Thursday, March 26, 2026
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कितने सुरक्षित हैं माइक्रोवेव सेफ कंटेनर्स!

हम में से कई लोग माइक्रोवेव कंटेनर्स को ‘सेफ’ मार्क देखकर खरीद लेते हैं। चूंकि इनके बैक में सेफ मार्क होता है इसलिए हम निश्चिंत भी हो जाते हैं। हालांकि इन पर केवल यह लिखा होना ही सेफ होने की गारंटी नहीं है।

कंटेनर्स में कमी
माइक्रोवेव कंटेनर्स को प्रयोग के लिए मानकों पर खरा पाए जाने के बाद ही इनका प्रयोग करें। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि पतली प्‍लास्टिक बॉडी वाले कंटेनर्स सुरक्षित नहीं होते हैं चाहे उन पर सेफ का मार्क हो भी तो भी। कई अध्‍ययनों में सामने आया है कि इन कंटेनर्स से BPA यानी बिसेफनॉल A निकलता है और जब इन्‍हें गर्म किया जाता है तो वह भोजन में मिल जाता है। छोटी-छोटी मात्रा में BPA लेना काफी हानिकारक होता है और इसका असर लंबे समय तक बना रहता है। अब तो इसे बैन करने की मांग भी उठ रही है।

क्‍या है बेहतर
विशेषज्ञ कहते हैं कि कई प्‍लास्टिक कंटेनर्स एक बार प्रयोग होने के बाद अगले प्रयोग के लिए ठीक से साफ नहीं होते। प्‍लास्टिक की कुछ मात्रा भोजन में मिलती ही है। साथ ही ऐसे कंटेनर्स, जिसमें डिटर्जेंट या पेंट आदि रखा गया हो उसे धोकर भोजन रखने के लिए कभी प्रयोग नहीं करना चाहिए।

इन्‍हें करें इस्‍तेमाल
शीशे के मोटे बर्तनों को ओवन के लिए प्रयोग करें। अच्‍छे ग्‍लासवेयर में ही भोजन को फिर गर्म करें। डेकोरेटिव ग्‍लास प्‍लेट्स को प्रयोग करने से बचें। पेपर प्‍लेट को भोजन गर्म करने के लिए इस्‍तेमाल कर सकते हैं।
 

इस मंदिर में पुरुषों का प्रवेश है निषेध, महिला बनकर करते हैं पूजा

देश में ऐसे कई  मंदिर ऐसे है, जहां महिलाओं का प्रवेश वर्जित है और अधिकतर चर्चा में रहता है,  लेकिन देश में एक ऐसा मंदिर भी है जहां पुरूषों का प्रवेश वर्जित है । इस मंदिर में उन्हें पूजा करने के ‌लिए महिलाओं की तरह पूरा सोलह श्रृंगार करना पड़ता है। ये खास मंदिर केरल के कोल्लम जिले में ‌हैं। इस कोट्टनकुलगंरा श्रीदेवी मंदिर में हर साल चाम्याविलक्कू त्यौहार मनाया जाता है।

इस त्यौहार में हर साल हजारों की संख्या में पुरुष श्रद्धालु जाते  हैं। उनके तैयार होने के लिए मंदिर में अलग से मेकअप रूम बनाया जाता है। पुरूष महिलाओं की तरह न केवल साड़ी पहनते है, बल्कि ज्वैलरी, मेकअप और बालों में गजरा भी लगाते है। इस उत्सव में शामिल होने के लिए उम्र की कोई सीमा नहीं है। यही नहीं ट्रांसजेंडर भी इस मंदिर में पूजा अर्चना करने के लिए आते हैं।

माना जाता है कि इस मंदिर में देवी की मूर्ति स्वयं प्रकट हुई थी। अपनी खास परंपरा के लिए दुनियाभर में मशहूर इस मंदिर के ऊपर कोई छत नहीं हैं। इस राज्य का यह ऐसा एकमात्र मंदिर है जिसके गर्भगृह के ऊपर छत या कलश नहीं हैं।

 

अमर, अकबर, एंथनी’ के हार्वड यूनिवर्सिटी पहुंचने का ये है राज

 

बॉलीवुड की सदाबहार फिल्म ‘अमर, अकबर, एंथनी’ अब सिर्फ एक फिल्म नहीं रहेगी। ये फिल्म अब एक किताब में तब्दील हो गई है। हॉर्वड यूनिवर्सिटी ने इस फिल्म को ‘बॉलीवुड, भाईचारे और देश’ पर  बनीं एक किताब में शामिल किया है। आखिर ऐसा इस फिल्म में क्या खास था जो हार्वड ने इसे अपनी किताब में शामिल किया, जानिए।

1977 में आई मनमोहन देसाई की फिल्म ‘अमर, अकबर, एंथनी’ ब्लॉकबस्टर साबित हुई थी। इस फिल्म में अमिताभ बच्चन, विनोद खन्ना और ऋषि कपूर ने मुख्य भूमिका निभाई थी। फिल्म की कहानी तीन भाइयों पर थी जो जन्म के वक्त बिछड़ जाते हैं। इसके बाद अलग-अलग धर्म के लोग उन्हें पाल-पोसकर बड़ा करते हैं। अमिताभ बच्चन ने एंथनी गोन्सालविज का किरदार निभाया था जो इसाई परिवेश में पला-बढ़ा था। विनोद खन्ना फिल्म में अमर खन्ना बने थे जो हिंदू थे। वहीं ऋषि कपूर फिल्म में अकबर अलाहाबादी बने थे। तीनों भाई फिल्म के विलेन को मारने के लिए साथ आते थे।
मनमोहन देसाई की ये फिल्म कई मायनों में भाईचारे का संदेश देती है। फिल्म में तीन धर्मों को एक साथ शांति से रहते हुए दिखाया गया था। तीनों बेटे स्वतंत्र दिवस के दिन अपने पिता से अलग होते हैं जो उन्हें गांधी की मूर्ती के नीचे छोड़ जाता है। तीनों का फिल्म के अंत में साथ आना देश की जीत दिखाता है। ‘अमर, अकबर, एंथनी’ साल 1977 की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म थी। बॉलीवुड में भाईचारे के लिहाज से इस फिल्म को हमेशा याद किया जाएगा।

 

पीयूष पाण्डेय : चाय चखने से लेकर विज्ञापन की दुनिया के बेताज बादशाह 

पीयूष पाण्डेय का नाम भारतीय विज्ञापन जगत में मशहूर है और इनकी कहानी इस बात का प्रमाण है कि रचनात्मकता असीमित होती है। पीयूष देश के कई प्रतिष्ठित अभियानों के पीछे रहे हैं, पर इनके करियर की शुरुआत विज्ञापन की चमक-धमक की दुनिया से बहुत दूर हुई थी। पेशे से क्रिकेटर रहे पीयूष ने गुडरिक ग्रुप में टी-टेस्टर के रूप में की थी।

हांलाकि विज्ञापन से इनका लगाव शुरू से था। सन 1979 में, २४ वर्ष की आयु में इन्होंने मुंबई स्थित ओगिलवी एवं मैथेर में पद ग्रहण करने के लिए अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया। इनका साक्षात्कार वहां के रंगन कपूर ने लिया और इन्हें अकाउंट एग्जीक्यूटिव के रूप में नौकरी करने का प्रस्ताव दिया ।

इस तरह के कदम कईयों को अपनी राह से भटका देते हैं पर पीयूष ने इस मौके को आगे बढ़ने की सीढ़ी बना लिया । वेर्व इंडिया  को दिए अपने एक साक्षात्कार में पियूष ने बताया कि किस प्रकार वे लोगो से छुपा कर विज्ञापनों के कॉपी या टैग लाइन (प्रचार वाक्य) लिखा करते थे

“मेरा पहला काम सनलाइट डिटर्जेंट पाउडर के लिए था। मुझे याद है कि इसमें सुप्रिया पाठक थीं, जो कहती थी सनलाइट की दाम बस इतनी, और चमक… चमक धूप सी ।”

पीयूष को एक रचनात्मक लेख तक पहुँचने में छः साल लग गए, पर पीयूष ने हार नहीं मानी ।

