज्योतिषी जीवन के अंधेरे रास्तों में रोशनी डाल सकता है। आने वाली समस्याओं से अवगत करा कर आपको उनसे लड़ने की क्षमता प्रदान करता है।
आप किस तरह से काम करती हैं और कौन सी पद्धति आपको प्रिय है?
एक सफल ज्योतिषी बनने के लिए ध्यान यानी मेडिटेशन अहम भूमिका निभाता है। सुबह 5 बजे ध्यान लगाना मैं कभी नहीं भूलती। यही वजह है कि अपने कार्य के साथ साथ अपनी रुचि जैसे खाना पकाना और ग्राफिक्स डिजाइनिंग को भी समय दे पाती हूं जो मुझे खुशी देता है या यूँ कहें स्वयं से मिलवाता है। सुकून मिलता है।
आपकी भावी योजना क्या है?
इतने वर्षों के कार्य के बाद एक इच्छा ने जन्म लिया है कि हमारे भारत देश में कोई भी व्यक्ति वास्तु की जानकारी के अभाव में किसी तकलीफ में ना रहे। मैं सभी भाई बहन को उनके जीवन की प्राथमिक वास्तु से जुड़ी समस्याओं से दूर करना चाहती हूं।
आपकी भावी योजना क्या है?
मैं शुभजिता के सभी पाठकों से निवेदन करना चाहती हूँ अपने जीवन की मूल समस्या को ढूंढ कर उसका निवारण करें न किउसके साथ रहने की आदत डालें। अगर आपको समस्या पता है तो उसका निवारण भी है। उसे ढूंढे और खुशहाल जीवन व्यतीत करें।
हम सब भारतीय हैं, हिन्दुस्तानी हैं, यह याद रखना ही एकमात्र समाधान हैं…हमारी समस्याओं का
गलतियों से सीखना बहुत जरूरी होता है मगर ऐसा लगता है कि टीआरपी, राजनीति और अपने फायदे के चक्कर में यह बात सब भूलते जा रहे हैं। मानसिक जड़ता ऐसी है कि डिग्री और कलम दोनों पर भारी पड़ रही है। मजहब जब इन्सानियत पर भारी पड़ने लगे तो समझ जाना जानिए कि कहीं न कहीं कुछ गलत हो रहा है। दुर्भाग्य यह है कि नेता तो नेता, साहित्यकार और संवेदनशील माने जाने वाले भी नफरत की आँधी में बहे जा रहे हैं। मुनव्वर साहब ने जिस तरह सिर कलम करने वालों का समर्थन किया है.,..उसे देखकर नाथूराम गोडसे को सही बताने वालों का पक्ष मजबूत हो रहा है जबकि गलत तो दोनों हैं। क्या हो गया है…गंगा – जमुना जैसे जुमले सही मायनों में जुमले ही हैं…मगर दूर – दूर भी इन्सानों की तरह तो रहा ही जा सकता है। लगातार उकसाने वाली हरकतें, चाहें जिधर से भी हों…नुकसान इस देश को ही पहुँचा रही है। ऐसे में अगर आपके आस – पास इस तरह के कट्टरपन्थी हैं तो नागरिक के रूप में आपकी जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। तमाम साजिशों को तोड़ने के लिए उस आम आदमी का उठना बहुत जरूरी है क्योंकि उसे शान्ति चाहिए, विकास चाहिए..एक अच्छा भविष्य चाहिए और युद्ध का उन्माद या नफरत की आँधी यह सब नहीं दे सकती। ये आम आदमी ही है जो कट्टरपंथियों के हाथ से इस देश को छुड़ाएगा…सलमान गलत करे तो रहीम को रोकना होगा…राजन गलत करे तो राम को रोकना होगा…देखिए, अपने आस – पास और कदम उठाइए क्योंकि दाँव पर किसी सियासत, धर्म या मजहब का नहीं, आपका भविष्य लगा है। इतिहास गवाह है कि किसी भी युद्ध में किसी नेता या शासक या विरोधियों का कुछ नहीं गया, दाँव पर आम आदमी के घर लगे हैं….खून उसका बहा, घर उसके जले हैं…तो यह बहुत जरूरी है कि अब आम आदमी हस्तक्षेप करे…और अपने घर से उठने वाले गलत हाथों को नीचे गिरा दे….