Tuesday, March 24, 2026
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बाजार और रोजगार के क्षेत्र में विस्तार कर रही है हिन्दी

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आज भी हिन्दी को साहित्य तक ही सीमित किया जा रहा है और युवाओं में इस भाषा में अपने भविष्य को लेकर एक संशय है जिसका समाधान दुर्भाग्यवश शिक्षण संस्थान नहीं कर रहे। अधिकतर लोगों के लिए हिन्दी पढ़ने का मतलब प्रोफेसर, अनुवादक या राजभाषा अधिकारी बनना भर ही है मगर बदलते समय के साथ अब हिन्दी में रोजगार का दायरा भी बढ़ रगहा है क्योंकि साहित्य हिन्दी का महत्वपूर्ण अंग अवश्य है मगर हिन्दी का दायरा सिर्फ साहित्य तक सीमित नहीं है। कविता, कहानी और कथा वाचन की दुनिया से निकल कर हिन्दी रोजगार की शक्ल में ढल रही है। सरकारी दफ्तरों के बाबुओं से लेकर निजी कंपनियों के मैनेजिंग डायरेक्टर्स तक को रोजगार और कारोबार को विस्तार देने के लिए हिन्दी की जरूरत पड़ रही है। नयी प्रौद्योगिकी को लोकप्रिय बनाने और उसे आम लोगों के बीच जमाने के लिए हिन्दी अब कॉरपोरेट जगत के लिए हथियार बन चुकी है।

कल तक तकनीक के क्षेत्र में अंग्रेजी का बोलबाला था, पर अब हिन्दी भी इसमें अपनी पैठ बना रही है। कंपनियों का विज्ञापन हो या बैकिंग सेवा का विस्तार, इनका हिन्दी के बिना काम नहीं चल पा रहा। आर्थिक विकास की ओबाहवा में हिन्दी को सहभागी बनाना एक अनिवार्य कदम बन गया है। उदारीकरण और सूचना प्रौद्योगिकी के दौर में कारोबार के विस्तार और विकास ने हिन्दी जानने वालों के लिए रोजगार के कई नए अवसर पैदा किए हैं। इस भाषा पर पकड़ रखने वाले लोगों को आज सरकारी और निजी, दोनों क्षेत्रों में अपने पैर मजबूती से जमाने का मौका मिल रहा है क्योंकि हिन्दी आज साहित्य की ही नहीं जनता और बाजार की भाषा भी है इसलिए हिन्दी आज की जरूरत भी है।

हिन्दी में रोजगार की दुनिया विविध और बहुरंगी है। इसमें करियर बनाने की चाह रखने वालों के लिए यह जरूरी है कि इसे जानें और क्षेत्र विशेष में पेशेवर रुख अपना कर आगे बढ़ें।

अध्यापन 

अध्यापन के क्षेत्र में नर्सरी से लेकर स्कूल और कॉलेज तक ही नहीं, कोचिंग सेंटर्स तक में हिन्दी के जानकारों के लिए ढेरों अवसर हैं। अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में भी हिन्दी एक विषय के रूप में जारी है। इसे पढ़ाने के लिए ऐसे शिक्षकों की जरूरत है, जिन्होंने इस विषय के साथ टीचर ट्रेनिंग भी की हो। चाहे वह नर्सरी टीचर ट्रेनिंग हो, जूनियर बेसिक टीचर ट्रेनिंग, बीएड और एमएड। नए और पुराने, दोनों तरह के कॉलेजों में हिन्दी का अध्यापन चल रहा है। इस माध्यम से नए-नए कोर्स खुल रहे हैं। कोचिंग संस्थानों में भी विभिन्न प्रवेश परीक्षाओं में हिन्दी पेपरों की तैयारी करवाने के लिए ट्य़ूटर व टीचर रखे जाते हैं।

विदेशों में हिन्दी अध्यापन

वैश्वीकरण के दौर में भारत की बहुरंगी संस्कृति को जानने की ललक ने विदेशियों में हिन्दी सीखने का क्रेज पैदा किया है। संस्कृति के अलावा जो विदेशी कंपनियां भारत में अपने बाजार और कारोबार का विस्तार चाहती हैं, वे भी अपने कर्मचारियों को हिन्दी सीखने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित कर रही हैं। इस रूप में इंग्लैंड, अमेरिका, जापान, जर्मनी, रूस, चीन और कोरिया जैसे कई देशों में हिन्दी पढ़ने-पढ़ाने का काम चल पड़ा है। यहां पैठ रखने वाले भारतीयों को इसके जरिए रोजगार मिल रहा है।

बैकिंग सेवा

देश में निजी और सरकारी बैंकों ने हाल के वर्षों में अपने कारोबार में बेतहाशा बढ़ोत्तरी की है। जगह-जगह बैकिंग सेवा के विस्तार ने हिन्दी में दक्ष युवाओं को भी रोजगार प्रदान किया है। यहां संस्थान की पत्रिका का प्रकाशन हो या बैकिंग सेवा के बारे में हिन्दी भाषी जनता को जानकारी देने का, दोनों के लिए विशेष तौर पर हिन्दी अधिकारी और कर्मचारी रखे जा रहे हैं। प्रबंधकों को भी जनता से बेहतर संपर्क कायम करने के लिए हिन्दी में निपुण बनाया जा रहा है।

प्रकाशन संस्थान

देश में प्रकाशन उद्योग का धंधा विकास की नई सीढ़ियों पर चढ़ रहा है। इन उद्योगों का एक बड़ा कारोबार हिन्दी पट्टी से भी जुड़ा है। पारंपरिक प्रकाशन संस्थान अपने कारोबार को नित नए आयाम दे रहे हैं। इनके अलावा हिन्दी के बाजार में अंतरराष्ट्रीय प्रकाशन संस्थान भी अपने पैर जमा रहे हैं, चाहे वह पेंग्विन हो या हॉपर कॉलिन्स। इस उद्योग में हिन्दी संपादक और अनुवादक की आज अच्छी-खासी जरूरत है। विदेशी भाषाओं की किताबें भी इन प्रकाशन संस्थानों से हिन्दी माध्यम में अनूदित होकर आ रही हैं।

