Sunday, March 22, 2026
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जीएसटी की नई दरों में आम लोग हुए खास

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गुड्स एवं सर्विसेज टैक्स-जीएसटी की चार दरों पर सहमति बन गई है. इसमें आम आदमी को बड़ी राहत दी गई है. जीएसटी काउंसिल ने गुरुवार चार स्तरीय जीएसटी दर का फैसला किया. ये दरें होगीं 5, 12, 18, 28 फीसदी.

जीएसटी काउंसिल की बैठक के बाद केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इस फैसले का ऐलान किया. जेटली ने कहा कि

जीएसटी को लागू करने की तैयारियां सही दिशा में चल रही हैं. काउंसिल की बैठक में कर दरों के ढांचे और मुआवजे के फॉर्मूले को अंतिम रूप दिया गया.

ये होंगी जीएसटी दरें

जिन वस्तुओं पर इस समय उत्पाद शुल्क और वैट सहित कुल 30-31 प्रतिशत कर लगता है उन पर जीएसटी दर 28 प्रतिशत होगी. आम लोगों की सामान्य उपभोग की वस्तुओं पर जीएसटी की दर 5 प्रतिशत होगी. जीएसटी में 12 प्रतिशत और 18 प्रतिशत की दो मानक दरें होंगी. जेटली ने कहा, जीएसटी के तहत उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में शामिल खाद्यान्न सहित आम व्यक्तियों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली 50 प्रतिशत वस्तुओं पर शून्य कर लगेगा.

राजस्व का क्या होगा ढांचाअनाज पर नहीं लगेगा कोई टैक्स
जेटली ने ऐलान किया कि आम आदमी के द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे खाद्यान्न पर कोई टैक्स नहीं होगा.

उच्चतम दर के प्राप्त होने वाले कर से होने अतिरिक्त राजस्व आय का इस्तेमाल आवश्यक उपभोग की वस्तुओं पर कर की दर पांच प्रतिशत रखने में किया जाएगा और आम उपभोग की कुछ वस्तुओं को 18 प्रतिशत के दायरे में हस्तांतरित किया जायेगा. लक्जरी कारों, तंबाकू, पान मसाला, कार्बोरेटेड पेय पदार्थों पर उपकर लगाया जायेगा, और इसके साथ इनपर स्वच्छ उर्जा उपकर के अलावा एक और उपकर लगाया जाएगा जिससे मिलने वाली राशि का इस्तेमाल राज्यों को राजस्व में होने वाले नुकसान की भरपाई के लिये किया जायेगा. जीएसटी लागू होने के पहले साल में राज्यों को उनके राजस्व नुकसान की भरपाई के लिये 50,000 करोड़ रपये की आवश्यकता होगा.

नुकसान की भरपाई को लेकर सहमति
इससे पहले वित्त मंत्री जेटली ने बताया था कि वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) परिषद में नई कर प्रणाली से राज्यों को होनेवाले नुकसान की भरपाई पर लगभग आम सहमति बन गई है.

 

छठ के गीतों में अब है बेटी की कामना

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सांझ के देबई अरघिया, और किछु मांगियो जरूर,

पांचों पुत्र एक धिया (बेटी), धियवा मंगियो जरूर.

रोहतास के नोखा गांव का अंकित छठ के ऐसे ही गीत सुनते हुए बड़ा हुआ है. वो कहता है, “बहुत अच्छा लगता है जब मां के मुंह से ये गीत सुनता हूं. इस गीत में बेटी को सूर्य भगवान से मांगा जा रहा है और ये ही इस महापर्व की ख़ासियत है.”

19 साल का अंकित जो बात कह रहा है वो हाल के सालों में छठ के मौके पर बड़ी शिद्दत के साथ रेखांकित की जा रही है. छठ के पारंपरिक गीतों में छठी माता से बेटी देने की प्रार्थना की जाती है. एक गीत जो बहुत लोकप्रिय है, उसके बोल है –

रूनकी झुनकी बेटी मांगीला, पढ़ल पंडितवा दामाद

छठी मइया दर्शन दींही ना आपन. ( खेलती कूदती बेटी और पढ़ा लिखा दामाद चाहिए)

इस बारे में बात करते हुए लोकगायिका चंदन तिवारी कहती हैं, “आप देखें हमारे यहां जब आशीर्वाद में कहा जाता है दूधो नहाओ पूतो फलो या फिर पुत्रवती भव. यानी बेटी की कामना कहीं नहीं है. लेकिन छठ में बेटी की भी कामना है और धनवान नहीं बल्कि पढ़े लिखे दामाद की कामना व्रती करती है.”

छठ मुख्य रूप से बिहार-झारखंड में मनाया जाता है. बहुत पवित्रता के साथ मनाए जाने वाले इस पर्व में डूबते और उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है.

इस महापर्व और स्त्रियों की भूमिका के बारे में हिंदू धर्म के जानकार पंडित रामदेव पाण्डे बताते हैं, “छठ के बारे में तो कहा ही जाता है कि इस व्रत को पहली बार सतयुग में राजा शर्याति की बेटी सुकन्या ने रखा था. इसलिए इसमें स्त्री स्वर की प्रधानता है. कोई ऐसा पर्व नहीं है जिसमें बेटी की कामना हो, छठ व्रत में ये कामना है. दुर्गापूजा में भी नारी की पूजा होती है लेकिन वहां बेटी की कामना नहीं है.”