पीयूष ने कई महत्वपूर्ण विज्ञापनों को लिखा है पर इनमे से सबसे अधिक प्रचलित फेविकोल रहा, जिसने इन्हें एब्बी और ए एंड एम् मैगज़ीन अवार्ड दिलवाया।

उन दिनों, ओगिलवी के लिए फेविकोल इतना महत्वपूर्ण उत्पाद नहीं था और पीयूष भी एक कम बजट वाले उत्पाद फेवीटाइट रैपिड के लिए कॉपीराइटर का काम कर रहे थे। स्क्रॉल के एक आर्टिकल के अनुसार, अन्विल अलीखान, जो उस वक़्त ओगिलवी के साथ काम कर रहे थे, याद करते हैं कि किस प्रकार पीयूष एक 10 सेकंड के रस्साकशी के  विचार  के साथ आये जिसमे दम लगा के हईशा का नारा था।

वह अभियान तो आगे बढ़ा नहीं पर फविकोल ने अपने पुराने विज्ञापन को हटा कर नये रस्साकशी के विचार को अपना लिया।

‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ के साथ ही लूना मोपेड, डेरी मिल्क, और एशियन पेंट्स के विज्ञापनों की सफलता के पीछे पीयूष का ही हाथ हैं। उन्होंने कई बार माना है कि उनकी सबसे अधिक प्रचिलित पंक्तियाँ किसी बातचीत या किसी संस्कृति से ली गयी है।

1994 में, 40 वर्ष की उम्र में कई सफल अभियानों के बाद, पीयूष को ओ एंड ऍम का नेशनल क्रिएटिव डायरेक्टर नियुक्त किया गया।

पीयूष को न सिर्फ मशहूर विज्ञापनों के लिए, बल्कि इस जगत में क्रांतिकारी बदलाव लाने के लिए भी जाना जाता है। राजस्थान की गलियों में बड़े हुए पीयूष हिंदी भाषा, साहित्य और संगीत से जुड़े रहे। मशहूर पाशर्व गायिका इला अरुण इनकी बहन है और विज्ञापन की दुनिया में ही मशहूर प्रसून पाण्डेय इनके भाई हैं ।

वेर्वे इंडिया को पीयूष बताते हैं, “हमारे घर पर हिंदी ही बोली जाती थी; हिंदी में ही हम चीज़े समझते थे। इसलिए हिंदी में मैं सबसे अधिक सहज हूँ ठीक उसी तरह जैसे बंगालियों के लिए बंगाली है या इसी तरह किसी की भी मातृभाषा उनके लिए है। फर्क सिर्फ़ ये है कि कुछ लोग अपनी इच्छा से अपनी भाषा को पीछे छोड़ देते है और यह उनकी सबसे बड़ी गलती होती है।”

इनका करियर उस समय आरम्भ हुआ जब टेलीविज़न की बढती लोकप्रियता के कारण विज्ञापनों में बदलाव लाये जा रहे थे और हिंदी उस वक्त विज्ञापन संचार के माध्यम के रूप में प्रचलित हो रही थी। पीयूष ने इस बदलाव में भागीदारी नहीं ली बल्कि इस बदलाव को एक नया रूप दिया।

अपने अलग तरह के विज्ञापनों के कारण, पीयूष ने अनगिनत पुरस्कार जीते हैं और असीमित प्रशंसा बटोरी है।

कैडबरी के इनकी मुहिम को क्रिएटिव ऐब्बीज़ द्वारा ‘कैंपेन ऑफ़ द सेंचुरी’ के टाइटल से नवाज़ा गया जबकि एड क्लब मुंबई ने ‘कैंपेन ऑफ द सेंचुरी’ पुरस्कार, फेविक्विक को दिया। 2002 के कान्स में दो बार स्वर्ण जितने के बाद इन्हें 2004 में कान्स एडवरटाइजिंग अवार्ड के जूरी का प्रेसिडेंट बनाया गया । 52 वर्ष के इतिहास में, इस स्थान पर पहुँचने वाले ये पहले भारतीय है।

2006 में ओगिलवी एंड मैथेर वर्ल्डवाइड बोर्ड में इन्हें शामिल किया गया और 2010 में इन्हें एडवरटाइजिंग एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया द्वारा लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से नवाज़ा गया। 2012 में न्यू यॉर्क के शेली लज़ारस द्वारा क्लीओ लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड पाने वाले ये पहले ऐशियाई बने ।

लगातार 9 वर्षों तक इन्हें द इकनोमिक टाइम्स द्वारा भारतीय विज्ञापन जगत का सबसे अधिक प्रभावशाली व्यक्ति घोषित किया है। 2016 में, इन्हे अपने योगदान और उपलब्धियों के लिए पद्मश्री से नवाज़ा गया।

मज़ाक में ऐसा कहा जाता है कि लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार देने का सांकेतिक मतलब होता है कि अब उस व्यक्ति को काम में विराम लगा कर सेवानिवृत हो जाना चाहिए, पर रचनात्मकता से भरे पीयूष के दिमाग को कोई पुरस्कार रोक नहीं पाया। इसके बाद पीयूष ने कई फिल्मों में अदाकारी की और पाण्डेयमोनियम : पियूष पाण्डेय ओन एडवरटाइजिंग नामक पुस्तक की रचना की ।

बीते सालों में, पीयूष के काम ने कई अवरोध तोड़े और कई कलात्मक सीमाएं लांघी।

अमिताभ बच्चन ने पीयूष के साथ काम करने के बारे में कहा है, “ मेरा अपना अनुभव इस जीवंत व्यक्ति के साथ काम करने का बहुत शिक्षाप्रद रहा है।”

यहाँ ध्यान देने योग्य बात ये है कि पीयूष ने अपना करियर, विज्ञापन की दुनिया में शुरू नहीं किया और न ही ये किसी अतिरिक्त योग्यता के साथ यहाँ आये। इन्होने अपने हुनर को तराशा और अपने आगे आने वाले हर मौके का फायदा उठाया और इस क्षेत्र का चेहरा सदा के लिए बदल दिया ।

(साभार – द बेटर इंडिया)

2021 तक अंग्रेजी को पछाड़ कर 20 करोड़ हो जाएंगे हिंदी में इंटरनेट का इस्तेमाल वाले

नई दिल्ली: हिंदी प्रेमियों के लिए यह अच्छी ख़बर हो सकती है कि इंटरनेट की दुनिया में हिंदी भाषियों का वर्चस्व लगातार बढ़ रहा है और इस आभासी दुनिया में हिंदी वाले इसी तरह अपनी पैठ बनाते रहे तो जल्द ही ये अंग्रेजी को काफी पीछे छोड़ जाएंगे।
वर्ष 2021 तक 53.6 करोड़ लोगों के ऑनलाइन रहने के समय अपनी क्षेत्रीय भाषाओं का इस्तेमाल करने की संभावना है। उसका श्रेय मोबाइल फोनों एवं डाटा पैक के घटते दाम तथा और स्थानीय सामग्री की उपलब्धता को जाएगा। यह बात गूगल- केपीएमजी की रिपोर्ट में आई है.

