Saturday, July 4, 2026
खबर एवं विज्ञापन हेतु सम्पर्क करें - [email protected]
Home Blog Page 102

प्रिंसेप्स द्वारा गोवर्धन ऐश पर आधारित कला प्रदर्शनी

कोलकाता । प्रिंसेप्स की ओर से ‘द रेट्रोस्पेक्टिव ऑफ गोबरधन ऐश’ प्रदर्शनी का शुक्रवार को भव्य उद्घाटन किया गया। जो 1929 – 1969 की अवधि पर ध्यान केंद्रित करने वाली एक व्यापक और भव्य कला कृति से जुड़ी प्रदर्शनी है। अभिनेत्री रिया सेन और अभिनेत्री मुनमुन सेन ने इस प्रदर्शनी के लिए कैटलॉग का उद्घाटन किया। इस दौरान इंद्रजीत चटर्जी, ब्रिजेश्वरी कुमारी गोहिल, इना पुरी, ऋचा अग्रवाल और कई अन्य लोग इसमें मौजूद थे। यह प्रदर्शनी शुक्रवार 29 मार्च से 21 अप्रैल, 2024 तक कोलकाता सेंटर फॉर क्रिएटिविटी में आयोजित की गई है। आम जनता के लिए इसमें प्रवक्ष निःशुल्क रखा गया है। इस प्रदर्शनी में ऐश के काम की एक मनोरम श्रृंखला को शामिल किया गया है, जिसमें रेखाचित्र, परिदृश्य, स्व-चित्र, चित्र, प्रतिष्ठित श्रृंखला, जीवंत पेस्टल और उनकी स्थायी बाल श्रृंखला को शामिल किया गया है। इस प्रदर्शनी में आनेवाले आगंतुक ऐश के कलात्मक विकास, तकनीकों में उनकी महारत और भारत में आधुनिकता के प्रति अटूट प्रतिबद्धता के बारे में उन्हें गहरी समझ से वाकिफ होंगे। मीडिया से बात करते हुए क्यूरेटर इंद्रजीत चटर्जी ने कहा, प्रिंसेप्स की इस ऐतिहासिक प्रदर्शनी के जरिए बंगाल की कलात्मक विरासत की गहराई को यहां उभरा गया हैं, जिसमें उनकी कलात्मक उत्कृष्टता के 4 दशकों की 100 से अधिक कलाकृतियाँ प्रदर्शित की गई हैं, जिसमें 1940 के दशक के अंत की उनकी प्रतिष्ठित ‘अवतार श्रृंखला’ भी शामिल है। इस आयोजन के जरिए हम कला के इतिहास में गोबरधन ऐश की स्थायी विरासत का सम्मान करते हुए इस कला के व्यापक कैटलॉग को प्रस्तुत कर गर्वित महसूस कर रहे हैं। यह प्रदर्शनी ऐश की प्रतिभा को फिर से निहारने के साथ 1930-1960 दशक की भारतीय कला के एक महत्वपूर्ण युग में खुद को डूबोने का एक अनूठा अवसर प्रदान करती है। गोबर्धन ऐश 1907-1969 दशक के भारतीय कला के इतिहास में एक महान व्यक्तित्व के रूप में मौजूद हैं। यहां गोबरधन ऐश की रेट्रोस्पेक्टिव 100 से अधिक कलाकृतियों को प्रदर्शित करते हुए उनकी चार दशकों की कलात्मक यात्रा का विवरण प्रस्तुत किया गया है। प्रिंसेप्स एक शोध-केंद्रित नीलामी केंद्र है, जो कला जगत में खोज और शिक्षा को बढ़ावा देने की प्रतिबद्धता के साथ आगे बढ़ रहा है।

वीरांगनाओं ने गीत-संगीत के साथ मनाया होली मिलन उत्सव

कोलकाता । अंतरराष्ट्रीय क्षत्रिय वीरांगना फाउंडेशन, पश्चिम बंगाल की ओर से होली मिलन उत्सव का आयोजन लिलुआ में किया गया। इस अवसर पर वीरांगना की प्रदेश अध्यक्ष तथा विख्यात गायिका-अभिनेत्री प्रतिभा सिंह ने होली की परम्परा का उल्लेख करते बुराई पर अच्छाई की जीत, वसंत व उल्लास की अभिव्यक्ति से जोड़ा। उन्होंने कहा कि जीवन के रंगों को कभी फीका न पड़ने दें। समारोह में कुमार सुरजीत, राकेश पाण्डेय, बेबी काजल, मसूरी लाल ने होली पर केन्द्रित गीतों का गायन कर सबको झूमने पर मजबूर कर दिया। इस दौरान भोजपुरी के मशहूर गायक व अभिनेता पवन सिंह ने वीडियो काफ्रेंसिंग से वीरांगनाओं को होली की शुभकामनाएं दीं।
कार्यक्रम में वीरांगना की प्रदेश महासचिव प्रतिमा सिंह, उपाध्यक्ष रीता सिंह, कोषाध्यक्ष पूजा सिंह, संगठन सचिव ममता सिंह, सचिव किरण सिंह, पूनम सिंह, कोलकाता इकाई की संरक्षक गिरिजा दारोगा सिंह, गिरिजा दुर्गादत्त सिंह, अध्यक्ष मीनू सिंह, महासचिव इंदु संजय सिंह, कोषाध्यक्ष संचिता सिंह, उपाध्यक्ष ललिता सिंह, पदाधिकारी मीरा सिंह, प्रेमशीला सिंह, सरोज सिंह, विद्या सिंह, सुमन सिंह, रीना सिंह, पूनम सिंह, लाजवंती सिंह, सोदपुर इकाई की अध्यक्ष सुनिता सिंह, पदाधिकारी जयश्री सिंह, मंजू सिंह, बबिता सिंह, पूजा सिंह, बालीगंज की अध्यक्ष सुमन सिंह, महासचिव रीता सिंह, श्यामनगर-आतपुर की सदस्या गुड़िया सिंह व बबिता सिंह, लिलुआ की सदस्या लीला सिंह, नीतू सिंह व सुमन सिंह उपस्थिति थीं। वीरांगना नारी शक्ति की सदस्याओं में पूनम राय, शकुंतला साव, अनिता साव, बबिता, मीनाक्षी तिवारी, बेबी श्री उपस्थित थीं।

