Saturday, October 24, 2026
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सुजान : हीनता होय जो हिम्मत की तो प्रबीनता लै कहा कूप में डारै”

प्रो. गीता दूबे

ऐ सखी सुन 14

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों हमारे समाज में बहुत सी प्रेम कहानियाँ मशहूर हैं और साहित्य में भी। मैं काल्पनिक प्रेम कहानियों की ही बात नहीं कर‌ रही सखियों बल्कि उन साहित्यकारों की प्रेम कहानियों की बात कर रही हूं जो साहित्य की दुनिया में बहुत चर्चित तो रहीं लेकिन एक छद्म उनके साथ यह रहा कि बहुत बार उन प्रेम कथा की मशहूर नायिकाओं को वास्तविक न मानकर काल्पनिक करार‌ कर दिया गया। शायद‌ यह भी इतिहास का एक प्रचलित षड्यंत्र है जिसके तहत स्त्री के उस अस्तित्व को‌ मिटाने की भरपूर कोशिशें हुईं जिनका व्यक्तित्व ही नहीं कृतित्व भी प्रभावशाली रहा हो। यह बात और है कि समाज‌ में अपनी मकबूलियत और मशहूरियत के बावजूद वह हाशिए पर ही रहीं। और हमारा तथाकथित सभ्य समाज जब हाशिए के इस ओर की स्त्रियों को ही उनका प्राप्य नहीं देता तो भला हाशिए के उस ओर की स्त्रियों को भला क्यों बर्दाश्त करता इसीलिए कह दिया गया कि वह तो कवि की कल्पना या ईश्वर का प्रतीक थी। सखियों आज मैं आपको एक ऐसी स्त्री या सखी की कथा सुनाती हूं जो एक संवेदनशील स्त्री, महाकवि घनानंद की प्रेमिका एवं स्वयं भी एक सशक्त कवयित्री थीं। जी हां, सही समझा आपने, मैं सुजान की बात कर‌ रही हूं। वही सुजान जिन पर घनानंद न केवल अपनी जान‌ निछावर‌ करते थे बल्कि जिनके नाम के बिना घनानंद की कविता पूरी ही नहीं होती। घनानंद और सुजान की प्रेम कहानी हिंदी साहित्य के इतिहास के पन्नों पर भले ही दर्ज हो लेकिन बहुत से लोग इस कहानी को एक काल्पनिक कहानी भी मानते हैं। 

यह कहानी एक संवेदनशील कला प्रेमी कवि और एक कवयित्री की कहानी भी है। घनानंद मुगल बादशाह  मुहम्मद शाह “सदारंग” जिन्हें मुहम्मद शाह “रंगीला” भी कहा जाता था, के‌ दरबार‌ में मीर मुंशी थे और सुजान दरबार की राजनर्तकी, जिसकी कला और सौन्दर्य पर तमाम दरबारी ही नहीं घनानंद भी मुग्ध थे। घनानंद के इस प्रेम की खबर सभी दरबारियों को‌ बखूबी थी। दरबारियों ने‌ घनानंद को बादशाह की नजर से गिराने और‌ दरबार से हटाने के लिए एक कुचक्र रचा। कहा जाता है कि एक दिन दरबारियों ने बादशाह से कहा कि मीर मुंशी साहब बहुत अच्छा गाते हैं, बादशाह के आग्रह करने पर‌ भी जब घनानंद ने गीत नहीं सुनाया तब उन्हीं कुचक्री दरबारियों ने कहा कि अगर सुजान आग्रह करे तो घनानंद अवश्य गाएंगे। बादशाह के कहने पर‌ सुजान ने आग्रह किया और उनके प्रेम के रंग में रंगे घनानंद ‌ने बादशाह की ओर पीठ करके, सुजान की ओर देखते हुए गीत सुना दिया। उस गीत ने बादशाह को बहुत अधिक प्रभावित किया लेकिन बादशाह तो बादशाह ठहरा, जिसने घनानंद के व्यवहार को‌ बेअदबी और अपनी तौहीन समझा और देश-निकाला दे दिया। घनानंद ने सुजान से भी साथ चलने की याचना की लेकिन सुजान की निष्ठा और प्रतिबद्धता राजा और‌ दरबार के प्रति थी, अतः उन्होंने साथ चलने से इंकार कर दिया। उनके मन में राज भय भी हो सकता था। इतिहास गवाह है कि शाही दरबार की न जाने कितनी नर्तकियों को राजा के अतिरिक्त किसी और से प्रेम करने के अपराध में मौत के घाट उतार दिया गया है। इस कथा एक पहलू यह भी हो सकता है कि संभवतः घनानंद का प्रेम एकतरफा रहा हो और‌ शायद इसीलिए सुजान ने उनका साथ नहीं दिया।

इस प्रेमकथा का एक और‌ दिलचस्प पहलू यह भी है कि सुजान सिर्फ नर्तकी नहीं थीं बल्कि वह कविताएँ भी लिखा करती थीं। घनानंद के कवित्त में चित्रित सुजान की बात तो खूब होती है लेकिन कवयित्री सुजान समय के साथ भुला दी गईं।  सुजान के कवित्त भी बहुत सी प्राचीन और मध्ययुगीन कवयित्रियों की तरह इतिहास के गलियारे में गुम हो गये। उनके एक कवित्त में एक स्त्री की पीड़ा और उसका अंतर्द्वन्द्व बखूबी अभिव्यक्त हुआ है-

