Monday, September 21, 2026
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बंगाल के अस्पतालों के 100 मीटर दायरे में बीड़ी-सिगरेट और गुटखा बैन

कोलकाता। पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्य के स्वास्थ्य ढांचे को सुदृढ़ करने और अस्पतालों के आसपास स्वच्छ व धुएं रहित वातावरण सुनिश्चित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक और सख्त कदम उठाया है। राज्य के स्वास्थ्य मंत्री शारद्वत मुखोपाध्याय ने तमलुक में बड़ा ऐलान करते हुए घोषणा की है कि बंगाल के सभी सरकारी व निजी अस्पतालों के 100 मीटर के दायरे में बीड़ी, सिगरेट, गुटखा, खैनी और अन्य तंबाकू उत्पादों की बिक्री एवं सेवन पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया है। इस महत्वपूर्ण निर्णय की घोषणा करते हुए स्वास्थ्य मंत्री ने स्पष्ट किया कि अस्पतालों के प्रवेश द्वार और आसपास तंबाकू की दुकानें और धुएं का गुबार मरीजों तथा उनके तीमारदारों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन रहा था, जिस पर अब पूर्णविराम लगाया जा रहा है। स्वास्थ्य मंत्री शारद्वत मुखोपाध्याय ने यह भी घोषणा की कि अस्पतालों के इंडोर वार्डों में मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर भी सख्ती बरती जाएगी। उनका कहना था कि मरीजों के उपचार और अस्पताल के अनुशासन को ध्यान में रखते हुए यह कदम उठाया जा रहा है। मीडिया कर्मियों से बातचीत में स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि राज्य सरकार अस्पतालों की व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए लगातार निरीक्षण कर रही है। उन्होंने कहा कि अस्पतालों में यदि डॉक्टरों, नर्सों और कर्मचारियों के कार्य व्यवहार में सुधार नहीं हुआ तथा दलालों की गतिविधियां बंद नहीं हुईं, तो संबंधित लोगों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी। स्वास्थ्य मंत्री ने यह भी घोषणा की कि अस्पतालों के इंडोर वार्डों में मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर भी सख्ती बरती जाएगी। उनका कहना था कि मरीजों के उपचार और अस्पताल के अनुशासन को ध्यान में रखते हुए यह कदम उठाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि सरकार का उद्देश्य केवल नियम बनाना नहीं बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक पारदर्शी, सुरक्षित और मरीजों के अनुकूल बनाना है। निरीक्षण के आधार पर तैयार रिपोर्ट के अनुसार आवश्यक सुधार लागू किए जाएंगे ताकि अस्पतालों में बेहतर चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकें। स्वास्थ्य मंत्री ने विश्वास जताया कि मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में पश्चिम बंगाल की स्वास्थ्य व्यवस्था को चरणबद्ध तरीके से और अधिक मजबूत, आधुनिक तथा जनहितैषी बनाया जाएगा। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में अस्पतालों में अनुशासन, पारदर्शिता और मरीजों की सुविधा सर्वोच्च प्राथमिकता होगी।

 

हिन्‍दी-जीवनव्रती पद्मश्री कैलाशचन्‍द्र पंत

विजयदत्‍त श्रीधर

हिन्‍दी-जीवनव्रती श्री कैलाशचन्‍द्र पंत अब हमारे बीच नहीं हैं। 31 जुलाई, 2026 को वे ब्रह्मलीन हुए। दादा के संबोधन से देशभर में लोकप्रिय पंत जी मध्‍यप्रदेश के सार्वजनिक जीवन की ऐसी विभूति थे जिन्‍हें हर वर्ग और हर आयु के लोगों का आदर और विश्‍वास मिला। अनन्‍य हिन्‍दी सेवा के लिए श्री कैलाशचन्‍द्र पंत को वर्ष 2026 के पद्मश्री अलंकरण से विभूषित किया गया । सबको एहसास हुआ कि सर्वथा सुपात्र समाजसेवी की सुदीर्घ साधना को सम्‍मानित किया गया है।
श्री कैलाशचन्‍द्र पंत ने मध्‍यप्रदेश में राष्‍ट्रभाषा प्रचार समिति के ध्‍वज तले सेवा और सरोकार का जो समीकरण रचा, उसका सबसे उल्‍लेखनीय तथ्‍य है कि हिन्‍दी-सेवा के लिए दादा कैलाशचन्‍द्र पंत ने अपने व्‍यक्तित्‍व और कृतित्‍व में अंतर्निहित तीन बड़ी संभावनाओं का लगभग परित्‍याग कर दिया। साठ के दशक में मेधावी छात्र के रूप में स्‍नातकोत्‍तर उपाधि अर्जित करने वाले पंत जी, किसी भी विश्‍वविद्यालय में सफल प्राध्‍यापक हो सकते थे। उनकी भाषा और शैली, तथ्‍य-निरूपण और कथ्‍य-कला पंत जी को पत्रकार जगत में प्रतिष्ठित करने में समर्थ होती। उनका लिखा हुआ गद्य जिन्‍होंने पढ़ा है वे निस्‍संकोच स्‍वीकार करेंगे कि श्री कैलाशचन्‍द्र पंत हिन्‍दी के समर्थ निबंधकार होते। किंतु यह उनकी वैयक्तिक उपलब्धि होती। पंत जी ने अपने व्‍यष्ठि के स्‍थान पर समष्ठि को वरीयता दी। उन्‍होंने आजीवन हिन्‍दी सेवा का व्रत लिया। इस व्रत का परिपालन करने में दादा का जो गुण आधारभूत सिद्ध हुआ, वह है लोकसंग्रह की उनकी उदात्‍त प्रकृति। इसी गुण के कारण वे अपने चहुँओर और दूर-दूर तक एक वृहद परिवार रच सके।
जब शिक्षा आधुनिक नहीं हुई थी, तब स्कूल में पढ़ा था- “तरुवर फल नहिं खात हैं, सरुवर पियहिं न पान” अर्थात् वृक्ष अपने फल खुद नहीं खाते (दूसरों को खाने के लिए फल देते हैं), सरोवर (जल स्रोत) स्वयं अपना पानी नहीं पीते अर्थात् उनमें प्रवहमान और संचित जल दूसरों की प्यास बुझाने के लिए होता है। मानव जीवन में भी कतिपय ऐसे सज्जन होते हैं जो अपने आचार-विचार और व्यवहार से समस्त समाज के हो जाते हैं। उनके सोच के दायरे में सबका कल्याण समाहित होता है। भोपाल के सांस्कृतिक परिदृश्य में ऐसा ही एक नाम दादा कैलाशचन्द्र पंत का है। वे अजातशत्रु थे । इसीलिए सब उनके थे और वे सबके थे।

