भारत जैन महामंडल लेडिज विंग द्वारा सुरंगों राजस्थान का आयोजन
एचआईटीके में में मनाया गया गणतंत्र दिवस
कोलकाता । हेरिटेज ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस, कोलकाता ने 26 जनवरी 2024 को परिसर में 75वां गणतंत्र दिवस गर्व, जोश और उत्साह के साथ मनाया। इस दिन मुख्य अतिथि के रूप में फोर्टिस हेल्थकेयर लिमिटेड की रणनीति और संचालन प्रमुख ऋचा सिंह देबगुप्ता की उपस्थित रहीं। कार्यक्रम के दौरान स्पेन के शीटगो के सीईओ यानिक वान डेर वार्ट भी आमंत्रित अतिथि के रूप में उपस्थित थे।
समारोह की शुरुआत द हेरिटेज स्कूल परिसर में मुख्य अतिथि द्वारा विक्रम स्वरूप (अध्यक्ष, स्कूल प्रबंधन समिति, द हेरिटेज स्कूल), सीमा सप्रू (प्रिंसिपल, द हेरिटेज स्कूल), की उपस्थिति में ध्वजारोहण के साथ हुई। प्रदीप अग्रवाल, सीईओ, हेरिटेज ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस, विवेक दिनोदिया, कार्यकारी निदेशक, हाई-टेक सिस्टम्स प्राइवेट। लिमिटेड और स्कूल के अन्य शिक्षक और कर्मचारी सदस्य भी इस दौरान उपस्थित रहे। राष्ट्रगान के गायन के बाद, छात्रों द्वारा भारत के 75 वर्षों के इतिहास पर आधारित सांस्कृतिक नृत्य प्रस्तुतियों का आयोजन किया गया, जिसमें भारत द्वारा हासिल किए गए प्रत्येक मील के पत्थर को खूबसूरती से दर्शाया गया।
हेरिटेज इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी और हेरिटेज लॉ कॉलेज के इंजीनियरिंग छात्रों ने विभिन्न देशभक्ति गीतों पर सांस्कृतिक नृत्य प्रस्तुतियां भी दीं। शीटगो, स्पेन के सीईओ यानिक ने कहा, “मैं इस प्रतिष्ठित क्षण में यहां आकर वास्तव में सम्मानित महसूस कर रहा हूं, जो भारत में मनाए जाने वाले महत्वपूर्ण दिनों में से एक है फोर्टिस हेल्थकेयर लिमिटेड संचालन प्रमुख ऋचा सिंह देबगुप्ता ने कहा, “आइए हम एक भारतीय की सच्ची भावना को बनाए रखने के लिए इस दिन को गर्व और जोश के साथ मनाएं।”
भारतीय संस्कृति और विरासत पर एक सत्र से छात्र उत्साहित हुए और उन्होंने अयोध्या राम मंदिर के लाइव कवरेज का अनुभव किया। स्वामी वेदनिष्ठानंद महाराज, आध्यात्मिक प्रमुख, रामकृष्ण मिशन वेदांत केंद्र, जिनेवा, स्विट्जरलैंड ने आज हेरिटेज परिसर के स्वामी विवेकानंद सभागार में ‘भारतीय संस्कृति और विरासत’ पर छात्रों को संबोधित किया। कार्यक्रम का आयोजन इंस्टीट्यूशन इनोवेशन काउंसिल ऑफ हेरिटेज इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, कोलकाता द्वारा किया गया था। इसमें द हेरिटेज कॉलेज और हेरिटेज लॉ कॉलेज के छात्रों और संकाय सदस्यों ने भी भाग लिया।
उद्घाटन भाषण के दौरान, स्वामीजी ने स्वामी विवेकानन्द की विचारधाराओं के बारे में बात की जो भारतीय संस्कृति और विरासत का सार है। विद्वान सत्र में हमारे भारत के माननीय प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन सत्र की लाइव स्क्रीनिंग देखी गई।
