Saturday, March 21, 2026
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जानिए भगवान विष्णु का इतिहास

हिन्दू धर्म में कहते हैं कि ब्रह्माजी जन्म देने वाले, विष्णु पालने वाले और शिव वापस ले जाने वाले देवता हैं। भगवान विष्णु तो जगत के पालनहार हैं। सभी के दुख दूर कर उनको श्रेष्ठ जीवन का वरदान देते हैं। जीवन में किसी भी तरह का संकट हो या धरती पर किसी भी तरह का संकट खड़ा हो गया हो, तो विष्णु ही उसका समाधान खोजकर उसे हल करते हैं। ब्रह्मा के काल में हुए भगवान विष्णु को पालनहार माना जाता है। विष्णु ने ब्रह्मा के पुत्र भृगु की पुत्र लक्ष्मी से विवाह किया था। शिव ने ब्रह्मा के पुत्र दक्ष की कन्या सती से विवाह किया था। हिन्दू धर्म के अनुसार विष्णु परमेश्वर के 3 मुख्य रूपों में से एक रूप हैं। एक शोधानुसार यह माना जाता है कि लगभग 12000 ईसापूर्व हुए थे।

शिवपुराण के अनुसार ब्रह्माजी अपने पुत्र नारदजी से कहते हैं कि विष्णु को उत्पन्न करने के बाद सदाशिव और शक्ति ने पूर्ववत प्रयत्न करके मुझे (ब्रह्माजी को) अपने दाहिने अंग से उत्पन्न किया और तुरंत ही मुझे विष्णु के नाभि कमल में डाल दिया। इस प्रकार उस कमल से पुत्र के रूप में मुझ हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा) का जन्म हुआ। श्रीमद् देवी भागवत पुराण के तीसरा स्कंध अध्याय 5 में भी इसका उल्लेख मिलता है। विष्णु रूप में उन्होंने ऋषि भृगु की पुत्री माता लक्ष्मी से विवाह किया। माता लक्ष्मी की माता का नाम ख्याति था। विष्णु और लक्ष्मी के करीब 18 पुत्र थे।

आनन्द: कर्दम: श्रीदश्चिक्लीत इति विश्रुत:।

ऋषय श्रिय: पुत्राश्च मयि श्रीर्देवी देवता।।- (ऋग्वेद 4/5/6)

नाम : विष्‍णु

वर्णन : हाथ में शंख, गदा, चक्र, कमल

पत्नी : लक्ष्मी

पुत्र : आनंद, कर्दम, श्रीद, चिक्लीत

शस्त्र : सुदर्शन चक्र

वाहन : गरूड़

विष्णु पार्षद : जय, विजय

विष्णु संदेशवाहक : नारद

निवास : क्षीरसागर (हिन्द महासागर)

ग्रंथ : विष्णु ‍पुराण, भागवत पुराण, वराह पुराण, मत्स्य पुराण, कुर्म पुराण।

मंत्र : ॐ विष्णु नम:, ॐ नमो नारायण, हरि ॐ

विष्णु के प्रकट अवतार :

हंसावतार : सनकादि मुनियों के दार्शनिक प्रश्नों का समाधान करने के लिए विष्‍णु ने हंसावतार धारण किया था। उन्होंने मुनियों को वैदिक ज्ञान बताकर दीक्षा प्रदान की थी। हंस रूप विष्णु ने ही शांत नामक दैत्य का वध किया था

आदि वराह अवतार : विष्णु ने कश्यप के पुत्र हिरण्याक्ष का वध करने के लिए वराह रूप धरा था।

नृसिंह अवतार : विष्णु ने कश्यप के पुत्र हिरण्यकशिपु का नृसिंह रूप धारण कर वध किया था।

मोहिनी अवतार : उन्होंने मोहिनी का रूप धारण कर असुरों से अमृत कलश को बचाकर देवताओं को दे दिया था।

जलंधर : विष्णु ने शिव पुत्र जलंधर का रूप धारण करके वृंदा का सतीत्व खंडित किया था।

मोहिनी अवतार : विष्णु ने भस्मासुर को मारने के लिए एक बार फिर उन्होंने मोहिनी रूप धारण किया।

कच्छप अवतार : समुद्र मंथन के दौरान जब धरती डोल रही थी, तब उन्होंने कच्छप रूप धारण किया।

धन्वंतरि : समुद्र मंथन के दौरान अंत में अमृत का कलश लेकर प्रकट हुए थे विष्णु जिन्हें भगवान धन्वंतरि कहा गया। भगवान के इस देव रूप ने आयुर्वेद, वेद, आरोग्य, वनस्पति आदि की शिक्षा दी। उनके बाद राजा धन्व के पुत्र धन्वंतरि हुए जिनके केतुमान नामक पुत्र थे। केतुमान के पुत्र का नाम भीमरथ था। भीमरथ के पुत्र का नाम दिवीदास था। दिवीदास का संवरण था जिसने सुदास से युद्ध लड़ा था।

हयग्रीव अवतार : विष्णु ने हयग्रीव नामक सोमकासुर को मारने के लिए हयग्रीव का ही रूप धारण किया।

मत्स्य अवतार : प्रलयकाल के दौरान मत्स्य रूप धारण कर राजा वैवस्वत मनु को नाव बनाकर सुरक्षित स्थान पर जाने के लिए कहा।

गजेन्द्रोधारावतार : हाथी (इंद्रद्युम्न) को मगरमच्छ (हुहू) से बचाने के लिए गजेन्द्रोधारावतार धरण किया।

स्वायंभुव मनु के दो पुत्र प्रियवत और उत्तानपाद में से उत्तानपाद के पु‍त्र ध्रुव को विष्णु ने वरदान दिया था।