दादा के परिवार में घुले-मिले इन 50 सालों में उनके बहुविध स्वरूपों का साक्षात्कार हुआ। सन् 1977 में दादा कैलाशचन्द्र पंत ने साप्ताहिक’ जनधर्म’ का सम्पादन-प्रकाशन आरम्भ किया। ‘जनधर्म’ के कई विशेषांक उन्होंने निकाले, जो सन्दर्भ की दृष्टि से स्थाई महत्त्व के हैं। ‘जनधर्म’ ने मध्यप्रदेश के किसी श्रेष्ठ साहित्यकार को प्रतिवर्ष ‘सारस्वत सम्मान’ से अलंकृत करने की परम्परा आरम्भ की थी।
अपने गुरु श्री बैजनाथप्रसाद दुबे के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में दादा कैलाशचन्द्र पंत ने मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, हिन्दी भवन न्‍यास, भोपाल के मंत्री- संचालक का दायित्व जिस लगन, कल्पनाशीलता और समर्पण के साथ निभाया, उसने हिन्दी भवन को हिन्दी और संस्कृति विषयक गतिविधियों में देश की अग्रणी संस्थाओं में प्रतिष्ठित किया है।
जनसंपर्क मध्‍यप्रदेश ने श्री कैलाशचन्‍द्र पंत को ‘गणेशशंकर विद्यार्थी ‘ सम्‍मान से पुरस्‍कृत किया। विश्‍व हिन्‍दी सम्‍मेलन में दादा को ‘हिन्‍दी सेवी सम्‍मान’ प्रदान किया गया। केन्‍द्रीय हिन्‍दी संस्‍थान का ‘सुब्रमण्‍यम् भारतीय सम्‍मान’ उन्‍हें मिला। सप्रे संग्रहालय के ‘लाल बलदेव सिंह सम्‍मान’ और शताब्‍दी समारोह में ‘कर्मवीर सम्‍मान’ से उन्‍हें सम्‍मानित किया गया।
निश्‍चय ही दादा कैलाशचन्‍द्र पंत जैसा विशाल स्‍नेही परिवार मध्‍यप्रदेश में कोई और नहीं रच पाया। इसी का प्रतिफल है कि समाज ने पंत जी को मान-सम्‍मान और अपनापन देने में कोई कसर बाकी नहीं रखी।

-संस्‍थापक, ज्ञानतीर्थ सप्रे संग्रहालय
मो. 7999460151, 9425011467
ईमेल : [email protected]

प्रेमचंद का साहित्य सामाजिक चेतना का जीवंत दस्तावेज़ : डॉ. बृजराज सिंह

कोलकाता । उमेशचंद्र कॉलेज, कोलकाता के हिंदी विभाग तथा आंतरिक गुणवत्ता मूल्यांकन समिति (आईक्यूएसी) के संयुक्त तत्वावधान में सोमवार को कॉलेज के सेमिनार कक्ष में ‘प्रेमचंद को क्यों पढ़े’- राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ। संगोष्ठी में वक्ताओं ने प्रेमचंद के साहित्य की समकालीन प्रासंगिकता, सामाजिक सरोकारों तथा मानवीय मूल्यों पर विस्तार से विचार व्यक्त किए।कार्यक्रम का शुभारंभ महान कथाकार प्रेमचंद के चित्र पर माल्यार्पण एवं पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया। अध्यक्षीय संबोधन में कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. मो. तफ़ज्जल हक़ ने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य आज भी समाज को नई दिशा देने की क्षमता रखता है। उनकी रचनाएँ सामाजिक विषमताओं, मानवीय संवेदनाओं और नैतिक मूल्यों की सशक्त अभिव्यक्ति हैं तथा नई पीढ़ी को सामाजिक उत्तरदायित्व का बोध कराती हैं।संगोष्ठी के बीज वक्तव्य एवं स्वागत भाषण में हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. कमल कुमार ने कहा कि प्रेमचंद ने हिंदी कथा-साहित्य को यथार्थवादी दृष्टि प्रदान करते हुए साहित्य को जनजीवन से जोड़ा। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य केवल साहित्यिक धरोहर नहीं, बल्कि भारतीय समाज का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दस्तावेज़ भी है। मुख्य वक्ता दयालबाग एजुकेशनल इंस्टीट्यूट, आगरा के हिंदी विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. बृजराज सिंह ने ‘प्रेमचंद को क्यों पढ़ें’ विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा कि प्रेमचंद का साहित्य मानवीय संवेदना, सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय चेतना का जीवंत दस्तावेज़ है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में प्रेमचंद की रचनाएँ पहले से अधिक प्रासंगिक हैं और विद्यार्थियों को उनके साहित्य का गंभीर अध्ययन करना चाहिए। बांग्ला विभाग की डॉ. सोनाली चक्रवर्ती ने बांग्ला साहित्य और समाज में प्रेमचंद की लोकप्रियता तथा उनके साहित्य के प्रभाव पर प्रकाश डालते हुए भारतीय भाषाओं के मध्य साहित्यिक संवाद की आवश्यकता पर बल दिया। इस अवसर पर कॉलेज की पुस्तकाध्यक्ष डॉ. कावेरी कर्मकार द्वारा प्रेमचंद पर आधारित प्रसार भारती संग्रहालय के एक वृत्तचित्र का प्रदर्शन किया गया, जिसे उपस्थित विद्यार्थियों एवं शिक्षकों ने अत्यंत रुचि के साथ देखा। कार्यक्रम का संचालन एवं संयोजन डॉ. ज्योति पासवान ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन प्रो. मर्सी हेम्ब्रम ने प्रस्तुत किया। संगोष्ठी में कॉलेज के शिक्षक, शिक्षाकर्मी एवं बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं की उत्साहपूर्ण सहभागिता रही। आयोजन को सफल बनाने में डॉ. अरूप बख्शी, प्रो. बसंत बर्मन, प्रो. पूजा मुखर्जी, प्रो. स्रोतोस्विनी डे, रोहन रजक, अमन गुप्ता, शैलानिल भौमिक, कुलजोत सिंह, अनुज कुमार पंडित, कौशिक जायसवाल सहित अनेक शिक्षकों एवं सहयोगियों ने सक्रिय भूमिका निभाई।

मानसून की बारिश और तीखा -चटपटा स्वाद

पनीर सैंडविच

सामग्री  : ब्रेड की स्लाइस: 4 (व्हाइट या ब्राउन), उबले आलू: 2 (मैश किए हुए), पनीर: 1/2 कप (कद्दूकस किया हुआ), उबले कॉर्न (स्वीट कॉर्न): 1/2 कप, बारीक कटा प्याज: 1 छोटा, हरी मिर्च: 1 (बारीक कटी हुई), हरी धनिया पत्ती: बारीक कटी हुई