रिपोर्ट के अनुसार हिंदी इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों की संख्या 2021 तक अंग्रेजी वालों से बहुत आगे निकल जाएगी और यह संख्या 19.9 करोड़ तक पहुंच जाएगी। उम्मीद की जा रही है कि उस समय तक भारत में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों की तादाद 73.5 करोड़ हो जाएंगी। उनकी संख्या 2016 में 40.9 करोड़ थी।

रोचक बात यह है कि भारतीय भाषाओं में इंटरनेट का उपयोग करने वालों में बड़ी संख्या में लोग पहले से ही सरकारी सेवाओं, क्लासीफाइड और खबरों का लाभ उठा रहे हैं तथा भुगतान भी वे ऑनलाइन ही करते हैं। ऐस लोग न केवल चैट ऐप और डिजिटल मनोरंजन का लाभ उठा रहे हैं बल्कि वे डिजिटल भुगतान तरीके भी अपना रहे हैं। वर्ष 2016 में भारतीय भाषाओं में इंटरनेट का उपयोग करने वालों की संख्या 23.4 करोड़ थी जबकि अंग्रेजी में इसका उपयोग करने वालों की संख्या 17.7 करोड़ थी। हिंदी के अलावा मराठी, बंगाली, तमिल, कन्नड़ और तेलुगु उपयोगकर्ताओं की संख्या तेजी बढ़ने की संभावना है।
 

फार्मूला ई रेसिंग कार चलाने वाली पहली भारतीय महिला बनीं गुल पनाग

हिंदी सिने अभिनेत्री गुल पनाग अब फार्मूला वन रेसर ड्राइवर बन गई हैं। डोर फिल्म से मशहूर हुई यह अभिनेत्री अब स्पेन के बर्सिलोना में फार्मूला ई रेसिंग कार चलाती नजर आईं। गुल पनाग ने एम4इलेक्ट्रो को सर्किट द कालाफट, कैटालोनिया स्पेन में चलाया।

एम4ई इलेक्ट्रो महिंद्रा की चौथी पीढ़ी की फॉर्मूला वन ई रेस कार है और इसने सीजन 4 में चैलेंज लिया। रेस ट्रैक पर ड्राइविंग से पहले गुल ने सिमुलेटर पर ट्रेनिंग ली जिसमें उनकी मदद महिंद्रा रेसिंग फार्मूला ई टीम  ड्राइवर फेलिक्स रोसेन्किवस्ट ने की।

एम4 इलेक्ट्रो को चलाने के बाद गुल पनाग ने कहा,’मुझे इस बात की खुशी है कि मैं दुनिया के उन लोगों में शामिल हो गई हूं जिसे मोटरस्पोर्ट की दुनिया में यह काम करने का मौका मिला। एम4 इलेक्ट्रो एक शानदार कार है। मैं इसके इंजन से मिल रहे आउटपुट को देखकर आश्चर्यचकित थी, क्योंकि ईवी टेक्नोलॉजी मेरे लिए कोई नई चीज नहीं थी। मैं बहुत समय से ई2ओ प्लस चला रही हूं।”

आपको यह भी बता दें कि गुलपनाग महिंद्रा की ई2ओ की मालकिन भी हैं जिसमें 210 एएच लिथियम आयन मोटर लगा है जो कि दो पावर आउटपुट 25 एचपी और 40 एचपी की शक्ति से संपन्न है। पी4, पी6 और पी8 वेरिएंट में उपलब्‍ध इस कार की कीमत 7.40लाख से 11.21 लाख रुपये एक्सशोरूम दिल्ली है।

 

महिलाओं को खुद के लिए भी समय जरूर निकालना चाहिए

पहली किताब से ही अपनी छाप छोड़ने वाली दीपिका अग्रवाल उन तमाम महिलाओं के लिए प्रेरणा हैं जो अपनी प्रतिभा की कद्र नहीं करतीं। घर – परिवार की तमाम जिम्मेदारियाँ निभाते हुए दीपिका ने अपनी पहली किताब ‘द बेटर साइड’ लिखी जिसे पाठकों ने हाथों – हाथ लिया। सोशल मीडिया को भी ये बड़ी खूबसूरती से इस्तेमाल करती हैं और उनके प्रेरक कथ्य जीवन में नया उत्साह भर रहे हैं। अपराजिता ने दीपिका अग्रवाल से खास मुलाकात की, पेश हैं प्रमुख अंश –

प्र. पहली ही किताब लिखी और वह बेस्टसेलर है? इस सफलता के बाद आपकी जिन्दगी कितनी बदली है?

उ. हमें खुद पर अटूट विश्वास रखना आता हो तो कोई भी काम हम करेंगे, सफलता निश्चित है। खुद पर विश्वास सबसे बड़ी चीज है। मेहनत से पाई हुई सफलता ही असली सफलता है जो मुझे अपनी पहली किताब ‘द बेटर साइड’ के माध्यम से मिली  है। अब लोग मुझे एक गृहिणी के साथ एक लेखिका के रूप में भी जानते हैं और सम्मान करते हैं। मुझसे लोग अपनी समस्याएँ साझा करते हैं और मैं उनकी समस्याओं का सकारात्मक समाधान निकालने की पूरी कोशिश करती हूँ। लोग अब मुझे मेरे नाम और मेरे काम से पहचानते हैं। मैं लोगों की सहायता व्यक्तिगत रूप से अपनी लेखनी द्वारा कर रही हूँ। यही मेरी सबसे बड़ी सफलता है।

प्र. आपने लिखना कैसे शुरू किया?

. लिखने का शौक तो मुझे था मगर व्यवस्थित रूप से लिखना  नहीं हो पाता था। यह जरूर था कि मेरे दिमाग में जो भी सकारात्मक और अच्छे विचार आते हैं, उन विचारों को में हमेशा से हर सुबह कागज पर उतार लेती हूँ। कविताएँ भी लिखती थी मगर इस ओर पहले ध्यान ही नहीं दिया। दरअसल, मेरे लेखन की शुरुआत ही इन 4 पँक्तियों के विचारों को उतारने से हुई। उसी दौरान एक कार्यशाला में भाग लिया और यह मेरे जीवन को बदलने वाला अनुभव साबित हुआ। कार्यशाला ने मुझमें विश्वास भरा और मैंने फैसला किया कि अब किताब लिखूँगी।

प्र. किसी से प्रेरणा मिली?

उ. एक भइया हैं मेरे, जिन्होंने “विशेज आर फ्री’ किताब लिखी, उन्होंने मेरा हौसला बढ़ाया। उनकी किताब पढ़कर मुझे प्रेरणा मिली। मैंने महसूस किया कि ईश्वर ने अगर मुझे कोई प्रतिभा दी है, मुझमें कुछ है तो उसे बाहर लाना चाहिए। जो भी लिखती थी, सोशल मीडिया पर डाल देती थी और वह लोगों को बहुत पसन्द आता था। तारीफें मिलती थीं तो हौसला बढ़ता गया और इसके बाद कार्यशाला में किताब लिखने की चाहत भर दी।

प्र. अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों और लेखन के बीच संतुलन आपने कैसे बनाए रखा?

उ. परिवार में सबने मुझे हमेशा प्रोत्साहित किया है। मेरी सफलता पर मेरे परिजन आनंदित होते हैं। मैंने अपनी हर जिम्मेदारी निभाई है मगर अपने लिए वक्त भी इन जिम्मेदारियों को पूरा करते हुए निकाला है। घर के काम में परिवार का सहयोग मिले तो हर काम आसान हो जाता है व्यक्तित्व के विकास से सम्बन्धित लेखन करना मुझे पसन्द है। अब मैं इसी क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहती हूँ, शोध करना चाहती हूँ और फिर लिखना चाहती हूँ। कविताएँ पसन्द हैं तो कविताएं भी लिखना चाहूँगी।

प्र. बहुत सी महिलाएँ हैं, जो अपने घर के पीछे खुद को भुला देती हैं, वह आपकी तरह अपना हुनर बाहर कैसे निकाल सकती हैं?

. सबसे पहले तो हम महिलाओं को अपनी मानसिकता बदलनी होगी। आप कुछ भी कर सकती हैं और आजकल तो सोशल मीडिया एक बड़ा माध्यम है जहाँ से आपको काफी सहायता मिल सकती है। सोशल मीडिया से हम काफी कुछ नया सीख सकते हैं। दरअसल, आज महिलाओं के साथ पुरुष को भी अपनी सोच बदलनी चाहिए और महिलाओं को आगे बढ़ाने में अपना सहयोग देना चाहिए।

प्र. आपकी भावी योजना क्या है?

. मुझे अब रुकना नहीं है। अपनी लेखनी द्वारा ज्यादा से ज्यादा लोगों को प्रेरित करना है।

प्र. क्या सन्देश देना चाहेंगी आप?

