Thursday, October 1, 2026
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साहित्य का सिनेमाई कोलाज है पंचलैट

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साहित्य और सिनेमा का रिश्ता गहरा तो है मगर साहित्य से सिनेमा सालों से दूर रहा है। या यूँ कहें कि यह रिश्ता वृत्तचित्रों और धारावाहिकों तक सिमटकर रह गया है तो गलत नहीं होगा। ऐसे में आजादी के बाद 50 के दशक को ध्यान में रखकर लिखी गयी कहानी को आधार मानकर पूरी की पूरी फिल्म और फीचर फिल्म बनाना मॉल संस्कृति में लिपटे तथाकथित आलोचकों को एक बेवकूफाना हरकत लग सकती है। फणीश्वर नाथ रेणु की कहानियाँ आपको एक अलग ही दुनिया में ले जाती हैं…उनकी कहानी पर बनी तीसरी कसम भले ही उस समय फ्लॉप रही हो मगर आज वह क्लासिक कही जाती है….एक बार फिर उनकी कहानी पंचलाइट पर बनी फिल्म सिनेमाघरों में आ चुकी है। दरअसल, पंचलैट वह अतीत है जहाँ उनको भारत की ओर मुड़कर देखना अपनी हार लगे या कड़वा सच तो शायद ज्यादा सही है। गाँव अब वृत्तचित्रों में भी अच्छा लगता है और वहाँ से एक ही स्टोरी कई बार निकल सकती है – मरते हुए किसान….इसके अलावा कुछ और देखना शायद लोग चाहते ही नहीं मगर महतो टोला सच इस अंदाज में कहता है कि जब आप हॉल से बाहर निकलते हैं तो वह गाँव और माहौल देर तक आपके अंदर रहते हैं। पंचलैट ऐसी ही क्रांति है।

गत 17 नवम्बर को रिलीज हुई फिल्म को पर्याप्त शो भले न मिले हों मगर इसने उस वर्ग को एक बार फिर सिनेमाघरों की ओर मोड़ा है जो सिनेमा की स्तरहीनता को कोसता हुआ मुँह मोड़कर बैठा है। लोग 100 किमी जाकर सिनेमा के टिकट खरीद रहे हैं और यह जिद एक जरूरी सी है जिसकी जीत के लिए अरसे बाद साहित्यकारों, कलाकारों और बुद्धिजीवियों ने जैसे कमर कस ली है…पंचलैट की उपलब्धि इस एकता को वापस लाना ही है। एक ऐसा नायक जिसके पास सिक्स और एइट पैक्स एब्स नहीं हैं….नायिका ऐसी जिसके पास चमचमाती साड़ी नहीं है और लोकेशन के नाम पर गाँव का घुप्प अँधेरा…। भला ऐसी फिल्में मल्टीप्लेक्स  में चलेंगी?  ऐसी फिल्म जिसके कलाकार फिल्म के प्रचार के लिए खुद सड़क पर निकल पड़े हैं….जिनका प्रोमोशन एक आम फिल्म की तरह हो रहा है…जहां किसी पांच सितारा होटल की जरूरत नहीं है और एक ऐसी फिल्म जिसका प्रोमोशन आम आदमी कर रहा है…यह पंचलैट की सफलता है कि घर के बड़े बच्चों का हाथ पकड़कर सिनेमाघरों में ले जा रहे हैं…पंचलैट ने उल्टी गंगा बहा दी है। मासूमियत, हंसी, सादगी…एक दूसरे का हाथ पकड़ना और दूसरे के आंसू पर रोना उल्टी गंगा ही तो है…गाँव ऐसा जहाँ लोग एक पेट्रोमैक्स जलाना तक नहीं जानते है और जलाने के लिए उसके सामने भी झुकते हैं जिसे जुर्माना न देनने पर निकाल दिया जाता है। वही गोधन मौसी के कहने पर सारे गिले -शिकवे मिटाकर गाँव के लिए पंचलैट जलाने चला भी आता है…ऐसी सरलता उल्टी गंगा बहाना नहीं है तो क्या है?

