Sunday, July 5, 2026
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आईसीएसआई ने प्रैक्टिसिंग कंपनी सेक्रेटरीज को लेकर किया 17वां क्षेत्रीय सम्मेलन 

कोलकाता । इंस्टीट्यूट ऑफ कंपनी सेक्रेटरीज ऑफ इंडिया (आईसीएसआई) की ओर से कोलकाता के मैरियट होटल में प्रैक्टिसिंग कंपनी सेक्रेटरीज को लेकर 17वां क्षेत्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया है। इस वर्ष के सम्मेलन का दृष्टिकोण ‘अच्छे कॉर्पोरेट प्रशासन को बढ़ावा देने में वैश्विक लीडर बनना’ रहा। इस सम्मेलन का मिशन ‘अच्छे कॉर्पोरेट प्रशासन की सुविधा प्रदान करने वाले उच्च क्षमता वाले पेशेवरों को विकसित करना’ है। दूसरी तकनीकी सत्र का विषय “भविष्य का निर्माण – एसएमई आईपीओ भारत को कैसे आकार दे रहे हैं”, इसपर चर्चा करना।  इसके पैनलिस्ट में, सीएस (डॉ.) ममता बिनानी, (पूर्व अध्यक्ष, आईसीएसआई और पश्चिम बंगाल एमएसएमई डेवलपमेंट फोरम की अध्यक्ष, सीए अमन सिंह भदोरिया (मैनेजर, जीवाईआर कैपिटल एडवाइजर्स प्राइवेट लिमिटेड), सीएस भरत साहू (उप कंपनी सचिव, नाल्को) और सीएस बी नरसिम्हन (आईसीएसआई उपाध्यक्ष) ने भाग लिया। इस अवसर पर सीएस (डॉ.) ममता बिनानी (पूर्व अध्यक्ष आईसीएसआई और पश्चिम बंगाल एमएसएमई डेवलपमेंट फोरम की अध्यक्ष ने कहा, “दुनिया युद्ध, गंभीर बीमारी और कुछ सत्ता-विरोधी मुद्दों से गुजर रही है, इस बीच भारतीय अर्थव्यवस्था पूरे विश्व के लिए आकर्षण का विषय है। यह उद्योगपतियों, व्यापारियों और विशेष रूप से छोटे और मध्यम उद्यमों के लिए चर्चा का विषय रहा है। एमएसएमई क्षेत्र जो देश की जीडीपी में लगभग 40 प्रतिशत का योगदान देता है। प्रत्येक राज्य का जीडीपी इसका एक बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है। देश में एमएसएमई कंपनियों की लिस्टिंग को प्रोत्साहित करने के लिए उनके लिए अलग-अलग मंच हैं, उनके आकार को देखते हुए, यह उपाय अधिक दृश्यता और लचीलापन प्रदान करता है।  सुरुआत में सार्वजनिक प्रस्तावों के माध्यम से धन जुटाने वाले एमएसएमई को सार्वजनिक रूप से जानना और एक अमिट छाप छोड़ना काफी रोमांच का विषय है।  सुशासन और उचित व्यवसाय प्रबंधन सफलता की कुंजी है। जो अनुकूलन क्षमता का कारक साबित होती है। इससे नौकरियों में काफी वृद्धि होती है और छोटे व्यवसाय के लिए प्रतिकूल कथा को नकारने में मदद मिलती है।

एमएसएमई के लिए इंडियन पैकेजिंग इंस्टीट्यूट में वेंडर डेवलपमेंट प्रोग्राम

कोलकाता । केंद्र सरकार के एमएसएमई मंत्रालय के अंतर्गत कोलकाता में एमएसएमई-डेवलपमेंट एंड फैसिलिटेशन ऑफिस में एमएसएमई क्षेत्र के लिए दो दिवसीय वेंडर डेवलपमेंट प्रोग्राम का इंडियन पैकेजिंग इंस्टीट्यूट में आयोजित किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य विपणन, व्यापार विकास के लिए आवश्यक जानकारी प्रदान करना। सम्मेलन का लक्ष्य इससे जुड़ी जानकारी की कमी, संसाधनों की कमी और कोविड-19 के बाद बिक्री/विपणन के असंगठित तरीकों के कारण एमएसएमई क्षेत्र को नए बाजारों की खोज करने और मौजूदा बाजार को बनाए रखने से जुड़ी सुविधा प्रदान करना था। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए एमएसएमई क्षेत्र में उत्पादों और सेवाओं की विपणन क्षमता बढ़ाने के लिए एमएसएमई मंत्रालय, भारत सरकार ने खरीद और विपणन सहायता योजना शुरू की है। यह वेंडर डेवलपमेंट प्रोग्राम (वीडीपी), एमएसई के लिए सार्वजनिक खरीद नीति – 2012 (2018 में संशोधित) के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए यह योजना का एक घटक है। केंद्र सरकार के एमएसएमई मंत्रालय द्वारा आयोजित विक्रेता विकास कार्यक्रम एमएसएमई हितधारकों और सरकार को एक मंच पर लाने के लिए भारत सरकार की एक पहल है। इस पहल को आगे बढ़ाने के लिए कोलकाता के एमएसएमई- विकास एवं सुविधा कार्यालय में आगामी 5 और 6 दिसंबर, 2023 को दो दिवसीय वेंडर डेवलपमेंट प्रोग्राम का आयोजन किया गया है।
2 दिवसीय इस कार्यक्रम का उद्घाटन डी मित्रा (आईईडीएस, संयुक्त निदेशक एवं एचओओ, एमएसएमई-डीएफओ, कोलकाता), बिधान दास (उप निदेशक, भारतीय पैकेजिंग संस्थान), कंचन चौहान (संचालन प्रबंधक, बीएनआई कोलकाता और सीबीडीए नॉर्थ), विजय अग्रवाल (सचिव, एलयूबी, डब्ल्यूबी), माणिक मजूमदार (मुख्य महाप्रबंधक,एमएम, ओएनजीसी) के साथ डब्ल्यू राजकुमार (अध्यक्ष, एपीआईडी एंड एफसी लिमिटेड, अरूणांचल प्रदेश सरकार) ने संयुक्त रूप से किया। इस मौके पर समाज की कई अन्य प्रतिष्ठित हस्तियां भी शामिल थे।
इस अवसर पर डी मित्रा (आईईडीएस, संयुक्त निदेशक और एचओओ, एमएसएमई-डीएफओ, कोलकाता) ने राज्य के लिए एमएसएमई के विशेष लाभों के लिए इस कार्यक्रम के आयोजन पर अपनी संतुष्टि व्यक्त की। उद्घाटन दिवस पर लगभग 150 एमएसएमई से जुड़े लोगों ने भाग लिया। अपने विचार साझा करते हुए उन्होंने कहा, भारत सरकार ने सार्वजनिक खरीद अधिनियम’2012 के तहत एमएसई से खरीद बढ़ाने के लिए कई उपाय किए हैं। यह व्यवसाय के साथ-साथ एक-दूसरे के साथ बातचीत करने का एक सामान्य मंच है। ऐसे कार्यक्रम सार्वजनिक क्षेत्र सहित कई खरीद संगठनों द्वारा उपयुक्त उद्यमियों का पता लगाने में बहुत उपयोगी साबित हुए हैं। यह कार्यक्रम पश्चिम बंगाल के एमएसएमई को मदद करेगा। कार्यक्रम में जीआरएसई, हिंदुस्तान एयरोनॉटिकल लिमिटेड (एचएएल), भारत हेवी इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीएचईएल), ओएनजीसी, इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड, हल्दिया, बामर लॉरी, एमएसटीसी, ईस्टर्न रेलवे, कोल इंडिया लिमिटेड, दामोदर वैली कॉर्पोरेशन (डीवीसी) आदि जैसे बड़े खरीदार इसमें शामिल हुए।