विष्णु के जन्मावतार

सनकादि अवतार : विष्णु ने ब्रह्मा के पुत्रों सनक, सनंदन, सनातन, सनत्कुमार के रूप में जन्म लेकर वेद ज्ञान का प्रकाश फैलाया।

नर-नारायण : धर्म की पत्नी रुचि के गर्भ से भगवान विष्णु ने नर और नारायण नामक दो ऋषियों के रूप में जन्म लिया। वे जन्म से तपोमूर्ति थे अतः जन्म लेते ही बदरीवन में तपस्या करने के लिए चले गए। उनकी तपस्या से ही संसार में सुख और शांति का विस्तार होता है।

वामनावतार : कश्यप-अदिति के 12 पुत्रों में से एक त्रिविक्रम को भगवान विष्णु का अवतार माना गया जिन्होंने असुर राज बाली से तीन पग में धरती दान में ले ली थी। उन्हें वामन भी कहा गया।

परशुराम अवतार : क्रूर राजाओं से समाज को बचाने के लिए और समाज में फिर से वैदिक व्यवस्था लागू करने के लिए विष्णु ने जमदग्नि-रेणुका के पुत्र के रूप में जन्म लिया, जो आगे चलकर परशुराम कहलाए।

व्यास अवतार : परशुराम के बाद वेद व्यास के रूप में भगवान ने अवतार लेकर वैदिक ज्ञान का उद्धार किया। (ये वे वेद व्यास नहीं हैं, जो कृष्ण के काल में हुए थे)

रामावतार : रावण का वध करने के लिए दशरथ-कौशल्या के पुत्र के रूप में विष्णु ने जन्म लिया।

कृष्णावतार : वासुदेव-देवकी के यहां विष्णु ने कृष्ण के रूप में जन्म लेकर दुनिया को गीता का ज्ञान दिया।

भगवान विष्णु ने ही नृसिंह अवतार लेकर एक और जहां अपने भक्त प्रहलाद को बचाया था वहीं क्रूर हिरण्यकश्यपु से प्रजा को मुक्ति दिलाई थी। उसी तरह वराह अवतार लेकर उन्होंने महाभयंकर हिरण्याक्ष का वध करके देव, मानव और अन्य सभी को भयमुक्त किया था। उन्होंने ही महाबलि और मायावी राजा बलि से देवताओं की रक्षा की थी।

श्री विष्णु के 24 अवतार : जब-जब पृथ्वी पर कोई संकट आता है तो भगवान अवतार लेकर उस संकट को दूर करते हैं। भगवान विष्णु ने अब तक 23 अवतार लिए हैं। भगवान विष्णु के 24 वें अवतार के बारे में कहा जाता है कि’कल्कि अवतार’के रूप में उनका आना सुनिश्चित है। इन 24 अवतार में से 10 अवतार विष्णु जी के मुख्य अवतार माने जाते हैं। यह है मत्स्य अवतार, कूर्म अवतार, वराह अवतार, नृसिंह अवतार, वामन अवतार, परशुराम अवतार, राम अवतार. कृष्ण अवतार, बुद्ध अवतार, कल्कि अवतार। इसके अलावा श्री सनकादि मुनि, नारद, नर-नारायण, कपिल मुनि, दत्तात्रेय, यज्ञ, भगवान ऋषभदेव, आदिराज पृथु, भगवान धन्वन्तरि, मोहिनी अवतार, हयग्रीव, श्रीहरि, महर्षि वेदव्यास, और हंसावतार।

(साभार – वेबदुनिया)

कलकत्ता हाईकोर्ट ने रद्द किए 2010 के बाद जारी 5 लाख ओबीसी प्रमाणपत्र

कोलकाता । कलकत्ता हाई कोर्ट ने बुधवार को 2010 के बाद से पश्चिम बंगाल में जारी किए गए सभी ओबीसी प्रमाणपत्रों को खारिज कर दिया है। जज तपब्रत चक्रवर्ती और राजशेखर मंथा की खंडपीठ ने ओबीसी प्रमाणपत्र देने की प्रक्रिया को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका पर यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग अधिनियम 1993 के आधार पर ओबीसी की नई सूची पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग तैयार करेगी। कोर्ट ने 2010 के बाद बनी ओबीसी सूची को अवैध करार दिया है। ओबीसी लिस्ट के रद्द होने से करीब 5 लाख ओबीसी प्रमाणपत्र रद्द होने वाले हैं। कलकत्ता हाई कोर्ट ने इस संदर्भ में पाया कि इस समय बनाया गया ओबीसी प्रमाणपत्र कानून के पूर्ण अनुपालन में नहीं बनाया गया था। कलकत्ता हाई कोर्ट ने बुधवार को कहा कि फैसला सुनाए जाने के बाद रद्द किए गए प्रमाणपत्र का इस्तेमाल किसी भी रोजगार प्रक्रिया में नहीं किया जा सकता है। साथ ही हाईकोर्ट ने कहा, इस प्रमाणपत्र के जिन उपयोगकर्ताओं को पहले ही मौका मिल चुका है, उन पर इस फैसले का असर नहीं होगा। कलकत्ता हाई कोर्ट का कहना है कि 2010 के बाद जितने भी ओबीसी प्रमाणपत्र बनाए गए हैं, वे कानून के मुताबिक ठीक से नहीं बनाए गए हैं इसलिए उस प्रमाणपत्र को रद्द किया जाना चाहिए। हालांकि, इसके साथ ही हाई कोर्ट ने कहा कि इस निर्देश का उन लोगों पर कोई असर नहीं होगा जो पहले ही इस सर्टिफिकेट के जरिए नौकरी पा चुके हैं या नौकरी पाने की प्रक्रिया में हैं। अन्य लोग अब उस प्रमाणपत्र का उपयोग रोजगार प्रक्रिया में नहीं कर सकेंगे।  जिस मामले के आधार पर हाई कोर्ट ने बुधवार को यह आदेश दिया, वह मामला 2012 में दायर किया गया था. वकील सुदीप्त दासगुप्ता और विक्रम बनर्जी वादियों की ओर से अदालत में पेश हुए। उन्होंने कहा कि वाम मोर्चा सरकार ने 2010 में एक अंतरिम रिपोर्ट के आधार पर पश्चिम बंगाल में अन्य पिछड़ा वर्ग बनाया था। उस कैटेगरी को ‘ओबीसी-ए’ नाम दिया गया।