तो हम भी फिल्म देखकर आए…हॉल में ज्यादा दर्शक नहीं थे मगर जो भी थे…गम्भीर थे…कोई सीटी नहीं…कोई पॉपकॉर्न भी  नहीं…और फिल्म के बाद सीटों पर जमे रहना…बता रहा था कि कुछ तो है जो उनको पीछे मोड़ रहा है…शहरों में रहने वालों के दिलों में गाँव छिपा रहता है……गाँव उनके लिए ऑक्सीजन है…तभी सप्ताह में या महीने भर में एक बार छुट्टी मिली नहीं कि वे गाँव भागते हैं….हरे –भरे खेतों में…चौपाल में और मिट्टी के उन घरों में भी…जहाँ उनका बचपन बीता है…पंचलैट ने उस गाँव को जिन्दा कर दिया। गाँव में घुप्प अंधरा….और अंधेरे का साथी….पेट्रोमैक्स जो एक लक्जरी है…सभी के पास है…बस महतो टोला के पास नहीं है…और इसे लेकर उनका मजाक भी उड़ाया जाता है..पंचायत जब गोधन से जुर्माना माँगती है तो उसके पीछे भी पंचलाइट खरीदने की भावना ही है…पंचलैट नाक का सवाल है…।

जब अाप अमितोष पाल को राज कपूर के गेटअप में देखते हैं….अनायास ही मुस्कुराहट आ जाती है मगर ये वाले राज कपूर थोड़े फास्ट हैं….उनकी डॉयलाग डिलिवरी में भी राज कपूर का अन्दाज है मगर उनके किरदार की मजबूती उस गँवई सादगी में है जो उनकी आँखों में है…बगैर किसी मुलम्मे के…वह सिर्फ गेटअप से नहीं आ सकती…इसके लिए किरदार में घुसने की जरूरत है। अनुराधा मुखर्जी ने भी उनका साथ मुनरी के रूप में बखूबी दिया है…खासकर उस दृश्य में जहाँ गोधन से लम्बे अरसे बाद पहली बार मिलती हैं। इस दृश्य में अनुराधा का अभिनय और उनके हाव – भाव बस देखने लायक हैं। यशपाल शर्मा और रवि झांकल जैसे कलाकारों का अभिनय तो मँजा – मँजाया है…गोधन द्वारा कल्पना झा उर्फ सरपंचाइन के किरदार को भौजी कहने पर यशपाल शर्मा के चेहरे पर जो भाव आते हैं..वह बड़े मजेदार हैं…एक ऐसा व्यक्ति जो त्रिशंकु जैसा ही है…पत्नी से प्यार है मगर पत्नी को सबसे छुपाकर रखना चाहता है और उसकी हर ख्वाहिश को पूरा भी करना चाहता है।

अपने दृश्यों में सब अभिनय करते हैं मगर सरपंचाइन का अभिनय आप उन दृश्यों में भी देखते हैं जहाँ उनके संवाद नहीं हैं…यही थियेटर का अनुशासन है और हर बार की तरह कल्पना ने अपनी भूमिका के साथ पूरा न्याय किया है। संगीत बेहद सुरीला और कर्णप्रिय है जो कानों को राहत देता है….हर गीत में गाँव में मेलजोल की संस्कृति आपको नजर आती है…खासकर गा भइया गा गीत में। भाषा में बिहार की विभिन्न बोलियाँ हैं और रासलीला में तो ब्रज और मथुरा ही उतर आए हैं। रासलीला का यह दृश्य उसकी मौलिकता के साथ दिखाना पंचलैट की सफलता है..। फिल्म किसी सेट पर नहीं बल्कि गाँव में ही फिल्माई गयी है। छायांकन फिल्म के विषय के अनुरूप ही है….जो लोग कभी गाँव नहीं गए और जिनके भीतर गाँव या भारतीय संस्कृति नहीं है…उनके लिए फिल्म को समझना थोड़ा कठिन है…पंचलैट ऐसी फिल्म है जो सही अर्थों में मास की फिल्म ही है और क्लास उसके दायरे में सिमट आता है। तीन पन्नों की कहानी को फैलाना और उसकी मौलिकता को बरकरार रखते हुए फैलाना आसान काम नहीं था मगर राकेश कुमार त्रिपाठी ने यह किया है। निर्देशक प्रेम मोदी ने सभी कलाकारों से उम्दा अभिनय करवा लिया है। ऐसी फिल्में ऑक्सीजन की तरह हैं…और पंचलैट साहित्य का सिनेमाई कोलाज है…जिसे ऑक्सीजन लगातार मिलते रहना चाहिए…उम्मीद मिलती रहनी चाहिए। प्रदूषण से थक गए हों और छुट्टी नहीं मिल रही हो तो पंचलैट देख आइए…ऑक्सीजन मिल जाएगा।

ट्रेलर हम दिखा दे रहे हैं…

https://youtu.be/AiRgMLfma-E

लंदन में रवींद्रनाथ टैगोर का घर खरीदना चाहती हैं ममता

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पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर का घर खरीदना चाहती हैं। ममता चाहती हैं कि विश्व प्रसिद्ध कवि व लेखक जहां रहे थे, उस जगह को संग्रहालय सह स्मारक  में बदल दिया जाए।