घरेलू हिंसा का शिकार तो पुरुष भी हैं, बात उन पर भी हो

अक्सर हम हमेशा से सुनते आये हैं कि घरेलू हिंसा सिर्फ महिला ही सहती है लेकिन क्या कभी हमने सुना है की एक पुरुष भी घरेलु हिंसा का शिकार होता है । ये कहना सच है पुरुष महिला के मुक़ाबले शारीरिक रूप से मजबूत होता है लेकिन इसका ये मतलब नहीं की वो घरेलू हिंसा न सहता हो । और ये वो हिंसा होती है जिसे चाहकर भी कोई पुरुष किसी को बता नहीं सकता या बताना नहीं चाहता क्योंकि समाज मानने को तैयार नहीं और कानून का भी इस मामले में कोई सहारा नहीं है । आज के दौर में अगर एक महिला चाहे तो अपने पति या पुरुष को घरेलू हिंसा कानून के सहारे जेल भिजवा सकती है । लेकिन ये हक़ किसी पति या पुरुष को नहीं है ।
घरेलू हिंसा झेलने वाले पुरुष इस श्रेणी में सबसे पहला स्थान पति का होता है उसके बाद ससुर फिर जेठ फिर देवर और फिर कोई भी पुरुष जो की पति से ताल्लुक रखता है । जरूरी नहीं की पुरुष शादी शुदा हो अगर वो लिव इन में रह रहा है तो भी वो किसी न किसी रूप से घरेलू हिंसा का शिकार होता है । अगर कभी कोई पति या पुरुष ये बताने की कोशिश भी करेगा तो उसका मज़ाक उड़ाया जाएगा और उस पर व्यंग मारा जाएगा की एक औरत से पिट गया । थू है तेरी मर्दानगी पर । इसी कारण पति या पुरुष अपने हुए अत्याचार को किसी से कहता नहीं ओर अंदर ही अंदर घुलता रहता है और धीरे -धीरे बीमारी का घर बनता चला जाता है । और आखिर में एक दिन उसकी ज़िंदगी भी समाप्त हो जाती है ।
समाज में माना जाता है कि एक पति या पुरुष कभी भी महिला के जुल्मों का शिकार नहीं हो सकता है. उसे कई वैधानिक,सामाजिक कानूनों या आर्थिक मदद से सिर्फ इसलिए वंचित किया जाता है क्योंकि वह पुरुष है. आजकल तो समाचार पत्र, टीवी, सिनेमा आदि औरत को बहुत ताकतवर दिखाया जा रहा है. घर ही नहीं, कार्यक्षेत्र में भी उस का दबदबा होता है. घरेलू हिंसा के प्रकार कोई भी महिला खासतोर से पत्नी अपने पति या पुरुष का काफी तरीको से घरेलु उत्पीड़न करती है । जैसे कि मानसिक पीड़ा देना, पारिवारिक सदस्य से न मिलने देना, दोस्त और रिश्तेदार ओर आस पड़ोस से न मिलने देना, आत्‍महत्‍या करने की धमकी देना, नामर्द पुकारना, घर से निकलने को विवश करना, बात बात पर टोकना, थप्‍पड़ मारना, शारिरिक हिंसा, मारपीट करना, ठोकर मारना,दांत से काटना, लात मारना, मुक्‍का मारना, धकेलना, किसी अन्‍य रीति से शारीरिक पीड़ा या क्षति पहुँचाना, दुर्व्‍यवहार करने, अपमानित करने, नीचा दिखाने, प्रतिष्‍ठा का उल्‍लंघन, मौखिक और भावनात्मक हिंसा, अपमान, गालियॉं देना, चरित्र और आचरण पर दोषारोपण, पूरी सैलरी रख लेना, संभोग न करना,खाने में थूक देना, पति या पुरुष कि बिना मर्जी से संभोग करना, महिला का बात- बात पर आत्महत्या की धमकी देना, बेइज्‍जत करना, ताने देना, गाली-गलौच करना, झूठा आरोप लगाना, मूलभूत आवश्‍यकताओं को पूरा न करना, मायके से न बुलाना,, शारीरिक प्रताड़ना, तलाक एवं मूलभूत आवश्‍यकताओं को पूरा न करने की धमकी देना, चांटा मारना, धक्‍का देना, छीना झपटी करना, लकड़ी या हल्‍की वस्‍तु से पीटना, लात मारना, घूंसा मारना, माचिस या सिगरेट से जलाना,गंभीर रूप से पीटना, जिससे हड़डी टूटना या खिसकना जैसी घटनाएं शामिल है,गंभीर रूप से जलाना, लोहे की छड़, धारदार वस्‍तु या भारी वस्‍तु से वार करना। कभी कभी पति या पुरुष ये सब सह नहीं पता और आत्महत्या के लिए मजबूर हो जाता है ।
घरेलू हिंसा के कारणअगर कोई महिला पति या पुरुष से ज्यादा सुन्दर है मतलब की अगर पति या पुरुष काला है तो उसको रंग भेद की टिप्पणी सहनी पड़ती है । अगर कोई महिला पति या पुरुष से ज्यादा पढी लिखी है मतलब की पति या पुरुष अगर कम पढ़ा लिखा है तो उसको अनपढ़ और गंवार आदि की टिप्पणी सहनी पड़ती है । अगर कोई महिला पति या पुरुष से ज्यादा कमाती है तो उसको कम कमाने का ताना झेलना पड़ता है । अगर कोई महिला पति या पुरुष से ऊंचे पद पर कार्य करती है तो उसको इस बात का भी ताना झेलना पड़ता है । कभी- कभी महिला पति या पुरुष के परिवार के साथ रहना नहीं चाहती और पति या पुरुष अपने परिवार को छोड़ना नहीं चाहता ये भी एक कारण होता है । कभी कभी महिला पति या पुरुष पर मालिकाना हक़ चाहती है और पति या पुरुष पर सम्पूर्ण अधिकार चाहती है । किसी किसी परिवार में महिला के मायके का दखल भी घरेलू हिंसा को बड़ावा देता है । किसी किसी महिला के शादी से पहले के अतिरिक्त विवाहेतर संबंध शादी के बाद भी चल रहे होते है या दफ्तर में किसी साथी के साथ प्रेम प्रसंग भी घरेलू हिंसा को बड़ावा देता है । महिला का बहुत ज्यादा शक्की होना । महिला का बहुत ज्यादा ज़िद्दी होना । महिला का बहुत ज्यादा खर्चीला होना । महिला की पेसो की भूख समाप्त न होना । महिला का बात बात पर झूठ बोलना।
कानून क्या कहता है – कानून के अनुसार घरेलू हिंसा सिर्फ एक महिला पर हो सकती है। किसी पति या पुरुष पर नहीं । हालांकि एक नाबालिग पुरुष घरेलू हिंसा का शिकार हो सकता है लेकिन अगर वो नाबालिग होते हुए शादी शुदा है तो वो कभी भी घरेलु हिंसा का शिकार नहीं हो सकता । पशुओं तक को हमारे समाज में सुरक्षा मिलती है लेकिन पति या पुरुष की सुरक्षा के लिए कोई कानून नहीं है. हक़ीक़त तो यह भी है कि जब हम पति या पुरुष पर अत्याचार के खिलाफ धरने या प्रदर्शन आदि करते हैं तो बहुत सारे पति या पुरुष उस में शामिल नहीं होते हैं । या तो शर्म महसूस करते हैं या अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों के विरोध में आवाज उठाने से कतराते हैं कि समाज क्या कहेगा । पुरुषों पर होने वाले अत्याचार तब तक नहीं रोके जा सकते जब तक वे खुद अपने अधिकारों के लिए आवाज नहीं उठाते ।
दुर्भाग्य से हमारे देश में पति के पास पत्नी के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए घरेलू हिंसा अधिनियम जैसा कानून नहीं है… यह टिप्पणी कुछ महीने पहले ही मद्रास हाई कोर्ट ने घरेलू हिंसा से जुड़े एक मामले को लेकर दी थी। सवाल उठा कि क्या पुरुष भी घरेलू हिंसा का शिकार हो सकते हैं? हाल ही में इसका उदाहरण भी देखने को मिला। हरियाणा में हिसार के रहने वाले एक शख्स का वजन शादी के बाद कथित तौर पर पत्नी के अत्याचार की वजह से 21 किलो घट गया। इसी के आधार पर उसे हाईकोर्ट से तलाक की मंजूरी मिल गई। ऐसे मामले बढ़े हैं। बहुत से लोगों के लिए ये सोचना भी अविश्वसनीय है कि पुरुषों के साथ हिंसा होती है। वजह ये है कि पुरुषों को हमेशा से मजबूत और ताकतवर माना जाता रहा। लेकिन पारिवारिक विवादों को सुलझाने के लिए चलाए जा रहे तमाम परामर्श केंद्रों के आंकड़े इसका प्रमाण हैं कि पुरुष भी महिलाओं के उत्पीड़न के शिकार हो रहे हैं। घरेलू हिंसा से संबंधित शिकायतों में करीब 40 फीसद शिकायतें पुरुषों की हैं। इसमें ये बात भी सामने आई है कि महिलाओं को तलाक ही एकमात्र विकल्प सुझता है, वहीं पुरुषों का काउंसलिंग पर जोर होता है। यानी काउंसलिंग या किसी भी तरह से पुरुष रिश्ते को जारी रखना चाहते हैं।
