Friday, November 6, 2026
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बंगाल में भाजपा ने चुनाव पर खर्च किये 286 करोड़ रुपये

कोलकाता । पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा ने न सिर्फ अपनी ताकत झोंकी थी, बल्कि तिजोरी का मुंह भी खोल दिया था। पश्चिम बंगाल के साथ चार अन्य राज्यों असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में भी चुनाव हुए थे। चुनाव आयोग को सौंपी गई चुनाव खर्च रिपोर्ट में भारतीय जनता पार्टी ने बताया है कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में कुल 529 करोड़ रुपये खर्च किए गए। इनमें से 286 करोड़ रुपये सिर्फ बंगाल में खर्च किए गए। चुनाव खर्च के मामले में दूसरे नंबर पर असम और तीसरे नंबर पर केरल रहा। पश्चिम बंगाल में भाजपा ने पहली बार सरकार बनाई है। बता दें कि निर्वाचन आयोग के नियमों के मुताबिक, चुनाव के दौरान सभी उम्मीदवारों को नामांकन से लेकर परिणाम घोषित होने तक का व्यक्तिगत खर्च का ब्योरा देना होता है। चुनावी खर्च में वाहन किराया, नाश्ता-खाना और पोस्टर-बैनर आदि के लिए खर्च की गई रकम शामिल होती है। विधायक के चुनाव में यह खर्च सीमा 40 लाख रुपये है। इसके अलावा पार्टियां अपने स्तर से चुनावों में पैसे खर्च करती हैं। चुनावी रैलियों, कैंडिडेट को दी गई रकम, बड़े विज्ञापन, स्टार प्रचारकों के कार्यक्रम का खर्च पार्टी के खाते में जुड़ता है। रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव के दौरानभाजपाको 1494 करोड़ रुपये का चंदा मिला था। चुनाव के बादभाजपाके बैंक खातों में 7689.06 करोड़ रुपये बचे थे। भाजपा की खर्च रिपोर्ट के मुताबिक, मई के पांच राज्यों के चुनावों में भाजपा ने 529 करोड़ रुपये खर्च किए। बंगाल में कुल 286 करोड़ रुपये खर्च हुए, इनमें से प्रत्याशियों का हिस्सा 69.83 करोड़ रुपये है। पार्टी ने उम्मीदवारों को प्रचार के लिए 58.80 करोड़ रुपये दिए थे, जो कुल खर्च में शामिल है। पार्टी ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में कुल 294 विधानसभा सीटों पर कैंडिडेट उतारे थे और 207 सीटें जीतीं थीं। खर्च के मामले में दूसरे नंबर पर असम रहा, जहां भाजपा ने 96.26 करोड़ रुपये खर्च किए। पार्टी ने केरल में 82.67 करोड़ रुपये, तमिलनाडु में 51.56 करोड़ रुपये और पुडुचेरी में 11.89 करोड़ रुपये खर्च किए। चुनाव के बाद भाजपा ने पश्चिम बंगाल, असम और पुडुचेरी में सरकार बनाई थी। तमिलनाडु में उसे एक और केरल में 3 सीटों पर जीत मिली थी।

चैट जीपीटी ने बिछड़े बुजुर्ग को पोते से मिलाया

लुधियाना । 1200 किलोमीटर दूर पहुंच गए थे चमन लाल… लेकिन एक अनजान युवक ने हार नहीं मानी।
पंजाब के लुधियाना जिले के फतेहगढ़ गुजरां गांव के चमन लाल 11 सितंबर को श्री हरमंदिर साहिब के दर्शन के लिए अमृतसर गए थे। इसी दौरान वे अपने साथियों से बिछड़ गए और अमृतसर रेलवे स्टेशन पहुंच गए। गलती से बिहार जाने वाली ट्रेन में बैठ गए और आखिरकार 1200 किलोमीटर से ज्यादा दूर गया पहुंच गए।
गया में उनकी मुलाकात नीरज से हुई। चमन लाल परेशान और भूखे थे और अपना पूरा पता नहीं बता पा रहे थे। उन्हें सिर्फ अपने गांव का नाम याद था, फतेहगढ़ गुजरां।
नीरज उन्हें अपने घर ले गए, खाना खिलाया और करीब चार दिन तक अपने परिवार के साथ रखा। फिर शुरू हुई उन्हें उनके अपनों तक पहुंचाने की कोशिश।
नीरज ने करीब तीन दिन तक इंटरनेट और चैट जीपीटी की मदद से गांव के नाम के अलग-अलग तरीकों से खोजबीन की। आखिरकार उन्हें लुधियाना जिले में माछीवाड़ा साहिब के पास फतेहगढ़ गुजरां गांव का पता मिला।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
नीरज ने चमन लाल को अकेले वापस भेजने के बजाय खुद गया से पंजाब तक उनके साथ जाने का फैसला किया। माछीवाड़ा पहुंचकर उन्होंने लोगों को चमन लाल की तस्वीर दिखाई। एक स्थानीय व्यक्ति ने उन्हें पहचान लिया और बात परिवार तक पहुंची। कुछ ही देर में उनके पोते सुखचैन सिंह वहां पहुंचे और अपने दादा को पहचान लिया।
तकनीक ने गांव का रास्ता दिखाया, लेकिन चमन लाल को घर तक पहुंचाया नीरज की इंसानियत ने।
कभी-कभी किसी की मदद करने के लिए हमारे पास बहुत कुछ होना जरूरी नहीं होता, बस किसी अनजान इंसान के लिए रुकने और हार न मानने का दिल होना चाहिए।

