उत्तर प्रदेश की राजनीति और उसकी पड़ताल करती पोस्ट पत्रकार शिल्पी सेन की फेसबुक वॉल से साभार
शिल्पी सेन
राजनीति में स्थाई दोस्त या दुश्मन नहीँ होते !
राजनीतिक विश्लेषण करते समय हम लोग यही कहते रहे हैं, चुनाव में देखते भी रहे हैं, एक दूसरे को कोसने वाले नेता साथ आ जाते हैं….समाजवादी राजनीति के पुरोधा मुलायम सिंह यादव पर यह बात सटीक तो है,लेकिन यह परिस्थिति कुछ अलग भी है !
आज नामांकन के वक्त पहली बार भाई शिवपाल यादव साथ नहीं रहे जबकि प्रस्तावक हमेशा शिवपाल ही हुआ करते थे ! दरअसल समाजवादी पार्टी और वर्तमान समय में इसे आगे ले जाने की जिम्मेदारी लेने वाले अखिलेश यादव के लिए यह एक नयी राह है, पर खुद मुलायम सिंह यादव को यह रास्ता कहाँ ले जायेगा कहना मुश्किल है !!!
जिस मुलायम सिंह यादव की सभाओं को कैंडिडेट की जीत की जमानत माना जाता था अब उन्ही की जीत के लिए अपील करने बीएसपी सुप्रीमो मायावती पहुँचेंगी .. ऐसा नहीँ कि जिन सभाओं में मुलायम जाते थे वहाँ कैंडिडेट जीतता ही हो पर मुलायम सिंह यादव के बारे में कहा जाता है कि वो रैली करते समय ही जान जाते (और कई बार बता भी देते थे )कि फलाँ प्रत्याशी जीतने वाला है या नहीँ …
19 अप्रैल का दिन समाजवादी सियासत का वो दिन होगा जब मैनपुरी में मुलायम के समर्थन मे एसपी बीएसपी साझा रैली करेंगे… अगर मंच पर खुद मुलायम मौजूद रहे(जो स्वाभाविक है ) तो मीडिया इस बात का विश्लेषण करेगी कि दोनों धुर विरोधी एक दूसरे से कितनी दूरी पर बैठे ..कितनी बार मंच पर मुलायम और माया ने एक दूसरे से बात की !!! क्योंकि इससे पहले जब SP – BSP साथ आये थे तब भी मुलायम के लिए कांशीराम ने साझा जनसभा नहीं की थी !
समाजवादी परिवार के झगडे के बाद भी इस परिवार के एक होने की आस रखने वाले जमीनी कार्यकर्ताओं के लिए यह एक अजीब स्थिति है ! समाजवादी पार्टी का भविष्य चाहे जिस राह पर जाये पर इस बात की आहट अब साफ़ सुनायी पड़ने लगी है कि देश के सबसे बड़े सूबे में समाजवादी सियासत को खड़ा करने वाले मुलायम सिंह यादव की राजनीति उस दिन के बाद से शायद ही पुराने रूप में आ पाये …. #ElectionDiary #MSY #AlliancePolitics
कोलकाता : विद्यासागर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की ओर से ‘केदारनाथ सिंह के काव्य में मानव- मूल्य विषय’ पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। पंकज सिंह ने स्वागत गीत प्रस्तुत किया। उद्धाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए डॉ अब्दुल रहीम ने केदारनाथ सिंह को हिंदी कविता का बड़ा कवि बताया। उद्धाटन वक्तव्य रखते हुए विश्वविद्यालय के संकायाध्यक्ष प्रो. दामोदर मिश्र ने मानव मूल्य पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि केदारनाथ सिंह अपनी रचनाओं में मानव मूल्यों के रक्षार्थ प्रतिबद्ध रहे हैं। स्वागत भाषण देते हुए विभागाध्यक्ष संजय जायसवाल ने कहा कि केदारनाथ सिंह हिंदी कविता के सबसे सहज एवं सौम्य कवि हैं। जिन्होंने साधारण घटनाओं को असाधारणत्व प्रदान किया। बीज वक्तव्य रखते हुए रांची विश्वविद्यालय के पूर्व प्रो. अरुण कुमार ने कहा कि केदारनाथ सिंह की कविता जीवन की विविधताओं से भरी हैं। जहां वे केंद्र की सत्ता को खारिज करते हुए हाशिए के लोगों को स्पेश देते हैं। बतौर मुख्य वक्ता प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय के डॉ. ऋषिभूषण चौबे ने केदारनाथ सिंह के साथ बिताए आत्मीय क्षणों का उल्लेख करते हुए कहा कि केदारनाथ सिंह हिंदी कविता के सबसे निश्छल एवं मनई कवि हैं। डॉ. रणजीत सिन्हा ने कहा कि केदारनाथ सिंह का काव्य मानव प्रेम का आख्यान है। राजा नरेंद्र लाल खान महिला कॉलेज की हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ रेणू गुप्ता ने कहा कि केदारनाथ सिंह ने कबीर और तुलसी की परंपरा का निर्वाह करते हुए हिंदी कविता को लोकजीवन से जोड़ा है। खड़गपुर कॉलेज के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. संजय पासवान ने कहा कि केदारनाथ सिंह ने जीवन की छोटी सी छोटी घटना को महत्व प्रदान किया है। इस अवसर पर चंदना मंडल, डॉ. प्रियंका मिश्रा, प्रभाती मुंगराज, विनय प्रसाद,सुजाता सिंह, मौसमी गोप,रूपल साव, धनंजय प्रसाद, रीता जायसवाल, सीमा साह, राजकुमार मिश्र, श्रद्धा उपाध्याय ,विनोद यादव, राकेश चौबे,सुषमा सिंह, रूपेश यादव, अनिल साह,प्रियंका गुप्ता,राहुल शर्मा, पूजा कुमारी साव तथा पिंकी बागमार ने आलेख पाठ किया। कार्यक्रम का सफल संचालन राहुल गौड़, मधु सिंह, तथा धन्यवाद ज्ञापन देते हुए विभाग के एसोसिएट प्रो. डॉ प्रमोद कुमार प्रसाद ने कहा कि केदार जी का साहित्य पढ़ना असल में मनुष्यता का पाठ पढ़ने जैसा है।