टैगोर साल 1912 में अपने काव्य संग्रह ‘गीतांजली’ के अनुवाद के दौरान उत्तरी लंदन के हैंपस्टीड हीथ स्थित हीथ विला नंबर 3 में कुछ महीने रहे थे। यूके में कार्यकारी भारतीय उच्चायुक्त दिनेश पटनायक के साथ मुलाकात में ममता ने इस निजी स्वामित्व वाले इस घर को खरीदने की सरकार की इच्छा से अवगत कराया।

कुछ साल पहले इस संपत्ति की कीमत करीब 23 करोड़ रुपये थी। सीएम बनर्जी एक सप्ताह के लंदन दौरे पर यहां पहुंची थीं। इस चर्चा से जुड़े एक करीबी व्यक्ति ने बताया कि इस घर का महान ऐतिहासिक महत्व है और सीएम इस घर को टैगोर के स्मारक रूप में बदलना चाहती हैं। ममता के साल 2015 के दौरे में भी इस पर चर्चा हुई थी।

 

राजस्थान का बूंदी राजघराना आया भंसाली और ‘पद्मावती’ के समर्थन में

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विवादों से चौतरफा घिरी फिल्म ‘पद्मावती’ पर जहां राजपूत समाज समेत राजस्थान के पूर्व राजघराने फिल्म के खिलाफ एक साथ खड़े हैं वहीं एक राजघराना फिल्म के समर्थन में आगे आया है। हालांकि फिल्म की रिलीज टल गयी है मगर इस बीच राजस्थान के बूंदी राजघराने ने फिल्म को अपना पूरा समर्थन दिया है और कहा है कि बिना फिल्म देखे समाज को इतना बवाल नहीं करना चाहिए।

बूंदी राजघराने के सदस्य बलभद्रसिंह और वंशवर्द्धन सिंह ने फिल्म का समर्थन करते हुए कहा कि फिल्म देखे बिना विरोध,तोड़फोड़ जैसी हिंसात्मक जैसी घटना कायराना है राजपूत समाज द्वारा ऐसा करना से पूरे समाज की बदनामी हो रही है।

गौरतलब है कि पूरे राजस्थान में लगभग सभी समाज के लोग, राजनैतिक पार्टियों के नेता एक आवाज में इस फिल्म का विरोध कर रहे हैं जिससे अब फिल्म निर्माता पर फिल्म को रिलीज नहीं करने का दबाव लगातार बढ़ रहा है।

​विवादों से चौतरफा घिरी फिल्म ‘पद्मावती’ पर जहां राजपूत समाज समेत राजस्थान के पूर्व राजघराने फिल्म के खिलाफ एक साथ खड़े हैं वहीं एक राजघराना फिल्म के समर्थन में आगे आया है। राजस्थान के बूंदी राजघराने ने फिल्म को अपना पूरा समर्थन दिया है और कहा है कि बिना फिल्म देखे समाज को इतना बवाल नहीं करना चाहिए।

बूंदी राजघराने के सदस्य बलभद्रसिंह और वंशवर्द्धन सिंह ने फिल्म का समर्थन करते हुए कहा कि फिल्म देखे बिना विरोध,तोड़फोड़ जैसी हिंसात्मक जैसी घटना कायराना है राजपूत समाज द्वारा ऐसा करना से पूरे समाज की बदनामी हो रही है।

गौरतलब है कि पूरे राजस्थान में लगभग सभी समाज के लोग, राजनैतिक पार्टियों के नेता एक आवाज में इस फिल्म का विरोध कर रहे हैं जिससे अब फिल्म निर्माता पर फिल्म को रिलीज नहीं करने का दबाव लगातार बढ़ रहा है।

 

प्रदूषण को मात दे रहे हैं कई देश

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दिल्ली और आसपास के इलाकों में प्रदूषण के बढ़ते स्तर से खतरनाक स्थिति बन गई थी। दिवाली के बाद फैले धुएं के बाद अब पराली जलाने से हुई धुंध से प्रदूषण का स्तर कई गुना बढ़ गया । केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार एक्यूआई (एयर क्वालिटी इंडेक्स) का स्तर 100 तक सामान्य है, हालांकि दिल्ली का एक्यूआई आमतौर पर 300 से 400 के बीच रहता है। लेकिन यह स्तर 440 तक पहुंच गया था। दिल्ली-एनसीआर, यूपी और आसपास के विभिन्न इलाकों में जहरीली धुंध छाने से गैस चैंबर जैसी स्थिति बन गई थी।  भारत के अलावा कई अन्य देश भी प्रदूषण की समस्या से जूझ रहे हैं। इन देशों में प्रदूषण से निपटने के कई तरीके अपनाए गए हैं जिनसे उन्हें कुछ सफलता भी हासिल हुई है।