“बेदहूँ चारि की बात को बाँचि, पुरान अठारह अंग में धारै।

चित्रहूँ आप लिखै समझे कबितान की रीति में वार ते पारै।।

राग को आदि जिती चतुराई ‘सुजान’ कहै सब याही के लारै।

हीनता होय जो हिम्मत की तो प्रबीनता लै कहा कूप में डारै।”

संभवतः सुजान के मन में इस बात की कसक ताउम्र बनी रही कि वह हिम्मत या साहस की कमी के कारण अपने समर्पित प्रेमी घनानन्द का साथ नहीं दे पाईं। जब प्रिय हमेशा के लिए दृष्टि की ओट में हो जाता है, समय की धारा में विलीन हो जाता है तो उसकी कमी खटकना स्वाभाविक ही है और इसी कारण संभवतः सुजान स्वयं को कोसती हैं कि अगर हिम्मत की कमी हो तो सारी प्रवीणता धरी रह जाती है। मजबूरियों ने सुजान के पैरों इस तरह जकड़ा कि साहित्य के इतिहास में उनकी छवि एक निष्ठुर प्रेमिका की बन गई । अब यह बात तो सुजान ही जानती होंगी कि इस निष्ठुरता के पीछे कौन सी झिझक या विवशता काम कर रही है। भारतीय स्त्री सदियों से ऐसी विवशताओं के बंधन में बँधकर अपने ह्दय की बात दबाकर रखती है इसीलिए सुजान के प्रति अपनी सोच को हमें बदलना चाहिए। सुनो सखियों, स्त्रियों की छवि निर्मित करने या गढ़ने में पितृसत्तात्मक समाज की बड़ी भूमिका रही है, समय आ गया है कि हम सबको अपनी संगठनात्मक शक्ति के बल पर इस भूमिका को बदलने की दिशा में पहल करनी चाहिए। फिलहाल विदा सखियों। अगले हफ्ते फिर मुलाकात होगी, एक नयी कहानी के साथ।    

नारियल के छिलके से बना दीं 400 कलाकृतियाँ

कला को अमूल्य मानते हैं, इसलिए आज तक एक भी कलाकृति नहीं बेची

नारियल के बेकार छिलकों से इतनी सुंदर और दिल लुभाने वाली वस्तुएं भी बन सकती हैं, जिन्हें देख हैरान रह जाएंगे। महाराष्ट्र के 59 वर्षीय विजयानंद शेम्बेकर पर आर्टिफेक्ट्स बनाने का जुनून सवार है। अलीबाग में इनकी आर्ट गैलरी का नाम ‘आशीर्वाद कलादलन’ है, वहां एक से बढ़कर एक आर्ट के डिजाइन सजाकर रखे हुए हैं। शुरुआत में 12 साल पहले इस कला के प्रति इनके जुनून को देखकर परिवार वालों ने इन्हें पागल करार दे दिया था, क्योंकि ये यहां-वहां कचरे में पड़े नारियल खोल उठाकर घर ले आते थे। बाद में परिवार वालों को इनके आर्ट की कद्र तब हुई जब दुनिया वाले विजयानंद की तारीफ करने लगे।

इनकी आर्ट गैलरी में नारियल से बने ट्रैक्टर, कार, ऑटो रिक्शा, साइकिल, बाइक, गणेश और कृष्ण की मूर्तियां भी दिखेंगी। घर की सजावट के लिए लैंप, दीवार पर लटकाए जाने वाले क्रॉफ्ट भी शामिल हैं। इसके लिए वे क्षतिग्रस्त नारियल, छाल, पत्तियों और तने का उपयोग करते हैं। वे अपने क्राफ्ट्स बेचते नहीं हैं, क्योंकि ये उनके लिए अमूल्य हैं। वे कहते हैं कि मेरे पास नौकरी है जो सभी जरूरतें पूरा कर देती है। वे छात्र-छात्राओं, इच्छुक लोगों को यह आर्ट सिखाने को तत्पर रहते हैं।
विजयानंद दिन में एक फर्टिलाइजर कंपनी में काम करते हैं और रात में अपने आर्ट को समर्पित हो जाते हैं। उन्होंने लगभग 400 कलाकृतियां बनाने का दावा किया है। अलीबाग एवं कोंकण क्षेत्र में हजारों नारियल पेड़ हैं। डंप यार्ड में उन्हें नारियल के छिलके मिल जाते हैं।
(साभार – दैनिक भास्कर)

