Thursday, October 1, 2026
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लघु पत्रिका प्रकाशन पर चर्चा, मरुतृण साहित्य-पत्रिका का लोकार्पण और काव्य पाठ

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एक हलफनामा मुक्तिबोध से जुड़ते हुए- “भीड़ में हूँ/ नीड़ में/ भावनाओं के ज्वार की लहरों पर में उछालता-कुदता/ रोमाणी उस्ताद के जुलुस की चकाचौंद से चौंधियाता/ देश देशांतर भागता-भटकता पहुँचता भीड़ में/ नीड़ में ।” यह कविता है ख्यातिलब्ध कवि ध्रुवदेव पाषाण का जिन्होंने कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए सुनाया । उन्होंने आगे कहा ” मरुतृण एक साहित्य पत्रिका है यह न लघु है न बड़ी है बल्कि यह एक साहित्य पत्रिका है ।” मुख्य अतिथि के तौर पर ताजा टीवी के प्रमुख विश्वंभर नेवर जी ने कहा कि लघु पत्रिका का संपादन और प्रकाशन साहित्यकार स्वयं साथ मिलकर कर अपनी निष्ठा से आगे बढ़ा सकते हैं । यह कार्यक्रम मरुतृण और ताजा टीवी के संयुक्त तत्वावधान में ताजा टीवी कार्यालय में संपन्न हुआ । मरुतृण साहित्य-पत्रिका के नये अंक का लोकार्पण भी पाषाण जी और नेवर जी के हाथों हुआ । कार्यक्रम की शुरूआत साहित्यकारों द्वारा समवेत स्वर में सरस्वती वंदना गाकर किया गया । इस मौके पर वरिष्ठ कवि नवल और आलोक शर्मा एवं लहक के संपादक निर्भय देव्याशं ने कार्यक्रम की गरिमा को बढ़ाया।

कार्यक्रम का संचालन मरुतृण के परामर्श संपादक राजेन्द्र साह तथा संपादक सत्य प्रकाश भारतीय ने संयुक्त रूप से किया। धन्यवाद ज्ञापन वरिष्ठ तथा प्रसिद्ध साहित्यकार सेराज खान बातीश जी ने किया । इस अवसर पर दिवंगत कवि कुँवर नारायण और चन्द्रकांत देवताले की आत्मा की शांति हेतु दो मिनट का मौन रखा गया ।”पत्रिका प्रकाशन संबंधित दीर्घकालीन आपके अनुभव और हमारे नवीन रास्ते” विषय पर एक परिचर्चा पर परिचर्चा में कुशेश्वर, पार्थ सारथी मौसम तथा श्री रणजीत भारती जी ने अपने विचार रखे । पाषाण जी ने मरुतृण को बेहद भरोसे से मरुतृण को आने वाले समय में साहित्य के नभ पर चमकने की कामना की। कार्यक्रम के आखिरी सत्र में आमन्त्रित कवि और कवयित्रियों का काव्य पाठ हुआ । डॉ. गिरिधर राय, रावेल पुष्प जी, ब्रजमोहन सिंह जी, जय कुमार रुसवा, रणविजय श्रीवास्तव, सेराज खान बातीश जी तथा युवा कवि और कवयित्रियों में शामिल रहे, अनिल उपाध्याय जी, नवीन कुमार सिंह जी, अमित कु अम्बष्ट ” आमिली “, जीवन सिंह जी , रामनाथ यादव बेखबर , ज्ञान प्रकाश पाण्डेय, सरवर दिलकश, भागीरथी कुर्मी, आरती सिंह जी , अनु नेवटिया और अनुराधा कुमारी । आमंत्रित सभी कवि और कवयित्रियों को पाषाण जी के हाथों से मरुतृण स्मृति पत्र दिया गया। श्रोताओं में मुख्य रूप से लक्ष्मी जायसवाल, वीनिता साव, खुशबू साह, रीता प्रकाश, विनीता प्रिया ’मिली’, कविता अरोङा, मिनाश्री सांगनेरिया, सुरेश चौधरी जी , सर्वेश कुमार राय , जतिब हयाल, नथमल रूँगटा, राम नारायण झा , ओम प्रकाश चौबे, संजय बिन्नाणी, राम सागर सिंह, सागर चौधरी और प्रवेश पटियालवी, इशिता और श्रेयांश आदि।

 