13 साल बाद फिर राइटर्स बिल्डिंग में शुरु होगा राजकाज

-नवान्न से फिर सचिवालय की होगी वापसी

कोलकाता। पश्चिम बंगाल के ऐतिहासिक ‘राइटर्स बिल्डिंग’ एक बार फिर से गुलजार होने जा रहा है। एक बार फिर यहां से बंगाल का राजकाज चलेगा। ‘राइटर्स बिल्डिंग’ में प्रशासनिक कामकाज को पूर्ण रूप से सक्रिय करने की तैयारियां तेज कर दी गई हैं। राज्य का लोक निर्माण विभाग (पीडब्लूडी) इमारत के नवीनीकरण और विभिन्न कक्षों को तैयार करने के कार्य में तेजी से जुटा हुआ है।
नवीनीकरण की योजना के लिए अडानी समूह ने पूर्व हेरिटेज कमीशन सदस्य और वास्तुकार रंजन मित्रा को जिम्मेदारी सौंपी है। रंजन मित्रा राइटर्स बिल्डिंग का निरीक्षण भी कर चुके हैं। अब ऐतिहासिक इमारत की संरचना और विरासत को ध्यान में रखते हुए आगे की योजना तैयार की जा रही है। ऐसे में लोक निर्माण विभाग के मुताबिक, पिछली बार हुए नवीनीकरण के दौरान यूरोपीय टाइल्स समेत कई ऐतिहासिक वस्तुएं या तो नष्ट हो गईं या फिर उन्हें नुकसान पहुंचा। ऐसे में इस बार राइटर्स बिल्डिंग की ऐतिहासिक पहचान और वास्तुकला को सुरक्षित रखते हुए नवीनीकरण करना बड़ी चुनौती माना जा रहा है।
राइटर्स बिल्डिंग में मुख्यमंत्री सचिवालय के लिए निर्धारित हिस्से का काम पहले ही पूरा किया जा चुका है। अब तीसरी मंजिल पर मुख्यमंत्री सहित कम से कम छह मंत्रियों के बैठने की व्यवस्था तैयार की जा रही है। लोक निर्माण विभाग का लक्ष्य है कि उसके जिम्मे जो अधूरे काम बचे हैं, उन्हें 10 अक्टूबर तक पूरा कर लिया जाए।
राइटर्स बिल्डिंग में कई महत्वपूर्ण मंत्रियों के लिए भी कार्यालय तैयार किए जा रहे हैं। इनमें लोक निर्माण मंत्री अग्निमित्रा पॉल, पंचायत मंत्री दिलीप घोष, पर्यटन मंत्री शंकर घोष, स्वास्थ्य मंत्री शारद्वत मुखोपाध्याय और लोक निर्माण मंत्री अजय पोद्दार के कमरों की व्यवस्था शामिल है। महाकरण में प्रशासन के शीर्ष अधिकारियों के लिए भी कमरे तैयार किए जा रहे हैं। मुख्य सचिव और राज्य पुलिस के डीजी समेत अन्य महत्वपूर्ण पदाधिकारियों के लिए राइटर्स बिल्डिंग में कार्यालय तैयार करने का काम चल रहा है।
लोक निर्माण विभाग के पास मौजूद अधूरे कामों को 10 अक्टूबर तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। राइटर्स बिल्डिंग के व्यापक स्तर पर नवीनीकरण की जिम्मेदारी अडानी समूह को सौंपने की योजना पर भी विचार किया जा रहा है। साल 2013 में राज्य सचिवालय को हावड़ा स्थित ‘नवान्न’ इमारत में स्थानांतरित किए जाने के बाद से ही राइटर्स बिल्डिंग में बड़े पैमाने पर जीर्णोद्धार का काम चल रहा है। विभाग के अनुसार, लगभग 13 साल बीत जाने के बावजूद अब तक राइटर्स बिल्डिंग के नवीनीकरण का 50 प्रतिशत काम भी पूरा नहीं हो पाया है।
राइटर्स बिल्डिंग के नवीनीकरण में हो रही इस देरी को देखते हुए अब राज्य सरकार ने लंबित कार्यों को जल्द से जल्द पूरा करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं।

