Tuesday, March 24, 2026
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जन्माष्टमी पर बनाएं विशेष भोग

मावा मिश्री
सामग्री– 1/2 कप घी, 4-5 बर्फ के टुकड़े, 3 बड़े चम्मच मिश्री, मक्खन
विधि – आप मक्खन मिश्री बनाने के लिए सफेद और ताजा मक्खन भी ले सकते हैं। लेकिन अगर मक्खन न हो तो घी में बर्फ डालकर उसे अच्छी तरह फेंट लें। घी फेंटते हुए आपको मक्खन अलग होता दिखेगा। इससे बर्फ निकाल लें और बने हुए मक्खन में मिश्री डालकर अच्छी तरह से मिलाएं । आपका प्रसाद तैयार है।

ओट्स वाले लड्डू


सामग्री – एक कप ओट्स, आधा कप मूंगफली, आधा कप गुड़, एक चम्मच सफेद तिल, आधा कप कटे हुए बादाम, काजू और पिस्ता, एक कटोरी पानी
विधि – सबसे पहले एक पैन को गर्म करें और उसमें मूंगफली को भून लें। अब इसका छिलका निकाल दरदरा पीस लें। उसी पैन में तिल भी ब्राउन होने तक भूनें और फिर ओट्स को भी भून लें। अब एक बाउल में इन चीजों को मिक्स करें। एक दूसरे पैन को गर्म कर उसमें पानी और गुड़ डालकर पका लें। गुड़ पिघल जाने के बाद उसमें ड्राई फ्रूट्स डालें और जब यह थोड़ा थिक हो जाए तो इसमें ओट्स, मूंगफली और तिल का मिश्रण डालें और मिला लें। इसे ठंडा करने के बाद, उसके लड्डू बना लें। आपके ओट्स के लड्डू तैयार हैं। आप इसमें कसा हुआ नारियल भी डाल सकते हैं।

जन्माष्टमी विशेष : श्री कृष्ण के ऐतिहासिक और साहित्यिक वर्णन तथा उनके जीवन से जुड़े रोचक तथ्य