आत्मा की सोच सकारात्मक बनाने के लिए शरीर का सही होना जरूरी है

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एक पत्रकार बनने की ख्वाहिश ने महिमा को दिल्ली पहुँचाया। दिल्ली में उसने पढ़ाई की और लगा कि उसके लिए जनसम्पर्क क्षेत्र अधिक सही है। पढ़ाई पूरी की और जोर – शोर से काम पर भी लग गयी मगर इस दौरान वह अपना ख्याल रखना भूल गयी और ऐसी बीमारी का शिकार हो गयी जिसने सफर की शुरुआत में ही उसके कदम बाँध दिये। मगर….रुकिए कहानी यहाँ से शुरू होती है…महिमा रुकी नहीं…उसने बीमारी को टक्कर दी और आज एक बार फिर वापस मैदान में कूद चुकी है। महज 25 साल की उम्र में लकवाग्रस्त होने की स्थिति मानसिक तौर पर किसी को तोड़ने के लिए काफी है मगर महिमा टूटी नहीं बल्कि उसने बीमारी को तोड़ दिया। महिमा ने अपनी कहानी अपराजिता के साथ साझा की और उसे हम उसकी जबानी ही आप तक ला रहे हैं…यह हौसलों की कहानी है..गौर से सुनिए..

1. मैं पटना से महत्वाकांक्षा लिए दिल्ली २०१५ में आयी थी। पत्रकारिता में बचपन से ही रुचि रही है। जैसे-जैसे पत्रकारिता के विभिन्न पहलुओं को समझा – खुद को जन संपर्क के लायक समझा। उच्च शिक्षा के लिए मैं देश के प्रतिष्ठ संस्था ” भारतीय जन संचार संस्था ” से पी जी डिप्लोमा किया। उसके बाद शुरू हुई असली ज़िन्दगी, स्टूडेंट लाइफ का ख़त्म होना और कॉरपोरेट ज़िन्दगी का आगमन।

2. शुरुआती दौर में काम करने के साथ साथ सीखने की भी तलब थी। हालाँकि – काम में सीखने का कभी कोई अंत नहीं होता पर कहते हैं न, नया नया जब बच्चा चलना शुरू करता है तब से ही वो दौड़ने की होड़ में लग जाता है। मेरा भी कुछ ऐसा ही हाल था। उस वक्त मैं सीखने के साथ साथ परफॉर्म करने का प्रेशर भी ले लेती थी और शायद इसी का परिणाम था कि मैं खाने -पीने पर ध्यान नहीं देती थी।

3.  थ्रोम्बोसिस का दौर हर मरीज़ की तरह मेरे लिए भी कठिन रहा पर मेरे लिए कठिनाइयों से ज्यादा सिखाने वाला दौर रहा। इस दौर में मैंने सीखा – कैसे नयी शुरुआत की जाती है। बुरे से बुरे शारीरिक कष्ट झेले , आप कल्पना कर सकते हैं – जिसने कभी भी टीकाकरण के अलावा कभी इंजेक्शन नहीं लिया उसे कैसा लगता होगा हफ़्तों इंजेक्शन लेने वक्त। उठ कर बैठना तो दूर ,एक इंच भी बिस्तर से खुद के दम पर हिल नहीं पाती थी। करीब दो महीने तक दूसरों की मदद से नहाना खाना, शौच करना हो रहा था। ज़ाहिर करना काफी मुश्किल होगा कि कैसे पूरा परिवार अस्त व्यस्त हो रखा था मेरे इस बीमारी के कारण।

4. परिवार का और दोस्तों का काफी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। कोइ ऐसा दिन नहीं था जब मुझसे पहले मेरे माँ – पापा और चाचा नहीं जगते और मेरे सोने के बाद ही उनकी आँख लगती। मुझे आज भी याद है जब पहली बार दायां हाथ हल्के से उठा था तब मम्मी ने फ़िज़ियोथेरेपिस्ट को लडडू खिलाया था , और जब पहली बार वॉकर के सहारे कड़ी हुई थी, तब पूरे मुहल्ले में मिठाइयां बटी थी।

5. लोगों ने आश्चर्य जताया था – कि जो लड़की कल तक हँस खेल रही थी ,वो आज ऐसी हालत में कैसे आ गयी। जो मेरे करीब थे – उन्होंने साफ़ बोल दिया कि ये सब मेरे शरीर के प्रति गैर ज़िम्मेदराना स्वभाव के कारण हुआ था। वहीँ जिनकी नज़रों में मैं बिगड़ी हुई लड़की थी – उन्होंने तो मेरा चरित्र प्रमाणपत्र भी दे दिया था। लोगों को पता नहीं क्यों ये समझना गवारा नहीं हो रहा था कि – ये सब डिहाइड्रेशन का एक्सट्रीम केस था।