सत्र में अपने संबोधन के दौरान स्वामीजी ने कहा कि शिक्षा वह है जो भारत के भविष्य को आकार दे सकती है। उन्होंने छात्रों से स्वामी विवेकानन्द की विचारधाराओं का अनुसरण करने का आग्रह किया, जहां वे अपनी सभी समस्याओं का समाधान बहुत ही सरल और स्पष्ट तरीके से पा सकते हैं। स्वामी जी ने कहा कि त्याग और सेवा दो चीजें भारतीय संस्कृति का सार हैं। सत्र का समापन द हेरिटेज लॉ कॉलेज, कोलकाता के छात्रों द्वारा आयोजित रामायण और सांस्कृतिक नृत्य पर कुछ सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के साथ हुआ।
अवधपुरी….एक अनुभव
रामायण के पन्नों में रहकर भी दबा रह गया श्रीराम की बड़ी बहन शांता का त्याग
क्या आपको पता है भगवान राम की एक बहन भी थीं, जिनका नाम शांता थाI शायद ही हममें से किसी को शांता के बारे में कुछ पता हो, क्योंकि हमने जो रामायण देखा व पढ़ा है उसमें शांता का जिक्र है ही नहींI इसलिए आज हम आपको भगवान श्री राम की बहन शांता के बारे में बताएँगे कि आखिर कौन थीं शांता? उनका जन्म कैसे हुआ और क्या है उनकी कहानीI
कौन थीं प्रभु श्री राम की बहन शांता – महाराज दशरथ की तीन रानियाँ थीं, कौशल्या, कैकयी और सुमित्राI दशरथ और कौशल्या अयोध्या के राजा-रानी थेI सभी जानते हैं कि राजा दशरथ के चार पुत्र थेI लेकिन यह बहुत कम लोगों को पता है कि इन चार पुत्रों के अलावा उनकी एक पुत्री भी थी, जिनका नाम शांता थाI शांता माता कौशल्या और दशरथ की पुत्री थींI शांता बहुत ही सुंदर एक होनहार कन्या थीं, वो हर क्षेत्र में निपुण थींI शांता को वेद, कला, शिल्प, युद्ध कला, विज्ञान, साहित्य एवं पाक कला सभी का अनूठा ज्ञान प्राप्त थाI अपने युद्ध कौशल से वह सदैव अपने पिता राजा दशरथ को गौरवान्वित कर देती थींI
रामायण में क्यों नहीं है देवी शांता का जिक्र? – रामायण में शांता का जिक्र इसलिए नहीं मिलता, क्योंकि वे बचपन में ही राजा दशरथ का महल छोड़कर अंगदेश चली गई थींI शांता के बारे में इतिहास में बहुत ही कम उल्लेख मिलता हैI उनके बारे में कई कहानियां प्रचलित हैंI
पहली कथा– पौराणिक कथाओं के अनुसार राजा दशरथ की पहली पत्नी महारानी कौशल्या की बहन रानी वर्षिणी और उनके पति अंगदेश के राजा रोमपद को कोई संतान नहीं थीI एक बार वर्षिणी ने कौशल्या और राजा दशरथ से कहा कि काश उनके पास भी शांता जैसी एक सुशील और गुणवती पुत्री होतीI राजा दशरथ से उनकी पीड़ा देखी नहीं गई और उन्होंने अपनी पुत्री शांता को उन्हें गोद देने का वचन दे दियाI रघुकुल की रित प्राण जाई पर वचन न जाई के अनुसार राजा दशरथ एवं माता कौशल्या को अपनी पुत्री को अंगदेश के राजा रोमपद एवं रानी वर्षिणी को गोद देना पड़ाI शांता को पुत्री के रूप में पाकर रोमपद और वर्षिणी बहुत प्रसन्न हो गए और उन्होंने राजा दशरथ का आभार व्यक्त कियाI इस प्रकार शांता अंगदेश की राजकुमारी बन गईंI