सिविल सर्विस

राज्य स्तरीय सिविल सर्विस परीक्षा हो या केन्द्र स्तर पर, इनमें अब हिन्दी माध्यम के छात्र भी अच्छी-खासी संख्या में बुलंदी के शिखर पर पहुंच रहे हैं। 2009 में छत्तीसगढ़ की किरण कौशल ने जहां हिन्दी माध्यम से सिविल सर्विस परीक्षा में तीसरा रैंक हासिल किया, वहीं 2010 के रिजल्ट में जयप्रकाश मौर्य ने नौवां रैंक। रिजल्ट में टॉप टेन में हिन्दी वालों को पहले से ज्यादा तवज्जो मिल रही है। इस आबोहवा के कारण हिन्दी माध्यम से और हिन्दी को एक विषय के रूप में चुन कर सैकड़ों युवा राज्य और केन्द्र की सिविल सर्विस परीक्षा में आ रहे हैं। सिविल सर्विस परीक्षा में परीक्षार्थियों की उमड़ी भीड़ को देखते हुए दिल्ली, इलाहाबाद और पटना जैसी जगहों पर कई कोचिंग संस्थान भी उग आए हैं। हिन्दी में स्टडी मैटीरियल तैयार कराने से लेकर पढ़ाने तक का कारोबार करोड़ों रुपयों में पहुंच गया है।

पब्लिक रिलेशन

नगरों और महानगरों में आज पीआर कंपनियां भी अपने कारोबार स्थापित कर रही हैं। इन कंपनियों में बेहतर हिन्दी के साथ लैस युवाओं की खासी जरूरत है।

ये युवा संस्थान के कारोबार को मीडिया के माध्यम से कायम करते हैं। कई बार सीधे-सीधे लोगों के बीच भी किसी कंपनी की छवि और उसके उत्पाद को प्रचारित करते हैं। रोजगार का यह नया क्षेत्र दिनोदिन खूब बढ़ रहा है।

मैनेजमेंट

अंग्रेजी में एमबीए कराने और इससे जुड़े संस्थान चलाने के कारोबार में हिन्दी ने भी अपनी दस्तक दी है। जिस तरह अंग्रेजी चैनलों की दुनिया में हिन्दी चैनलों ने अपनी जगह बनाई, उसी तरह हिन्दी माध्यम से एमबीए भी अपनी जगह बना रहा है। बाजार में ऐसे प्रशिक्षित प्रबंधकों को पैदा करने के लिए ही महात्मा गांधी हिन्दी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय ने हिन्दी माध्यम में एमबीए का कोर्स शुरू किया है। विश्वविद्यालय यह कोर्स देशभर में विभिन्न सेंटरों के माध्यम से चला रहा है।

अनुवाद

अनुवाद के क्षेत्र में हिन्दी दिन दुगनी रात चौगुनी के लिहाज से बढ़ रही है। निजी और सरकारी, दोनों तरह के संस्थानों में अनुवादकों की जरूरत पड़ रही है। इसके लिए आउटसोर्सिंग का काम भी जोरों पर है। अनुवाद ब्यूरो इन जरूरतों को पूरा करने के लिए स्थापित हुए हैं। भारत सरकार ने भी राष्ट्रीय स्तर पर अनुवाद ब्यूरो बनाने की योजना बनाई है। कर्मचारी चयन आयोग सरकारी कार्यालयों में अनुवादकों की मांग को देखते हुए हर साल परीक्षा भी आयोजित करता है। इसमें जूनियर और वरिष्ठ, दोनों तरह के अनुवादक चयनित होते हैं। अनुवाद के साथ दुभाषिया भी रखे जा रहे हैं। विदेशी फिल्मों की हिन्दी में डबिंग हो या संसद में अंग्रेजी भाषा से हिन्दी में रूपांतरण या विदेश शिष्टमंडल की भाषा का हिन्दी में रुपांतरण, इन सभी कामों के लिए दुभाषियों की जरूरत होती है। दुभाषिए को रोजगार के अलग से अवसर भी मिल रहे हैं।

राजभाषा संस्थान

केन्द्र स्तर पर राजभाषा के रूप में हिन्दी को बढ़ावा देने और उसके प्रचार-प्रसार के लिए राजभाषा संस्थान में भी हिन्दी से जुड़े लोगों को काम के अवसर मिल रहे हैं। यहां राजभाषा अधिकारी, हिन्दी सहायक व हिन्दी टाइपिस्ट जैसे पदों पर काम करने के अवसर मुहैया कराए जाते हैं।

मीडिया

प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, दोनों के अभूतपूर्व विस्तार ने रोजगार के ढेरों अवसर मुहैया कराए हैं। दोनों में संपादन और लेखन का काम प्रमुख है। इस उद्योग का विस्तार भी जारी है। एफएम रेडियो, कम्युनिटी रेडियो और इंटरनेट मीडिया के नए क्षेत्र हैं, जहां आए दिन कंटेन्ट तैयार करने और स्क्रिप्ट लेखन का काम प्रमुखता से होता है। मीडिया संस्थानों में पत्रकारिता पढ़ाने और उसके लिए सामग्री तैयार करने का काम भी तेजी से बढ़ा है।

विज्ञापन उद्योग

हिन्दी में आकर्षक और प्रभावी विज्ञापन तैयार करने के लिए युवाओं की मांग बढ़ी है। प्रसून जोशी जैसे कई लेखकों ने विज्ञापन की दुनिया में एक अलग पहचान कायम की है। इंटरनेट पर कंटेन्ट राइटिंग और अनुवाद के लिए भी हिन्दी के विशेषज्ञों और भाषाविदों की जरूरत बढ़ाई है।

भाषा विशेषज्ञ

विभिन्न सॉफ्टवेयर कंपनियां हिन्दी में लोकप्रियता हासिल करने के लिए भाषाविदों को अपने यहां अवसर मुहैया करा रही हैं। माइक्रोसॉफ्ट, एडोब, आईबीएम, क्वॉर्क एक्सप्रेस जैसे नाम प्रमुख हैं। गूगल और याहू जैसी कंपनियां अपने यहां स्तरीय सामग्री उपलब्ध कराने के लिए हिन्दी भाषाविदों को काम के अवसर मुहैया करा रही हैं।