क्या महिलाएं पुरुषों को करती है प्रताड़ित? – साल 2018 में व्हेन वाइफ बीट देयर हसबैंड, नो वन वांट्स टु बिलीव इट नामक शीर्षक से प्रकाशित लेख में कैथी यंग ने कई रिसर्च का जिक्र किया। इससे ये पुष्टि हुई कि वायलेंट रिलेशनशिप में महिलाओं के एग्रेसिव होने की आशंका पुरुषों जितनी ही है।
क्या कहते हैं आंकड़े – वैसे तो, भारत में ऐसा कोई सरकारी आकंड़ा नहीं मिला, जिससे घरेलू हिंसा में शिकार पुरुषों का पता चल सके। लेकिन पुरुषों के अधिकारों के लिए कार्यरत कुछ संस्थाएं इस दिशा में काम कर रही हैं। साल 2020 में लॉकडाउन के दौरान सेव इंडियन फैमिली फाउंडेशन की ओर से टेलीफोनिक सर्वे किया गया। इस दौरान इंदौर की पौरुष संस्था और राष्ट्रीय पुरुष आयोग समन्वय समिति दिल्ली को भी पुरुष हेल्पलाइन पर कई शिकायतें मिली। इसमें पाया गया कि लॉकडाउन के दिनों में पत्नियों द्वारा अपने पतियों को प्रताड़ित करने के मामलों में 36 फीसदी की बढ़ोतरी हुई क्योंकि कई पुरुष काम छोड़कर घर पर बैठने गए, या फिर ऑफिस बंद होने से वर्क फ्रॉम होम करने लगे। ऐसे में वे पत्नियों के रवैये से डिप्रेशन में रहने लगे।
आत्म सम्मान गंवाने के डर से शिकायत नहीं कर पाते – कई संस्थाओं के सर्वे के मुताबिक ज्यादातर पुरुष सेल्फ रिस्पेक्ट के चलते अपनी पत्नी की शिकायत नहीं कर पाते। अगर कोई हिम्मत कर पुलिस को शिकायत करता भी है, तो अक्सर पुलिस ही उसे धमका देती है। वैवाहिक जीवन में पुरुष किस तरह प्रताड़ित होते है इसका उदाहरण प्रशासनिक व्यवस्था के बड़े ओहदों पर बैठे पुरुषों के मामले में भी देखने को मिला।
केस- 1 – साल 2018 में कानपुर के पुलिस अधीक्षक (पूर्वी) के पद पर तैनात रहे भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी सुरेंद्र कुमार दास की जहरीला पदार्थ खाने के कारण मौत हो गई। जांच में घरेलू कलह के कारण आत्महत्या की बात सामने आई।
केस- 2 – साल 2017 में बिहार के आइएएस अधिकारी मुकेश कुमार ने पत्नी से विवाद के कारण गाजियाबाद रेलवे स्टेशन के पास ट्रेन से कटकर अपनी जान दे दी थी। सुसाइड नोट में लिखा था कि वह अपनी पत्नी और अपने मां-बाप के बीच हो रहे झगड़े से बेहद परेशान थे।
घरेलू हिंसा से सुरक्षा अधिनियम पुरुष को नहीं देता सुरक्षा – नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट की मानें तो महिलाओं की तुलना में पुरुष ज्यादा आत्महत्या करते हैं। इसकी एक मुख्य वजह परिवार में चल रही कलह और रिश्तों से उपजा डिप्रेशन भी है। वहीं, साल 2019 में ‘इंडियन जर्नल ऑफ कम्युनिटी मेडिसिन’ की रिसर्च के अनुसार हरियाणा के ग्रामीण क्षेत्रों में 21-49 वर्ष की उम्र के एक हजार विवाहित पुरुषों में से 52.4 फीसद ने जेंडर आधारित हिंसा का अनुभव किया। इन आकड़ों को देख लगता है कि जब संविधान लिंग, जाति और धर्म के आधार पर किसी तरह का फर्क स्वीकार नहीं करता, तो क्यों घरेलू हिंसा से सुरक्षा अधिनियम पुरुष को सुरक्षा नहीं देता? जबकि विकसित देशों में जेंडरलेस कानून वहां के पुरुषों को न केवल महिलाओं की तरह घरेलू हिंसा से प्रोटेक्शन देता है, बल्कि इस बात को भी स्वीकार करता है कि पुरुष भी प्रताड़ित होते हैं।
क्या तलाक से डरते हैं पुरुष – सेव इंडियन फैमिली फाउंडेशन और माई नेशन संस्था के ऑनलाइन शोध की मानें तो 98 प्रतिशत भारतीय पति तीन साल के रिलेशनशिप में कम से कम एक बार घरेलू हिंसा का सामना कर चुके हैं। दिल्ली हाइकोर्ट में वकील योगेंद्र ने बताया कि भारत में दहेज निरोधक कानून, घरेलू हिंसा अधिनियम, दुष्‍कर्म से संबंधित कानून सहित महिलाओं की सुरक्षा के लिए और भी कई कानूनी प्रावधान अमल में लाए गए हैं। लेकिन पुरुषों के साथ हिंसा के लिए कोई कानून नहीं। एक दशक पहले जहां एक हजार में मुश्किल से एक मैरिड कपल्स तलाक के लिए कोर्ट पहुंचता था, वहीं अब यह आंकड़ा बढ़ गया है। पुरुषों के कई मामले आते है जो अपने वैवाहिक जीवन से दुखी हैं और तलाक लेने की स्थिति से लगभग रोज गुजरते हैं। जब तलाक का कदम उठाते भी हैं तो उन्हें डर होता है कि कहीं उनका पक्ष सुने बिना ही क्रूर करार न दिया जाए।
क्या महिलाओं के लिए बने कानूनों का हो रहा दुरुपयोग? – साल 2018 में उत्तर प्रदेश में दो सांसदों ने ये मांग उठाई कि राष्ट्रीय महिला आयोग की तर्ज पर राष्ट्रीय पुरुष आयोग भी बने। इसे लेकर प्रधानमंत्री को पत्र भी लिखा था। इन्हीं में से एक सांसद का दावा था कि आज ऐसे कई पुरुष झेल में हैं, जो पत्नी प्रताड़ित है। लेकिन कानून के एकतरफा रुख और समाज में बदनामी के डर की वजह से वे घरेलू अत्याचारों के खिलाफ आवाज नहीं उठा रहें। कई तो सुसाइड करने को मजबूर हैं। पुरुष आयोग की मांग का समर्थन करने वाले लोगों का कहना है कि महिलाओं को सुरक्षा देने के लिए बनाए गए कानूनों का दुरुपयोग हो रहा है। कई तरह से पुरुषों को प्रताड़ित किया जा रहा है। अमेरिका के कानून से प्रेरित होकर धारा 498-ए बनाई गई। लेकिन दहेज प्रताड़ना का ये कानून भी एकतरफा नजर आया। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के अनुसार साल 2012 में इस कानून के तहत दर्ज मामलों में 1,97,762 लोगों को गिरफ्तार किया गया। इन मामलों में चार्जशीट यानी आरोप पत्र दाखिल करने की दर 93.6 फीसद है जबकि आरोपियों पर दोष साबित होने की दर महज 15 फीसद। वहीं, बलात्कार से संबंधित धारा 376 के तहत महिला का आरोप लगाने से ही आरोपी की गिरफ्तारी हो जाती है। अप्रैल 2013 से जुलाई 2014 के बीच दिल्ली में रेप के कुल 2,753 मामले दर्ज हुए, जिनमें से 1,464 मामले झूठे थे।
पुरुष विरोधी सोच बदलने को संस्थाएं कर रही काम – भारत में पहले पुरुषों के अधिकारों को लेकर कम ही आवाज उठती थी, लेकिन अब विभिन्न राज्यों में मेन्स राइट्स ऐक्टिविस्ट बैठक करने लगे हैं। यहां तक कि कई बार वे सड़कों पर उतरकर अपने हकों की बात भी करते हैं। मेन वेलफेयर ट्रस्ट के मेंबर सौरभ सिंह ने बताया कि हमारे देश में महिलाओं के मुकाबले शादीशुदा पुरुष ज्यादा सुसाइड कर रहे हैं। इससे उनके डिस्ट्रेस लेवल का पता चलता है। देश के अलग अलग राज्यों में काम कर रहीं हमारी संस्था को हर महीने 4 से 5 हजार पुरुषों की शिकायतें मिलती है। इसमें रिक्शा वाले से लेकर आईएएस ऑफिसर तक के लोग शामिल हैं। अधिकतर फाल्स रेप केस, मोलेस्टेशन, अननेचुरल सेक्स, झुठे मैरिज रेप के आरोपों से जुड़ी शिकायतों को लेकर फोन करते है।पुरुषों को जागरूक किया जाता है कि वे अपने हक की आवाज उठाएं। पुरुष हेल्पलाइन नंबर 8882-498-498 भी जारी किया गया है। इसके जरिये कोई भी पीड़ित पुरुष कभी भी फोन कर मदद मांग सकता है।
(स्त्रोत – क्वोरा में प्रकाशित राजस्थान विश्वविद्यालय के शुभम खत्री का आलेख)