दूसरी कथा – बात उस समय की है जब राजा दशरथ और कौशल्या का विवाह भी नहीं हुआ थाI ऐसा कहा जाता है कि रावण को पहले से ही पता चल चुका था कि अयोध्या के राजा दशरथ और कौशल्या की संतान ही उसकी मृत्यु का कारण बनेगीI इसलिए रावण ने कौशल्या को पहले ही मारने की योजना बनाईI उसने कौशल्या को एक संदूक में बंद किया और नदी में बहा दियाI वही से राजा दशरथ शिकार के लिए जा रहे थेI उन्होंने कौशल्या को बचाया और उस समय नारद जी ने उनका गन्धर्व विवाह कराया थाI उनके विवाह के बाद उनके यहां एक कन्या ने जन्म लिया, जिसका नाम शांता थाI वो जन्म से दिव्यांगना थी राजा दशरथ ने उसका कई बार उपचार कराया लेकिन कोई लाभ नहीं हुआI तब कई ऋषि मुनियों से सलाह की गई, तो उन्हें पता चला कि रानी कौशल्या और राजा दशरथ का गोत्र एक ही है इसीलिए उन्हें इन समस्याओं का सामना करना पड़ रहा हैI उन्हें यह भी सलाह दी गई कि अगर इस कन्या के माता पिता को बदल दिया जाए, तो यह कन्या ठीक हो जाएगीI यही कारण था कि राजा दशरथ ने शांता को रोमपद और वर्षिणी को गोद दे दिया थाI
तीसरी कथा- कई अन्य कथाओं के अनुसार राजा दशरथ ने शांता को इसलिए त्यागा क्योंकि वह पुत्री थी और कुल आगे नहीं बढ़ा सकती थी, ना ही राज्य को संभाल सकती थीI इसलिए राजा दशरथ ने शांता को रोमपद और वर्षिणी को गोद दे दिया थाI शांता को गोद दे देने के बाद दशरथ की कोई भी संतान नहीं थी, जिसके कारण वे परेशान रहने लगे थे और इसी कारण संतान के लिए राजा दशरथ ने पुत्रकामेष्ठि यज्ञ करवाया, जिसके बाद उन्हें चार पुत्रों की प्राप्ति हुईI
किससे और कैसे हुआ था शांता का विवाह? – राजा रोमपद को अपनी पुत्री से बहुत लगाव थाI वे अपनी बेटी से बहुत प्यार करते थेI एक बार एक ब्राह्मण उनके द्वार पर आयाI किन्तु वे शांता से बातचीत में इतने व्यस्त थे कि उन्होंने ब्राह्मण की तरफ़ ध्यान ही नहीं दिया और ब्राह्मण को खाली हाथ ही लौटना पड़ाI इसके कारण ब्राह्मण को काफी गुस्सा आया। वह ब्राह्मण इंद्र देव का भक्त था, इसलिए भक्त के अनादर से देवों के देव इंद्र देव क्रोधित हो उठें और उन्होंने वरुण देव को आदेश दिया कि अंगदेश में वर्षा न होI इंद्र देव की आज्ञा के अनुसार वरुण देव ने ठीक वैसा ही कियाI कई वर्षों तक वर्षा न होने के कारण अगंदेश में सूखा पड़ गया था और चारों तरफ़ हाहाकार मच गयाI राजा रोमपद को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वे क्या करें, उनसे अपनी प्रजा की तकलीफ देखी नहीं गई और इस समस्या का समाधान पाने के लिए राजा रोमपद ऋषि ऋंग के पास गएI ऋषि ऋंग ने उन्हें वर्षा के लिए एक यज्ञ का आयोजन करने को कहाI
ऋषि के निर्देशानुसार रोमपद ने पूरे विधि-विधान के साथ यज्ञ कियाI यज्ञ के संपन्न होते ही अंगदेश में वर्षा होने लगीI प्रजा इतनी खुश हुई कि अंगदेश में जश्न का माहौल बन गया, सभी ख़ुशी से झूम उठे थेI तभी वर्षिणी और रोमपद ने ऋषि ऋंग से प्रसन्न होकर अपनी पुत्री शांता का विवाह उनसे करने का फैसला कियाI पुराणों के अनुसार ऋषि ऋंग विभंडक ऋषि के पुत्र थेI एक दिन जब विभंडक ऋषि नदी में स्नान कर रहे थे, तब नदी में ही उनका वीर्यपात हो गयाI उस जल को एक हिरणी ने पी लिया था, जिसके फलस्वरूप ऋंग ऋषि का जन्म हुआ थाI