हिन्दू धर्म में श्रीकृष्ण को भगवान विष्णु के 8वें अवतार के रूप में पूजा जाता हैं। उन्हें कन्हैया, श्याम, गोपाल, केशव, द्वारकेश या द्वारकाधीश, वासुदेव आदि नामों से भी जाना जाता है। उनका जन्म द्वापरयुग में हुआ था। उनको इस युग के सर्वश्रेष्ठ पुरुष, युगपुरुष या युगावतार का स्थान दिया गया है। महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित श्रीमद्भागवत और महाभारत में कृष्ण का चरित्र विस्तृत रूप से वर्णित किया गया है। भगवद्गीता में कृष्ण और अर्जुन का संवाद आज भी पूरे विश्व में लोकप्रिय है। इस उपदेश के लिए कृष्ण को जगतगुरु का सम्मान भी दिया जाता है।
जगतगुरु भगवान श्री कृष्ण के जीवनकाल का विस्तृत विवरण सबसे पहले महाकाव्य महाभारत में मिलता है, जिसमें कृष्ण को भगवान विष्णु के आठवें अवतार के रूप में दर्शाया गया है।
महाभारत के कई अंशों में कृष्ण को केंद्र में रखा गया है। श्री कृष्ण भगवत गीता महाकाव्य के छठे पर्व ( भीष्म पर्व ) के अठारहवे अध्याय में, वासुदेव कृष्ण युद्ध के मैदान में अर्जुन को महान ज्ञान देते हैं। महाभारत के अलावा के परिशिष्ट में भी कृष्ण के बचपन और युवावस्था का एक विस्तृत संस्करण है। इसके अलावा भी दूसरे महाकाव्यों तथा ऐतिहासिक पुस्तकों में भी वासुदेव श्री कृष्ण का आंशिक अथवा विस्तृत वर्णन मिलता है।
भारतीय-यूनानी मुद्रण: लगभग 180ईसा पूर्व इंडो-ग्रीक राजा एगैथोकल्स  ने देवताओं की छवियों पर आधारित वैष्णव दर्शन से संबंधित कुछ सिक्के जारी किये थे। इन सिक्कों पर शंख और सुदर्शन चक्र धारण किये हुए, भगवान विष्णु के अवतार वासुदेव कृष्ण तथा गदा और हल के साथ बलराम को देखा जा सकता है।
प्राचीन संस्कृत वैयाकरण पतंजलि (Patanjali): ने भी अपने महाभाष्य में वासुदेव कृष्ण और उनके सहयोगियों के कई प्रसंगों का उल्लेख किया है। पाणिनी की श्लोक संख्या 3.1.26 में भी एक टिप्पणी के माध्यम से कंस वध अथवा कंस की हत्या से सम्बन्धित किंवदंतियों का वर्णन किया गया है।
हेलियोडोरस शिलालेख (Heliodorus inscription): पुरातत्वविदों द्वारा मध्य भारतीय राज्य मध्य प्रदेश में औपनिवेशिक काल के, ब्राह्मी लिपि में लिखे शिलालेख के साथ एक स्तंभ की खोज की थी। यह शिलालेख “वासुदेव” को समर्पित है जो भारतीय परंपरा में कृष्ण का दूसरा नाम है।
हाथीबाड़ा शिलालेख: हेलियोडोरस शिलालेख के अलावा राजस्थान राज्य में स्थित 19वीं सदी ईसा पूर्व के तीन हाथीबाड़ा शिलालेख और एक घोसूंडी शिलालेख मे भी कृष्ण का उल्लेख किया गया है। कई पुराणों में भी भगवान कृष्ण के जीवन के कुछ संदर्भों को विस्तार पूर्वक बताया गया है, अथवा इस पर प्रकाश डाला गया है। भागवत पुराण और विष्णु पुराण में कृष्ण के जीवनकाल की सबसे विस्तृत जानकारी है।
एक ब्रिटिश राजनयिक, औपनिवेशिक प्रशासक और वनस्पतिशास्त्री, सर चार्ल्स एलियट (Sir Charles Eliot) द्वारा भी हिंदू धर्म पुस्तक तथा विभिन्न स्रोतों में उपलब्ध साहित्यिक साक्ष्य के आधार पर कृष्ण की कथा की उत्पत्ति का पता लगाने की कोशिश की गई है। उन्होंने विभिन्न स्रोतों से कृष्ण की ऐतिहासिक उत्पत्ति का पता लगाने का हर संभव प्रयास किया। उनके निष्कर्षों के अनुसार विष्णु के अन्य महान अवतार कृष्ण, भारतीय देवताओं में सबसे विशिष्ट व्यक्तियों में से एक हैं। लेकिन अभी भी उनकी ऐतिहासिक उत्पत्ति अस्पष्ट बनी हुई है। ऋग्वेद में कृष्ण के लिए काले अथवा गहरा नीले रंग वाला शब्द प्रयोग किया गया है। छांदोग्य उपनिषद में, देवकी के पुत्र कृष्ण का उल्लेख अंगिरसा वंश के ऋषि घोर द्वारा शिक्षित किए जाने के रूप में किया गया है, अतः यह संभव है की कृष्ण भी उन्हीं के वंश के थे। कृष्ण का एक प्रसिद्ध नाम वासुदेव भी है, और यह पाणिनि का एक सूत्र भी है। पतंजलि द्वारा किये गए उल्लेखों पर गौर किया जाए तो, ऐसा लगता है कि यह एक कबीले का नाम नहीं है, बल्कि एक देवता का नाम है। यदि ऐसा है तो संभव है की वासुदेव को ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में एक देवता के रूप में मान्यता दी गई होगी। उनका उल्लेख दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के आसपास के शिलालेखों में भी मिलता है। श्री कृष्ण का नाम और इतिहास सदैव रहस्यमयी रहा है, किंतु उनके जीवन की कई ऐसी अनसुनी कहानियां और रोचक तथ्य भी हैं, जो रहस्यमयी होने के साथ-साथ संदेशपूर्ण भी हैं।
1. गायों का स्वर्ग और वैकुंठ: प्रभु श्री राम और श्री कृष्ण के भक्त, कभी भी उन्हें मृत नहीं मानते। बल्कि उनका मानना है की, लीलाओं को समाप्त करने के पश्चात ये दोनों वैकुंठ को लौट गए। राम कृष्ण से अलग हैं, क्योंकि राम नहीं जानते कि वह विष्णु हैं, जबकि कृष्ण कहते हैं की वह विष्णु हैं। मान्यताओं के अनुसार राम विष्णु के सातवें अवतार हैं और कृष्ण आठवें हैं। कुछ भक्त वैकुंठ को सबसे ऊपर मानते हैं तो, कई भक्तों के लिए कृष्ण का गोलोक का स्वर्ग विष्णु के वैकुंठ के स्वर्ग से ऊंचा है। माना जाता है की वैकुंठ दूध के सागर में स्थित है, लेकिन यह सारा दूध गोलोक में स्थित गायों के थन से आता है। ये गायें कृष्ण की बांसुरी से मंत्रमुग्द होकर स्वेच्छा से अपना दूध देती हैं।
2. स्थानीय रूप में वैश्विक कृष्णा: महाराष्ट्र के कवि-संतों जैसे एकनाथ, तुकाराम और ज्ञानेश्वर ने कृष्ण को जन-जन तक पहुंचाया। महाराष्ट्र में लोग कृष्ण की छवि को पंढरपुर के विठोबा के रूप में देखते हैं। राजस्थान और गुजरात में कृष्ण का दर्शन नाथद्वारा के श्रीनाथजी के माध्यम से होता है। ओडिशा के लोग पुरी मंदिर में जगन्नाथ की स्थानीय छवि के माध्यम से कृष्ण से जुड़ते हैं। असम में, कृष्ण के चित्र नहीं हैं किंतु यहां कृष्ण को जप, गायन, नृत्य और प्रदर्शन के माध्यम से पूजा जाता है।
4. बौद्धिक भगवद गीता और भावनात्मक भागवत पुराण: यह तथ्य विवादस्पद प्रतीत होता है किंतु, महाभारत को पारंपरिक रूप से अशुभ माना जाता है, क्योंकि यह रक्तपात और पारिवारिक युद्ध को दर्शाता है। यही कारण है कि लोग भागवत पुराण से कृष्ण के बचपन और युवावस्था की कहानियों को उनकी मां यशोदा और उनकी प्यारी गोपियों के साथ सुनाना पसंद करते हैं। महाभारत का एकमात्र शुभ हिस्सा भगवद गीता है, जो कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान में कृष्ण द्वारा अर्जुन को सुनाई गई हिंदू दर्शन का सारांश है। अगर भगवद गीता नहीं होती, तो संभवतः लोग कृष्ण के जीवन के उत्तरार्ध को इतना महत्व नहीं देते।
5. जैन और बौद्धों के कृष्ण: बौद्ध और जैन परंपराओं में कृष्ण की कई कहानियां प्रचलित हैं। जैन महाभारत में युद्ध कौरवों और पांडवों के बीच नहीं बल्की द्वारका के कृष्ण और मगध के सम्राट जरासंध के बीच होता है, जिसमें पांडव कृष्ण का समर्थन करते हैं और कौरव जरासंध का समर्थन करते हैं।
6. अत्याचारियों के प्रति दया: अत्याचारियों पर दया और करुणा करने के संदर्भ में कृष्ण की कई कहानियां प्रचलित हैं। कंस, जरासंध और दुर्योधन कृष्ण विद्या के तीन मुख्य खलनायक हैं। कहा जाता है कि इन तीनों का बचपन बेहद दर्दनाक था। कंस की मां ने उसे जन्म देते ही अस्वीकार कर दिया था। जरासंध जन्म के समय विकृत (deformed) पैदा होता है, उसके पिता की दो रानियाँ उसके आधे शरीर को जन्म देती हैं, और उसके बाद दो हिस्सों को जरा नामक राक्षसी द्वारा आपस में जोड़ दिया जाता है। दुर्योधन की मां अपने अंधे पति के साथ एकजुटता में आंखों पर पट्टी बांधकर रखती है, इसलिए वह जीवन भर अपने माता-पिता द्वारा अनदेखा किया जाता है। यह तर्क इस ओर इशारा करते हैं कि समाज में जिन लोगों को बुरा माना जाता है, उनके साथ अक्सर अन्याय होता है, जो उन्हें इतना असुरक्षित बनाता है, कि वे असंवेदनशील और अमानवीय हो जाते हैं।
भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव, कृष्ण जन्माष्टमी के दौरान देशभर के कृष्ण मंदिर में भक्तों की भरी भीड़ जुटती है। हमारे शहर रामपुर में भी इस पावन अवसर पर पुराना गंज स्थित हरिहर मंदिर, जोकीराम का मंदिर, पीपल टोला स्थित मंदिर, मनोकामना मंदिर और मांई का थान मंदिर में पूजा आराधना की जाती है। आमतौर पर सभी मंदिरों में जन्माष्टमी के अवसर पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटती है, और भगवान श्री कृष्ण की देर रात तक पूजा अर्चना होती है।
(साभार – प्रारंग वेबसाइट)

क्या चीनी की जगह मधुमेह को नियंत्रित रखता है गुड़ ?