14 साल की उम्र में शादी, 18 साल की उम्र में बच्चे और आज हैं आईपीएस अधिकारी

एन अंबिका ने 14 साल की उम्र में एक पुलिस वाले से शादी कर ली और 18 साल की उम्र में वह दो बच्चों की मां बनी। एक दिन वह अपने पति के साथ गणतंत्र दिवस की पुलिस परेड देखने पहुंची। उसने वहां पुलिस ऑफिसर को मिलने वाला सम्मान देखा और ये सोचा कि मैं किस तरह ये सम्मान पा सकती हूं। जब उसने इस बारे में अपने पति से बात की तो उन्होंने बताया कि ये सम्मान मिलना इतना आसान नहीं है। इसके लिए कड़ी मेहनत की जरूरत होती है। ये सब जानने के बाद उसने सिविल सर्विसेस की इंट्रेंस एग्जाम क्लियर करने का फैसला किया। इसके लिए अंबिका ने सबसे पहले 10 वीं की परीक्षा पास की और उसके बाद पोस्ट ग्रेजुएशन किया। लेकिन वे एक छोटे कस्बे में रहती थी जहां पढ़ाई की पर्याप्त सुविधा नहीं थी। तब अंबिका के पति ने चेन्नई में अपनी पत्नी के रहने और पढ़ाई करने का इंतजाम किया। वे खुद नौकरी के साथ बच्चों की देखभाल करने लगे। चेन्नई में रहते हुए अंबिका ने खूब मेहनत की लेकिन वे दो बार इस एग्जाम को क्लियर नहीं कर सकीं। जब तीसरी बार भी वे पास नहीं हुई तो उनके पति ने उन्हें लौट आने को कहा। लेकिन अंबिका ने एक आखरी बार कोशिश करने की जिद की। उनकी ये कोशिश सफल रही और उनका नाम 2008 की आईपीएस लिस्ट में शामिल हुआ। उनकी पहली पोस्टिंग महाराष्ट्र में हुई। 2019 में उन्हें डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस का पद मिला और वे ‘लोकमत महाराष्ट्रीयन ऑफ द ईयर अवार्ड’ के लिए चुनी गई। जांबाज ये महिला लेडी सिंघम के नाम से अपनी खास पहचान रखती है।

पेपरलेस बजट:वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने लॉन्च केंद्रीय बजट मोबाइल ऐप

सांसद और आम लोग कर सकेंगे इस्तेमाल

नयी दिल्ली : वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 1 फरवरी 2021 को बजट पेश करने वाली हैं। इस बीच वित्त मंत्री ने ‘केंद्रीय बजट मोबाइल ऐप’ लॉन्च किया। इस ऐप पर बजट से जुड़ी सारी जानकारी उपलब्ध होगी। लोकसभा-राज्यसभा के सांसदों के साथ आम लोग भी इस ऐप का इस्तेमाल कर सकेंगे। कोविड-19 के प्रोटोकॉल को देखते हुए वित्त वर्ष 2021-22 के बजट को प्रकाशित नहीं करने का फैसला किया गया है। आजादी के बाद यह पहला मौका है जब बजट के कागजात प्रकाशित नहीं किए जा रहे हैं। यह बजट पूरी तरह से पेपरलेस होगा। वित्त मंत्री सॉफ्ट कॉपी के जरिए संसद में बजट से जुड़ी जानकारी देंगी। केंद्र सरकार ने बजट ना प्रकाशित करने के वित्त मंत्रालय बजट दस्तावेजों की छपाई प्रक्रिया की शुरुआत के मौके पर हर साल हलवा सेरेमनी करता है। सेरेमनी का आयोजन संसद में बजट पेश किए जाने से एक पखवाड़ा पहले नॉर्थ ब्लॉक के बेसमेंट में होता है। इस काम के लिए कम से कम 100 लोगों की जरूरत है। यह लोग करीब 15 दिन तक नॉर्थ ब्लॉक के बेसमेंट में ही रहते हैं। लेकिन कोरोना के डर को देखते हुए छपाई ना करने का फैसला किया गया है।
इस ऐप पर बजट से जुड़े सभी 14 डॉक्यूमेंट उपलब्ध होंगे। इसमें वार्षिक वित्तीय स्टेटमेंट (बजट), डिमांड फॉर ग्रांट्स (DG), फाइनेंशियल बिल आदि दस्तावेज शामिल हैं। यह एक यूजर फ्रैंडली ऐप है। इस ऐप पर एम्बेड, प्रिटिंग, सर्च, जूम इन और आउट, बायडायरेक्शनल स्क्रॉलिंग, टेबल ऑफ कंटेंट्स और एक्सटर्न लिंक्स आदि फीचर उपलब्ध हैं।यह ऐप हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में उपलब्ध है। इस ऐप को एंड्रॉयड और iOS दोनों प्लेटफॉर्म से डाउनलोड किया जा सकता है।
यह ऐप हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में उपलब्ध है। इस ऐप को एंड्रॉयड और iOS दोनों प्लेटफॉर्म से डाउनलोड किया जा सकता है।यह ऐप केंद्रीय बजट वेब पोर्टल www.indiabudget.gov.in से भी डाउनलोड किया जा सकता है। इस ऐप को डिपार्टमेंट ऑफ इकोनॉमिक अफेयर्स की देखरेख में नेशनल इन्फॉर्मेटिक्स सेंटर (एनआईसी) ने तैयार किया है।

1 फरवरी को संसद में वित्त मंत्री का बजट भाषण खत्म होने के बाद बजट संबंधी सभी डॉक्यूमेंट इस ऐप पर डाउनलोड हो जाएंगे।

भवानीपुर कॉलेज में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस विषय पर वेबिनार

