‘साहित्यिकी’ संस्था के तत्वावधान में मासिक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इसका शुभारम्भ नगर के प्रतिष्ठित कवि श्री नवल ने सुषमा हंस तथा रेशमी पांडा मुखर्जी द्वारा संपादित ‘साहित्यिकी’ पत्रिका के २६वें अंक के लोकार्पण से किया। गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’ के जन्म-शतवार्षिकी-पर्व पर केन्द्रित इस संगोष्ठी में किरण सिपानी ने सबका स्वागत किया। उषा श्रॉफ ने ‘मुक्तिबोध’ की कविता ‘मुझे कदम-कदम पर’, वसुंधरा मिश्र ने ‘अंधेरे में’, सुषमा हंस ने ‘मैं तुम लोगों से दूर हूँ’ कविताओं की आवृत्ति की तथा विद्या भंडारी ने ‘तू और मैं’, गीत की सुरबद्ध प्रस्तुति की। प्रमुख वक्ता प्रो. रेखा सिंह ने ‘मुक्तिबोध’ की मानसिक बुनावट की पड़ताल करते हुए रेखांकित किया कि उनकी कविताओ में ‘अस्मिता की पहचान’ की नहीं वरन् मानवीय चेतना के पहचान और बचाव की तड़प दिखाई देती है। ‘मुक्तिबोध’ को विलक्षण रचनाकार बताते हुए उन्होंने यह भी कहा कि उनमें विरोधाभास बहुत ही कम है इसीलिए वे इतने खास और प्रासंगिक हैं। पूनम पाठक ने कहा कि ‘मुक्तिबोध’ सदैव उसी ईमानदारी की अपेक्षा करते दिखाई देते हैं, जो उन्होंने स्वयं रचनात्मक स्तर पर बरती है। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कुसुम जैन ने कहा कि अपना उपनाम ‘मुक्तिबोध’ रखने वाले रचनाकार ने ‘सर्व’ की मुक्ति में ही ‘स्व’ की मुक्ति स्वीकार की। कार्यक्रम का कुशल संचालन करते हुए गीता दूबे ने कात्यायनी की कविता ‘मुक्तिबोध के लिए’ की आवृत्ति भी की। धन्यवाद ज्ञापन वाणीश्री बाजोरिया ने किया। संस्था की सदस्याओं के अतिरिक्त इतु सिंह, आदित्य गिरि ,बालेश्वर राय, प्रीति साव आदि भी कार्यक्रम में उपस्थित थे।
सर्दियों में करें होंठों की हिफाजत
सर्दियां आते ही ज्यादातर लोगों की त्वचा रूखी होने लग जाती है। त्वचा की नमी कहीं खो सी जाती है और त्वचा रूखी-बेजान नजर आने लगती है। त्वचा के साथ ही हमारे होंठ भी फटने शुरू हो जाते हैं.।कई बार ये समस्या इतनी ज्यादा बढ़ जाती है कि होंठों से खून भी आना शुरू हो जाता है। ऐसे में बहुत जरूरी है कि हम अपनी त्वचा को लेकर फिक्रमंद रहें ताकि वो हमेशा खूबसूरत और जवां बनी रहे।
सर्दियों में त्वचा को ज्यादा से ज्यादा नमी की जरूरत होती है. ऐसे में आप चाहें तो ग्लिसरीन का इस्तेमाल कर सकती हैं। यह एक कुदरती लिप बाम भी है।
आप चाहें तो ग्लिसरीन को बाम की तरह लगा सकती हैं। इसके अलावा इसे दूध, शहद या गुलाब जल के साथ मिलाकर भी लगाया जाता है।
सर्दियों में शुष्क हवाओं के कारण होठ सूख जाते हैं और फटने लग जाते हैं। होठों पर ग्लिसरीन के इस्तेमाल से होंठ मुलायम बनते हैं जिससे फटने की समस्या भी नहीं होने पाती है।
अगर आपके होंठों पर दाग-धब्बे हैं और ये काले पड़ चुके हैं तो भी ग्लिसरीन का इस्तेमाल करना फायदेमंद रहता है. कई बार धूम्रपान करने के कारण लोगों के होंठ काले पड़ जाते हैं. ऐसी स्थिति में भी ग्लिसरीन का इस्तेमाल करना फायदेमंद रहता है.