कैंसर की महंगी दवाओं पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

नयी दिल्ली, एजेंसी । कैंसर की महंगी दवाओं की कीमतों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद सख्त टिप्पणी की है।सर्वोच्च अदालत ने कहा कि कुछ कैंसर दवाओं को निर्माता कंपनियां रिटेलर को सिर्फ 2,700 रुपये में बेच रही हैं, लेकिन उन्हीं दवाओं पर 27,000 रुपये तक का एमआरपी छापा जा रहा है। अदालत ने इसे मरीजों के साथ “दिनदहाड़े डकैती” बताया और कहा कि मामला सिर्फ मरीजों के शोषण का नहीं है, बल्कि आयुष्मान भारत जैसी सरकारी योजनाओं के जरिए आखिरकार इसका भुगतान देश के करदाताओं के पैसे से भी किया जाता है। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने उस कीमत के अंतर पर सवाल उठाया, जिसमें निर्माता द्वारा रिटेलर को 2,700 रुपये में बेची जा रही दवा की अधिकतम खुदरा कीमत 27,000 रुपये तक दिखाई जा रही है। सर्वोच्च अदालत ने सुनवाई के दौरान आयुष्मान भारत जैसी सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं का भी जिक्र किया। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में अस्पताल दवाएं इसी एमआरपी या ऊंची कीमत पर खरीदते हैं और बाद में सरकार से भुगतान प्राप्त करते हैं।यानी जो पैसा दवाओं पर खर्च हो रहा है, उसका बड़ा हिस्सा अंततः सरकारी खजाने से जाता है। और सरकारी खजाने का मतलब है देश के करोड़ों करदाताओं का पैसा। कोर्ट ने साफ कहा कि इसलिए यह मुद्दा केवल मरीजों तक सीमित नहीं है, बल्कि सार्वजनिक धन के इस्तेमाल से भी जुड़ा हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे मामले में नियामक संस्थाओं और अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए।

ट्राई ने समझी ग्राहकों की परेशानी, सस्ते होंगे मोबाइल रिचार्ज

नयी दिल्ली ।  टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (ट्राई) ने मंगलवार को टेलीकॉम कंज्यूमर प्रोटेक्शन (तेरहवां संशोधन) रेगुलेशन, 2026 जारी किया। इसके तहत टेलीकॉम सर्विस प्रोवाइडर्स को खास तौर पर वॉयस और एसएमएस के लिए ज्यादा स्पेशल टैरिफ वाउचर देने होंगे। इस बदलाव का मकसद सिर्फ वॉयस और एसएमएस वाले एसटीवी की सीमित उपलब्धता, खासकर कम समय वाले ऑप्शन की कमी को दूर करना है। ट्राई ने देखा कि ऐसे वाउचर सीमित संख्या में उपलब्ध थे और ज्यादातर लंबी वैलिडिटी वाले थे, जिससे कम आय वाले कस्टमर्स के लिए कम कीमत वाले और कम समय वाले ऑप्शन कम थे। इस फैसले के बाद जहां भारती एयरटेल का शेयर 0.87 फीसदी की गिरावट के साथ 1817 रुपए पर बंद हुआ। वहीं दूसरी ओर वोडाफोन आइडिया के शेयरों में करीब 3 फीसदी की तेजी देखने को मिली और 14.26 रुपए पर बंद हुआ।
ट्राई ने दी बड़ी राहत
ट्राई ने 7 अप्रैल, 2026 को सलाह-मशविरे के लिए संशोधन का ड्राफ्ट जारी किया था। उसे स्टेकहोल्डर्स से 1,132 जवाब मिले और रेगुलेशन को अंतिम रूप देने से पहले 15 जून को ओपन हाउस डिस्कशन किया गया। संशोधित नियमों के तहत, टेलीकॉम सर्विस प्रोवाइडर्स को सिर्फ वॉयस और एसएमएस वाले एसटीवी देने होंगे। इसके लिए टैरिफ में उचित कटौती करनी होगी, खासकर उन वैलिडिटी पीरियड के लिए (30 दिन या उससे कम) जिनके लिए वे वॉयस, एसएमएस और डेटा वाले एसटीवी देते हैं। ऑपरेटर्स को सिर्फ वॉयस और एसएमएस वाला ऐसा एसटीवी भी देना होगा जिसकी वैलिडिटी हर महीने उसी तारीख को रिन्यू हो सके। अगर किसी महीने में वह तारीख नहीं आती है, तो रिन्यूअल की तारीख उस महीने का आखिरी दिन होगी। इसके अलावा, ऑपरेटर्स को ऊपर बताए गए ऑप्शन से ज्यादा वैलिडिटी वाला कम से कम एक सिर्फ वॉयस और एसएमएस वाला एसटीवी देना होगा, जो वॉयस, एसएमएस और डेटा वाले एसटीवी की वैलिडिटी पीरियड के बराबर हो।
मिलेगी बड़ी राहत
ट्राई ने कहा कि संशोधित टैरिफ फ्रेमवर्क से कम आय वाले कस्टमर्स को ज्यादा ऑप्शन मिलेंगे और वे अपनी जरूरतों और आर्थिक क्षमता के हिसाब से रिचार्ज कर सकेंगे। अथॉरिटी का मानना है कि ऐसा टैरिफ फ्रेमवर्क ग्राहकों की जरूरतों को अच्छी तरह से पूरा करेगा। यह संशोधित रेगुलेशन कम आय वाले ग्राहकों को ज्यादा ऑप्शन देगा, जिससे वे अपनी जरूरतों और आर्थिक क्षमता के अनुसार रिचार्ज कर सकेंगे।