चीन – साल 2014 में चीन के कई शहरों में धुंध छा गई थी और प्रदूषण का स्तर पॉल्यूशन कैपिटल कहलाने वाले बीजिंग में भी बहुत ऊंचा पाया गया था। इसके बाद चीन ने प्रदूषण से निपटने के लिए युद्धस्तर पर प्रयास शुरू कर दिए। यहां मल्टी-फंक्शन डस्ट सेप्रेशन ट्रक का इस्तेमाल किया गया। इसके ऊपर एक विशाल वॉटर कैनन लगा होता है जिससे 200 फीट ऊपर से पानी का छिड़काव होता है।पानी का छिड़काव इसलिए किया गया ताकि धूल नीचे बैठ जाए। इसके अलावा, चीन ने वेंटिलेटर कॉरिडोर बनाने से लेकर एंटी स्मॉग पुलिस तक बनाने का फैसला किया। ये पुलिस जगह-जगह जाकर प्रदूषण फैलाने वाले कारणों जैसे सड़क पर कचरा फेंकने और जलाने पर नजर रखती है।  चीन में कोयले की खपत को भी कम करने के प्रयास किए गए हैं जो वहां प्रदूषण बढ़ने के मुख्य कारणों में से एक था।

फ्रांस –    फ्रांस की राजधानी पेरिस में हफ्ते के अंत में कार चलाने पर पाबंदी लगा दी गई थी। वहां भी ऑड-ईवन तरीका अपनाया गया। साथ ही ऐसे दिनों में जब प्रदूषण बढ़ने की संभावना हो तो सार्वजनिक वाहनों को मुफ्त किया गया और वाहन साझा करने के लिए कार्यक्रम चलाए गए। वाहनों को सिर्फ 20 किमी. प्रति घंटे की गति से चलाने का आदेश दिया गया. इस पर नज़र रखने के लिए 750 पुलिसकर्मी लगाए गए।

जर्मनी  – जर्मनी के फ्रीबर्ग में प्रदूषण कम करने के लिए सार्वजनिक परिवहन को बेहतर बनाने पर जोर दिया गया। यहां ट्राम नेटवर्क को बढ़ाया गया। यह नेटवर्क इस तरह बढ़ाया गया कि यह बस रूट को भी जोड़ सके और ज्यादा आबादी उस रूट के तहत आ जाए। साथ ही यहां सस्ती और कुशल परिवहन व्यवस्था पर जोर दिया गया। बिना कार के रहने पर लोगों को सस्ते घर, मुफ्त सार्वजनिक वाहन और साइकिलों के लिए जगह दी गई।

ब्राजील-    ब्राजील एक शहर क्यूबाटाउ को ‘मौत की घाटी’ कहा जाता था। यहां प्रदूषण इतना ज्यादा था कि अम्लीय बारिश से लोगों का बदन तक जल जाता था। लेकिन, उद्योगों पर चिमनी फिल्टर्स लगाने के लिए दबाव डालने के बाद शहर में 90 प्रतिशत तक प्रदूषण में कमी आ गई। यहां हवा की गुणवत्ता पर निगरानी के बेहतर तरीके अपनाए गए।

स्विट्जरलैंड –  स्विट्जरलैंड के शहर ज्यूरिख में प्रदूषण से निपटने के लिए पार्किंग की जगहें कम की गईं ताकि पार्किंग न मिलने के कारण लोग कम से कम कार का इस्तेमाल करें। इस कारण प्रदूषण और ट्रैफिक जाम से निजात पाने में कुछ हद तक सफलता मिली थी।

 

 

117 सुंदरियों को पीछे छोड़ मानुषी छिल्लर बनीं मिस वर्ल्ड 2017

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बीजिंग, प्रेट्र/आइएएनएस :  17 साल बाद भारतीय सुंदरता ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना परचम लहराया है। चीन के सान्या शहर में शनिवार रात रंगारंग कार्यक्रम में मिस इंडिया मानुषी छिल्लर को इस साल का मिस व‌र्ल्ड घोषित किया गया। इस प्रतियोगिता में दुनिया  भर की 118 सुंदरियों ने हिस्सा लिया था।