कोलकाता :  भवानीपुर एजुकेशन कॉलेज में इंटेलिजेंस आर्टिफिशियल पर हुए वेबिनार में मशीन द्वारा सीखने की पद्धतियों के विषय में विद्यार्थियों को महत्वपूर्ण जानकारी दी गयी। कृत्रिम तरीके से विकसित की गई बौद्धिक क्षमता के विषय में विषेषज्ञ डायरेक्टर पर प्रेक्सिस बिजनेस स्कूल फाउंडेशन के प्रोफेसर चरणजीत सिंह बतौर प्रमुख वक्ता के रूप में विद्यार्थियों को संबोधित किया। उन्होंने बताया कि आज बहुत ही तेज़ी से कृत्रिम बुद्धिमत्ता को अपनाया जा रहा है।व्यवसाय की दुनियां के साथ साथ विभिन्न क्षेत्रों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग लिया जा रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जनक जांन मैकार्थी का मानना है कि यह बुद्धिमान कंप्यूटर प्रोग्राम को बनाने का विज्ञान और अभियांत्रिकी है अर्थात यह मशीनों द्वारा प्रदर्शित की गई इंटेलिजेंस है ।यह समस्या को हल करता है, निर्णय लेता है और कैसे काम करता है इत्यादि बातों को पहले ही बता देता है। कंप्यूटर प्रणाली बुद्धिमान रोबोट के प्रयोग हो रहे हैं, हवाई जहाज क्षेत्रों में इसका उपयोग हो रहा है भविष्य में भी होगा स्वास्थ्य शिक्षा सामाजिक आर्थिक उत्पादक क्षेत्रों में सफलता मिलने की संभावना है, जैसे – उत्पादन और निर्माण के तरीकों में क्रांतिकारी परिवर्तन देखने को मिलेगा चरनप्रीत सिंह ने बताया कि जहां एक ओर इसके बहुत फ़ायदे हैं वहीं हानियां भी हैं । बेरोज़गारी की संख्या भी बढ़ने की संभावना है। यह भारी मात्रा में सिद्धांत पर काम करता है इसका स्वरूप कैसा होगा इस पर शोध कार्य चल रहे हैं । इस वेबिनार में प्रोफेसर चरनप्रीत सिंह ने एक छात्र द्वारा पूछे गए सवाल कि आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कहां तक सीमित है जिसका उत्तर देते हुए कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अपने विकास की ओर है और विकसित होने में अब अधिक समय नहीं लगेगा जैसा कि एलन मस्क ने बता दिया है कि यह सुपर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बनने की ओर है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के विषय में काफ़ी संख्या में छात्रों ने भाग लिया। तानिया पान और सृष्टि झुनझुनवाला ने सभी का स्वागत किया। सार्थक बाधवा ने इसकी रिपोर्ट दी। इसके अलावा इस वेबिनार में मशीनों द्वारा सीखने की पद्धतियों के बारे में भी जानकारी दी गयी।कॉलेज के डीन प्रोफेसर दिलीप शाह ने कंप्यूटर की भाषा के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि यह संख्या 01001001111आदि कंप्यूटर की बाइनरी भाषा है जिसका आज हर क्षेत्र में उपयोग हो रहा है। इस कार्यक्रम की जानकारी दी डा. वसुंधरा मिश्र ने।

कोटक महिन्द्रा आसान शर्तों पर दे रहा है डिजी होम लोन

कोलकाता : कोटक महिन्द्रा अब डिजिटल माध्यमों के जरिए आसान होम लोन उपलब्ध करवायेगा। बैंक 6.75 प्रतिशत सालान की दर से गृह ऋण उपलब्ध करवाने की घोषणा पहले ही कर चुका है। कोटक डिजी होम लोन के लिए आवेदक अब अपनी ऋण राशि पात्रता और लागू ब्याज दर की तुरंत ऑनलाइन जांच कर सकते हैं, और तुरंत एक सैद्धांतिक मंजूरी पत्र भी प्राप्त कर सकते हैं। यह काफी हद तक घर के मालिकों के लिए घर खरीदना आसान बनाएगा। होम लोन की तत्काल मंजूरी मौजूदा और नए दोनों कोटक ग्राहकों के लिए, और वेतनभोगी और स्व-नियोजित ग्राहक खंडों के लिए उपलब्ध है। आवेदक नए होम लोन, बैलेंस ट्रांसफर या टॉप-अप लोन के लिए आवेदन करने की सुविधा का उपयोग कर सकते हैं। आवेदक ऋण राशि और कार्यकाल चुन सकता है और पात्र ऋण राशि बढ़ाने के लिए एक सह-आवेदक को भी जोड़ सकता है। उसके बाद आवेदकों को एक सैद्धांतिक मंजूरी पत्र प्राप्त होगा और उसके बाद दस्तावेजों के ऑनलाइन जमा करने के लिए आगे बढ़ना होगा। कोटक महिन्द्रा बैंक के प्रेसिडेंट (कन्ज्यूमर एसेट्स )अंबुज चांदना ने कहा, डिजिटल-प्रथम दृष्टिकोण का उपयोग करते हुए, घर खरीदारों को अब पूरी तरह से पेपरलेस और संपर्क रहित तरीके से अपने ऋण पात्रता के सभी विवरणों के साथ एक त्वरित होम लोन मंजूरी मिल जाएगी।