भवानीपुर में प्रोजेक्ट पिच-लाइफ विषय पर सेमिनार

-भवानीपुर एजुकेशन सोसायटी कॉलेज और बोर्ड आफ स्टडीज अकेडमी के संयुक्त आयोजन

कोलकाता । भवानीपुर एजुकेशन सोसायटी कॉलेज द्वारा 22 सितंबर 2026 को “संभावना – पिच – प्रदर्शन – प्रगति: कॉर्पोरेट अनुभव – एजीएम के लिए बैंक मूल्यांकन” शीर्षक से एक संयुक्त सेमिनार आयोजित किया गया था। कार्यक्रम की कल्पना एक अनुभवात्मक शैक्षणिक पहल के रूप में की गई थी जिसका उद्देश्य छात्रों को कॉर्पोरेट और वित्तीय पारिस्थितिकी तंत्र की व्यावहारिक समझ प्रदान करना और उन्हें कॉर्पोरेट निर्णय लेने और शासन में शामिल विभिन्न चरणों से परिचित करवाना था।

उद्घाटन समारोह में दीप प्रज्ज्वलित कर रेक्टर और डीन प्रो दिलीप शाह और वाइस प्रिंसिपल प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी,सीए हरिराम अग्रवाल और सीए मयूर अग्रवाल एवं गणमान्य अतिथियों की उपस्थिति रही। प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी ने स्वागत वक्तव्य दिया। सभी प्रमुख अतिथियों ने अपने वक्तव्य रखे।
सेमिनार में छात्रों को वास्तविक दुनिया के कॉर्पोरेट अनुभवों, विशेष रूप से बैंक मूल्यांकन, कॉर्पोरेट वित्त, व्यावसायिक प्रदर्शन और वार्षिक आम बैठकों (एजीएम) के संबंध में उजागर करके कक्षा में सीखने और पेशेवर अभ्यास के बीच अंतर को पाटने का प्रयास किया गया। कार्यक्रम ने एक इंटरैक्टिव मंच प्रदान किया जहां छात्र वित्त, बैंकिंग और कॉर्पोरेट प्रशासन के व्यावहारिक पहलुओं से जुड़ सकते थे।
प्रतिष्ठित गणमान्य व्यक्तियों और वक्ताओं की उपस्थिति और योगदान ने कार्यक्रम के शैक्षणिक मूल्य को समृद्ध किया। उनकी अंतर्दृष्टि और पेशेवर अनुभवों ने छात्रों को वित्तीय संस्थानों और कॉर्पोरेट संगठनों के कामकाज पर मूल्यवान दृष्टिकोण प्रदान किए। सत्रों ने छात्रों को इस बात की सराहना करने के लिए प्रोत्साहित किया कि सैद्धांतिक अवधारणाओं को पेशेवर प्रथाओं और सूचित निर्णय लेने में कैसे अनुवादित किया जाता है।
कार्यक्रम का विशेष आकर्षक घटक मॉक एजीएम था, जो छात्रों को वार्षिक आम बैठक की कार्यवाही और कार्यप्रणाली की अनुभवात्मक समझ प्रदान करता था। सिमुलेशन ने प्रतिभागियों को कॉर्पोरेट संचार, विचार-विमर्श, हितधारक भागीदारी और औपचारिक निर्णय लेने की प्रक्रियाओं से परिचित होने में सक्षम बनाया।
मॉक एजीएम की उत्कृष्ट स्क्रिप्टिंग के लिए सुश्री तृप्ति उपाध्याय की विशेष सराहना की जाती है। उनकी विचारशील योजना और रचनात्मक निष्पादन ने इस खंड को छात्रों के लिए जानकारीपूर्ण, आकर्षक और व्यावहारिक रूप से प्रासंगिक बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
कार्यक्रम को संकाय सदस्यों, छात्र स्वयंसेवकों और प्रतिभागियों की उत्साहपूर्ण भागीदारी और सहयोग से भी बहुत फायदा हुआ, जिनके सामूहिक प्रयासों ने सेमिनार के सुचारू और सफल संचालन को सुनिश्चित किया।
इसलिए प्रोजेक्ट- पिच-लाइफ के तहत संयुक्त सेमिनार एक सार्थक शैक्षणिक पहल थी जिसने वित्तीय साक्षरता, कॉर्पोरेट एक्सपोज़र और अनुभवात्मक शिक्षा को सफलतापूर्वक संयोजित किया। इस अवसर पर छात्रों को सैद्धांतिक अवधारणाओं से परे देखने और पेशेवर माहौल की बेहतर समझ विकसित करने का अवसर प्रदान किया, जिससे उनकी समग्र शैक्षणिक और कैरियर की तैयारी में योगदान हुआ। डॉ वसुंधरा मिश्र ने बताया कि आयोजक और संयोजकों में सीए विवेक पटवारी का विशेष योगदान रहा।कार्यक्रम को सफल बनाने में बहुमूल्य योगदान देने वालोंऔर समर्थन के लिए सभी गणमान्य व्यक्तियों, वक्ताओं, संकाय सदस्यों, छात्र स्वयंसेवकों और प्रतिभागियों के प्रति अपनी हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त की।