मानुषी ने सभी प्रतिस्प‌िर्द्धयों को पीछे छोड़ते हुए मिस व‌र्ल्ड का खिताब अपने नाम किया। वह हरियाणा के सोनीपत शहर की रहने वाली हैं। इससे पहले आखिरी बार 2000 में प्रियंका चोपड़ा को मिस व‌र्ल्ड चुना गया था। इस प्रतियोगिता में दूसरे नंबर पर मिस मेक्सिको और तीसरे नंबर पर मिस इंग्लैंड रहीं। मानुषी 67वीं मिस व‌र्ल्ड हैं।

बहादुरगढ़ के बामडौली गांव की बेटी है मानुषी

मानुषी हरियाणा राज्य के बहादुरगढ़  की बेटी है, उन्होंने मिस वर्ल्ड 2017 का खिताब जीत कर हरियाणा का नाम रोशन किया है। मानुषी छिल्लर का परिवार मूल रूप से बहादुरगढ़ के बामडौली गांव का रहने वाला है। मानुषी के पिता मित्रबसु पेशे से डॉक्टर हैं जो फिलहाल दिल्ली के इनमास इंस्टीट्यूट में असिस्टेंट डायरेक्टर हैं और माता नीलम इब्मास कालेज में बायोकेमिस्ट्री की प्रोफेसर। अब से तकरीबन 15-20 सालों पहले वो गांव छोड़कर दिल्ली आ कर बस गए थे, लेकिन गांव की बेटी की इस उपलब्धि से गांव वाले बहुत खुश हैं।

 

20 साल की मानुषी छिल्लर सोनीपत के भगत फूल सिंह मेडिकल कॉलेज की छात्रा हैं और कार्डिएक सर्जन बनना चाहती हैं। उनकी प्रारंभिक शिक्षा दिल्ली के सेंट थॉमस स्कूल में हुई है। मानुषी को पैराग्लाइडिंग, बंजी जंपिंग और स्कूबा डाइविंग रोमांचक जैसे खेल पसंद हैं। इसके अलावा उन्होंने भारतीय शास्त्रीय नृत्य में प्रशिक्षण लिया है। वह स्केचिंग और पेंटिंग भी बनाती हैं।

बचपन का सपना

मिस व‌र्ल्ड बनना मानुषी के बचपन का सपना था। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि बचपन में मैं हमेशा से इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेना चाहती थी। हालांकि, मुझे यह कभी नहीं पता था कि मैं यहां तक पहुंच जाऊंगी। मानुषी समाजसेवा के कार्यो से भी जुड़ी रही हैं। उन्होंने महिलाओं की माहवारी के दौरान हाइजीन से संबंधित एक कैंपेन में करीब 5000 महिलाओं को जागरूक किया है।

इस जवाब ने बनाया विजेता

मानुषी छिल्लर से फाइनल राउंड में जूरी ने सवाल पूछा था कि किस व्यवसाय में सबसे ज्यादा सैलरी मिलनी चाहिए और क्यों? इसके जवाब में मानुषी ने कहा कि मां को सबसे ज्यादा सम्मान मिलना चाहिए। इसके लिए उन्हें कैश में सैलरी नहीं बल्कि सम्मान और प्यार मिलना चाहिए।

मिस वर्ल्ड मानुषी छिल्लर का पुश्तैनी घर

बहादुरगढ़ के बामडौली गांववालों का कहना है कि उनकी बेटी ने पूरे देश में गांव का नाम रोशन किया है। उन्होनें मानुषी को उनकी इस उपलब्धि के लिए शुभकामनायें दी हैं। उन्हें अपनी बेटी पर पूरा भरोसा है कि मानुषी भविष्य में समाजिक कार्यों से जुड़ कर देश के उत्थान में अपनी अपनी अहम भमिका निभायेगी।

 

पुरुषों के अंडरगारमेंट बेचने वाला पहला ई-कॉमर्स प्लैटफॉर्म है बटटॉक्स

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ऐसे समय में जब हम ऑनलाइन किराने का सामान भी खरीद लेते हैं, बिल भुगतान करते हैं और कमोडिटी खरीदते हैं, इस सुविधा को देखते हुए तीन युवा उद्यमियों ने पुरुषों को बेहतर अंडरवियर की खरीद में मदद करने के लिए तकनीक का इस्तेमाल किया है। चेन्नई के रहने वाले बृजेश देवारेड्डी, सुरेज सलीम और मनीष किशोर ने ई-कॉमर्स प्लेटफार्म बटटॉक्स का शुभारंभ किया है, जो अपने ग्राहकों को उनके लिए मुफीद अंडरवियर खरीदने की सुविधा प्रदान करता है। बेशक बटटॉक्स, अंडरगारमेंट ऑनलाइन बेचने वाला देश का पहला स्टार्टअप नहीं हैं। हाल के वर्षों में, जिवामे और प्रिटी सीक्रेट्स जैसे कई ऑनलाइन उद्यमों ने भारत में इनरवियर मार्केट को बढ़ाने में मदद की है, इस मार्केट का 2024 तक 68,270 करोड़ (10.2 अरब डॉलर) तक पहुंच जाने का अनुमान है। लेकिन बटकॉक्स निश्चित रूप से पहला उद्यम है जो पुरुषों के इनरवियर पर ध्यान केंद्रित करता है।