घरेलू हिंसा : समस्या को समस्या न मानना ही सबसे बड़ी समस्या

पीहू पापिया
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ

जिन्दगी को बेहतर ढंग से जीने की जो शर्त है वह भारी-भरकम है। अतः किसी से निभती है किसी से नहीं निभती। अमूमन तीन तरह के रवैये वाले लोग होते हैं। पहले वो लोग जो सफलता की ऊंचाइयों को छूना चाहते हैं। दूसरे वो लोग जो अपनी समस्याओं से उभरना चाहते हैं। एक तीसरा प्रकार भी है। इनमें वो लोग आते हैं जो समस्या को समस्या मानते नहीं बल्कि जिन्दगी का हिस्सा मानकर समझौते और किस्मत के झूले में झलते हुए पूरी जिन्दगी काट लेते हैं। यहीं से सबसे बड़ी समस्या की आगाज़ होता है। अगर लोग समस्या को समस्या मानेंगे ही नहीं तो, न तो उससे निकलने की कोशिश करेंगे और न ही कभी उससे निकल पायेंगे। ज्यादातर लोग इसी तीसरी श्रेणी में आते हैं। चाहे स्त्री हो या पुरुष, उनके साथ शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न होता रहता है और वे इसका विरोध तक नहीं कर पाते निकलना तो दूर की बात है।
ऐसी समस्याओं से निकलने का पहला कदम यही है कि अपने जीवन और अपने आप पर नज़र डालिए कि जो कुछ आपके जीवन में चल रहा है वह आपको गवारा अथवा मंजूर है भी या नहीं। अगर आपको किसी भी स्थिति या व्यक्ति से असहजता महसूस होती हैं, आपकी सहनशीलता को लांघ रही है, आप स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं तो उस अनुभूति की उपेक्षा न करें। खुद से या किसी भी व्यक्ति (आपको लगता हो जो आपकी स्थिति और आपको समझेगा) की सहायता लें और सहजता को पाने की ओर कदम उठायें। यह पहला कदम ही है जो सबसे भारी होता है। यह उठा लिया तो आगे का रास्ता दिखने लगता है। यह पहला कदम उठाना आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है। यह पहला कदम है समस्या की पहचान करने का कदम। पहचान होगी तो ही उसका समाधान निकालने की मूहीम शुरू हो पायेगी। ऐसी स्थिति में खुद पर विश्वास और धैर्य ही सबसे बड़ा सम्बल होता है। इस दुनिया में कुछ भी असम्भव नहीं। नज़रिया बदलिए रास्ते खुद ब खुद मिल जायेंगे। आप सभी अपनी किस्मत खुद लिखने के काबिल है। आदमी असफल नहीं होता बल्कि काम करने के तरिके में सफलता-असफलता होती है। तरीके बदले और सफलता पाये। और जब तक सफलता का मूँह न देख लें तरिके बदलते रहें। कभी हार न मानने के जज्बे से ही आदमी हर परिस्थिति का केवल डटकर मुकाबला ही नहीं बल्कि उससे उभर जाने की भी क्षमता रखता है।
बदनसीबी यह भी है कि दुनिया अक्सर ताकतवर के साथ खड़ी होती है और कमज़ोर लोग छितरा जाते हैं। इसलिए खुद को कमज़ोर नहीं समझकर अपनी अंदर की ताकत को जगाने की जरूरत है। हमारे अंदर ही हमारे सारे सवालों का हल छिपा हुआ है जरूरत है बस तलाशने की।