पर्यटकों के लिए खुला शांतिनिकेतन गृह

– हेरिटेज वॉक में दिखेगी टैगोर की विरासत की झलक

बोलपुर । रवींद्रनाथ टैगोर की स्मृतियों और उनकी ऐतिहासिक विरासत को अपने भीतर समेटे शांतिनिकेतन में अब पर्यटकों के लिए एक और महत्वपूर्ण दरवाजा खुल गया है। 19 सितंबर 2026 से शांतिनिकेतन गृह को हेरिटेज वॉक के माध्यम से पर्यटकों के लिए खोल दिया गया है। छह साल से अधिक समय तक बंद रहने के बाद इस ऐतिहासिक भवन में पर्यटकों की आवाजाही शुरू होना शांतिनिकेतन की विरासत को करीब से जानने वालों के लिए महत्वपूर्ण खबर है।

उल्लेखनीय है कि शांतिनिकेतन की खासियत यही है कि यहां इतिहास सिर्फ संग्रहालय में बंद नहीं है—यहां की मिट्टी, पेड़, भवन, संगीत, कला और शिक्षा की परंपरा आज भी टैगोर की उस सोच की कहानी सुनाती है, जिसने बोलपुर के इस छोटे से इलाके को दुनिया के सांस्कृतिक मानचित्र पर अलग पहचान दी। शांतिनिकेतन गृह को शांतिनिकेतन परिसर का सबसे पुराना ईंटों से बना मकान माना जाता है।

वर्ष 1862 में महर्षि देवेंद्रनाथ टैगोर ने इस स्थान को खरीदा था। बाद में यही परिसर टैगोर परिवार की गतिविधियों और शांतिनिकेतन के विकास का महत्वपूर्ण केंद्र बना। रवींद्रनाथ टैगोर ने वर्ष 1901 में ब्रह्मचर्याश्रम की शुरुआत की, जिसने आगे चलकर विश्वभारती की विचारधारा और शिक्षा-पद्धति की नींव तैयार की। अब हेरिटेज वॉक के दौरान पर्यटक शांतिनिकेतन गृह को देख सकेंगे।  यहां आने वाले लोगों को सिर्फ एक पुराना भवन देखने का मौका नहीं मिलेगा, बल्कि वे उस ऐतिहासिक वातावरण को महसूस कर सकेंगे, जहां से टैगोर की शिक्षा, साहित्य, कला और प्रकृति-केंद्रित विचारधारा की एक महत्वपूर्ण यात्रा आगे बढ़ी।

शांतिनिकेतन आने वाले पर्यटकों के लिए उत्तरायण परिसर सबसे महत्वपूर्ण आकर्षणों में से एक है। यहां रवींद्रनाथ टैगोर से जुड़े उदयन, श्यामली, पुनश्च, कोणार्क और उदिची जैसे भवन हैं। इन भवनों की वास्तुकला एक-दूसरे से अलग है और इनमें टैगोर के जीवन, उनकी कला और उनके प्रयोगों की झलक दिखाई देती है।

विश्वभारती की योजना के अनुसार पूजा की छुट्टियों के बाद इन ऐतिहासिक भवनों को भी पर्यटकों के लिए खोलने की दिशा में काम किया जा रहा है। इससे आने वाले समय में शांतिनिकेतन का हेरिटेज सर्किट और विस्तृत हो सकता है।

शांतिनिकेतन की पहचान केवल टैगोर के आवासीय भवनों से नहीं है। यहां छातिमतला, उपासना गृह, बकुलबीथि, घंटातला, आम्रकुंज, पाठ भवन और सिंह सदन जैसे कई ऐतिहासिक स्थल हैं।

उपासना गृह अपनी कांच की दीवारों और विशिष्ट वास्तुकला के कारण आकर्षण का केंद्र है। वहीं छातिमतला शांतिनिकेतन के शुरुआती आध्यात्मिक इतिहास से जुड़ा महत्वपूर्ण स्थल है। आम के पेड़ों से घिरा आम्रकुंज और खुले वातावरण में शिक्षा की परंपरा यह बताती है कि टैगोर की नजर में शिक्षा केवल कक्षा और किताबों तक सीमित नहीं थी।