शैक्षणिक शुल्क सुविधा को आसान बनायेंगे एस बी एम बैंक और ग्रे क्वेस्ट

कोलकाता : एसबीएम बैंक और ग्रे क्वेस्ट अब शैक्षणिक शुल्क भुगतान सुविधा को अपने उपभोक्ताओं के लिए आसान बनायेंगे। ग्रे क्वेस्ट एक एडुकेशन फिनटेक कम्पनी है जिसने देश भर के 2000 से अधिक अग्रणी स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के साथ भागीदारी की है। माता-पिता को अपने बच्चों की शिक्षा की फीस को आसान मासिक भुगतान करने की अनुमति देता है। अभिभावक सुरक्षित, सुविधाजनक और पेपरलेस प्रक्रिया के माध्यम से ग्रेक्वेस्ट प्लेटफॉर्म पर पांच मिनट के भीतर मासिक भुगतान विकल्प के लिए साइन अप कर सकते हैं, अपने वार्षिक या थोक सेमेस्टर स्कूल / कॉलेज की फीस को बिना किसी अतिरिक्त लागत के सस्ती मासिक भुगतान में परिवर्तित कर सकते हैं। ग्रेक्वेस्ट माता-पिता को मानार्थ बीमा कवर और अपने बच्चों के लिए 50+ अनन्य पुरस्कारों तक पहुंच जैसे लाभ भी मिलते हैं। एसबीएम बैंक इंडिया लिमिटेड के हेड-रिटेल एंड कंज्यूमर बैंकिंग, नीरज सिन्हा, एजुकेशन लेंडिंग स्पेस में साझेदारी और बैंक की गतिविधियों पर विचार रखे।
ग्रेक्वेस्ट के संस्थापक और सीईओ, ऋषभ मेहता ने कहा, “हमारे आंकड़ों के अनुसार, औसत भारतीय परिवार अपनी वार्षिक आय का 13% प्रति बच्चे शिक्षा शुल्क पर खर्च करता है। एसबीएम बैंक के साथ हमारी साझेदारी शैक्षणिक शुल्क भुगतान को आसान बनायेगी। इस तरह के वित्तपोषण की सुविधा प्रदान करने की हमारी क्षमता को बढ़ावा देगा। ”एसबीएम बैंक इंडिया न केवल ग्रेक्वेस्ट के ग्राहकों को सस्ती धनराशि तक पहुंच प्रदान करेगा, बल्कि उन्हें अपनी समग्र बैंकिंग आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सशक्त करेगा।

सुशीला बिड़ला गर्ल्स स्कूल में मनाया गया युवा दिवस

कोलकाता : स्वामी विवेकानंद ने शिक्षा के महत्व को हमेशा समझा था और यही कारण है कि वे युवाओं को हमेशा प्रेरित करते रहे हैं। हाल ही में सुशीला बिड़ला गर्ल्स स्कूल की छात्राओं ने युवा दिवस का आयोजन कर स्वामी जी के दर्शन, सिद्धांतों और उनकी शिक्षाओं के प्रति जागरुकता लाने का प्रयास किया। वर्चुअल माध्यमों पर आयोजित इस कार्यक्रम में कुछ छात्राओं ने स्वामी विवेकानंद का वेश भी धारण किया और उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस के बारे में जाना, स्वामी विवेकानंद के विचार भी पढ़े। चौथी कक्षा की छात्राओं ने उनके जीवन और शिक्षा पर आधारित एक वीडियो भी प्रदर्शित किया और इसमें बांग्ला और हिन्दी, दोनों ही भाषाओं का उपयोग किया गया। पाँचवीं कक्षा में हिन्दी में निबन्ध लेखन और कविता लेखन प्रतियोगिता आयोजित की गयी। इसके अतिरिक्त पोस्टर प्रतियोगिता भी हुई।

नेताजी का स्वप्न ‘महाजाति सदन’ और पसन्द लक्ष्मीनारायण एंड संस का ‘तेलेर भाजा’

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस…आजाद हिन्द फौज को नयी पहचान देने वाले ओजस्वी वाणी से मुर्दों में प्राण फूँक देने वाले हम सबके प्रिय नेता जी। भवानीपुर में उनकी स्मृतियों को संजोता नेताजी भवन तो हम सबके सामने है ही ..परन्तु नेता जी के व्यक्तित्व के कई ऐसे पक्ष भी हैं जो कम ही लोग जानते हैं…नेता जी ने इस शहर को ऐसा सभागार दिया है जो आज भी सिर ऊँचा कर हम सबके सामने है और उनकी स्मृति बन गया है। सुभाष बाबू सृष्टा तो थे ही, साथ ही भोजन प्रेमी भी थी। मूढ़ी, पकौड़ी से उनका लगाव रहा…छात्र जीवन में तेलेर भाजा की चाह में वे ऐसी ही एक दुकान को खूब पसन्द करते थे..और दुकान के मालिक खेदू साव का भी नेता जी से लगाव भी कुछ ऐसा ही था कि नेताजी के जन्मदिवस पर हर निःशुल्क तेलेर भाजा वितरित करते रहे और आज भी हर साल 23 जनवरी को तेलेर भाजा के वितरण की परम्परा अब तक चली आ रही है।
इस बार की पड़ताल में ऐसी ही घटनाओं की झलक है आपके लिए। हम जिस सभागार की बात कर रहे हैं…वह है महाजाति सदन…। महाजाति सदन को तो हम सब जानते हैं…कभी न कभी आप भी गये ही होंगे और हाल ही में 75 साल पूरे कर चुके इस सभागार को संवारा भी गया मगर नेताजी से इस सभागार का अनोखा सम्बन्ध है….नेताजी का ही नहीं बल्कि कवि गुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर का भी सम्बन्ध है। सुभाष बाबू का ऐसा स्वप्न जिसे आगे चलकर देश के स्वाधीन होने के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री विधान चन्द्र राय ने पूरा किया।

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के अनुरोध पर महाजाति सदन को नाम भी रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने दिया था