मधुमेह की बीमारी लोगों को तेजी से अपना शिकार बना रही है । आम बोलचाल की भाषा में इसे शुगर की बीमारी भी कहा जाता है. लगातार लोगों को अपना शिकार बनाने वाली इस बीमारी को लेकर ऐसी कुछ बातें कहीं जाती है जिससे पर विश्वास करना थोड़ा मुश्किल है । ऐसी ही एक बात यह है कि डायबिटीज के मरीज चीनी की जगह गुड़ खाएंगे तो उनका शुगर लेवल नियंत्रित रहेगा । गुणवत्ता की दृष्टि से आज मिलने वाला गुड़ लाभ नहीं, अपितु हानि पहुंचाता है ।
मधुमेह के कारण – आज के समय में अगर कोई व्यक्ति अपनी खानपान की आदतों के साथ खिलवाड़ कर रहा है तो इसस आने वाले समय में उसे कई तरह के मुश्किल का सामना करना पड़ सकता है इसलिए खाने में विटामिन, मिनरल और जरूरी पोषक तत्व होने चाहिए. ताकि मधुमेह का खतरा न रहे ।
खराब जीवनशैली – खराब जीवनशैली आपके शरीर को अंदर तक खराब कर देती है । आज के समय में सोने-जागने का कोई सही वक्त नहीं है जिसके कारण लोग व्यायाम भी नहीं करते हैं, बाद में जाकर वह मधुमेह के मरीज हो जाते हैं ।
शरीर में कफ – किसी व्यक्ति के शरीर में काफी ज्यादा कफ बन रहा है तो वह मधुमेह का कारण हो सकता है । इसका आयुर्वेद से ही इलाज संभव है । किसी व्यक्ति के शरीर में काफी ज्यादा कफ बन रहा है तो वक्त रहते जरूर इलाज करवाएं ।
प्रदूषण – तेजी से प्रदूषण बढ़ने के कारण मधुमेह बनने का खतरा हमेशा बना हुआ रहता है. शुद्ध हवा में रहने की कोशिश करें ।
ज्यादा से ज्यादा सक्रिय रहें – मधुमेह के मरीज जितना ज्यादा सक्रिय रहेंगे उन पर मधुमेह उतना ही अपना प्रभाव कम करेगा इसलिए जरूरी है कि शारीरिक रूप से ज्यादा से ज्यादा सक्रिय रहें ।

आदित्य की ओर चला आदित्य एल – 1

आदित्य एल1 सूर्य का अध्ययन करने वाला पहला अंतरिक्ष आधारित भारतीय मिशन होगा। अंतरिक्ष यान को सूर्य-पृथ्वी प्रणाली के लाग्रेंज बिंदु 1 (एल1) के चारों ओर एक प्रभामंडल कक्षा में रखा जाएगा, जो पृथ्वी से लगभग 1.5 मिलियन किमी दूर है। एल1 बिंदु के चारों ओर प्रभामंडल कक्षा में रखे गए उपग्रह को सूर्य को बिना किसी आच्छादन/ग्रहण के लगातार देखने का प्रमुख लाभ है। यह वास्तविक समय में सौर गतिविधियों और अंतरिक्ष मौसम पर इसके प्रभाव को देखने का अधिक लाभ प्रदान करेगा। अंतरिक्ष यान वैद्युत-चुम्बकीय और कण और चुंबकीय क्षेत्र संसूचकों का उपयोग करके फोटोस्फीयर, क्रोमोस्फीयर और सूर्य की सबसे बाहरी परतों (कोरोना) का निरीक्षण करने के लिए सात नीतभार ले जाएगा। विशेष सहूलियत बिंदु एल1 का उपयोग करते हुए, चार नीतभार सीधे सूर्य को देखते हैं और शेष तीन नीतभार लाग्रेंज बिंदु एल1 पर कणों और क्षेत्रों का यथावस्थित अध्ययन करते हैं, इस प्रकार अंतर-ग्रहीय माध्यम में सौर गतिकी के प्रसार प्रभाव का महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अध्ययन प्रदान करते हैं। आदित्य एल1 नीतभार के सूट से कोरोनल तापन, कोरोनल मास इजेक्शन, प्री-फ्लेयर और फ्लेयर गतिविधियों और उनकी विशेषताओं, अंतरिक्ष मौसम की गतिशीलता, कण और क्षेत्रों के प्रसार आदि की समस्या को समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करने की उम्मीद है।
आदित्य-एल1 मिशन के प्रमुख विज्ञान उद्देश्य हैं:
सौर ऊपरी वायुमंडलीय (क्रोमोस्फीयर और कोरोना) गतिकी का अध्ययन।
क्रोमोस्फेरिक और कोरोनल तापन, आंशिक रूप से आयनित प्लाज्मा की भौतिकी, कोरोनल मास इजेक्शन की शुरुआत, और फ्लेयर्स का अध्ययन
सूर्य से कण की गतिशीलता के अध्ययन के लिए डेटा प्रदान करने वाले यथावस्थित कण और प्लाज्मा वातावरण का प्रेक्षण
सौर कोरोना की भौतिकी और इसका ताप तंत्र।
कोरोनल और कोरोनल लूप प्लाज्मा का निदान: तापमान, वेग और घनत्व।
सी.एम.ई. का विकास, गतिशीलता और उत्पत्ति।
उन प्रक्रियाओं के क्रम की पहचान करें जो कई परतों (क्रोमोस्फीयर, बेस और विस्तारित कोरोना) में होती हैं जो अंततः सौर विस्फोट की घटनाओं की ओर ले जाती हैं।
कोरोना में चुंबकीय क्षेत्र टोपोलॉजी और चुंबकीय क्षेत्र माप।
हवा की उत्पत्ति, संरचना और गतिशीलता