भवानीपुर कॉलेज ने फागुन पर गैर शैक्षणिक कर्मचारियों को किया सम्मानित

कोलकाता । फागुन के आगमन के साथ ही भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज के सभी मैनेजमेंट के पदाधिकारियों, शिक्षक, शिक्षिकाओं और विद्यार्थियों ने गैर शैक्षणिक कर्मचारियों को सम्मानित किया। कॉलेज के सभी गैर शैक्षणिक कार्यों के लिए नेपथ्य के नायक दिन रात परिश्रम कर कॉलेज की सुरक्षा का दायित्व बखूबी निभाते हैं। 260 से अधिक संख्या में इन नायकों में सिक्यूरिटी , एकाउंट, एडमिशन, ऑफिशियल, टेक्निकल, कम्प्यूटर, पुस्तकालय, गेम्स एंड स्पोर्ट्स,मडटस्टस्ट सांइस एंड फिजिक्स, इलेक्ट्रोनिक केमेस्ट्री सोसाइटी हॉल, एच आर अॉफिस, टीआईसी, कॉलेज अॉफिस सिस्टम कंट्रोल, आफ्टर नून इवनिंग, इन्फ्रास्ट्रक्चर आदि अनेक विभाग हैं जहाँ वे अपनी-अपनी सेवाओं द्वारा पूरे कॉलेज को सुचारू रूप से चलाने में अपना योगदान दे रहे हैं। कॉलेज के डीन और रेक्टर प्रो दिलीप शाह ने अपने वक्तव्य में बताया कि सभी गैर शैक्षणिक कर्मचारियों बिना कॉलेज नहीं चल सकता यहां तक कि कॉलेज का गेट भी वे ही खेलते हैं, वे रीढ़ की हड्डी हैं।कॉलेज के टीआईसी डॉ सुभब्रत गंगोपाध्याय ने सर्वप्रथम सबसे पुराने कर्मचारी हरि सिंह जी को उपहार देकर सम्मानित किया और फूल बरसाए।इस अवसर पर बहुत से सांस्कृतिक कार्यक्रम किए गए। नृत्य, संगीत और नाट्य प्रस्तुति दी गईं। कार्यक्रम की शुरुआत प्रो रेखा नारिवाल के श्याम और राधा के गीत के साथ हुई। केबीसी शैली में प्रश्नोत्तर का उत्तर गैर शैक्षणिक कर्मचारियों द्वारा दिए गए। कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

अर्चना संस्था ने मनाई शब्दों की होली

कोलकाता । रंगों का त्योहार है आया, खुशियों की बौछार संग लाया उषा श्राफ की इन पंक्तियों ने होली त्योहार की खुशियों को दुगना कर दिया। अर्चना संस्था के सदस्यों में बनेचंद मालू ने हास्य कविता रामू छुट्टी पर गया है और क्षणिकाएँ, शशि कंकानी ने नवरंग आज बिखेरेंगे हम, हे जी हिलमिल खेले फाग रे, भारती मेहता ने रंग सूखे हों तो भरे नहीं जाते, ज्यादा गीलें हों तो बह जाते हैँ अभिव्यक्ति क्या नपी तुली होनी चाहिए?, विद्या भंडारी ने गीत अरे ए री आलि रंग बिना चित नहीं लागे, मन को रंग दें आज,आज होली है।मृदुला कोठारी ने गीत होली आई सखियों रल मिल होली खेलन चाल।ऐ वृंदावन में धूम मची है फाग मचास।ऐ। प्रकृति के रंगों में रंग है हमारा उत्सव आम अनार जामुनी रंगों में रंग है हमारा उत्सव होली की धूम मचाता है।
कार्यक्रम का संचालन सुशीला चनानी ने किया और अपनी रचनाएं स्वरचित गीत -(होली के विभिन्न रंगो का प्रभाव-फागुन के महीने में उत्सव होली का आता , संग में रंगों की झोली भर लाता है और राजनीतिक ,सामाजिक विभिन्न ,विसंगतियों पर प्रहार करते हुए विभिन्न स्वरचित जोगिरा सुनाये जैसे -नेताजी को देख कर गिरगिट हो गयी दंग । मै भी इतना न बदलूं जितना ये बदले रंग।जोगिया सरदार जोगिरा सरररर—।
वसुंधरा मिश्र ने होरी-आई गीत सुना कर राधा-कृष्ण की बांसुरिया को याद किया। हिम्मत चोरडि़या प्रज्ञा ने गीतिका हमें किसी ने भूल से,आज पिला दी भंग।चढ़ा रंग जब भंग का, खूब हुआ हुड़दंग।।मीना दूगड़ ने हायकू -होली का राम राम, रंगों का पैगाम, तुम्हारे लिए। और होली !होली! होली! होली का शोर चहुँओर है,नाच रहा मन मोर है सुनाई।
चंद्रकांता सुराणा सुराणा ने अपनी रचनाओं होली का त्यौहार है आया, ढेर सारे रंग है लाया/ नानीसा ममता की मूरत है, चांद भी शर्मा जाए ऐसी सूरत है से महफिल में चार चांद लगा दिए। संयोजक इंदू चांडक ने अठखेली करती हवा, नृत्य करे मन मोर। रंग रॅऺगीला मास यह, फागुन अति चितचोर , गीत -रंग है गुलाल है, मस्ती और धमाल है, होली का गीत सुनाया। धन्यवाद ज्ञापन किया बनेचंद मालू ने ।कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