छठ के गीतों में सभी तरह का काम करने वाले लोगों की बेटियों का जिक्र है. एक गीत के बोल है-

छोटी रे मोटी डोमिन बेटी के लामी लामी केश,

सुपवा ले आइहा रे डोमिन, अरघ के बेर

छोटी रे मोटी मालिन बेटी के लामी लामी केश,

फुलवा ले आइहा रे मलिन, अरघ के बेर …..

वरिष्ठ साहित्यकार और लोकगायक शांति जैन कहती है, ”आप इन गीतों को देखिए इसमें ऊंच नीच, छोटे बड़े सभी तरह के भेदभाव टूटते हैं. जातीय जकड़नें टूटती हैं. एक तरफ साक्षात देवता होते हैं और दूसरी तरफ पूजा की सारी सामग्री प्रकृति से ली हुई जिसको बनाने में समाज के सभी वर्गों की जरूरत है. इसी पर्व में आप डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देते है, इसी में आप बेटी देने की प्रार्थना करते है. बाकी किसी पर्व में ऐसा कहां है ?”

ये जातीय और धार्मिक जकड़नें किस तरह टूटती है इसका ज़िक्र वरिष्ठ मैथिली लेखिका उषा किरण ख़ान करती हैं.

वो बताती हैं, “हमारे यहां तो मुसलमान औरतें भी छठ करती हैं. बस वो छठ के पकवान नहीं पकाती हैं, सिर्फ फल और सब्जियां ही चढ़ाती हैं. जब हम छोटे थे तो हमने उनसे पूछा कि वो पकवान क्यों नहीं पकाती है, तो उन्होंने बड़े भोलेपन से इसका जवाब दिया कि हमारा छुआ वो( भगवान) नहीं खाएंगे इसलिए. इस एक बात से आप समझे कि पर्व कितना व्यापक है.”

अपनी शूटिंग में व्यस्त छोटे पर्दे की लाली यानी रतन राजपूत छठ के मौके पर पटना नहीं आ पा रही है. रतन राजपूत ने भी कुछ साल छठ व्रत किया था. फोन पर बातचीत में वो कहती हैं, “औरत के बिना तो सब कुछ अधूरा है. वो अगर अपने महत्व को समझ जाए तो औरत को बढ़ने से कौन रोक सकता है.”

 

कोरिया में मिसेज वर्ल्ड 2016 में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगी मोहिनी शर्मा

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मुंबई- उद्यमी मोहिनी शर्मा माने मिसेज वर्ल्ड प्रतियोगिता के 2016 के संस्करण में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगी। यह प्रतियोगिता कल कोरिया में होगी। 28 वर्षीय मोहिनी के सिर पर इस वर्ष मई में मिसेज इंडिया का ताज सजा था।
डिजाइनर मासूमी मेवावाला ने खास तौर पर उनके गाउन और पारपंरिक पोशाक पर काम किया है जो भारत की आत्मा का प्रतिनिधित्व करेगा। मोहिनी ने कहा कि परिवार, काम और प्रतियोगिता की तैयारी के बीच संतुलना बनाना आसान काम नहीं था।
बहरहाल, वह खुश हैं कि वह आखिरकार इन सब में संतुलन बैठाने में कामयाब रही। उन्हें खुशी है कि वह भारत का प्रतिनिधत्व एक वैश्विक मंच पर कर रही हैं।
उन्होंने कहा ‘‘ यह अबतक आनंदपूर्ण सफर रहा है। छोटी से छोटी तैयारी ने मुझे बहुत कुछ सिखाया। मैं अतंरराष्ट्रीय मंच पर अपने देश का प्रतिनिधित्व करने का इंतजार कर रही हूं।’’ मोहिनी ने एक बयान में कहा, ‘‘ यह हमेशा से मेरा सपना था और आखिरकार मैं इसे सच होते हुए देख रही हूं। मुझे आप सभी के समर्थन और स्नेह की आशा है।’’

 

ये शख्स है जायकेे की दुनिया के बेेताज बादशाह

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जायके की दुनिया में संजीव कपूर चर्चित नाम  है। भारत का शायद ही ऐसा कोई घर होगा जहां लोग इस शेफ को चेहरे से न पहचानते हों। पिछले कुछ सालों से टीवी पर उनके कुकरी शो बेहद पसंद किए जाते हैं। अपने खाने के दम पर संजीव कपूर सिर्फ भारत ही नहीं पूरी दुनिया में पहचाने जाते हैं। टीवी के एक चर्चित शो में इस बार वे नहीं दिखाई दे रहे हैं। इसे लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। जानते हैं उनके बारे में…

संजीव कपूर का जन्म हरियाणा में हुआ था, लेकिन उनका ज्यादातर बचपन नई दिल्ली में गुजरा। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि एक बार पिता को किचन में खाना बनाते देख उन्होंने शेफ बनने की ठानी थी। उस वक्त उनकी उम्र महज 10 साल थी। उस उम्र से हुई शुरुआत बाद में उनका प्रोफेशन बन गया। 1992 में उन्होंने एल्योना कपूर से शादी की, वे कारोबार में भी उनका हाथ बंटाती हैं। उनकी कुल नेट वर्थ 12 करोड़ रुपए है। उनकी150 से ज्यादा किताबें छप चुकी हैं।