राजा दशरथ को पुत्र प्राप्ति में कैसे सहायक बनी बेटी शांता – जब कई सालों तक राजा दशरथ को पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई तो वे परेशान रखने लगेI राजा दशरथ और उनकी तीनों रानियां इस बात को लेकर चिंतित रहती थीं कि पुत्र नहीं होने पर उत्तराधिकारी कौन होगाI उनकी चिंता दूर करने के लिए ऋषि वशिष्ठ ने सलाह दिया कि ऋंग ऋषि से पुत्रेष्ठि यज्ञ करवाया जाएI इस यज्ञ से पुत्र की प्राप्ति होगीI दशरथ ने उनके मंत्री सुमंत की सलाह पर पुत्रकामेष्ठि यज्ञ में महान ऋषियों को बुलायाI इस यज्ञ में दशरथ ने ऋंग ऋषि को भी बुलायाI ऋंग ऋषि एक पुण्य आत्मा थे तथा जहां वे पांव रखते थे वहां यश फैल जाता थाI राजा दशरथ ने आयोजन करने का आदेश दियाI ऋषि ऋंग अपनी एक घोर तपस्या को पूरा करके उन्हीं दिनों अपने आश्रम लौटे थेI पहले तो ऋषी ऋंग ने इस यज्ञ के लिए मना कर दिया था लेकिन पत्नी शांता के कहने पर वो तैयार हो गएI कहते हैं कि पुत्रेष्ठि यज्ञ कराने वाले का जीवनभर का पुण्य इस यज्ञ की आहुति में नष्ट हो जाता हैI लेकिन उन्होंने एक शर्त रखी, ”मैं अकेला नहीं आ सकताI मैं यज्ञ कराने के लिए सहमत हूं, लेकिन मेरी पत्नी शांता भी मेरे साथ आएगीI वह भी ऋत्विक के रूप में कार्य करेगीI” राजा दशरथ के मंत्री सुमंत इस शर्त को मानने के लिए सहमत हो गएI ऋषी ऋंग और शांता अयोध्या पहूंचेI शांता ने जहां भी पैर रखा, वहां से सूखा गायब हो गयाI दशरथ और कौशल्या सोच में पड़ गए कि आखिर यह कौन है? तब शांता ने स्वयं अपनी पहचान प्रकट कीI उन्होंने कहा, ”मैं आपकी पुत्री शांता हूं।” दशरथ और कौशल्या को यह जानकर बहुत खुशी हुई कि वह उनकी पुत्री शांता हैI ऐसा माना जाता है कि ऋंग ऋषि और शांता का वंश ही आगे चलकर सेंगर राजपूत बनाI सेंगर राजपूत को ऋंगवंशी राजपूत कहा जाता हैI
कैसे मिले भगवान श्री राम और शांता? – काफी लंबे समय तक भगवान श्री राम और उनके तीनों भाइयों को उनकी बहन शांता के बारे में कोई जानकारी नहीं थीI वे नहीं जानते थे कि उनकी एक बड़ी बहन भी हैI कई साल बीतने के बाद भी माता कौशल्या अपनी पुत्री शांता के वियोग को भूल नहीं पाई थीI उन्हें हमेशा शांता की याद आती रहती थी, जिसके कारण कई बार रानी कौशल्या और राजा दशरथ के बीच मतभेद हो जाता थाI अपनी माता के दुख को महसूस कर भगवान राम ने माता कौशल्या से प्रश्न किया कि ऐसी क्या चीज़ है जिसके बारे में वे हमेशा सोचती रहती हैं, किस बात के कारण वे हमेशा हमेशा उदास रहती है? तब माता कौशल्या ने भगवान राम को अपने मन की पीड़ा के बारे में बतायाI प्रभु राम को उनकी बड़ी बहन शांता के बारे में बताया और जिसके बाद भगवान राम अपने तीनों भाइयों के साथ अपनी बड़ी बहन शांता से मिलने गएI जब भगवान राम अपनी बहन शांता से मिलते, तब शांता अपने त्याग का फल उनसे मांगती हैI तब भगवान राम हमेशा उनके साथ रहने का वचन देते हैं और इस तरीके से जीवन भर वे एक दूसरे की परछाई बनकर रहते हैंI
