Sunday, July 5, 2026
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बिशन सिंह बेदी- विश्वकप के मैच में 8 ओवर मेडन फेंककर किया था कमाल

भारतीय टीम के महान स्पिनरों में से एक बिशन सिंह बेदी का सोमवार को 77 वर्ष की उम्र में निधन हो गया । बाएं हाथ के स्पिनर बिशन की सांप की तरह बलखाती गेंदें एक समय विपक्षी बल्‍लेबाजों के लिए काल हुआ करती थी । यह उस समय की बात थी जब बिशन बेदी, चंद्रेशखर, ईरापल्‍ली प्रसन्‍नाा और वेंकटराघवन की स्पिन चौकड़ी का विश्‍व क्रिकेट में राज हुआ करता था, भारतीय टीम के कप्‍तान बिशन बेदी इस चौकड़ी के फ्रंटलाइन स्पिनर थे ।
67 टेस्‍ट में भारत की ओर से 266 विकेट लेने वाले ‘बिशन पाजी’ कप्‍तान के तौर पर हमेशा अपने खिलाड़ियों के साथ खड़े रहे । खिलाड़ियों के हित में जरूरत पड़ने पर वे क्रिकेट प्रशासन के सामने खड़े होने से भी नहीं चूके । शायद यही कारण रहा कि अपने दौर के खिलाड़ि‍यों का काफी सम्‍मान उन्‍हें हासिल रहा. उनके नेतृत्‍व में भारतीय टीम ने देश में दिग्‍गज टीमों को तो शिकस्‍त दी ही, विदेशों में भी टीम के प्रदर्शन में सुधार भी इसी दौर में आया ।
बेदी सहित भारत की स्पिन चौकड़ी को अपनी फ्लाइट के जरिये विपक्षी बल्‍लेबाजों को छलना बखूबी आता था । विकेट लेने के बाद इन स्पिनरों का जश्‍न मनाने का अंदाज भी अलग होता था । क्रिकेट से संन्‍यास लेने के बाद बिशन ने स्पिन गेंदबाजों को तैयार करने में भी योगदान दिया । मनिंदर सिंह और मुरली कार्तिक जैसे स्पिनरों ने बेदी के मार्गदर्शन में अपनी खेल कौशल को तराशा । कॅरियर रिकॉर्ड की बात करें तो बेदी ने 67 टेस्‍ट और 10 वनडे भारत की ओर से खेले।

टेस्‍ट क्रिकेट में 28.71 के औसत से 266 और वनडे में 48.57 के औसत से सात विकेट उनके नाम पर हैं । टेस्‍ट क्रिकेट में वे 14 बार पारी में पांच या इससे अधिक और एक बार मैच में 10 या इससे अधिक विकेट लेने में सफल रहे ।बेशक बेदी वनडे क्रिकेट ज्‍यादा क्रिकेट नहीं खेले और इस फॉर्मेट के उनके रिकॉर्ड बहुत प्रभावशाली नहीं है लेकिन विश्व कप में सबसे कंजूस गेंदबाजी विश्‍लेषण में से एक ‘स्पिन के इस सरदार’ के नाम पर दर्ज है । 1975 के वर्ल्‍डकप में ईस्‍ट अफ्रीका के खिलाफ बेदी ने अपने 10 ओवर में 8 मेडन रखते हुए 6 रन देकर एक विकेट लिया था । वनडे में 12 ओवर के स्‍पैल में 8 ओवर मेडन रखना बेदी जैसे करिश्‍माई स्पिनर के बूते की ही बात थी । वे बाद में टीम इंडिया के कोच भी बने ।
1976-77 के बहुचर्चित वेसलीन कांड में इंग्‍लैंड जैसी टीम के खिलाफ शिकायत दर्ज करना बिशन सिंह बेदी जैसे खिलाड़ी के बूते की ही बात थी । भारत के दौरे पर आई उस इंग्‍लैंड टीम में तेज गेंदबाज जॉन लीवर शामिल थे । इस टेस्‍ट सीरीज के तहत मद्रास (अब चेन्‍नई) में लीवर हैडबेंड लगाकर मैदान में उतरे थे. मैच में अपनी स्विंग से लीवर ने भारतीय बल्लेबाजों को खासा परेशान किया था । लीवर की इस कामयाबी के बीच बेदी ने सनसनीखेज आरोप लगाया था कि लीवर ने अपने हैडबेंड में वेसलीन लगाया था, इससे उन्‍हें गेंद को ज्‍यादा स्विंग कराने और विकेट लेने में मदद मिली । इंग्‍लैंड उस समय विश्‍व क्रिकेट की बड़ी ताकत हुआ करता था, ऐसे में बेदी के आरोपों को ज्‍यादा गंभीरता से नहीं लिया गया । हालांकि बाद में विश्‍व क्रिकेट में आई बॉल टेम्‍परिंग की घटनाओं ने इस बात की पुष्टि की कि ‘कृत्रिम कारणों’ से गेंद को अधिक स्विंग कराया जा सकता है । भारतीय क्रिकेट में बाद में बेदी के स्‍तर और उसके ऊपर के कई खिलाड़ी हुए लेकिन अपने प्‍लेयर्स के हित में बहादुरी से खड़े होने उनके जैसे टीम मैन बिरले ही होंगे ।