मसाले: 1/2 छोटा चम्मच चाट मसाला, 1/2 चम्मच चिली फ्लेक्स, 1/2 चम्मच ओरिगैनो, स्वादानुसार नमक और काली मिर्च पाउडर, मक्खन- सैंडविच सेकने के लिए

विधि  :  स्टफिंग तैयार करें: एक पैन लें और उसमें आधा चम्मच बटर डालें। बटर मेल्ट हो जाए तो इसमें बारिक कटा प्याज, हरी मिर्च डालें। जब ये भून जाए तो इसमें मैश किए हुए आलू, कद्दूकस किया पनीर और उबले कॉर्न डालें। इसके बाद इसे अच्छी तरह मिक्स करें। अब इसमें चाट मसाला, चिली फ्लेक्स, ओरिगैनो, काली मिर्च और स्वादानुसार नमक मिलाएं। अगर आप सैंडविच को और क्रीमी बनाना चाहते हैं, तो इसमें 2 चम्मच मेयोनेज़ या चीज़ स्प्रेड मिला लें। सभी चीजों को अच्छी तरह मिक्स करें।

सैंडविच असेंबल करें: ब्रेड की दो स्लाइस लें। एक स्लाइस पर हरी चटनी या बटर लगाएं और दूसरी स्लाइस पर टोमैटो सॉस लगा सकते हैं। अब ब्रेड की एक स्लाइस पर तैयार की गई आलू-पनीर-कॉर्न की स्टफिंग अच्छी तरह फैलाएं। दूसरी ब्रेड स्लाइस को इसके ऊपर रखकर हल्का दबाएं।

टोस्ट/ग्रिल करें: तवे या सैंडविच मेकर को गर्म करें। ब्रेड की बाहरी सतह पर थोड़ा सा मक्खन लगाएं। सैंडविच को तवे पर रखें और धीमी से मध्यम आंच पर दोनों तरफ से सुनहरा और क्रिस्पी होने तक सेंक लें। जब दोनों तरफ से अच्छी तरह सिक जाए तो इसका आनंद उठाएं।

कॉर्न चीज रोल

 

सामग्री :  आटे के लिए : 1 कप आटा, आधा छोटा चम्मच नमक, 2 बड़े चम्मच तेल, आधा कप गुनगुना पानी

स्टफिंग के लिए सामग्री: 1 प्याज़, आधा शिमला मिर्च, 6 हरी मिर्च, 1 भुट्टा उबला हुआ, आधा कप पोहा, आधा छोटा चम्मच काली मिर्च पाउडर, 1 छोटा चम्मच ओरिगैनो सीज़निंग, 1 छोटा चम्मच चिली फ्लेक्स, 5 चीज़ क्यूब्स, आधा छोटा चम्मच नमक, आटे का घोल, 2 बड़े चम्मच आटा, गर्म पानी

 विधि  : चीज़ कॉर्न रोल बनाने के लिए सबसे पहले आटा गूंथ लें। आटा गूंथने के लिए 1 कप आटा में आधा छोटा चम्मच नमक, 2 बड़े चम्मच तेल डालें और फिर उसे गुनगुने पानी से गूंथ लें। अब, उसे कॉटन के कपड़े से ढककर रख दें। उसके बाद गैस ऑन कर एक भगोने में पानी डालकर भुट्टा उबाल दें। जब भुट्टा उबल जाए तो उसके दाने चाकू की मदद से निकाल लें।  अब स्टफिंग के लिए बारीक कटा प्याज़, बारीक कटा शिमला मिर्च, बारीक कटी हरी मिर्च, उबला हुआ भुट्टा, काली मिर्च पाउडर, ओरिगैनो सीज़निंग, चिली फ्लेक्स, चीज़ क्यूब्स, नमक, को डालकर आपस में मिलाएं। आप इसमें थोड़ा पानी में भिगोया और मैश किया हुआ पोहा भी मिलाएं। पोहा स्टफिंग में नमी नहीं आने देगा।  अब आटे की एक लोई लें और बेल लें फिर उसपर घी लगाएं, दूसरा लोई लें उसे भी बेलें। अब दूसरी चपाती को घी वाली चपाती पर रखें और एक बड़ी साइज़ की पतली रोटी बना लें। इस तरह सब रोटियां तैयार करें और उन्हें तवे पर रखकर हल्का सेंकें। ध्यान रखें पूरी तरह पकाना नहीं है। जब रोटियां तैयार हो जाएं तो उन्हें अलग अलग कर दें। अब हर चपाती पर स्टफिंग डालें और उसे रोल करें। चिपकने के लिए आप आटे के घोल का इस्तेमाल करें। जब रोल बन जाये तो उसे कड़ाही में अच्छी तरह तल लें। आपकी चीज़ कॉर्न रोल बनकर तैयार है। इसे सॉस या चटनी के साथ परोसें।

 