कवि कुंवर नारायण को पर्दे पर देखना, बीसवीं सदी के एक ऐसे महत्वपूर्ण हिंदी कवि की कविताओं से मुठभेड़ करना है, जिनकी कविताएं हमारे समय और संवेदना को हर क्षण रेखांकित करती रही हैं। कुंवर नारायण अभी कुछ दिनों पहले ही गुजरे, लेकिन उन पर बनी गौतम चटर्जी की 40 मिनट की शार्ट फिल्म को देखने से लगता है कि कुंवर नारायण हमारे पास खड़े अपनी कविताओं का पाठ कर रहे हैं। गौतम चटर्जी की इस लघु फिल्म का नाम है ‘अपने सामने’। अंग्रेजी में इस छोटी-सी फिल्म का नाम दिया गया है ‘फेसिंग द सेल्फ’।
‘अपने सामने’ दरअसल, कुंवर नारायण के एक महत्वपूर्ण कविता-संग्रह का नाम भी है। गणित और दर्शन-शास्त्र जैसे जटिल विषयों में पीएचडी किए गौतम चटर्जी बुनियादी तौर पर सिनेमा के आदमी हैं और कवि कुंवर नारायण से उनका चालीस सालों का स्नेहभरा संबंध रहा है। कभी लखनऊ, तो कभी दिल्ली में कवि का साबका इस संवेदनशील फिल्मकार से होता रहा है। बनारस के सांस्कृतिक माहौल में जन्मे और वहीं पले-बढ़े गौतम चटर्जी को अक्सर लगता था कि कुंवर नारायण और उनकी कविताओं को पर्दे पर उतारा जाए, सो उन्होंने 2017-18 के दौर में अपना ‘5 डी मार्क टू’ कैमरा उठाया और कवि को फिल्माना शुरू किया। यह सायास था। यही वह समय भी था, जब कवि अपनी उम्र के ढलान पर थे। इससे पहले हिंदी के एक और महत्वपूर्ण कवि श्रीकांत वर्मा पर गौतम चटर्जी लघु फिल्म बना चुके थे। दरअसल, गौतम ने डेका सीरीज-10 नाम से पांच भारतीय और पांच विदेशी कवियों पर एक-एक घंटे की ‘दस रूपक’ नामक लघु फिल्मों की श्रृंखला तैयार की हैं। इसमें हिंदी के दो वरिष्ठ कवि-श्रीकांत वर्मा और कुंवर नारायण शामिल हैं। एक श्रृंखला कवि रवींद्रनाथ टैगोर की लंबी कविता पर भी केंद्रित है। गौतम चटर्जी बताते हैं कि कुंवर नारायण वाली लघु फिल्म सिर्फ 40 मिनट की है, बाकी सभी फिल्में घंटे भर की है।
कुंवर नारायण पर बनी शार्ट फिल्म की खासियत यह है कि कवि के विभिन्न मूड की कविताओं को एक बेहतरीन और खूबसूरत कोलाज का रूप दिया गया है। कवि की एक लंबी कविता ‘नदी बूढ़ी नहीं होती’ में दृश्यों का लाजवाब संयोजन इस तरह हुआ है जैसे वे हमारे सामने हों।
करीब सवा घंटे की शूटिंग और चाक्षुष संपादन के बाद इस लघु फिल्म को पर्दे पर चालीस मिनट में समेटना हिंदी के एक बड़े कवि को सही मायने में वाजिब श्रृद्धांजलि हैं। फिल्म के आरंभ में खंडहर, बूंदों का टपकना और ट्रेन का गुजरना जैसे दृश्यों का आना अनायास नहीं है, बल्कि कवि की कविता और उनकी वाणी से तालमेल बिठाते एक चुस्त संपादन-कला की उत्कृष्ट बानगी हैं। बीच-बीच में जीवन और मृत्यु से मुठभेड़ कराते कवि के दार्शनिक-से संवाद दिलोदिमाग को उलझाते नहीं, बल्कि झकझोरते और झंकृत करते हैं !
इस लघु फिल्म में संगीत एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। पंडित किशन महाराज का तबला हो या निखिल बनर्जी का सितार या फिर निशांत सिंह का पखावज-कवि की कविता और ओजस्विता को विस्तार ही देता है। विश्वजीत रायचौधरी का सरोद भी इस लघु फिल्म की जान है और इसकी अनुगूंज काफी देर तक सुनाई पड़ती हैं।
कोलकाता के नंदन प्रेक्षागृह में हुए साउथ एशिया फिल्म महोत्सव और भारतीय भाषा परिषद में दिखाई गई यह लघु फिल्म यानी ‘अपने सामने’ कवि कुंवर नारायण की परिधि से बाहर नहीं जाती, बल्कि कवि के दायरे और उनकी ऊर्जा को विस्तार देते हुए उनके जीवन-दर्शन से हमें बखूबी रूबरू कराती हैं। फिल्मकार गौतम चटर्जी का कहना है कि निकट भविष्य में कुंवर नारायण पर दूसरा पार्ट भी बना सकते हैं। लगभग 14 किताबें लिख चुके गौतम चटर्जी ने मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, भारतेंदु हरिश्चंद्र और शरतचंद्र पर लघु फिल्मों की एक खूबसूरत श्रृंखला भी तैयार की हैं। इनमें कुछ बन चुकी हैं और कुछ का निर्माण जारी है। बातचीत में गौतम चटर्जी कहते हैं कि पैसे के लिए वे फिल्म नहीं बनाते। उनका कहना है कि पैसा मेरे दिमाग में कभी नहीं रहता। बेहतरीन सिनेमा के प्रति लगाव और समर्पण मुझे फिल्म बनाने को प्रेरित करता रहता है।
गौतम चटर्जी की पूंजी देशभर में फैले उनके अनगिनत शिष्य भी हैं। गौतम चटर्जी ने ‘कुहासा’ और ‘अनुबंध’ समेत चार कथा फिल्में और दस गैर कथा फिल्में भी बनाई हैं। वे आगे कहते हैं- कार्यशाला, व्याख्यान और सृजनात्मक लेखन से उनका गुजारा हो जाता है। सुकून से ठीक-ठाक और व्यवस्थित जिंदगी जीने के लिए और क्या चाहिए।
महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए उनका एक साथ आना जरूरी है और यह तभी होगा जब वे एक साथ जुड़ सकेंगी और अपने अनुभव साझा कर सकेंगी। ऑल इंडिया लेडीज लीग ऐसी ही संस्था है। विमेन इकोमिक फोरम तथा ऑल लेडीज लीग की ग्लोबल चेयर पर्सन तथा बायो आयुर्वेदा की संस्थापक डॉ. हरबीन अरोड़ा से अपराजिता की बातचीत के कुछ अंश – प्र. महिला सशक्तिकरण को आप कैसे परिभाषित करेंगी? उ. सशक्तिकरण अपने भीतर छुपी शक्ति को पहचानना है। यह अपनी क्षमता को बाहर लाना है, वैसे ही जैसे एक माँ अपने बच्चे की परवरिश कर, उसे प्रोत्साहन और समर्थन देकर उसे सशक्त बनाती है। हमें महिलाओं को सुरक्षा प्रदान कर अपने समुदाय और समाज में वह जगह देना है, जहाँ वह यह महसूस कर सके कि मैं यह कर सकती हूँ। आत्म सम्मान, आत्म विश्वास, आत्म निर्भरता और आत्म परिपूर्णता, ये चार तत्व स्थापित करना सशक्तीकरण के स्तम्भ हैं। प्र. महिलाओं की जिन्दगी में शिक्षा की क्या भूमिका है? उ. शिक्षा परिवर्तन की शुरुआत है। सपने देखने की क्षमता और एक दृष्टि है जो शिक्षा से प्राप्त होती है मगर हमारी मानसिकता को भी शिक्षित करने की जरूरत है जिससे परिवार और समाज महिला को उसकी दृष्टि के साथ सम्मान दे और परिवार उसके साथ खड़ा हो सके। आपकी परवरिश और परिवार का आपके विकास में औपचारिक स्कूली शिक्षा के अतिरिक्त बड़ा योगदान होता है। प्र. आपकी नजर में आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि क्या है? उ. हमें इस बात की खुशी है कि हम विभिन्न संस्कृतियों और देश व समाज की महिलाओं को अपने साथ ला सके हैं। ‘ऑल’ एकमात्र ऐसी संस्था है जिसमें सभी महिलाओं को निःशुल्क प्रवेश मिलता है और इसके लिए एकमात्र मापदंड सकारात्मक ऊर्जा और भाईचारे व बहनापे की भावना होना है। प्र. महिला सुरक्षा और सशक्तिकरण के लिए किस तरह के कदम उठाने चाहिए? उ. सुरक्षा की बात की जाए तो जब महिलाएं महिलाओं की सुरक्षा के लिए खड़ी होंगी और जब कार्यस्थल और सार्वजनिक जीवन में महिलाएं जब अधिक दिखेंगी। निश्चित रूप से हम अपनी सुरक्षा के लिए आवाज और तेज कर सकेंगे। आमतौर पर सुरक्षा को लेकर लोग सलाह देते हैं कि हमें घर से कम निकलना चाहिए मगर मैं इसके विपरीत विश्वास करती हूँ कि हमें और अधिक बाहर निकलकर पुरुष प्रधान समाज में उपस्थिति दर्ज करवानी होगी जिससे महिलाओं की अधिक भागीदारी से संतुलन आ सके। महिलाओं को महिलाओं की बेस्ट फ्रेंड बनना होगा। राजनीति, राष्ट्रीयता और धर्म किसी महिला की सहायता करने में बाधक नहीं बनना चाहिए। हमें एक दूसरे को महिला की तरह देखना होगा और चुनौतियों और आकाँक्षा को समझना चाहिए। महिलाएं हमेशा से शांति और स्थायीत्व की संरक्षक रही हैं।
प्र. महिलाओं को लेकर समाज की अवधारणा कहाँ तक बदली है? उ. बहुत कुछ बदला है मगर अब भी बहुत कुछ बदलने की जरूरत है। फिर भी मुझे विश्वास है कि हमारे और देश और दुनिया की बहुत सी अन्य संस्थाओं के प्रयास से परिवर्तन जारी रहेगा। हम भाग्यशाली हैं जो हमारे आस – पास बहुत सी महिलाएं प्रेरणा के रूप में मौजूद हैं जो पहले नहीं था। हमें अपने प्रयास जारी रखने की जरूरत है जिससे हमारे बच्चे महिलाओं को नेतृत्व देने वाली भूमिकाओं में देख सकें और समझ सकें कि महिलाएं अगर तय कर लें तो वे कुछ भी कर सकती हैं।
प्र. ऑल लेडीज लीग तथा विमेन इकोनॉमिक फोरम के बारे में बताएं? उ. ऑल लेडीज लीग, हमने एक सपने के साथ शुरु किया था जिससे हम बहनापे को प्रोत्साहित कर सकें। महिलाएं नेतृत्व देने की दिशा में एक बड़ी और महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं और सशक्त व सांस्कृतिक प्रभाव छोड़ सकेंगी। हमारा विमेन इकोनॉमिक फोरम सभी महिलाओं को आत्मविश्वास, जानकारी तथा प्रेरित नेटवर्क दे रहा है जिससे वे सभी क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकें।
प्र. हमारे पाठकों को आप क्या संदेश देना चाहेंगी? उ. आप जब महिला को देखती हैं तो शक्ति को देखती हैं। एक महिला अपने आस – पास हर किसी का ख्याल रखती है इसलिए जब आप एक महिला को शिक्षित व सशक्त करते हैं तो आप समाज को विकसित करते हैं। महिला कभी कमजोर नहीं होती है। प्यार और संरक्षण के साथ देने की क्षमता उसकी बड़ी ताकत है। यहाँ तक कि जब वह कमाती है तो वह अपने परिवार की बेहतरी के बारे में सोचती है और हर काम में मूल्य और दायित्वबोध लाती है जिसमें व्यवसाय भी शामिल है। अपनी बेटियों को कमजोर न समझें बल्कि उसे जहाँ तक हो सके, बेहतर परवरिश और प्रोत्साहन दें और आप अपना भविष्य सुरक्षित करेंगे।
चुनावी बुखार जोर पकड़ने लगा है और पारा सोशल मीडिया का चढ़ने लगा है। मोदी और राहुल से लेकर मायावती और ममता की बातों के अलावा किसी को कुछ नहीं सूझ रहा..आरोप और प्रत्यारोपों की भाषा और तेज हो रही है। कहने की जरूरत नहीं कि हर प्रत्याशी अपना पसीना बहाने में लगा है मगर चुनाव में जिस तरह से टिकट बाँटे जा रहे हैं और जिनको बाँटे जा रहे हैं, उसे लेकर असन्तोष भी सभी दलों को झेलना पड़ रहा है। ये ऐसा ही है जैसे आप साल भर मेहनत करें और फल आपका सहकर्मी ले जाए…मगर इस चुनाव में बहुत से मुद्दे छूट भी रहे हैं…पर्यावरण और बच्चे…घोषणापत्रों में बहुत पीछे छूटे जा रहे हैं। हम बड़ी -बड़ी बातों पर बात करते हैं मगर छोटी – छोटी जरूरतों पर ध्यान नहीं जाता…स्थिति यह है कि रोजगार और नौकरी का झगड़ा भी शुरू हो गया है….अलबत्ता चुनाव में यह सब बहुत काम आते हैं…चौकीदार, चायवाला..