 सीएम ममता बोलीं- फैसला नहीं मानेंगे
हाईकोर्ट के फैसले पर सीएम ममता बनर्जी का बयान आया है. उन्होंने कहा है कि वह ओबीसी आरक्षण पर उच्च न्यायालय के आदेश को स्वीकार नहीं करेंगी । सीएम ने कहा, आज मैंने सुना कि एक न्यायाधीश ने एक आदेश पारित किया है, जो प्रसिद्ध रहे हैं. पीएम इस बारे में बात कर रहे हैं कि अल्पसंख्यक तपशीली आरक्षण कैसे छीन लेंगे। ऐसा कभी कैसे हो सकता है? इससे संवैधानिक विघटन होगा। तपशीली या आदिवासी आरक्षण को अल्पसंख्यक कभी छू नहीं सकते लेकिन ये शरारती लोग (भाजपा) अपना काम एजेंसियों के माध्यम से कराते हैं।

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शादी में मिले तोहफों पर भी देना होता है टैक्स? जानिए क्या कहते हैं नियम

नयी दिल्ली । भारत में शादियों में खूब पैसे खर्च किए जाते हैं. आपने देखा होगा। अक्सर जो भी रिश्तेदार, दोस्त और अन्य लोग आते हैं. लगभग सब के सब उपहार लेकर आते हैं। कोई उपहार के तौर पर पैसे देता है तो कोई तोहफे में महंगे- महंगे सामान देता है. ऐसे में अक्सर लोगों के मन में यह सवाल आता है क्या शादी में मिले उपहारों पर, या उपहार के तौर पर मिले पैसों पर किसी प्रकार का कोई टैक्स लगता है। क्या कहते हैं शादियों में मिले तोहफों को लेकर आयकर के नियम चलिए जानते हैं –

शादी में मिले तोहफे होते हैं टैक्स फ्री – इनकम टैक्स एक्ट के नियमों के मुताबिक शादी में मिले सभी प्रकार के गिफ्ट टैक्स फ्री होते हैं लेकिन आपको शादी में मिले सभी उपहारों का विवरण अपने पास रखना होता है। इससे आगे चलकर आपको कोई दिक्कत नहीं आती। इसके साथ ही आपको शादी में मिले उपहारों की जानकारी इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करते वक्त देनी होती है। इसके साथ ही आपको अपनी शादी का प्रमाण जमा करना होता है जिसमें शादी का कार्ड और शादी के फोटो भी देने होते हैं।

50,000 रुपये तक उपहार ले सकते हैं – जहां शादी में मिले तोहफे भले ही टैक्स फ्री हों. लेकिन इसके अलावा आपको अन्य तोहफों पर टैक्स देना होता है. 50,000 रुपये की रकम के ऊपर मिले सभी तोहफे आयकर की श्रेणी में आते हैं। इन पर इनकम टैक्स एक्ट, 1961 के सेक्शन 56(2)(x) के तहत आपको टैक्स देना होता है. हालांकि आपको आपके रक्त संबंधियों से मिले गिफ्ट्स पर टैक्स नहीं देना होता। इसके साथ ही आयकर की धारा सेक्शन 10 (23C) और सेक्शन 12A या 12AA के तहत आपको तोहफों में टैक्स पर छूट देती है।

भारत ने 10 सालों में 31,000 किलोमीटर रेल नेटवर्क जोड़ा : अश्विनी वैष्णव

नयी दिल्ली । केंद्रीय रेल, संचार और आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने मोदी सरकार के पिछले 10 वर्षों में भारतीय रेलवे में परिवर्तनकारी परिवर्तनों को प्रदर्शित करने के लिए डेटा जारी किया है। मुंबई में विकसित भारत एंबेसडर कार्यक्रम को संबोधित करते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा कि 2014 से पहले रेलवे को पॉलिटिकली दूध देने वाली गाय की तरह प्रयोग किया जाता था। ऐसे कई मंत्री हैं, जिन्हें रेलवे के विकास से कुछ लेना-देना नहीं था। उन्होंने सिर्फ अपने संसदीय क्षेत्र या कुछ लोगों के लिए विकास किया था। 2014 के पहले के 60 साल तक देश में एक ही परिवार ने शासन किया। उन 60 सालों में रेलवे इलेक्ट्रिफिकेशन मात्र 20 हजार किलोमीटर हुआ। लेकिन, 2014 से 2024 में रेलवे का इलेक्ट्रिफिकेशन 44 हजार किलोमीटर हुआ। 1950 से 1970 तक रेलवे में जो काम होना चाहिए था, ताकि रेलवे की कैपेसिटी, जनसंख्या और इकोनॉमी के हिसाब से बढ़ाई जा सके, करीब 40-50 साल तक रेलवे को इग्नोर करके रखा गया। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने आगे कहा- 2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से प्रतिदिन 4 किलोमीटर के हिसाब से रेलवे नेटवर्क बिछाया गया। मतलब, साल भर में 1,200-1,500 किलोमीटर नई पटरियां बिछाई गई। 31 मार्च 2024 को फाइनेंशियल ईयर तक 5,300 किलोमीटर रेलवे नेटवर्क को जोड़ा गया है। एक साल में स्विट्जरलैंड के रेलवे नेटवर्क 5,000 किलोमीटर के बराबर जोड़ा गया है। इससे पहले साल में 5,200 किलोमीटर पटरियां बिछाई गई। मोदी सरकार ने 10 साल में देशभर में रेलवे में 31,000 किलोमीटर नए रेलवे ट्रैक जोड़े। यानी जर्मनी के बराबर देश में रेलवे नेटवर्क को जोड़ा गया है। दुनिया आर्श्चयचकित है कि किस तरह से यह काम संभव हो पा रहा है। देश के 140 करोड़ देशवासियों को एक आधुनिक ट्रेन की जरूरत थी, क्या उसे 20-30 साल पहले नहीं लाया जा सकता था। लेकिन, यह सौभाग्य भी पीएम मोदी के खाते में आया।