जानिए रामलीला का इतिहास

दिनेश कपूर
यद्यपि रामलीला का प्रदर्शन 1200 ई. से होना आरम्भ हो गया था, संस्कृत राजसी और संभ्रांत भाषा होने के कारण यह राज प्रासादों और धनाढय लोगों के यहां ही प्रदर्शित होती थी। यूं तो इसका प्रचलन वाल्मीकि की रामायण के युग में हुआ पर चूंकि तब की भाषा संस्कृत थी, बाद की पीढ़ियां इसे समझ नहीं पाती थीं। एक किवदंति के अनुसार त्रेता युग में श्री रामचंद्र के वनगमनोपरांत अयोध्यावासियों ने चौदह वर्ष की वियोगावधि राम की बाल लीलाओं का अभिनय कर बिताई थी। तभी से इसकी परंपरा का प्रचलन हुआ।
इसे जन मानस तक ले गए तुलसीदास जिन्होंने रामायण को फिर से लिखा सोलहवीं शताब्दी के मध्य में जन सामान्य की भाषा में जो उस समय अवधी थी। सो उन्होंने अवधी में सरल भाषा में रामचरितमानस लिखी और अकबरनामा में इसका जिक्र है की सम्राट अकबर को इस ग्रन्थ में काफी रुचि थी और उसने इसका अनुवाद फारसी भाषा में भी करवाया था। शासक के प्रोत्साहन से तब 16वीं शताब्दी में रामलीला का मंचन अवधी में जगह-जगह हुआ। एक अन्य जनश्रुति से यह प्रमाणित होता है कि इसके आदि प्रवर्तक मेघा भगत थे जो काशी के कतुआपुर मुहल्ले में स्थित फुटहे हनुमान के निकट के निवासी माने जाते हैं। लिखित सूत्रों के अनुसार ये पहले मंचन थे जो 16वीं शताब्दी के अंत में हुए। तुलसीदास जी की प्रेरणा से अयोध्या और काशी के तुलसी घाट पर प्रथम बार रामलीला हुई थी।
काशी के रामनगर की रामलीला काशी नरेश के सामने होती थी। इसकी समाप्ति रावण के पुतले के दहन के साथ होती थी। लखनऊ में महाराज उदित नारायण सिंह के शासन काल में सन 1776 में रामलीला हुई थी। उन्होंने मिर्जापुर जिले के एक व्यापारी के उलाहने पर रामलीला शुरू की थी। दक्षिण-पूर्व एशिया के इतिहास में कुछ ऐसे प्रमाण मिलते हैं जिससे ज्ञात होता है कि इस क्षेत्र में प्राचीन काल से ही रामलीला का प्रचलन था। जावा के सम्राट वलितुंग के एक शिलालेख में एक समारोह का विवरण है जिसके अनुसार सिजालुक ने उपर्युक्त अवसर पर नृत्य और गीत के साथ रामायण का मनोरंजक प्रदर्शन किया था। इस शिलालेख की तिथि 907 ई. है।
थाई नरेश बोरमत्रयी (ब्रह्मत्रयी) लोकनाथ की राजभवन नियमावली में रामलीला का उल्लेख है जिसकी तिथि 1458 ई. है। राजा ने 1767 ई. में स्याम (थाईलैड) पर आक्रमण किया था। युद्ध में स्याम पराजित हो गया। विजेता सम्राट अन्य बहुमूल्य सामग्रियों के साथ रामलीला कलाकारों को भी बर्मा ले गया। बर्मा के राजभवन में थाई कलाकारों द्वारा रामलीला का प्रदर्शन होने लगा। माइकेल साइमंस ने बर्मा के राजभवन में राम नाटक 1794 ई. में देखा था। आग्नेय एशिया के विभिन्न देशों म रामलीला के अनेक नाम और रूप हैं। दिल्ली में, सबसे पहली रामलीला पुरानी दिल्ली में हुई थी। यहां रामलीला उस समय हिंदू फौजियों व प्रजा के लिए हुआ करती थी। यह लीला गांधी मैदान में 1924 से होती आ रही है। हिन्दू और मुस्लिम दोनों इन रामलीलाओं में किरदार भी निभाते थे।

(साभार – गृहलक्ष्मी)