पकौड़ा…चॉप..पता नहीं…यह जंग कहाँ जाकर थमने वाली है मगर एक बात तो समझ में नहीं आ रही है कि छोटे -छोटे स्वरोजगार को नौकरियों की तुलना में हम हेय दृष्टि से क्यों देख रहे हैं? एक तरफ यह कहा जाता है कि कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता..और दूसरी तरफ हीनताबोध…हम एक यूटोपिया में जी रहे हैं कि देश के हर युवा को नौकरी ही करनी है..कभी आपने उनसे पूछा है कि वह क्या चाहते हैं…कन्वेंशनल रोजगार से अलग हटकर कुछ सोचा जाए और एक शिल्प को उद्योग का रूप दिया जाए तो क्या बुरा है…काम तो वही है, फर्क पैकेजिंग का है…वही पॉपकॉर्न आपको सड़क पर 10 रुपये मे भी महँगा मिलता है मगर हवाई अड्डे पर वही आप 100 रुपये में खरीदते हैं। भारत में शिल्प की कमी नहीं है मगर हीनता बोध के कारण हमने अपने युवाओं को मजबूर कर दिया है कि वे अपने हुनर बक्से में बंद करके रखें।
अगर कोई कुम्हार पॉटरी शिल्प का आधुनिकीकरण करके व्यवसाय आगे बढ़ाए, कोई इंजीनियरिंग का छात्र खेती को आसान बनाने वाले उपकरण बनाए..तो इसमें क्या बुरा है? शहरों में न्यूनतम वेतन पर नौकरी करते हुए अगर कोई युवा गोलगप्पे बेचकर अपने ट्यूशन का खर्च निकालता है तो इसमें आपको आपत्ति क्यों है? इंजीनियरिंग कॉलेजों में हजारों सीटें खाली रहती हैं…डिग्री लेकर निकलने वाले युवाओं के पास प्लान बी का विकल्प रहना चाहिेए और यही हमारे संस्थान नहीं सिखाते…नौकरी करते हुए आप अपने परिवार का पेट भरते हैं मगर अपना काम करते हुए आप 10 लोगों को रोजगार देकर 10 परिवारों की मदद करते हैं और इसके लिए आपको वापस अपने गाँवों की ओर मुड़कर या फिर घरों की परम्परागत जीविका की ओर देखने की जरूरत है। मुझे बड़ा अजीब लगता है जब लोग पढ़े फारसी, बेचे तेल की उक्ति सुनाते हैं….फारसी पढ़कर तेल बेचने में क्या बुराई है…आखिर तेल बेचकर ही बड़ी मिले खड़ी हुई हैं..आप किसी भी सफल उद्योगपति की कहानी उठाइए…उसकी शुरुआत ऐसे ही हुई है..चुनाव आते और जाते रहेंगे…नेता बदलते रहेंगे…कुछ भी स्थायी नहीं है मगर उनके चमत्कारों पर भरोसा करने से बेहतर है कि आप अपनी शक्ति पर विश्वास करें और उस शक्ति का उपयोग एक सच्चे नागरिक की तरह करें….एक सही नेतृत्व जरूर चुनें मगर उसके भरोसे ही न बैठे रहें….और सही नेतृत्व चुनने के लिए जरूरी है कि अपने मताधिकार का प्रयोग करें। राजनीति बेहतर तभी होगी जब आपका सक्रिय हस्तक्षेप होगा..राजनीति से विरक्त होकर बदलाव की उम्मीद करना एक मरीचिका है इसलिए आपको आगे बढ़ने की जरूरत है..मतदान पर्व आरम्भ हो रहा है…..आइए मतदान करें…सशक्त भारत गढ़ें।
अपराजिता फीचर डेस्क
भारतीय राजनीति इन दिनों बदलाव के दौर से गुजर रही है और जाहिर है कि यह बदलाव आसान नहीं है। हर दल में वरिष्ठ नेता हैं…कई ऐसे हैं जिनकी उम्र हो चुकी है मगर अपनी तमाम शारीरिक दिक्कतों के बावजूद सक्रिय हैं। यह सच है कि अपनी पार्टी को खड़ा करने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है जिसे नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता और यही कारण है कि इनका दबदबा रहता है और कोई भी दल या संगठन इनको यह कहने का जोखिम नहीं उठाता कि अब उनको सेवानिवृत्त हो जाना चाहिए क्योंकि हमारे देश में बुजुर्गों को सम्मान देने की परम्परा रही है इसलिए यह बात कहना ही लोगों को पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा लगता है। हर क्षेत्र में सेवानिवृति की आयु निर्धारित है, फिल्मों में भी उम्र एक सीमा है। लेखन, कला और राजनीति ही ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें आपको उम्र में बाँधा नहीं जा सकता। लेखन और कला के क्षेत्र का चरित्र बहुत व्यक्तिगत होता है, इसमें आपको शारीरिक गतिविधियों पर इतना निर्भर नहीं रहना पड़ता इसलिए यहाँ वृद्धों को परेशानी नहीं होती, उम्र कोई बाधा भी नहीं है मगर राजनीति…? राजनीति का चरित्र दूसरा है…वहाँ आपकी उम्र मायने रखती है और आप इस बात को नजरअन्दाज नहीं कर सकते और न ही करना चाहिए मगर एक अच्छी छवि बरकरार रखने के लिए अधिकतर राजनीतिक दलों ने इसे नजरअन्दाज किया है…नतीजा यह है कि आज भारत के पास अच्छे युवा नेताओं की कमी है..अगर बुजुर्गों ने कुछ छोड़ा भी है तो वह अपने पारिवारिक हितों को सहेजते हुए छोड़ा है..अपनी धरोहर अपने बच्चों को सौंप दी है। हम बात युवा भारत की करते जरूर हैं मगर युवाओं को पर्याप्त भागेदारी देने में यकीन नहीं रखते। यहीं पर कथनी और करनी में फर्क नजर आता है। यहाँ यह जान लेना जरूरी है कि लोकसभा में युवा सांसद कहीं अधिक सक्रिय हैं।
नारायण दत्त तिवारी ने पूरी कोशिश की मगर अन्ततः उनको हाशिए पर ही डाला गया