इसके अलावा अश्विनी वैष्णव ने कहा कि पीएम मोदी को अपने देश के इंजीनियर और डिजाइनरों के टैलेंट पर दृढ़ विश्वास था और उसी विश्वास के कारण पीएम मोदी ने स्पष्ट कहा कि हम दूसरे देशों से ट्रेन नहीं लेंगे, हमें खुद से आत्मनिर्भर बनना होगा। इसके बाद वंदे भारत डेवलप हुई। आज वर्ल्ड क्लास ट्रेन के जो भी मानक होते हैं, वो इस ट्रेन में मौजूद हैं। आज देशभर में 1,300 रेलवे स्टेशनों का आधुनिकीकरण किया जा रहा है। महाराष्ट्र में 120 रेलवे स्टेशनों के आधुनिकीकरण का काम चल रहा है। भारत में बुलेट ट्रेन का डिजाइन बनना शुरू हो चुका है। अब भारत में बनी बुलेट ट्रेन भविष्य में एक्सपोर्ट होने वाली है। कांग्रेस ने देश को एक हीन भावना में रखा हुआ था, जिसमें देश का विकास करने की बजाए हमेशा दूसरों के ऊपर निर्भर रहना पड़ता था। मोदी सरकार के 10 साल में यह माइंडसेट चेंज हुआ है। हम कुछ भी तैयार कर सकते हैं।

18 लाख मोबाइल नंबर होंगे बंद! टेलीकॉम कंपनियों को दूरसंचार विभाग का निर्देश

नयी दिल्ली । दूरसंचार कंपनियां 18 लाख मोबाइल नंबर को बंद करने वाली हैं। सरकार का यह साइबर क्राइम और ऑनलाइन फ्रॉड पर अब तक का सबसे बड़ा ऐक्शन हो सकता है। पिछले दिनों दूरसंचार विभाग ( डॉओटी) ने 28 हजार से ज्यादा मोबाइल हैंडसेट को डिसकनेक्ट करने का आदेश जारी किया था। इन मोबाइल हैंडसेट का इस्तेमाल साइबर क्राइम के लिए किया गया था। अब सरकार इन मोबाइल हैंडसेट में इस्तेमाल किए जाने वाले मोबाइल नंबर को ब्लॉक करने के लिए टेलीकॉम कंपनियों को निर्देश दिया है।

18 लाख मोबाइल नंबर होंगे ब्लॉक! – रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार साइबर क्राइम, ऑनलाइन फ्रॉड पर लगाम लगाने के लिए पूरे देश में लगभग 18 लाख मोबाइल नंबर को ब्लॉक करने की तैयारी में हैं। अलग-अलग विभाग की जांच एजेंसियों ने इन मोबाइल नंबर को वित्तीय फ्रॉड में लिप्त पाया है। 9 मई को दूरसंचार विभाग ने टेलीकॉम ऑपरेटर्स को 28,220 मोबाइल हैंडसेट को ब्लॉक करने का आदेश जारी किया था। इसके अलावा 2 मिलियन यानी करीब 20 लाख मोबाइल नंबर को री-वेरिफाई करने के लिए कहा था, जिसका इस्तेमाल इन मोबाइल हैंडसेट में किया गया था। दूरसंचार विभाग के अधिकारियों का कहना है कि 2 मिलियन में से करीब 10 प्रतिशत मोबाइल नंबर को ही दोबारा वेरिफाई किया जा सका है। टेलीकॉम कंपनियों को इन नंबर को 15 दिन के अंदर वेरिफाइ करवाना था। एनसीआरपी  के मुताबिक, 2023 में साइबर फ्रॉड के जरिए 10,319 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। इस दौरान एनसीआरपी पोर्टल पर साइबर फ्रॉड के कुल 6.94 लाख शिकायतें दर्ज की गई थी।

इस वजह से की गयी कार्रवाई – डॉओटी के अधिकारियों की मानें तो साइबर अपराधी फ्रॉड करने के लिए अलग-अलग टेलीकॉम सर्किल का सिम इस्तेमाल कर रहे थे। वे मोबाइल नंबर और हैंडसेट बार-बार बदल रहे थे, ताकि जांच एजेंसियों से बचा जा सके। उदाहरण के तौर पर झारखंड और पश्चिम बंगाल का सिम कार्ड दिल्ली-एनसीआर में यूज किया जा रहा था। जांच एजेंसियों के रडार में नहीं आने के लिए वे केवल एक आउटगोइंग कॉल करके सिम कार्ड और हैंडसेट बदल देते थे। जांच एजेंसियों ने पिछले साल करीब 2 लाख सिम कार्ड को फ्रॉड की वजह से ब्लॉक किया था। सबसे ज्यादा हरियाणा के मेवात में 37 हजार सिम कार्ड ब्लॉक हुए थे। साइबर अपराध को ट्रैक करने के लिए सरकार का कहना है टेलीकॉम कंपनियों को सिम कार्ड के इस्तेमाल के पैटर्न पर पैनी नजर रखनी पड़ेगी। खास तौर पर उन सिम कार्ड का ध्यान रखना होगा, जिसे होम सर्किल से बाहर इस्तेमाल किया जा रहा है।