फ्लू के लक्षण और बचाव

मानसून का मौसम अपने साथ राहत तो लेकर आता है, लेकिन इसी मौसम में वायरल संक्रमण और फ्लू के मामले भी तेजी से बढ़ने लगते हैं। इसको लेकर दिल्ली स्थित एम्स के मेडिसिन विभाग के डॉक्टर संजीव सिन्हा ने आईएएनएस से खास बातचीत की। उन्होंने कहा कि इन दिनों अस्पताल की ओपीडी में खांसी, जुकाम, बुखार और शरीर दर्द जैसी शिकायत लेकर आने वाले मरीजों की संख्या बढ़ गई है। डॉ. संजीव सिन्हा के मुताबिक, इन दिनों मरीजों में सबसे आम लक्षण गले में खराश, नाक बहना, सूखी खांसी, तेज बुखार, सिरदर्द और पूरे शरीर में दर्द हैं। कई मरीज कमजोरी और थकान की भी शिकायत कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि ये लक्षण सामान्य वायरल संक्रमण की तरह लग सकते हैं, लेकिन कई मामलों में यह इन्फ्लूएंजा वायरस का संक्रमण भी हो सकता है। इसलिए लक्षणों को हल्के में नहीं लेना चाहिए। उन्होंने बताया कि कुछ लोगों में इस संक्रमण का खतरा ज्यादा होता है। इनमें 65 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्ग, पांच साल से कम उम्र के बच्चे, गर्भवती महिलाएं, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, किडनी की बीमारी, कैंसर या अन्य गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीज शामिल हैं। ऐसे लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता अपेक्षाकृत कमजोर होती है, इसलिए उनमें संक्रमण गंभीर रूप ले सकता है।
डॉक्टर ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति को तेज बुखार, लगातार खांसी, गले में दर्द और शरीर में दर्द जैसे लक्षण दिखाई दें, खासकर यदि वह हाई रिस्क श्रेणी में आता है, तो उसे तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। जांच और इलाज डॉक्टर की सलाह के अनुसार शुरू करना बेहद जरूरी है।
डॉ. सिन्हा ने बताया कि शुरुआत में डॉक्टर मरीज के लक्षणों के आधार पर क्लिनिकल डायग्नोसिस करते हैं। यदि इन्फ्लूएंजा का संदेह होता है तो गले या नाक से स्वैब लेकर आरटी-पीसीआर जांच की जाती है। इसी जांच से यह पता चलता है कि मरीज को वास्तव में इन्फ्लूएंजा है या नहीं और यदि है तो कौन-सा स्ट्रेन, जैसे एच1एन1 या एच3एन2, जिम्मेदार है।
उन्होंने बताया कि अगर जांच में इन्फ्लूएंजा की पुष्टि हो जाती है, तो मरीज को एंटीवायरल दवाएं दी जाती हैं। इसके साथ ही बुखार कम करने के लिए पैरासिटामोल, पर्याप्त आराम और खूब पानी पीने की सलाह दी जाती है। तेज बुखार की वजह से शरीर में पानी की कमी हो सकती है, इसलिए मरीज को हाइड्रेटेड रखना बहुत जरूरी है।
डॉ. सिन्हा ने कहा कि जिन लोगों की रिपोर्ट पॉजिटिव आती है, उन्हें कम से कम दो से तीन दिन तक घर में रहकर खुद को आइसोलेट करना चाहिए। इस दौरान मास्क पहनना जरूरी है ताकि संक्रमण परिवार के अन्य लोगों तक न पहुंचे। अगर किसी कारणवश बाहर जाना पड़े, तो भी मास्क का इस्तेमाल करें और भीड़भाड़ वाली जगहों से बचें। खांसते या छींकते समय मुंह और नाक को रुमाल, टिश्यू या तौलिये से ढंकना चाहिए।
उन्होंने यह भी बताया कि इन्फ्लूएंजा एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में बहुत तेजी से फैलता है। जब संक्रमित व्यक्ति खांसता या छींकता है तो उसके मुंह और नाक से निकलने वाली छोटी-छोटी बूंदों के जरिए वायरस दूसरे व्यक्ति तक पहुंच जाता है। यदि सामने वाला व्यक्ति इन बूंदों के संपर्क में आता है या उन्हें सांस के साथ अंदर ले लेता है, तो संक्रमण फैल सकता है।
एम्स में मामलों की संख्या बढ़ने के सवाल पर डॉ. सिन्हा ने कहा कि मानसून के दौरान ऐसे मरीज हर साल बढ़ते हैं। उन्होंने बताया कि इस मौसम में कभी लगातार बारिश होती है तो कभी अचानक गर्मी बढ़ जाती है। तापमान और नमी में बार-बार होने वाला यह बदलाव वायरस के फैलने के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करता है। इसलिए जुलाई-अगस्त के दौरान फ्लू और अन्य वायरल संक्रमण अधिक देखने को मिलते हैं।
उन्होंने कहा कि यदि तेज बुखार कई दिनों तक बना रहे, सांस लेने में परेशानी हो, ऑक्सीजन कम महसूस हो, मरीज भ्रमित दिखे या कमजोरी बहुत ज्यादा हो जाए, तो बिना देरी किए नजदीकी अस्पताल या डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। समय पर इलाज मिलने से गंभीर जटिलताओं से बचा जा सकता है।
डॉ. सिन्हा ने यह भी चेतावनी दी कि यदि समय पर इलाज न कराया जाए, तो यह संक्रमण गंभीर रूप ले सकता है। खासकर बुजुर्गों और पहले से बीमार लोगों में वायरस फेफड़ों तक पहुंचकर निमोनिया का कारण बन सकता है। ऐसी स्थिति में मरीज का ऑक्सीजन स्तर गिर सकता है, सांस लेने में तकलीफ हो सकती है और उसे अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत पड़ सकती है।

जानिए फ्रेंडशिप डे का इतिहास

जिंदगी में अगर एक सच्चा दोस्त मिल जाए, तो जैसे सब कुछ आसान हो जाता है। वह आपकी खुशी में सबसे ज्यादा खुश होता है और मुश्किल समय में बिना किसी स्वार्थ के आपके साथ खड़ा रहता है। इसी खूबसूरत रिश्ते का जश्न मनाने के लिए हर साल फ्रेंडशिप डे मनाया जाता है। इस खास दिन की शुरुआत और भारत में इसे अगस्त के पहले रविवार को मनाए जाने के पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है।
फ्रेंडशिप डे की शुरुआत का विचार सबसे पहले साल 1930 में अमेरिका में सामने आया। ग्रीटिंग कार्ड बनाने वाली मशहूर कंपनी हॉलमार्क के संस्थापक जॉयस हॉल ने सुझाव दिया कि दोस्तों के नाम भी एक खास दिन होना चाहिए। उनका मानना था कि इस दिन लोग अपने दोस्तों को ग्रीटिंग कार्ड, शुभकामनाएं और छोटे-छोटे उपहार देकर अपने रिश्ते को और मजबूत बना सकते हैं। हालांकि उस समय यह विचार ज्यादा लोकप्रिय नहीं हो पाया और धीरे-धीरे लोगों की नजरों से ओझल हो गया।
इसके बाद साल 1958 में दक्षिण अमेरिकी देश पराग्वे में इस सोच को नई दिशा मिली। डॉक्टर रेमन आर्टेमियो ब्राचो अपने दोस्तों के साथ भोजन कर रहे थे। बातचीत के दौरान उन्होंने एक ऐसा दिन मनाने का विचार रखा, जो केवल दोस्तों के लिए हो और दुनिया में भाईचारे, प्रेम और शांति का संदेश दे। इसी विचार से वर्ल्ड फ्रेंडशिप क्रूसेड नामक संस्था की शुरुआत हुई। इस संगठन ने दोस्ती को पूरी दुनिया में बढ़ावा देने का अभियान शुरू किया और 30 जुलाई को फ्रेंडशिप डे के रूप में मनाने की परंपरा शुरू हुई।
दोस्ती के इसी महत्व को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र महासभा ने साल 2011 में आधिकारिक तौर पर 30 जुलाई को इंटरनेशनल फ्रेंडशिप डे घोषित किया। इसका उद्देश्य सिर्फ दोस्तों का जश्न मनाना नहीं था, बल्कि अलग-अलग देशों, संस्कृतियों और समुदायों के बीच शांति, सहयोग और आपसी समझ को बढ़ावा देना भी था।
हालांकि, भारत समेत कुछ देशों में यह अगस्त के पहले रविवार को मनाया जाता है। इसके पीछे कोई खास कारण नहीं है, लेकिन रविवार को ज्यादातर लोगों की छुट्टी होती है, ऐसे में भारत में लोग इसे अगस्त के पहले रविवार को मनाने लगे। इसमें किसी सरकारी आदेश की भूमिका नहीं थी, बल्कि फिल्मों, टीवी, ग्रीटिंग कार्ड कंपनियों और बाद में सोशल मीडिया ने इसे लोगों के बीच इतना लोकप्रिय बना दिया कि यही तारीख चलन में आ गई। इसलिए आज भी भारत में अधिकतर लोग अगस्त के पहले रविवार को ही फ्रेंडशिप डे मनाते हैं।
आज के दौर में फ्रेंडशिप डे खासकर युवाओं के बीच बेहद लोकप्रिय है। स्कूल, कॉलेज और ऑफिस में दोस्त एक-दूसरे को रंग-बिरंगे फ्रेंडशिप बैंड बांधते हैं, चॉकलेट, गिफ्ट और ग्रीटिंग कार्ड देते हैं। सोशल मीडिया पर लोग अपने सबसे अच्छे दोस्तों के साथ तस्वीरें और वीडियो शेयर कर उन्हें खास महसूस कराते हैं। कई लोग इस दिन पुराने दोस्तों से दोबारा संपर्क भी करते हैं और बीते खूबसूरत पलों को याद करते हैं।