19 अगस्त 1939 को सुभाष चन्द्र बोस, विधान चन्द्र राय जैसे गण्यमान्य लोगों के बीच कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने महाजाति सदन का शिलान्यास किया पर हमें और पीछे मुड़कर देखने की जरूरत है। 1937 मई का महीना, सुभाष चन्द्र बोस ने अपने एल्गिन रोड स्थित आवास पर अपने मित्र एडवोकेट नृपेन्द्र चन्द्र मित्र और स्थानीय युवकों को लेकर एक सभा बुलाई थी। इस सभा में सुभाष चन्द्र बोस ने कलकत्ता की नागरिक सभा समिति के आह्वान के लिए एक बड़े प्रेक्षागृह या सभागार की स्थापना की जरूरत बतायी।
इसके कुछ दिन बाद नेता जी को सेन्ट्रल एवेन्यू और हरिसन रोड (आज का महात्मा गाँधी रोड) के संयोगस्थल के निकट कलकत्ता नगर निगम की 19 कट्ठा जमीन का पता चला और इसी जगह को सुभाष चन्द्र बोस ने प्रेक्षागृह के निर्माण के लिए चुना। नेता जी के अनुरोध पर तब कलकत्ता नगर निगम ने 1 रुपये की लीज पर जमीन उनको दी। फिर इस प्रस्तावित प्रेक्षागृह के नामकरण के लिए रवीन्द्रनाथ ठाकुर से अनुरोध किया गया और तब कवि गुरु ने इस प्रेक्षागृह को नाम दिया…महाजाति सदन।

नेताजी का यह स्वप्न पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री विधान चन्द्र राय ने पूरा किया

शांतिनिकेतन के विशिष्ट वास्तुकार सुरेन्द्रनाथ कर को इस प्रेक्षागृह का नक्शा बनाने की जिम्मेदारी मिली और इसके बाद सुभाष बाबू के अनुरोध पर कविगुरु ने इस महाजाति सदन की नींव रखी यानी शिलान्यास किया। इस बीच 1941 में सुभाष बाबू ने स्वाधीनता की मशाल को तेज करने के लिए देश त्याग किया। इस वजह से महाजाति सदन का निर्माण कार्य ठप पड़ गया। इस पर नाराज ब्रिटिश सरकार ने सुभाष बाबू के नाम पर जो लीज थी, वह भी रद्द कर दी।
ऐसी स्थिति में सुभाष चन्द्र बोस के बड़े भाई शरत चन्द्र बोस और मित्र नृपेन्द्र चन्द्र मित्र ने ब्रिटिश सरकार के इस फैसले के खिलाफ अदालत में अपील की। अदालत का फैसला कुछ दिन बाद ही आया मगर लीज को रद्द कर देने का फैसला गैरकानूनी करार दिया गया।

1947 में देश स्वाधीन हुआ और 1949 में पश्चिम बंगाल की विधानसभा में महाजाति सदन बिल पास हुआ। इसके बाद तत्कालीन मुख्य मंत्री विधान चन्द्र राय ने महाजाति सदन का निर्माण कार्य की बागडोर सम्भाल ली। 1958 में 19 अगस्त को उन्होंने ही इस सभागार का उद्घाटन किया। सभागार का मूल भवन 4 तल का है और 1309 सीटें हैं। यह सभागार 19 कट्ठा जमीन पर बना है। इसके अतिरिक्त यहाँ प्रदर्शनियों की व्यवस्था है। नेता जी और कवि गुरु की प्रतिमायें भी हैं, और साथ ही एक ग्रंथागार भी है।

महाजाति सदन एक्ट 1949 
महाजाति सदन और नेताजी का सम्बन्ध तो हमने आपको बता दिया..अब हम आपको नेताजी का ‘तेलेर भाजा’ कनेक्शन भी बताते हैं। यह सम्बन्ध इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह आम आदमी के मन में नेता जी किस तरह बसे हुए हैं…यह बताता है। यह सम्बन्ध बंगाल और बिहार के सम्बन्ध को मजबूत करने वाली डोर है और यह सम्बन्ध जुड़ा है एक दुकान से।

हेदुआ इलाके में स्कॉटिश चर्च कॉलेज से थोड़ी दूर पर है लक्ष्मी नारायण साव एंड संस की दुकान…दूर से ही इनके पकौड़ों और वेजिटेबल चॉप की खुशबू आपको खींच लेगी। नेताजी को इस दुकान की पकौड़ी यानी तेलेर भाजा खूब पसन्द था और छात्र जीवन में..वह यहाँ आकर इनका आनन्द भी लिया करते थे। यह दुकान आज भी है तो शुभजिता पहुँच गयी इस ऐतिहासिक जगह पर। दुकान के मालिक केष्टो कुमार गुप्ता ने बताया कि दुकान इनके दादा जी खेदू साव ने अपने बेटे लक्ष्मीनारायण के नाम पर 1918 में खोली।

बिहार के गया जिले से आने वाले गुप्ता बताते हैं कि उन दिनों यह दुकान क्रांतिकारियों के लिए एक इन्फॉरमेशन सेंटर यानी सूचना केन्द्र जैसी ही थी,,,,और दादा जी सूचना पहुँचा दिया करते थे। क्रांतिकारियों की गोपनीय बैठकों में इनके दादा जी खेदू साव पकौड़ी, मूढ़ी और मिट्टी की कुल्हड़ में चाय लेकर जाते थे। नेताजी को भी उन्होंने तेलेर भाजा खिलाया… यह1942 में नेता जी के जन्मदिवस पर आस – पास के लोगों को मुफ्त तेलेर भाजा खिलाना शुरू किया…देश आजाद हुआ तो खेदू साव ने घोषणा की कि हर साल 23 जनवरी को इस दुकान पर मुफ्त तेलेर भाजा वितरण होगा…यह परम्परा आज भी चली आ रही है।