चन्द्रमा के आंगन में उतरा चन्द्रविजेता भारत

शुभजिता फीचर डेस्क

23 अगस्त 2023 भारत के स्वर्णिम इतिहास का एक अध्याय बन चुका है । इतिहास का वह अध्याय…जिस पर वर्तमान ही नहीं बल्कि आने वाला समय भी सदैव गर्व करता रहेगा । विश्व के तमाम विकसित देशों द्वारा अवहेलित भारत ने आज वह अध्याय रच दिया है कि वह समाज आज भारत की ओर देख रहा है । पराक्रम सिर्फ शस्त्र दिखाना या युद्ध करना नहीं होता बल्कि अपनी मेधा, अपने श्रम, अपनी अदम्य साहसिक चेतना और असाधारण कृतत्व से अपना लक्ष्य प्राप्त करना है और यह पराक्रम हमारे वैज्ञानिकों ने कर दिखाया है । 23 अगस्त 2023 को चंद्रयान-3 का लैंडर विक्रम चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतरा है। किसी भी प्रक्षेपण यान के किसी ग्रह पर उतरने पर उस उतरने वाले स्थान को एक नाम देने की परंपरा है। यह परंपरा सभी देश और संस्थान निभाते हैं। जिस स्थान पर चंद्रयान 3 का विक्रम लैंडर उतरा था उस स्थान का नाम भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने शिव शक्ति पॉइंट रखा है। जहां चन्द्रयान 2 उतरा था, वह प्वाइंट तिरंगा कहलाएगा । 23 अगस्त का दिन अब अंतरिक्ष दिवस के नाम से मनाया जाएगा । ये उनके आध्यात्मिक ज्ञान को दर्शाता है। “शिव” में मानव कल्याण का संकल्प समाहित हैं, और “शक्ति” से हमें उन संकल्पो को पूरा करने का सामर्थ्य हासिल होता है। शक्ति एक माध्यम है, जिससे हम किसी भी सपने को पूरा करने की क्षमता प्राप्त करते हैं। भारत के प्रधान मंत्री के अनुसार; शक्ति नाम हिमालय (शिव का प्रतिनिधित्व करता है) से कन्याकुमारी (शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है) तक भारत देश का प्रतिनिधित्व करता है। शिव शक्ति प्वाइंट भारत की वैज्ञानिक और दार्शनिक सोच का गवाह बनेगा। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) का तीसरा चंद्र मिशन चंद्रयान-3 चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग करता है। इस अवसर पर पीएम मोदी ने भारतीय वैज्ञानिकों के सामर्थ्य पर खुशी जताते हुए इसे भारत के लिए ऐतिहासिक और समृद्ध कदम बताया। पीएम मोदी ने कहा, “हमने धरती पर संकल्प किया और चांद पर उसे साकार किया…भारत अब चंद्रमा पर है।”इसरो के तीसरे चंद्र मिशन चंद्रयान-3 की चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग पर पीएम मोदी ने कहा, “जब हम ऐसे ऐतिहासिक क्षण देखते हैं तो हमें बहुत गर्व होता है। यह नए भारत की सुबह है।” चंद्रयान-3 अंतरिक्ष यान में एक प्रणोदन मॉड्यूल (वजन 2,148 किलोग्राम), एक लैंडर (1,723.89 किलोग्राम) और एक रोवर (26 किलोग्राम) शामिल है।कुछ दिन पहले लैंडर प्रोपल्शन मॉड्यूल से अलग हो गया और अब दोनों अलग-अलग कक्षाओं में चंद्रमा का चक्कर लगा रहे हैं। हाल ही में, चंद्रमा लैंडर ने चंद्रयान -2 मिशन के ऑर्बिटर के साथ संचार लिंक स्थापित किया है, जो 2019 से चंद्रमा की परिक्रमा कर रहा है और इस तरह एक बैकअप टॉकिंग चैनल है। चंद्रयान-3 में महिलाओं का अहम योगदान : भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि भले ही चंद्रयान-2 मिशन के विपरीत चंद्रयान-3 मिशन का नेतृत्व पुरुषों द्वारा किया जा रहा है, लेकिन बड़ी संख्या में इसमें महिलाओं का योगदान हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर आईएएनएस को बताया, “लगभग 54 महिला इंजीनियर/वैज्ञानिक हैं, जो चंद्रयान-3 मिशन पर काम कर रही है। वे अलग-अलग केंद्रों पर काम करने वाले विभिन्न प्रणालियों के सहयोगी और उप परियोजना निदेशक और परियोजना प्रबंधक हैं।”
छात्रों ने इसरो के चंद्रयान-3 चंद्रमा मिशन के लिए महत्वपूर्ण मोटर का किया निर्माण : चंद्रमा पर भारत के तीसरे मिशन – चंद्रयान-3 – के प्रक्षेपण की उलटी गिनती सुचारू रूप से आगे बढ़ रही है और लाखों लोग सांस रोककर इंतजार कर रहे हैं, छात्रों की एक टीम ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के स्वदेशी अंतरिक्ष यान के लिए एक महत्वपूर्ण मोटर बनाई है।इसरो ने अपने अंतरिक्ष मिशन के लिए तमिलनाडु के सेलम में सोना कॉलेज ऑफ टेक्नोलॉजी की सौनास्‍पीड टीम को विभिन्न प्रकार की मोटरों के निर्माण का काम सौंपा था। अंतरिक्ष एजेंसी ने आखिरकार चंद्रयान-3 को लॉन्च करने के लिए लॉन्च व्हीकल मार्क-तीन (एलवीएम 3) में उपयोग के लिए बनाई गई एक स्टेपर मोटर को खरीद लिया। अंतरिक्ष में यात्रा के लिए, चंद्रयान-3 प्रक्षेपण यान, एलवीएम 3 को चंद्रमा मिशन के साथ सफलतापूर्वक एकीकृत किया गया है।