उ. मेरा कहना है कि प्रतिभा हम सबमें हैं, जरूरत बस उसे तराशने की है। महिलाओं को खुद के लिए भी समय जरूर निकालना चाहिए। आप आधा घंटा या कुछ मिनट ही निकालिए मगर समय निकालिए और उस वक्त मे वह काम करिए जो आप हमेशा से करना चाहती हैं। यह आधा  घंटा भी सिर्फ आपका होना चाहिए। अपनी पहचान बनाइएं, उसे विकसित कर आगे बढ़िए।

 

एक दूसरे की हिफाजत करेंगे, तभी हम बचेंगे और तभी यह मुल्क बचेगा

अजीब सा मौसम है, हर बात पर बेवजह का शोर है और जिन मुद्दों पर बात करनी चाहिए, उन पर लम्बी खामोशी है। कहीं आग लग रही है तो कहीं पथराव हो रहा हैं, कहीं फतवों का दौर चल रहा है तो कहीं औरतें पिस रही हैं।

हाल ही में तीन तलाक, अजान, गाय और भूखे किसान इस देश के मीडिया चैनलों में छाए रहे। यकीन नहीं होता कि हम इस देश की गंगा – जमुनी संस्कृति में रहने वाले हैं। राजनीति हमें इस्तेमाल कर रही है और हम अपनी खुशी से उसके हाथ का खिलौना बने हुए हैं। जिस देश में सैनिकों की मौत भी विवाद का विषय बन जाए, उस देश का भविष्य क्या होगा, यह सोचने का विषय है।

समझ नहीं आता, अचानक इस देश को क्या हो गया है, हम अजान को नहीं बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं, मंदिर की घंटियाँ हमें परेशान कर रही है, कल को गुरुवाणी से तकलीफ होगी और गिरजाघरों के घंटे हमारी नींद उड़ाएँगे।

हम से मैं पर सिमटता हमारा जीवन हमसे बहुत कुछ छीन रहा है। वसुधैव कुटुम्बकम के इस देश में भाषा और संस्कृति ही एक मात्र माध्यम है जो हमारी संजीवनी है और हमें बचा सकता है। क्या ऐसा नहीं लगता कि जिस गाँव और शहर को एक दूसरे का पूरक होना चाहिए, वे एक दूसरे के दुश्मन बन रहे हैं।

दरअसल, परम्परा हो, धर्म हो या संस्कृति हो, रीति जब कुरीति बन जाए और विकास की राह में रोड़ा बने तो उसे वहीं पर तोड़ देना चाहिए और यह बात हर धर्म पर लागू होती है। तीन तलाक पर मुस्लिम बहनें कम से कम खुलकर बोल रही हैं और जब बोल रही हैं तो यह समस्या भी खत्म होगी, जरूर होगी।

इस्लाम पर आतंक और रुढ़ियों ने कब्जा कर लिया है और इस कब्जे से निकालना शिक्षित व आधुनिक मुस्लिम वर्ग की जिम्मेदारी है। तीन तलाक को लेकर जो हिन्दू ताने कस रहे हैं, उनको भी दहेज, देवदासी, डायन, भ्रूण हत्या जैसी हजारों समस्याओं से लड़कर समाज को आगे ले जाने की जिम्मेदारी निभानी होगी।

अगर आपको बुरके से नफरत है तो 10 हाथ के घूँघट और बाल विवाह पर भी आपत्ति होनी चाहिए और आपत्ति ही नहीं होनी चाहिए, उसे दूर करने के लिए काम करना चाहिए। घरेलू हिंसा तो हर तबके के व्यक्ति कर रहे हैं, अगर आप समानता लाते हैं तो सिर आपका ऊँचा होगा क्योंकि आपको अपने पीछे एक अच्छा समाज छोड़कर जाना है।

इस देश में अजान, आरती, गुरुवाणी और गिरजाघरों की प्रार्थना सभी के लिए जगह होनी चाहिए मगर जब आप सरस्वती पूजा और माँ दुर्गा के पंडालों में फेविकॉल से बजाते हैं तो उस समय आप अपने ही धर्म का अपमान कर रहे होते हैं। धर्म कोई भी हो, उसे पाखंड मत बनाइए।

एक दूसरे की हिफाजत करेंगे, तभी हम बचेंगे और तभी यह मुल्क बचेगा । देश में सरकारे आती – जाती रहेंगी मगर  ये हम हैं जो हमेशा बने रहे हैं, हजारों सालों से और साथ चलकर हमें रहना है हजारों सालों तक। एक का सम्मान दूसरा करेगा, तभी यह देश आगे बढ़ सकता है। अगर स्त्री को माँ कहते हैं तो माँ की दुनिया को बेहतर आप ही को बनाना होगा।

किसान को बचाना, खुद को बचाना है, जिम्मेदारी सरकार की ही नहीं हम सबकी है

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  • सुषमा त्रिपाठी

इस देश में कृषि और कृषक हमेशा से ही महत्वपूर्ण मगर उतने ही उपेक्षित और शोषित रहे हैं। हम उन बड़े किसानों की बात नहीं कर रहे जो सम्पन्न हैं मगर उनकी तादाद भी कम है। देश के हर कोने में किसान परेशान है, वह मर रहा है, प्रदर्शन कर रहा है। सोशल मीडिया पर कृषक विमर्श की बाढ़ आ गयी है मगर यह सारा विमर्श आरोप – प्रत्यारोप में सिमट कर रह गया है। हर किसी ने अन्नदाता को अपने हिसाब से इस्तेमाल किया है। मुमकिन है कि दिल्ली में तमिलनाडु के किसानों के प्रदर्शन को लेकर आप सवाल उठाएं मगर आप उन कठिनाइयों और कटु सत्य से मुँह नहीं मोड़ सकते और न ही शहर में रहकर परिस्थिति को समझा जा सकता है। माँग ऋणमाफ करने की हो रही थी मगर न तो यह कृषकों की समस्याओं का स्थायी समाधान है और न ही अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत ही है। बावजूद इसके हर चुनाव के पहले ऋणमाफ करने को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। स्थिति को सुधारने के लिए केन्द्र की महत्वपूर्ण भूमिका है, यह मानने के बावजूद राज्य की जिम्मेदारी कम नहीं हो जाती। प्रदर्शन और ऋणमाफी से आगे बढ़कर ठोस नीतियों की जरूरत है कि निचले स्तर तक इन नीतियों का लाभ पहुँचे और इसमें सरकार की ही नहीं बल्कि कॉरपोरेट जगत, शिक्षाक्षेत्र से लेकर हम सबकी जिम्मेदारी है। ऐसा क्यों लग रहा है कि कृषि को महत्वपूर्ण मानने के बावजूद उद्योग की तुलना में उसे दोयम दर्जे का बनाया जा रहा है? हम किसानों के लिए रोते हैं और जब गाँवों के विकास को सरकार प्रमुखता देती है तो उस पर हाय – तौबा मचाने वाले भी हम ही होते हैं। जी हाँ, शहरों की शिक्षित और परिष्कृत जनता जो बहुरराष्ट्रीय कम्पनियों के मॉल से सब्जियाँ खरीदती है मगर पास जमीन पर बैठे दूर – दराज के गाँवों से आए एक कृषक से सब्जी या अनाज खरीदना उसकी शान के खिलाफ है। मनमानी कीमतों पर ब्रांडेड दाल, सब्जियाँ और फल खरीदने वाले लोग मोलभाव करते हैं और सोशल मीडिया पर आँसू बहाते हैं। खेती विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों के लिए महज एक प्रोजेक्ट वर्क है जिससे जरिए वे कुछ दिनों के लिए शहरों से ऊब कर गाँवों में जाते हैं मगर गाँवों में बसकर कृषि क्षेत्र के लिए कोई काम नहीं करना चाहता। आखिर ऐसे शोध क्यों नहीं हो रहे हैं जो कृषकों की मेहनत कम कर उसका उत्पादन बढ़ा सके और इसे एक बाजार उपलब्ध करवाए? कृषि से संबंधित इंजीनियरिंग, पशुओं को स्वस्थ रखने और दुधारू मवेशियों का उत्पादन बढ़ाने के लिए किसी भी क्षेत्र में कितने लोग काम कर रहे हैं या अभिभावक कहाँ तक बच्चों को गाँवों में जाने या बसने की अनुमति दे रहे हैं? खुद युवा पीढ़ी क्या गाँवों में जाना चाहती है या गाँवों को बेहतर बनाने के लिए काम करना चाहती है? क्यों सरकार जब पोस्टिंग किसी गाँव में करती है तो आन्दोलन और घेराव शुरू हो जाता है? कटु सत्य यह है कि सरकारी नौकरी प्राथमिकता इसलिए है क्योंकि वहाँ तय मोटा वेतन है और यह धारणा है कि आरामदायक जीवनशैली भी मिलेगी। अगर ऐसा है तो हर बात के लिए सरकार को दोष देना कहाँ तक सही है? आज किसान मर रहे हैं तो भागीदारी हमारी भी है। कॉरपोरेट क्षेत्र चाहें तो कृषि से सम्बन्धित उद्योगों से इस देश के कृषि और प्राकृतिक संसाधनों को नया जीवन दे सकते हैं। आप पतंजलि का मजाक उड़ा सकते हैं मगर सत्य तो यही है कि पतंजलि ने कृषि को बड़ी सहायता दी है। सवा सौ करोड़ की आबादी वाला देश हर काम के लिए सरकार पर क्यों निर्भर है? क्या हम हर बात के लिए राजनेताओं और सरकारों पर निर्भर नहीं होते जा रहे? दोहरापन कहीं और नहीं हमारे भीतर है।