यदि वसीयत के बिना मृत्यु होती है, तो ऐसे होता है बंटवारा 

संपत्ति के मालिक की मृत्यु के बाद, नामांकित व्यक्ति को मृतक की संपत्ति को संपत्ति के कानूनी उत्तराधिकारियों को हस्तांतरित करना होता है। किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद, उसकी संपत्ति को दूसरे व्यक्ति को हस्तांतरित करने की प्रक्रिया हस्तांतरण के प्रकार पर निर्भर करती है। ध्यान दें कि संपत्ति के स्वामित्व के हस्तांतरण की प्रक्रिया सरल है यदि मृत व्यक्ति ने वसीयत बनाई है, लेकिन संपत्ति के बटवारा की प्रक्रिया जटिल हो सकती है यदि वसीयत नहीं की गई है और कई उत्तराधिकारी हैं।

वसीयत होने पर संपत्ति कैसे ट्रांसफर करें – मृत्युलेख आमतौर पर स्पष्ट रूप से कानूनी उत्तराधिकारियों को बताते हैं जो मृत व्यक्ति की संपत्ति और अन्य संपत्ति का वारिस करेंगे। लॉ फर्म एथेना लीगल की चीफ एसोसिएट नेहा गुप्ता का कहना है कि कानूनी उत्तराधिकारी के नाम पर संपत्ति को हस्तांतरित करने का पहला कदम वसीयत की जांच करना या प्रशासन का पत्र प्राप्त करना है। एक व्यक्ति की वसीयत प्रोबेट कोर्ट द्वारा प्रमाणित एक प्रति है तो वसीयत का निष्पादक या प्रशासक वसीयत के प्रोबेट के लिए आवेदन करता है। यह वसीयत की वैधता और प्रामाणिकता निर्धारित करने के लिए अदालत में की जाने वाली एक प्रक्रिया है। इसके विपरीत, वसीयत में अब वसीयत प्रशासक का उल्लेख नहीं है या यदि प्रोबेट अनिवार्य नहीं है, तो वसीयत के लाभार्थियों को एलओए के लिए आवेदन करना होगा। इसी समय, एलओए आवश्यक होने की संभावना है, भले ही कोई व्यक्ति बिना वसीयत लिखे मर जाए।

प्रोबेट या एलओए की आवश्यकता है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि संपत्ति कहां स्थित है। उपरोक्त प्रक्रिया पूरी होने के बाद, लाभार्थी को कानूनी उत्तराधिकारी के नाम पर संपत्ति को स्थानांतरित करने के लिए संबंधित दस्तावेजों के साथ संबंधित उप-पंजीयक के कार्यालय में जाना होगा और कानूनी उत्तराधिकारी को स्वामित्व के हस्तांतरण के लिए आवेदन जमा करना होगा, मूल संपत्ति के दस्तावेज, संपत्ति के मालिक का मृत्यु प्रमाण पत्र, पहचान पत्र और कानूनी उत्तराधिकारी और मृत व्यक्ति का पता प्रमाण। मृत्यु प्रमाण पत्र न मिलने की स्थिति में संपत्ति के हस्तांतरण की प्रक्रिया वहीं अगर किसी व्यक्ति की वसीयत लिखे बिना मौत हो जाती है तो उस व्यक्ति की संपत्ति मृत व्यक्ति पर लागू उत्तराधिकार कानून के तहत क्लास-1 के वारिसों में बंट जाएगी। इस पहली श्रेणी में पति/पत्नी और बच्चे वारिस होते हैं, जबकि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के अनुसार मृतक हिंदू व्यक्ति की मां भी प्रथम श्रेणी की वारिस बनती है।

यदि कोई हिंदू महिला बिना वसीयत के मर जाती है – पहले बेटे, बेटियाँ और पति * दूसरे पति के उत्तराधिकारियों को * तीसरी माता या पिता * चौथे पिता के उत्तराधिकारियों को * पांचवीं मां के उत्तराधिकारियों को क्या कहता है । इस्लामी कानून मुस्लिम कानून दो प्रकार के उत्तराधिकारियों का मानता है, जिनमें से पहला शेयरधारक है और दूसरा रेजीड्यूरीज है। शेयरधारक मृतक की संपत्ति में एक निश्चित हिस्से के हकदार होते हैं जबकि शेयरधारकों द्वारा अपने हिस्से लेने के बाद रेजीड्यूरीज के पास शेष संपत्ति का अधिकार होता है।

(साभार – महाराष्ट्रनामा हिन्दी)