संजीव का जन्म 10 अप्रैल 1964 को हरियाणा के अंबाला जिले में हुआ था। उन्होंने इंस्टीट्ट यू ऑफ होटल मैनेजमेंट (आईएचएम) कैटरिंग एंड न्यूट्रीशन, पूसा, नई दिल्ली से अपनी पढ़ाई की है। 1984 में आईटीडीसी के साथ रसोई ट्नर रे के रूप में शेफ करियर शुरू किया था। मुंबई के सेंटूर होटल के साथ कार्यकारी शेफ के रूप में उन्होंने सबसे लंबे वक्त तक काम किया। आज वे ‘येलो चिली’ के नाम से रेस्त्रां चेन चलाते हैं, जिसकी विदेशों में भी कई ब्रांच हैं। इतना ही नहीं वे एक फूड चैनल के भी मालिक हैं। इसकी शुरुआत उन्होंने 2011 में की थी।

खाना खजाना से मिली पहचान
उनका सबसे पॉपुलर टीवी शो ‘खाना खजाना’ एशियाई देशों में चाव से देखा जाता है। यह शो 120 देशों में टेलीकास्ट होता है और इसके करीब 500 मिलियन दर्शक हैं। कुकिंग को लेकर संजीव 150 से ज्यादा किताबें भी लिख चुके हैं, जो हिंदी गुजराती, मराठी, इंग्लिश जैसी भाषाओं में पब्लिश हो चुकी हैं। उनकी एक बुक ‘हाऊ टू कुक इंडियन’ पश्चिमी देशों में काफी पॉपुलर है। न्यूयार्क टाइम्स में ‘समर कुक बुक ऑफ द ईयर 2011’ में यह बुक सिलेक्ट हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के यूएई दौरे के दौरान संजीव कपूर भी उनके साथ गए थे। उन्होंने मोदी के लिए कई वेजीटेरियन डिसेस तैयार की थीं।

सामाजिक योगदान
– ऑटिज्म के बच्चों के लिए संजीव कपूर पूरा सहयोग देते हैं। सामाजिक दायित्व के रुप में ग्रामीण दूरवर्ती इलाकों के बच्चों के लिए और समाज के पिछड़े वर्ग के बच्चों के लिए स्कूलों में खाना दिया जाता है।
– वे मिनिस्ट्री ऑफ टूरिज्म के पैनल में हैं और भारतीय पाक शैली का विशेष दस्तावेज तैयार करते हैं।
– उनका ब्रांड वंडरशेफ महिलाओं को व्यापार शुरू करने में मदद करता है
 

अब पासपोर्ट बुकलेट में नहीं देनी पड़ेगी पिता-पति की डिटेल, केंद्र बदल सकता है फॉर्मेट

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केंद्र सरकार ने पासपोर्ट फार्मेट में बड़ा बदलाव कर सकती है। पासपोर्ट बुकलेट पर अब तक आवेदनकर्ता के पिता, मां और पति या पत्नी का नाम होता था. पर अब इस ऑप्शन को हटाने पर सरकार विचार कर सकती है। एक अंतरमंत्रालीय पैनल ने विदेश मंत्रालय को ये प्रथा खत्म करने का प्रस्ताव दिया था। ये प्रस्ताव कई लोगों खासतौर से महिलाओं की शिकायतों को देखते हुए दिया गया है।

पैनल का कहना है कि अविवाहित, पति से अलग रहने वाली या तलाकशुदा महिलाएं को अक्सर इस तरह की जानकारियां देने में परेशानी होती है। पासपोर्ट में इन सभी जानकारियों की कोई जरूरत नहीं है।

तीन महीने पहले हुआ था पैनल का गठन
महिला व बाल विकास मंत्रालय, विदेश मंत्रालय और केंद्रीय पासपोर्ट ऑर्गनाइजेशन की ओर से तीन महीने पहले इस पैनल का गठन किया गया था, जिसका काम पासपोर्ट एक्ट 1967 और पासपोर्ट नियम 1980 की समीक्षा करना था।

पैनल ने दिए थे ये तर्क
पैनल का कहना था कि दुनियाभर की सभी विकासशील देशों में पासपोर्ट बुकलेट ये सारी जानकारी नहीं लिखी जाती है। इस प्रस्ताव में ये भी कहा गया कि विदेश मंत्रालय ये सभी जानकारियां अपने रिकॉर्ड के लिए ले सकता है, लेकिन इन्हे पासपोर्ट बुकलेट पर छापना जरूरी नहीं है। खासतौर से महिलाओं को इस पेज की वजह से उत्पीडऩ का शिकार होना पड़ता है।

केंद्र ने पासपोर्ट नियम में किए थे ये बदलाव
इसके अलावा केंद्र सरकार ने पासपोर्ट नियम में कुछ बदलाव किए थे। पहले जहां आवेदन के समय आवेदक से 12 सवाल पूछे जाते थे, अब वहीं केवल नौ सवालों के ही जवाब देने होंगे। आवेदक के पास पहले पासपोर्ट था या नहीं? और कभी विदेश दौरा किया था? यह दोनों सवाल हटा दिए गए हैं। पुलिस वैरिफिकेशन पासपोर्ट बनने के बाद होगा, लेकिन इसके लिए पासपोर्ट सेवा केंद्र का आधार कार्ड प्रोजेक्ट से लिंक होना जरूरी है। नए फॉर्मेट के मुताबिक, अस्थायी पते पर रहने वाले आवेदकों को पुलिस वैरिफिकेशन में अब यह जानकारी भी देनी होगी कि पासपोर्ट के लिए आवेदन करने से पहले वह पिछले एक साल में कहां-कहां रहा।