सर्दियों में हवाओं के प्रभाव से होंठो की ऊपरी परत सूख जाती है और पपड़ी बन जाती है. ऐसे में ग्लसिरीन का इस्तेमाल करना बहुत फायदेमंद होता है।
अगर आपके होंठ कहीं से कट गए हों या फिर अगर उनमें किसी तरह का घाव बन गया हो तो भी ग्लिसरीन का इस्तेमाल करना फायदेमंद होता है।
होंठों के लिए ग्लिसरीन एक पोषक तत्व की तरह काम करता है, जिससे होंठों को नमी मिलती है।
समय के साथ संगीत बदल जाएगा: गुलजार
प्रख्यात गीतकार-फिल्मकारर गुलजार का मानना है कि समय के साथ बदलते फिल्मी संगीत में कुछ भी गलत नहीं है और व्यक्ति को इसे अपनाना चाहिए और इसे आत्मसात करना सीखना चाहिए।
उनका कहना है कि किसी फिल्म में किरदार के मिजाज के मुताबिक गाने लिखे जाते हैं और इन गानों की तुलना 50 और 60 के दशक के गानों से करना अनुचित है।
उन्होंने कहा, ‘‘ गाने उस फिल्म के मुताबिक होंगे। यदि कोई किरदार शराब के नशे वाला कोई गाना गाना चाहता है तो वह ‘दिल ए नादान.’ नहीं गाएगा, बल्कि ‘गोली मार भेजे में’ गाना गाएगा। किरदारों के मुताबिक भाषा बदलती है।’’ गुलजार ने कहा, ‘‘ समय बदलेगा और संगीत भी। हमारी रफ्तार बदली है, कपड़े बदले हैं, खाने की आदतें बदली हैं तो संगीत जस का तस क्यों रहना चाहिए? वह भी बदलेगा।
विश्व की ज्यादातर आबादी ‘मोटापे’ का शिकार है
एक नये शोध के मुताबिक एक आश्चर्यजनक तथ्य सामने आया है कि विश्व की 76 प्रतिशत आबादी यानी करीब 5 . 5 अरब लोग मोटापे के शिकार हैं। शोधकर्ताओं ने आगाह किया है कि यह धीरे-धीरे विकराल रूप लेता जा रहा है। इसके साथ ही इससे जटिल व पाचन संबंधी गंभीर बीमारियों के खिलाफ वैश्विक स्वास्थ्य प्रयासों में अब बदलाव करने की अपील की है।
शोधकर्ताओं ने मोटापे के पीछे की एक विशिष्ट धारणा को रेखांकित किया है कि जरूरत से ज्यादा वसा होने से स्वास्थ्य पर काफी बुरा असर पड़ता है। इस शोध में न्यूजीलैंड के ऑकलैंड यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी के शोधकर्ता भी शामिल हैं।
मौजूदा आंकड़ों के अनुसार यह बात सामने आयी है कि अधिक वजन और मोटापे से ग्रस्त लोगों की संख्या में हुई वृद्धि ने इसको मोटापे की उस श्रेणी में डाल दिया जिसमें सामान्य वजन के लोग भी शामिल हैं।
इसके मुख्य अध्ययनकर्ता और ऑस्ट्रेलिया के मैफ फिटनेस प्राइवेट लिमिटेड के सीईओ फिलिप मैफेटोन ने कहा, ‘‘मोटापे के इस विकराल रूप ने उन लोगों को भी अपने आगोश में ले लिया है जो लोग व्यायाम करते हैं और यहां तक कि वे लोग भी जो खेलों में काफी अच्छे हंै।’’ मैफेटोन ने बताया, ‘‘मोटापे की इस श्रेणी में सामान्य वजन के लोग भी शामिल हैं जिससे जटिल बीमारियों के लिए खतरा और बढ़ गया है। यह खतरा ज्यादा मोटे लोगों के साथ-साथ उनके लिए भी है जिनको सामान्य वजन का समझा जाता है।’’ पिछले तीन से चार दशकों में मोटापे का यह भयावह चेहरा काफी हद तक बढ़ गया है जिससे ज्यादातर लोग अस्वस्थ होने की कगार पर हैं।