भारत में यहां होती है देवी शांता की पूजा – हिमाचल के कुल्लू में ऋंग ऋषि के मंदिर में भगवान राम की बड़ी बहन शांता की पूजा अर्चना की जातीI यह मंदिर कुल्लू से 50 कि.मी दूर बना हुआ हैI यहां देवी शांता की प्रतिमा भी स्थापित हैI इस मंदिर में देवी शांता और उनके पति ऋंग ऋषि की साथ में पूजा होती हैI दोनों की पूजा के लिए कई जगहों से भक्त दर्शन के लिए आते हैंI शांता देवी के इस मंदिर में जो भी भक्त देवी शांता और ऋंग ऋषि की सच्चे मन से पूजा करता है उसे भगवान राम का आशीर्वाद प्राप्त होता हैI देवी शांता के मंदिर में दशहरा बड़ी धूम-धाम से मनाई जाती हैI इसके अलावा उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के हरैया तालुका में श्रृंगी नारी के मंदिर में आज भी देवी शांता की पूजा होती हैI यहां आज भी लोग प्रतिदिन श्रद्धा के साथ पूजा करने आते हैंI ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर में पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैंI
श्रंगेरी के पास ही इसी नाम से एक पर्वत भी है। श्रंगेरी में श्रंगी ऋषि और शांता के मंदिर हैं। श्रंगेरी शहर का नाम श्रंगी ऋषि के नाम पर ही है। यहीं उनका जन्म हुआ था। दक्षिण भारत में, खासतौर पर कर्नाटक, केरल के कुछ इलाकों में भगवान राम की बहन की मान्यता है। इसके अलावा छत्तीसगढ़ सहित कुछ अन्य जगहों पर ऐसी लोक कथा प्रचलित हैं।
(साभार – गृहलक्ष्मी)
श्रीराम प्राण प्रतिष्ठा समारोह….500 वर्ष की तपस्या के बाद सत्य हुआ ऐतिहासिक क्षण


रामलला की मूर्ति की बेहद खास तस्वीर सामने आई है। इस तस्वीर में उनके पूरे स्वरूप को देखा जा सकता है। तस्वीर में रामलला माथे पर तिलक लगाए बेहद सौम्य मुद्रा में दिख रहे हैं। हालांकि, रामलला की यह तस्वीर गर्भ गृह में लाने से पहले की है। अभी भगवान की आंखों में पट्टी बंधी हुई है। आइये जानते हैं रामलला की मूर्ति की सभी विशेषताएं…
मूर्ति करीब 200 किलोग्राम वजनी तो ऊंचाई 4.24 फीट
मूर्ति की विशेषताएं देखें तो इसमें कई तरह की खूबियां हैं। मूर्ति श्याम शिला से बनाई गई है जिसकी आयु हजारों साल होती है। मूर्ति को जल से कोई नुकसान नहीं होगा। चंदन, रोली आदि लगाने से भी मूर्ति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। मूर्ति का वजन करीब 200 किलोग्राम है। इसकी कुल ऊंचाई 4.24 फीट, जबकि चौड़ाई तीन फीट है। कमल दल पर खड़ी मुद्रा में मूर्ति, हाथ में तीर और धनुष है। कृष्ण शैली में मूर्ति बनाई गई है।
मूर्ति के ऊपर स्वास्तिक, ॐ, चक्र, गदा, सूर्य भगवान विराजमान हैं। रामलला के चारों ओर आभामंडल है। श्रीराम की भुजाएं घुटनों तक लंबी हैं। मस्तक सुंदर, आंखें बड़ी और ललाट भव्य है। भगवान राम का दाहिना हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में है। मूर्ति में भगवान विष्णु के 10 अवतार दिखाई दे रहे हैं। मूर्ति नीचे एक ओर भगवान राम के अनन्य भक्त हनुमान जी तो दूसरी ओर गरुड़ जी को उकेरा गया है। मूर्ति में पांच साल के बच्चे की बाल सुलभ कोमलता झलक रही है। मूर्ति को मूर्तिकार अरुण योगीराज ने बनाया है। श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के अधिकारियों का कहना था कि जिस मूर्ति का चयन हुआ उसमें बालत्व, देवत्व और एक राजकुमार तीनों की छवि दिखाई दे रही है।अयोध्या के श्रीराम मंदिर में तीन मूर्तियों को स्थापित किया जाएगा, जिसमें से एक मूर्ति को गर्भगृह में स्थापित किया जाएगा। इनके बनने के बाद सबसे बड़ा सवाल तो यह था कि गर्भ गृह में किस रूप में राम लला विराजमान होंगे। मूर्तिकारों ने तीनों मूर्तियों को इतना सुंदर बनाया कि चयन करना कठिन हो रहा था कौन सी सुंदर है और कौन सी उतनी नहीं है। अंततः बाल रूप वाली मूर्ति को राम मंदिर के गर्भ गृह में विराजने का फैसला लिया गया।