अगर आप भी गर्मियों में दिखना चाहती हैं खास, बाल संवारें इन तरीकों से

गर्मियों का मौसम अपने आप में कई तरह की परेशानियों का सबब बनता है। फिर चाहे सेहत हो, हमारी त्वचा हो या फिर हमारे बाल ही क्यों न हों। गर्मी में बढ़ता तापमान हर चीज को प्रभावित करता है। इस मौसम में घर पर रहना हो या फिर बाहर निकलना हो, गर्मी से बचने के लिए हमेशा यही सवाल आता है कि बालों को कैसे संभाला और संवारा जाए। खुले बाल पसीने और धूप से खराब हो सकते हैं, इसलिए ऐसे हेयरस्टाइल चुनने चाहिए जिनसे ये परेशानियां भी न हों और साथ ही, गर्मी भी ज्यादा न लगे। इसलिए बालों के लिए गर्मियों के अनुरूप ऐसे हेयरस्टाइल की जरूरत महसूस होती है, जो इन्हें स्टाइलिश लुक देने के साथ-साथ हमें आराम भी दें। आज हम आपको ऐसे ही कुछ हेयरस्टाइल्स के बारे में बताने वाले हैं, जो आपको स्टाइलिश लुक भी देंगे और बालों की वजह से गर्मी भी कम लगेगी।

हाई पोनीटेल – हाई पोनी टेल गर्मियों में बालों को बांधने का सबसे आसान तरीका है। यह आपको काफी क्लासी लुक देता है। इसे आप फ्रॉक, मिडी, जींस या फिर किसी फॉर्मल वेयर के साथ भी आसानी कैरी कर सकती हैं। इससे आपके बाल लंबे समय तक बिना बिखरे, सेट रहेंगे।

फ्रेंच चोटी – गर्मियों में बाल जितने बंधे रहें उतनी उलझन कम होती है, खासकर बाहर निकलने पर। ऐसे में फ्रेंच चोटी एक ऐसा हेयरस्टाइल है जो सूट, साड़ी, मिडी किसी भी आउट फिट के साथ फिट बैठती है। लंबे बालों पर ये चोटी और भी खूबसूरत लगती है। इसे स्टाइल करने के लिए आप इसके साथ क्यूट और छोटी क्लिप्स भी लगा सकती हैं।

सिंपल पोनी – गर्मी के मौसम में किसी ब्रंच पर जाना है या आउटिंग के लिए जाना है, तो सिंपल पोनी एक बेहतर ऑप्शन है। इसमें आपका लुक काफी कैजुअल, लेकिन क्लासी लगेगा। इसके साथ अपने सामने के कुल बालों को लूज छोड़ सकती हैं, ताकि वे आपके चेहरे को फ्रेम करें। इससे आपका लुक और बेहतर दिखेगा।

लो बन – बालों का लो बन हेयरस्टाइल एक एवर ग्रीन लुक है। यह ऑयली हेयर के लिए एक सेफ हेयरस्टाइल लुक माना जाता है, लेकिन आप इसे कभी भी बना सकती हैं। ऑफिस से लेकर पार्टी तक, लो बन हर लुक के साथ अच्छा लगता है।

मेसी बन – गर्मियों में मेसी बन बहुत बेहतरीन हेयरस्टाइल विकल्प है। ड्राई और घने बालों को स्मार्टली संवारने का इससे बेहतर और कोई तरीका नहीं हो सकता है। आप भी अपने कैजुअल वेयर्स के साथ इस बन को बना सकती हैं।

सिंपल जूड़ा – गर्मियों में बालों को जितना अधिक समेट कर रखा जाए उतना अधिक अच्छा है। ऐसे में अगर आपको पार्टी या फंक्शन अटेंड करना है, तो साड़ी के साथ सिम्पल जूड़ा बनाएं। बालों को बांधने का ये सबसे आसान और स्मार्ट तरीका है। किसी कार्यक्रम के लिए आप इसके साथ बालों में गजरा भी लगा सकती हैं।

गर्मी में आग की भट्टी बन जाती है रसोई, ठंडा रखें इस तरह

गर्मियों के मौसम में घर का एक हिस्सा ऐसा होता है जिसमें कोई नहीं जाना चाहता. वह है किचेन. लेकिन, खाना बिना खाए भी रहना संभव नहीं है। ऐसे में महिलाओं को जाना पड़ता है। गैस चूल्हे के पास घंटों खड़े होकर सब्जी, रोटी, पराठे, दाल, चावल हर कुछ बनाना होता है। घर के लोगों की फरमाइश पूरी करनी होती है। टप-टप पसीना माथे से 15 मिनट के अंदर टपकना शुरू हो जाता है। रसोई में जाने वाले हर व्यक्ति का यही हाल गर्मियों में हो जाता है। ऐसे में कैसा हो जब आप रसोई में जाएं और वहां खाना बनाते समय आपको बहुत अधिक गर्मी ना लगे? इसके लिए आपको कुछ तरीके आजमाने होंगे..जो हम दे रहे हैं-

कुछ महिलाएं 12 से 2 बजे दिन में रसोई में खाना बनाने के लिए जाती हैं। इस समय धूप काफी तेज होती है जिससे घर के अंदर भी काफी गर्मी बढ़ जाती है। अब रसोई में तो एसी, कूलर लगा नहीं होता। ऐसे में बेहतर है कि आप गर्मी में खाना बनाने के समय में थोड़ा बदलाव लाएं। यदि आप दिन भर में तीन बार भोजन बनाती हैं तो कोशिश करें कि सारे काम सुबह में ही निपटा लें। आप बाद में खाते समय दिन और रात के लिए बनी सब्जी, चावल, दाल आदि को गर्म करके खाएं। इससे आपको बार-बार रसोई में नहीं जाना पड़ेगा।

गर्मी के दिनों में आसान और झटपट बनने वाली चीजें बनाएं । बहुत अधिक तेल-मसाले वाली चीजें गर्मियों में खाना भी सेहत के लिए अच्छा नहीं होता है। ऐसे में वे ही चीजें बनाएं जिसमें अधिक समय न लगे। साधारण व्यंजन चुनें, जो कम मेहनत, बिना किसी तकनीक और प्रक्रियाओं के बन जाए।