यह रही मिशन चन्द्रयान को सफल बनाने वाली टीम
गत 14 जुलाई को क़रीब 2:35 बजे आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन स्पेस सेंटर से चन्द्रयान लांच किया गया था । इस मिशन का बजट महज 615 करोड़ रुपये रहा । इस मिशन को सफल बनाने के लिए इसरो की टीम ने कड़ा परिश्रम किया । 2019 की असफलता से वैज्ञानिकों का दिल टूटा जरूर मगर उस असफलता को सफलता में इन वैज्ञानिकों ने बदला । तब के. सिवन इसरो के चेयरमैन थे और अब एस. सोमनाथ हैं मगर यह सफलता तमाम विफलताओं को सफलता में बदलने की यात्रा है । चन्द्रयान -3 को चांद पर भेजने के लिए एलवीएम -3 लांचर का उपयोग किया गया । यह सफलता इसरो के सैकड़ों वैज्ञानिकों के अनथक परिश्रम का परिणाम है तो आज मिलते हैं चन्द्रयान -3 की टीम से –
1. एस. सोमनाथ – इसरो के चेयरमैन एस. सोमनाथ को इस चन्द्र अभियान का मष्तिष्क माना जाता है । एस. सोमनाथ गगनयान और आदित्य-एल1जैसे मिशन का भी मुख्य हिस्सा रहे हैं । उन्होंने टीकेएम कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग (कोल्लम) से मेकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है । इसके साथ ही इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (बंगलुरू) से एरोस्पेस इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है । इसरो के अध्यक्ष बनने से पहले एस. सोमनाथ लिक्विड प्रोप्लशन सिस्टम सेंटर एनं विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर के निदेशक भी रह चुके हैं ।
2. पी. वीरमुथुवेल – पी वीरमुथुवेल ने साल 2019 में चंद्रयान-3 के प्रोजेक्ट डायरेक्टर की ज़िम्मेदारी ली थी. वर्तमान पद से पहले वो इसरो हेडक्वार्टर के स्पेस इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोग्राम ऑफिस के उप निदेशक थे । पी. वीरमुथुवेल चंद्रयान 2 मिशन के भी मुख्य वैज्ञानिकों में से एक थे । पी.वीरमुथुवेल तमिलनाडु के रहने वाले हैं और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (मद्रास) के विद्यार्थी रह चुके हैं ।
3. एस. उन्नीकृष्णन नायर – विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर का प्रमुख बनने से पहले एस. उन्नीकृष्णन नायर और उनकी वैज्ञानिकों की टीम कई महत्वपूर्ण मिशन के मूल दायित्व वहन कर चुकी है । जियोसिन्क्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल, जिसे बाद में लॉन्च व्हीकल मार्क – 111 नाम दिया गया था, वह इसी केन्द्र में विकसित किया गया था । उन्नीकृष्णन ने मार एथेंशियस कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से बी.टेक की पढ़ाई की है । इसके अतिरिक्त आईआईएससी, बंगलुरू से एम. ई, एरोस्पेस इंजीनियरिंग और आईआईटी मद्रास से मेकेनिकल इंजीनियरिंग में पीएचडी की है ।
4. ए. राजराजन – ए. राजराजन एक सफल वैज्ञानिक और वर्तमान में सतीश धवन स्पेस सेंटर (एसडीएससी एसएसएआर) के निदेशक हैं । ए. राजराजन कॉम्पोजिट क्षेत्र के विशेषज्ञ हैं । इन्होंने 1987 में मेकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक किया । वहीं, 2015 में इन्हें इसरो मेरिट अवार्ड से सम्मानित किया गया था , साथ ही 2010, 2011 और 2015 में इन्हें इसरो टीम एक्सीलेंस अवार्ड दिया गया था ।
5. एम. शंकरन – साल 2021 में एम. शंकरन ने यू आर राव सैटेलाइट सेंटर के डायरेक्टर का पद संभाला था । यह सेंटर सैटेलाइट के निर्माण और एसोसिएटेड सैटेलाइट तकनिक के विकास के लिए एक अग्रणी केंद्र है । इन्होंने भारतीदसान यूनिवर्सिटी (तिरुचिरापल्ली) से फिजिक्स से मास्टर डिग्री प्राप्त की है । साथ ही इन्हें 2017 में इसरो का पर्फामेंस एक्सीलेंस अवार्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है । इसके अलावा, 2017 और 2018 में इन्हें इसरो टीम एक्सीलेंस अवार्ड भी दिया गया था ।
6. एस. मोहन कुमार – एस. मोहन कुमार एलवीएम 3 -एम 4 / चन्द्रयान 3 के मिशन डायरेक्टर हैं । एस. मोहन कुमार । मोहन कुमार विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर के वरिष्ठ वैज्ञानिक हैं । ये एलवीएम3 – एम3 मिशन (वन वेब इंडिया 2 सैटेलाइट्स ऑन बोर्ड) के भी निदेशक भी रह चुके हैं.
7. रितु करिधाल श्रीवास्तव – रितु कारिधाल लखनऊ की रहने वाली हैं, जिन्हें रॉकेट विमेन ऑफ इंडिया के नाम से जाना जाता है. रितु इसरो इसरो की वरिष्ठ वैज्ञानिक हैं. वहीं, इससे पहले वे चंद्रयान-2 समेत कई बड़े अंतरिक्ष अभियानों का हिस्सा रह चुकी हैं । इन्हें इसरो का युवा वैज्ञानिक पुरस्कार भी मिल चुका है ।
8. डॉ. के. कल्पना – . डॉ. के. कल्पना चंद्रयान-3 मिशन की डिप्टी प्रोजेक्ट डायरेक्टर हैं । वह लम्बे समय से इसरो के मून मिशन पर काम कर रही हैं । कोविड महामारी के दौरान भी उन्होंने इस मिशन पर काम करना जारी रखा । वो इस प्रोजेक्ट पर पिछले 4 साल से काम कर रही हैं । डॉ. के. कल्पना वर्तमान में यूआरएससी की डिप्टी प्रोजेक्ट डायरेक्टर हैं । इन मुख्य वैज्ञानिकों के अलावा चंद्रयान-3 मिशन से क़रीब 54 महिला इंजीनियर्स और वैज्ञानिक भी जुड़ी हुई थीं ।