कृषि और कृषि क्षेत्र से संबंधित गहन अनुभव नहीं हैं मगर स्थिति को देखने और समझने के लिए अपराजिता ने थोड़ी सामग्री और आँकड़ों का संकलन किया है जिसमें बीबीसी हिन्दी से लेकर कई ब्लॉग और समाचार पत्रों के खबरों की कतरने शामिल हैं। हम जो कह रहे हैं, इनके आधार पर ही कह रहे हैं। यह स्थिति कृषि के साथ ही नहीं है बल्कि हमारी तमाम परम्परागत कलाओं और उद्योगों के साथ है। सच तो यह है कि आज गाँव, किसान और कृषि के लिए आँसू हर कोई बहा रहा है मगर कोई भी वहाँ जाकर काम करके स्थिति को सुधारने के लिए आगे नहीं आ रहा है। मीडिया भी नहीं, जिसने प्रदर्शन दिखाए मगर वह स्थिति नहीं जिस वजह से इन किसानों को दिल्ली आना पड़ा। खबरों के नाम पर हमें तमाशा करने और देखने की आदत हो गयी है। किसानों ने चूहे खाए और आपने उनको रोका नहीं, गजेन्द्र सिंह चौहान एक राजनीतिक सभा में सबके बीच में पेड़ से फाँसी लगाकर मर जाता है और हम उसे लाइव देखते हैं, ये संवेदनहीनता हमें मनुष्य होने का अधिकार भी रखने नहीं देती। स्थानीय स्तर पर जो आम नागरिक हैं, वे बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं। केन्द्र के किसी मंत्री ने किसानों से मिलने की जरूरत नहीं समझी, कोई सितारा वहाँ नहीं गया और खुद तमिलनाडु के मुख्यमंत्री भी लगभग महीने भर बाद आए।

हाँ किसान आत्महत्या कर रहे हैं और भारत में गरीबी और आर्थिक तंगी के चलते बड़े पैमाने पर किसान आत्महत्या करते हैं। सरकार कह रही है कि उसने किसानों की आत्महत्या के मामलों को कम करने के लिए कई कदम उठाए हैं। महेन्द्र सिंह टिकैत के बाद कोई बड़ा किसान नेता नजर नहीं आया। 1990 के दशक से भारत में किसानों की आत्महत्या के मामले सुर्खियां बटोरते रहे हैं। पहले-पहल महाराष्ट्र में बड़े पैमाने पर किसानों की आत्महत्या की घटनाएं सामने आईं और उसके बाद देश के दूसरे राज्यों में भी किसानों की आत्महत्या देखने को मिलीं।

कर्ज़ की वजह

किसानों का समर्थन कर रहे समूहों का कहना है कि अनाज की वास्तविक कीमतें किसानों को नहीं मिलती और उन्हें जीएम कंपनियों से कपास के काफी महंगे बीज और खाद खरीदने होते हैं। इन समूहों के मुताबिक जीएम बीज को खरीदने में कई किसान गहरे कर्ज में डूब जाते हैं। जब फसल की सही कीमत नहीं मिलती है तो उन्हें आत्महत्या कर लेना एकमात्र विकल्प नजर आता है। यह स्थिति पंजाब जैसे राज्य में भी है। एक आँकड़े के अनुसार “भारत में वर्ष 2010 में करीब 1,90,000 आत्महत्याएं हुई हैं। इसमें किसान महज 10 फ़ीसदी ही हैं।” बावजूद इसके सरकारी आंकड़े भी कम भयावह नहीं हैं. इनके मुताबिक भी हर साल भारत में हजारों किसान आत्महत्या करते हैं. सरकार के ताजा आकंड़ों के मुताबिक 2011 में करीब 14 हजार किसानों ने आत्महत्या की। ब्रिटिश मेडिकल जर्नल लैंसेट में भारत में आत्महत्याओं पर एक विस्तृत रिपोर्ट छपी है जो बताती है कि कई आत्महत्याओं की रिपोर्ट दर्ज नहीं होती है। लैंसेट के मुताबिक, वर्ष 2010 में 19 हजार किसानों ने आत्महत्या की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मानते हैं कि किसानों की समस्या की जड़ें बेहद गहरी हैं और इनके समाधान के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी है।

हर 30 मिनट में एक आत्महत्या

भारत को कृषि प्रधान देश कहा जाता है और यहां की 80 फीसदी आबादी खेती पर ही निर्भर है. बावजूद इसके देश में यह क्षेत्र सबसे पिछड़ा है। किसानों की समस्याओं पर ध्यान देने की फुर्सत न तो किसी सरकार को है और न ही किसी राजनीतिक पार्टी को। हां, उनकी आत्महत्या के मामले अक्सर विपक्षी दलों के लिए सरकार पर हमले का हथियार जरूर बन जाते हैं। आंकड़ों के आईने में यह समस्या काफी गंभीर नजर आती है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के मुताबिक, वर्ष 1995 से 2013 के बीच तीन लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं। वर्ष 2012 में 13,754 किसानों ने विभिन्न वजहों से आत्महत्या की थी और 2013 में 11,744 ने। एक अनुमान के मुताबिक देश में हर 30 मिनट में एक किसान आत्महत्या करता है। आँकड़े कुछ साल पुराने हैं तो जाहिर है कि यह स्थिति और भी विकट हो सकती है। वर्ष 2014 में भी आत्महत्या की दर में तेजी आई। इस दौरान 3,144 मामलों के साथ महाराष्ट्र लगातार 12वें वर्ष भी पहले स्थान पर बना हुआ है।

बस आंकड़ों की बाजीगरी

केंद्रीय खुफिया विभाग ने भी हाल में किसानों की आत्महत्या के बढ़ते मामलों पर एक रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी। उसमें कहा गया था कि किसानों की आत्महत्या की वजह प्राकृतिक भी है और कृत्रिम भी। इनमें असमान बारिश, ओलावृष्टि, सिंचाई की दिक्कतों, सूखा और बाढ़ को प्राकृतिक वजह की श्रेणी में रखा गया था तो कीमतें तय करने की नीतियों और विपणन सुविधाओं की कमी को मानवनिर्मित वजह बताया गया था इस रिपोर्ट में कहीं भी इस बात का कोई जिक्र नहीं था कि आखिर इस समस्या पर अंकुश कैसे लगाया जा सकता है। जाहिर है सरकारी एजेंसी की यह रिपोर्ट आंकड़ों की बाजीगरी के अलावा कुछ नहीं है। देश के जिन राज्यों में यह समस्या सबसे गंभीर है उनमें महाराष्ट्र तो पहले नंबर पर है ही, उसके बाद पंजाब, गुजारत, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु का स्थान है। इन राज्यों में साल-दर-साल आत्महत्या के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। किसानों की समस्याएं और उनके आत्महत्या के मामले कुछ दिनों के लिए सुर्खियों में रहते हैं। सरकारें छोटा-मोटा मुआवजा देकर या राहत पैकेज का एलान कर अपने दायित्व से मुक्त हो जाती हैं। नतीजतन समस्या जस की तस रहती है और आत्महत्या का यह चक्र जारी रहता है. बस चेहरे बदलते रहते हैं।