दरअसल, भारतीय लोकतन्त्र में राजनीति एक पैतृक व्यवसाय से अधिक कुछ नहीं है। बात कड़वी जरूर है मगर राजनीतिक दल जिस तरह परिवार को अपने राजनीतिक हितों का साध्य मानते हैं, उसे देखकर यह बात ही सही जान पड़ती है। शरद पवाार ने चुनाव न लड़ने का निर्णय लिया मगर वे यह सुनिश्चित करना न भूले कि उनकी बेटी सुप्रिया सुले इस क्षेत्र में अपनी जगह बना ले। चुनाव न लड़ने का फैसला भी उन्होंने सब कुछ सेटल करने के बाद लिया है। बहुत से नेताओं के लिए तो यह चुनाव उनके राजनीतिक जीवन का अंतिम चुनाव होने जा रहा है और बहुत से लोगों ने पहले से ही हाथ पीछे खींच लिए हैं। सत्ता लिप्सा और अहं, दरअसल आपको बाँधता है और भारतीय नेता इन दोनों से ही जकड़े हैं। हम बात युवा भारत की करते जरूर हैं मगर युवाओं को कमान देने में दिग्गजों को बहुत परेशानी होती है..नतीजा यह है कि पार्टी धीरे – धीरे खत्म होती जाती है। आप माकपा का उदाहरण लीजिए…विमान बोस, बुद्धदेव भट्टाचार्य जैसे नेता अभी भी जमे हैं..इस पार्टी में युवा नेताओं के नाम उँगलियों पर गिने जा सकते हैं। कहने की जरूरत नहीं है और न ही बताने की जरूरत है कि माकपा कहाँ पर है। तृणमूल के सुदीप बन्द्योपाध्याय ने तो चुनाव लड़ने के प्रति अनिच्छा जाहिर कर चुके हैं मगर विकल्पहीनता और जोखिम लेने से डरने की वजह से पार्टी उनको दोबारा मैदान में उतार चुकी है। असुरक्षित परिवारवाद ने दलों के कार्यकतार्ओं को नाराज तो किया ही, विकल्प भी तैयार नहीं होने दिए और यह धीरे – धीरे भीतरी असन्तोष में तब्दील हो गया है। यह बीमारी भी अधिकतर राजनीतिक दलों में है जबकि हर पार्टी कार्यकर्ताओं को आगे ले जाने और उसके समर्पण का दावा करती है। दरअसल, वयोवृद्ध नेता इस कमजोरी को समझते हैं और अपनी निष्ठा को लेकर टिकट का दावा करने में उनको कोई परहेज भी नहीं है।
सच्चाई तो यह है कि कोई भी पार्टी जनता की जरूरतों से ज्यादा समीकरणों का ध्यान रखती है और यही कारण है कि वयोवृद्ध नेताओं की नाराजगी मोल लेने का साहस कोई नहीं करता। उनको शांति से धीरे – धीरे हटाया जाता है, जो नेता समझदारी से परिस्थिति को आँकते हैं, वे खुद दूरी बना लेते हैं जैसे कि कांग्रेस ने प्रणव मुखर्जी के साथ किया। सलूक तो सीताराम केसरी और पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव के साथ भी अच्छा नहीं किया गया..। माकपा ने पार्टी लाइन के नाम पर सोमनाथ चटर्जी जैसे दिग्गज नेता के साथ किस तरह का व्यवहार किया, यह किसी से छिपा नहीं है।
गहलोत ने अपनी वरिष्ठता और गाँधी परिवार से नजदीकी का लाभ उठाकर पायलट को सीएम बनने से रोका जबकि पायलट कहीं अधिक लोकप्रिय भी थे और चुनाव जितवाने में उनकी बड़ी भूमिका भी रही। कमलनाथ ने भी इसी तरह सिंधिया को मध्य प्रदेश में सीएम नहीं बनने दिया..निश्चित रूप से इसका एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है
सत्ता का मोह एक दिन दिग्गजों को दयनीय बनाकर छोड़ता है। यह बहुत असमंजस वाली स्थिति है, जिस पार्टी को खड़ा करने में जोशी, आडवाणी ने जान लगा दी, पूरा जीवन खपा दिया, वहाँ से इनकी उम्मीदें रहना स्वाभाविक है। आप इसे नैतिकता की दृष्टि से गलत बता भी सकते हैं मगर बात अगर भविष्य की हो, कदम आगे बढ़ाने से जुड़ी है तो क्या हम और आप भी इस तरह के फैसले नहीं लेते..नैतिकता और परम्परा की दृष्टि से गलत होने पर भी वह भविष्य और संगठन की बेहतरी के लिए उठाया गया कदम होता है और आडवाणी जी का उद्देश्य भी तो यही रहा होगा…संगठन को मजबूत और बहुत हद तक युवा रखना। भाजपा ने यही किया है, कांग्रेस ने भी यही किया मगर शाह सम्भवतः समय की नजाकत को समझते हैं। आज भाजपा में युवाओं की संख्या बढ़ रही है तो कांग्रेस में घट रही है। मौजूदा लोकसभा में भारतीय जनता पार्टी के 70 साल से अधिक उम्र के सांसदों की संख्या 15वीं लोकसभा की तुलना में 14.2 फीसदी से घटकर 8.8 फीसदी रह गई है। वहीं 25 से 40 वर्ष की उम्र के सांसदों की संख्या 5.8 फीसदी से बढ़कर 7.8 फीसदी हो गई है। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च की ओजारी इंडिया स्पेंड के आंकड़ों से यह खुलासा हुआ। वहीं विपक्षी पार्टी कांग्रेस में उम्रदराज सांसदों की स्थिति भाजपा के ठीक उलट है। कांग्रेस में युवा सांसदों की संख्या 8.1 फीसदी से घटकर 6.7 फीसदी और बुजुर्ग सांसदों की संख्या 11.9 फीसदी से बढ़कर 20 फीसदी हो गयी है।
16वींं लोकसभा में कई युवा चेहरे थे और ये अधिक सक्रिय भी रहे