रूढ़िवादी भारत में, आम तौर अच्छी फिटिंग वाले इनरवियर मौजूद नहीं होते है। जबकि महिलाएं आमतौर पर बिना अपने शरीर के आकार का ध्यान दिए ऐसे ही लॉन्जरी खरीद लेती हैं वहीं पुरुष शायद ही कभी अपने अंडरग्राम के लिए काफी ध्यान देते हैं। यहां तक कि भारत में ऑनलाइन शॉपिंग एप्स में पुरुषों के अंतर्वस्त्रों की वर्गीकृत श्रेणियां नहीं होती हैं। यही कारण है कि देवारेड्डी, सलीम और किशोर ने बटटॉक्स की शुरुआत की और फिर बिक्री शुरू करने से पहले एक साल में बाजार अनुसंधान पर खर्च किया। किशोर के मुताबिक, भारतीय पुरुष अक्सर नहीं जानते हैं कि जब उनके अंडरवियर को बदलने का समय आ गया है। बेचैनी पैदा करने के अलावा, खराब फिटिंग के अंडरवियर से स्वास्थ्य को खतरे भी हो सकते हैं।

सेक्शुअल मेडिसिन कंसल्टेंट और एक प्रोफेसर राजन भोंसले के अनुसार, सही आकार के अंडरवियर पहनने से व्यक्ति के यौन स्वास्थ्य पर सीधा प्रभाव पड़ता है और उचित फिट के कपड़े पहनने से बांझपन से जुड़े मुद्दों को कम करने में मदद मिल सकती है। देवारेड्डी के मुताबिक, यह ऐसा विषय है कि कोई कभी भी इसके बारे में बात नहीं करता है। महिलाओं के स्वास्थ्य के मुद्दों पर बात होनी शुरू हो गयी हैं लेकिन पुरुष इस मुकाबले पिछड़े होते हैं। इन सभी को हाइलाइट करना होगा और तभी हमें लगा कि इस तरह एक प्लेटफार्म बनाया जाना चाहिए। बटटॉक के पास एक सदस्यता मॉडल है, जहां ग्राहकों को सेवा के लिए पंजीकरण के बाद समय-समय पर उनके दरवाजे पर उत्पादों का लाभ मिलता है। कंपनी की तीन अलग-अलग सदस्यता योजनाएं हैं, जो कि 999 से लेकर 4999 रुपए तक हैं और वार्षिक प्लान 2700 से 14000 तक के हैं। कीमतें ब्रांड के आधार पर भिन्न-भिन्न हैं। यूसीबी, एफसीयूके, पार्क एवेन्यू और एम्पोरियो अरमानी जैसे ब्रांड इस प्लैटफॉर्म पर खरीदे जा सकते हैं। प्रत्येक बॉक्स में जाने वाले उत्पाद एक संपूर्ण प्रश्नावली पर आधारित होते हैं जो कि साइन अप करते समय ग्राहकों को भरना होता है। हाल में आई एक रिपोर्ट भारतीय इनरवियर मार्केट: ट्रेन्ड्स एंड ऑपर्च्यूनिटीज़ के मुताबिक, भारत में इनरवियर उद्योग में भारी वृद्धि की क्षमता है, जो पिछले कुछ सालों में भारतीय बाजार में बड़े अंतर्राष्ट्रीय ब्रांडों के प्रवेश से स्पष्ट है। संगठित बाजार के बढ़ते आकार और असंगठित बाजार में गिरावट का हिस्सा, मूल्य संवेदनशीलता से लेकर ब्रांड संवेदनशीलता तक एक विशिष्ट बदलाव दिखाता है। बटटॉक्स के फाउंडर बृजेश और उनकी टीम अब तक अपनी प्रगति से खुश हैं और उनकी कंपनी में लक्ष्य को अपने ऑर्डर वॉल्यूम को बढ़ाया जा रहा है। खोजी क्षमता वाले ग्राहकों की मदद करने के लिए नए मिक्स और मिश्रणों पर भी ध्यान केंद्रित किया जा रहा है।