लिटिल थेस्पियन के 21वें रंग अड्डे की पिचकारी ने बिखेरे साहित्य के रंग

कोलकाता ।  हाजरा के सुजाता देवी विद्या मंदिर के प्रांगण में 23 मार्च 2024 की शाम निर्धारित समय पर आरंभ हुआ कोलकाता की सुप्रसिद्ध नाट्यसंस्था लिटिल थेस्पियन का 21 वा रंग अड्डा। यह मासिक रंग अड्डा लिटिल थेस्पिएन के संस्थापक और वरिष्ठ रंगकर्मी अजहर आलम और उमा झुनझुनवाला की सोच और मिलन का खूबसूरत परिणाम है। कार्यक्रम का आगाज़ उमा झुनझुनवाला के प्रेरणादायक वक्तव्य से हुआ। उन्होंने रंग अड्डे का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों के भीतर नाट्य साहित्य के संस्कार को जगाना और नाट्य कला के सभी अंगों से छात्रों को परिचित करवाना बताया। साहित्य के रंगों में पहला रंग अज्ञेय का था जिनका परिचय पाठ खिदिरपुर कॉलेज की छात्रा नेहा मालिक ने किया और उनके उपन्यास नदी के द्वीप के पत्रों पर रोशनी डालते हुए आलेख पठन प्रस्तुत किया खिदिरपुर कॉलेज की प्रोफेसर सुधा गौड़ ने। इस श्रृंखला को आगे बढ़ते हुए साजदा खातून ने जयदेव तनेजा का साहित्यिक परिचय दिया तो वही ज्योतिका प्रसाद ने ने उनके आलेख देहांतर तथा निशा गुप्ता ने शुतुरमुर्ग पर प्रभावशाली प्रस्तुति दी। इस अवसर पर उमा झुनझुनवाला ने 2004 में खेले गए शुतुरमुर्ग नाटक की कुछ रोचक बातें भी साझा की। इस क्रम में ज्योति साह ने नाटककार हृषिकेश सुलभ का परिचय पाठ प्रस्तुत किया।पार्वती कुमारी शॉ ने बिहारी ठाकुर और उनसे परिचित स्त्रियों की दशा को दर्शाता नाटक बटोही’ का शब्दचित्र उकेरा,कथित अंशों का अभिनयात्मक पाठ लिटिल थेस्पियन के कलाकार–संगीता व्यास, सुधा गौड़, राधा ठाकुर, मोहम्मद आसिफ अंसारी,दानिश वारिस ख़ान ने किया। कार्यक्रम का कुशल संचालन प्रियंका सिंह द्वारा संपन्न हुआ। इस रंग रंग अड्डे में मुख्य अथिति के रूप मे उपस्थित थी प्रभात खबर की वरिष्ठ पत्रकार भारती जैनानी, कवियत्री मौसमी प्रसाद तथा वी. अरुणा। उमा जुनझुनवाला ने सभी उपस्थित लोगों को धन्यवाद दिया और बताया कि लिटिल थेस्पियन 17 अप्रैल को अपने संस्थापक- निर्देशक एस.एम. अज़हर आलम का जन्मोत्सव मनाएगा और इस अवसर पर उनके द्वारा निर्देशित नाटक एंडगेम का मंचन करेंगा ।अल्पाहार ,साहित्य और होली के रंगों से संपन्न हुआ 21वा रंग अड्डा।