कांग्रेस के साथ समस्या यह है कि कल तक जो पार्टी पूरे राष्ट्र की बात कर रही थी, वह निरन्तर परिवारवाद से होते हुए परिवार में सिमटती चली गयी। जो अच्छे नेता थे, उनको उभरने ही नहीं दिया गया..राहुल गाँधी को युवराज कहा जाता है मगर भारत जैसे लोकतन्त्र में इस शब्द की कोई जरूरत है, ऐसा लगता नहीं है। आज कई नेताओं का यह आखिरी चुनाव होने जा रहा है। एक पीढ़ी धीरे-धीरे बाहर जा रही है और नयी पीढ़ी उसकी जगह ले रही है। तमिलनाडु में करुणानिधि और जयललिता, दोनों के निधन के बाद यह पहला आम चुनाव होने जा रहा है। जोशी और आडवाणी को टिकट नहीं मिला। यशवन्त सिन्हा नेपथ्य से खूब सक्रिय रहेंगे। बहरहाल, उनकी भी उम्र इतनी हो चली है कि अगले चुनाव में शायद ही कुछ कर पाएं। पार्टी के 84 वर्षीय नेता शांता कुमार ने चुनाव न लड़ने की घोषणा कर दी है। महाराष्ट्र के दिग्गज एनसीपी नेता शरद पवार भी इस बार चुनाव न लड़ने की बात कह चुके हैं। उनकी बेटी सुप्रिया सुले और पोते पार्थ पवार का चुनाव लड़ना तय है। पंजाब के वयोवृद्ध नेता प्रकाश सिंह बादल शायद इस बार चुनाव लड़ें पर उनकी उम्र भी उन्हें अगला चुनाव लड़ने की इजाजत नहीं देने वाली। वैसे वे अपनी विरासत अपने बेटे सुखबीर सिंह बादल को सौंप चुके हैं, ठीक पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा की तरह।
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का चुनाव लड़ना भी रहस्य बना हुआ है लेकिन राजनीति में हाशिये की स्थिति को वे पहले ही स्वीकार कर चुके हैं। जम्मू-कश्मीर के फारुख अब्दुल्ला का हाल अलबत्ता बेहतर है, जो अस्सी पार करने के बाद भी श्रीनगर से लड़ने की तैयारी में हैं, हालांकि उनकी पार्टी नैशनल कॉन्फ्रेंस अब बेटे उमर अब्दुल्ला के ही जिम्मे है। मुलायम सिंह यादव मैदान में हैं मगर पार्टी में उनकी उपेक्षा किसी से छिपी नहीं है। यह उनका आखिरी चुनाव हो सकता है। लालू प्रसाद वैसे तो 70 साल के हैं लेकिन बीमार हैं और जेल में हैं। अनुमान है कि जितने मुकदमे उन पर हैं, उनके चलते चुनाव वे आगे शायद ही लड़ सकें। उनके बेटे तेजस्वी यादव की तैयारी में यह बात शामिल है। देखें, नयी पीढ़ी इन कद्दावर नेताओं की जगह कैसे भरती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह काफी समय से गाँधीनगर सीट पर उम्मीदवार बदलना चाहते थे। बताते हैं 75 साल से अधिक उम्र के लोगों को टिकट देने या न देने के निर्णय में भी सबसे.बड़ी बाधा आडवाणी ही थे लेकिन ऑपरेशन बालाकोट ने भाजपा नेतृत्व और प्रधानमंत्री को उत्साह से भर दिया। परिवारवाद भाजपा में भी है, राजनाथ सिंह, मेनका गाँधी जैसे नेताओं की सन्तानें भी पीछे नहीं हैं मगर यहाँ अभी भी आम कार्यकर्ता के लिए जगह है और अनन्त कुमार की सीट पर 28 साल के तेजस्वी सूर्या को टिकट देकर यह बात बताने की कोशिश पार्टी ने की है मगर यह काफी नहीं है। आडवाणी के सामने भी यह प्रस्ताव रखा गया कि वो गाँधीनगर सीट से अपनी बेटी को प्रत्याशी बनाने की सहमति दे दें। लेकिन आडवाणी ने कहा कि, उन्होंने जीवनभर राजनीति में परिवारवाद का विरोध किया है। इसके बाद आडवाणी ने मंतव्य समझकर गांथीनगर से चुनाव न लड़ने की इच्छा जाहिर की और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने प्रधानमंत्री से मशविरा करके उम्मीदवार बदल लिया। अब अमित शाह गाँथीनगर से भाजपा का चेहरा बन चुके हैं। आज भाजपा में लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, यशवन्त सिन्हा जैसे नेताओं की स्थिति देखकर आप यह बात कह सकते हैं और हो सकता है कि भाजपा को लानतें भेजें। करिया मुंडा को टिकट नहीं मिला तो उन्होंने खेती करने का फैसला कर लिया मगर सच यह भी है कि यह भविष्य की तैयारी भी कही जा सकती है। आज भाजपा के पास जितने युवा चेहरे हैं तो उनके लिए अवसर हैं मगर कांग्रेस में राहुल और सोनिया जैसे बरगद के सामने तमाम सम्भावनाशील नेताओं की प्रतिभा दम तोड़ रही है। कांग्रेस में गाँधी परिवार के करीबियों की ही चलती है और मध्य प्रदेश व राजस्थान में मुख्यमंत्री के चुनाव में जो नाटक चला, उसे देखकर तो यह बात और पुख्ता हो जाती है। ये तय है कि आज जो जोशी और आडवाणी के साथ हो रहा है, उस स्थिति के लिए शाह – मोदी खुद को भी मानसिक तौर पर तैयार कर रहे हों या क्या पता वे यह नौबत ही न आने दें।
गौतम गम्भीर पहले से ही सक्रिय रहे हैं..देखना यह है कि आगे इनकी राह कैसी है
युवा सांसद अधिक सक्रिय हैं और उनकी ही जरूरत है
गौरतलब है कि पहली लोकसभा (1952) में सांसदों की औसत उम्र 46.5 साल थी। 16वीं लोकसभा (2014) में बढ़कर यह 56 साल हो गई है। हालांकि पहली लोकसभा में सदस्यों की संख्या 489 थी, जबकि वर्तमान लोकसभा में सदस्यों की संख्या 545 है। बुजुर्ग सांसदों के मामले में वर्तमान लोकसभा दूसरे स्थान पर है, जबकि पहले पायदान पर 15वीं लोकसभा है। खास बात यह कि युवा भारत में अधिकांश सांसद 56 से 70 साल के बीच की उम्र के हैं। बीते सितंबर माह में जारी इंडिया स्पेंड की रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान लोकसभा में सबसे युवा सांसद की उम्र 28 साल है, जबकि सबसे बुजुर्ग सांसद की उम्र 88 साल है। सांसदों की औसत उम्र 58 साल है. यानी आधे सांसदों की उम्र 58 साल या उससे अधिक है। साल 2011 में भारत की औसत आयु 24 साल थी। वर्तमान लोकसभा में 56 से 70 साल के बीच की उम्र के सांसदों की भागीदारी 44 फीसदी है, जबकि देश की कुल जनसंख्या के हिसाब से ये केवल 8 फीसदी हैं. भारत की कुल जनसंख्या के एक चौथाई लोग 25 से 40 साल के बीच की उम्र के हैं और वे चुनाव जीतने योग्य हैं, लेकिन इस उम्र समूह से दस फीसदी से अधिक सांसद नहीं हैं. उधर, संसद में बुजुर्ग सांसदों (71 से 100 साल) की संख्या 9.6 फीसदी है, जबकि वे देश की कुल जनसंख्या के सिर्फ 2.4 फीसदी हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार के अधिकांश सांसद युवा हैं और 41 से 55 साल के बीच की उम्र के सांसद संसद में सबसे अच्छे परफॉर्मर हैं। देश के सर्वाधिक जनसंख्या वाले राज्य उत्तर प्रदेश की लोकसभा में सबसे ज्यादा भागीदारी है। इस राज्य से चुनकर आने वाले 63 फीसदी सांसद 56 साल से कम उम्र के हैं।