लीजिए बिहार के देसी जायके का स्वाद

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लिट्टी चोखा

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आवश्यक सामग्री – आटा लगाने के लिये – – 400 ग्राम ( 4 कप) गेहूं का आटा, -आधा छोटी चम्मच अजवायन, आधा कप घी या तेल, 1/3 छोटा चम्मच खाने का सोडा, 3/4 छोटी चम्मच नमक

भरावन बनाने के लिये – 200 ग्राम (2 कप) सत्तू , 1 इंच लम्बा टुकड़ा अदरक, 2-4 हरी मिर्च,  आधा कप बारीक कतरा हुआ हरा धनियां,1 छोटी चम्मच जीरा, 2 छोटी चम्मच सरसों का तेल, 2 टेबल स्पून अचार का मसाला, 1 नीबू का रस, आधा छोटी चम्मच काला नमक (ऐच्छिक), नमक – स्वादानुसार ( 1/4 छोटी चम्मच )

चोखा – को पारम्परिक तरीके से चौखा सिर्फ हरी मिर्च और नमक डालकर बनाया जाता है, टमाटर, अदरक और हरा धनियां डालकर चोखा और भी स्वादिष्ट लगता है.

सामग्री – 400 ग्राम (1 या 2 बैगन) – बड़ा बैगन, 250 ग्राम ( 4 टमाटर मध्यम आकार के) टमाटर, 2-4 (बारीक कतरी हुई) हरी मिर्च, 1 1/2 इंच लम्बा टुकड़ा ( बारीक कतरा हुआ) अदरक , 2 टेबल स्पून ( बारीक कतरा हुआ) हरा धनियां, नमक – स्वादानुसार ( एक छोटी चम्मच), 1-2 छोटी चम्मच सरसों का तेल

विधि – लिट्टी के लिये आटा लगाइये – आटे को छान कर बर्तन में निकालिये, आटे में घी, खाने का सोडा, अजवायन और नमक डाल कर अच्छी तरह मिला लीजिये, गुनगुने पानी की सहायता से नरम आटा गूथ लीजिये.  गुथे हुये आटे को ढककर आधा घंटे के लिये ढककर रख दीजिये.  लिट्टी बनाने के लिये आटा तैयार है.

भरावन तैयार कीजिये अदरक को धोइये, छीलिये और बारीक टुकड़ों में काट लीजिये (कद्दूकस भी कर सकते हैं)।  हरी मिर्च के डंठल तोड़िये, धोइये और बारीक कतर लीजिये।  हरा धनियां को साफ कीजिये, धोइये बारीक कतर लीजिये। सत्तू को किसी बर्तन में निकालिये, कतरे हुये अदरक, हरी मिर्च, धनियां, नीबू का रस, नमक, काला नमक, जीरा, सरसों का तेल और अचार का मसाला मिला लीजिये, अगर पिठ्ठी सूखी लग रही है तो 4-5  टेबल स्पून डालिये, पिठ्ठी को इतना गीला करना है कि वह, लड्डू बांधने पर बंध जाय, सभी चीजों को अच्छी तरह मिला लीजिये, सत्तू की पिठ्ठी तैयार है।

लिट्टी बनाएं – गुथे हुये आटे से मध्यम आकार की लोइयां बना लीजिये.  लोई को अंगुलियों की सहायता से 2-3 इंच के व्यास में बड़ा कर लीजिये, कटोरी जैसा बना लीजिये, इस पर 1 – 1 1/2 छोटी चम्मच पिठ्ठी रखिये और आटे को चारो ओर से उठा कर बन्द कीजिये और गोल कर लीजिये, गोले को हथेली से दबा कर थोड़ा चपटा कीजिये, लिट्टी सिकने के लिये तैयार है.

तंदूर को गरम कीजिये, भरी हुई लोइयों को तंदूर में रखिये और पलट पलट कर ब्राउन होने तक सेकिये.  (पारम्परिक रूप से  लिट्टी उपले पर सेकीं जाती है)

चोखा – बैगन और टमाटर धोइये और भून लीजिये, ठंडा कीजिये, छिलका उतार लीजिये, किसी प्याले में रख कर चमचे से मैस कीजिये, कतरे हुये मसाले और नमक, तेल डाल कर अच्छी तरह मिलाइये। लीजिये बैगन का चोखा तैयार है। आप लहसुन और प्याज पसन्द करते है तब 5-6 लहसन की कली छीलिये बारीक कतरिये और एक प्याज छीलिये, बारीक कतरिये इन्हैं भी इस बैगन में मिला लीजिये.