ऐसी रामलीला जहां हर किरदार को निभा रही हैं महिलाएं

शारदीय नवरात्रों के नौ दिनों तक प्रत्येक शाम को राम के चरित पर आधारित नाटक ‘रामलीला’ का जगह-जगह मंचन किया जाता है। जिसमें सम्पूर्ण रामायण की प्रमुख घटनाओं को दर्शाया जाता है। एक दौर था जब शाम होते ही लोग रामलीला देखने मैदानों में पहुंच जाया करते थे। साथ ही रामलीला की झांकियों का इंतजार करते थे। अब यदि आप देखें तो रामलीला जो पहले पुरानी दिल्ली की शोभा थी। आज सभी जगह में होने लगी है। रामलीला में महिला और पुरुष कलाकार रामायण के सभी किरदारों को निभाते हुए नजर आते हैं। लेकिन देश में एक जगह ऐसी है, जहां राम से लेकर रावण के किरदार महिलाओं द्वारा निभाए जाते हैं। आपको सुनकर या देखकर आश्चर्य होगा लेकिन यहां पूरे मंच को महिलाओं ने संभाला हुआ है। इस अनोखी रामलीला को देखने दूर-दूर से लोग आते हैं।
जानिए कहां हो रही है ये रामलीला
ये रामलीला जिसमें सभी महिला कलाकार अभिनय कर रही हैं वो चंडीगढ़ के पास जीरकपुर के पीर मुछल्ला इलाके के साथ चिनार होम्स में चल रही है। ये रामलीला 15 अक्टूबर से आरम्भ हो चुकी है। कमाल की बात तो यह है कि इस रामलीला में 9 महीने की बच्ची से लेकर 79 साल की बुजुर्ग महिला तक इसमें किरदार निभा रही हैं। कुल मिलाकर 32 महिला कलाकर विभिन्न अभिनय कर रही हैं।
कोई कोरियोग्राफर तो कोई है बैंक कर्मचारी
रामलीला में राम, सीता, लक्ष्मण और रावण आदि के किरदार निभा रहीं ये महिलाएं निजी जीवन में बेहद सफल महिलाएं हैं। इनमें से कोई कोई बैंक में काम करती हैं तो कोई बीटेक की स्टूडेंट है। श्रीराम का किरदार निभाने वाली 30 वर्षीय प्रभिता बैंक में कर्मचारी हैं। इसी तरह एक अन्य किरदार निभा रहीं रमनदीप कौर पेशे से एक कोरियोग्राफर है। इसके साथ ही बाकी महिलाएं भी अपनी व्यस्त दिनचर्चा से समय निकालकर रामलीला में अभिनय कर रही हैं।
महिलाएं किसी से कम नहीं
ये रामलीला उदाहरण है कि महिलाएं अब किसी भी कार्य को करने में किसी से कम नहीं है। हर क्षेत्र में महिलाएं दिन दुगनी रफ्तार से आगे बढ़ रही हैं। राष्ट्रपति पद से लेकर हर जगह आपको महिलाओं का परचम नजर आएगा। इसी तरह आपने हमेशा रामलीला में पुरूषों को ही किरदार निभातें हुए देखा है। लेकिन महिलाओं द्वारा निभाए जा रहे सभी किरदारों वाली ये रामलीला अनोखी है।

(साभार – गृहलक्ष्मी)

 

शुभजिता स्वदेशी : बाघ बकरी को पराग देसाई ने ऐसे बनाया 2000 करोड़ का ब्रांड, महात्मा गांधी से है सम्बन्ध

‘वाघ बकरी चाय’, इस ब्रांड का सम्बन्ध महात्मा गांधी से लेकर अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा तक से है । करीब 130 साल पुरानी इस कंपनी के एग्जीक्यूटिव चेयरमैन पराग देसाई का 49 साल की आयु में निधन हो गया, जो इस पारिवारिक व्यवसाय की चौथी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते थे बताया जाता है कि अहमदाबाद में मॉर्निंग वॉक के समय उन पर आवारा कुत्तों ने हमला किया, जिनसे बचने के दौरान वह फिसलकर गिर गए. बाद में करीब हफ्तेभर एक निजी अस्पताल में उनका इलाज चला, लेकिन मस्तिष्क आघात की वजह से अंतत: उनका देहांत हो गया. लेकिन क्या आप जानते हैं पराग देसाई के कंपनी संभालने के बाद ‘वाघ बकरी’ 100 करोड़ रुपए से 2000 करोड़ रुपए का ब्रांड बन गया । चलिए बताते हैं आपको ये पूरी कहानी…
‘वाघ बकरी’ की शुरुआत 1892 में हुई. तब नारणदास देसाई नाम के एक उद्योगपति ने भारत की सीमाओं को लांघकर दक्षिण अफ्रीका का सफर तय किया । वहां जाकर उन्होंने 500 एकड़ में फैले चाय बागान खरीदे । चाय की टेस्टिंग से लेकर उसके चुनाव में कई अनूठे प्रयोग किए और करीब 20 साल का वक्त वहां बिताया । इसी दौरान वह महात्मा गांधी के संपर्क में आए । उनके स्वदेशी आंदोलन ने उन्हें काफी प्रभावित किया । इसके बाद वह भारत लौटे और वाघ बकरी चाय की शुरुआत की । आज ‘वाघ बकरी टी ग्रुप’ भारत की टॉप-5 पैकेज्ड टी कंपनियों में से एक है । अब इसी ‘वाघ बकरी’ का एक लिंक महात्मा गांधी को दिल से मानने वाले अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा से जुड़ते हैं । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब गणतंत्र दिवस के समारोह में बराक ओबामा को मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया था । उसी दिन ‘वाघ बकरी’ ने अपना नया विज्ञापन ‘रिश्तों में गर्माहट लाए’ लॉन्च किया था । बताया जाता है कि इस कदम के पीछे पराग देसाई की ही सोच थी । वह भारत-अमेरिका के रिश्तों में पनप रही नई गर्माहट के इस मौके को भुनाना चाहते थे ।
100 करोड़ से 2000 करोड़ रुपये के ब्रांड तक
पराग देसाई साल 1995 में वाघ बकरी टी ग्रुप से जुड़े । उस समय ये महज 100 करोड़ रुपये की वैल्यू वाला ब्रांड था । इसके बाद उन्होंने कई अनूठे प्रयोग किए । ‘वाघ बकरी’ चाय ब्रांड को कई नई कैटेगरी में लॉन्च किया । चाय मार्केट के प्रीमियम सेगमेंट में उतरे और टी बैग, ग्रीन टी जैसे प्रोडक्ट पेश किए. उन्होंने गुजरात से बाहर निकल देश के अन्य राज्यों में वाघ बकरी ब्रांड को पहुंचाया और इसे एक राष्ट्रीय ब्रांड बनाया । इसके बाद जब देश में कॉफी कैफे की जगह ‘टी कैफे’ का चलन बढ़ना शुरू हुआ, तब उन्होंने वाघ बकरी नाम से ‘प्रीमियम टी लाउंज’ शुरू कीं । इसका फायदा मिला और आज देश के कई मेट्रो शहरों में ये काम कर रहे हैं । इस तरह 100 करोड़ का ब्रांड आज 2000 करोड़ का हो चुका है ।
बिक जाती है 5 करोड़ किलो चाय
वाघ बकरी टी ग्रुप मौजूदा समय में हर साल 5 करोड़ किलोग्राम चाय का कारोबार कर लेती है । देश के 24 राज्यों में इसका कारोबार फैला है । वहीं दुनिया के 60 से ज्यादा देशों में ये चाय का निर्यात करती है । कंपनी की चाय प्रोसेसिंग यूनिट 6 लाख वर्ग फुट में फैली है । हर दिन यहां 2 लाख किलो से ज्यादा चाय प्रोसेस करने की क्षमता है ।