मैफेटोन ने बताया कि हमलोग इन खतरनाक कारकों में हो रहे इजाफे को लेकर जागरूकता फैलाना चाहते हैं, जहां ‘ओवरफैट’ और ‘अंडरफैट’ शब्दावलियों को नये सिरे से व्याख्या की जाएगी। हम उम्मीद करते हैं कि यह शब्दावली आम प्रयोगों में शामिल होगी जिससे विश्व स्वास्थ्य में उल्लेखनीय सुधार करने में मदद मिलेगी।
चार साल की बच्ची बनी लाइब्रेरियन, दो साल में पढ़ चुकी है हजार किताबें
चार साल की लड़की डालिया अराना की उपलब्धियों के बारे में सुनकर आप हैरान रह जाएंगे। दरअसल जॉर्जिया की डालिया 1,000 से ज्यादा किताबें पढ़ चुकी है और उसकी इस उपलब्धि के कारण उसे दुनिया की सबसे बड़ी लाइब्रेरी ‘यूएस लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस’ में एक दिन के लिए लाइब्रेरियन बनाया गया। कार्ला ने डालिया के साथ की अपनी तस्वीरें भी ट्वीट की हैं और लिखा है, ‘एक दिन की लाइब्रेरियन डालिया मैरी अराना के साथ काम करना काफी मजेदार रहा. उसने अभी ही 1,000 से ज्यादा किताबें पढ़ ली है।’डालिया ने एक दिन का कार्यभार वहां की लाइब्रेरियन कार्ला हेडन के साथ संभाला. कार्ला और डालिया ने साथ में मीटिंग्स की। दोनों लाइब्रेरी के स्टाफ से भी मिले और वहां के हॉल का भी जायजा लिया. डालिया ने लाइब्रेरी में व्हाइटबोर्ड भी लगाने का सुझाव दिया, जिससे बच्चे वहां लिखने का अभ्यास कर सकें। डालिया ने पहली किताब दो साल की उम्र में पढ़ी थी। यह देखकर उसकी मां ने उसे एक ऐसे प्रोग्राम में दाखिला दिला दिया। था, जो बच्चों को किताबें पढ़ने कि लिए प्रोत्साहित करता है और यह भी ट्रैक रखता है कि बच्चे ने कितनी किताबें पढ़ ली हैं। डालिया की मां ने ‘लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस’ को डालिया की उपलब्धियों के बारे में लिखा। लाइब्रेरी ने डालिया के पूरे परिवार को लाइब्रेरी बुलाया और डालिया को एक दिन का लाइब्रेरियन बनाने का प्रस्ताव रखा।
अमाल मलिक ने कहा, ‘अवॉर्ड जाए भाड़ में’
बॉलीवुड में दिए जाने वाले अवॉर्ड्स की साख को लेकर सवाल उठना कोई नहीं बात नहीं है। इस बार के फिल्मफेयर अवॉर्ड में झंडा गाड़ने वाली फिल्म ‘दंगल’ के लीड हीरो आमिर खान अतीत में नेशनल अवॉर्ड्स के अलावा दूसरे अवॉर्ड समारोह में शिरकत नहीं करने की बात कह चुके हैं। इस बार विरोध का बिगुल गायक और संगीतकार अमाल मलिक ने बजाया है। एक फिल्म अवॉर्ड समारोह में नॉमिनेशन के तौर तरीकों को लेकर अमाल मलिक ने अपनी नाराजगी का इज़हार फेसबुक पर किया हलांकि उन्होंने अवॉर्ड समारोह का नाम नहीं लिया।
अमाल ने अपने फेसबुक पोस्ट में ज्यूरी की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाए हैं। अमाल ने ऐसी कई फिल्मों और कलाकारों का हवाला दिया है जिन्हें उनके मुताबिक नॉमिनेशन मिलना चाहिए था लेकिन ऐसा हुआ नहीं।
बड़े सितारों के बच्चों को दिए गए ‘न्यू कमर अवॉर्ड्स’ को लेकर अमाल नाराज दिखे। उनका कहना है कि ‘न्यू कमर अवॉर्ड्स’ वैसे लोगों को भी दिए गए हैं जिनके काम को किसी ने देखा तक नहीं है। अपने फेसबुक पोस्ट के आखिर में अमाल ने कहा है, “अवॉर्ड गया भाड़ में यार… लोगों को उनकी प्रतिभा और काम के आधार पर नॉमिनेट किया जाना चाहिए।.”