और मजहब के नाम पर सियासत करने वालों की चालों को नाकाम कर दे। रोटी – बेटी का सम्बन्ध हो तो दिल से हो, किसी को उकसाने के लिए या नीचा दिखाने के लिए न हो…जब तक मानसिक तौर पर हम इसे स्वीकार नहीं कर पाते…कम से कम तब तक एक अच्छे पड़ोसी की तरह तो रह ही सकते हैं क्योंकि हर तकलीफ में काम तो सबसे पहले पड़ोसी ही आता है। क्या जरूरत है कि सीता को सलमा या रुकसाना को रीता बनाकर दिखाया जाए. क्या जरूरत है कि कि रवि को रहीम बनाने पर इज्जत मिले या इकबाल को इशान बनना ही पड़े….कोई जरूरत नहीं है। हम जैसे हैं,….वैसे ही स्नेह से एक दूसरे के साथ रह सकते हैं औऱ यह बात कोई और नहीं, आम आदमी ही समझाएगा। भूल जाइए कि आप किस धर्म या मजहब के हैं…बस एक बात याद रखिए कि हम सब भारतीय हैं…हिन्दुस्तानी हैं और यही एकमात्र समाधान हैं…हमारी समस्याओं का।
वाया ‘मीडिया: एक रोमिंग कॉरस्पॉडेंट की डायरी’
वाया ‘मीडिया: एक रोमिंग कॉरस्पॉडेंट की डायरी’ 1990 से लेकर 2005 तक के कालखंड; लगभग डेढ़ दशक की कथा है। 90 के दशक में प्रिंट मीडिया में महिला पत्रकारों की स्थिति, कार्यस्थल पर पितृसत्तात्मक ढांचे का प्रभाव और इसके बीच महिलाओं का संघर्ष साफ दिखता है। आज भी स्थिति बदली है मगर इतनी नहीं कि महिलाओं का संघर्ष खत्म हो गया हो। हमें यह उपन्यास महिला पत्रकारों की अप्रत्यक्ष आत्मकथा का आरम्भिक अंश लगता है जिसकी कई परतें अभी खुलनी बाकी हैं और वे खुलेंगी जरूर
कैमरे की नजर से कोजागरी लक्खी पूजो
संयोजक – शुभांगी जयसवाल



अमेजन पर करें खरीददारी और पाएं बैंकों के ये ऑफर
कोलकाता : अमेजन ग्रेट इंडियन सेल गिफ्टिंग हैप्पीनेस डेज़ 29 अक्तूबर से शुरू हो गए हैं और जैसा कि हम जानते हैं अमेज़न पिछले कई दिनों से लगातार बढ़िया सेल आयोजित कर रहा है जिसमें कई प्रोडक्टस पर भारी डिस्काउंट और डील्स पेश की जा रही हैं। यह सेल 4 नवम्बर तक चलने वाली है। सेल के दौरान आपको अमेज़न के अलावा, कई बैंक कार्ड्स पर भी अच्छा डिस्काउंट और कैशबैक मिल सकता है। साथ ही अगर आप अपने अकाउंट से पहली दफा कुछ बुक कर रहे हैं तो आपको कुछ प्रोडक्टस पर फ्री डिलिवरी की सुविधा भी मिलेगी। आज हम आपको सेल में मिल रही बेस्ट डील्स के बारे में बता रहे हैं और आप किफ़ायती दाम में स्मार्टफोंस, एयर प्योरिफायर्स, लैपटॉप्स आदि खरीद सकते हैं।
डालते हैं बैंक ऑफर पर नजर
सिटी बैंक: 10% तत्काल छूट प्राप्त करें | क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड पर अधिकतम 3 हजार रुपये की छूट
आईसीआईसीआई बैंक: 10% तत्काल छूट प्राप्त करें | क्रेडिट कार्ड पर अधिकतम 3 हजार रुपये की छूट और डेबिट कार्ड पर 1500 रुपये
कोटक बैंक: 10% तत्काल छूट प्राप्त करें | क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड पर अधिकतम 3 हजार रुपये की छूट
रूपय: 10% तत्काल छूट प्राप्त करें | क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड पर अधिकतम छूट 250 रुपये की