4 प्रतिशत बढ़ गया डीए, त्योहारी सीजन में केन्द्रीय कर्मचारियों को मिला उपहार

नयी दिल्ली । बीते दिनों केंद्र सरकार ने अपने कर्मचारियों के महंगाई भत्ता (डीए) में 4 प्रतिशत की बढ़ोतरी की थी। अब राज्यों ने भी अपने कर्मचारियों की डीए में बढ़ोतरी करने की शुरुआत कर दी है। इसी कड़ी में कर्नाटक सरकार ने अपने कर्मचारियों का महंगाई भत्ता 3.75 प्रतिशत बढ़ाने की घोषणा की है। सरकार ने एक आदेश में कहा कि वह महंगाई भत्ते को मौजूदा 35 प्रतिशत से संशोधित कर 38.75 प्रतिशत कर रही है। कर्नाटक की सरकार ने यूजीसी/एआईसीटीई/आईसीएआर पैमाने पर व्याख्याताओं और न्यायिक अधिकारियों के डीए में चार प्रतिशत वृद्धि की भी घोषणा की। इस बढ़ोतरी के बाद राज्य सरकार 1,109 करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च करेगी।
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने केंद्र सरकार के कर्मचारियों एवं पेंशनभोगियों के महंगाई भत्ते में चार प्रतिशत बढ़ोतरी की है। इस फैसले से 48.67 लाख कर्मचारियों और 67.95 लाख पेंशनधारकों को लाभ होगा। अब सरकारी कर्मचारियों का डीए और पेंशनधारकों की डीआर बढ़कर 46 प्रतिशत हो जाएगी। बता दें कि बढ़ा हुआ भत्ता एक जुलाई, 2023 से लागू होगा। महंगाई भत्ते में यह वृद्धि उस फॉर्मूले के मुताबिक है जो सातवें वेतन आयोग की अनुशंसाओं पर आधारित है। महंगाई भत्ता और महंगाई राहत दोनों के कारण राजकोष पर संयुक्त प्रभाव प्रति वर्ष 12,857 करोड़ रुपये होगा।

नवरात्रि उत्सव में टूटे रिकॉर्ड, माता वैष्णो देवी मंदिर में चार लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने की पूजा

वैष्णो देवी । नवरात्रि के उत्सव के दौरान जम्मू कश्मीर के रियासी जिले में त्रिकुटा पर्वत पर स्थित माता वैष्णो देवी के मंदिर में चार लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने पूजा-अर्चना की। एक अधिकारी ने यह जानकारी दी। श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड (एसएमवीडीएसबी) के प्रवक्ता ने कहा, ”नवरात्रि शुरू होने के बाद से रोजाना औसतन 40,000 श्रद्धालु पूजा-अर्चना कर रहे हैं। अबतक चार लाख से अधिक श्रद्धालु यहां आ चुके हैं। पिछले वर्ष नौ दिवसीय शारदीय नवरात्रि के दौरान करीब 3.18 लाख श्रद्धालु यहां आये थे।” उन्होंने कहा कि विश्व शांति, सद्भाव, समृद्धि और मानव जाति के अच्छे स्वास्थ्य के लिए बोर्ड द्वारा आयोजित नौ दिवसीय ‘शत चंडी महायज्ञ’ का रामनवमी के पावन अवसर पर समापन हो गया।
प्रवक्ता ने बताया कि श्रद्धालुओं के अलावा, कर्मचारियों के साथ बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) अंशुल गर्ग ने वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पूर्ण आहुति और अन्य अनुष्ठानों में भाग लिया। उन्होंने बताया कि पद्म श्री प्रो. विश्वमूर्ति शास्त्री की अगुवाई में पंडितों के समूह ने महायज्ञ किया।
उन्होंने बताया कि नवरात्रि उत्सव के दौरान इस बार तीर्थयात्रा में स्काईवाक, पुनर्निमित पार्वती भवन, गुफा से वर्चुअल दर्शन, श्री भैरो जी मंदिर परिसर में मुफ्त लंगर सेवा, श्रद्धालुओं के लिए बोर्ड की वेबसाइट पर सीधा दर्शन सुविधा तथा द्विभाषी ‘शक्ति’ चैटबॉट विशेष रूप से शामिल किये गए हैं।
उन्होंने कहा कि इस पहल का उद्देश्य तीर्थयात्रा को श्रद्धालुओं के लिए और सुविधाजनक और आनंदमय बनाना है। प्रवक्ता ने बताया कि स्काईवाक का 12 अक्टूबर को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उद्घाटन किया था, जिसने (स्काईवाक ने) नवरात्रि के दैरान यात्रा प्रबंधन में अहम भूमिका निभायी।