रवींद्रनाथ टैगोर ने शांतिनिकेतन में ऐसी शिक्षा व्यवस्था की कल्पना की जिसमें प्रकृति, संगीत, साहित्य, चित्रकला, नृत्य और संस्कृति को शिक्षा का हिस्सा बनाया गया। खुले वातावरण में पढ़ाई और प्रकृति के बीच सीखने की परंपरा शांतिनिकेतन की सबसे अलग पहचान बनी।

इसी सोच ने आगे चलकर शांतिनिकेतन को भारतीय और अंतरराष्ट्रीय कला-संस्कृति के महत्वपूर्ण केंद्रों में शामिल किया। कला भवन और संगीत भवन ने इस सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

शांतिनिकेतन की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता को अंतरराष्ट्रीय पहचान तब मिली, जब 2023 में इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया। यूनेस्को ने शांतिनिकेतन को टैगोर की शिक्षा और मानवतावादी विचारों से विकसित उस परिसर के रूप में मान्यता दी, जहां प्रकृति, कला और शिक्षा का अनूठा मेल देखने को मिलता है।

अब 19 सितंबर से शांतिनिकेतन गृह को हेरिटेज वॉक में शामिल किए जाने के बाद पर्यटकों को इस विरासत को और करीब से देखने का अवसर मिलेगा। आने वाले दिनों में उत्तरायण परिसर के अन्य ऐतिहासिक भवन भी पर्यटकों के लिए खुलते हैं तो बोलपुर आने वाले लोगों के लिए यह पूरा इलाका एक विस्तृत टैगोर हेरिटेज सर्किट के रूप में विकसित हो सकता है।

बिड़ला समूह ने दिए बंगाल में निवेश बढ़ाने के संकेत

कोलकाता  ।  पश्चिम बंगाल में आदित्य बिड़ला समूह के निवेश और मौजूदा संयंत्रों के विस्तार को लेकर गत रविवार को भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य और आदित्य बिरला समूह के चेयरपर्सन कुमार मंगलम बिड़ला के बीच मुलाकात हुई। बैठक के बाद शमिक भट्टाचार्य ने बताया कि बातचीत के दौरान पश्चिम बंगाल में बिड़ला समूह के निवेश और उसके मौजूदा प्लांट्स के विस्तार को लेकर चर्चा हुई। उन्होंने कहा कि कुमार मंगलम बिड़ला ने बंगाल में निवेश बढ़ाने और अपनी औद्योगिक गतिविधियों के विस्तार में रुचि दिखाई है।

शमिक भट्टाचार्य के अनुसार, सरकार बदलने के बाद उन्होंने कुमार मंगलम बिड़ला को पत्र लिखकर पश्चिम बंगाल में निवेश बढ़ाने का आग्रह किया था। उन्होंने कहा था कि राज्य में उद्योग और निवेश के लिए अनुकूल माहौल तैयार करने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं और बिड़ला समूह को भी बंगाल में अपनी गतिविधियों का विस्तार करना चाहिए। इसके बाद कुमार मंगलम बिड़ला की ओर से सकारात्मक जवाब मिला और रविवार को दोनों के बीच मुलाकात हुई।

शमिक ने बताया कि बैठक सकारात्मक रही और पश्चिम बंगाल में बिड़ला समूह के मौजूदा कारोबार तथा संयंत्रों के विस्तार की संभावनाओं पर चर्चा हुई। उन्होंने कहा कि बिड़ला परिवार का पश्चिम बंगाल से पुराना संबंध रहा है और कारोबारी गतिविधियों के अलावा सामाजिक एवं संस्थागत स्तर पर भी परिवार की राज्य में मौजूदगी रही है। शमिक ने यह भी कहा कि अतीत में श्रमिक आंदोलन और औद्योगिक परिस्थितियों के कारण आदित्य विक्रम बिड़ला को अपना कार्यालय मुंबई स्थानांतरित करना पड़ा था, हालांकि बिरला परिवार का बंगाल से जुड़ाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ।

शमिक भट्टाचार्य ने बताया कि कुमार मंगलम बिड़ला के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात करने की संभावना है। उन्होंने कहा कि उन्होंने स्वयं बिड़ला से मुख्यमंत्री से मिलने का आग्रह किया है और बिड़ला भी मुख्यमंत्री से मुलाकात के इच्छुक हैं। प्रस्तावित बैठक में पश्चिम बंगाल में नए निवेश, मौजूदा उद्योगों के विस्तार और राज्य में औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ावा देने से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है।

 