अमाल इस बात का भी अंदेशा जताते हैं कि इस फेसबुक पोस्ट के बाद उन्हें जीवन में शायद दोबारा कोई नॉमिनेशन नहीं मिले।
‘दंगल’ को लेकर एक बार फिर चर्चा में हैं छोटे परदे की पार्वती
छोटे परदे की बेहतरीन एक्ट्रेस में शुमार साक्षी तंवर इन दिनों फिल्म ‘दंगल’ को लेकर सुर्खियों में हैं। कारण कि साक्षी ने भी फिल्म में छोटा मगर महत्वपूर्ण रोल किया है। पहलवान महावीर सिंह फोगाट पर केंद्रित इस फिल्म में आमिर खान ने लीड रोल निभाया है। फिल्म में साक्षी ने आमिर की पत्नी दया कौर का किरदार निभाया है।
कम ही लोग जानते हैं कि साक्षी ने अपना करियर दूरदर्शन से शुरू किया था। इतना ही नहीं साक्षी भी एक ब्यूटी कांटेस्ट का हिस्सा रह चुकी हैं। उन्हें एक टाइटल भी दिया गया था। साक्षी के करियर में ‘कहानी घर-घर की’ और ‘बड़े अच्छे लगते हैं’ बड़े टीवी शो माने जाते हैं। यह शो न सिर्फ बहुत ज्यादा समय तक लोकप्रिय रहे बल्कि इनके लिए साक्षी को सम्मान भी मिला।
साक्षी ने टीवी जगत में लगातार चार सालों तक शो ‘बड़े अच्छे लगते हैं’ के लिए बेस्ट एक्ट्रेस का अवॉर्ड जीता है। शो में साक्षी के किरदार का नाम ‘प्रिया’ था। जबकि ‘कहानी घर-घर की’ में साक्षी के किरदार का नाम ‘पार्वती अग्रवाल’ था। दोनों ही किरदारों से साक्षी ने घर-घर में अपनी पहचान बना ली है। साक्षी शो ‘कौन बनेगा करोड़पति’ पर भी नजर आ चुकी हैं।
साक्षी तंवर का नाम उन एक्ट्रेस में शुमार हैं जिन्होंने टीवी पर पहली बार न सिर्फ बोल्ड सीन दिया बल्कि अपने को-स्टार को ‘किस’ भी किया। एक्टर राम कपूर और साक्षी तंवर के बीच फिल्माया गया यह सीन टीवी जगत के गलियारों में खासा चर्चित रहा था। शो ‘बड़े अच्छे लगते हैं’ का निर्माण एकता कपूर की कंपनी बालाजी टेलीफिल्म्स ने किया था।
ऑक्सफोर्ड से राजनीति सीखेंगी मलाला
पाकिस्तान की नोबल विजेता और शिक्षा कार्यकर्ता मलाला यूसुफजई प्रतिष्ठित ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से राजनीति, दर्शन और अर्थव्यवस्था की शिक्षा लेंगी। इसके लिए उन्होंने ऑक्सफोर्ड यूनिविर्सिटी में प्रवेश के लिए साक्षात्कार दिया है। मलाला को आकांक्षा है कि वह एक दिन प्रधानमंत्री बनेंगी।
मीडिया रिपोर्ट के हवाले से 19 वर्षीय पाकिस्तानी किशोरी ने कहा कि उनका साक्षात्कार इतना आसान नहीं था और दूसरे किसी छात्र की तरह मैं भी रिजल्ट का इंतजार उत्सुकता से कर रही हूं। रिपोर्ट में कहा गया है कि मलाला दर्शन, राजनीतिक और अर्थव्यवस्था की पढ़ाई करने को इच्छुक है। ये तीनों विषयों का चयन डिग्री के लिए मुख्यत: ब्रिटिश राजनेताओं, सामाजिक सेवा कार्यकर्ताओं और मीडिया प्रतिनिधियों द्वारा किया जाता है।