जहाँ रावण को माना जाता है दामाद, होती है पूजा

आज पूरा भारत दशहरा मना रहा है । दशहरा की शाम हर तरफ आपको रावण जलता हुआ नजर आएगा । दरअसल, पूरा भारत रावण को बुराई का प्रतीक मानकर दशहरा के दिन जलाता है. लेकिन इसी देश में एक ऐसी जगह है जहां रावण की पूजा होती है । यहां तक कि इस जगह के लोग रावण को अपना दामाद मानते हैं । चलिए आपको बताते हैं कि आखिर इस जगह से रावण का इतना गहरा संबंध कैसे है और क्यों लोग रावण को आज भी अपना दामाद मानते हैं । हम जिस जगह की बात कर रहे हैं वो मध्य प्रदेश में है । दरअसल, मध्य प्रदेश के मंदसौर में रावण को लोग अपना दामाद मानते हैं, यही वजह है कि यहां लोग इसकी पूजा करते हैं । कहा जाता है कि रावण की पत्नी मंदोदरी का मंदसौर में घर था, इसीलिए यहां के लोग आज भी रावण को अपना दामाद मानते हैं ।
रावण के पुतले की पूजा होती है – एक तरफ जहां पूरे देश में दशहरा की शाम रावण का का दहन किया जाता है । मंदसौर में इस पुतले की पूजा होती है । वहीं मंदसौर के रूंडी में तो रावण की एक मूर्ति भी बनी हुई है जिसकी पूजा होती है । यहां लोग रावण को फूल माला चढ़ा कर उसकी पूजा करते हैं । मंदसौर के अलावा कई और जगहें भी हैं जहां रावण की पूजा होती है । भारत के अलावा और श्रीलंका में भी कई जगह रावण की पूजा होती है ।
यहां अभी मौजूद है रावण का शव – ऐसा माना जाता है कि श्रीलंका के रगैला के जंगलों में करीब 8 हजार फीट की ऊंचाई पर रावण का शव रखा गया है । लोगों का मानना है कि यहां रावण के शव को ममी के रूप में संरक्षित रखा गया है । श्रीलंका घूमने जाने वाले लोगों के लिए ये जगह और रावण का महल बहुत बड़ा पर्यटन स्थल है । यही वजह है कि हर साल इस जगह से श्रीलंका सरकार को काफी फायदा होता है ।

 