होली में नोटों पर लग जाए रंग तो क्या करें, क्या कहता है आरबीआई

होली के लिए शहर से लेकर गांव देहात में रंगों में डूब चुका है। रंग,अबीर और पिचकारी की धूम मची है. चारों ओर रंग ही रंग है। होली के रंगों से आप तो रंग ही जाते हैं, कई बार आपकी जेब में रखे नोट भी रंगीन हो जाते हैं। होली के हुड़दंग में, मौज मस्ती में, नोट को संभालना बड़ा मुश्किल हो जाता है। जेब में रखे नोट रंगीन हो जाते हैं। नोट रंगीन हुआ नहीं कि कई बार लोगों के चहरे का रंग उतर जाता है। कई बार इन नोटों को दुकानदार लेने से मना कर देते हैं. बहाने बनाते हैं कि भाई रंग लगा हुआ है, दूसरा नोट दो.
रंगीन नोट के लिए क्या है नियम – होली तो खत्म हो जाती है, लेकिन रंगीन नोटों को चलाने की आपकी कोशिश जारी रहती है। दुकान, पेट्रोल पंप हर जगह आप उस नोट को चलाने की कोशिश करते हैं। रंग लगे नोट यहां वहां सब जगह आपको देखने को मिल जाएंगे, लेकिन क्या आपको पता है कि नोट को साफ सुथरा रखना आपकी जिम्मेदारी है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया का नियम के मुताबिक नोटों को साफ-सुधरा रखना आपकी जिम्मेदारी है।
क्या रंगीन नोट चलेंगे? – होली के दौरान कई बार ऐसा भी होता है कि जब आपकी जेब में मौजूद नोट भी रंगीन हो जाते हैं, या फट जाते है। ऐसी स्थिति में जब आप इन नोट को किसी दुकानदार को देते हैं तो वो अक्सर उसे लेने से इनकार कर देता है, लेकिन आपको बता दें कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के नियम के मुताबिक दुकानदार ऐसा नहीं कर सकते हैं। वो इन नोट को लेने से मना नहीं कर सकते हैं। आरबीआई के नियम के मुताबिक भले ही नोट रंगीन हैं, लेकिन उनके सिक्योरिटी फीचर प्रभावित नहीं हुए तो बैंक भी उसे लेने से मना नहीं कर सकता है। अगर आपके नोट पर रंग लग गया है तो आप उसे सुखाकर बाजार में वापस चला सकते है। हालांकि जान लें कि नोटों का जानबूझ खराब करना या फिर उससे छेड़छाड़ करना गलत है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने इसी के लिए साल 1988 में ‘क्लीन नोट पॉलिसी’ लागू की. आरबीआई एक्ट 1934 की धारा 27 के मुताबिक कोई भी शख्स किसी भी तरीके से नोटों को ना तो नष्ट कर सकता है और न ही उसमें किसी तरह की छेड़छाड़ कर सकता है। नोटों को साफ-सुधरा रखना लोगों की जिम्मेदारी है।
क्या करें अगर नोट में रंग लग जाए – अगर आपने नोट में रंग लग जाए या फिर वो कट-फट जाए तो आपको परेशान होने की जरूरत नहीं है। आप किसी भी बैंक में जाकर इन नोटों को बदल सकते हैं. आरबीआई के नियम के मुताबिक देश के सभी बैंकों में पुराने फटे, मुड़े हुए नोट, रंग लगे नोटों को बदला जा सकता है। इसके लिए बैंक आपसे कोई शुल्क नहीं वसूलेगा. नोट बदलने के लिए जरूरी नहीं है कि आपका खाता उस बैंक में हो।
नोट बदलने पर कितना वापस मिलेगा – अब जान लें कि किसी भी फटे हुए नोट को बैंक में बदलने पर आपको कितना रुपया वापस मिलेगा। बता दें कि बैंक में बदलने पर बैंक आपको उस नोट की स्थिति के मुताबिक पैसा वापस करता है। इसे उदाहरण से समझिए. 2000 रुपये के नोट का 88 वर्ग सेंटीमीटर (सीएम) होने पर पूरा पैसा मिलेगा, लेकिन 44 वर्ग सीएम पर आधा ही पैसा मिलेगा य़ इसी तरह 200 रुपये फटे नोट में 78 वर्ग सीएम हिस्सा देने पर पूरा पैसा मिलेगा। वहीं 39 वर्ग सीएम पर आधा पैसा ही मिलता है। बता दें कि भारतीय रिजर्व बैंक के नियमानुसार हर बैंक को पुराने, फटे या मुड़े नोट स्वीकार करने होंगे बशर्ते वह नकली नहीं होने चाहिए।
(साभार – जी न्यूज)