अमेजन पे आईसीआईसीआई क्रेडिट कार्ड: 5% तत्काल छूट (अधिकतम रु। 50) + अमेजन पे आईसीआईसीआई बैंक क्रेडिट कार्ड के साथ गैर-प्रमुख सदस्यों के लिए 3% रिवार्ड पॉइंट
कोरोना के बीच सितम्बर तिमाही में 37 प्रतिशत बढ़ी अमेजन की बिक्री
नयी दिल्ली : कोरोना संकट के बीच दुनियाभर में ग्राहकों ने जमकर ऑनलाइन खरीदारी की। इसका फायदा ई-कॉमर्स कंपनियों को भी हुआ है। अमेरिकी ई-कॉमर्स कंपनी अमेजन की बिक्री सितंबर तिमाही में 37% बढ़कर 96.1 बिलियन डॉलर हो गई। यह पिछले साल की समान तिमाही में 70 बिलियन डॉलर की थी। कंपनी ने उम्मीद जताई है कि चौथी तिमाही में बिक्री का आंकड़ा बढ़कर 112 बिलियन डॉलर और 121 बिलियन डॉलर के बीच हो सकती है।
सितंबर तिमाही में कंपनी का नेट इनकम बढ़कर 6.3 बिलियन डॉलर हो गया है, जो पिछले साल की समान अवधि में 2.1 बिलियन डॉलर रहा था। कंपनी के फाउंडर और सीईओ जेफ बेजोस ने बताया कि क्रिसमस के दौरान ग्राहक गिफ्ट की खरीदारी करेंगे। इससे उम्मीद है कि हॉलिडे सीजन में बिक्री के बढ़ सकती है। इसके अलावा अमेजन नए जॉब के अवसर भी दे रही है। उन्होंने बताया कि हमें गर्व है कि अमेजन ने अकेले इस साल 4 लाख से अधिक नौकरियां दी हैं।
कंपनी की क्लाउड आर्म अमेजन वेब सीरीज सर्विसेज (AWS) की बिक्री भी 29% बढ़कर 11.6 बिलियन डॉलर हो गई। जबकि, ऑपरेटिंग इनकम 3.54 बिलियन रहा। कंपनी के एडवर्टाइजिंग बिजनेस का रेवेन्यू 51% बढ़कर 5.4 बिलियन डॉलर रहा। इसके अलावा सब्सक्रिप्शन सर्विसेस का रेवेन्यू 33% बढ़कर 6.58 बिलियन डॉलर हा गया है। इसमें प्राइम मेंबरशिप का रेवेन्यू भी शामिल है। वर्तमान में अमेजन के साथ दुनियाभर में 11.20 लाख कर्मचारी जुड़े हुए हैं, जो साल दर साल 50% बढ़ रहे हैं।
गुरुवार को अमेरिकी बाजार नैस्डैक में अमेजन डॉट कॉम का शेयर 1.52% की बढ़त के साथ 3,211.01 अमेरिकी डॉलर प्रति शेयर के भाव पर बंद हुआ था।
ऐ सखी सुन – मानसिकता बदलेगी तो समाज अपनेआप ही बदलेगा

ऐ सखी सुन, देवी पर्व अर्थात नवरात्र समाप्त हो गया है लेकिन अभी बहुत सी देवियों की अराधना बाकी है। सखियों यह मौसम ही देवियों की पूजा का है, दुर्गा, लक्ष्मी और काली की पूजा। लेकिन मुश्किल तो इस बात की है कि हमारा समाज पाखंडी है जिसकी कथनी और करनी में उतना ही अंतर है जितना अंतर आसमान और धरती के बीच है। इसीलिए वह पूजा तो करता है देवियों की लेकिन घर की स्त्रियों को उतना भी सम्मान नहीं देता जितना हाड़ मांस के किसी भी जीव को देना चाहिए। शायद इसीलिए जिस देश में नारियों की पूजा होती है वहाँ सबसे ज्यादा प्रताड़ित नारियाँ ही होती हैं। नारीपूजक देश में स्त्रियों को बराबरी का अधिकार देना तो दूर की बात है उन्हें उनका संवैधानिक प्राप्य अधिकार भी नहीं मिलता। अखबार की सुर्खियां अधिकांशतः स्त्री के प्रति होनेवाले अपराधों से भरी होती हैं। हमने तकनीकी विकास की सीढ़ियां चढ़ने में भले ही कामयाबी हासिल कर ली हो लेकिन अपने संस्कारों और मानवीयता को निचले पायदान पर छोड़ आए हैं। हमने बड़ी- बड़ी डिग्रियां भले ही हासिल कर लीं लेकिन शिक्षा के सार को किसी अंधेरे कमरे में कैद कर दिया