सुन्दरवन की ‘वनदुर्गा’, जो करती हैं ‘दक्षिणराय’ बाघ से लोगों की रक्षा

सुन्दरवन…यह नाम जुबान पर आते ही आपको सबसे पहले क्या ध्यान में आता है? मैनग्रोव जंगल, जंगल के बीच से होकर गुजरती नदी और रॉयल बंगाल टाइगर। सुन्दरवन दुनिया का सबसे बड़ा दलदली इलाका है। पीली-काली धारी वाले बाघ जिन्हें सुन्दरवन क्षेत्र में रहने वाले लोग ‘दक्षिणराय’ के नाम से जानते हैं। बाघ कितने खतरनाक और खुंखार होते हैं, ये बात हर किसी को पता है।
लेकिन क्या आप जानते हैं, कोई हैं सुन्दरवन में भी जिनसे दक्षिणराय भी डरते हैं। जिनपर होती है इन खतरनाक बाघों से वहां के निवासियों की रक्षा करने की जिम्मेदारी। जी हां, इन बाघों से सुन्दरवन के निवासियों की रक्षा करने की जिम्मेदारी उठाती हैं ‘बोनोबीबी’ या ‘वनदुर्गा’।
सुन्दरवन के आसपास करीब 45 लाख लोगों की आबादी रहती है, जिनका मुख्य पेशा मछलियां व केंकड़े मारना, जंगलों से शहद और लकड़ियां काटना इत्यादि। ये काम करते समय स्थानीय लोग हर बार अपनी जान हथेली पर लेकर जंगलों में जाते हैं, क्योंकि यहां पानी में मगरमच्छ तो जमीन पर बाघों का खतरा मंडराता ही रहता है। हाल के दिनों में बाघों के नदी में तैरकर नाव तक पहुंचने और लोगों को अपना शिकार बनाने की खबरें भी सुर्खियों में छायी रहती हैं। वनदुर्गा को स्थानीय लोग वनदेवी, व्याघ्रदेवी और वनचंडी के नाम से भी पुकारते हैं।
सुन्दरवन जो भारत से लेकर बांग्लादेश तक फैला हुआ है। कहा जाता है कि सुन्दरवन का 60 प्रतिशत हिस्सा बांग्लादेश में और 40 प्रतिशत हिस्सा भारत में मौजूद है। यहां के निवासी अगर किसी देव-देवी पर सबसे अधिक विश्वास करते हैं तो वह है वनदुर्गा। सुन्दरवन क्षेत्र में रहने वाले मछुआरे, शहद इकट्ठा करने वाले और लकड़हारा समुदाय के सभी लोग, फिर वह चाहे हिंदू हो या मुस्लिम, वनदुर्गा की पूजा पूरे भक्तिभाव से करता है। स्थानीय कथा के अनुसार वनदुर्गा या बोनोबीबी की मां गुलाल बीबी मदीना से और उनके पिता इब्राहिम मक्का से सुन्दरवन में आए थे।
यहीं पर उन्होंने वनदुर्गा को जन्म दिया। वहीं दूसरी तरफ दक्षिणराय जशोर (वर्तमान बांग्लादेश) के एक शहर ब्राह्मननगर के राजा के अधिनस्थ एक सामंत थे। दक्षिणराय काफी अत्याचारी अधिकारी थे। उनके अत्याचारों से स्थानीय लोगों को मुक्त करवाने के लिए वनदुर्गा ने उनसे कई युद्ध किये, जिसमें हर बार दक्षिणराय को हार का सामना करना पड़ा। इस हार को स्थानीय लोग सुन्दरवन का सबसे बड़ा आतंक और बुराई का प्रतीक यानी बाघ पर जीत के रूप में देखते हैं।
कहा जाता है कि वनदुर्गा जंगल (सुन्दरवन) की अधिष्ठात्री देवी हैं। उन्हें 18 भाटी की मालकिन माना जाता है। नदी में ज्वार खत्म होकर भाटा आने के तुरंत बाद अगर फिर से ज्वार आए तो उसे 1 भाटी कहा जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार अगर 18 भाटी के समय कोई व्यक्ति जंगल में जाकर मछली-केंकड़ा पकड़ता शहद इकट्ठा करना, लकड़ियां काटना आदि काम करता है तो उस समय दक्षिणराय से उसकी रक्षा स्वयं वनदुर्गा करती हैं।
स्थानीय लोगों का मानना है कि जब बाघ किसी मछुआरे या लकड़हारे पर हमला करता है, तब हिंदू या मुसलमान का फर्क मिट जाता है। उस समय उस व्यक्ति को बाघ के चुंगल से बचाना ही हमारा एकमात्र लक्ष्य बन जाता है। इसलिए जब बोनोबीबी या वनदुर्गा की पूजा करने की बारी आती है तब यहां धर्म की दीवार भी मिट जाती है।
पिछले कई सालों से लगातार आए चक्रवाती तूफानों की वजह से सुन्दरवन को भारी नुकसान पहुंचा है। इसके अलावा पेड़ों की अंधाधुन कटाई की वजह से भी जंगल को काफी नुकसान पहुंच रहा है। इसके प्रति लोगों को जागरुक बनाने के उद्देश्य से ही कोलकाता में दुर्गा पूजा पर ‘सेविंग द सुन्दरवन’ थीम पर दुर्गा पूजा पंडाल तैयार किया गया है। यह दुर्गा पूजा पंडाल सॉल्टलेक इलाके के सी ई ब्लॉक में बनाया गया है। यहां आपको मैनग्रोव जंगल से लेकर वॉच टॉवर से वनबीबी की पूजा को अनुभव कर सकते हैं। यहां जंगल को और भी वास्तविक रूप प्रदान करने के लिए जानवरों की प्रतिकृति से भी पंडाल को सजाया गया है।

 

नवरात्रि में रख रहे व्रत तो स्वस्थ रहने के लिए याद रहें ये बातें

नवरात्रि कई लोगों के लिए उपवास का समय होता है, जिसे अगर सही तरीके से न किया जाए तो हमें कमजोरी महसूस हो सकती है। हर साल नवरात्रि के दौरान भक्त देवी दुर्गा से प्रार्थना करने के लिए इस हिंदू त्योहार के दौरान उपवास करते हैं। उपवास करना न केवल शुभ माना जाता है, बल्कि यह शरीर को डिटॉक्सिफाई करने का एक शानदार तरीका भी है क्योंकि यह हानिकारक विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में सहायता करता है, लेकिन आहार में बदलाव के कारण उपवास करने से शरीर सुस्त या थका हुआ भी हो सकता है।
प्रतिदिन 14 से 16 घंटे का उपवास रखें और शेष घंटों में भोजन करें। इसमें दैनिक 16 घंटे का उपवास और 8 घंटे की खाने की सुविधा है, जिसमें हम 2, 3 या अधिक भोजन कर सकते हैं। हम 6 दिनों के लिए 14 घंटे का उपवास और 3 दिनों के लिए 16 घंटे का उपवास भी कर सकते हैं।
करना सरल, सुरक्षित और टिकाऊ है। एक बार जब हम खाने की खिड़की में प्रवेश करते हैं, तो दो भोजन के बीच 2।5 घंटे से अधिक का अंतर न रखें, चाहे भोजन बड़ा/छोटा हो।
फलों की 2-3 सर्विंग न केवल शरीर को हाइड्रेटेड रखती है बल्कि फाइबर भी देती है जो मल त्याग में मदद करती है। सुनिश्चित करें कि आप अच्छा भोजन करें, उदाहरण के लिए, एक गिलास दूध/छाछ के साथ आलू से बनी साबूदाना खिचड़ी या कुट्टू आटा पराठा। कोशिश करें कि इस भोजन में चीनी न हो।
उपवास के दौरान खुद को हाइड्रेटेड रखना बहुत जरूरी है क्योंकि इससे भूख की पीड़ा काफी हद तक कम हो सकती है। इतना ही नहीं, पानी पीने से उपवास के दौरान थकान और यहां तक ​​कि बेहोशी को भी दूर करने में मदद मिल सकती है। हमेशा पानी की बोतल रखें और समय-समय पर पानी पीते रहें।
नौ दिनों का उपवास निश्चित रूप से शरीर को डिटॉक्सीफाई करने में मदद करेगा लेकिन उपवास के दौरान आहार में बदलाव से कुछ लोगों में एसिडिटी या कब्ज हो सकता है। इससे निपटने के लिए ठंडा दूध पिएं और एसिडिटी को दूर रखें। इससे निपटने के लिए हम अपने आहार में नींबू पानी या दही भी शामिल कर सकते हैं।
दिन के दौरान बादाम, अखरोट और पिस्ता सहित मुट्ठी भर अनसाल्टेड नट्स का सेवन करना सुनिश्चित करें। सुबह नाश्ते से पहले व्रत खोलने के लिए एक या दो चम्मच घी/कोल्ड-प्रेस्ड नारियल तेल मिलाना सबसे अच्छा विचार है। चूँकि यह आहार सब्जियों पर शून्य है, रात भर भिगोए हुए सूखे मेवे पेट के लिए मदद कर सकते हैं।