शुभजिता स्वदेशी : चूड़ियों से शुरुआत और आज घर – घर में हैं सेलो वर्ल्ड के उत्पाद

कहते हैं सही दिशा में संघर्ष हो तो सफलता मिलने में कोई संशय नहीं. ऐसी ही कुछ कहानी है मुंबई सेलो वर्ल्‍ड की. आज यह कंपनी 13 हजार करोड़ रुपये का कारोबार करती है, लेकिन एक समय इस कंपनी के मालिक प्‍लास्टिक की चूड़ियां बेचते थे । मेहनत रंग लाई और आज इसके प्रोडक्‍ट देश के घर-घर में इस्‍तेमाल किए जाते हैं. खाने की मेज से लेकर स्‍टडी टेबल तक इस कंपनी के प्रोडक्‍ट आपको दिख जाएंगे।
सेलो वर्ल्‍ड ने नवंबर, 2023 में शेयर बाजार में भी कदम रख दिया और मार्केट में लिस्‍ट हो गई। कंपनी के मालिक प्रदीप राठौर, जो बतौर मैनेजिंग डायरेक्‍टर और चेयरमैन अपनी सेवाएं दे रहे हैं, उनकी गिनती अब देश के अरबपतियों में होने लगी है। मुंबई की इस कंपनी ने अब 1,700 से ज्‍यादा प्रोडक्‍ट बनाने शुरू कर दिए हैं। किचन के प्रोडक्‍ट से लेकर फर्नीचर और पेन बनाने तक की फील्‍ड में कदम रख दिया है ।
प्रदीप राठौर की संपत्ति – फोर्ब्‍स के मुताबिक, कंपनी के चेयरमैन प्रदीप राठौर की सेलो वर्ल्‍ड में करीब 44 फीसदी हिस्‍सेदारी है और आज उनकी कुल संपत्ति 1 अरब डॉलर यानी करीब 8,300 करोड़ रुपये पहुंच गई है । कंपनी की कमाई में 66 फीसदी हिस्‍सेदारी किचेन प्रोडक्‍ट से आती है, जबकि पेन, पेंसिल और स्‍टेशनरी व फर्नीचर सेग्‍मेंट से भी करीब 34 फीसदी कमाई हो जाती है।
कैसे शुरू हुई कंपनी की यात्रा – सेलो की नींव साल 1967 में घीसूलाल राठौर ने रखी थी। तब यह कंपनी सिर्फ प्‍लास्टिक के फुटवियर और चूड़ियां ही बेचती थी । साल 1980 में घीसूलाल अमेरिका गए और वहां से किचन प्रोडक्‍ट बनाने का आइडिया लेकर आए। यह आइडिया चल निकला और कंपनी का किचन प्रोडक्‍ट की दुनिया में नाम हो गया। इसके बाद 2017 में ग्‍लासवेयर और ओपल मार्केट में कदम रखा, जहां जबरदस्‍त सफलता मिली ।
बेटों ने बना दी हजारों करोड़ की कंपनी – सेलो वर्ल्‍ड को ऊंचाई तक पहुंचाने में प्रदीप राठौर, पंकज राठौर और उनके पुत्र गौरव प्रदीप राठौर का खासा योगदान है। बीते 2 साल में ही सेलो वर्ल्‍ड की बिक्री में 70 फीसदी का उछाल दर्ज किया गया है।  कंपनी ने मार्च, 2023 को समाप्‍त वित्‍तवर्ष में 17.97 अरब रुपये का राजस्‍व हासिल किया। इसके साथ ही कंपनी का मुनाफा भी 58 फीसदी बढ़कर 230 करोड़ रुपये पहुंच गया। कंपनी को बाजार में कई नामी कंपनियों से लोहा लेना पड़ रहा है। बोरोसिल, टीटीके, मिल्‍टन और ला ओपला जैसी दिग्‍गज कंपनियों के बीच सेलो के प्रोडक्‍ट बाजार पर अपनी पकड़ बनाए हुए हैं।

6 साल की भारतीय मूल की बच्ची बनी दुनिया की सबसे कम उम्र की गेम डेवलपर

छह साल की एक लड़की को गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स (जीडब्ल्यूआर) ने दुनिया की सबसे कम उम्र की वीडियोगेम डेवलपर के रूप में मान्यता दी है।

सिमर खुराना 6 साल और 335 दिन की थीं जब उन्होंने अपना पहला वीडियो गेम बनाया था। विलक्षण लड़की कनाडा के ओंटारियो की रहने वाली है। उसने कोडिंग सीखना शुरू किया और सप्ताह में तीन दिन क्लास में जाती थी। दुनिया भर के कोडर्स उसकी उम्र जानकर हैरान रह गए, क्योंकि इतने छोटे बच्चे को कंप्यूटर प्रोग्रामिंग की दुनिया में कदम रखते हुए देखना आश्चर्यजनक था। उसके पिता, पारस खुराना जानते थे कि वह प्रतिभाशाली है, इसलिए वह एक अच्छे शिक्षक की तलाश कर रहे थे और आखिरकार उसे कोडिंग सीखने में मदद करने के लिए एक शिक्षक मिल गया। गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड से बात करते हुए खुराना ने कहा कि सिमर ने यूट्यूब पर वीडियो देखकर खुद ही गणित सीखा। जब वह किंडरगार्टन में थी तब वह कक्षा 3 का गणित हल करने में सक्षम थी।

उन्होंने कहा कि वह हमेशा हर चीज से शिल्प और खेल बनाती रहती हैं, कभी-कभी बेकार कागज से भी। उन्होंने बताया कि उन्हें लगा कि वह स्वाभाविक रूप से कोडिंग में उत्कृष्ट होंगी क्योंकि उनके पास कौशल का एक आदर्श संयोजन था। इसलिए उन्होंने उसे एक डेमो कोडिंग क्लास लेने के लिए कहा और पाया कि उसे यह पसंद आया और उसने इसमें सफलता हासिल की।

सिमर का पहला वीडियो गेम जिसने विश्व रिकॉर्ड बनाया था उसका नाम “हेल्दी फ़ूड चैलेंज” था। एक डॉक्टर द्वारा उसे जंक फूड खाना बंद करने के लिए कहने के बाद उसे इस खेल का विचार आया। गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड से बात करते हुए सिमर ने बताया कि चूंकि डॉक्टर ने उन्हें स्वस्थ खाने के लिए कहा था, इसलिए उन्होंने स्वस्थ भोजन और जंक फूड के बारे में एक गेम बनाने का फैसला किया। उन्होंने यह भी कहा कि वह बच्चों को स्वस्थ और जंक फूड के बीच अंतर सीखने में मदद करना चाहती थीं और यह भी बताना चाहती थीं कि उन्हें बड़ी मात्रा में जंक फूड का सेवन क्यों नहीं करना चाहिए। सिमर ने कहा कि उन्हें गणित और कोडिंग पसंद है। वह बड़ी होने पर गेम डेवलपर बनने की इच्छा रखती है। उन्होंने गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में शामिल होने पर खुशी व्यक्त की और भविष्य में और अधिक रिकॉर्ड बनाने के प्रयास की संभावना से इनकार नहीं किया।