(साभार – योर स्टोरी)

 

नहीं रहे हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार कुंवर नारायण

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फैजाबाद  : हिंदी के प्रसिद्ध कवि कुंवर नारायणका निधन हो गया। वह 90 वर्ष के थे। मूलरूप से फैजाबाद के रहने वाले कुंवर पिछले 51 साल से साहित्य से जुड़े थे। उन्होंने दिल्ली के सीआर पार्क स्थित अपने घर में अंतिम सांसे लीं। वह सीआर पार्क में अपनी पत्नी और बेटे के साथ रहते थे।  पिछले कई महीनों से उनकी तबीयत खराब चल रही थी। साहित्य सिनेमा और संगीत में लगभग समान दखल रखने वाले कुंवर नारायण की मूल प्रतिष्ठा कवि की थी। ‘चक्रव्यूह’, ‘परिवेशः हम तुम, ‘इन दिनों’, ‘कोई दूसरा नहीं’, ‘आत्मजयी’, वाजश्रवा के बहाने और कुमारजीव जैसी अविस्मरणीय अनेक कृतियों के साथ उन्होंने हिंदी के साहित्य और समाज को एक बड़ी विरासत सौंपी है।

वह अज्ञेय द्वारा संपादित ‘तीसरा सप्तक’ के कवियों में रहे। कुंवर नारायण को अनेक महत्वपूर्ण सम्मान भी मिले। 1995 में उन्हें कविता संग्रह ‘कोई दूसरा नहीं’ के लिए साहित्य अकादमी सम्मान मिला। 2005 में ज्ञानपीठ सम्मान मिला।
उन्हें 2009 में पद्मभूषण से विभूषित किया गया। इसके अलावा कुमार आशान सम्मान, प्रेमचंद पुरस्कार और व्यास सम्मान भी मिले। उन्हें कई अंतरराष्ट्रीय सम्मान भी मिले थे। कुंवरनारायण की रचनाशीलता के कई आयाम रहे। एक तरह की उजली मनुष्यता उनकी कविता का मुख्य स्वर बनाती रही।
लखनऊ विश्वविद्यालय से उन्होंने अंग्रेजी साहित्य से परास्नातक की पढ़ाई की थी। हालांकि, पढ़ाई के तुरंत बाद उन्होंने पुश्तैनी ऑटोमोबाइल बिजनेस में काम करना शुरू कर दिया था। बाद में आचार्य कृपलानी, आचार्य नरेंद्र देव और सत्यजीत रे से प्रभावित होकर साहित्य में उनकी गहरी रुचि हो गई।

आधुनिक समय के तनावों-दबावों के बीच यह कविता बड़ी सहजता से प्रेम और सहिष्णुता का एक पाठ बनाती रही। इसके अलावा उन्होंने कई पौराणिक आख्यानों को आधुनिक और समकालीन अर्थों और संदर्भों के साथ पुनर्परिभाषित भी किया। आत्मजयी, वाजश्रवा के बहाने जैसी रचनाएं इस सामर्थ्य का प्रमाण हैं।

 

दूर करें बच्चों में इंटरनेट की लत

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आज कल की लाइफस्टाइल में तकनीक हर उम्र के लोगों के जीवन का एक जरूरी हिस्सा बन चुकी है। इंटरनेट का प्रभाव हर उम्र के लोगों पर देखा जा सकता है लेकिन इसका सबसे बुरा असर बच्चों पर पड़ रहा है। तकनीक विज्ञान का वरदान है, वहीं इसका ज्यादा इस्तेमाल बच्चों के शारीरिक विकास के साथ उनके दिमाग पर भी काफी बुरा असर डालता है। इंटरनेट की वजह से बच्चे आउटडोर गेम्स से दूर हो गए हैं। वो मोटापे के साथ कई तरह की बीमारियों के शिकार होते जा रहें हैं। अगर आपका बच्चा भी अपना ज्यादातर समय इंटरनेट पर ही गुजारता है, तो आप इन बातों को अपनाकर अपने बच्चे को इंटरनेट का ज्यादा प्रयोग करने से रोक सकते हैं –

आपका बच्चा इंटरनेट पर क्या देख रहा है, इसकी पूरी जानकारी रखना आपकी जिम्मेदारी है. साथ ही यह ध्यान रखें कि आपका बच्चा किस तरह के वीडियो गेम्स खेलता है, टीवी पर किस तरह की फिल्में या प्रोग्राम देखता है।

अपने बच्चे से इस बात पर जरूर चर्चा करें कि वीडियो गेम्स, फिल्म और टीवी प्रोग्राम में उन्हें क्या पसंद आया और क्या नहीं, और उससे उन्होंने क्या सीखा।