सावन विशेष : भगवान शिव का अद्भुत स्वरूप और उसमें छिपा जीवन-दर्शन

-उदय कुमार सिंह

“गले सर्पों का हार है, वस्त्र व्याघ्र की खाल है।त्रिशूल-डमरूधारी, बाबा भोले भंडारी की महिमा अपरंपार है।” मानव जीवन के समस्त पापों, कष्टों और संतापों का शमन करने वाला पावन सावन मास आरंभ हो चुका है। देशभर के शिवालयों में श्रद्धालुओं का भीड़ उमड़ रही है। हर ओर “हर-हर महादेव” और “बम-बम भोले” के जयघोष गूंज रहे हैं। शिवभक्त भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा-अर्चना कर सुख, समृद्धि, आरोग्य और मोक्ष का आशीर्वाद प्राप्त करने की कामना कर रहे हैं।

सावन का महीना केवल जलाभिषेक, रुद्राभिषेक और व्रत-उपवास तक सीमित नहीं है। यह आत्मशुद्धि, संयम, तप और शिवत्व को अपने जीवन में उतारने का भी अवसर है। इस पूरे महीने आप भी किसी न किसी शिवालय में जाकर भगवान शिव की आराधना कर रहे हैं लेकिन क्या आपने कभी यह जानने का प्रयास किया है कि भगवान शिव का स्वरूप ऐसा क्यों है? उन्होंने अपने शरीर पर जो कुछ धारण किया है, उसका क्या महत्व है? क्या यह केवल पौराणिक अलंकरण है या फिर हर प्रतीक के पीछे कोई गहन आध्यात्मिक संदेश छिपा है?

वास्तव में भगवान शिव का स्वरूप जितना अलौकिक दिखाई देता है, उतना ही गूढ़ और दार्शनिक भी है। उनकी विशाल जटाओं से लेकर मस्तक पर सुशोभित चंद्रमा, तीसरे नेत्र, नीलकंठ, गले में लिपटे सर्प, मुंडमाला, त्रिशूल, डमरू, व्याघ्रचर्म, भस्म और नंदी इन सभी का अपना विशिष्ट महत्व है। शिव का प्रत्येक अंग और प्रत्येक आभूषण जीवन को सही दिशा देने वाली शिक्षा प्रदान करता है।

क्या वास्तव में भगवान शिव का स्वरूप ऐसा ही था?सनातन परंपरा में शिव को साकार और निराकार दोनों रूपों में स्वीकार किया गया है। वे कण-कण में विद्यमान हैं इसलिए उन्हें किसी एक स्वरूप में सीमित नहीं किया जा सकता।

फिर भी आज जो शिव स्वरूप प्रचलित है, वह निराधार नहीं है। पुराणों, वेदों, उपनिषदों और विभिन्न धार्मिक आख्यानों में भगवान शिव के गुण, कर्म और लीलाओं का जो वर्णन मिलता है, उसी के आधार पर कलाकारों और मूर्तिकारों ने उनके स्वरूप की कल्पना की। इसलिए शिव का प्रत्येक प्रतीक उनके व्यक्तित्व और उनके दिव्य संदेश का प्रतिनिधित्व करता है।

आइए जानते हैं भगवान शिव के स्वरूप में निहित आध्यात्मिक रहस्यों को

जटाएं : अनंत ब्रह्मांड और तप का प्रतीकभगवान शिव की विशाल जटाएं केवल उनके योगी स्वरूप का परिचय नहीं देतीं, बल्कि वे संपूर्ण ब्रह्मांड का भी प्रतीक हैं। जिस प्रकार अंतरिक्ष में असंख्य ग्रह, नक्षत्र, आकाशगंगाएं और तारामंडल विद्यमान हैं, उसी प्रकार शिव की जटाएं अनंत सृष्टि का बोध कराती हैं। इन्हीं जटाओं में मां गंगा का अवतरण हुआ और मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित हैं। जटाएं यह भी दर्शाती हैं कि शिव पूर्ण योगी हैं, जिन्होंने सांसारिक आकर्षणों पर विजय प्राप्त कर तप और आत्मसंयम को अपनाया।

मां गंगा : करुणा और जीवन का प्रवाहपौराणिक कथा के अनुसार जब मां गंगा पृथ्वी पर अवतरित हुईं, तब उनके तीव्र वेग को संभालने के लिए भगवान शिव ने उन्हें अपनी जटाओं में धारण किया। यह प्रसंग केवल कथा नहीं बल्कि यह संदेश देता है कि शक्ति तभी कल्याणकारी बनती है जब उस पर संयम का नियंत्रण हो। शिव की जटाओं से प्रवाहित होती गंगा जीवन, पवित्रता, करुणा और लोककल्याण की प्रतीक हैं।

चंद्रमा : शांत और निर्मल मन का प्रतीकसमुद्र मंथन से निकले चौदह रत्नों में चंद्रमा भी एक थे। भगवान शिव ने उन्हें अपने मस्तक पर स्थान दिया। ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा मन का कारक माना जाता है। शिव के मस्तक पर विराजमान चंद्रमा यह संदेश देता है कि मन सदैव शांत, संतुलित और निर्मल होना चाहिए। परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, स्थिर मन वाला व्यक्ति ही सही निर्णय ले सकता है।