होली के उत्साह में बच्चों का रखें खास ख्याल

रंगों का त्योहार होली आने वाली है। इस वर्ष होली 25 मार्च को है। इस पर्व को बच्चों से लेकर बड़े बुजुर्ग तक सभी उत्साह से मनाते हैं। बच्चे तो होली को लेकर अति उत्साहित रहते हैं। पहले से ही अपनी पिचकारी मंगवा लेते हैं, और उसमें पानी भरकर खेला करते हैं। होली वाले दिन तो पिचकारी और रंग लेकर घर के बाहर निकल जाते हैं। दोस्तों, आस पड़ोसियों पर पिचकारी के रंगों की बौछार करने से बच्चों को रोकना मुश्किल हो जाता है। बच्चों के इस उत्साह और मस्ती को देख माता पिता के साथ ही करीबी भी बहुत खुश होते हैं। लेकिन होली में कई बार कुछ लापरवाही रंग में भंग का काम करती हैं। होली के उत्साह में अगर आप बच्चों की मस्ती को नजरअंदाज कर रहे हैं या उनका ध्यान नहीं दे रहे हैं तो त्योहार के मजे में खलल पड़ सकता है। इसलिए होली के दौरान बच्चों का खास ख्याल रखने की जरूरत है, साथ ही कुछ सावधानियां भी बरतनी चाहिए।
गुब्बारों से दूरी – होली में बच्चे नई नई तरह की पिचकारी की डिमांड करते हैं। पिचकारी सिर्फ रंग खेलने के लिए होनी चाहिए। सुरक्षा की दृष्टि से वह खराब न हो। इसलिए ऐसी पिचकारी घर लाएं जो आपके बच्चे या दूसरे बच्चों को चोटिल न कर दें। इसके अलावा होली में अक्सर बच्चे गुब्बारों में पानी भरकर खेलते हैं। एक दूसरे पर पानी भरे गुब्बारे फेंकते हैं जो फटने पर सामने वाले को चोटिल कर सकता है इसलिए होली में रंग वाले गुब्बारे खेलने से बचना चाहिए। बच्चों के लिए होली में पिचकारी और रंग तो लाएं लेकिन गुब्बारे लेकर घर न आएं। साथ ही उन्हें मना करें कि बाहर दोस्तों के रंग वाले गुब्बारों से भी न खेलें।
केमिकल रंगों से बचाएं – आजकल होली में जिन रंगों की उपयोग होता है वह अधिकांश केमिकलयुक्त होते हैं। बाजारों में मिलावट और केमिकल वाले रंग मिलते हैं, जो त्वचा, आंखों को नुकसान पहुंचाते हैं। ऐसे रंगों की पहचान करके ऑर्गेनिक कलर ही लाएं। हालांकि हो सकता है कि दूसरे बच्चे मिलावटी रंगों का उपयोग कर रहे हों, उस से अपने बच्चे को बचाने के लिए कलरफुल और फंकी गॉगल्स पहनाएं ताकि उन की आंखें सुरक्षित रहें। इसके अलावा फुल बांह के कपड़े पहनाएं, जिससे त्वचा ढकी रहे और रंगों के सम्पर्क में आने की संभावना कम रहे।
रखें नजर – बच्चा जब रंग खेलने के लिए घर से बाहर सोसायटी या कॉलोनी में निकले तो आप काम में व्यस्त न हो जाएं। उसे अपने दोस्तों संग खेलने के लिए अकेला न छोड़ें, बल्कि नजर रखें। बीच-बीच में देखें कि आपका बच्चा कहां और किन लोगों के साथ खेल रहा है। अक्सर बच्चे खेलते वक्त गिर जाते हैं या रंग उनकी आंखों में जा सकता है। ऐसे वक्त पर अगर आप सही समय पर उन्हें मदद नहीं करेंगे तो समस्या बढ़ भी सकती है। सुरक्षा की दृष्टि से भी निगरानी जरूरी है।
खान-पान न बिगाड़ दे सेहत – होली में सिर्फ रंग ही नहीं, तला भुना खाना, बहुत अधिक मिठाई और तरह तरह के व्यंजनों का अधिकता से सेवन भी बच्चे के पाचन को बिगाड़ सकता है। फूड पॉइजनिंग का खतरा भी रहता है। इसलिए होली की मस्ती में उनकी सेहत खराब न हो जाए, इसके लिए खानपान का विशेष ध्यान रखें।