अंत:शुद्धि और आध्यात्मिक शक्ति का महापर्व है नवरात्रि

नवरात्रि हिन्दू धर्म के लोगो द्वारा मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण त्यौहार है। यह त्यौहार असत्य पर सत्य की जीत को दर्शाता है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार नवरात्रि साल में दो बार मनाया जाता है । हिंदी महीनो के मुताबिक पहला नवरात्रि चैत्र महीने में मनाया जाता है और दूसरी बार अश्विन महीने में मनाया जाता है। नवरात्रि नौ दिनों तक निरंतर चलता है जिसमे देवी माँ के अलग अलग स्वरूपों की लोग भक्ति और निष्ठा के साथ पूजा करते है। भारत में नवरात्रि अलग अलग राज्यों में विभिन्न तरीको और विधियों के संग मनाई जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन्हीं नौ दिनों में मां दुर्गा धरती पर आती है। उनके आने की खुशी में इन दिनों को दुर्गा उत्सव के तौर पर देशभर में धूमधाम से मनाया जाता हैं।
नवरात्रि एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ होता है नौ रातें। इन नौ रातों और दस दिनों के दौरान शक्ति- देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है। दसवां दिन दशहरा के नाम से प्रसिद्ध है। नवरात्रि एक हिंदू पर्व है। नवरात्रि वर्ष में चार बार आता है। चैत्र, आषाढ़, अश्विन, पौष प्रतिपदा से नवमी तक मनाया जाता है। नवरात्रि के नौ रातों में तीन देवियों महालक्ष्मी, सरस्वती और दुर्गा के नौ स्वरुपों की पूजा होती है जिन्हें नवदुर्गा कहते हैं। दुर्गा का मतलब जीवन के दुख को हटानेवाली होता है। नवरात्रि एक महत्वपूर्ण प्रमुख त्योहार है जिसे पूरे भारत में पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है।
नवरात्रि से हमें अधर्म पर धर्म और बुराई पर अच्छाई के जीत की सीख मिलती हैं। यह हमें बताती है की इंसान अपने अंदर की मूलभूत अच्छाइयों से नकारात्मकता पर विजय प्राप्ती और स्वयं के अलौकिक स्वरूप से साक्षात्कार कैसे कर सकता है। भारतीय जन-जीवन में धर्म की महत्ता अपरम्पार है। यह भारत की गंगा-जमुना तहजीब का ही नतीजा है कि सब धर्मों को मानने वाले लोग अपने-अपने धर्म को मानते हुए इस देश में भाईचारे की भावना के साथ सदियों से एक साथ रहते चले आ रहे हैं। यही कारण है की पूरे विश्व में भारत की धर्म व संस्कृति सर्वोतम मानी गयी है। विभिन्न धर्मों के साथ जुड़े कई पर्व भी है जिसे भारत के कोने कोने में श्रध्दा, भक्ति और धूमधाम से मनाया जाता है। उन्हीं में से एक है नवरात्रि।
नवरात्रि पर्व के नौ दिनों के दौरान आदिशक्ति जगदम्बा के नौ विभिन्न रूपों की आराधना की जाती है। ये नौ दिन वर्ष के सर्वाधिक पवित्र दिवस माने गए हैं। इन नो दिनों का भारतीय धर्म एवं दर्शन में ऐतिहासिक महत्व है और इन्हीं दिनों में बहुत सी दिव्य घटनाओं के घटने की जानकारी हिन्दू पौराणिक ग्रन्थों में मिलती है। माता के इन नौ रूपों को नवदुर्गा के नाम से भी जाना जाता है जो इस प्रकार हैं -शैलपुत्री, ब्रह्माचारिणी, चन्द्रघन्टा, कूष्माण्डा, स्कन्द माता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी और सिध्दिदात्री।
वसन्त की शुरुआत और शरद ऋतु की शुरुआत, जलवायु और सूरज के प्रभावों का महत्वपूर्ण संगम माना जाता है। इन दो समय मां दुर्गा की पूजा के लिए पवित्र अवसर माने जाते है। त्योहार की तिथियां चन्द्र कैलेंडर के अनुसार निर्धारित होती हैं। यह पूजा वैदिक युग से पहले प्रागैतिहासिक काल से है। नवरात्रि के पहले तीन दिन देवी दुर्गा की पूजा करने के लिए समर्पित किए गए हैं। यह पूजा उनकी ऊर्जा और शक्ति की की जाती है। प्रत्येक दिन दुर्गा के एक अलग रूप को समर्पित है।