आलू का चोखा – उबले आलू 4-5 छील कर बारीक तोड़ लीजिये, कतरे हुये अदरक, हरी मिर्च, हरे धनिये, लाल मिर्च, नमक मिलाइये, आलू का चोखा तैयार है।

परोसिये – चोखा प्याले में डालिये, गरमा गरम लिट्टी को पिघले हुये घी में डुबाइये, लिट्टी को बीच से तोड़ कर भी घी में डुबाया जा सकता है,  चोखा के साथ, हरी धनिये की चटनी के साथ परोसिये और खाइये।

 

ठेकुआ

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सामग्री- गेहूं का आटा- 500 ग्राम सूखा नारियल- 2 चम्‍मच चीनी- 300 ग्राम सौंफ- 1 चम्‍मच तेल- 2 चम्‍मच हरी इलायची पाउडर- 1/2 चम्‍मच पानी- 1 कप तेल, ठेकुआ बनाने का सांचा

 विधि– चीनी और पानी को एक साथ पिघलाएं, फिर आंच बंद कर दें और मिश्रण को ठंडा होने दें। अब गेहूं, घिसा नारियल, इलायची पाउडर, सौंफ और 2 चम्‍मच तेल को एक साथ गूथ लें। अब इस आटे में चीनी वाला पानी मिलाएं और मुलायम आटा तैयार करें। इन्‍हें हथेलियों से दबाएं और सांचे में हल्‍का सा तेल लगा कर उसमें दबाए गए आटे को रखें। अब सोंच को दबा कर आकार दें और आराम से निकाल कर बाहर रखें। कढाई में तेल गरम करें, उसमें ठेकुए को डीप फ्राई करें। एक बार हो जाने के बाद ठेकुए को बाहर निकालें और ठंडा होने के बाद सर्व करें।

 

भोजपुरी लोकगीत – लोरी

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लोरी –

 
चंदा मामा, आरे आव, पारे आवऽ,
नदी के किनारे आवऽ
सोने की कटोरिया में
दूध भात ले ले आवऽ
बुचिया का मुंहवा में घूट! घूट!!
(अनेक जगह यह पंक्ति है – “बबुआ के मुंहवा में घुटुक”।)

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घुघुवा मन्ना, उपजे चन्ना,
एही पड़े आवेले बबुआ के मामा।
उठा ले ले कोरा, थमा दे ले लड्डू,
छेदा देले नाक-कान
पहिरा देले बाला।

छठ के गीत – केलवा जे फरये ला घवद से ओहपर सुगा मंडराय

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केलवा जे फरये ला घवद से ओहपर सुगा मंडराय
उ जे खबरी जनइबो अदित्य से सुगा दिहले जुठीयाय
उ जे मरबउ रे सुगवा धनुष से सुगा गिरे मुरुछाय
सुगनी जे रोवय वियोग से आदित्य होऊ न सहाय

नारियलवा जे फरये ला घवद से ओहपर सुगा मंडराय
उ जे खबरी जनइबो अदित्य से सुगा दिहले जुठीयाय
उ जे मरबउ रे सुगवा धनुष से सुगा गिरे मुरुछाय
सुगनी जे रोवय वियोग से आदित्य होऊ न सहाय

अमरुदवा जे फरये ला घवद से ओहपर सुगा मंडराय
उ जे खबरी जनइबो अदित्य से सुगा दिहले जुठीयाय
उ जे मरबउ रे सुगवा धनुष से सुगा गिरे मुरुछाय
सुगनी जे रोवय वियोग से आदित्य होऊ न सहाय

 