एक ही उपाय, मौत

आखिर किसानों की बढ़ती आत्महत्या की वजहें क्या है? मोटे तौर पर इसकी जो वजहें हैं उनमें मानसून का बदलता मिजाज प्रमुख है। तमाम आधुनिक उपकरणों की उपलब्धता के बावजूद तथ्य यह है कि ज्यादातर किसान अब भी फसलों की बुवाई और सिंचाई के मामले में बारिश पर ही निर्भर हैं। बीते कोई डेढ़ दशक से मौसम के लगातार बदलते मिजाज और बेमौसमी बरसात ने उनकी तबाही के रास्ते खोल दिए हैं। कहीं जरूरत से ज्यादा बारिश उनकी तबाही की वजह बन जाती है तो कहीं बेमौसम बारिश फसलों की काल बन जाती है। सूखा और बाढ़ की समस्या तो लगभग हर साल सामने आती है। इसके अलावा कर्ज का लगातार बढ़ता चक्र भी एक अहम वजह है। बैकों से कर्ज की खास सुविधा नहीं होने की वजह से किसानों को बीज, खाद और सिंचाई के लिए पैसों की खातिर महाजनों और सूदखोरों पर निर्भर रहना पड़ता है। यह लोग 24 से 50 फीसदी ब्याज दर पर उनको कर्ज देते हैं लेकिन फसलों की उपज के बाद उसकी उचित कीमत नहीं मिलने की वजह किसान पहले का कर्ज नहीं चुका पाता। वह दोबारा नया कर्ज लेता है और इस तरह पीढ़ी-दर-पीढ़ी कर्ज के भंवरजाल में फंसती रहती है। आखिर में उसे इस समस्या से निजात पाने का एक ही उपाय सूझता है और वह है मौत को गले लगाना।

कीमतें तय करना जरूरी

विडंबना यह है कि बंपर फसल भी किसानों के लिए जानलेवा होती है और फसलों की बर्बादी भी। कपास और गन्ना जैसी नकदी फसलों के लिए ज्यादा पूंजी की जरूरत पड़ती है। लेकिन उपज से लागत भी नहीं वसूल हो पाती। यही वजह है कि आत्महत्या की सबसे ज्यादा घटनाएं इन नकदी फसलों वाले राज्यों में ही होती हैं। फसल पैदा होने के बाद उनकी खरीद, कीमतें तय करने की कोई ठोस नीति और विपणन सुविधाओं का अभाव किसानों के ताबूत की आखिरी कील साबित होते हैं। तो आखिर इस समसया पर अंकुश लगाने का कारगर तरीका क्या है? विशेषज्ञों का कहना है कि प्राकृतिक विपदाओं पर काबू पाना तो किसी के वश में नहीं है लेकिन फसल पैदा होने के बाद उनकी कीमतें तय करने की एक ठोस और पारदर्शी नीति जरूरी है ताकि किसानों को उनकी फसलों की उचित कीमत मिल सके। इसके अलावा विपणन सुविधाओं की बेहतरी और खेती के मौजूदा तौर-तरीकों में आमूल-चूल बदलाव जरूरी हैं। इसके लिए केंद्र और राज्य सरकारों को विभिन्न सहकारी कृषक समितियों के साथ मिल कर इस दिशा में ठोस कदम उठाना होगा। उसी हालत में किसानों में आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्ति पर अंकुश लगाया जा सकेगा।

रोजाना ढाई हजार किसान छोड़ रहे हैं खेती

एनसीआरबी के पिछले पांच सालों के आंकड़ों के मुताबिक 2009 में 17 हजार, 2010 में 15 हजार, 2011 में 14 हजार, 2012 में 13 हजार और 2013 में 11 हजार से ज्यादा किसानों ने खेती से जुड़ी तमाम परेशानियों समेत अन्य कारणों से आत्महत्या कर ली। खेती में लगातार हो रहे घाटे के कारण रोजाना ढाई हजार किसान खेती छोड़ रहे हैं। और तो और देश में अभी किसानों की कोई एक परिभाषा भी नहीं है। सवाल उठता हैकि आने वाले आम बजट में सरकार, गांव, खेती और किसानों को इस आर्थिक संकट से उबारने के लिए क्या पहल करेगी। किसान की क्या परिभाषा हो? क्योंकि वित्तीय योजनाओं के संदर्भ में किसान की एक परिभाषा है, तो राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो का कोई दूसरा मापदंड है, पुलिस की नजर में किसान की अलग परिभाषा है। उतार-चढ़ाव के बीच कृषि विकास दर रफ्तार नहीं पकड़ रही है। कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 2012, 2013 में कृषि विकास दर 1.2 फीसद थी, जो 2013-14 में बढ़ कर 3.7 फीसद हुई और 2014-15 में फिर घटकर 1.1 फीसद पर आ गई। पिछले कई सालों में बुवाई के रकबे में 18 फीसद की कमी आई है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, कृषि क्षेत्र की बदहाली का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले दो दशकों में भारी संख्या में किसान आत्महत्या कर चुके हैं और ज्यादातर आत्महत्याओं का कारण कर्ज है, जिसे चुका पाने में किसान असमर्थ हैं, जबकि 2007 से 2012 के बीच करीब 3.2 करोड़ गांव वाले खासकर किसान शहरों की ओर पलायन कर गए हैं। इनमें से काफी लोग अपनी जमीन और घर-बार बेच कर शहरों में आ गए। पंचायती राज व्यवस्था के इतने साल बीत जाने के बाद भी लोग गांव से पलायन करने को मजबूर हैं। खेती के प्रति रूझान लगातार कम हो रहा है। उन्होंने कहा कि इसका कारण पंचायतों का वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर नहीं होना है। ऐसे में केंद्रीय बजट का सात फीसद सीधे गांव को दिया जाए ताकि गांव में संसाधन विकसित किए जा सकें।

 

गांव से पलायन करने के बाद किसानों और खेतीहर मजदूरों की स्थिति यह है कि कोई हुनर न होने के कारण उनमें से ज्यादातर को निर्माण क्षेत्र में मजदूरी या दिहाड़ी करनी पड़ती है। 2011 की जनगणना के मुताबिक हर रोज ढाई हजार किसान खेती छोड़ रहे हैं। भारी संख्या में गांव से लोगों का पलायन हो रहा है जिसमें से ज्यादातर किसान हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के पिछले पांच सालों के आंकड़ों के मुताबिक 2009 में 17 हजार, 2010 में 15 हजार, 2011 में 14 हजार, 2012 में 13 हजार और 2013 में 11 हजार से ज्यादा किसानों ने खेती से जुड़ी तमाम परेशानियों समेत अन्य कारणों से आत्महत्या कर ली। महाराष्ट्र, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में किसानों की आत्महत्या की दर सबसे ज्यादा रही है। देश में 640 में से 340 जिलों में मानसून की बारिश में 20 फीसद तक कमी दर्ज की गई है। आज भी सिंचाई के लिए ज्यादातर किसान प्रकृति पर निर्भर हैं। बेमौसम बरसात, ओलावृष्टि के कारण भारी मात्रा में हर साल फसलों की बर्बादी होती है।

ढाई दशक पहले कृषि को जब बाजारवाद के आसरे छोड़ने का निर्णय किया गया, समस्या वहीं से विकट होती गई। किसानों के लिए संकट की बात यह है कि पूरी दुनिया में अनाज के भाव कम हुए हैं, ऐसे में पैदावार घटने के बावजूद भारत में फसल के दाम बढ़ने की उम्मीद नहीं है। अगर उत्पादन घटेगा तो किसानों को आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ेगा और यह किसान की समस्याओं को और बढ़ा सकता है। किसानों की आय राष्ट्रीय औसत से काफी कम है। ऐसे में भी किसान सरकार से किसी वेतनमान की मांग नहीं कर रहा है बल्कि वह अपनी फसलों के लिए उचित न्यूनतम समर्थन मूल्य मांग रहा है ताकि देश के लोगों के साथ अपने पेट भी ठीक से भर सके। सच तो यह है कि देश एक बड़े संकट की तरफ बढ़ रहा है जहां कोई खेती नहीं करना चाहता लेकिन भोजन सभी को चाहिए। इस मुद्दे पर समय रहते केंद्र और राज्य सरकारों को संजीदा होना होगा और इस पर व्यावहारिक रणनीति बनानी होगी। इसके साथ ही दोहरेपन से ऊपर उठकर शहरों से लेकर कॉरपोरेट और अकादमिक जगत और खुद हमको कृषकों के लिए आगे आना होगा। सिर्फ सरकार के भरोसे किसान को बचाना सम्भव नहीं है।

 (नोट – अपराजिता यह दावा नहीं करती कि उपरोक्त सामग्री या आँकड़े उसने एकत्रित किए हैं। यह लेख www.dw.com, बीबीसी व समेत अन्य समाचारपत्रों के समाचारों पर आधारित है और इसका प्रयास पाठकों तक समस्या को हर पक्ष को ध्यान में रखते हुए पहुँचाना है।)

पत्रकार से किसान बने गिरीन्द्रनाथ झा, अब अपने गाँव को नयी पहचान दे रहे है!