त्रिनेत्र : ज्ञान और चेतना का प्रतीकभगवान शिव त्रिनेत्रधारी हैं। उनके तीन नेत्र केवल तीन आंखें नहीं, बल्कि तीन प्रकार की चेतना का प्रतीक हैं। ये तीनों नेत्र भूत, वर्तमान और भविष्य के ज्ञान, सत्त्व, रज और तम तीनों गुणों की समझ तथा स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल तीनों लोकों पर दृष्टि का संकेत देते हैं। शिव का तीसरा नेत्र दिव्य ज्ञान का प्रतीक है। जब यह खुलता है तो अज्ञान, अधर्म और अहंकार का अंत हो जाता है।

नीलकंठ : विष को भी स्वीकार करने का साहससमुद्र मंथन के समय निकले कालकूट विष से संपूर्ण सृष्टि संकट में पड़ गई थी। तब भगवान शिव ने संसार की रक्षा के लिए उस विष का पान कर लिया। माता पार्वती ने उसे उनके कंठ से नीचे नहीं उतरने दिया, जिससे उनका कंठ नीला हो गया और वे नीलकंठ कहलाए। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि महान व्यक्ति समाज की पीड़ा स्वयं सह लेते हैं लेकिन उसे दूसरों तक नहीं पहुंचने देते।

सर्पों का हार : नकारात्मक प्रवृत्तियों पर नियंत्रणसर्प सामान्यतः भय, मृत्यु और तमोगुण का प्रतीक माना जाता है। भगवान शिव ने उसे अपने गले का आभूषण बना लिया। इसका अर्थ है कि जिसने अपने भय, क्रोध, मोह और नकारात्मक प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त कर ली, वही सच्चा योगी है। शिव यह संदेश देते हैं कि मनुष्य को अपनी दुर्बलताओं का दास नहीं बल्कि स्वामी बनना चाहिए।

मुंडमाला : मृत्यु के शाश्वत सत्य का बोधभगवान शिव के गले में सुशोभित मुंडमाला जीवन और मृत्यु के सनातन चक्र का प्रतीक है। एक पौराणिक मान्यता के अनुसार यह देवी शक्ति के अनेक जन्मों का प्रतीक है, जबकि दार्शनिक दृष्टि से यह बताती है कि जन्म और मृत्यु प्रकृति का अटल नियम हैं। शिव मृत्यु के भी स्वामी हैं। इसलिए वे हमें मृत्यु से भयभीत होने के बजाय उसे जीवन का स्वाभाविक सत्य स्वीकार करने की प्रेरणा देते हैं।

त्रिशूल : तीन प्रकार के तापों का नाशभगवान शिव का प्रमुख आयुध त्रिशूल है। इसके तीन फलक दैहिक, दैविक और भौतिक इन तीन प्रकार के तापों का प्रतिनिधित्व करते हैं। दैहिक अर्थात शरीर और मन के कष्ट, दैविक अर्थात प्राकृतिक अथवा दैवी संकट तथा भौतिक अर्थात सांसारिक दुख। शिव का त्रिशूल इन सभी कष्टों के विनाश का प्रतीक है।

डमरू : सृष्टि के प्रथम नाद का प्रतीकभगवान शिव के हाथ में स्थित डमरू सृष्टि की आदिम ध्वनि का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि डमरू के नाद से महेश्वर सूत्र प्रकट हुए, जिनसे संस्कृत व्याकरण की आधारशिला रखी गई। शिव का तांडव केवल विनाश नहीं बल्कि नवसृजन की भूमिका भी है। जब पुराना समाप्त होता है, तभी नए युग का आरंभ होता है। इसलिए डमरू परिवर्तन, सृजन और जीवन की निरंतरता का प्रतीक है।

व्याघ्रचर्म : शक्ति पर संयम का संदेशभगवान शिव अपने शरीर पर व्याघ्रचर्म धारण करते हैं। बाघ शक्ति, हिंसा और अहंकार का प्रतीक माना जाता है। शिव यह संदेश देते हैं कि शक्ति आवश्यक है, लेकिन उसका उपयोग केवल धर्म और न्याय की रक्षा के लिए होना चाहिए। स्वाभिमान मनुष्य का आभूषण है, परंतु अहंकार उसका सबसे बड़ा शत्रु।

भस्म : संसार की नश्वरता का संदेशभगवान शिव अपने शरीर पर भस्म धारण करते हैं। यह भस्म हमें याद दिलाती है कि शरीर, धन, वैभव और संसार की प्रत्येक वस्तु नश्वर है। एक दिन सब कुछ मिट्टी में मिल जाएगा। इसलिए मनुष्य को अहंकार त्यागकर सत्य, सेवा और सदाचार के मार्ग पर चलना चाहिए।

नंदी : धर्म, निष्ठा और समर्पण का प्रतीकभगवान शिव के वाहन नंदी केवल एक बैल नहीं हैं। धर्मशास्त्रों में वृषभ को धर्म का प्रतीक माना गया है। नंदी के चार पैर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार पुरुषार्थों का प्रतिनिधित्व करते हैं। शिव मंदिरों में नंदी सदैव शिवलिंग की ओर एकटक देखते हुए दिखाई देते हैं, जो अटूट श्रद्धा, समर्पण और एकाग्रता का सर्वोच्च उदाहरण है।

शिव का संपूर्ण स्वरूप क्या सिखाता है?

भगवान शिव का पूरा स्वरूप संतुलन का संदेश देता है। वे योगी भी हैं और आदर्श गृहस्थ भी। वे संहारक भी हैं और कल्याणकारी भी। वे वैराग्य के प्रतीक भी हैं और परिवार के संरक्षक भी। उनकी जटाएं संयम सिखाती हैं, चंद्रमा मन की शीतलता का संदेश देता है, तीसरा नेत्र विवेक का प्रतीक है, सर्प भय पर विजय का, त्रिशूल कष्टों के विनाश का, डमरू सृजन का, व्याघ्रचर्म अहंकार पर नियंत्रण का, भस्म नश्वरता का और नंदी धर्म के मार्ग पर अडिग रहने की प्रेरणा देता है।

जिसने परमात्मा का साक्षात् अनुभव कर लिया, वह उस दिव्य अनुभूति को शब्दों में व्यक्त करने में स्वयं को असमर्थ पाता है। इसलिए ऋषि-मुनियों ने ईश्वर के स्वरूप को प्रतीकों के माध्यम से समझाने का प्रयास किया। भगवान शिव का प्रत्येक प्रतीक जीवन-दर्शन का एक अध्याय है।