है। हमने अपनी बेटियों को गृहलक्ष्मी बनने के सारे गुर तो सिखा दिए लेकिन बाहरी मोर्चे पर उन्हें कैसे लड़ना है या घर के शत्रु से कैसे मुकाबला करना है, यह सिखाना हम भूल गए। और यही कारण है कि लड़कियाँ सहना और धीरज धरना तो सीख जाती हैं लेकिन अपने हक और अधिकारों के लिए लड़ना तो दूर की बात है कभी -कभी मुँह खोलना तक भूल जाती हैं। और सहते -सहते जब दर्द हद से गुजर जाता है तब उनकी पीड़ा प्रार्थना में बदल जाती है और वे बरबस कह बैठती हैं, “अगले जन्म मोहे बिटिया ना कीजो”। यह एक ऐसी प्रार्थना है जिस पर एक पल के लिए ठहरकर पूरे समाज को सोचना चाहिए और सोचते- विचारते हुए अपने वैचारिक परिदृश्य को भी बदलने की कोशिश करनी चाहिए।

जब तक तकनीकी विकास के साथ साथ हम अपना मानसिक रूप से विकसित नहीं होंगे, उदार होकर सोचते हुए लड़का- लड़की की समानता के पक्षधर नहीं बनेंगे तब तक समाज भी नहीं बदलेगा। और लड़कियों के प्रति होनेवाले अपराधों में भी कमी नहीं आएगी। इसीलिए सखी हमें एकजुट होकर समाज के मानस को बदलना है। साथ ही अपनी बेटियों को अबला बनने का संस्कार घुट्टी में नहीं पिलाना है बल्कि शारीरिक और मानसिक तौर पर मजबूत बनाना है। उन्हें एक लड़की की तरह नहीं पालना है बल्कि एक सजग और सचेत नागरिक का संस्कार भी देना है जिसके कंधों पर समाज को गढ़ने का दायित्व हो। साथ ही अपनी बेटियों के अलावा बेटों को भी सामाजिक और मानवीय संस्कार घुट्टी में पिलाने की जरूरत है। उन्हें एक पुरुष की तरह नहीं पालना है बल्कि एक सचेत नागरिक बनाना है। उन्हें भी यह समझाने की जरूरत है कि शारीरिक बनावट में भले ही भेद हो लेकिन वे किसी भी मायने में लड़िकयों से श्रेष्ठ नहीं है। और जब हम अपनी बेटियों के साथ बेटों को भी सिखाना, बताना और संस्कारित करना शुरू करेंगे तो निश्चित तौर पर समाज में बदलाव आएगा। जब वे लड़कियों को अपने समान मानना समझना शुरु करेंगे तो उनके मन में उन्हें सजा देने, सबक सिखाने या उनका शोषण करने की बात आएगी ही नहीं। इस संदर्भ में मंजुश्री वात्स्यायन की कविता “चलन” की कुछ पंक्तियां उद्धृत करना चाहूंगी जो हाथरस कांड के बाद लिखी गई हैं और बेहद विचलित करती हैं-
“गुड़िया तो गुड़िया ही थी
हूबहू बार्बी डॉल
सुनहरे,रेशमी घुंघराले बाल,
गुलाबी रंगत लिए
मक्खन से मुलायम गाल,
* * * * *
मां ने उसे समझाया था
अच्छे और बुरे स्पर्श का अर्थ
* * * * * * * * *
बावजूद इसके,एक दिन
घर के पीछे, पार्क में
मिला उसका क्षत-विक्षत शरीर,
* * * * * * *
कोई परिचित ही रहा होगा,
जिसे उसके मां-बाप ने निश्चय ही
नहीं सिखाया होगा
मानवोचित संस्कार
पुरूषोचित व्यवहार
बहन बेटियों की रक्षा करना
स्त्रियों का सम्मान करना
क्योंकि / हमारे यहाँ
बेटों को सिखाने का
चलन नहीं है ….
देखो सखी, हमारे समाज में लिंगभेद की जड़ें बहुत गहरी हैं लेकिन अपने धैर्य और संकल्प से हम समस्या की जड़ तक पहुंचकर इसका समाधान ढूंढने की कोशिश तो कर ही सकते हैं। मानसिकता बदलेगी तो समाज अपने आप बदलेगा। आओ सखी, हम सब एकजुट होकर इस बदलाव के लिए संकल्प लें।