अटल बिहारी वाजपेयी ने दिया चन्द्रयान नाम
क्या आपको पता है कि जिस चंद्रयान-3 पर सबकी निगाहें टिकी रहीं, उस मिशन का नाम शुरुआत में सोमयान था, जिसे बाद में बदलकर चंद्रयान कर दिया गया। 1999 में जब चंद्र मिशन को मंजूरी दी गई थी उस समय भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी थे। वाजपेयी ने ही अंतरिक्ष वैज्ञानिकों को चंद्रमा पर खोज करने के लिए प्रेरित किया था। जिाके बाद चांद पर मिशन की तैयारी की गई। रिपोर्ट की मानें तो अटल बिहारी वाजपेयी ने जब सोमयान की जगह चंद्रयान नाम का सुझाव दिया तो वैज्ञानिक समुदाय को यह खास पसंद नहीं आया। दरअसल, सोमयान नाम एक संस्कृत श्लोक से प्रेरित था। संस्कृति में चंद्रमा का ही दूसरा नाम सोम है। उस समय भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के तत्कालीन अध्यक्ष के. कस्तूरीरंगन ने बताया कि अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि मिशन को सोमयान नहीं, बल्कि चंद्रयान कहना चाहिए। उन्होंने बताया कि वाजपेयी ने कहा था कि देश आर्थिक शक्ति के रूप में उभरा है और मिशन आगे चंद्रमा पर कई खोजपूर्ण यात्राएं करेगा । इसरो के मुताबिक, चंद्र मिशन की अवधारणा 1999 में भारतीय विज्ञान अकादमी में चर्चा से आई और 2000 में एस्ट्रोनॉटिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया में आगे की बातचीत हुई। के. कस्तूरीरंगन ने बताया कि मिशन की योजना बनाने में 4 साल और लागू करने में करीब 4 साल लगे।
तारीखों में मिशन चंद्रयान-3 
6 जुलाई : भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने बहुप्रतीक्षित मिशन चंद्रयान-3 की लॉन्चिंग की तारीख का एलान किया। इसरो के अध्यक्ष एस सोमनाथ ने बताया कि चंद्रयान-3 मिशन 14 जुलाई को 2:35 बजे आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा में दूसरे लॉन्च पैड से उड़ान भरेगा। इसरो इस योजना पर बीते चार साल से काम कर रहा था। इससे एक दिन पहले एजेंसी ने बताया था कि श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र में चंद्रयान-3 युक्त एनकैप्सुलेटेड असेंबली को एलवीएम3 के साथ जोड़ा गया। वहीं सभी वाहन विद्युत परीक्षण सात जुलाई को सफलतापूर्वक संपन्न हुए।
11 जुलाई : इसरो ने चंद्रयान-3 को सफलतापूर्वक चंद्रमा पर उतारने का पूर्वाभ्यास किया। इसरो की ओर से एक ट्वीट में बताया कि लॉन्च की पूरी तैयारी और प्रक्रिया का डमी रूप में 24 घंटे का पूर्वाभ्यास सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।
14 जुलाई : भारत के तीसरे चंद्र मिशन ‘चंद्रयान-3’ को लॉन्च किया गया। चंद्रयान-3 ने दोपहर 2:35 बजे चंद्रमा की ओर उड़ान भरा। मिशन को भेजने के लिए LVM-3 लॉन्चर का इस्तेमाल किया गया।
15 जुलाई : चंद्रयान-3 ने पहली कक्षा पूरी की। मतलब उसकी पहली कक्षा बदली। अंतरिक्ष यान 41762 किमीx 173 किमी की कक्षा में पहुंचा। तब इसरो के वैज्ञानिकों ने बताया कि 41 दिन बाद 23 अगस्त को चंद्रमा के दक्षिण ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग की तैयारी के क्रम में चंद्रयान-3 की पृथ्वी के साथ दूरी बढ़ाने की प्रक्रिया शुरू की गई।
17 जुलाई : भारत के अंतरिक्ष मिशन चंद्रयान-3 ने सफलतापूर्वक पृथ्वी की दूसरी कक्षा में प्रवेश किया। तब चंद्रयान-3 पृथ्वी से 41,603 किलोमीटर x226 किलोमीटर दूर स्थित पृथ्वी की कक्षा में मौजूद था।
18 जुलाई : चंद्रयान-3 ने पृथ्वी की तीसरी कक्षा में प्रवेश किया। चंद्रयान-3 पृथ्वी से 51,400 किलोमीटर x228 किलोमीटर दूर स्थित पृथ्वी की कक्षा में मौजूद था।
20 जुलाई : अंतरिक्ष यान को 71351 किमी x 233 किमी की चौथी कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित किया।
25 जुलाई : चंद्रयान-3 के कक्षा बदलने की पांचवीं प्रक्रिया (अर्थ बाउंड ऑर्बिट मैन्यूवर) सफलतापूर्वक पूरी हो गई। यह कार्य बंगलूरू इसरो टेलीमेट्री, ट्रैकिंग एंड कमांड नेटवर्क (आईएसटीआरएसी) से किया गया। तब चंद्रयान पृथ्वी से 127609 किलोमीटर x 236 किलोमीटर दूर कक्षा में पहुंचा।
1 अगस्त : चंद्रयान-3 को पृथ्वी की कक्षा से निकालकर सफलतापूर्वक चांद की कक्षा की तरफ रवाना किया गया। इसरो ने कहा कि ‘चंद्रयान-3 ने पृथ्वी की कक्षा का चक्कर पूरा कर लिया है और अब यह चांद की तरफ बढ़ रहा है।’ चंद्रयान-3 ने चंद्रमा के चारों ओर 288 किमी x 369328 किमी की कक्षा में प्रवेश किया।
5 अगस्त : चंद्रयान-3 164 किमी x 18074 किमी की दूरी पर चंद्र कक्षा में पहुंचा।
6 अगस्त : चंद्रमा के चारों ओर मिशन की कक्षा घटाकर 170 किमी x 4,313 किमी कर दी गई।
9 अगस्त : धीरे-धीरे इसकी गति को घटाते हुए चंद्रमा की अगली कक्षा में पहुंचाने की प्रक्रिया जारी रही। दोपहर दो बजे के आसपास इसे तीसरी कक्षा में प्रवेश कराया गया।
14 अगस्त : चंद्रयान-3 को चौथी कक्षा में पहुंचाने की प्रक्रिया की गई। इस दिन मिशन 151 x 179 किलोमीटर की कक्षा के गोलाकार चरण पर पहुंच गया।
16 अगस्त : पांचवीं कक्षा में पहुंचाने की प्रक्रिया पूरी हुई। फायरिंग के बाद अंतरिक्ष यान 153 किमी x 163 किमी की कक्षा में पहुंच गया।
17 अगस्त : लैंडिंग मॉड्यूल को इसके प्रपल्शन मॉड्यूल से अलग कर दिया गया। लैंडिंग मॉड्यूल में प्रज्ञान रोवर और विक्रम लैंडर शामिल हैं।
18 अगस्त : ‘डीबूस्टिंग’ प्रक्रिया को अंजाम दिया जिसने इसकी कक्षा को 113 किमी x 157 किमी तक कम कर दिया। दरअसल, डीबूस्टिंग यान की गति धीमा करने की एक विधि है।
20 अगस्त : चंद्रयान-3 ने अपना अंतिम डीबूस्ट ऑपरेशन पूरा किया, जिससे विक्रम लैंडर की कक्षा 25 किमी x 134 किमी तक नीचे आ गई।
23 अगस्त : शाम 6.04 मिनट पर विक्रम लैंडर चांद की सतह पर उतरा और चांद के दक्षिण ध्रुव पर उतरने वाला भारत पहला देश बना । तब से लेकर अब तक चन्द्रमा से जुड़े अनेकों तथ्य इसरो ने हमसे साझा किये हैं ।