सावन का यह पावन महीना केवल शिवलिंग पर जल अर्पित करने का अवसर नहीं बल्कि भगवान शिव के गुणों संयम, करुणा, धैर्य, त्याग, संतुलन, निर्भयता और लोककल्याण की भावना को अपने जीवन में उतारने का भी समय है। जब मनुष्य इन गुणों को आत्मसात कर लेता है, तभी उसकी शिवभक्ति पूर्ण मानी जाती है। यही भगवान भोलेनाथ के दिव्य स्वरूप का वास्तविक संदेश है।

(हिन्दुस्थान समाचार से साभार)

लिटिल थेस्पियन की नवीनतम प्रस्तुति ‘चेहरे’

कोलकाता की सुप्रसिद्ध हिंदी-उर्दू नाट्य संस्था लिटिल थेस्पियन ने 22 जुलाई 2026 की शाम ज्ञान मंच में अपने नवीनतम नाटक ‘चेहरे’ का मंचन किया। टोनी डेवनेई मोरिनेली के नाटक द सीन्स ऑफ द मदर पर आधारित तथा एस. एम. अज़हर आलम द्वारा रूपांतरित यह एक-अंकीय मनोवैज्ञानिक नाटक हमारे समय की एक असहज किंतु अत्यंत प्रासंगिक सच्चाई को मंच पर साकार करता है।
‘चेहरे’ परिवार की आदर्श और चमकदार छवि को प्रश्नांकित करता है। यह एक ऐसे घर की चारदीवारी में कैद तीन पीढ़ियों की स्त्रियों की कथा है, जहाँ प्रेम के साथ-साथ आघात भी विरासत में मिलता है। आरंभ में यह अमीना नामक एक शराबी माँ की कहानी प्रतीत होती है, किंतु धीरे-धीरे एक गहरे प्रश्न में बदल जाती है—क्या हम अनजाने में उन्हीं लोगों जैसे बन जाते हैं जिन्होंने कभी हमें तोड़ा था?
अमीना इस कथा में एक साथ पीड़िता भी है और उत्पीड़क भी। अम्मा की कठोरता ने उसके भीतर क्रूरता को जन्म दिया और वही क्रूरता अब उसकी बेटियों इशरत और रज़िया के जीवन को आकार देती है। नसीमा की स्मृतियों के माध्यम से नाटक यह स्थापित करता है कि हिंसा किसी एक व्यक्ति से शुरू नहीं होती; वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी विरासत की तरह हस्तांतरित होती रहती है। रूपांतरणकार एस. एम. अज़हर आलम ने मूल कथानक को अनावश्यक विस्तार से बचाते हुए उसे सघन, आत्मीय और प्रभावी बनाए रखा है।
इस प्रस्तुति की सबसे बड़ी शक्ति इसका अभिनय है। अमीना की भूमिका में चंद्रेयी मित्रा ने घृणा और करुणा के द्वंद्व को इतनी सहजता से साकार किया कि दर्शक उससे वितृष्णा के साथ-साथ उसके भीतर छिपे टूटे हुए मनुष्य को भी देख पाता है। इशरत के रूप में एनी दास दबी हुई ज़िम्मेदारी और आत्म-भ्रम का प्रभावशाली रूप प्रस्तुत करती हैं, जबकि गुंजन अज़हर की रज़िया दमित आक्रोश की सशक्त अभिव्यक्ति बनकर उभरती हैं। दोनों बहनों के बीच प्रेम और वैमनस्य का तनाव पूरे नाटक में विश्वसनीय बना रहता है। नसीमा की भूमिका में नूपुर भौतिका स्मृतियों को आवश्यक संदर्भ देती हैं और किसी भी पात्र का पक्ष लिए बिना कथा की संवेदनात्मक परतों को उभारती हैं। वहीं संगीता व्यास की अम्मा मंच पर अल्प समय के लिए उपस्थित होकर भी पूरे नाटक पर अपनी छाप छोड़ जाती हैं।
निर्देशिका उमा झुनझुनवाला की दृष्टि संयमित, प्रतीकात्मक और अभिनेता-केंद्रित है। उन्होंने मंच को अनावश्यक सजावट से मुक्त रखते हुए एक गलियारे और कैनवास चित्रों के माध्यम से “अतीत में फँसे होने” की अनुभूति निर्मित की है। प्रकाश, रंग और मंचीय स्थान का उनका प्रयोग उन भावों को व्यक्त करता है जिन्हें संवाद पूरी तरह नहीं कह पाते। यहाँ आघात केवल पात्रों की स्मृतियों में नहीं, बल्कि दीवारों, चेहरों और यहाँ तक कि वेशभूषा के रंगों में भी उपस्थित महसूस होता है। यह ऐसा सूक्ष्म निर्देशन है जहाँ किसी एक प्रॉप या प्रकाश-संकेत के हट जाने से भी अर्थ बदल सकता है।
उमा झुनझुनवाला द्वारा परिकल्पित मंच-सज्जा स्वयं एक पात्र का रूप धारण कर लेती है। गलियारे में टंगे चेहरे, मुखौटे और खंडित भावों वाले चित्र केवल दृश्य सज्जा नहीं हैं; वे नाटक के शीर्षक ‘चेहरे’ का दृश्यात्मक विस्तार हैं। ये अम्मा के चेहरे हैं, अतीत के चेहरे हैं और उन भूमिकाओं के चेहरे हैं जिन्हें स्त्रियाँ अनचाहे भी जीवन भर ढोने को विवश रहती हैं।
जॉयदीप रॉय की प्रकाश-योजना और मुरारी रायचौधरी की संगीत-परिकल्पना वर्तमान और स्मृति के बीच सहज संक्रमण रचती है तथा प्रस्तुति के भावलोक को और अधिक सघन बनाती है।
‘चेहरे’ सहज या मनोरंजनप्रधान नाटक नहीं है। यह दर्शक को इसलिए असहज करता है क्योंकि वह उसे एक कठिन सत्य के सामने खड़ा करता है। नाटक उपचार का कोई सरल समाधान नहीं देता, किंतु यह संकेत अवश्य करता है कि किसी घाव को पहचानना और उसका नाम लेना ही उससे मुक्ति की पहली सीढ़ी हो सकता है।
लिटिल थेस्पियन ने इस प्रस्तुति के माध्यम से साहसिक, संवेदनशील और आवश्यक रंगकर्म का परिचय दिया है। यहाँ करुणा भी है और सत्य भी। नाटक की समाप्ति के बाद सभागार में पसरा सन्नाटा इस बात का प्रमाण था कि ‘चेहरे’ ने दर्शकों को केवल विचलित नहीं किया, बल्कि उनके भीतर गहरे तक अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी।