छोटा जादूगर 

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 जयशंकर प्रसाद

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कार्निवल के मैदान में बिजली जगमगा रही थी। हँसी और विनोद का कलनाद गूँज रहा था। मैं खड़ा था उस छोटे फुहारे के पास, जहाँ एक लड़का चुपचाप शराब पीनेवालों को देख रहा था। उसके गले में फटे कुरते के ऊपर से एक मोटी-सी सूत की रस्सीु पड़ी थी और जेब में कुछ ताश के पत्तेे थे। उसके मुँह पर गंभीर विषाद के साथ धैर्य की रेखा थी। मैं उसकी ओर न जाने क्यों आकर्षित हुआ। उसके अभाव में भी संपन्नदता थी।
मैंने पूछा, ”क्योंी जी, तुमने इसमें क्याआ देखा?”
”मैंने सब देखा है। यहाँ चूड़ी फेंकते हैं। खिलौनों पर निशाना लगाते हैं। तीर से नंबर छेदते हैं। मुझे तो खिलौनों पर निशाना लगाना अच्छाफ मालूम हुआ। जादूगर तो बिलकुल निकम्मां है। उससे अच्छात तो ताश का खेल मैं ही दिखा सकता हूँ।” उसने बड़ी प्रगल्भाता से कहा। उसकी वाणी में कहीं रूकावट न थी।
मैंने पूछा, ”और उस परदे में क्या। है? वहाँ तुम गए थे?”
”नहीं, वहाँ मैं नहीं जा सका। टिकट लगता है।”
मैंने कहा, ”तो चलो, मैं वहाँ पर तुमको लिवा चलूँ।” मैंने मन-ही-मन कहा, ‘भाई! आज के तुम्हींै मित्र रहे।’
उसने कहा, ”वहाँ जाकर क्याह कीजिएगा? चलिए, निशाना लगाया जाए।”
मैंने उससे सहमत होकर कहा, ”तो फिर चलो, पहले शरबत पी लिया जाए।” उसने स्वीाकार-सूचक सिर हिला दिया।
मनुष्यों की भीड़ से जाड़े की संध्या भी वहाँ गरम हो रही थी। हम दोनों शरबत पीकर निशाना लगाने चले। राह में ही उससे पूछा, ”तुम्हा रे घर में और कौन हैं?”
”माँ और बाबूजी।”
”उन्हों ने तुमको यहाँ आने के लिए मना नहीं किया?”
”बाबूजी जेल में हैं।”
”क्योंी?”
”देश के लिए।” वह गर्व से बोला।
”और तुम्हाएरी माँ?”
”वह बीमार है।”
”और तुम तमाशा देख रहे हो?”
उसके मुँह पर तिरस्का र की हँसी फूट पड़ी। उसने कहा, ”तमाशा देखने नहीं, दिखाने निकला हूँ। कुछ पैसे ले जाऊँगा, तो माँ को पथ्य़ दूँगा। मुझे शरबत न पिलाकर आपने मेरा खेल देखकर मुझे कुछ दे दिया होता, तो मुझे अधिक प्रसन्न्ता होती!”
मैं आश्चहर्य से उस तेरह-चौदह वर्ष के लड़के को देखने लगा।
”हाँ, मैं सच कहता हूँ बाबूजी! माँजी बीमार हैं, इसीलिए मैं नहीं गया।”
”कहाँ?”
”जेल में! जब कुछ लोग खेल-तमाशा देखते ही हैं, तो मैं क्यों न दिखाकर माँ की दवा करूँ और अपना पेट भरूँ।”
मैंने दीर्घ नि:श्वा स लिया। चारों ओर बिजली के लट्टू नाच रहे थे। मन व्यैग्र हो उठा। मैंने उससे कहा, ”अच्छा’ चलो, निशाना लगाया जाए।”
हम दोनों उस जगह पर पहुँचे जहाँ खिलौने को गेंद से गिराया जाता था। मैंने बारह टिकट खरीदकर उस लड़के को दिए।
वह निकला पक्काे निशानेबाज। उसकी कोई गेंद खाली नहीं गई। देखनेवाले दंग रह गए। उसने बारह खिलौनों को बटोर लिया, लेकिन उठाता कैसे? कुछ मेरी रूमाल में बँधे, कुछ जेब में रख लिये गए।
लड़के ने कहा, ”बाबूजी, आपको तमाशा दिखाऊँगा। बाहर आइए, मैं चलता हूँ।” वह नौ-दो ग्याँरह हो गया। मैंने मन-ही-मन कहा, ‘इतनी जल्दीा आँख बदल गई!”
में घूमकर पान की दुकान पर आ गया। पान खाकर बड़ी देर तक इधर-उधर टहलता-देखता रहा। झूले के पास लोगों का ऊपर-नीचे आना देखने लगा। अकस्मानत् किसी ने ऊपर के हिंडोले से पुकारा, ”बाबूजी!”
मैंने पूछा, ”कौन?”
”मैं हूँ छोटा जादूगर।”
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कलकत्तेू के सुरम्यू बोटैनिकल-उद्यान में लाल कमलिनी से भरी हुई एक छोटी-सी झील के किनारे घने वृक्षों की छाया में अपनी मंडली के साथ बैठा हुआ मैं जलपान कर रहा था। बातें हो रही थीं। इतने में वही छोटा जादूगर दिखाई पड़ा। हाथ में चारखाने का खादी का झोला, साफ जाँघिया और आधी बाँहों का कुरता। सिर पर मेरी रूमाल सूत की रस्सीर से बँधी हुई थी। मस्तारनी चाल में झूमता हुआ आकर वह कहने लगा –
”बाबूजी, नमस्ते ! आज कहिए तो खेल दिखाऊँ?”
”नहीं जी, अभी हम लोग जलपान कर रहे हैं।”
”फिर इसके बाद क्याे गाना-बजाना होगा, बाबूजी?”