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एक पत्रकार, एक लेखक, इन्टरनेट की दुनियां का एक जाना माना नाम आखिर क्यूँ एक किसान बन गया? ये कहानी है चनका, बिहार के लेखक किसान, गिरीन्द्रनाथ झा की।

गिरीन्द्रनाथ का जन्म भले ही फणीश्वर नाथ रेनू के गाँव – पूर्णिया में हुआ था, पर उनके किसान पिता ने उन्हें हमेशा अपने गाँव से दूर रखा।

कारण था कि हर पिता की तरह वे भी अपने बेटे को जीवन में सफल होते देखना चाहते थे और हमारे समाज में किसान को असफलता का ही प्रतिरूप माना जाता है। बचपन से ही गिरीन्द्रनाथ को विभिन्न शहरों में पढने के लिए भेजा गया। वे छुट्टियों में चनका आते तो उनका मन वहीँ बस जाता पर बाबूजी की इच्छानुसार वे फिर शहर का रुख कर लेते।

“मुझे बचपन से ही लिखने का शौक रहा है और गाँव आपको कई रोचक कहानियां देता है। यूँ कह लीजिये कि एक लेखक के लिए गाँव में ढेर सारा रॉ मटेरियल उपलब्ध होता है। ऊपर से गाँव का होते हुए भी मुझे गाँव में रहने का मौका ही नहीं मिला। शायद यही वो कारण था जिसकी वजह से गाँव हमेशा मुझे अपनी ओर खींचता था,” गिरीन्द्रनाथ बताते है।

गिरीन्द्रनाथ ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के सत्यवती कॉलेज से अर्थशास्त्र में ग्रेजुएशन किया और फिर YMCA इंस्टिट्यूट से प्रिंट मीडिया में पोस्ट ग्रेजुएशन किया। इसके बाद वे आईएनए न्यूज़ सर्विसेज से जुड़ गए। तीन साल दिल्ली में काम करने के बाद गिरीन्द्रनाथ ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से ही कंप्यूटर साइंस में स्नातक कर चुकी प्रिया को अपनी जीवनसंगिनी बनाया। इसके बाद उन्हें दैनिक जागरण अखबार में नौकरी मिल गयी और ये जोड़ा कानपूर में बस गया।

हालाँकि गिरीन्द्रनाथ का मन अभी भी गाँव में ही बसता था। इसलिए 2006 से ही जब भी वे गाँव जाते वहां कुछ कदंब के पेड़ ज़रूर लगा आते। उनके दिमाग में गाँव में एक ऐसा घर बनाने का सपना पनपने लगा जहाँ शहरो के लोग भी आकर रहने को उत्सुक हो।

हर छुट्टी पर गाँव आकर पेड़ लगाने का सिलसिला यूँही चलता रहा पर गिरीन्द्रनाथ अपने बाबूजी के आगे गाँव में ही बस जाने की बात का उल्लेख न कर सके। पर नियति को कुछ और ही मंज़ूर था।

2012 में जब गिरीन्द्रनाथ अपनी पत्रकारिता के करियर के शिखर पर थे, अचानक एक दिन उनके बाबूजी को ब्रेन हैमरेज होने की खबर आई।

गिरीन्द्रनाथ तुरंत अपने परिवार समेत चनका की ओर रवाना हो गए। और इसके बाद बाबूजी की सेवा और उनके पुश्तैनी 17 बीघा ज़मीन की देख रेख के लिए गाँव में ही बस जाने की उनकी जिद्द के आगे उनके बाबूजी की एक न चली।

गिरीन्द्रनाथ की पत्नी प्रिया ने भी इस फैसले में उनका पूरा साथ दिया। दिल्ली के किसी बड़े मॉल के कॉफ़ी शॉप से शुरू हुई ये प्रेम कहानी अब चनका के खेत खलिहानों तक पहुँच गयी थी। पर अचरज ये था कि जहाँ युवा पीढ़ी आज गाँव से पलायन करने का बस मौका भर ढूंडती है वही ये युवा जोड़ा शहर की चकाचौंध को छोड़ यहाँ गाँव की पगडंडियों में बेहद खुश था।

इनके प्यार में इस बदलाव की पूरी कहानी गिरिद्रनाथ द्वारा लिखी लप्रेक श्रृंखला की पुस्तक ‘प्यार में माटी सोना’ में पाई जाती है। गिरीन्द्रनाथ के इस पुस्तक का विमोचन प्रसिद्द पत्रकार रवीश कुमार ने किया है और उनके इस पुस्तक को देश विदेश में काफी ख्याति प्राप्त हुई है।

गिरीन्द्रनाथ अब अपने गाँव तो आ गए थे पर अब भी उनका शहर को गाँव की ओर खींचने का सपना अधुरा था। इसके लिए उन्होंने सबसे पहले गाँव से शहरो की ओर हो रहे पलायन को रोकने की ठानी। जिन-जिन परिवारों को ज़मीन खो देने की वजह से गाँव से पलायन करना पड़ रहा था उन परिवारों के आगे गिरीन्द्रनाथ ने अपनी ज़मीन पर खेती करने का प्रस्ताव रखा। इस तरह गाँव में साझेदारी पर खेती होने लगी। पर खेती में नुकसान होने का दूसरा सबसे बड़ा कारण था नशा। गांव के कई पुरुषो को पीने की लत थी, जिसके चलते वो जितना कमाते वो सब इस लत के ऊपर खर्च कर देते।

ऐसे में गिरीन्द्रनाथ ने सबसे पहले इन नशेबाजो के बच्चो से दोस्ती की। उन्हें नशे से होने वाले दुश्परिनामो पर आधारित कई डाक्यूमेंट्री फिल्मे दिखाई और समझाया कि उन्हें अपने पिता को इससे रोकना चाहिए। जब बच्चो ने बीड़ा उठाया तो उनकी माताएं भी गिरीन्द्रनाथ से सलाह मांगने आने लगी। और अब इन अबला समझी जानेवाली महिलायों ने अपने घर में ही नशामुक्ति के लिए जंग छेड़ दी। धीरे धीरे गाँव में बदलाव की लहर दौड़ने लगी और गाँव पूरी तरह नशामुक्त हो गया। इसके साथ ही गाँव से पलायन का सिलसिला भी थमने लगा।

गाँव को शहर जाने से तो गिरीन्द्रनाथ ने रोक लिया था; अब मुद्दा था शहर को गाँव लाकर गाँव से जोड़ने का।

ऐसा गिरीन्द्रनाथ इसलिए चाहते थे ताकि शहर के लोगों में गाँव के प्रति जो गलत धारणाएं है वो दूर हो। लोग अपनी धरोहर को पहचाने और उसे बचाए रखने की कोशिश भी करे। ये सब तभी संभव था जब गाँव में कुछ ऐसा होता जो शहरियों को अपनी और खींचता।

“अक्सर गाँव की छबी एक दुखदायी जगह की होती है, जहाँ गरीबी है, भुखमरी है, कीचड है और सिर्फ असुविधाएं है। पर दुःख कहाँ नहीं होता? आपको शहरो में जब नौकरी में इंसेंटिव नहीं मिलता तब दुःख नहीं होता? बस गाँव भी वैसा ही है; यहाँ दुःख तो है पर शान्ति भी है, सुख भी है और माटी की खुशबू का मज़ा भी है। मैं शहर की गाँव के प्रति इसी मानसिकता को बदलना चाहता हूँ,” गिरीन्द्रनाथ कहते है।