और हंसते – हंसते फांसी पर चढ़ गये वे आजादी के मतवाले

शुभांगी उपाध्याय
“वतन के नाम पर जीना, वतन के नाम मर जाना, शहादत से बड़ी कोई इबादत हो नहीं सकती।।”
भारत को परतंत्रता की बेड़ियों से मुक्त कराने के दो मुखर स्वर थे, एक अहिंसक आंदोलन तो वहीं दूसरी ओर सशस्त्र क्रांतिकारी आंदोलन। सन् 1857 से लेकर 1947 तक भारतीय स्वतंत्रता हेतु जितने भी प्रयत्न हुए, उनमें क्रांतिकारियों का आंदोलन सर्वाधिक प्रेरणाप्रद रहा। भारत को मुक्त कराने के लिए सशस्त्र विद्रोह की एक अखण्ड परम्परा रही है। यहां अंग्रेज़ी राज्य की स्थापना के साथ ही सशस्त्र विद्रोह का आरम्भ हो गया था। वस्तुतः क्रांतिकारी आंदोलन भारतीय इतिहास का गौरवशाली स्वर्ण युग ही था। अपनी मातृभूमि की सेवा, उसके लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देने की जो भावना उस दौर में प्रस्फुटित हुई, आज उसका नितांत अभाव हो गया है। स्वतंत्रता प्राप्ती के पश्चात आधुनिक नेताओं ने भारत के सशस्त्र क्रांतिकारी आंदोलन को प्रायः दबाते हुए उसे इतिहास में कम महत्व दिया और कई स्थानों पर उसे विकृत भी किया गया। स्वराज्य उपरान्त यह सिद्ध करने की चेष्टा की गई कि हमें स्वतंत्रता केवल कांग्रेस के अहिंसात्मक आंदोलन के माध्यम से मिली है। इस नये विकृत इतिहास में स्वाधीनता के लिए प्राणोत्सर्ग करने वाले, सर्वस्व समर्पित करने वाले असंख्य क्रांतिकारियों, अमर हुतात्माओं की पूर्ण रूप से उपेक्षा की गई।
23 मार्च 1931 का दिन भारतीय इतिहास में अत्यन्त ही हृदयविदारक घटना के रुप में याद किया जाता है। ये वही काला दिन है जब क्रूर अंग्रेज़ी हुक़ूमत ने मात्र 23 वर्षीय भगत सिंह और सुखदेव थापर तथा 22 वर्षीय शिवराम हरि राजगुरु को राष्ट्रप्रेम के अपराध में फांसी की सज़ा दे दी और आज़ादी के ये मतवाले सदा के लिए अमर हो गए।
लाला लाजपत राय की हत्या का प्रतिशोध : सन् 1927 में काकोरी कांड के सिलसिले में भगत सिंह ने अपना नाम बदलकर ‘विद्रोही’ नाम से एक लेख लिखा था जिस कारण उन्हें पहली बार गिरफ़्तार किया गया था। लाहौर में दशहरे के मेले में बम विस्फोट का आरोप भी उन पर लगाया गया था। बाद में अच्छे व्यवहार के कारण उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया था। उसी वर्ष जब साइमन कमीशन भारत आया तो लाला लाजपत राय ने उसका पुरजोर विरोध किया। विरोध प्रदर्शन के दौरान एसपी जेम्स ए स्कॉट ने निर्दोष भीड़ पर लाठीचार्ज करने का आदेश दे दिया। उसने दूर से ही लाला लाजपतराय को देख लिया। उस धूर्त ने बड़ी निर्ममता से लाला जी पर लाठी बरसानी शुरू कर दी और वह बुरी तरह लहूलुहान हो गए। लाला जी ने घोर पीड़ा में भी दहाड़ते हुए कहा था, “हमारे ऊपर चलाई गई हर लाठी ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत में ठोकी गई कील साबित होगी।” 17 नवंबर को उनकी शहादत से समूचा भारतवर्ष आहत और आक्रोशित था। भगत सिंह जैसे तमाम क्रांतिकारी लाला जी को अपना आदर्श मानते थे और वे चुप नहीं बैठने वाले थे। 10 दिसंबर, 1928 को भगवतीचरण वोहरा की पत्नी दुर्गा देवी की अध्यक्षता में देश भर के क्रांतिकारियों की लाहौर में बैठक हुई और यह तय हुआ कि लाला जी की मौत का बदला लिया जाएगा।
सैंडर्स की हत्या : योजना अनुसार भगत सिंह, राजगुरु, चंद्रशेखर आज़ाद और जयगोपाल स्कॉट को मारने के अभियान में निकल पड़े। स्कॉट की कार का नंबर था 6728। उसके थाने पहुँचने की सूचना देने की ज़िम्मेदारी जयगोपाल को सौंप दी गई। उन्होंने स्कॉट को पहले कभी नहीं देखा था। उस दिन स्कॉट छुट्टी पर था और थाने से बाहर निकल रहे असिस्टेंट एसपी जेपी सैंडर्स को ही भूलवश स्कॉट समझकर उन्होंने अपने साथियों को संकेत दे दिया। राजगुरू ने अपनी जर्मन माउज़र पिस्टल से गोली चला दी। भगत सिंह चिल्लाते ही रह गए, ‘नहीं, नहीं, नहीं ये स्कॉट नहीं हैं।’ लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। जब सैंडर्स गिरा तो भगत सिंह ने भी उसपर कुछ गोलियाँ दाग दी। स्वतंत्रता सेनानी शिव वर्मा अपनी किताब ‘रेमिनिसेंसेज़ ऑफ़ फ़ेलो रिवोल्यूशनरीज़’ में लिखते हैं, “जब भगत सिंह और राजगुरु सैंडर्स को मारने के बाद भाग रहे थे तो एक हेड कॉन्सटेबल चानन सिंह उनका पीछा करने लगा। जब आज़ाद के चिल्लाने पर भी वो नहीं रुका तो राजगुरु ने उसे भी गोली मार दी।” अगले दिन शहर की दीवारों पर लाल स्याही से बने पोस्टर चिपके पाए गए जिन पर लिखा था ‘सैंडर्स इज़ डेड। लाला लाजपत राय इज़ एवेंज्ड।’