स्क्रिप्ट और कंटेन्ट लेखन

टीवी सीरियल हो फिल्म की दुनिया, विज्ञापन संस्थाएं, कोचिंग सेंटर, प्रकाशन संस्थान या अन्य निजी कंपनियां, अपने यहां स्क्रिप्ट लेखन और कंटेन्ट राइटिंग के लिए हिन्दी के लेखकों को ढेरों अवसर मुहैया करा रही हैं। बॉलीवुड में इन दिनों स्क्रिप्ट लेखकों की अच्छी-खासी मांग है।

कॉल सेंटर

बाजार पर पकड़ बनाने के लिए अब कॉल सेंटरों में भी अच्छी हिन्दी जानने और बोलने वालों को काम के अवसर मुहैया कराए जा रहे हैं। रोजगार का यह क्षेत्र अभी शुरुआती दौर में है।

हिन्दी में वेबसाइट तथा ऐप डेवलपर

हालांकि इसकी माँग है मगर इस दिशा में काम बहुत कम हुआ है। अगर हिन्दी साहित्य, तकनीक अथवा रोजमर्रा की जानकारी आप डिजिटल माध्यम पर उपलब्ध करवाते हैं तो यह बड़ा बाजार है। डिजिटल माध्यमों में भी लेखकों और विषय विशेषज्ञों की माँग बढ़ती जा रही है। खासकर हर सरकारी विभाग का एक हिन्दी संस्करण अवश्य होता है जहाँ आप काम कर सकते हैं या काम दे भी सकते हैं।

 

अपराधियों के लिए खौफ का दूसरा नांम हैं हरप्रीत कौर, प्रियंका चोपड़ा को भी प्रेरित किया

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रोहतास।उग्रवादियों और अपराधियों को सबक सिखाने वाली “लेडी सिंघम” के नाम से चर्चित कैमूर की SP हरप्रीत कौर को आंतरिक सुरक्षा पदक से सम्मानित किया जाएगा। यह सम्मान किसी IPS को तब मिलता है जब वह दो वर्ष से अधिक समय तक नक्सल क्षेत्र में रहकर शांति व्यवस्था कायम रख सकें। कड़क पुलिस ऑफिसर की है छवि..

बिहार के भभुआ में तैनात IPS अधिकारी हरप्रीत कौर को लोग कड़क पुलिस ऑफिसर के रूप में जानते हैं। शराबबंदी में अहम भूमिका निभाने के लिए राज्य सरकार उत्पाद पदक से भी नवाज चुकी हैं। SP हरप्रीत कौर अपने कामों से लगातार सुर्खियों बनी रहती हैं।

प्रियंका चोपड़ा ने किया था हरप्रीत को फॉलो
प्रकाश झा की फिल्म ‘जय गंगाजल’ में SP आभा माथुर की भूमिका निभाते समय अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा के कैमूर SP हरप्रीत कौर को फॉलो किया था। प्रियंका की भूमिका हरप्रीत कौर की रियल लाइफ की तरह थी। फिल्म में जिस तरह से प्रियंका अपराध में शामिल लोगों पर कार्रवाई करती हैं, कमोबेश उसी तरह हरप्रीत का व्यवहार अपराधियों के साथ रहता है।

बचपन से IPS बनना चाहती थीं हरप्रीत

26 जून 1980 को पंजाब प्रान्त के बरनाला जिला के छोटे से गांव अलकड़ा में जन्मी आईपीएस हरप्रीत कौर के पिता जोगिन्दर सिंह शिक्षक हैं और माता जस्मिल कौर गृहिणी। हरप्रीत कौर कहती हैं कि उनके पिता उन्हें बचपन से ही बड़ी होकर पुलिस अफसर के वर्दी में देखना चाहते थे। कमोबेश उनका भी यही सपना था।

परेशानी के बाद भी डटी रहीं एसपी कौर

कैमूर में बतौर एसपी के पद पर तैनात 2009 बैच की महिला आईपीएस हरप्रीत कौर 31 जनवरी 2016 को भभुआ थाना क्षेत्र के सिगठी गांव में अहले सुबह एक छात्र की हत्या के बाद गांव में विधि-व्यवस्था बिगड़ने की सूचना पर मौके पर दल-बल के साथ पहुंची। स्थिति इतनी बेकाबू थी कि एसपी कौर ने अगर सूझबूझ से काम नहीं लिया होता तो एसपी समेत मौजूद पुलिस-प्रशासन के साथ बड़ी घटना हो सकती थी।

पुआल के ढेर में छुपा कर रखा था हथियार

करीब 6 घंटे तक चले आंदोलन के दौरान एसपी हरप्रीत कौर पीने के पानी व वॉशरूम जैसी व्यवहारिक परेशानियों को दरकिनार करते हुए गांव में ही छुपे छात्र की हत्या मामले के अपराधियों को गिरफ्तार करने से लेकर अपराधियों की निशानदेही पर हत्या के मुख्य आरोपी के घर के सामने पुआल के ढेर में छुपा कर रखे गए अवैध चार हथियारों को बारी-बारी से बाहर निकाल कर बहादुरी व सूझबूझ का परिचय दिया। उस वक्त के मौजूदा हालात यह थे कि अगर मौके से अपराधियों की गिरफ्तारी और छात्र की हत्या में प्रयोग की गई हथियार बरामद नहीं होते तो शायद आक्रोशितों का बवाल थम नहीं पाता।

महिला जवान के सामने आती हैं संसाधनों की कमी की समस्या

एसपी कौर की मानें तो एक महिला जवान के साथ व्यवहारिक परेशानियों की समस्या अमूमन हर दिन आड़े आती हैं। थानों में महिला वॉशरूम होने के साथ इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत है। वे कहती हैं कि महिला पुलिस जवान आन्दोलन या फिर किसी ऑपरेशन के दौरान आने वाली व्यवहारिक परेशानियों को उस वक्त दमन कर जाना ही मुनासिब समझती हैं। कारण कि वैसे जगहों पर समुचित संसाधन नहीं होते।

कई कारनामों से चर्चित हैं हरप्रीत कौर

एसपी हरप्रीत कौर जहानाबाद में बतौर एसपी के पद पर करीब 1 साल तैनात रही। इस दौरान लेवी के साढ़े 27 लाख रुपए के साथ महिला नक्सली को गिरफ्तार करने के साथ बेगूसराय में 15 माह के कार्यकाल के दौरान मूर्ति तस्करों की गिरफ्तारी करने के अलावे कई चर्चित कारनामें कर चुकी हैं।  कैमूर में एसपी के पद पर तैनाती के दौरान कुदरा और हाटा में बिगड़े कम्युनल मामले को काबू पाने के साथ हाल के दिनों में सिगठी में छात्र की हत्या मामले को सुलझा कर बहादुरी का परिचय दिया था।