महिलाओं के खिलाफ हिंसा और उत्पीड़न का दायरा घर तक सीमित नहीं

महिलाओं के खिलाफ हिंसा हमेशा से होती रही है और इसे महिमामंडित भी किया जाता रहा है। आज भी 70 प्रतिशत महिलाएं हिंसा और उत्पीड़न को भाग्य और नियति का खेल मानकर स्वीकार करती हैं या वह यहां तक कहती हैं कि मारपीट पुरुषोचित स्वभाव है मगर मारपीट सिर्फ पुरुष ही नहीं करते। महिलाओं के खिलाफ जब उत्पीड़न होता है तो उसकी जिम्मेदार असुरक्षा बोध से पीड़ित औरतें होती हैं और वह घर से लेकर कार्यस्थल तक हर जगह विराजमान हैं। उनका लक्ष्य किसी भी बेहतर महिला को पीछे धकेलना ही होता है। यह सच है कि पितृसत्तात्मक समाज इसकी जड़ में है मगर पितृसत्तात्मक समाज की तह में जाकर देखिए तो पता चलता है कि इसे संचालित करने वाली महिलाएं ही हैं। पुरुष कई बार संचालित करता है तो कई बार महिलाओं के हाथ की कठपुतली भी वही होता है जिसे भावनात्मक स्तर पर किसी महिला की ब्लैकमेलिंग का शिकार होना पड़ता है। वस्तुतः मेरी नजर में हिंसा एक जेंडर न्यूट्रल मामला है और इसकी शुरुआत परिवार से होती है। कई परिवार में पुरुष दबाते हैं तो कई जगहों पर उनको जुबान खोलने की अनुमति नहीं होती। हिंसा का यह बड़ा कारण है तो इसकी तह में जाकर देखिए तो इसकी शुरुआत तो बचपन से ही हो जाती है मगर आपका सामाजिक दायरा ऐसा है कि पारिवारिक उत्पीड़न (विशेषकर वह माता – पिता, भाई – भाभी का हो) को उत्पीड़न मानने को तैयार ही नहीं होता। अगर कोई लड़की या लड़का शिकायत करे तो उसे गम्भीरता से लिया ही नहीं जाता । सब कुछ देखते हुए भी परिवार और समाज की प्रतिष्ठा का हवाला देकर पीड़ित सदस्य को ही चुप करवा दिया जाता है और प्रताड़क हर जगह पूजा जाता है। आपको यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि हर बार माता – पिता – भाई – बहनें या रिश्तेदार नायक नहीं होते, वह प्रताड़क होते हैं मगर सामाजिक सहानुभूति उनको ही मिलती है। यहां तक कि लड़की की हत्या भी हो जाए तो तर्क यह दिया जाता है कि बाप की इज्जत उछाल रही थी। सबसे पहला सवाल क्या इज्जत सिर्फ माता – पिता…मायके या ससुराल की होती है…क्या किसी स्त्री या पुरुष का कोई सम्मान नहीं होता ? पारिवारिक प्रतिष्ठा का सारा ठेका आपने लड़कियों को या लड़कों को ही क्यों सौंप रखा है? क्या बाप शराब पीकर घर पर क्लेश करे, अवैध सम्बन्ध रखे. घर में मारपीट करे तो क्या संतान की इज्जत नहीं जाती? आपने हिंसा को खासकर परिवार में होने वाली हिंसा को इतना सामान्य मान लिया है कि आप उसे समस्या मानते ही नहीं जबकि स्त्री का संघर्ष बचपन से ही छोटी – छोटी बातों से ही आरम्भ हो जाता है। पहले उसका आहार, उसकी शिक्षा, उसकी नौकरी, उसके जीवनसाथी चुनने का मामला, हर चीज परिवार की इच्छा और रिश्तेदारों एवं समाज पर छोड़ दिया जाना और उनके हिसाब से लड़की के लिए नियम -कायदे एवं कानून बनाना ही हिंसा का रूप है। इसकी आड़ में बड़ी से बड़ी साजिशों को अंजाम दिया जाता है। बहुत सी स्त्रियां 498 ए का दुरुपयोग कर रही हैं और अपने से बेहतर हर स्त्री को पीछे रखने के लिए वह किचन पॉलिटिक्स का सहारा ले रही हैं। मैं निजी अनुभवों से ऐसे कई मामले जानती हूँ जहाँ जेठानी के कारण देवरानी को किसी प्रकार की आर्थिक सहायता बंद कर दी गयी। घर के राशन से लेकर बच्चों की फीस के लिए स्त्री निर्भर होती है, खासकर जब उसका पति कम कमाता हो या फिर वह न हो। घर की बेटियों की पढ़ाई छुड़वाने में घर की किसी मां, भाभी या बहन का हाथ हो सकता है। यह मनोवैज्ञानिक उत्पीड़न सारा आत्मविश्वास ही छीन लेता है और उत्पीड़न का यह ऐसा स्वरूप है जिस पर कोई बात ही नहीं करना चाहता। माएं अपने बेटों को खुली छूट देती हैं कि वह अपनी बहनों के साथ मारपीट करे, उसकी चीजें छीनें…यहां तक कि घर की छोटी से छोटी कील लगाने के लिए उसे जबरन भाइयों पर निर्भर बनाया जाता है कि वह छोटी है तो क्या यह हिंसा नहीं है। बहनों के दुप्पटे से लेकर उसकी शिक्षा तक, हर फैसले में जब ऐसी दखलन्दाजी रहेगी तो स्त्री के व्यक्तित्व का विकास कैसे हो सकेगा और कैसे वह अपने लिए खड़ी हो सकेगी? हर साल 25 नवम्बर को महिलाओं पर होने वाली हिंसा को रोकने के लिए अंतराष्ट्रीय महिला हिंसा उन्मूलन दिवस मनाते हैं। कार्यक्रम होते हैं, भाषणबाजी होती है, पोस्टर लगते हैं मगर जब तक बुनियाद सही नहीं होगी तब तक समाधान की उम्मीद बेमानी है। बहरहाल बात आज महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा पर ही करते हैं –
अंतराष्ट्रीय महिला हिंसा उन्मूलन दिवस का इतिहास – पैट्रिया मर्सिडीज मिराबैल, मारिया अर्जेंटीना मिनेर्वा मिराबैल और एंटोनिया मारिया टेरेसा मिराबैल द्वारा डोमिनिक शासक रैफेल टुजिलो की तानाशाही का कड़ा विरोध किए जाने पर उस क्रूर शासक के आदेश पर 25 नवंबर 1960 को उन तीनों बहनों की हत्या कर दी गई थी। साल 1981 से उस दिन को महिला अधिकारों के समर्थक और कार्यकर्ता उन्हीं तीनों बहनों की मृत्यु की पुण्यतिथि के रूप में मनाते आए हैं। संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 17 दिसंबर 1999 को एकमत से हर साल 25 नवंबर का दिन ही महिलाओं के खिलाफ अंतराष्ट्रीय हिंसा उन्मूलन दिवस के रूप में मनाने के लिए निर्धारित किया गया।
महिलाओं के खिलाफ अपराधों में एक-तिहाई पति और रिश्तेदारों की क्रूरता से जुड़े – सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (एमओएसपीआई) की तरफ से किए गए राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के विश्लेषण के मुताबिक, 2016 से 2021 के बीच महिलाओं के खिलाफ लगभग हर तीन में से एक अपराध उसके पति और/या उसके रिश्तेदार की ‘क्रूरता’ से जुड़ा था । इस माह के शुरू में एमओएसपीआई की ‘वीमेन एंड मेन इन इंडिया 2022’ रिपोर्ट में प्रकाशित निष्कर्ष बताते हैं कि पति और उनके रिश्तेदारों की तरफ से क्रूरता देश में महिलाओं के खिलाफ हिंसा का सबसे आम रूप है । 2016 से 2021 के बीच 6 साल की अवधि में देश में भारत में महिलाओं के खिलाफ अपराध के करीब 22.8 लाख मामले दर्ज हुए. रिपोर्ट में बताया गया है कि इनमें से लगभग 7 लाख यानी करीब 30 प्रतिशत भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 498ए के तहत दर्ज किए गए थे। धारा 498ए किसी महिला के खिलाफ पति या उसके रिश्तेदारों की क्रूरता से संबंधित हैं. इसमें ‘क्रूरता’ को किसी ऐसे इरादतन आचरण के रूप में परिभाषित किया गया है जिससे ‘महिला के आत्महत्या जैसा कदम उठाने या गंभीर चोट पहुंचने अथवा किसी शारीरिक अंग या स्वास्थ्य (चाहे मानसिक या शारीरिक) के लिए खतरा उत्पन्न होने की संभावना हो.’
इसके अलावा क्रूरता को ‘महिला के उत्पीड़न….किसी भी संपत्ति या मूल्यवान चीज के लिए किसी भी गैरकानूनी मांग को पूरा करने के लिए उसे या उससे संबंधित किसी भी व्यक्ति को मजबूर किए जाने या उसके या उससे संबंधित किसी व्यक्ति के ऐसी मांग पूरी करने में नाकाम रहने पर प्रताड़ित किए जाने’ से जोड़कर भी देखा जाता है। ध्यान रहे कि दोषी पाए जाने पर आरोपी को तीन साल तक जेल की सजा हो सकती है और जुर्माना भी लगाया जा सकता है । एमओएसपीआई रिपोर्ट के आंकड़ों से पता चलता है कि अध्ययन वाले छह वर्षों में से प्रत्येक में 498ए के तहत दर्ज मामले महिलाओं के खिलाफ अन्य सभी अपराधों में सबसे ज्यादा थे यानी बलात्कार और यौन उत्पीड़न से मामलों में भी कहीं ज्यादा।
आगे बात करें तो 2016 से 2021 की इस अवधि के दौरान, देश में आईपीसी की धारा 354 के तहत 5.2 लाख मामले दर्ज किए गए ।‘महिलाओं के शील भंग करने के इरादे से किए गए हमले’ संबंधी इस धारा के तहत दर्ज मामले महिलाओं के खिलाफ अपराध से जुड़े कुल मामलों में से 23 फीसदी हैं। महिलाओं के खिलाफ अगला सबसे आम अपराध अपहरण और बंधक बनाना है और लड़कियों को उनके ही घर में बंधक बनाया जाता है, यह एक सच है। जिसमें 4.14 लाख घटनाओं के साथ औसतन 18 फीसदी मामले दर्ज किए गए. इन छह साल में भारत में बलात्कार के लगभग 1.96 लाख मामले दर्ज किए गए, जो 2016-2021 में महिलाओं के खिलाफ कुल अपराधों में लगभग 8.6 प्रतिशत थे.
498ए मामलों में अपराध दर की बात करें तो असम चार्ट में सबसे ऊपर है। राज्य में 2021 में 498ए के तहत करीब 13,000 मामले दर्ज किए गए. यह आंकड़ा राज्य में प्रति एक लाख महिला जनसंख्या पर 75 मामले होते हैं। इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ क्राइम एंड सिक्योरिटी साइंसेज (आईआईसीएसएस), बेंगलुरु के प्रमुख निदेशक प्रोफेसर के. जयशंकर के अनुसार बड़ी संख्या में अपराधों का पता ही नहीं लग पाता क्योंकि ये जाति, संस्कृति, पितृसत्ता, पुलिस और समाज का डर आदि विभिन्न कारणों से रिपोर्ट नहीं किए जाते. एक स्वतंत्र थिंक टैंक या किसी अकादमिक निकाय की तरफ से अपराध पीड़ितों पर एक समग्र सर्वेक्षण किए जाने की जरूरत है।
लॉकडाउन में और बढ़ा उत्पीड़न – राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) ने मुताबिक साल 2020 में कोरोना महामारी के कारण राष्ट्रीय तालाबंदी के महीनों के रूप में चिन्हित एक साल में महिलाओं और बच्चों के खिलाफ पारंपरिक अपराधों में कमी आई लेकिन देश में अपराध के मामले 28 प्रतिशत बढ़ गए। हालांकि लॉकडाउन के बाद महिलाओं और बच्चों के खिलाफ आपराधिक मामलों में तेजी आई है। एनसीआरबी के अनुसार देशभर में 2020 में यौन शोषण के रोजाना औसतन 77 मामले दर्ज किए गए और कुल 28,046 मामले सामने आए। दुनियाभर में पूरे देश में महिलाओं के खिलाफ अपराध के कुल 3,71, 503 मामले दर्ज किए गए, जो 2019 में 4,05,326 और 2018 में 3,78,236 थे।
वर्क फ्रॉम होम में भी नहीं थमे अपराध के मामले – एनसीआरबी के अनुसार देश की राजधानी दिल्ली में 2020 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 10,093 मामले दर्ज किए गए, जबकि 2019 में ऐसे 13,395 मामले सामने आए थे यानी 2019 की तुलना में 2020 में महिलाओं के खिलाफ 24.65 फीसदी अपराध कम हुए। कोविड-19 महामारी और लॉकडाउन के कारण जब देश की अधिकांश आबादी अपने घरों में थी, स्कूल-कॉलेज बंद थे, वर्क फ्रॉम होम चल रहा था, ऐसे में भी 2020 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 10,093 मामले सामने आना कम चिंताजनक नहीं है। 2020 में दिल्ली में महिलाओं के अपहरण के 2,938 यौन शोषण के प्रयास के 9 और यौन शोषण या सामूहिक यौन शोषण के बाद हत्या का एक मामला दर्ज किया गया। इस दौरान देशभर में साइबर अपराध 2019 के मुकाबले 11.8 फीसदी बढ़ा है।
सेहत के लिए घातक है उत्पीड़न – सबसे पहले समझिए कि उत्पीड़न सिर्फ शारीरिक नहीं होता, मानसिक और वाचिक भी होता है। स्त्री को कुछ न कहना और उसे दरकिनार कर देना….यह सबसे बड़ा उत्पीड़न है। आर्थिक स्तर पर उसे बाध्य करना कि वह मांगती ही रहे, यह आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाना है। भारतीय परिवारों में उत्पीड़न का यह सामान्य तरीका है जिससे पढ़ने वाली लड़कियां जूझती हैं। परीक्षा के दौरान फीस रोक देना और उसे पैसे देकर नाकारा साबित करना यह आम बात है जहां पैसे तो मिल जाते हैं पर उसका ब्याज उसे कमतर साबित कर और तानों से रक्तरंजित कर वसूला जाता है। अगर किसी महिला ने किसी तरह की मारपीट या यौन हिंसा का अनुभव किया हो, तो उनके मन में कई तरह की भावनाएं वि​कसित हो जाती हैं, जैसे- डर लगना, कन्फ्यूजन महसूस होना, गुस्सा आना या फिर पूरी तरह से सुन्न हो जाना और कुछ भी महसूस न कर पाना. इसके अलावा हमला और हिंसा झेलने वाली महिलाओं को कई बार खुद में शर्मिंदगी और अपराधबोध भी महसूस होने लगता है.
मानसिक बीमारियां होने का खतरा – महिलाओं में कई तरह की मानसिक बीमारियां विकसित होने का खतरा बढ़ जाता है जैसे: पोस्ट ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (पीटीएसडी): किसी तरह की यौन हिंसा या शारीरिक दुर्व्यवहार की वजह से व्यक्ति को ट्रॉमा, खौफनाक या डरावना अनुभव महसूस हो सकता है और इसी वजह से पीटीएसडी की समस्या हो सकती है। पीटीएसडी की वजह से पीड़ित महिला, आसानी से चौंक जाती है, चिंता या तनाव महसूस करती हैं, हर वक्त सतर्क रहती हैं, उन्हें सोने में दिक्कत महसूस होती है या फिर बहुत अधिक गुस्से का अनुभव करती हैं। कई बार महिलाओं को मारपीट कर अकेला छोड़ दिया जाता है । जब उसके पास बात करने के लिए कोई न हो और वह लगातार प्रताड़ित होती रहे तो वह अवसाद में चली जाती है और एक समय आता है जब पागल हो जाती है। क्रूरता ऐसी होती है कि तब उसे मानसिक उपचार की जगह ताने मिलते हैं..य़ह एक गम्भीर अपराध है मगर इस तरह के अपराधों के लिए किसी प्रकार का स्पष्ट कानून नहीं है।
अवसाद – महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा से जुड़े अध्ययनों की मानें, तो सामान्य महिलाओं की तुलना में शारीरिक या यौन हिंसा का शिकार महिलाओं में डिप्रेशन का खतरा 3 गुना अधिक होता है. हर वक्त उदासी महसूस होना, जो भी हुआ उसके लिए खुद को दोषी मानना इस तरह की चीजें लगातार सोचने की वजह से उनके मन में आत्महत्या का ख्याल भी बार-बार आने लगता है ।
एंजाइटी – आसपास जो भी हो रहा है उससे जुड़ी सामान्य चिंता भी हो सकती है, या फिर अचानक पीड़ित महिला को बहुत अधिक डर महसूस हो सकता है, जिसे एंजाइटी अटैक कह सकते हैं. कई बार एंजाइटी की यह समस्या धीरे-धीरे समय के साथ बदतर होने लगती है और व्यक्ति के दैनिक जीवन में भी हस्तक्षेप करने लगती है. इस तरह की चीजों का अनुभव करने पर भी उसे खुद तक सीमित रखने की बजाए डॉक्टर से बात करनी चाहिए वरना, इसका मानसिक सेहत पर गंभीर असर देखने को मिल सकता है ।
(स्त्रोत – द प्रिंट में प्रकाशित रिपोर्ट)