गर्मी में सबसे ज्यादा गैस चूल्हे के पास खड़े होकर खाना बनाने में जान जाती है। ऐसे में आप उन रेसिपी को बनाएं जिनमें देर तक गैस चूल्हे के पास न खड़ा होना पड़े। कम से कम समय लेने वाला व्यंजन आजमाएं। इससे आपका रूटीन चीजों से हटकर कुछ अलग भी खाने को मिलेगा। फल, सलाद, जूस, हल्की और उबली हुई चीजों का सेवन कर सकते हैं ये आसानी से पच भी जाएंगे और शरीर में पोषक तत्वों की भी कमी नहीं होगी।

आपको जो भी बनाना हो उसके लिए सामग्री पहले ही इकट्ठा कर लें। सब्जियों को काट लें। मसाले तैयार कर लें। ये सब काम आप रात में सोने से पहले थोड़ा समय निकाल कर करें या फिर सुबह कर लें।12 बजे जब आप रसोई में जाएंगे खाना बनाने तो इन सब कामों में भी अधिक समय लगता है। देर तक रसोई में खड़े रहने से फिर गर्मी लग सकती है। शरीर की सारी उर्जा पसीने के साथ निकल जाएगी।

रसोई में एग्जॉस्ट फैन और चिमनी लगी है तो इनका जरूर इस्तेमाल करें। इससे खाना बनने के दौरान उठने वाला धुंआ, भाप, तेल-मसाले की गंध निकल जाएगी। रसोई की खिड़कियों को खोल दें. इससे हवा क्रॉस वेंटिलेट होगी, जिससे नमी, गंदगी और गंध किचन के अंदर नहीं जमा होंगी। परिणामस्वरूप, जब भी आप रसोई के अंदर कदम रखेंगे तो आपको साथ-सुथरा, ठंडा और गंध-मुक्त अनुभव होगा।

( साभार – न्यूज 18 )

बच्चों का बढ़ता स्क्रीन टाइम है 89 प्रतिशत मांओं की चिंता : सर्वेक्षण रिपोर्ट

नयी दिल्ली । बच्चों के स्क्रीन टाइम (मोबाइल, टेलीविजन, टैब, लैपटॉप आदि देखने की अवधि) को लेकर 89 प्रतिशत भारतीय मां चिंता करती हैं। हाल ही में जारी की गयी एक रिपोर्ट में यह बात सामने आई है। बाजार अनुसंधान कंपनी टेकआर्क द्वारा मदर्स डे पर जारी इस रिपोर्ट के लिए 600 ऐसी कामकाजी मांओं के बीच सर्वेक्षण कराया गया जिनका कम से कम एक बच्चा तीसरी से 10वीं कक्षा में पढ़ता हो। इसमें महिलाओं से डिजिटल इकोसिस्टम में उनकी चिंताओं, चुनौतियों, रुचि और पसंदों के बारे में पूछा गया था। रिपोर्ट में कहा गया है, “मांओं का मानना है कि स्क्रीन टाइम बढ़ने से बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है और उनके मानसिक तथा सामाजिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि मांओं की सबसे बड़ी चिंताओं में निजता (81 प्रतिशत), अनुचित कंटेंट (72 प्रतिशत), टीनएज इंफ्लुएंसर (45 प्रतिशत) और डीप फेक (26 प्रतिशत) सबसे ऊपर हैं। उनका मानना है भविष्य में डीप फेक और जेन एआई अभिभावकों के लिए और बड़ी चिंता बनेगी। डिवाइसों की बात करें तो भविष्य के लिए सबसे बड़ी चिंता वीआर हेडसेट है, खासकर एप्पल विजन प्रो की लॉन्चिंग के बाद। हालांकि मांओं ने यह भी स्वीकार किया कि पांच साल पहले कि तुलना में आज डिजिटल दुनिया बच्चों के लिए ज्यादा उपयोगी और प्रासंगिक है। रिपोर्ट के अनुसार, 60 प्रतिशत से ज्यादा मां अपने बच्चों के लिए चीजें खरीदने में खर्च की गई राशि का 51-85 प्रतिशत ऑनलाइन खरीददारी पर खर्च करती हैं। वहीं, 20 प्रतिशत डिजिटल सेवी महिलाओं के मामले में यह आंकड़ा 85 प्रतिशत से भी ज्यादा है। वे अपने बच्चों के लिए सबसे ज्यादा खरीददारी अमेजन पर, खानों के ऑर्डर स्विगी पर और मनोरंजन पैकेज डिजनी हॉटस्टार पर लेती हैं।

लोस चुनाव विशेष : मतदाता सूची में महिलाओं का नाम फलाने की बीवी, पहले चुनाव आयुक्त ने हटवाया