अब तक क्या पता चला

1. तापमान
27 अगस्त को इसरो ने चंद्रमा की सतह पर तापमान भिन्नता का एक ग्राफ जारी किया और अंतरिक्ष एजेंसी के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक ने भी चंद्रमा पर दर्ज किए गए उच्च तापमान पर आश्चर्य व्यक्त किया है। अंतरिक्ष एजेंसी ने एक अपडेट साझा करते हुए कहा कि चंद्रयान-3 के विक्रम लैंडर पर चंद्रा के सरफेस थर्मोफिजिकल एक्सपेरिमेंट (ChaSTE) पेलोड ने चंद्रमा की सतह के थर्मल व्यवहार को समझने के लिए ध्रुव के चारों ओर चंद्र ऊपरी मिट्टी के तापमान प्रोफाइल को मापा। समाचार एजेंसी पीटीआई से बात करते हुएइसरो के वैज्ञानिक बीएचएम दारुकेशा ने कहा, “हम सभी मानते थे कि सतह पर तापमान 20 डिग्री सेंटीग्रेड से 30 डिग्री सेंटीग्रेड के आसपास हो सकता है, लेकिन यह 70 डिग्री सेंटीग्रेड है। यह आश्चर्यजनक रूप से हमारी अपेक्षा से अधिक है।”
2. 4-मीटर व्यास वाला गड्ढा
27 अगस्त को, चंद्रमा की सतह पर चलते समय, चंद्रयान -3 रोवर को 4-मीटर व्यास वाले गड्ढे के सामने आने पर एक बाधा का सामना करना पड़ा। इसरो के एक अपडेट में कहा गया कि गड्ढा अपने स्थान से 3 मीटर आगे स्थित था। इसके बाद इसरो ने रोवर को अपने पथ पर वापस लौटने का आदेश देने का निर्णय लिया और सूचित किया कि रोवर अब सुरक्षित रूप से एक नए पथ पर आगे बढ़ रहा है।
3. चंद्रमा पर तत्व
30 अगस्त को, चंद्रयान -3 के ‘प्रज्ञान’ रोवर पर लेजर-प्रेरित ब्रेकडाउन स्पेक्ट्रोस्कोप उपकरण ने दक्षिणी ध्रुव के पास चंद्र सतह में सल्फर की उपस्थिति की ‘स्पष्ट रूप से पुष्टि’ की। एल्युमीनियम (Al), कैल्शियम (Ca), आयरन (Fe), क्रोमियम (Cr), टाइटेनियम (Ti), मैंगनीज (Mn), सिलिकॉन (Si), और ऑक्सीजन (O) जैसे अन्य तत्वों का भी पता लगाया जाता है। अंतरिक्ष एजेंसी ने आगे कहा कि हाइड्रोजन (एच) की खोज जारी है। इस बीच, वैज्ञानिकों ने कहा है कि रोवर वर्तमान में “समय के खिलाफ दौड़” में है और इसरो छह पहियों वाले वाहन के माध्यम से अज्ञात दक्षिणी ध्रुव की अधिकतम दूरी को कवर करने के लिए काम कर रहा है। “हमारे पास इस मिशन के लिए कुल मिलाकर केवल 14 दिन हैं, जो चंद्रमा पर एक दिन के बराबर है, इसलिए चार दिन पूरे हो चुके हैं। बचे हुए दस दिनों में हम जितना अधिक प्रयोग और शोध कर पाएंगे, वह महत्वपूर्ण होगा। हम समय के खिलाफ दौड़ में हैं क्योंकि इन 10 दिनों में हमें जो करना है अधिकतम काम और इसरो के सभी वैज्ञानिक इस पर काम कर रहे हैं, “अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र के निदेशक नीलेश एम देसाई ने रविवार को एएनआई को बताया।

सिनेमा में रक्षाबंधन

रक्षाबंधन ऐसा पर्व है जिसके लिए भाई और बहन इस पर्व के सबसे अधिक उत्‍साहित रहते हैं। इस दिन बहन अपने भाई की कलाई पर रक्षासूत्र बांधकर, उनका रोली से टीका कर लंबी उम्र की कामना करती हैं और भाई बदले में बहनों की रक्षा का वचन देते हैं। ये र‍िश्‍ता ऐसा है कि हिंदी फ‍िल्‍मों में भी इसका महत्‍व दिखाया गया है। आइये जानते हैं कि किन बॉलीवुड फ‍िल्‍मों में इस पर्व को दिखाया गया है।

●छोटी बहन (1959) – साल 1959 में आई फ‍िल्‍म छोटी बहन, बहन-भाई के प्यार पर बनी लोकप्रिय फिल्मों से एक है। इसी फिल्म का गाना है ‘भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना…’ जो आज भी खूब सुना जाता है। बलराज साहनी, नंदा, महमूद और रहमान ने इस फ‍िल्‍म में मुख्य भूमिका निभाई थी।

●हरे रामा हरे कृष्णा (1971) – साल 1971 की ये फिल्म भाई-बहन की भावुक कहानी को बयां करती है। देव आनंद और जीनत अमान इस फ‍िल्‍म में लीड थे। इस फ‍िल्‍म का गाना ‘फूलों का तारों का…’ आज भी हिट है।

●रेशम की डोरी (1974)  1974 की फ‍िल्‍म रेशम की डोरी आत्मा राम के निर्देशन में बनी थी और भाई-बहन के र‍िश्‍ते को बखूबी द‍िखा गई। धर्मेद्र इस फ‍िल्‍म में लीड रोल में थे। फिल्म का गाना ‘बहना ने भाई की कलाई से प्यार बांधा है..’ आज भी लोकप्रिय है।

●धर्मात्मा (1975) – बॉलीवुड की श्रेष्‍ठ फ‍िल्‍मों में से एक है धर्मात्‍मा जिसमें फ‍िरोज खान लीड रोल में थे। उनकी बहन का रोल निभाया था फरीदा जलाल ने। फरीदा अपने पति की रक्षा के ल‍िए फिरोज की कलाई पर राखी बांधती हैं।

●सनम बेवफा (1991) – साल 1991 में आई ये फ‍िल्‍म काफी खास थी क्‍योंकि इसमें रक्षाबंधन के पर्व को धर्मों से ऊपर दिखाया गया था। एक मुस्लिम लड़की अपनी दोस्त के पांच राजपूत भाइयों को राखी बांधती है। इस फ‍िल्‍म में सलमान खान लीड रोल में थे।

●तिरंगा (1993) – राज कुमार और नाना पाटेकर की फ‍िल्‍म तिरंगा में भी रक्षाबंधन दिखाया गया। इस फ‍िल्‍म का गाना ‘इसे समझो ना रेशम का तार भैया’ काफी हिट है। अदाकारा Varsha Usgaonkar अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधते हुए ये गाना गाती हैं।

●हम साथ साथ हैं (1999) – सूरज बड़जात्या की इस फिल्म में भाई बहन के अटूट रिश्‍ते को दिखाया गया था। फिल्म में रक्षाबंधन सीन काफी इमोशनल कर देने वाला था। नीलम ने सलमान खान, सैफ अली खान और मोहनीश बहल बहन का रोल निभाया था।

इस कड़ी में सरबजीत का नाम उल्लेखनीय है जो एक सच्ची घटना पर आधारित है । सरबजीत की भूमिका में रणदीप हुडा और उनकी बहन की भूमिका में ऐश्वर्या राय नजर आई थीं । हाल ही में प्रदर्शित अक्षय कुमार की रक्षाबंधन भी इस सूची में शामिल हो गयी है ।

रक्षाबंधन विशेष : जानिए देवताओं की बहनों के नाम

भाई और बहन के स्नेह से जुड़ा रक्षाबंधन का पर्व बहुत विशेष है । ​ हिंदू मान्यता के अनुसार रक्षाबंधन के पर्व को शुभता को बढ़ाने और देवताओं का आशीर्वाद पाने के लिए इस दिन बहनें अपने आराध्य को विशेष रूप से राखी बांधती हैं । जीवन की मंगलकामना करते हुए रक्षाबंधन पर कोई प्रथम पूजनीय भगवान गणेश तो कोई भगवान श्रीकृष्ण को राखी बांधता है, लेकिन क्या आप बड़े देवताओं की बहनें भी बहनें है । यदि नहीं तो आइए भगवान राम से लेकर कान्हा तक के सभी ईश्वरीय अवतारों और देवताओं की बहनों के नाम विस्तार से जानते हैं –