सेनको गोल्ड एंड डायमंड्स के आभूषणों से सजी चंदननगर के हेलापुकुर जगद्धात्री पूजा की प्रतिमा

गैलरी गोल्ड में आयोजित हुई स्ट्रोक्स एंड स्ट्राइक्स प्रदर्शनी

कोलकाता । उभरते हुए कलाकारों को प्रोत्साहित करने के लिए सेनको गोल्ड एंड डायमंड्स ने सातवीं स्ट्रोक्स एंड स्ट्राइक्स प्रदर्शनी को सहायता दी। गैलरी गोल्ड में यह प्रदर्शनी 17 से 19 नवम्बर तक चली। गैलरी गोल्ड की संरक्षक जोइता सेन ने कहा कि यह प्रदर्शनी उभरते कलाकारों को बढ़ावा देने के लिए है और इस बार प्रदर्शनी में 26 कलाकारों, मूर्तियों और प्रिंट निर्माताओं ने भाग लिया । गैलरी गोल्ड न केवल पारंपरिक और सार्थक कलाकारों के लिए एक मंच है, बल्कि यह शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्तित्वों/कलाकारों के लिए भी एक जगह है । गैलरी गोल्ड की संरक्षक शुभंकर सेन ने कहा कि गैलरी गोल्ड सभी कला प्रेमियों के लिए कला का एक स्थान है, और ये कार्यक्रम दर्शकों, समान विचारधारा वाले विचारकों और गैलरी के बीच एक इंटरफ़ेस के रूप में कार्य करते हैं।

आईआईटी खड़गपुर में दिखे रोशनी के सजीले रंग

खड़गपुर । आईआईटी खड़गपुर ने दिवाली को रोशनी के रंग से सजाया। हर साल की तरह इल्यूमिनेशन आयोजित किया गया जो संस्थान की विरासत और धरोहर का महत्वपूर्ण अंग है। आत्मनिर्भर भारत की संकल्पना को प्रोत्साहित करते हुए स्थानीय विक्रेताओं जैसे दीया बनाने वालों, कारीगरों और अन्य विक्रेताओं को भी काफी लाभ मिला और विद्यार्थियों ने भी उत्साहपूर्वक भाग लिया । हर साल, हम प्रत्येक हॉल के छात्रों को “चटाई” बनाने, दीये जोड़ने और विस्तृत कलाकृतियाँ बनाने के लिए एक साथ काम करते हुए देखते हैं। इसका विस्तार विभिन्न हॉलों के बीच पारंपरिक रंगोली प्रतियोगिता तक भी होता है और इस बार भी अनोखी रंगोली दिखाई पड़ी। रंगोली, जीवंत रंगों का मिश्रण, पौराणिक कथाओं, सांस्कृतिक प्रतीकों और जटिल ज्यामितीय पैटर्न के दृश्यों को दर्शाती है। इस प्रक्रिया में एक-दूसरे के साथ एक अविभाज्य बंधन विकसित करते हुए, वरिष्ठ और कनिष्ठ पैनल और भित्तिचित्रों के माध्यम से शानदार विषयों को व्यक्त करने के लिए सहयोगात्मक रूप से काम करते हैं। रोशनी आईआईटी खड़गपुर की संस्कृति और सहकर्मी-संबंध का एक अनिवार्य हिस्सा है। रोशनी अविस्मरणीय यादों और पुरानी यादों का अवतार है जो हर केजीपी वासी के दिल में गहराई से बसी रहती है – जिसे आने वाले वर्षों तक याद किया जाएगा और संजोया जाएगा।