समय के साथ इस दुकान में वैरायटी बढ़ी…शेफ रणवीर ब्रार से लेकर दादा सौरभ गांगुली तक कई दिग्गज हस्तियाँ यहाँ आ चुकी हैं…आज भी इस दुकान के तेलेर भाजा की महक सबको लुभाती है। इस साल भी 23 जनवरी को तेलेर भाजा वितरण होगा और जिस पैकेट में यह दिया जाता है, उस पर बनी होती है, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की तस्वीर। दुकान के सामने नेताजी की प्रतिमा तो है ही…ऊपर भी नेताजी की तस्वीर और हर तरफ बिखरा पड़ा है इतिहास और ऐतिहासिक तस्वीरें औऱ तेलेर भाजा वितरण की अनूठी परम्परा और दुकान के मालिक केष्टो कुमार गुप्ता के अनुसार हमेशा जारी रहेगी यह परम्परा तो आप अगर कोलकाता में हों तो यहाँ जरूर जायें।

स्त्रोत साभार – (महाजाति सदन) आनन्द बाजार पत्रिका, कोलकाता 24 X7

वीडियो फुटेज – हेयरिक सौरभ

विश्व गौरव की ओर बढ़ने की प्रेरणा देने वाला व्यक्तित्व था नेताजी का

शिव प्रकाश (राष्ट्रीय महासचिव तथा पश्चिम बंगाल प्रभारी, भाजपा)

नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जन्म जयंती पर विशेष

राष्ट्र आज महान देशभक्त नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 125वीं जयंती मना रहा है। सुभाष बाबू का जीवन वृत्त समस्त राष्ट्र साधकों, राष्ट्रचिंतकों के लिए गौरव बोध कराने वाला है। उनका सतत संघर्षपूर्ण, साहसिक जीवन प्रेरणा देना वाला है। सुभाष चंद्र बोस की पूर्ण स्वराज की अवधारणा का आशय भारतीय संस्कारों से आप्लावित राज्य था। बंगाल का शेर कहे जाने वाले नेताजी सुभाष चन्द्र बोस अग्रणी स्वतंत्रता सेनानियों में से एक थे। उनके नारों “दिल्ली चलो” और “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा” से युवा वर्ग में एक नये उत्साह का प्रवाह हुआ था। पूरे देश में नेताजी के इस नारे को सुनकर राष्ट्रभक्ति की अलख जगी। जो लोग यह कहते हैं कि शांति और अहिंसा के रास्ते से भारत को आजादी मिली, उन्हें एक बार नेताजी के जीवन चरित्र का अध्ययन करना चाहिए।

सुभाष बाबू का जन्म आज के दिन 1897 में ओडिशा प्रांत के कटक में हुआ था। उनके पिता जानकी नाथ बोस एक प्रख्यात वकील थे जो कालांतर में बंगाल विधान सभा के सदस्य भी रहे। सुभाष बाबू एक सच्चे राष्ट्रभक्त, समाज सुधारक एवं आदर्श राजनेता थे। उनका आर्थिक सामाजिक चिंतन हमारा सदैव मार्गदर्शन करता है। उनके इसी समर्पण के कारण लोग प्यार से उन्हें नेताजी कहकर पुकारते थे। उनके विचारों पर स्वामी विवेकानंद और रवींद्रनाथ टैगोर की अमिट छाप थी। अपनी अधूरी आत्मकथा में स्वामी विवेकानंद की अक्सर कहने वाली ऋगवेद की उस ऋचा का वर्णन वह करते हैं। वह कहते हैं “आत्मनो मोक्षार्थम जगत हिताय” अर्थात पहले स्वतः को मोक्ष तथापि दूसरों के सुख के लिए संघर्ष, समर्पण करना चाहिए। स्वामी विवेकानंद जी ने कहा था कि मेरा नारायण दरिद्र नारायण है। इसका चरितार्थ प्रसंग सुभाष बाबू के जीवन में देखने को मिलता है।

उत्तरी बंगाल में भयावह बाढ़ आयी थी, जिसमें व्यापक तौर पर जनहानि हुई। उन दिनों सुभाष बाबू कलकत्ता के प्रेसिडेंसी कालेज में पढ़ाई कर रहे थे और अपने कुछ मित्रों के साथ व बाढ पीड़ितों की सहायता में लगे थे। एक दिन वह जनसेवा कार्य में लगे थे तो उनके पिता ने कहा कि बेटा तुम कहां व्यस्त हो? सुभाष बाबू ने उत्तर दिया पिताजी मैं बाढ़ पीड़ितों की सेवा में लगा हूं। बाढ़ ने लोगों का घर-बार उजाड़ दिया है। उनकी यह हालत देखकर मेरा दिल रो उठता है। इस बार उनके पिता जानकीनाथ बोस ने कहा सुभाष मैं तुमसे सहमत हूं। लोगों की मदद जरूर करनी चाहिए, लेकिन ऐसा करने के लिए अपने कर्तव्यों की अनदेखी नहीं करनी चाहिए। अपने यहां दुर्गा पूजन का भव्य कार्यक्रम आजित किया गया है। इसमें मेरे साथ तुम्हारा होना भी बेहद आवश्यक है। पिता को जवाब देते हुए सुभाष बाबू ने कहा पिताजी मुझे माफ करिए। मेरा आपके साथ जाना संभव नहीं है। जब चारों ओर बाढ़ से हाहाकार मचा है, ऐसे मेरे दिमाग में केवल एक ही विचार आता है कि किस तरह लोगों की अधिक से अधिक मदद की जाए। मेरे लिए दीन-दुखियों में ही दुर्गा का वास है। मेरी पूजा के भागी यही लोग है। यह सुनकर उनके पिता भाव-विभोर हो गए। उनकी यही अनन्य देश प्रेम का भाव उन्हें अन्य महा पुरुषों से अलग करता है।