पद्म पुरस्कार : 88 वर्ष में भी ज्ञान की विरासत को सहेज कर रख रहे हैं डॉ यशवंत सिंह कठोच
गणतंत्र दिवस विशेष : 26 जनवरी 1950 को ऐसे बना भारत एक गणतांत्रिक देश
गणतंत्र दिवस विशेष : इसरो की झांकी में दिखे चंद्रयान-3, आदित्य एल-1
नयी दिल्ली । गणतंत्र दिवस के अवसर पर निकाली गई झांकियों में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की झांकी बेहद आकर्षक रही और इसमें चंद्रयान-3, आदित्य एल-1 को प्रमुखता दी गई। झांकी में इसरो के विभिन्न मिशनों में महिला वैज्ञानिकों की भागीदारी को भी प्रदर्शित किया गया। इसरो अगले वर्ष भारत की पहली मानव अंतरिक्ष उड़ान को अंजाम देने की योजना बना रहा है।
इस झांकी में ‘लॉन्च व्हीकल मार्क-3’ का एक मॉडल पेश किया गया जिसके जरिए चंद्रयान-3 को श्रीहरिकोटा से चंद्रमा तक भेजा गया था। झांकी में अंतरिक्ष यान के चंद्रमा में उतरने के स्थान को भी दर्शाया गया। इस स्थान को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शिव शक्ति प्वाइंट नाम दिया है। इसरो की झांकी में सूरज के अध्ययन के लिए निचली कक्षा में भेजे गए आदित्य एल-1 को भी प्रदर्शित किया गया। इसके अलावा इसरो के भविष्य के मिशन गगनयान और भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन आदि को भी झांकी में स्थान दिया गया।
गणतंत्र दिवस विशेष : ‘नारी शक्ति’ का साक्षी बना कर्तव्य पथ
नयी दिल्ली । गणतंत्र दिवस परेड में शुक्रवार को ‘नारी शक्ति’ की विशेष झलक देखने को मिली। इसमें ग्रामीण उद्योग, समुद्री क्षेत्र, रक्षा, विज्ञान से लेकर अंतरिक्ष तक विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया गया। इस भव्य परेड की थीम ‘विकसित भारत’ और ”भारत-लोकतंत्र की मातृका” थी। इसकी शुरुआत में एक संगीतमय समूह ‘आवाहन’ के साथ हुई। यह एक मनमोहक प्रदर्शन था, जिसमें देश के विभिन्न कोनों से आए भारतीय संगीत वाद्ययंत्रों की एक श्रृंखला शामिल थी। कुल 112 महिला कलाकारों के एक बैंड ने लोक वाद्ययंत्रों से लेकर आदिवासी वाद्ययंत्रों तक को बड़ी कुशलता से बजाया, जो महिलाओं की ताकत और कौशल का प्रतीक है। मणिपुर, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, ओडिशा, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों ने अपनी झांकियों में विविध क्षेत्रों में महिलाओं की भूमिकाएं प्रदर्शित कीं।
मणिपुर की झांकी में महिलाओं को नावों पर प्रसिद्ध लोकटक झील से कमल के डंठल इकट्ठा करते हुए और पारंपरिक ‘चरखों’ का उपयोग करके सूत बनाते हुए दिखाया गया। झांकी में एक प्राचीन बाजार ‘इमा कीथेल’ पर भी प्रकाश डाला गया था और इसने महिलाओं के नेतृत्व वाले वाणिज्य की स्थायी विरासत पर जोर दिया था।