जो पढ़ेगा, वही रचेगा और जो रचेगा, वही टिकेगा

साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में डॉ. एस. आनंद एक सुपरिचित व्यक्तित्व हैं। कोलकाता की पत्रकारिता में इन्होंने अनेकों पत्रकारों को अपने ज्ञान, अनुभव से सींचा है, खड़ा किया । डॉ. एस. आनन्द पत्रकारिता के क्षेत्र में लगभग 50 वर्षों से सक्रिय हैं। उनको साहित्य एवं पत्रकारिता का समन्वय करने के लिए जाना जाता है। महानगर के कई अग्रणी समाचार पत्रों में कार्य करते हुए वे नियमित स्तम्भ लेखन, विशेषकर व्यंग्य लेखन के लिए जाने जाते हैं। लस्टम– पस्टम पाठकों में बहुत लोकप्रिय रहा है। देश की चर्चित पत्रिकाओं में इनकी रचनाएं प्रकाशित होती रही हैं। है। शुभ सृजन नेटवर्क का सृजन सारथी सम्मान- 2023 महानगर के वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार डॉ. एस. आनन्द को दिया जा रहा है। शुभजिता ने सृजन सारथी डॉ. एस. आनंद से विशेष बातचीत की, प्रस्तुत हैं प्रमुख अंश – 
प्र. पत्रकारिता और साहित्य, दोनों से आपका जुड़ाव रहा है, आमतौर पर इन दोनों को एक दूसरे के सामने खड़ा कर देने की परिपाटी रही है, आपका दृष्टिकोण क्या है? 
पत्रकारिता और साहित्य एक दूसरे के पूरक हैं। बिना एक के दूसरे का अस्तित्व ही नहीं, ऐसा मेरा मानना है।  चार दशकों पूर्व मैंने वाराणसी से प्रकाशित संसार हिन्दी दैनिक में यह मंजर अपनी आंखों से देखा था जहां बहुत सारे साहित्यकार उस समाचार पत्र में काम करते थे। प्रूफ संशोधन से लेकर समाचार लेखन, फीचर सब कुछ उनके ही जिम्मे था। अपने समय का सबसे ज्यादा लोकप्रिय अखबार था। इसके बंद होने के बाद  इसी टीम के अधिकांश पत्रकार  ‘आज’ हिन्दी दैनिक में आ गये और उसे परवान चढ़ाया।। बनारस के जाने माने कवि और हास्य व्यंग्य लेखक मोहन लाल गुप्त ( भैया जी बनारसी) ने एक साहित्यिक गोष्ठी में कहा था – एक अच्छा पत्रकार एक उम्दा साहित्यकार होता है क्योंकि बिना साहित्य को जाने किसी भी विधा में सृजन नामुमकिन है। साहित्य से हमें नये शब्द मिलते हैं, नयी संवेदनाएं जाग्रत होती हैं जिनका उपयोग कर हम समाचारों को संवेदनशील और मानवीय बना सकते हैं। जैसे दाल के बिना भात खाने में मजा नहीं आता वैसे ही बिना साहित्यिक ज्ञान के समाचारों का उम्दा प्रस्तुतीकरण नहीं कर सकते।
प्र. 50 वर्षों से आप हिन्दी पत्रकारिता में सक्रिय हैं, इन 50 वर्षों में आप क्या परिवर्तन देखते हैं?
पेट प्रबल होता है और उससे भी प्रबल है उसे पालने की जद्दोजहद। जमाना महंगा है और जीवनयापन की समस्या दिन -प्रतिदिन भयंकर ही होती जा रही है।  पाव भर पसीने की कीमत चंद पैसे ही मिलते हैं। साहित्य में मनोरंजन करने,उस पर सहानुभूति प्रकट करने और उससे प्रेम रखने के लिए न तो हमारे पास समय है और न ही सामर्थ्य क्योंकि हमारे समक्ष है जीविका की विकट समस्या। हमारा पहला कर्तव्य है किसी प्रकार जीवित रहना। जीवन पहले है, साहित्य पीछे। परन्तु मनुष्य मात्र में अन्तर की अभिव्यक्ति के लिए एक आकुलता अनादिकाल से रही है,वह अपने को बहुत लोगों में प्रतिष्ठित करने के लिए व्याकुल रहता है। इसे ही कहते हैं – साहित्य का आवेग। उसमें एक और व्यग्रता होती है, वह यह कि वह बहुतों के अन्तर के निगूढ़तम भावों का जानकार हो, बहुतेरे हृदय से उसका परिचय हो-वह है साहित्य प्रेम। फलत:  साहित्य न केवल आत्मा का दर्पण, हृदय का प्रतिबिंब और जीवन का चित्र है बल्कि वह स्वयं आत्मा है, हृदय है, जीवन है।
प्र. नवजागरण काल में पत्रकारिता के पीछे एक मिशनरी भाव रहता था, आज भी लगभग 200 साल बीत जाने के बाद भी यही उम्मीद बनी हुई है, वर्तमान समय में इसे बनाए रखना कहां तक सम्भव ह?
पत्रकारिता और साहित्य का सम्बन्ध मेरे हिसाब से  दाल में घी जैसा होता है। पत्रकारिता मिशन हैं तो साहित्य उस मिशन में चार चांद लगाने का एक यंत्र है। जैसे बिना अक्षर ज्ञान के शब्दों को या वाक्यों को लिखना नामुमकिन है वैसे ही साहित्य से विलग होकर समाचार तो लिखे जा सकते हैं मगर उसमें वह प्रवाह और रवानी नहीं होगी जो एक सुधी पाठक के लिए आवश्यक होती है। आज तो ऐसे- ऐसे पत्रकार आ गये हैं जिन्हें न तो व्याकरण का पता है और न ही इमले का। वचन, लिंग, क्रिया की तो बात ही छोड़ दीजिए। दरअसल, युग बदल गया, पत्रकारिता का मिशन बदल गया। पहले पत्रकारिता देश, समाज और मानवीय उत्कर्ष के लिए की जाती थी ,आज वह एक व्यापार बन गयी है। पत्रकारिता को पैसे कमाने की मशीन मान लिया गया है। आखिर ऐसा हो भी क्यों नहीं?यह पेशा आज पूंजीपतियों के हाथ की कठपुतली बन  गया है। जहां तक बात निष्पक्ष पत्रकारिता की है तो मेरा यही कहना है, बकौल बशीर बद्र –
बड़े प्यार से मेरा घर जला
कभी आंच तुम पे न आयेगी
ये जुबां किसी ने खरीद ली
ये कलम किसी की गुलाम है।

प्र. पत्रकारिता और साहित्य का समन्वय किस प्रकार किया जा सकता है?

इन दिनों साहित्यिक पत्रकारिता समस्याग्रस्त है। सबसे बड़ी समस्या है बिक्री और पठनीयता की। अब समाचार पत्र खरीद कर पढ़ने वाले बहुत कम हो गये हैं। एक समय था कि ‘मतवाला’ के प्रकाशन के दिन पाठक प्रेस को घेरकर खड़े हो जाते थे। लखनऊ से ‘माधुरी’ पत्रिका लगभग सात दशकों तक  ग्राहकों के बल पर चलती रही है। प्रेमचंद, पंडित रूपनारायण पांडेय और डॉ कृष्ण बिहारी मिश्र ने इसकी वस्तु सज्जा में अकूत श्रम किया था। आज के पत्र-पत्रिकाएं प्राय: संपादक या मालिक की अखाड़ेबाजी अथवा आइडियोलॉजी या वर्णनामूलक सनक अथवा छद्म बौद्धिकता की शिकार हो गयी है।
साहित्यिक पत्रकारिता के लिए आवश्यक है कि वह पाठकीय प्रवृत्ति का परिष्कार करे। जन साधारण से संवाद स्थापित करके मोहक शैली में उसे पेश करे और यह तभी संभव है जब पत्रकार साहित्यिक प्रतिभा से लबरेज हो। इमला, वर्तनी, व्याकरण का अच्छा ज्ञान हो तथा उसके पास शब्द भंडार हो क्योंकि बिना परिष्कृत और सरल शब्दों के वह अपना प्रस्तुतीकरण सही ढंग से नहीं कर सकता इसलिए पत्रकारिता में साहित्य का समन्वय जरूरी है।

प्र. 50 वर्षों की यात्रा को आप किस प्रकार देखते हैं…स्मृतियों में जाकर? आज के युवा पत्रकारों के बारे में आपकी क्या राय है?