मलाला इस समय अपने पिता जिआउद्दीन यूसुफजई और अपनी मां टूर पेकई के साथ बर्मिंघम में हैं, जहां मलाला लड़कियों के लिए एजबेस्टन हाईस्कूल में शिक्षा कार्यकर्ता के लिए रूप में हिस्सा लेती हैं। मलाला ने कई साक्षात्कारों में पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनने की इच्छा जाहिर की है।
बेटी को खोने के बाद भी, पकिस्तान से इस पिता ने भेजा भारत को प्यार भरा ख़त!
लकीरे हैं तो रहने दो..
किसी ने रूठ कर गुस्से में शायद खेंच दी थी…
इन्ही को अब बनाओ पाला..
और आओ कबड्डी खेलते हैं..
लकीरे हैं तो रहने दो….
-गुलज़ार
प्यार से अबीहा कहलाई जानेवाली 13 साल की नलैन रुबाब इमरान ने गुलज़ार साहब की लिखी इन पंक्तियों को ज़रूर पढ़ा और समझा होगा, तभी तो भारत और पकिस्तान के बीच खींची नफरत की इन लकीरों को मिटाकर वो पकिस्तान से भारत आई और हमे प्यार और अपनेपन का एक नया पाठ पढ़ा गई।
अबीहा की मौत के बाद उनके पिता हमीद इमरान ने पकिस्तान के एक अखबार, ‘द डॉन’ में भारत के नाम एक धन्यवाद पत्र लिखा।
“न तो मैं अपनी बेटी की मौत के दर्द को भुला सकता हूँ और न ही उसके इलाज के दौरान भारत से पाए हुए प्यार को।”
अबीहा पाकिस्तान के चकवाल शहर की रहने वाली थी। उनका जिगर (liver) खराब हो चुका था। 2011 में डॉक्टरो ने उन्हें लीवर ट्रांसप्लांट की सलाह दी। चूँकि उनके पिता, इमरान उस वक़्त साऊदी अरबिया में नौकरी कर रहे थे इसलिए अबीहा का ऑपरेशन वही करवाया गया था। पर 2015 में एक बार फिर से अबीहा को ऑपरेशन की ज़रूरत पड़ी। पकिस्तान में इस ऑपरेशन का खर्च करीब 50 लाख रूपये तक आना था इसलिए इमरान ने भारत का रुख किया।
यहाँ दिल्ली के अपोलो अस्पताल में अबीहा का ऑपरेशन होना था। पर दिक्कत ये थी कि इमरान भारत में किसीको नहीं जानते थे। ऊपर से यहाँ आने से पहले तक उन्होंने भारत को केवल एक दुश्मन देश के तौर पर ही जाना था। अबीहा की माँ भी गर्भवती थी इसलिए उन्हें भी देखभाल की ज़रूरत थी।
इमरान को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि उन्हें क्या करना चाहिए। ऐसे में इमरान के एक दोस्त ने उन्हें भारत में रहने वाले रतनदीप सिंह कोहली के बारे में बताया और उनका पता भी दिया। रतनदीप सिंह कोहली, सरदार चेत सिंह कोहली के पोते है, जिन्होंने 1910 में चकवाल का सरकारी स्कूल बनवाया था। इसी स्कूल में इमरान और उनके दोस्त भी पढ़े थे।