बहरों को सुनाने के लिए सेंट्रल एसेंब्ली में धमाका: उन दिनों सेंट्रल एसेंब्ली में दो बिलों पर विचार किया जाना था। एक था पब्लिक सेफ़्टी बिल जिसमें सरकार को बिना मुक़दमा चलाए किसी को भी गिरफ़्तार करने का अधिकार दिया गया था और दूसरा था ट्रेड डिस्प्युट बिल जिसमें श्रमिक संगठनों को हड़ताल करने की मनाही हो गई थी। 8 अप्रैल को जब यह बिल पेश किए जाने वाले थे तब भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त सेंट्रल एसेंब्ली की दर्शक दीर्घा में पहुँच गए। कुलदीप नैयर लिखते हैं, “भगत सिंह ने बहुत सावधानी से उस जगह बम लुढ़काया जहाँ एसेंबली का कोई सदस्य मौजूद नहीं था। जैसे ही बम फटा पूरे हॉल में अंधेरा छा गया। बटुकेश्वर दत्त ने दूसरा बम फेंका। तभी दर्शक दीर्घे से एसेंब्ली में कागज़ के पैम्फ़लेट उड़ने लगे। असेंबली के सदस्यों को ‘इंक़लाब ज़िंदाबाद’ और ‘लॉन्ग लिव प्रोलिटेरियट’ के नारे सुनाई दिए। उन पैम्फ़लेटों पर लिखा था बहरों को सुनाने के लिए ऊँची आवाज़ की ज़रूरत होती है।” पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार दोनों ही क्रांतिवीरों ने स्वयं को गिरफ़्तार करवाया। भगत सिंह ने तो अपनी वह पिस्टल भी सौंप दी जिससे उन्होंने सैंडर्स की हत्या की थी ताकि इस बात की पुष्टि हो जाए कि वह भी हत्या में शामिल थे। दोनों क्रांतिकारियों को बम फैंकने के जुर्म में आजीवन कारावास की सज़ा मिली, लेकिन सैंडर्स की हत्या के लिए भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव को फाँसी की सज़ा सुनाई गई।
कुलदीप नैयर अपनी किताब ‘विदाउट फ़ियर, द लाइफ़ एंड ट्रायल ऑफ़ भगत सिंह’ में लिखते हैं, “जल्लाद ने पूछा था कौन पहले जाएगा ? सुखदेव ने जवाब दिया था, मैं सबसे पहले जाऊँगा। जल्लाद ने एक के बाद एक तीन बार फाँसी का फंदा खींचा था। तीनों के शरीर बहुत देर तक फाँसी के तख़्ते से लटकते रहे थे।”
शहादत के पश्चात : भारत माता के वीर सपूतों से अंग्रेज़ी हुक़ूमत इतना भयभीत थी कि 24 मार्च के बदले 23 मार्च को ही कायरों की तरह शाम के समय उन्हें फांसी पर लटका दिया। पहले योजना थी कि तीनों का अंतिम संस्कार जेल में ही किया जाएगा परन्तु उठते हुए धुएं को देखकर जेल के बाहर उमड़े जनसैलाब के उत्तेजित होने के भय से यह निर्णय लिया गया कि उनका अंतिम संस्कार सतलज के तट पर कसूर में किया जाएगा। रातोंरात जेल की पिछली दीवार तुड़वाई गई और वहाँ से एक ट्रक को अंदर लाया गया। तीनों क्रांतिवीरों के पार्थिव शरीर को घसीटते हुए ले जाकर उन ट्रकों में फेंक दिया गया। मन्मथनाथ गुप्त अपनी किताब ‘हिस्ट्री ऑफ़ इंडियन रिवॉल्यूशनरी मूवमेंट’ में लिखते हैं, “सतलज नदी के तट पर दो पुजारी उन शवों का इंतज़ार कर रहे थे। उन तीनों के मृत शरीर को चिता पर रखकर आग लगा दी गई, जैसे ही भोर होने लगी जलती चिता की आग बुझाकर आधे जले हुए शरीरों को सतलज नदी में फेंक दिया गया। बाद में इस जगह की शिनाख़्त चौकी नंबर 201 के रूप में हुई। जैसे ही पुलिस और पुजारी वहाँ से हटे, गाँव वाले पानी के अंदर घुस गए। उन्होंने अधजले शरीर के टुकड़ों को पानी से निकाला और फिर ढंग से उनका अंतिम संस्कार किया।”
शहीदों की करो पूजा तो हिंदुस्तान बदलेगा : यह समस्त संसार आशा भरी दृष्टि से आज भारत जैसे युवा देश की ओर देख रहा है। अब समय आ गया है कि भारत का युवा कमर कसे और समूचे विश्व का नेतृत्व करे। जिस विश्वगुरु अखण्ड भारत की कल्पना तमाम देशभक्तों ने की थी, जिसे साकार करने हेतु उन वीरों ने अपने प्राणों तक की आहुति दे दी, उस श्रेष्ठ भारत के स्वप्न को साकार करने का एकमात्र उद्देश्य अब हर भारतीय का जीवनोद्देश्य होना चाहिए। यही उन वीर हुतात्माओं के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी। उन महापुरूषों पर केवल माल्यार्पण कर देने मात्र से नहीं अपितु उनसे प्रेरणा पाकर अपना जीवन राष्ट्रहित में लगा देना ही उनकी सच्ची पूजा होगी।
(शोधार्थी, कलकत्ता विश्वविद्यालय)