 

भारतीय सेना का हाल बयां करते हुए रो पड़ीं शिल्पा, छलके आंसू

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मुंबई।एक्ट्रेस शिल्पा शेट्टी इन दिनों टीवी पर रियलिटी शो ‘सुपर डांसर’ की जज के किरदार में नजर आ रही हैं। हाल ही में पाकिस्तानी आतंकियों के हमले में शहीद हुए इंडियन आर्मी के जवानों को गुवाहाटी की लड़की मासूम ने अपने परफॉरमेंस में ट्रिब्यूट दिया। मासूम बच्ची और उसके पिता के एक्ट को देखकर शिल्पा इमोशनल हो गईं और उनकी आंखों में आंसू छलक उठे। जवानों को इतनी भी लग्जरी नहीं है कि वो छुट्टी ले पाएं…

दरअसल, एक्ट में एक पिता अपनी बेटी के साथ डांस करते हुए नजर आते हैं। लेकिन तभी सीमा पर युद्ध की घोषणा हो जाती है। इस पर बेटी कहती है, डैडी प्लीज 5 मिनट और रुक जाओ ना। बस फिर क्या, परफॉरमेंस खत्म होने के बाद फीडबैक देते वक्त शिल्पा इमोशनल हो गईं। शिल्पा ने कहा- आज मैं काम पे जा रही थी, तो मेरे बेटे ने बोला कि आज काम पे मत जाओ। जो हमारी सरहद पे लड़ रहे हैं उनके पास ये लग्जरी भी नहीं है कि वो छुट्टी ले पाएं। यह कहते-कहते शिल्पा का गला भर आया और उनकी आंखों से आंसू टपकने लगे। शिल्पा को देखकर वहां मौजूद सभी लोग इमोशनल हो गए।

वैसे यह पहली बार नहीं है जब शिल्पा किसी एक्ट को देखकर इतनी इमोशनल हुई हैं। इससे पहले 9 साल के फिजिकली चैलेंज्ड (दिव्यांग) बच्चे देव वार्ष्णेय की परफॉरमेंस और उसकी सरवाइवल स्टोरी सुनकर भी शिल्पा इमोशनल हो गई थीं। बता दें कि शिल्पा के साथ इस शो को डायरेक्टर अनुराग बासु और कोरियोग्राफर गीता कपूर भी जज कर रही हैं।

 

अपनों की बेरुख़ी के शिकार बुजर्गों का सहारा बनी, 100 साल की अरुणा

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बुढ़ापे में जिन बुज़ुर्गों को अपनों ने ही बाहर का रास्ता दिखा दिया, उन लोगों की ज़िन्दगी की तन्हाइयों को बाँटने और उन्हें आसरा देने के लिए असम की एक 100 वर्षीय वृद्धा अरुणा मुख़र्जी उनकी हमदर्द और मसीहा बनी हैं।

असम की 100 वर्षीय अरुणा मुख़र्जी ने गुवाहाटी नागरिक प्रशाशन से एक वृद्धाश्रम खोलने की अनुमति माँगी है। इस वृद्धाश्रम का संचालन वो खुद ही करेंगी।

अरुणा ने हिन्दुस्तान टाइम्स को बताया, “ मेयर ने मुझसे पूछा कि इस वृद्धाश्रम का संचालन कौन करेगा, मैंने ज़वाब दिया- ‘मैं’। ये सुनकर उनके चेहरे के भाव देखने लायक थे।“ मेयर मृगेन सरनिया और उनके सहकर्मी अरुणा के इस कदम से इतने प्रभावित है कि वे इस वृद्धाश्रम को खोलने की साड़ी कार्यवाही जल्द से जल्द पूरा करने की कोशिश में जुट गए है ताकि अरुणा इसे अक्टूबर महीने से ही शुरू कर सके।

मृगेन कहते है, “100 साल की उम्र में भी अरुणा में इतना उत्साह है कि वो उम्र के इस पड़ाव में जो कर रही हैं वो लोग अपनी युवावस्था में भी नहीं कर पाते, यह प्रशंशनीय है। “

अरुणा अपनी क्षेत्र की जानी-मानी सामाजिक कार्यकर्ता है। वे चार वोकेशनल इंस्टिटुएस चलाती हैं जहाँ कि निःशुल्क पेंटिंग बनाने का, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, ज़रदोज़ी और सॉफ़्ट टॉयज बनाने का प्रशिक्षण दिया जाता है। 100 साल की आयु पार करने के बावज़ूद उनकी दिनचर्या बहुत ही सक्रिय और उत्साह से भरी होती है और उनका स्वस्थ्य भी बहुत अच्छा है। बस ढ़लती उम्र की वजह से उनकी नज़र ज़रा कमज़ोर और सुनने की शक्ति थोड़ी कम हो गयी है। इसके बावजूद वो अपना सारा काम खुद करतीं हैं।

अरुणा के बारे में सबसे दिलचस्प बात ये है कि वो पिछले 70 सालों से सिर्फ़ चाय और बिस्कुट खा कर ही जीवित हैं। उन्हें संतरे भी बहुत पसंद हैं और वो संतरों के मौसम में संतरे भी खाती हैं। उन्होंने 1947 में बांग्लादेश ( पूर्वी पाकिस्तान ) के शरणार्थियों को देख कर ये खानपान अपनाया। अरुणा का जन्म ढाका में हुआ था पर 80 साल पहले जादुलाल मुख़र्जी से विवाह होने पर वो उन्हीं के साथ आ कर असम में बस गयीं, उनके पति गुवाहाटी कॉटन कॉलेज में रासायन विभाग में थे।