आइसीएस की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद प्रशासनिक सेवा में चयन होने के बाद भी उनको अंग्रेजों की नौकरी स्वीकार्य नहीं थी। देश के प्रति समर्पण और राष्ट्रहित में सोच की भावना में उन्होंने अंग्रेजों की नौकरी छोड़ दी। प्रशासनिक सेवा से त्यागपत्र देने के बाद सुभाष गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह पर चितरंजन दास की पार्टी के साथ जुड़े तथा राजनीति की शुरुआत की। वे बाल गंगाधर तिलक के पूर्ण स्वाराज्य के प्रचंड समर्थक थे।

स्वतंत्रता के राष्ट्रीय आंदोलन को विश्व पटल पर ले जाकर विश्व व्यापी बनाने का श्रेय सुभाष बाबू को ही जाता है। वह 1938 में विशेष आग्रह पर कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। गौर करने वाली बात यह है कि जब सुभाष बाबू कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने, उस समय देश के अधिकांश प्रांतों में कांग्रेस की सरकार थी। कांग्रेस के समक्ष उस समय एक विकासवादी गवर्नेंस मॉडल प्रस्तु करने की चुनौती पैदा हुई। तत्कालीन सरकार में रक्षा और विदेश मामलों को छोड़कर बाकी सभी विभाग और मंत्रालय कांग्रेस सरकार के ही अधीनस्थ थे। इसे देखते हुए नेता जी ने बड़े निर्णय लिये और प्लानिंग कमेटी और साइंस काउंसिल का गठन किया। जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता में बनी प्लानिंग कमेटी को सुभाष बाबू ने ‘बॉटम टू टॉप’ की अवधारणा पर विकास का मॉडल तैयार करने को कहा। लेकिन नेहरू ने तत्कालीन सोवियत संघ के मॉडल पर काम किया जिस पर बाद में कांग्रेस की सरकारों ने अमल किया। लेकिन महात्मा गांधी समेत तमाम कांग्रेसी नेताओं के विचारों से मेल नहीं खाने के चलते सुभाष चंद्र बोस ने 1939 में कांग्रेस से त्यागपत्र दे दिया। बाद में उन्होंने फारवर्ड ब्लॉक की स्थापना की।

सुभाष चंद्र बोस की शख्सियत की विशेषताओं और उनमें छिपी राष्ट्र हित की भावना को अगर किसी राजनेता ने समझा और उस पर अमल किया है तो वे हैं देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। प्रधानमंत्री मोदी की नेतृत्व वाली सरकार ने जब नीति आयोग का गठन किया तभी सुभाष बाबू की बनायी प्लानिंग कमेटी की आधारशिला को आकार मिल सका। मोदी सरकार की विकास की अवधारणा भी ‘बॉटम टू टॉप’ की सोच पर आधारित है। सुभाष चंद्र बोस की इस अवधारणा के आर्थिक चिंतन के मूल में स्वामी विवेकानंद, असम के विचारक शंकर देव, तमिलनाडु के तिरुवल्लू और बाबा साहेब अंबेडकर का विशेष महत्व है।

अंग्रेजों से आजादी के संघर्ष के दौरान जब बोस जी ने देखा कि शक्तिशाली संगठन के बिना स्वाधीनता मिलना मुश्किल है तो वे जर्मनी से टोकियो गए और वहां पर उन्होंने आजाद हिन्द फ़ौज की स्थापना की। देश से अंग्रेजों को निकालने की उनकी धुन और पूर्ण स्वराज की अवधारणा उनके मन में बसी थी। इसीलिए उन्होंने कहा “हमारी यह सेना हिंदुस्तान को अंग्रेजों की दासता से मुक्त करेगी।” लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री मोदी ने इसकी व्यापकता का जिक्र करते हुए कहा था कि आजाद हिंद सरकार ने हर क्षेत्र से जुड़ी योजनाएं बनायी थीं। इसका अपना बैंक था, अपनी मुद्रा थी और अपना डाक टिकट था। नेताजी की सूझबूझ का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि आजाद हिंद सरकार का अपना गुप्तचर तंत्र भी था। अपने युग से आगे की सोच रखते हुए नेताजी ने महिला सशक्तीकरण को भी महत्व दिया। आजाद हिंद फौज में महिला रेजिमेंट का गठन भी किया, जिसकी कमान कैप्टन लक्ष्मी स्वामीनाथन को सौंपी गई। सुभाष बाबू की दूरदर्शिता का उदाहरण आजाद हिंद फौज का अपना रेडियो और ‘फॉरवर्ड’ नाम की पत्रिका थी जिनके जरिए सुभाष चंद्र बोस के लेखों और भाषणों का प्रसार किया जाता था।

प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व वाली मौजूदा सरकार नेताजी सुभाष चंद्र बोस, महात्मा गांधी और अंबेडकर सरीखे महापुरुषों के सपनों का भारत निर्मित करने के काम में लगी हुई है। आत्मनिर्भर भारत अभियान सुभाष बाबू के आर्थिक चिंता का क्रियान्वयन है जो राष्ट्र को संपन्न बनाते हुए विश्व गौरव की ओर लेकर जाएगा।