खतरे में कूचबिहार की  300-500 साल पुरानी तालपत्र पांडुलिपियां

कूचबिहार ।  कूचबिहार में राजकालीन धार्मिक परंपरा की महत्वपूर्ण धरोहर मानी जाने वाली दो दुर्लभ तालपत्र पांडुलिपियां संरक्षण के अभाव में धीरे-धीरे नष्ट होने की कगार पर पहुंच गई हैं। इन पांडुलिपियों में दर्ज मंत्रों और पूजा-विधियों के आधार पर सदियों से मदनमोहन और बड़ादेवी की आराधना की जाती रही है। ऐसे में इनके पन्नों के पूरी तरह नष्ट होने पर इन प्राचीन पूजा-पद्धतियों को मूल शास्त्रीय विधि के अनुसार समझना और आगे जारी रखना मुश्किल हो सकता है।

कूचबिहार देवत्र ट्रस्ट बोर्ड के संरक्षण में रखी इन पांडुलिपियों को राजकालीन परंपरा से जुड़ी महत्वपूर्ण धरोहर माना जाता है। शोधकर्ताओं के एक वर्ग के अनुसार इनकी उम्र करीब 300 से 500 वर्ष तक हो सकती है। खासकर मदनमोहनबाड़ी में प्राचीन काल से चली आ रही तांत्रिक पूजा-पद्धति से इनके जुड़ाव को महत्वपूर्ण माना जाता है। यह पूजा सामान्य वैष्णव परंपरा से अलग बताई जाती है।

दुर्लभ मंत्रों की नहीं है दूसरी प्रति – इन पांडुलिपियों का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि तालपत्र पर लिखे दुर्लभ मंत्रों की कोई दूसरी प्रति उपलब्ध नहीं बताई जाती। इसलिए इनके नष्ट होने का अर्थ केवल एक प्राचीन दस्तावेज का समाप्त होना नहीं होगा, बल्कि उन मंत्रों और पूजा-विधियों से संबंधित मूल सामग्री का भी लुप्त होना होगा। पत्तियां पूरी तरह नष्ट होने पर भविष्य में इन मंत्रों और पूजा-विधि को मूल रूप में समझना तथा उसी शास्त्रीय प्रक्रिया के अनुसार पूजा करना बेहद कठिन हो सकता है।

प्राचीन लिपि में संस्कृत, कलात्मक आवरण भी खास -पांडुलिपियां संस्कृत भाषा में लिखी गई हैं, लेकिन इनमें इस्तेमाल लिपि पारंपरिक देवनागरी से अलग है। अक्षरों में प्राचीन बंगाल और कामरूपी शैली की झलक दिखाई देती है। इससे इनका महत्व धार्मिक होने के साथ-साथ ऐतिहासिक और भाषाई दृष्टि से भी बढ़ जाता है। इनमें से एक पांडुलिपि करीब 18 इंच लंबी और छह इंच चौड़ी बताई जाती है। इसके ऊपर और नीचे लकड़ी के मजबूत आवरण लगे हैं। इन आवरणों पर कभी रंगीन बेल-बूटों की नक्काशी हुआ करती थी, लेकिन समय के साथ इसकी चमक फीकी पड़ गई है। आवरण के अंदर एक ओर बड़ादेवी के स्वरूप से मिलती-जुलती मां दुर्गा की तस्वीर बनी है, जबकि दूसरी ओर पुरुष योद्धाओं और दो वीरांगनाओं के बीच युद्ध का दृश्य अंकित है। इस कारण पांडुलिपि तत्कालीन कला और सांस्कृतिक परंपरा का भी महत्वपूर्ण प्रमाण मानी जाती है।

विशेष अवसरों पर ही निकाली जाती हैं पांडुलिपियां – इन पांडुलिपियों का इस्तेमाल रोजाना की पूजा में नहीं किया जाता। स्नान यात्रा और उत्थान एकादशी जैसे विशेष धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान एक पांडुलिपि को गर्भगृह से बाहर निकाला जाता है। दूसरी पांडुलिपि केवल बड़ादेवी की शारदीय पूजा के दौरान निकाली जाती है। वर्ष के अन्य समय इन्हें मदनमोहन के गर्भगृह में लाल कपड़े में लपेटकर सुरक्षित रखा जाता है।

2022 में शुरू हुई थी संरक्षण की पहल -पांडुलिपियों के संरक्षण की जरूरत को देखते हुए वर्ष 2022 में प्रशासनिक स्तर पर पहल शुरू हुई थी। हालांकि, आगे चलकर यह मामला कथित तौर पर फाइलों तक ही सीमित रह गया। इतने महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेजों के संरक्षण में देरी को लेकर अब सवाल उठ रहे हैं। लंबे समय तक वैज्ञानिक संरक्षण के अभाव में तालपत्र और उस पर लिखी स्याही के और क्षतिग्रस्त होने की आशंका बनी हुई है।