अरुणा ने द न्यू ई इंडियन एक्सप्रेस से साक्षात्कार में बताया, “मैंने बांग्लादेश से भागे सैकड़ों भूखे शरणार्थियों को गुवाहाटी रेल्वे स्टेशन पर शरण लिए हुए देखा। मैंने छोटे-छोटे बच्चों को भूख से बिलखते देखा, तो उनके लिए खाना बना कर उन्हें खाने के लिये दिया। धन जुटाने के लिए मैंने कागज़ की थैलियाँ बना कर बेचे ताकि मैं उन पैसों से ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को खाना खिला सकूँ…..कुछ समय बाद वो लोग कहीं और चले गये पर मैं ये कभी नहीं भूल पायी कि भूखे रहने का एहसास कैसा होता है। इसलिए मैं आज तक बिस्कुट और चाय के अलावा कुछ नहीं लेती।“

अरुणा अपने बच्चों से अलग स्वतंत्र रूप से रहती हैं। उनका एक बेटा और बेटी कनाडा में रहते हैं और तीन बेटे गुज़र चुके हैं।अरुणा की ज़िन्दगी पर फ़िल्म बना रही, डॉक्यूमेंट्री फिल्म मेकर बबिता शर्मा ने कहा, “100 साल की उम्र में भी उनका ये जज़्बा कायम है। वो बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में जाती हैं और बाढ़ पीड़ितों की मदद करती हैं।“

(साभार – द बेटर इंडिया)

 

सैकड़ों गरीब बच्चों को पढ़ा रही है मीना निझवान!

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हममें से शायद ही कोई होगा जो समाज को कुछ देने की ख्वाहिश न रखता हो। हम सब सामाजिक मदद करना चाहते हैं, लेकिन अक्सर अकेले होने की वजह से या कहाँ से शुरू करें इन सवालों से जूझते रहते हैं। और अपने रोजमर्रा की ज़िन्दगी में खो जाते हैं।

नोएडा की मीना निझवान ‘संकल्प साक्षरता समिति’ के माध्यम से सैकड़ों जरूरतमंद बच्चों को पढ़ा रही हैं। 1993 में मीना निझवान ने अपनी घरेलू सहायक पदमा को पढ़ाना शुरू किया। तब उन्हें कुछ तो अंदाजा था कि ये पहल एक दिन हज़ारो बच्चों की ज़िन्दगी संवारने वाली है।

“मैं आर्मी बैकग्राउंड से आती हूँ, इसलिए हमेशा समाज के लिए कुछ करने की बड़ी इच्छा रखती थी। जब मेरे पति आर्मी से रिटायर हुए और हम एक स्थाई जगह रहने लगे। मैंने पदमा को पढ़ाना शुरू किया,” 71 वर्षीय मीना बताती हैं।

1995 में जब मीना और पदमा को अपने घर पास यूँही भटक रहे चार गरीब बच्चे दिखे, तो वे उन्हें अपने घर लेकर आ गयी। उन्होंने बच्चों को नहलाया, खाना खिलाया और उनसे ये वादा लिया कि अब वो पढ़ाई शुरू करेंगे।

मीना के लिए ये बहुत ख़ुशी की बात थी कि उन बच्चों ने वादा निभाया और हर दिन उनके घर पढ़ने को आने लगे। धीरे धीरे आसपास ये बात फैली तो कूड़ा उठाने वाले, रिक्शा चलाने और घरेलु कामकाजी परिवारों के बच्चे भी उनके घर पढ़ने को आने लगे। अब मीना का घर एक छोटे स्कूल में बदलने लगा। बच्चों के उत्साह ने मीना को प्रेरित किया और उन्होंने अपने इस जिम्मे को ‘संकल्प साक्षरता समिति’ का नाम दे दिया। इन बच्चों को पढ़ाने के साथ साथ उनकी कॉपी-किताबों, स्टेशनरी सहित खाने का इंतज़ाम भी मीना करने लगीं।

“बच्चों की बढ़ती संख्या से मैं खुश भी थी और थोड़ी चिंतित भी, क्योंकि मेरे पास पर्याप्त धन नहीं था कि उनकी परवरिश कर सकूँ। मेरे पिता की बंद पड़ी फेक्ट्री में नमक के पैकेट्स थे उन्होंने मुझे कहा, देखो अगर इनसे तुम्हारी कुछ मदद हो पाए तो.. फिर मैं नमक के पैकेट्स लेकर निकल पड़ी, अनजान लोगों के दरवाजे खटखटाती और उनसे इन बच्चों की पढाई के लिए नमक के पैकेट खरीदने को कहती,” मीना अपने मुश्किल वक़्त को याद करते हुए कहती हैं।

बच्चों के साथ व्यवहारिक चुनौतियाँ भी कम नहीं है। ये वो बच्चे हैं जिनके साथ उनके समाज और परिवार में बुरी तरह व्यवहार किया जाता है, उन्हें मारना-पीटना और गाली-गलौज रोजमर्रा की सामान्य बात है। इस माहौल में पल रहे बच्चों के लिए मीना पर भी विश्वास करना कठिन है।

“धीरे धीरे मैंने ये महसूस किया कि बच्चों को पढ़ाना बेशक जरुरी है लेकिन साथ ही उनके परिवार को संवेदनशील बनाना भी उतना ही जरुरी है। मैंने इनके घरों में जाना शरू किया और उनके माता-पिता को ये बातें समझाने की कोशिश की। आखिर मेरे जीवन का मकसद सिर्फ बच्चों को शिक्षा देना भर नहीं है बल्कि उन्हें जिम्मेदार नागरिक बनने में मदद करना है,” मीना बताती हैं।

मीना के शिक्षा से ज़िंदगियाँ संवारने के प्रयास को स्माइल फाउंडेशन ने सहयोग देने का फैसला लिया। तब से उनके बच्चों की संख्या निरंतर बढ़ रही है।

“स्माइल फाउंडेशन के सहयोग से हम बच्चों को संकल्प स्कूल में एलिमेंट्री शिक्षा दे पा रहे हैं, उसके साथ ही हम उन्हें मुख्यधारा के स्कूलों में आगे की पढाई के लिए दाखिल कर रहे हैं। अब हम फॉर्मल स्कूलों की फीस का खर्च उठाने की ओर ध्यान लगा रहे हैं।”

मीना ने अपने घर के पास एक स्कूल में प्रौढ़ शिक्षा की शुरुआत की है, जहाँ वे पास के झुग्गियों की 50 महिलाओं को मुफ़्त शिक्षा दे रही हैं।