”नहीं जी, तुमको….” क्रोध से मैं कुछ और कहने जा रहा था। श्रीमतीजी ने कहा, ”दिखलाओ जी, तुम तो अच्छे आए। भला, कुछ मन तो बहले।” मैं चुप हो गया, क्योंाकि श्रीमतीजी की वाणी में वह माँ की-सी मिठास थी, जिसके सामने किसी भी लड़के को रोका नहीं जा सकता। उसने खेल आरंभ किया।
उस दिन कार्निवल के सब खिलौने उसके खेल में अपना अभिनय करने लगे। भालू मनाने लगा। बिल्ली रूठने लगी। बंदर घुड़कने लगा। गुड़िया का ब्याकह हुआ। गुड्डा वर काना निकला। लड़के की वाचालता से ही अभिनय हो रहा था। सब हँसते लोट-पोट हो गए।
मैं सोच रहा था। बालक को आवश्य।कता ने कितना शीघ्र चतुर बना दिया। यही तो संसार है।
ताश के सब पत्ते लाल हो गए। फिर सब काले हो गए। गले की सूत की डोरी टुकड़े-टुकड़े होकर जुड़ गई। लट्टू अपने से नाच रहे थे। मैंने कहा, ”अब हो चुका। अपना खेल बटोर लो, हम लोग भी अब जाएँगे।”
श्रीमतीजी ने धीरे से उसे एक रूपया दे दिया। वह उछल उठा।
मैंने कहा, ”लड़के!”
”छोटा जादूगर कहिए। यही मेरा नाम है। इसी से मेरी जीविका है।”
मैं कुछ बोलना ही चाहता था कि श्रीमतीजी ने कहा, ”अच्छा , तुम इस रुपए से क्याभ करोगे?”
”पहले भरपेट पकौड़ी खाऊँगा। फिर एक सूती कंबल लूँगा।”
मेरा क्रोध अब लौट आया। मैं अपने पर बहुत क्रुद्ध होकर सोचने लगा, ‘ओह! कितना स्वाअर्थी हूँ मैं। उसके एक रुपया पाने पर मैं ईर्ष्याप करने लगा था न!”
वह नमस्काुर करके चला गया। हम लोग लता-कुंज देखने के लिए चले।
उस छोटे से बनावटी जंगल में संध्या साँय-साँय करने लगी थी। अस्ताोचलगामी सूर्य की अंतिम किरण वृक्षों की पत्तियों से विदाई ले रही थी। एक शांत वातावरण था। हम लोग धीरे-धीरे मोटर से हावड़ा की ओर आ रहे थे।
रह-रहकर छोटा जादूगर स्मईरण हो आता था। तभी सचमुच वह एक झोंपड़ी के पास कंबल कंधे पर डाले मिल गया। मैंने मोटर रोककर उससे पूछा, ”तुम यहाँ कहाँ?”
”मेरी माँ यहीं है न! अब उसे अस्पथताल वालों ने निकाल दिया है।” मैं उतर गया। उस झोंपड़ी में देखा तो एक स्त्री चिथड़ों से लदी हुई काँप रही थी।
छोटे जादूगर ने कंबल ऊपर से डालकर उसके शरीर से चिमटते हुए कहा, ”माँ!”
मेरी आँखों से आँसू निकल पड़े।
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बड़े दिन की छुट्टी बीत चली थी। मुझे अपने ऑफिस में समय से पहुँचना था। कलकत्ते् से मन ऊब गया था। फिर भी चलते-चलते एक बार उस उद्यान को देखने की इच्छाक हुई। साथ-ही-साथ जादूगर भी दिखाई पड़ जाता तो और भी…. मैं उस दिन अकेले ही चल पड़ा। जल्द् लौट आना था।
दस बज चुके थे। मैंने देखा कि उस निर्मल धूप में सड़क के किनारे एक कपड़े पर छोटे जादूगर का रंगमंच सजा था। मैं मोटर रोककर उतर पड़ा। वहाँ बिल्ली़ रूठ रही थी। भालू मनाने चला था। ब्या ह की तैयारी थी, यह सब होते हुए भी जादूगर की वाणी में वह प्रसन्नथता की तरी नहीं थी। जब वह औरों को हँसाने की चेष्टाै कर रहा था, तब जैसे स्वंयं काँप जाता था। मानो उसके रोएँ रो रहे थे। मैं आश्चतर्य से देख रहा था। खेल हो जाने पर पैसा बटोरकर उसने भीड़ में मुझे देखा। वह जैसे क्षण भर के लिए स्फूेर्तिमान हो गया। मैंने उसकी पीठ थपथपाते हुए पूछा, ”आज तुम्हा रा खेल जमा क्योंं नहीं?”
”माँ ने कहा है कि आज तुरंत चले आना। मेरी अंतिम घड़ी समीप है।” अविचल भाव से उसने कहा।
”तब भी तुम खेल दिखलाने चले आए!” मैंने कुछ क्रोध से कहा। मनुष्यण के सुख-दु:ख का माप अपना ही साधन तो है। उसके अनुपात से वह तुलना करता है।
उसके मुँह पर वहीं परिचित तिरस्कासर की रेखा फूट पड़ी।
उसने कहा, ”क्योंत न आता?”
और कुछ अधिक कहने में जैसे वह अपमान का अनुभव कर रहा था।
क्षण भर में मुझे अपनी भूल मालूम हो गई। उसके झोले को गाड़ी में फेंककर उसे भी बैठाते हुए मैंने कहा, ”जल्दी चलो।” मोटरवाला मेरे बताए हुए पथ पर चल पड़ा।
कुछ ही मिनटों में मैं झोंपड़े के पास पहुँचा। जादूगर दौड़कर झोंपड़े में माँ-माँ पुकारते हुए घुसा। मैं भी पीछे था, किंतु स्त्री के मुँह से, ‘बे…’ निकलकर रह गया। उसके दुर्बल हाथ उठकर गिर गए। जादूगर उससे लिपटा रो रहा था। मैं स्तसब्धम था। उस उज्व् म ल धूप में समग्र संसार जैसे जादू-सा मेरे चारों ओर नृत्यल करने लगा।