नवरात्रि के पहले दिन बालिकाओं की पूजा की जाती है। दूसरे दिन युवती की पूजा की जाती है। तीसरे दिन जो महिला परिपक्वता के चरण में पहुंच गयी है, उसकि पूजा की जाती है। नवरात्रि के चैथे, पांचवें और छठे दिन लक्ष्मी- समृद्धि और शांति की देवी की पूजा करने के लिए समर्पित है। आठवे दिन पर एक यज्ञ किया जाता है। नौवा दिन नवरात्रि समारोह का अंतिम दिन है। यह महानवमी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन उन नौ जवान लड़कियों की पूजा होती है जो अभी तक यौवन की अवस्था तक नहीं पहुंची है। इन नौ लड़कियों को देवी दुर्गा के नौ रूपों का प्रतीक माना जाता है। लड़कियों का सम्मान तथा स्वागत करने के लिए उनके पैर धोए जाते हैं। पूजा के अंत में लड़कियों को उपहार के रूप में नए कपड़े, वस्तुयें, फल प्रदान किए जाते हैं। शक्ति की उपासना का पर्व शारदीय नवरात्र प्रतिपदा से नवमी तक निश्चित नौ तिथि, नौ नक्षत्र, नौ शक्तियों की नवधा भक्ति के साथ सनातन काल से मनाया जा रहा है। आदिशक्ति के हर रूप की नवरात्र के नौ दिनों में क्रमशरू अलग-अलग पूजा की जाती है। मां दुर्गा की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री है। ये सभी प्रकार की सिद्धियां देने वाली हैं। इनका वाहन सिंह है और कमल पुष्प पर ही आसीन होती हैं। नवरात्रि के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है।
इस पर्व से जुड़ी एक कथा अनुसार देवी दुर्गा ने एक भैंस रूपी असुर अर्थात महिषासुर का वध किया था। पौराणिक कथाओं के अनुसार महिषासुर के एकाग्र ध्यान से बाध्य होकर देवताओं ने उसे अजय होने का वरदान दे दिया। उसको वरदान देने के बाद देवताओं को चिंता हुई कि वह अब अपनी शक्ति का गलत प्रयोग करेगा। महिषासुर ने अपने साम्राज्य का विस्तार स्वर्ग के द्वार तक कर दिया और उसके इस कृत्य को देख देवता विस्मय की स्थिति में आ गए। महिषासुर ने सूर्य, इन्द्र, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, यम, वरुण और अन्य देवताओं के सभी अधिकार छीन लिए और स्वयं स्वर्गलोक का मालिक बन बैठा। देवताओं को महिषासुर के प्रकोप से पृथ्वी पर विचरण करना पड़ रहा था तब महिषासुर के इस दुस्साहस से क्रोधित होकर देवताओं ने देवी दुर्गा की रचना की। ऐसा माना जाता है कि देवी दुर्गा के निर्माण में सारे देवताओं का एक समान बल लगाया गया था। महिषासुर का नाश करने के लिए सभी देवताओं ने अपने अपने अस्त्र देवी दुर्गा को दिए थे और कहा जाता है कि इन देवताओं के सम्मिलित प्रयास से देवी दुर्गा और बलवान हो गईं थी। इन नौ दिन देवी-महिषासुर संग्राम हुआ और अन्ततरू महिषासुर-वध कर महिषासुर मर्दिनी कहलायीं। नवदुर्गा और दस महाविद्याओं में काली ही प्रथम प्रमुख हैं। भगवान शिव की शक्तियों में उग्र और सौम्य, दो रूपों में अनेक रूप धारण करने वाली दशमहाविद्या अनंत सिद्धियां प्रदान करने में समर्थ हैं। दसवें स्थान पर कमला वैष्णवी शक्ति हैं, जो प्राकृतिक संपत्तियों की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी हैं। देवता, मानव, दानव सभी इनकी कृपा के बिना पंगु हैं, इसलिए आगम-निगम दोनों में इनकी उपासना समान रूप से वर्णित है। सभी देवता, राक्षस, मनुष्य, गंधर्व इनकी कृपा-प्रसाद के लिए लालायित रहते हैं।
नवरात्रि के दौरान उपवास करने से शरीर से विषाक्त पदार्थ निकल जाते हैं, जिससे शरीर स्वस्थ और निरोगी रहता है। नवरात्रि के दौरान ध्यान, योग और भक्ति करने से मन को शांति मिलती है, जिससे तनाव और चिंता कम होती है। नवरात्रि व्रत का मूल उद्देश्य है इंद्रियों का संयम और आध्यात्मिक शक्ति का संचय। वस्तुत: नवरात्र अंत:शुद्धि का महापर्व है। आज वातावरण में चारों तरफ विचारों का प्रदूषण है। ऐसी स्थिति में नवरात्र का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है।