मीना निझवान अकेले दम पर बदलाव की प्रेरक हैं। वे मिसाल हैं ऐसे लोगों के लिए जो समाज के लिए कुछ करना चाहते हैं। हमें अकेले ही अपने घर से बदलाव की शुरुआत कर देनी चाहिए, आगे का कारवां अपने आप जुड़ता जाता है।

स्माइल फाउंडेशन राष्ट्रीय स्तर की विकास संस्था है जो 4 लाख बच्चों और उनके परिवारों को हर वर्ष 200 से ज्यादा वेलफेयर प्रोजेक्टो से सीधे लाभ पहुंचाती है।

(साभार – द बेटर इंडिया)

महिलाओं की कला को पहचान दिला रही है अरबन छोकरी

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अरबन छोकरी..यह नाम अब एक ब्रांड बनता जा रहा है. इसमें सिर्फ साड़ियां ही नहीं ड्रेस मैटेरियल के साथ ही मॉडन ड्रेस के लिए जाना माना बुटिक बन गया है।

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5 साल पहले प्रतिभा टालाटुले ने इसे कला संगम के नाम से आरम्भ किया था। इसका उद्देश्य उन महिलाओं की कला को सामने लाना था जिनमें कला थी और जो आगे काम करना चाहती थीं मगर आर्थिक अभाव के कारण उनका यह सपना अधूरा रह गया था।

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बाद में इसे अरबन छोकरी नाम दिया गया। इसे महिलाओं की पहचान बनाने के लिए शुरू किया है। प्रतिभा का कहना है कि समाज का सबसे मजबूत स्तम्भ महिलाएं हैं और उन्हें खुद अपनी पहचान बनानी पड़ेगी इसलिए उन्होंने अपने इस बुटिक में हाथों की कारीगरी को प्रमुखता दी है।

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कढ़ाई, एप्लिक, फेबरिक पेंटिग के साथ ही रचनात्मकता को प्रमुखता दी है। उन्होंने अपने इस काम में जरूरतमंद महिलाओं का साथ लिया है ताकि वे भी खुद की क्षमता को पहचानकर आर्थिक रूप से स्वाबलम्बी हो सके।

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अरबन छोकरी की शुरुआत में प्रतिभा ने अपने रिश्तेदारों के वैवाहिक कार्यक्रमों के लिए डिजाइनर परिधान तथा सजावट का अन्य सामान बनाकर की। धीरे – धीरे महिलाएं जुड़ीं  और आज 15 महिलाएं जुड़ी हैं। नागपुर के अरबन छोकरी से अब कोलकाता और मध्यप्रदेश की महिलाएं भी जुड़ रही हैं।

(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं)

स्त्री को सशक्त बनाने की राह बताती दुर्गापूजा

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 मालविका घोष

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नवरात्रि के साथ माँ का आगमन हो चुका है। पंडालों में श्रद्धा और मस्ती के मिले – जुले संगम में डूबने – उतराने के लिए हम तैयार है। जहाँ देखिए, वहीं पर माँ के नेत्र दिख पड़ते हैं।

बंगाल का सबसे बड़ा उत्सव दुर्गापूजा जहाँ देवी के नौ रूपों की आराधना की जाती है। रोशनी में नहाया कोलकाता अद्भुत लगता है मगर इसकी शुरुआत बाड़ी पूजो के रूप में ही हुई थी, ये हम सब जानते हैं।

1790 का समय था, कोलकाता बस रहा था और राय बाबू के घर से हुगली के गुप्तीपाड़ा में रहने वाले 12 मित्रों ने बारवारी पूजा आरम्भ की। इस पूजा के लिए घरों से अर्थ की व्यवस्था की जाती है और अब तो बाजार से लेकर सितारे तक सब हाजिर हैं। यही पूजा सार्वजनीन भी है।

महालया देवी आगमन की सूचना है और पूर्वजों को तर्पण देने के लिए उमड़ी लोगों की भीड़ से गंगा के घाट सज उठते हैं।

महाषष्ठी, महासप्तमी, महाअष्टमी, महानवमी के दौरान पूजा का उत्साह अपने चरम पर होता है और फिर आता है विजयादशमी का दिन, जब माँ कैलाश जाती हैं। यह पक्ष देवी पक्ष कहलाता है।

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नवरात्रि और इस उत्सव से जुड़ी है माँ शक्ति की आराधना और स्त्री शक्ति का सम्मान। कन्याओं को पूजे जाने का दिन मगर कन्याओं और में देवी का वास है, यह बात ही आजकल उपहास लगती है जब हम छोटी बच्चियों से लेकर स्त्री का उत्पीड़न देखते हैं।

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आज लड़कियों की तस्करी और बलात्कार की घटनाओं से अखबार भरे पड़े हैं और उसे सनसनीखेज बनाने की होड़ चल पड़ी है। परिवारों में भी लड़कियों से पक्षपात होता है और लड़के मान लेते हैं कि लड़कियो का कोई महत्व नहीं होता और वे उसे अपनी संपत्ति भर समझने लगते हैं तो यह दोहरी मानसिकता खीझ उत्पन्न करती है। परिवार की परवरिश और वातावरण में ही लड़कों को नहीं सिखाया जाता कि वे लड़कियों का सम्मान करें तो स्त्री को सम्मान कहाँ से मिलेगा?

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स्त्री सक्षम है और जब कुम्हारटोली की महिला शिल्पकार चाइना पाल से मुलाकात हुई तो बहुत कुछ जानने और समझने का मौका मिला। चाइना महज 19 साल की उम्र से ही माँ की प्रतिमा गढ़ रही हैं। पिता को देखकर रुचि जगी और उनके गुजरने के बाद चाइना ने परिवार का दायित्व कंधे पर उठाया। चाइना कहती हैं कि अगर कोई काम लगन और निष्ठा से किया जाए तो कुछ भी मुश्किल नहीं है। राज्यपाल से सम्मानित हो चुकीं चाइना का काम बेहद सराहा गया है।

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उनकी प्रतिमा रामकृष्ण मिशन से लेकर हावड़ा व कई अन्य जगहों पर जाती हैं। कुम्हारटोली में और भी महिला मूर्तिकार हैं जिनमें माला पाल का नाम भी शामिल है। चाइना को लोग कुम्हारटोली में दशभुजा के नाम से पुकारते हैं। ये एक शुरुआत है मगर स्त्री जब खुद कदम बढ़ाएगी और अपने साथ दूसरी स्त्रियों के सम्मान की रक्षा के लिए खड़ी होगी तो सशक्तीकरण खुद ही हो जाएगा।