लोकसभा में केरल से 20 सांसद हैं, लेकिन एक भी सांसद 25 से 40 साल के बीच की उम्र के नहीं हैं। केरल की औसत आयु भी 31 साल है।यहाँ से चुनकर आए 65 फीसदी सांसद 55 साल से अधिक उम्र के हैं. 41 से 55 साल के बीच की उम्र के सांसद 16 वीं लोकसभा में सबसे अच्छे प्रदर्शक भी रहे हैं. संसदीय सत्रों में इनकी उपस्थिति कुल मिलाकर 81 फीसदी रही है, जबकि बुजुर्ग सांसदों की उपस्थिति 76.3 फीसदी रही है। सवाल पूछने, बहस में भाग लेने और निजी विधेयक पेश करने के मामले 41 से 55 साल के बीच की उम्र के सांसद सर्वाधिक सक्रिय रहे हैं। इस उम्र के सांसदों ने सदन में 168 प्रश्न पूछे, जबकि बुजुर्ग सांसदों ने सिर्फ 91 प्रश्न पूछे। संसद में सबसे कम सक्रिय 71 से 88 साल के बीच की उम्र के सांसद रहे हैं. इस उम्र समूह के 34 फीसदी सांसदों ने सदन में दस से भी कम सवाल पूछे।
हकीकत यह है कि युवाओं को निर्णायक भूमिका में न लाकर आप अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं और वयोवृद्ध नेताओं को सोचना होगा कि एक लम्बी पारी उन्होंने खेली है…अब मौका है कि अपने बच्चों को ही नहीं, दूसरों के बच्चों को भी मैदान में खुलकर आने दें…आखिर लोकतन्त्र परिवार के लिए होता नहीं है, वह तो जनता के लिए है, चुनाव भी किसी के अहंकार की तुष्टि या किसी खास व्यक्ति या परिवार को मजबूत करने के लिए नहीं होते…यह जनता का अधिकार है…निष्पक्ष और बेहतर विकल्प देकर ही राजनीतिक दल जनता के दिल में अपनी जगह बना सकते हैं…बाकी पब्लिक खुद समझदार है।
(इनपुट – न्यूज 18 पर प्रकाशित इंडिया स्पेन्ड की रिपोर्ट)
नयी दिल्ली : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आगामी लोकसभा चुनाव में लोगों की ज्यादा से ज्यादा भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए गत रविवार को सोशल मीडिया पर एक नया कैंपेन ‘वोट कर’ शुरू किया। उन्होंने ट्वीट कर देशवासियों से मतदान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने की अपील की है, साथ ही विभिन्न क्षेत्रों के दिग्गजों से लोगों को मतदान का महत्व समझाने और उन्हें ज्यादा से ज्यादा मतदान के लिए प्रोत्साहित करने का भी अनुरोध किया। प्रधानमंत्री ने कहा है कि लोग यह सुनिश्चित करें कि उनके परिजन और मित्रगण मतदान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लें। उन्होंने यह भी कहा कि लोगों के ऐसा करने से देश के भविष्य पर सकारात्मक असर पड़ेगा।
पीएम मोदी ने लोगों से अपील की है, ‘यदि आप वोटरों को जागरूक करने के लिए कोई भी नई पहल कर रहे हैं तो उसकी जानकारी #VoteKar के साथ साझा करें।’ प्रधानमंत्री ने बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेताओं अनुपम खेर, कबीर बेदी और फिल्म निर्माता शेखर कपूर को टैग कर अपने ट्वीट में कहा कि इन लोगों ने वैश्विक स्तर पर भारत का मान और सम्मान बढ़ाया है। उन्होंने इनसे अपील करते हुए कहा कि वे देशवासियों को अधिक से अधिक संख्या में मतदान के लिए प्रेरित करें।
उन्होंने बॉलीवुड अभिनेता हृतिक रोशन और आर. माधवन को टैग कर ट्वीट किया, ‘आपका काम न सिर्फ मनोरंजन के लिए मायने रखता है, बल्कि इसके पीछे जुनून और कठिन परिश्रम भी है। आपकी आवाज बेहद मायने रखती है, इसलिए अगर आप लोगों को मतदान के लिए जागरूक करने में मदद करेंगे, तो इससे भारत का लोकतंत्र और मजबूत होगा।’ इसी तरह, मोदी ने टाइम्स डिजिटल के चीफ एडिटर राजेश कालरा समेत मीडिया के कई दिग्गजों को भी अपने ट्वीट में टैग करते हुए कहा, ‘आज की तारीख में भारी तादाद में युवा चलते-फिरते वक्त समाचारों से रूबरू होते हैं, ऐसे में एक बेहतर कल सुनिश्चित करने को लेकर उन्हें उत्साहित करने का यह माकूल वक्त है।’
प्रधानमंत्री मोदी ने कई मीडिया संस्थानों को टैग किया और ट्वीट कर कहा, ‘लोकतंत्र ज्यादा से ज्यादा मतदान से और मजबूत होगा। मैं इनसे लोगों को मतदान का महत्व समझाने और ज्यादा से ज्यादा मतदान के लिए उन्हें जागरूक करने की अपील करता हूं।’
मोदी ने बॉलीवुड के दिग्गजों अनिल कपूर, अजय देवगन और माधुरी दीक्षित को भी टैग किया और ट्वीट कर कहा, ‘बॉक्स ऑफिस के बाद अब पोलिंग बूथों पर टोटल धमाल का वक्त आ गया है। वोट कर मूवमेंट को आपके सपोर्ट से भारत के लोकतंत्र का भविष्य समृद्ध होगा। आइये हम सब मिलकर ज्यादा से ज्यादा मतदान सुनिश्चित करते हैं।’
बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद मोदी इससे पहले भी अपने ट्विटर हैंडल से विभिन्न क्षेत्रों की जानी-मानी हस्तियों को टैग कर उनसे लोगों को मतदान का महत्व समझाने और ज्यादा से ज्यादा मतदान के लिए जागरूक करने की अपील कर चुके हैं।
नयी दिल्ली : वाइस एडमिरल करमबीर सिंह को सरकार ने अगला नौसेनाध्यक्ष चुना है। वह मौजूदा नौसेनाध्यक्ष वाइस एडमिरल सुनील लांबा का स्थान लेंगे। लांबा का कार्यकाल 31 मई 2019 को समाप्त हो जाएगा। इस बात की जानकारी रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता ने ट्वीट के जरिए दी। नौसेना की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार वह राष्ट्रीय रक्षा अकादमी खडकवासला के पूर्व छात्र हैं।
वाइस एडमिरल करमबीर सिंह जुलाई 1980 में भारतीय नौसेना में शामिल हुए थे। 1982 तक उनकी नियुक्ति एक हेलिकॉप्टर पायलट के तौर पर थी। उन्होंने ब्रिटेन के वेलिंगटन स्थित डिफेंस सर्विसिज स्टाफ कॉलेज से पढ़ाई की है। इसके अलावा उन्होंने मुंबई के कॉलेज ऑफ नेवल वारफेयर से भी पढ़ाई की है। यह इन दोनों जगहों पर निदेशक के पद पर भी रहे हैं। अति विशिष्ट सेवा मेडल प्राप्त करमबीर सिंह को 31 मई 2016 को वाइस एडमिरल का कार्यभार सौंपा गया था। उन्हें पायलट के तौर पर चेतक और कामोव हेलिकॉप्टर उड़ाने का अनुभव है। अपने 36 साल के करियर में उन्होंने भारतीय तट रक्षक बल के जहाज को कमांड किया है। इसके साथ ही वह नेवल मिसाइल कोरवेट और गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर के कमांडर भी रहे हैं।
लॉस एंजेलिस से अटलांटा के लिए उड़ान भरने वाली डेल्टा फ्लाइट को एक ही परिवार की पायलट टीम ने उड़ाया। ये बात जानकर विमान में मौजूद यात्री भी हैरान रह गए। ये बोइंग का 757 विमान था। जिसमें पायलट की सीट पर बैठी मां और बेटी की तस्वीर वायरल हुई। ये दोनों मां बेटी फ्लाइट की क्रू मेंबर हैं।
इस फ्लाइट में मां बतौर कैप्टन पद संभाल रही हैं, जिनका नाम वेंडी रेक्सन है। वहीं उनकी बेटी केली रेक्सन फर्स्ट ऑफिसर के पद पर हैं। इस खास मौके की तस्वीर डेल्टा फ्लाइट ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से ट्वीट किया। जिसमें लिखा है, “फैमिली फ्लाइट क्रू गोल्स”। मां-बेटी की ये तस्वीर एम्ब्री-रिडल वर्ल्डवाइड के चांसलर जॉन आर वेट्रट ने ली है। इसके बाद उन्होंने ये तस्वीर अपने ट्विटर हैंडल पर भी शेयर की। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक इस फ्लाइट में वेट्रट यात्री थे। उन्हें कॉकपिट में दोनों की बातें सुनने के बाद पता चला कि वो मां-बेटी हैं। वेट्रट के अनुसार इस बात को जानने के बाद उन्होंने मां-बेटी से मिलने की इच्छा जताई। इसके बाद उन्हें ये मौका भी दिया गया। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार केली रेक्सन की बहन भी पायलट हैं।
नयी दिल्ली : बॉलीवुड की क्वीन कंगना रनौत किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं। साल की शुरुआत में अपनी फिल्म ‘मणिकर्णिका’ से छा जाने वाली कंगना के हाथ के और सफलता लगी है। वे देश की पहली सर्वाधिक पारिश्रमिक पाने वाली अभिनेत्री बन गयी हैं। कंगना रनौत तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जे जयललिता की बायोपिक के लिए 24 करोड़ की फीस ले रही हैं. कंगना से पहले दीपिका पादुकोण इस लिस्ट में टॉप पर थीं. दीपिका ने फिल्म ‘पद्मावत’ के लिए 11 करोड़ की फीस चार्ज की थी। वहीं दीपिका से पहले प्रियंका चोपड़ा बॉलीवुड की सबसे महंगी अभिनेत्री हुआ करती थीं। फिल्म से जुड़े करीबी सूत्रों के हवाले से खबर है कि कंगना रनौत को 24 करोड़ की फीस ऑफर की गयी है। दो भाषाओं में बन रही इस फिल्म में तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री रहीं जयललिता के जीवन को दिखाया जाएगा. कंगना के साथ इस फिल्म का कॉन्ट्रैक्ट साइन कर लिया गया. फिल्म तमिल में ‘थलाईवी’ और हिंदी में ‘जया’ के नाम से बन रही है। फिल्म का निर्देशन साउथ फिल्मों के टॉप मेकर्स में से एक विजय कर रहे हैं। विजय ने ‘मद्रासापट्टिनम’ और ‘दैवा तिरुमगल’ जैसी फिल्मों का निर्देशन किया है।
कंगना ने हाल ही में अपने एक बयान में कहा था कि ‘जयललिता जी इस सदी की सबसे सफल महिलाओं में से एक हैं। वह एक सुपरस्टार थीं और आगे चलकर प्रसिद्ध राजनीतिक हस्ती बनीं, मुख्यधारा की फिल्म के लिए यह बेहतरीन विषय है। मैं इस बड़ी परियोजना का हिस्सा बनकर सम्मानित महसूस कर रही हूं.’
बता दें कि जयललिता सिनेमा जगत के साथ भारतीय राजनीति का एक बड़ा नाम रहा है। तमिल, तेलुगू और कन्नड़ फिल्मों ने अभिनय के साथ ही वो 1991 से लेकर साल 2016 तक तमिलनाडु की सीएम के पद पर भी थी।