पहला चुनाव कराने में 6 महीने लगे
नयी दिल्ली । वोटर लिस्ट में महिलाओं के नाम फलाने की बीवी, फलाने की माता या फलाने की बेटी…आपको शायद यह पढ़कर बेहद अटपटा लगे, मगर देश के पहले आम चुनाव के वक्त वोटर लिस्ट में महिलाओं का नाम सीधे-सीधे नहीं लिखवाया जाता था। पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं का परिचय कुछ इसी तरह से दिया जाता रहा है। लेकिन, एक व्यक्ति की कोशिशों ने यह तस्वीर बदलकर रख दी। वह थे देश के पहले चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन, जो नाम से भले ही सुकुमार थे, मगर फैसलों से बेहद सख्त।
बात तब की है, जब 26 जनवरी, 1950 को संविधान लागू हो चुका था। उस वक्त अंतरिम सरकार चल रही थी। ऐसे में यह सोचा गया कि देश का शासन लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित सरकार द्वारा चलाया जाए। लोग यह मानते रहे कि यह काम कुछ ही महीने का है। हालांकि, नई सरकार का गठन इतना भी आसान नहीं था। जनवरी, 1950 में चुनाव आयोग बना और होनहार सुकुमार सेन को देश का पहला चुनाव आयुक्त की कमान दी गई।
वोटिंग लिस्ट के पहले मसौदे में 40 लाख महिलाओं के नाम दर्ज नहीं हो पाए
सुकुमार सेन के सामने चुनाव क्षेत्रों के नामांकन से लेकर वोटर लिस्ट बनाने जैसी कई बड़ी चुनौतियां थीं। आखिरकार कड़ी मशक्कत के बाद मतदाता लिस्ट का पहला मसौदा प्रकाशित हुआ तो पता चला कि इसमें 40 लाख महिलाओं के नाम दर्ज होने से रह गए। इन महिलाओं को फलाने की बेटी या फलाने की बीवी के रूप में दर्ज किया गया था। आजादी से पहले कुछ इसी तरह से महिलाओं के नाम लिखे जाते थे। मगर, ये आजाद भारत था। सुकुमार सेन अड़ गए और कहा कि महिलाओं को उनके अपने नाम से ही जाना जाएगा। इसके बाद से आम चुनावों में महिला वोटर्स के नाम ही उनकी पहचान बने।
आजादी के वक्त देश में 17 करोड़ वोटर्स, सेन ने मतदाता  को बनाया ताकतवर
आजादी के वक्त देश में 17 करोड़ वोटर्स थे, जो आज की तारीख में करीब 98 करोड़ हो चुके हैं। इतना लंबा सफर तय करने में चुनाव आयोग की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इससे ज्यादा भूमिका सुकुमार सेन जैसे ईमानदार और दृढ़ कर्तव्य वाले चुनाव आयुक्तों की रही। सुकुमार सेन ने वोटर्स को ताकतवर बनाने का बीड़ा उठाया। 17 करोड़ वोटर्स को 3200 विधायक और लोकसभा के लिए 489 सांसद चुनने थे। इन वोटर्स में से महज 17 फीसदी ही साक्षर थे। ऐसे में चुनाव आयोग को मतदान के खास तरीके ईजाद करने पड़े। आयोग ने चुनाव कराने के लिए 3 लाख से ज्यादा अफसरों और चुनावकर्मियों को ट्रेनिंग दी गई।जब अंग्रेजों ने उड़ाया मजाक तो सेन ने दिया करारा जवाब
सुकुमार सेन की कवायद का अंग्रेज मजाक उड़ाते कि आने वाले वक्त में दुनिया लाखों अनपढ़ लोगों के मतदान की बेहूदी नौटंकी देखेगी। किसी ने कहा कि भारत में यूनिवर्सल वोटिंग राइट्स कराने का आइडिया ठीक नहीं है, क्योंकि उस समय तक यूरोप के बहुत से देशों और यहां तक कि खुद को लोकतंत्र का बड़ा नुमाइंदा कहलाने वाले अमेरिका में भी महिलाओं को वोटिंग राइट्स नहीं थे। मगर, सुकुमार सेन लोगों के खिल्ली उड़ाने की परवाह नहीं की और न ही उन्होंने सफल चुनाव कराने के लिए किसी तरह का कोई समझौता ही किया।
पहले आम चुनाव में हर प्रत्याशी के लिए मतपेटी
पहले आम चुनाव में सुकुमार सेन ने यह फैसला किया कि हर एक मतदान केंद्र में हर उम्मीदवार के लिए एक मतपेटी खी जाएगी और मतपेटी पर प्रत्याशी का चुनाव चिह्न छपा होगा। हर वोटर को एक खाली मतपत्र दिया जाएगा, जिसे वह अपने पसंद के उम्मीदवार की मतपेटी में डालेगा। इस काम के लिए 20 लाख स्टील के बक्सों का इस्तेमाल हुआ। चुनाव चिन्ह और बाकी ब्यौरों को दर्ज करने के लिए मतपेटी को पहले सरेस कागज या ईंट के टुकड़े से रगड़ना पड़ता था। शुरुआती दो चुनावों के बाद यह तरीका बदल दिया गया। अब मतपत्र पर हर उम्मीदवार के नाम पर मुहर लगानी होती थी। यही तरीका अगले 40 सालों तक अपनाया जाता रहा। 90 के दशक के आखिर में आयोग ने ईवीएम का इस्तेमाल शुरू किया और 2004 तक पूरे देश में ईवीएम का इस्तेमाल होने लगा।
सुकुमार सेन ने आखिर सारी तैयारियों के बाद अक्टूबर, 1951 से फरवरी, 1952 तक चुनाव कराया। यह 1952 का ही चुनाव कहा जाता है, क्योंकि ज्यादातर चुनाव 1952 में हुआ। चुनाव कैंपेन, वोटिंग और मतगणना में 6 महीने लग गए। लोगों ने इस चुनाव में जमकर भागीदारी की। कुल वोटर्स में से 50 फीसदी से ज्यादा ने वोट डाले। यूनिवर्सल वोटिंग राइट्स वाले इस चुनाव ने आलोचकों के मुंह बंद कर दिए। पूरी दुनिया तक यह मैसेज गया कि भारत ने कामयाबी के साथ इतना बड़ा चुनाव करा लिया। 1952 का चुनाव पूरी दुनिया में लोकतंत्र के इतिहास के लिए मील का पत्थर साबित हुआ।
(साभार – नवभारत टाइम्स)