अपने बच्चों को ऐसे काम करने पर जोर दें, जो उनके लिए फायदेमंद हों। उन्हें पेड़ पौधे लगाना सिखाएं उनके लाभों के बारे में बताएं।

जितना हो सके अपने बच्चों को आउटडोर गेम्स में व्यस्त रखें। उनको खेलों से जुड़ी सभी जानकारी दें और खेल-कूद में उनकी ज्यादा से ज्यादा रुचि पैदा करें।

अपने बच्चों को ज्यादा इंटरनेट का इस्तेमाल न करने दें। उनके इंटरनेट इस्तेमाल करने का एक समय निश्चित करें।

अपने बच्चों के बेड रुम में कभी भी टीवी, लैपटॉप, या मोबाइल फोन ना रखें।

अकसर माता-पिता अपने बच्चों के प्यार में इतने खो जाते हैं कि वो उनकी हर मांग को बिना सोचें समझे पूरी करने लगते हैं। आपका यह व्यवहार आपके बच्चे पर बहुत गलत असर डालता है, इसलिए ऐसा करने से बचें।

 

रेणुका शहाणे टीवी पर कर रही हैं वापसी, अब पकाएंगी ‘खिचड़ी’

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फिल्म ‘हम आपके है कौन’ की बड़ी भाभी और टीवी सीरियल ‘सुरभि’ से लोगों के दिलों पर राज करने वाली अभिनेत्री रेणुका शहाणे अब एक बार फिर टीवी पर वापसी कर रही हैं। दरअसल मशहूर कॉमेडी सीरियल ‘खिचड़ी’ का तीसरा सीजन जल्द आने वाला है। जेडी मजीठिया, ‘साराभाई वर्सेस साराभाई’ के बाद अब  ‘खिचड़ी’ का तीसरा पार्ट लाने वाले हैं और खबर है कि इस बार खिचड़ी में अभिनेत्री रेणुका शहाणे नजर आएंगी।

आपको बता दें कि इस सीरियल पहला सीजन साल 2002 में आया था। इसके बाद साल 2005 में दूसरा सीजन इंस्टेंट खिचड़ी के नाम से शुरू हुआ था। अब इसका तीसरा सीजन जल्द शुरू होने के लिए तैयार है। इसमें सभी पुराने कलाकार काम कर रहे हैं। अनंग देसाई, राजीव मेहता, सुप्रिया पाठक और वंदना पाठक भी सीरियल में नजर आएंगी लेकिन इसके साथ ही रेणुका शहाणे भी शो में दिखेंगी।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, प्रोड्यूसर आतीश कपाड़िया और जेडी मजीठिया के बच्चे इस शो से डेब्यू कर सकते हैं। अगस्तया कपाड़िया और मिश्री मजीठिया जैकी और चक्की नाम के किरदार निभाएंगे। बलविंदर सिंह सूरी और समीक्षा को भी इस कॉमेडी शो में काम करने के लिए बोला गया है। हालांकि सूत्रों की मानें तो रेणुका शहाणे का रोल छोटा होगा लेकिन काफी इंस्टरेटिंग होगा।

 

 अमरनाथ की गुफा को बनाएं साइलेंट जोन, बाबा बर्फानी पर न चढ़ाएं नारियल : एनजीटी

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नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने सलाह दी है कि बढ़ते हिमस्खलन से बचाने के लिए अमरनाथ गुफा को ‘साइलेंट जोन’ घोषित किया जाना चाहिए। एनजीटी ने अमरनाथ श्राइन से ये भी कहा है कि भगवान शंकर को चढ़ाए जाने वाले नारियल पर भी रोक लगाएं।

एनजीटी ने ये भी पूछा है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने 2012 में उस क्षेत्र को सबसे सुरक्षित क्षेत्र घोषित किया था तो आजतक उस आदेश का पालन क्यों नहीं हुआ। एनजीटी  ने अमरनाथ श्राइन द्वारा बनाई गई पर्यावरण सुरक्षा कमेटी से यह भी पूछा है कि श्राइन के आस-पास बनी दुकानें और शौचालय अभी तक क्यों नहीं हटाई गये हैं।

इससे पहले एनजीटी ने वैैष्णो देवी दर्शन करने जाने वाले श्रद्धालुओं को लेकर आवश्यक निर्देश जारी किये थे जिसके मुताबिक, मां वैष्णो देवी के दर्शन के लिए एक दिन में अब केवल 50 हजार श्रद्धालु ही कटरा से ऊपर जा सकेंगे।