भगवान गणेश – सनातन पंरपरा में किसी भी कार्य की शुरुआत भगवान गणेश जी की पूजा एवं प्रार्थना के जरिए की जाती है। यही कारण है कि रक्षाबंधन पर पहली राखी भगवान गणेश जी को अर्पित करने की मान्यता । हिंदू मान्यता के अनुसार भगवान गणेश की बहन का नाम अशोक सुंदरी है । इसके अलावा मां ज्योति और मां मनसा को भी गणपति की बहनें हैं ।

भगवान विष्णु – हिंदू मान्यता के अनुसार दक्षिण भारत में पूजी जाने वाली मीनाक्षी देवी को भगवान विष्णु की बहन माना जाता है । मीनाक्षी माता को माता पार्वती का अवतार माना गया है ।

भगवान शिव -जिस श्रावण मास में भगवान शिव की पूजा का विशेष महत्व माना गया है, उसकी पूर्णिमा पर भगवान शिव को भी राखी चढ़ाने की मान्यता है। हिंदू मान्यता के अनुसर भगवान शिव की बहन का नाम असावरी देवी है ।

श्रीकृष्ण – हिंदू मान्यता के अनुसार भगवान श्री कृष्ण की बहन का नाम सुभद्रा था, हालांकि उनकी इनके अलावा कई और बहनें भी थीं जिनमें उनकी सखी माने जाने वाली द्रौपदी भी शामिल हैं, जिनकी संकट के समय भगवान कृष्ण ने सम्मान की रक्षा की थी । इनके अलावा मां विंध्यवासिनी, योगमाया, एकनांगा भी भगवान श्री कृष्ण की बहनें थीं ।

श्रीराम – हिंदू धर्म में भगवान राम का नाम जन्म से लेकर अंत तक व्यक्ति के साथ जुड़ा रहता है । भगवान राम के जिस नाम का मंत्र जपने से व्यक्ति को सभी दुखों से मुक्ति मिल जाती है, उनकी बहन का नाम शांता था जो कि उनसे उम्र में बड़ी थीं ।
राजा बलि – हिंदू मान्यता के अनुसार धन की देवी मां लक्ष्मी को राजा बलि की बहन माना जाता है । मान्यता यह भी है कि मां लक्ष्मी द्वारा राजा बलि को राखी बांधने से ही इस पावन परंपरा की शुरुआत हुई ।

सूर्य देवता – प्रत्यक्ष देवता भगवान सूर्य की बहन का नाम माता षष्ठी है जिनकी हर साल छठ पर्व के दौरान विशेष पूजा की जाती हैृ । षष्ठी देवी या फिर कहें छठी मैया को ब्रह्मा की मानस पुत्री भी कहा जाता है ।

शनि देवता- हिंदू मान्यता के अनुसार सूर्यपुत्र शनिदेव की तीन बहनों काम नाम क्रमश: यमुना, ताप्ती और भद्रा है ।

एसेंसिव ने आरम्भ किया प्रबन्धन और उद्यमिता में डिप्लोमा पाठ्यक्रम

निम्से के सहयोग से संचालित होगा 6 माह का पाठ्यक्रम

कोलकाता ।  उद्यमशीलता को बढ़ावा देने और प्रबंधन कौशल को बढ़ाने की दिशा में एसेंसिव एजुकेयर लिमिटेड, नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर माइक्रो, स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज (एनआई-एमएसएमई) के सहयोग से प्रबंधन और उद्यमिता में डिप्लोमा कोर्स आरम्भ किया है । इस अवसर पर निम्समे की महानिदेशक डॉ. ग्लोरी स्वरूपा, संकाय सदस्य डॉ. दिब्येंदु चौधरी और एसेंसिव ग्रुप ऑफ कंपनीज के अध्यक्ष श्री अभिजीत चटर्जी ने भाग लिया। डिप्लोमा कार्यक्रम का उद्देश्य व्यक्तियों को प्रबंधन भूमिकाओं और उद्यमशीलता प्रयासों दोनों में उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए आवश्यक आवश्यक कौशल और ज्ञान से लैस करना है। निम्समे का प्रतिष्ठित प्रमाणन प्राप्त करके, यह कार्यक्रम अपनी गुणवत्ता और उद्योग मानकों के अनुरूप होने का प्रमाण है। एनआईएमएसएमई की महानिदेशक डॉ. ग्लोरी स्वरूपा ने आज के प्रतिस्पर्धी व्यावसायिक परिदृश्य में निरंतर सीखने और कौशल वृद्धि के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने एक व्यापक कार्यक्रम लाने के लिए एसेंसिव एडुकेयर लिमिटेड और निम्समे के बीच सहयोग की सराहना की, जो अपने प्रबंधन कौशल को बढ़ाने के इच्छुक उद्यमियों और पेशेवरों की जरूरतों को पूरा करता है। संकाय सदस्य डॉ. दिब्येंदु चौधरी ने पाठ्यक्रम और पाठ्यक्रम संरचना के बारे में जानकारी प्रदान की। उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि कैसे कार्यक्रम को व्यावहारिक ज्ञान और वास्तविक दुनिया के कौशल पैदा करने के लिए तैयार किया गया है जो विभिन्न व्यावसायिक वातावरणों में सफलता दिला सकता है। एसेंसिव ग्रुप ऑफ कंपनीज के अध्यक्ष अभिजीत चटर्जी ने नवाचार और विकास की संस्कृति को विकसित करने में उद्यमशीलता शिक्षा के महत्व पर अपना दृष्टिकोण साझा किया। पाठ्यक्रम 6 माह का है और फिलहाल एसेंसिव के 6 केन्द्रों पर चलाया जाएगा ।

 

नराकास (उपक्रम) कोलकाता की छमाही समीक्षा बैठक

कोलकाता । नगर राजभाषा कार्यांवयन समिति (उपक्रम) कोलकाता की छमाही समीक्षा बैठक दिनांक 25 अगस्त को कोलकाता में सम्पन्न हुई। बैठक में नराकास के अध्यक्ष श्री विनय रंजन, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग के क्षेत्रीय कार्यांवयन कार्यालय के प्रभारी श्री निर्मल कुमार दूबे सहित सदस्य कार्यालयों के अध्यक्ष व प्रबंध निदेशक, निदेशक, कार्यालय प्रमुख तथा हिंदी अधिकारी उपस्थित रहें। इस बैठक में वित्तीय वर्ष 2022-23 के दौरान कोलकाता के विभिन्न उपक्रमों में श्रेष्ठ राजभाषा कार्यांवयन व श्रेष्ठ हिंदी पत्रिका प्रकाशन हेतु कार्यालयों को नराकास राजभाषा पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। साथ ही वर्ष के दौरान नराकास के तत्वावधान में विभिन्न सदस्य कार्यालयों द्वारा आयोजित हिंदी प्रतियोगिताओं के पुरस्कार भी वितरित किए गए।  इस बैठक में समिति की अर्द्धवार्षिक पत्रिका “अभिव्यक्ति” के 28वें अंक का विमोचन किया गया ।