छठ 2016 – छठ पूजा व्रत विधि और शुभ मुहूर्त

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वर्ष में दो बार छठ का महोत्सव पूर्ण श्रद्धा और आस्था से मनाया जाता है| पहला छठ पर्व चैत्र माह में तो दूसरा कार्तिक माह में मनाया जाता है| चैत्र शुक्ल पक्ष की षष्ठी चैती छठ और कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी को कार्तिकी छठ कहा जाता है| यह पर्व सूर्यदेव की उपासना के लिए प्रसिद्ध है|

मान्यता है कि छठ देवी सूर्यदेव की बहन है| इसलिए छठ पर्व पर छठ देवी को प्रसन्न करने हेतु सूर्य देव को प्रसन्न किया जाता है| गंगा-यमुना या किसी भी नदी, सरोवर के तट पर सूर्यदेव की आराधना की जाती है| महाभारत में भी छठ पूजा का उल्लेख किया गया है| पांडवों की माँ कुंती को विवाह से पूर्व सूर्य देव की उपासना कर आशीर्वाद स्वरुप पुत्र की प्राप्ति हुई जिनका नाम था कर्ण| पांडवों की पत्नी द्रौपदी ने भी उनके कष्ट दूर करने हेतु छठ पूजा की थी|

हिन्दू धर्म में छठ पर्व का अत्यंत महत्त्व है और पुरुष एवं स्त्री एक सामान रूप से इस पर्व को मनाते हैं| यह पर्व कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से आरंभ होकर सप्तमी तक चलता है| प्रथम दिन यानि चतुर्थी तिथि ‘नहाय-खाय’ के रूप में मनाया जाता है| आगामी दिन पंचमी को खरना व्रत किया जाता है और इस दिन संध्याकाळ में उपासक प्रसाद के रूप में गुड-खीर, रोटी और फल आदि का सेवन करते है और अगले 36 घंटे तक निर्जला व्रत रखते हैं| मान्यता है कि खरन पूजन से ही छठ देवी प्रसन्न होती है और घर में वास करती है| छठ पूजा की अहम तिथि षष्ठी में नदी या जलाशय के तट पर भारी तादाद में श्रद्धालु एकत्रित होते हैं और उदीयमान सूर्य को अर्ध्य समर्पित कर पर्व का समापन करते हैं|

छठ पर्व – महत्व                                                                           

छठ पूजा मुख्य रूप से बिहार व पूर्वी उत्तर प्रदेश में मनाया जाता है| हालाँकि अब यह पर्व देश के कोने-कोने में मनाया जाता है| पौराणिक कथाओं के अनुसार यह माना जाता है कि यह भारत के सूर्यवंशी राजाओं के मुख्य पर्वों से एक था| कहा जाता है कि एक समय मगध सम्राट जरासंध के एक पूर्वज का कुष्ठ रोग हो गया था| इस रोग से निजात पाने हेतु राज्य के शाकलद्वीपीय मग ब्राह्मणों ने सूर्य देव की उपासना की थी| फलस्वरूप राजा के पूर्वज को कुष्ठ रोग से छुटकारा मिला और तभी से छठ पर सूर्योपासना की प्रातः आरंभ हुई है|

छठ व्रत पूर्ण नियम तथा निष्ठा से किया जाता है| श्रद्धा भाव से किए गए इस व्रत इ नि:संतान को संतान सुख की प्राप्ति होती हैं और धन-धान्य की प्राप्ति होती है| उपासक का जीवन सुख-समृद्धि से परिपूर्ण रहता है|

छठ व्रत – विधि

  • छठ पर्व में मंदिरों में पूजा नहीं की जाती है और ना ही घर में साफ़-सफाई की जाती है|
  • पर्व से दो दिन पूर्व चतुर्थी पर स्नानादि से निवृत्त होकर भोजन किया जाता है।
  • पंचमी को उपवास करके संध्याकाळ में किसी तालाब या नदी में स्नान करके सूर्य भगवान को अर्ध्य दिया जाता है| तत्पश्चात अलोना भोजन किया जाता है।
  • षष्ठी के दिन प्रात:काल स्नानादि के बाद संकल्प लिया जाता है| संकल्प लेते समय निम्न मन्त्रों का उच्चारण करे

ऊं अद्य अमुकगोत्रोअमुकनामाहं मम सर्व

पापनक्षयपूर्वकशरीरारोग्यार्थ श्री

सूर्यनारायणदेवप्रसन्नार्थ श्री सूर्यषष्ठीव्रत करिष्ये।

  • पूरा दिन निराहार और नीरजा निर्जल रहकर पुनः नदी या तालाब पर जाकर स्नान किया जाता है और सूर्यदेव को अर्ध्य दिया जाता है|

अर्ध्य

अर्ध्य देने की भी एक विधि होती है| एक बांस के सूप में केला एवं अन्य फल, अलोना प्रसाद, ईख आदि रखकर उसे पीले वस्त्र से ढक दें| तत्पश्चात दीप जलाकर सूप में रखें और सूप को दोनों हाथों में लेकर निम्न मन्त्र का उच्चारण करते हुए तीन बार अस्त होते हुए सूर्यदेव को अर्ध्य दें।

ऊं एहि सूर्य सहस्त्रांशों तेजोराशे जगत्पते।

अनुकम्पया मां भवत्या गृहाणार्ध्य नमोअस्तुते॥

छठ पूजा 2016 शुभ मुहूर्त

छठ पर्व तिथि          :      6 नवम्बर 2016, रविवार

सूर्योदय, छठ तिथि      :   प्रातः काल 06:36, 6 नवम्बर 2016

सूर्यास्त, छठ तिथि      :   सांय काल 05:32, 6 नवम्बर 2016

षष्ठी तिथि प्रारंभ        :     सुबह 10:47 बजे से, 5 नवम्बर 2016

षष्ठी तिथि समाप्त      :     दोपहर 12:16 बजे तक, 6 नवम्बर 2016