विभाजन से पहले सरदार चेत सिंह कोहली का परिवार चकवाल में ही रहा करता था और उन्होंने यहाँ स्कूल और अस्पताल बनवाने के अलावा भी ऐसे कई नेक काम किये थे जिनकी वजह से वे आज भी चकवाल के लोगों के दिलो में बसते है। इसी वजह से जब कभी चकवाल के इस स्कूल में कोई बड़ा कार्यक्रम होता है तो चेत सिंह जी के पोते रतनदीप सिंह को ज़रूर बुलाया जाता है।
रतनदीप सिंह कोहली कहते है, “मैं 2010 में चकवाल गया था, जब मेरे दादाजी के बनाये स्कूल की सौवी वर्षगाठ थी। और फिर दुबारा 2012 में अपने परिवार को लेकर वहां गया था। वहां के लोगो ने और उस स्कूल के बच्चो ने हमें इतना प्यार और सम्मान दिया जिसे मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकता। मेरी पत्नी को तो वो ‘चकवाल की बहु’ कहकर बुलाते थे। हमारे बुजुर्गों के किये हुए अच्छे कामो के लिए वो लोग हमे शुक्रियां कहते नहीं थक रहे थे। ये बहुत ही भावुक क्षण था हमारे लिए।”
रतनदीप सिंह का पता मिलने पर इमरान अपनी पत्नी, अपनी बेटी- अबीहा और उस व्यक्ति को साथ लेकर गए जो अबीहा को लीवर देने वाला था। इन चारो का रतनदीप सिंह और उनकी पत्नी परमजीत कौर ने खुले दिल से स्वागत किया।
“जब इमरान हमारे घर आये तो हम लोग एक दुसरे से बिलकुल अनजान थे। पकिस्तान में रहने वाले हमारे एक पुराने दोस्त ने उन्हें हमारा पता दिया था। पर अबीहा पहले ही दिन से मेरी पत्नी के साथ बहुत घुल मिल गयी थी। जब मेरी पत्नी ने पूछा कि क्या वो अबीहा के लिए उसकी पसंद का खाना बना कर रोज़ अस्पताल भेज सकती है तो इमरान और उनकी पत्नी बेहद खुश हुए। अबीहा को अस्पताल का खाना बिलकुल पसंद नहीं था। ऐसे में उनके लिए ये बड़ी राहत थी,” रतनदीप सिंह बताते है।
परमजीत कौर बहुत प्यार से अबीहा के लिए खाना बनाने लगी। बाकि सभी सदस्यों के लिए भी वे अलग से खाना बनाती। मांसाहारी व्यंजनों के लिए मांस ख़ास तौर पर मुसलमान दुकानदारों से ही लाया जाता।
“मुझे पता था कि मुसलमान धर्म के लोग सिर्फ हलाल किया हुआ मांस ही खाते है। इसलिए मैं इस बात का ख़ास ध्यान रखता। जब मैंने इमरान को एक बार खाने की मेज़ पर बताया कि ये मांस हलाल किया हुआ है इसलिए वे बेझिझक खाए तो उन्होंने कहा, “भाईजान हमारे लिए तो आपके घर की हर चीज़ हक़ हलाल है”। उनके ये शब्द सुनकर मैं और मेरी पत्नी बेहद भावुक हो उठे थे,” कोहली बताते है।
16 मार्च 2015 को अबीहा का ऑपरेशन किया गया। पर तबियत बिगड़ने की वजह से अबीहा की माँ को उसे छोड़कर पकिस्तान लौटना पडा। पर वो इस तसल्ली के साथ भारत से जा रही थी कि यहाँ परमजीत कौर के रूप में अबीहा की दूसरी माँ मौजूद है।