एक लाख मछली पकड़ने वाले जहाजों में लगेंगे ट्रांसपोंडर

कोलकाता । समुद्री मछली पकड़ने वाले एक लाख जहाजों में जल्द ही वेसल कम्युनिकेशन एंड सपोर्ट सिस्टम (वीसीएसएस) के तहत ट्रांसपोंडर लगाए जाने की तैयारी की जा रही है। यह सिस्टम खराब मौसम के दौरान मछुआरों के लिए बहुत फायदेमंद होगा, जिससे बचाव दल अपने जहाजों का तेजी से पता लगा सकेंगे। इतना ही नहीं यह मछली पकड़ने वाली भारतीय नावों को गलती से पड़ोसी देशों की सीमा में जाने से रोकने के लिए अलर्ट भी देगा। गुरुवार को केंद्रीय मत्स्य पालन विभाग ने प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएमएसवाई) के तहत वीसीएसएस के लिए नेशनल रोल-आउट प्लान को मंजूरी दे दी है, जिसकी कुल लागत 364 करोड़ रुपए है। मछली पकड़ने वाले जहाजों पर ट्रांसपोंडर लगाने के अलावा इस प्रोजेक्ट में जरूरी अर्थ स्टेशन और उससे जुड़े कम्युनिकेशन इंफ्रास्ट्रक्चर बनाना और क्षेत्रीय भाषाओं में ‘नभमित्र’ एप्लीकेशन बनाना शामिल है।
प्रोजेक्ट के तहत योग्य मछुआरों को ट्रांसपोंडर मुफ्त में दिए जाते हैं। इसे केंद्र और राज्यों के बीच 60:40 के हिसाब से लागत शेयरिंग के आधार पर लागू किया जाना है। केंद्रशासित प्रदेशों को 100 प्रतिशत केंद्रीय मदद दी जाएगी। वेसल कम्युनिकेशन एंड सपोर्ट सिस्टम को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने समुद्री मछली पकड़ने वाले जहाजों की निगरानी, ​​कंट्रोल और निगरानी के लिए देश में ही बनाया है।
इसरो की ओर से समुद्री मछली पकड़ने वाले समुदाय की मदद के लिए ‘नभमित्र’ एप्लीकेशन बनाया गया है। इस एप्लिकेशन के खास फीचर्स और क्षमताओं में समय-समय पर पोजीशन रिपोर्टिंग, टू-वे मैसेजिंग, इमरजेंसी/एसओएस मैसेजिंग, ऑटोमैटिक बाउंड्री क्रॉसिंग अलर्ट (जियो-फेंसिंग पर आधारित), मौसम और साइक्लोन की चेतावनी, इमरजेंसी मौसम अलर्ट, पोटेंशियल फिशिंग जोन (पीएफजेड) एडवाइजरी, नेविगेशनल मदद और एक ई-टोकन/ट्रिप डिक्लेरेशन सिस्टम शामिल हैं।
देशभर में कुल 1,547 नोटिफाइड सेंटरों में से 423 फिश लैंडिंग सेंटरों (एफएलसी) पर इंफ्रास्ट्रक्चर की योजना बनाई गई है। एफएलसी को संबंधित राज्यों/केंद्र शासित राज्यों की प्राथमिकताओं के आधार पर इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के लिए माना जाता है, जिसमें मछली पकड़ने वाले जहाजों की संख्या, सेंटर पर निर्भर मछुआरों की संख्या, मछली पकड़ने की मात्रा, मछली बाजारों और प्रोसेसिंग सेंटरों से नजदीकी और दूसरी स्थानीय जरूरतें शामिल हैं, जिसमें टेक्नो-फाइनेंशियल वायबिलिटी और कानूनी नियमों का पालन करने के साथ-साथ फाइनेंशियल रिसोर्स की उपलब्धता शामिल है।
सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, सबसे ज्यादा एफएलसी (350) आंध्र प्रदेश में हैं, इसके बाद तमिलनाडु में 301 और केरल में 204 हैं।

‘दुर्गा सुरक्षा स्क्वाड’ को मिले नए यूनिफॉर्म और हेलमेट

कोलकाता । कोलकाता पुलिस के ‘दुर्गा सुरक्षा स्क्वाड’ की सदस्य, अब ड्यूटी के दौरान अपनी यूनिफॉर्म के ऊपर खास तौर पर डिजाइन की गई गुलाबी और नारंगी रंग की वेस्टकोट पहनेंगी। इन वेस्टकोट पर देवी दुर्गा और उनके त्रिशूल की तस्वीर बनी होगी। ‘दुर्गा सुरक्षा स्क्वाड’ को इसी महीने की शुरुआत में महिलाओं के खिलाफ अपराधों के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए शुरू किया गया था। स्कूटर पर गश्त करने वालीं स्क्वाड सदस्यों के लिए अनिवार्य इस नई वेस्टकोट को गुलाबी और नारंगी रंगों में डिजाइन किया गया है। इस वेस्टकोट के आगे और पीछे देवी दुर्गा का चेहरा और उनका त्रिशूल बना होगा, साथ ही अंग्रेजी में ‘दुर्गा सुरक्षा स्क्वाड’ लिखा होगा।
पुलिस अधिकारियों के अनुसार, यह डिजाइन स्क्वाड की भूमिका, मुसीबत में फंसी महिलाओं की सहानुभूति के साथ मदद करने और साथ ही महिलाओं के खिलाफ अपराधों और हिंसा के मामलों में सख्त कार्रवाई करने को दर्शाता है।
लालबाजार स्थित कोलकाता पुलिस मुख्यालय ने लगभग 2.75 लाख रुपए की लागत से 110 वेस्टकोट का ऑर्डर दिया है। निर्माताओं को निर्देश दिया गया है कि वे यह सुनिश्चित करें कि ये वेस्टकोट प्रोफेशनल, मजबूत और आरामदायक हों, साथ ही इनसे काम करने की क्षमता पर कोई असर न पड़े।
स्क्वाड को कोलकाता पुलिस के लोगो वाले नए गुलाबी हेलमेट भी मिलेंगे। इन हेलमेट में कई परतों वाला सॉफ्ट पैडिंग, पूरी तरह से साइड प्रोटेक्शन और चिन गार्ड की सुविधा होगी, साथ ही वेंटिलेशन का भी ध्यान रखा जाएगा। पुलिस ने लगभग 1.08 लाख रुपए की लागत से ऐसे करीब 80 हेलमेट का ऑर्डर दिया है।
दुर्गा सुरक्षा स्क्वाड मुख्य रूप से महिलाओं की सुरक्षा बढ़ाने के लिए शहर में स्कूटर पर गश्त करता है। इस पहल को एक संयुक्त गश्त नेटवर्क का समर्थन प्राप्त है, जिसमें कोलकाता भर के पुलिस स्टेशनों, साइबर पुलिस स्टेशन, महिला पुलिस स्टेशनों और महिला सेल के कर्मी शामिल हैं।