मध्य प्रदेश की झांकी ने कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से राज्य की विकास प्रक्रिया में महिलाओं के जुड़ने का जश्न मनाया। आधुनिक सेवा क्षेत्रों, लघु उद्योगों और पारंपरिक क्षेत्रों में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी पर ध्यान केंद्रित किया गया था। इसमें राज्य की सांस्कृतिक समृद्धि में योगदान देने वाली महिला कलाकारों के चित्रण के साथ-साथ पहली महिला फाइटर पायलट अवनी चतुर्वेदी को भी दिखाया गया। ओडिशा की झांकी ने हस्तशिल्प और हथकरघा क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी पर प्रकाश डाला, जबकि छत्तीसगढ़ की झांकी ने बस्तर के आदिवासी समुदायों में महिलाओं के प्रभुत्व को प्रदर्शित किया।
राजस्थान की झांकी में महिलाओं के नेतृत्व वाले हस्तशिल्प उद्योगों के विकास को प्रदर्शित किया गया और प्रसिद्ध ‘घूमर’ नृत्य भी प्रदर्शित किया गया। झांकी में दर्शाया गया कि मीरा बाई की मूर्ति भक्ति और शक्ति का प्रतीक है। हरियाणा की झांकी में सरकारी कार्यक्रम ”मेरा परिवार, मेरी पहचान” के माध्यम से महिला सशक्तीकरण पर प्रकाश डाला गया। इसमें डिजिटल इंडिया पहल के माध्यम से सरकारी योजनाओं तक पहुंच को प्रदर्शित किया गया। आंध्र प्रदेश ने अपनी झांकी का विषय स्कूली शिक्षा में बदलाव पर केंद्रित किया। लद्दाख की झांकी में भारतीय महिला आइस हॉकी टीम को प्रदर्शित किया गया, जिसमें लद्दाखी महिलाएं भी शामिल थीं।
रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) की झांकी ने रक्षा और अनुसंधान के मुख्य क्षेत्रों में महिला वैज्ञानिकों के महत्वपूर्ण योगदान पर प्रकाश डाला। इसमें एंटी-सैटेलाइट मिसाइल और तीसरी पीढ़ी की एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल जैसी उपलब्धियां शामिल थीं। पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय ने महिला नाविकों की संख्या में वृद्धि और लाइटहाउस और क्रूज पर्यटन में प्रगति पर जोर देते हुए भारत के समुद्री क्षेत्र के विकास का प्रदर्शन किया।
गणतंत्र दिवस परेड में सेना के तीनों अंगों की एक महिला टुकड़ी भी शामिल थी, जो आतंकवाद प्रभावित क्षेत्रों में अभियान, सियाचिन ग्लेशियर और रेगिस्तान सहित विभिन्न इलाकों में उनकी असाधारण सेवा को दर्शाती है। सशस्त्र बल चिकित्सा सेवाओं ने परेड में पहली बार एक पूर्ण महिला दल ने मार्च किया। मोटरसाइकिलों पर 265 महिलाओं ने विभिन्न साहसी करतबों के माध्यम से साहस, वीरता और दृढ़ संकल्प का प्रदर्शन किया। उन्होंने योग सहित भारतीय मूल्यों और संस्कृति की ताकत का भी प्रदर्शन किया और एकता और समावेशिता का संदेश दिया। भारतीय नौसेना की झांकी में ”नारी शक्ति” को भी दर्शाया गया है। इस सैन्य बल द्वारा सभी भूमिकाओं और सभी रैंकों में महिलाओं का स्वागत करने की हाल में घोषणा की गई है। कर्तव्य पथ पर पहली बार, उप-निरीक्षक श्वेता सिंह की कमान में ‘बीएसएफ महिला ब्रास बैंड’ ने परेड में भाग लिया। सीमा सुरक्षा बल की महिला टुकड़ी में 144 ”महिला प्रहरी” शामिल थीं।