300 से 500 वर्ष पुरानी होने का अनुमान – इतिहास शोधकर्ता स्वप्नकुमार राय के मुताबिक इन पांडुलिपियों के कई सौ वर्ष पुराने होने में कोई संदेह नहीं है। उनके अनुसार महाराजा शिवेंद्रनारायण के समय बड़ादेवी की पूजा पद्धति में कुछ संशोधन हुए थे। संभव है कि उसी दौरान संबंधित पांडुलिपि को नए सिरे से लिखा गया हो। इस आधार पर एक पांडुलिपि की उम्र कम से कम 300 वर्ष होने की संभावना है। उनका कहना है कि मदनमोहन से संबंधित पांडुलिपि इससे भी पुरानी हो सकती है। हालांकि, वास्तविक उम्र निर्धारित करने के लिए विशेषज्ञों की मदद से तालपत्र और उसमें इस्तेमाल की गई स्याही की कार्बन डेटिंग कराने की आवश्यकता है। इससे पांडुलिपियों की सही कालावधि निर्धारित करने में मदद मिल सकती है।

प्रशासन अब डिजिटाइजेशन और वैज्ञानिक संरक्षण करेगा – कूचबिहार के जिलाधिकारी जितिन यादव ने बताया कि उन्हें इस विषय की पहले जानकारी नहीं थी। उन्होंने कहा कि राजकालीन इन ऐतिहासिक पांडुलिपियों को किसी भी तरह नष्ट होने से बचाने के लिए जल्द से जल्द डिजिटाइजेशन और वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण की व्यवस्था की जाएगी।पांडुलिपियों के साथ जुड़ा है इतिहास –इन दोनों तालपत्र पांडुलिपियों का महत्व केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। इनके साथ कूचबिहार राजपरिवार की सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा, प्राचीन लिपि, कला, साहित्य और पूजा-पद्धति का इतिहास जुड़ा हुआ है। पांडुलिपियों में दर्ज सामग्री और उनके कलात्मक आवरण उस दौर के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन की भी झलक देते हैं।

ऐसे में इनके संरक्षण का सवाल केवल दो पुराने दस्तावेजों को बचाने का नहीं, बल्कि उनसे जुड़ी पूरी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने का है। यदि समय रहते इन्हें वैज्ञानिक तरीके से संरक्षित नहीं किया गया, तो तालपत्र के साथ इतिहास के कई अनमोल पन्ने भी हमेशा के लिए खो सकते हैं।

(साभार – हिन्दुस्थान समाचार)

बंगाल के 64 सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों से करोड़ों रुपये के चिकित्सा उपकरण गायब

– स्वास्थ्य विभाग ने दिए एफआईआर के सख्त निर्देश

कोलकाता । ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाने के उद्देश्य से करोड़ों रुपये खर्च कर खरीदे गए चिकित्सा उपकरणों के पुर्जे रहस्यमय तरीके से गायब होने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। इस बड़ी लापरवाही को बेहद गंभीरता से लेते हुए राज्य स्वास्थ्य विभाग ने सभी जिलों के मुख्य चिकित्सा अधिकारियों को पंद्रहवें वित्त आयोग के फंड से खरीदे गए चिकित्सा उपकरणों की चोरी के मामलों में तत्काल एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया है।

स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार, राज्य के 12 जिलों के 64 सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में चिकित्सा उपकरणों की चोरी की घटनाएं दर्ज की गई हैं। इन 64 सरकारी संस्थानों में 50 उप-स्वास्थ्य केंद्र, 13 ब्लॉक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र शामिल हैं। इस सूची में हावड़ा जिला सबसे ऊपर है, जहां 25 स्वास्थ्य केंद्रों में ऐसी घटनाएं सामने आई हैं। हावड़ा के इन मामलों में से 18 स्वास्थ्य केंद्र संकराइल में स्थित हैं, जबकि बाकी सात श्यामपुर दो नंबर ब्लॉक के अंतर्गत आते हैं।

गौरतलब है कि कोरोना महामारी के दौरान ग्रामीण स्तर पर चिकित्सा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए वर्ष 2021-22 में पंद्रहवें वित्त आयोग ने इन उपकरणों की खरीद के लिए विशेष धनराशि आवंटित की थी। यह भारी-भरकम राशि राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन परियोजना के तहत मंजूर की गई थी। करोड़ों रुपये की लागत से खरीदे गए इन जीवन रक्षक उपकरणों के उचित रखरखाव और उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए वर्ष 2024 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तत्कालीन निदेशक ने सभी जिलाधिकारियों और मुख्य चिकित्सा अधिकारियों को एक आधिकारिक पत्र भी भेजा था।

स्वास्थ्य विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस पूरे प्रकरण को दुर्भाग्यपूर्ण करार देते हुए कहा कि आम लोगों की जान बचाने और उन्हें सुविधा देने के लिए महामारी के समय ये सामग्रियां भेजी गई थीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि जिन लोगों को ये उपकरण सौंपे गए थे, इस चोरी की पूरी जिम्मेदारी उन्हीं को लेनी होगी।