अब तक गाँव के करीब 600 बच्चो से गिरीन्द्रनाथ की पक्की दोस्ती हो चुकी थी। वो उन्हें रोज़ पढ़ाते और साथ में टेक्नोलॉजी के थोडा-थोडा समीप भी ला रहे थे। इसी बात का उल्लेख उन्होंने पटना UNICEF द्व्रारा आयोजित एक समारोह में किया। उन्होंने आग्रह किया कि UNICEF का अगला फिल्म फेस्टिवल किसी बड़े शहर के बजाय चनका में किया जाये। गिरीन्द्रनाथ की कोशिश सफल हुई और 2015 का UNICEF का बाल चित्र महोत्सव चनका में आयोजित किया गया।

पुरे देश से मीडिया यहाँ इकठ्ठा हुई और चनका को एक अलग पहचान मिली।

इसके बाद गिरीन्द्रनाथ ने मीडिया को चनका बुलाने का सिलसिला जारी रखा। वे हर साल यहाँ सोशल मीडिया मीट करते है जिसमे पत्रकारों और कलाकारों के अलावा गाँव के भी लोग आलोचनाओं में शामिल होते है। इससे शहर और गाँव दोनों को ही एक दुसरे को जानने का मौका मिलता है।

साथ ही गिरीन्द्रनाथ ने लिखना कभी नहीं छोड़ा। अपने ब्लॉग ‘अनुभव’ के ज़रिये वे लोगो तक चनका की बातें पहुंचाते रहे। अनुभव को साल 2015 में एबीपी न्यूज़ और दिल्ली सरकार की ओर से सर्वश्रेष्ठ हिंदी ब्लॉग का भी सम्मान प्राप्त है। इसके अलावा गिरीन्द्रनाथ राजनितिक और सामाजिक विषयों पर एनडीटीवी, बीबीसी और जागरण जैसी कई अखबारों और न्यूज़ वेबसाइट के लिए लिखते है। इससे वे बाहरी दुनियां से खुद भी जुड़े रहते है और चनका को भी जोड़े रखते है।

गिरीन्द्रनाथ कहते है कि गाँव में रहना उनके लिए इसलिए आसान है क्यूंकि उनकी ज़रूरतें बहुत कम है। शौक के नाम पर उन्हें सिर्फ इन्टरनेट का नशा है, जो उन्हें बाहरी दुनिया से जोड़े रखता है।

“गाँव मुझे अपने आप से जोड़ता है और इन्टरनेट बहार की दुनियां से। ये इन दोनों का मेल ही है जो मेरे जीवन को इतना मजेदार बनाए हुए है,” वे हँसते हुए कहते है।

गिरीन्द्रनाथ के लेखन के ज़रियें दुनियां चनका को जानने लगी थी। वैज्ञानिक यहाँ शोध करने के लिए आते। रवीश कुमार से लेकर राजदीप सरदेसाई तक इस पत्रकार से किसान बने शख्स के गाँव पर शो बना चुके थे। पर अब भी कुछ बाकी था।

“मैं चाहता था कि शहर के लोग गाँव को करीब से जाने। विदेशो में न जाकर गाँव में आकर अपनी छुट्टी मनाये। यहाँ रहे, यहाँ का खाना खाए, यहाँ का लोकसंगीत सुने।“

इस मकसद को पूरा करने के लिए गिरीन्द्रनाथ ने चनका रेसीडेन्सी की नीव रखी। जो कदंब के पेड़ वो 2006 से लगा रहे थे उसकी संख्या अब 1000 तक पहुँच गयी थी।

ये पेड़ आसमान को छुने लगे थे। वहां पंछी आने लगे थे। एक अद्भुत आभा से भरी धरती का निर्माण हो चूका था। अब देर थी तो बस एक ऐसे डेरे की जहाँ इन वादियों का मज़ा लेने के लिए लोग आकर रह सकें।

गिरीन्द्रनाथ ने इन सभी पेड़ो के बीचोबीच अपनी सारी पूंजी लगाकर एक घर बनाया और नाम दिया चनका रेसीडेन्सी। अब इस स्वर्ग जैसे घर में रहने के लिए शहर से मेहमान आने लगे है। ये मेहमान गाँव का खाना खाते है, यहाँ का संगीत सुनते है और यहाँ की मिट्टी की खुशबू में बसे सुख का आनंद लेते है। इससे शहर में रहने वाले लोग अपनी मिट्टी से तो जुड़ते ही है साथ ही गांववालों को भी कमाई का एक और ज़रियाँ मिलता है, जो किसानी कर रहे लोगो के लिए बेहद ज़रूरी है। इसके अलावा गाँव और शहर की वो दूरी मिटती है जो केवल इन्टरनेट के माध्यम से ही जुड़ पाते थे।

चनका रेसीडेन्सी के पहले मेहमान थे इयान वुलफर्ड। इयान मूल रूप से अमेरिकी हैं और ऑस्ट्रेलिया के ला ट्रोब यूनिवर्सिटी में हिंदी के प्रोफेसर हैं।

आजकल वे हिंदी साहित्य के महान लेखक फणीश्वर नाथ रेणु पर किताब लिख रहे है। रेणु के बारे में लिखने के लिए पूर्णिया जिले से अच्छी कौनसी जगह होती। इसलिए इयान ने पूर्णिया जिले में बसे चनका रेसीडेन्सी का नाम सुनते ही यहाँ का रुख किया।

“बिहार के गांव में रेसीडेंसी एक अनोखा प्रयोग है, युवा किसान गिरिंद्रनाथ झा का. मैं 2005 में पहली बार बिहार आया था। फिर इसके बाद लगातार आता रहा हूं। इस बार चनका रेसीडेंसी में ‘गेस्ट राइटर’ बनकर आया हूं।  इस बार पूर्णिया यात्रा में देख रहा हूं कि लोगों में मानसिक बदलाव आया है। कुछ बदलाव जो दिख रहे हैं, मसलन सड़क, बिजली, शिक्षा वगैरह! लेकिन सबसे बड़ी चीज़ जो मैं महसूस कर रहा हूं वो है लोगों की सोच में अंतर आया है। पहले बढ़ते अपराध की घटनाओं को लेकर, स्कूली शिक्षा को लेकर, कृषि में नए प्रयोग को लेकर सवाल किए जाते थे. इस बार देख रहा हूं कि सब कुछ में बदलाव आया है,” इयान कहते है।

चनका रेसीडेंसी की मेहमानों की फेहरिस्त में  डेविड और लिंडसे फ्रेनसेन का भी नाम है यह अमेरिकी जोड़ा साइकिल से दुनिया को नाप रही है, वो भी लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरुक करने के लिए। तुर्की से इनकी यात्रा शुरु होती है और चीन-नेपाल होते हुए ये पूर्णिया में दाखिल होते हैं और पहुंच जाते हैं आपके किसान के घर। एक डाक्यूमेंट्री फिल्म के सिलसिले में उन्होंने Chanka के लोगों से लंबी बातचीत की और यहाँ के पेड़-पौधों के संग वक्त बिताया।

गिरीन्द्रनाथ अब इस प्रोजेक्ट को और आगे बढ़ाना चाहते है जिसके लिए उन्हें आप सभी के सहयोग की ज़रूरत है।

“खेत-खलिहान म्यूज़ियम बनाने की योजना है। इस म्यूज़ियम में हम गाँव के उन समानों को इकट्ठा करेंगे जिसका पहले किसानी काम में प्रयोग हुआ करता था, मसलन- लकड़ी का हल, बैलगाड़ी, मसाला पिसने वाला पत्थर, आदिवासी समाज के उपकरण, संगीत के साज, पेंटिंग आदि। इन सामानों को डिस्पले करने के लिए हॉल बनाने की योजना है। यह सब तैयार करने के लिए अनुमानित बजट चार लाख रुपए का है,” गिरीन्द्रनाथ ने बताया। जहाँ तक रेसीडेंसी के ख़र्च का सवाल है, तो उसमें और अधिक लोग ठहरें, इसके लिए भी फ़ंड की आवश्यकता है। अनुमानित बजट दस लाख रुपए का है, जिसमें पुस्तकालय और आवास की सुविधा शामिल होगी।

(साभार – द बेटर इंडिया)