(आलेख और तस्वीरें एक युवा पत्रकार मालविका घोष की हैं और उत्सव को अपनी दृष्टि से देखने का प्रयास किया है। अगर आप भी अपराजिता के लिए लिखना चाहती हैं या चाहते हैं तो आपका स्वागत है। विशेषकर युवाओं को अभिव्यक्ति का माध्यम देना अपराजिता का प्रयास है)

गरबा और डांडिया नाइट पर दिखें सिर्फ आप ही आप

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नवरात्र के दिनों में हर दिन एक नया सेलिब्रेशन है। कभी डांडिया तो कभी दुर्गा पूजा, दोस्त हों या रिश्तेदार, त्योहारों पर एक साथ सेलिब्रेट करने की तैयारियों के बीच खास दिखने की चाहत भला किसमें नहीं होगी। गरबा या डांडिया नाइट पर कैसी ड्रेस पहनें, कैसा मेकअप हो जैसी कई प्रकार की उधेड़बुन हमारे मन में चलती है। तो चलिए, आपकी इस उधेड़बुन को हम सुलझा देते हैं, मेकअप एक्सपर्ट भारती तनेजा के खास टिप्स आपके जरूर काम आएंगे।
कैसा हो मेकअप
मौसम भी ही कितना बेहतरीन हो लेकिन भीड़-भाड़ और डांस के दौरान पसीना आना वाजिब है। ऐसे में मेकअप के दौरान ध्यान रखें कि इसका बेस वाटरप्रूफ हो जिससे पसीने के साथ-साथ मेकअप न बहे।

आप चाहें तो ग्लॉसी या न्यूड मेकअप को भी तरजीह दे सकती हैं। इसके साथ-साथ गुलाबी, पीच या ब्राउन ब्लशर खूब फबेगा। रात के समय ब्लशर थोड़ा डार्क रखें और इसे गालों से कनपट्टी तक ब्रश से लगाएं। ध्यान रहे कि ब्लशर आपके स्किन टोन के हिसाब से ही हो। वहीं लिपस्टिक के बजाय आप लिप पेंसिंल ले लाइन के बाद लिपग्लॉस का इस्तेमाल करेंगी तो आपका लुक अधिक ब्राइट लगेगा। ट्रैडिशनल टच के लिए स्वरोस्की वाली पतली या छोटी बिंदी लगाएं।

आंखों का मेकअप हो खास
कोई भी मेकअप तब तक पूरा नहीं है जब तक आंखों के मेकअप को तरजीह न दी जाए। डांडिया नाइट पर खास लुक के लिए आप आंखों पर पर्पल, पिंक, ग्रीन, ब्लू या कॉपर शेड के आइशैडो ट्रइ कर सकती हैं जो पार्टी लुक के लिए परफेक्ट हैं। यह ध्यान रखें कि आइशैडो के शेड्स आपकी ड्रेस से मैच करें।

आइब्रो के ठीक नीचे आप स्पार्कल्स भी लगा सकती हैं जिससे रात में आपका मेकअप ब्राइट लगेगा। चाहें तो आंखों के नीचे कलरफुल लाइनर लगाकर स्मज करें, सिर्फ इतने से ही आपकी आंखें आकर्षक लगेंगी। लाइनर या काजल को बाहर की ओर निकालकर लगाने से भी आपका लुक चेंज हो जाएगा।

ट्राइ करें फैंटेसी मेकअप 
आजकल बैकलेस, क्रॉसलेस या हाल्टर लुक वाली चोली का काफी चलन है। इसमें पीठ, गर्दन आदि का काफी एक्सपोज होता है। कुछ अलग दिखने की चाह है तो आप अपने बैक या गर्दन के खुले भाग पर फैंटेसी मेकअप भी करवा सकती हैं। इसमें मेंहदी, स्पार्कल्स और कई रंगों के प्रयोग से तरह-तरह की कलाकृतियां बनवा सकती हैं। सिके अलावा, चूडियों की जगह भी इनका प्रयोग आकर्षक लगेगा।

हेयरस्टाइल हो खास
आमतौर पर लड़कियां आजकल खुले बाल ज्यादा पसंद करती हैं पर आप अलग लुक के लिए अपनी हेयरस्टाइल के साथ थोड़े बदलाव जरूर करें। बालों के आगे भाग की कई चोटियां गुथ लें और पूछे से प्लेन चोटी या जूड़ा बनाएं या फिर आगे के बालों को कर्ल कराकर निकाल लें और पीछे चोटी रखें। चाहें तो चेटियों में मोती या स्वरोस्की वाले पिन क्लच करें। डांडिया नाइट पर यकीनन सिर्फ आप ही आप दिखेंगी।

 

स्टेशन पर पढ़ती है 8 साल की बच्‍ची, अफसर बनना चाहती है

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उरई. घर में छाया अंधेरा, फिर भी नहीं बुझी पढ़ाने आस। कुछ ऐसी ही तस्‍वीर यूपी के जालौन जिले में सामने आई है। यहां एक बच्‍ची रोजाना रेलवे स्‍टेशन पर आकर अपनी कॉपी-किताब खोलकर बैठ जाती है। पढ़ाई पूरी होने के बाद व‍ह वापस चली जाती है। कई बार वह स्‍टेशन पर ही सो जाती है। सीएम के नि‍र्देश पर डीएम ने उसकी मां को आवास और पेंशन दिए जाने की घोषणा की।