जहां तक मेरा कार्यानुभव कहता है कि वो दिन गुजर गए जब पसीने गुलाब थे। पहले पत्रकारों की नियुक्ति उसकी शैक्षिक योग्यता, साहित्यिक दक्षता और कार्यानुभव को देखकर की जाती थी किन्तु आज जिसने कंप्यूटर ,पेज मेकिंग  तथा कट-पेस्ट की जानकारी हासिल कर ली, वह संपादक हो जाता है और ऐसी स्थिति में आप उनसे स्वस्थ पत्रकारिता की आशा नहीं कर सकते। अनुवाद की शैली भी तभी ठीक होगी जब आपके पास शब्दों का संग्रह होगा। शब्द की तीन शक्तियां होती हैं -अमिधा, लक्षणा और व्यंजना, यह बात कितनों को मालूम है? उपसर्ग और प्रत्यय के बारे में कितने लोग जानते हैं? और यही कारण है कि चाहे अखबार हो या न्यूज चैनल सभी -सशक्तिकरण,  तुष्टिकरण लिख रहे हैं जो ग़लत है। व्याकरण ज्ञान न होने से ऐसी गलतियां होती हैं फिर भी संपादकों और मालिकों को कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि वे अखबार या पत्रकारिता को मिशन नहीं व्यापार समझते हैं और इसी से पत्रकारिता में क्षरण आ रहा है।
6. आप क्या सन्देश देना चाहेंगे?
मैं बहुत छोटा और अदना सा साहित्यकार हूं, मैं किसी को क्या संदेश दूंगा? मै तो आज भी सीख रहा हूं फिर भी इतना जरूर कहूंगा कि जो पढ़ेगा, वही रचेगा और जो रचेगा, वही टिकेगा।

भवानीपुर कॉलेज ने मनाया इंट्रा कॉलेज एथलेटिक मीट ऊर्जा 2023 

कोलकाता । गीतांजलि स्टेडियम में भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज के छात्र- छात्राओं ने इंट्रा एथलेटिक मीट ऊर्जा 2023 के अंतर्गत स्पोर्ट्स और एथलीट्स के प्रदर्शन, कॉरनिवाल फेस्ट और फनफेयर रहा। 22 नवंबर को उद्घाटन समारोह में कॉलेज के अध्यक्ष रजनीकांत दानी और रेक्टर और डीन प्रो दिलीप शाह ने मशाल प्रज्वलित कर खेल का आरंभ किया। 50 विद्यार्थियों ने समूह नृत्य से खिलाडियों का उत्साहवर्धन किया। साथ में, कॉलेज के डायरेक्टर जनरल डॉ सुमन मुखर्जी, मैनेजमेंट पदाधिकारियों में जीतू भाई, उमेद ठक्कर और प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी, प्रो समीक्षा खंडूरी, डॉ वसुंधरा मिश्र, प्रो विवेक पटवारी, प्रो चंदन झा, प्रो दर्शना त्रिवेदी और बड़ी संख्या में वोलिंटियर्स विद्यार्थियों  आदि की उपस्थिति रही। डॉ सुमन मुखर्जी ने स्वामी विवेकानंद के शब्दों द्वारा बच्चों को खेल के प्रति जागरूक किया। प्रो दिलीप शाह ने सभी विद्यार्थियों को शुभकामनाएँ देते हुए कॉलेज के खेल में हिस्सा लेने के लिए प्रोत्साहित किया। कॉलेज के 300 से अधिक प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। सौ – दो सौ – चार सौ रेस, डिस्कस थ्रो, शार्ट पुट, रिले रेस, जेवलिन थ्रो आदि विभिन्न स्पोर्ट्स में कई बैचों में लड़कियों और लड़कों ने अपने अपने शानदार प्रदर्शन किया। खाने, पीने और स्नेक्स आदि के 13 स्टॉल लगाए गए जो विद्यार्थियों ने लगाए।एनसीसी के कैडटों ने मार्चपास्ट किया और तिरंगे को सलामी दी। मार्चपास्ट में कॉलेज के 17 कलेक्टिव के विद्यार्थियों ने अपने-अपने झंडे के साथ सलामी दी। फ्लेम, क्रिसेंडो, इन एक्ट, सेतु, बुलशाई, फैशनिस्टा, सेल्युलायड, एक्सप्रेशन, एनसीसी, एन एस एस आदि सभी के विद्यार्थियों ने पूरे स्टेडियम का चक्कर लगाते हुए झंडे को सलामी दी। । 100 और 200 मीटर रेस में प्रथम द्वितीय और तृतीय स्थान पर आने वाले प्रतिभागियों को पुरस्कृत किया गया। शिक्षकों और नॉन टीचिंग स्टाफ ने भी रेस में हिस्सा लिया जिसमें चंदन झा, विवेक पटवारी, दर्शना त्रिवेदी ने अच्छा प्रदर्शन किया।अंत में, सांस्कृतिक कार्यक्रम संगीतज्ञ सौरभ गोस्वामी के बैंड द्वारा किया गया। सभी विजयी विद्यार्थियों को उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थान प्राप्त वालों को मेडल ट्राफी और सर्टिफिकेट देकर पुरस्कृत किया गया।  सर्वश्रेष्ठ मेल और फीमेल ट्राफी प्रदान की गई। स्पोर्ट्स के  रूपेश गांधी का प्रमुख सहयोग रहा। इस कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज पहुंचे अभिनेता विक्की कौशल

कोलकाता । प्रसिद्ध गीत ‘माथे पे तिलक जय हिंद लगा वो मेरी निशानी है’ फिल्म ‘सैम बहादुर’ के लोकप्रिय अभिनेता विक्की कौशल का स्वागत भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज ने किया।विक्की कौशल एक भारतीय अभिनेता हैं जिन्हें 2015 में पुरस्कार विजेता फिल्म मसान में उनके सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए सबसे ज्यादा याद किया जाता है,उरी सर्जिकल स्ट्राइक में विक्की कौशल ने एक सैनिक की भूमिका निभाई थी जिसमें बेस्ट एक्टर का अवार्ड मिला था। सैम बहादुर फिल्म में विक्की कौशल ने मानेकशॉ का जबर्दस्त अभिनय किया है जो रिलीज होने वाली है। फिल्म सैम बहादुर फिल्म के प्रोमो के लिए विक्की कौशल भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी में आए और अपनी फिल्म के प्रोमो को विद्यार्थियों के साथ देखा जो एक दिसम्बर को रीलिज होगी।
यह फिल्म फील्ड मार्शल सैम बहादुर यानि सैम हॉरमुसजी फेम जी जमशेद जी मॉनेक शॉ की बायोपिक पर बनी है। इस फिल्म की निर्देशक मेघना गुलजार हैं। बड़ी संख्या में उपस्थित विद्यार्थियों ने गीतों का आनंद लिया। तू मेरा कोई ना अपना बना ले पिया, फलक से चांद लाऊंगा, वेवफा झूठा प्यार, आदि पंजाबी की कई गीतों की धुन पर सभी छात्र छात्राएँ थिरकते रहे। कॉलेज के मैनेजमेंट के पदाधिकारियों, रेक्टर और डीन प्रो दिलीप शाह और उपाध्यक्ष मिराज डी शाह, शिवानी डी शाह, सोहिला भाटिया ने विक्की कौशल का स्वागत किया ।छात्राओं ने विक्की कौशल का पोट्रेट देकर सम्मानित किया। इस अवसर पर कॉलेज के फ्लेम और इन एक्ट कलेक्टिव ने विक्की कौशल की फिल्मों से विभिन्न नृत्य और सैन्य नाट्य प्रस्तुति दी । मेरा हीरो विक्की विक्की चिल्लाते हुए जोरशोर से हर कदम पर जोश दिखाया जिसे विक्की कौशल ने बहुत पसंद किया ।
विक्की कौशल ने बताया कि इस फिल्म में सभी सैनिक वास्तविक हैं और इसके लिए उन्होंने कहा कि भारतीय सेना को सैल्यूट किया साथ में बड़ी संख्या में विद्यार्थियों ने भी किया। फील्ड मार्शल का पद धारण करने वाले सैम बहादुर पहले भारतीय सैन्य अधिकारी थे। मानेकशॉ सैम बहादुर नाम से प्रसिद्ध हुए। सैम बहादुर 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध के दौरान भारतीय सेना अध्यक्ष थे और फील्ड मार्शल का पद धारण करने वाले पहले भारतीय सैन्य अधिकारी थे। सैम बहादुर का सैनिक करियर द्वितीय विश्व युद्ध से आरंभ होकर चार दशकों और पांच युद्ध तक विस्तृत रहा।
विक्की कौशल ने विद्यार्थियों के साथ अपनी सेल्फी और बातें शेयर की। यह कार्यक्रम भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज के टर्फ पर हुआ।रेक्टर और डीन प्रो दिलीप शाह, प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी समीक्षा खंडूरी और वोलिंटियर्स विद्यार्थियों द्वारा यह कार्यक्रम बहूत ही कम समय में आयोजित किया गया। इसकी जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।