अगले कुछ दिन बेहद नाज़ुक थे। अबीहा की तबियत दिन पर दिन बिगडती चली जा रही थी। पर परमजीत हर पल उनके साथ होती। अब वे सिर्फ अबीहा के लिए ही नहीं बल्कि अपोलो अस्पताल में इलाज करा रहे बाकी पाकिस्तानी मरीजों के लिए भी खाना बनाकर लाने लगी। कुछ लोगो को तो उन्होंने घर पर ख़ास दावत भी दी।
“हम तीन महीने वहां रहे पर कोहली साहब और उनके परिवार ने हमे ये कभी महसूस नहीं होने दिया कि हम किसी अनजान मुल्क में है। हमे ऐसा ही लगता था जैसे हम चकवाल के ही किसी अस्पताल में अबीहा का इलाज करा रहे है,” इमरान बताते है।
पर तीन महीने तक मौत से जंग लड़ने के बाद आखिर 7 मई 2015 को अबीहा ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
“वो कई बार कहती थी कि उसे भारत बहुत अच्छा लगता है। उसे ये अस्पताल और यहाँ के डॉक्टर्स भी बहुत अच्छे लगते है और जब वो बड़ी होगी तो इसी अस्पताल में डॉक्टर बन कर आएगी। मुझे उसकी बहुत याद आती है,” परमजीत कौर ने अपने आंसू रोकते हुए कहा।
अस्पताल की नर्स से लेकर अबीहा की डॉक्टर तक हर कोई अबीहा की बातें बताता नहीं थकता। इमरान भी अस्पताल के सभी कर्मचारियों के बेहद शुक्रगुजार है जिन्होंने अबीहा की देखभाल में कोई कमी नहीं रखी।
भारत से जाते हुए भी भारतीय सेना के जवानो ने इमरान का दिल उस वक़्त जीत लिया जब वे अबीहा के शव को लेकर पकिस्तान वापस जा रहे थे।
“जब हमारा एम्बुलेंस बॉर्डर के पास आकर रुका तो एक सैनिक दौड़कर आया और अबीहा के शव पर उसने एक हरा कपड़ा ओढ़ा दिया ताकि उसे धुप न लगे।”
भले ही इमरान भारत से आँखों में आंसू लेकर लौटे पर उन्होंने भारत के रतनदीप सिंह कोहली और उनके परिवार के प्यार को कभी नहीं भुलाया।
“भले ही बंटवारे की वजह से हम एक दुसरे से बहुत दूर हो गए हो। पर 67 साल बाद भी इन दोनों मुल्को के आम इंसान के बीच का प्यार अब भी ख़त्म नहीं हुआ है। और एक दिन ये प्यार दोनों मुल्को के सियासती खेलो से ऊपर उठकर अपना रंग ज़रूर दिखायेगा,” – हमीद इमरान।
पकिस्तान में अपने घर से फ़ोन पर ‘द बेटर इंडिया’ से बात करते हुए इमरान ने कहा, “मैं अपनी किस्मत को मंज़ूर करता हूँ। वालिद होने के तौर पर अपनी बच्ची को बचाने के लिए मुझसे जो कुछ हो सकता था, जितना हो सकता था, मैंने किया। पर एक मुसलमान होने के नाते मैं ‘अल्लाह’ के हर फैसले को मंज़ूर करता हूँ।”
भारत के लोगो का शुक्रिया अदा करते हुए इमरान के पास शब्द कम पड़ रहे थे, “मैं चाहता हूँ कि लोग ये जाने कि आम हिन्दुतानी कितना नेक है। सिर्फ कोहली परिवार ही नहीं बल्कि अपोलो अस्पताल के हर डॉक्टर और नर्स का मैं शुक्रगुजार हूँ जिन्होंने मेरी बच्ची का इतना ख्याल रखा, फिर चाहे वो डॉ. सुभाष गुप्ता हो या डॉ. सिब्बल।”