पढ़ने के स्‍कूल से तो मिला ड्रेस-किताब लेकिन झोपड़ी में नहीं मिली लाइट

– जालौन जिले के तिवारी अपने परिवार के साथ उरई रेलवे स्‍टेशन के पास एक झोपड़ी में रहते हैं।
– इनकी 6 साल की बेटी दिव्या प्राइमरी स्कूल में क्‍लास 2 की छात्रा है।
– दिव्‍या की मां मोनिका ट्रेनों में भीख मांगकर पेट पालती हैं, जबकि तिवारी मजदूरी करते हैं।
– बड़ी मुश्किल से 2 वक्‍त की रोटी का जुगाड़ हो पाता है। झोपड़ी में बिजली कनेक्शन भी नहीं है।
– फिर भी दिव्‍या के पढ़ने-लिखने के शौक को देखते हुए उसका सरकारी स्कूल में एडमिशन कराया है।
– स्कूल से उसे किताबें-ड्रेस तो मिल गईं, लेकिन झोपड़ी में लाइट नहीं आने के कारण वह पढ़ नहीं पाती थी।
– इसलिए वह पास स्थित स्‍टेशन पर चली जाती है और वहीं रोशनी में बैठकर पढ़ाई करती है।
– अक्‍सर वह स्‍कूल ड्रेस में ही होती है। लोग आते-जाते रहते हैं। रेलवे का अनाउंसमेंट और ट्रेन का शोर होता रहता है।
– लेकिन दिव्‍या बिना कहीं ध्यान दिए जमीन पर कॉपी-किताब फैलाए पढ़ती रहती है।

अफसर बनना चाहती है दिव्या

– दिव्या को अभी नहीं पता कि वह क्या बनना चाहती है।
– मां मोनिका बताती हैं, कभी-कभी बिटिया कहती है कि वह अफसर बनेगी, लेकिन कौन सी अफसर बनेगी, नहीं पता।
– रेलवे स्टेशन पर स्‍वीट की दुकान लगाने वाले मशहूर शर्मा बताते हैं, ऐसा जज्बा कम ही देखने को मिलता है।

सीएम ने आवास और पेंशन देने का दि‍या नि‍र्देश

सीएम अखिलेश ने रवि‍वार को दिव्या के परिवार को आवास और पेंशन देने के निर्देश दिए। इसके बाद डीएम संदीप कौर

ने दिव्या और उसकी मां को आवास और पेंशन दिए जाने की घोषणा की। उन्होंने इसके कागजात दिव्या की मां को सौंप

दिए।
 

पहले नक्सली थीं, सरेंडर कर कमांडो बनीं; अब दो नक्सलियों को मार गिराया

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रायपुर.छत्तीसगढ़ में बस्तर के कुदूर इलाके में इस बार महिला कमांडो ने दो नक्सलियों को मार गिराया है। बस्तर में ऐसा पहली बार हुआ है। हमला करने के बाद दोनों नक्सली इंद्रावती नदी पार कर भागने की कोशिश कर रहे थे। बस्तर में फोर्स ने नक्सलियों के खिलाफ पिछले 9 महीने में 94 लोगों को मार गिराया है। जिन कमांडो ने नक्सलियों को ढेर किया, वे कभी खुद नक्सली थीं…

– ऑपरेशन में तीन महिला कमांडो प्रमिला कश्यप, फूलो मरकाम और कोसी भी शामिल थीं। ये तीनों भी पहले नक्सली थीं, जिन्होंने सरेंडर किया था।

– पुलिस ने इन्हें ट्रेनिंग दी और कमांडो बनाया। हथियार चलाने का प्रशिक्षण दिया। इनके हाथ में एसएलआर थी। प्रमिला का कहना है कि उन्हें पता था कि नक्सलियों का मूवमेंट क्या होगा।

– इससे उन्हें स्ट्रेटजी समझने में देर नहीं लगी और एनकाउंटर में आसानी हुई।

एक घंटे तक हुई फायरिंग

– दो दिन पहले बस्तर के कुदूर इलाके में नक्सलियों ने पुलिस पार्टी पर अटैक किया था। इसके बाद डिस्ट्रिक्ट पुलिस फोर्स, डीआरजी और एसएएफ की ज्वाइंट पार्टी को एनकाउंटर के लिए जंगल में भेजा गया।

– शुक्रवार की सुबह सांगवेल के पास नदी किनारे नक्सली दिखे। नक्सलियों को फोर्स की मूवमेंट का पता लग गया और उन्होंने हमला कर दिया। इसके बाद करीब एक घंटे तक दोनों तरफ से फायरिंग चलती रही।

– मुठभेड़ के बाद सर्चिंग में पुलिस ने दो नक्सलियों के शव बरामद किए हैं। जिनकी पहचान नहीं हो पाई है, लेकिन इन्हें नक्सली लीडर विलास की गैंग से जुड़ा माना जा रहा है।

– नक्सलियों को मारने के बाद डीआरजी की टीम के साथ नक्सलियों की लाश को लेकर ये लेडी कमांडो पुलिस हेडक्वार्टर पहुंचीं। इससे पहले भी पुलिस की इस टीम के साथ 5 बार मुठभेड़ हो चुकी है।

– कमांडो प्रमिला के मुताबिक, उन्हें पता था कि नक्सलियों का अगला मूवमेंट क्या होगा। इससे उन्हें स्ट्रेटेजी समझने में देर नहीं लगी और एनकाउंटर में आसानी हुई।

नक्सली से कमांडो बनी महिला की शादी भी पुलिस ने करवाई

– ऑपरेशन में शामिल तीनों लेडी कमांडो प्रमिला कश्यप, फूलो मरकाम और कोसी पहले खुद नक्सली थीं। इनके सरेंडर करने के बाद इन्हें फोर्स में नौकरी दी गई और पुलिस ने इन्हें ट्रेनिंग देकर कमांडो बनाया।

– इनमें से कोसी की शादी भी पुलिस ने करवाई थी। कभी जंगल में भटकने वाली इन महिलाओं के हाथों में आज एसएलआर जैसे खतरनाक हथियार हैं।

– कमांडो प्रमिला का कहना है कि अब हम एनकांडटर के दौरान गोली चलाते हैं और जब नक्सली थे, तब भी गोली चलाते थे, लेकिन इन दोनों में जमीन-आसमान का फर्क है। तब गुनाह लगता था, छिप-छिपकर फिरते थे और अब गर्व हो रहा है।

बस्तर में 9 महीने में 94 नक्सली ढेर

– आईजी एसआरपी कल्लूरी के मुताबिक साल 2014 तक पुलिस हर साल औसतन 34 से 36 नक्सली मारती थी। इसके बाद 2015 में 48 नक्सलियों को मारा गया।

– वहीं 2016 में पुलिस ने अब तक 94 नक्सलियों को मार गिराया है। हालांकि, कुछ सोशल ऑर्गनाइजेशन की तरफ से बस्तर में इन एनकाउंटर को फर्जी होने का आरोप भी लगाया जाता रहा है।