“मैं लोगो से ये भी कहना चाहता हूँ कि दोनों ही मुल्को की आम आवाम को सियासत से कोई लेना देना नहीं है। उनके अन्दर जो एक इंसानी जज्बा है वो किसी भी सियासती कडवाहट से कई ऊपर है,” उन्होंने कहा।
अबीहा की डायरी कोहली परिवार और अपोलो अस्पताल के डॉक्टरो के नाम लिखे कई शुक्रियानामे से भरी हुई थी। जन्नत की ओर रुखसती से पहले इस नन्ही सी परी ने अपनी डायरी में लिखा था, “I Love India” (“मुझे भारत से प्यार है “)।
(साभार – द बेटर इंडिया)
फैशनेबल और स्टाइलिश हैं डस्टर जैकेट्स
सर्दियों में अपने परम्परागत परिधानों के साथ स्वेटर्स, पुलोवर्स और ब्लेज़र से अलग कुछ पहनना चाहती हैं तो इन दिनों एक तरह की जैकेट्स काफी ट्रेंड कर रही है जो आपके ट्रेडिशनल लुक को बरकरार रखने में हेल्पफुल रहेगी. इन जैकेट्स को विंटर्स के बाद भी लगभग सभी तरह के ड्रेसेज़ के साथ पेयर किया जा सकता है. इस तरह की जैकेट्स मार्केट में डस्टर जैकेट के नाम से लोकप्रिय हैं।
डस्टर जैकेट?
जींस, स्कर्ट, मैक्सी, गाउन और कुर्ते के साथ पहने जाने वाले लॉन्ग जैकेट्स को डस्टर जैकेट कहते हैं। फुल स्लीव और स्लीवलेस जैसे कई तरह के वैराइटी में ये जैकेट्स उपलब्ध हैं।. हैवी, बोल्ड और लाइट प्रिंट्स वाले इन जैकेट्स से आप खुद को हर एक सीज़न में स्टाइल कर सकती हैं।
इन्हें कॉलेज़, ऑफिस वेयर के साथ ही कैजुअल और पार्टी वेयर के साथ भी पहना जा सकता है। प्रिंट्स और पैटर्न का चुनाव आप अपने शरीर के हिसाब से करें।
स्लीव्स के अलावा इनके नेकलाइन और लम्बाई भी वैराइटी देखने को मिलती हैं जो पूरी तरह से आपके पसंद और बॉडी साइज़ पर डिपेंड करता है।
जहां पहले इसे कुर्ती और सलवार-कमीज के साथ पहना जाता था वहीं अब इसे जींस, स्कर्ट, गाउन,शॉर्ट ड्रेस, सबके साथ पहने हुए देखा जा सकता है.अपने पुराने लहंगे के साथ थोड़ा हैवी वर्क वाला डस्टर जैकेट पहन सकती हैं।
अपने आउटफिट्स को देखते हुए फ्रिल, लेयर्स और स्ट्रेट कट वाले जैकेट्स को चुनें।
लहंगे के साथ एम्ब्रॉयडेड, ब्रोकेड वर्क और सिल्क जैसे फैब्रिक से बने डस्टर जैकेट अच्छे लगेंगे।
सेमी फॉर्मल लुक के लिए जींस, पैंट्स और कुर्ते के साथ पहनें। इंडो-वेस्टर्न लुक के लिए क्रॉप-टॉप और स्कर्ट के साथ डस्टर जैकेट पहनें।
सलवार-कमीज और गाउन के साथ डस्टर जैकेट का कॉम्बिनेशन आपके लेडीज़ संगीत और मेंहदी फंक्शन में देगा क्लासी लुक। जु्अल लुक के लिए शॉर्ट्स के साथ डस्टर जैकेट्स पहनें। इसे आप बीच वेयर के तौर पर भी पहन सकती हैं।