पहली बार दायां हाथ हल्के से उठा था तब मम्मी ने फ़िज़ियोथेरेपिस्ट को लडडू खिलाया था , और जब पहली बार वॉकर के सहारे कड़ी हुई थी, तब पूरे मुहल्ले में मिठाइयां बटी थी।

6. सबसे ज्यादा सपोर्ट परिवार, दोस्तों , डॉक्टर्स , फ़िज़ियोथेरेपिस्ट और आया आंटी से मिला।

7.अभी मैंने नौकरी फिर से ज्वाइन कर ली है और साथ ही रिकवरी फेज़ के ख़त्म होने का इंतज़ार का रही हूँ ताकि मुझे डॉक्टर से फिटनेस सर्टिफिकेट मिल जाए।

8. सन्देश कुछ खास नहीं पर यही कि हलके से सिरदर्द को भी नज़रअंदाज़ न किया जाए और समझें कि आत्मा की सोच को सार्थक होने में शरीर काफी मायने रखता है।

बीमारी के बारे में

सेरेब्रल थ्रॉम्बोसिस  – सेरेब्रल थ्रॉम्बोसिस एक असामान्य मस्तिष्क विकार है। वयस्कों में इस स्थिति की शुरूआत की औसत आयु 39 साल है। महिमा के मामले में इतनी कम उम्र में ऐसी भयनाक बीमारी होना बड़ा ही रेयर केस था।  सेरेब्रल थ्रॉम्बोसिस तब होता है जब मस्तिष्क के वीनस साइनस में खून का थक्का जम जाता है। यह रक्त को मस्तिष्क से बाहर निकलने से रोकता है। शिराओं और रक्त कोशिकाओं पर दबाव बढ़ जाता है, जिससे सूजन और शिराओंमें रक्तस्त्राव होने लगता है। लगभग 25 फीसद मामलों में इस रोग का सबसे आम लक्षण है- सिरदर्द। आईएमए के अनुसार, लगभग 80 फीसदी रोगियों को पूरी तरह से ठीक करना संभव है। इस रोग की पुनरावृत्ति की दर लगभग 2-4 फीसद है। आंकड़ों के मुताबिक, यह एक लाख की आबादी में किसी एक व्यक्ति को होता है। इस बीमारी से ग्रसित करीब 5 फीसदी लोग बीमारी बिगड़ने पर मर जाते हैं, जबकि 10 फीसदी मरीज की मौत बाद में होती है। पुरुषों की तुलना में यह रोग महिलाओं में अधिक होता है।

 

कमजोरियों से भागकर हम इतिहास नहीं बदल सकते

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साल की उल्टी गिनती आज से शुरू हो चुकी है और ऐसा लग रहा है जैसे हमारे विकास और प्रगतिशीलता की उल्टी गिनती शुरू हो रही है। परम्परा के नाम पर वर्चस्व की राजनीति करने वाले तमाम लोग एकजुट हो रहे हैं और बहाना है एक फिल्म। बहाना कहें या निशाना ही सही शब्द है और ये चिन्ता तमाम सतही बातों को लेकर ही है या यूँ कहें कि उनके हाथ में एक हथियार मिल गया है…जन भावना…जनभावना…सम्मान और प्रतिष्ठा की धुरी में पिस रहे इस देश और समाज ने क्या खो दिया है…उसे खुद अन्दाजा नहीं है। कभी – कभी समझना मुश्किल हो जाता है कि ये परम्परा…इज्जत और धर्म इतने नाजुक क्यों हैं कि जरा सी चोट से खुद को बचा नहीं पाते। याद रखिए कि धर्म और समाज के ठेकेदारों ने इसी जनभावना का हवाला देकर लम्बे समय तक शोषण चक्र और वर्चस्व को जिन्दा रखा है…और आज हर राजनीतिक पार्टी यही कर रही है…कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जो अपने सिद्धांतों पर अडिग हो और सिद्धांत तो वर्तमान समय की सबसे बड़ी विडम्बना बनकर रह गए हैं…आप यह नहीं देख रहे कि आप किस चीज की वकालत कर रहे हैं….सती प्रथा की या जौहर की या उसके नाम पर होने वाली हिंसा की….क्या इतिहास को चाटुकारिता में बदलना चाहिए। आपका इतिहास गौरवशाली रहा होगा मगर आप अपनी हार को भूलते हैं तो आपको जीत की प्रेरणा कभी नहीं मिलेगी। आदिम समय से ही कमजोरों खासकर स्त्रियों को दंडित करने के लिए उनका अंग – भंग करना, दबाना..या बलात्कार कर देना वर्चस्ववादी सत्ता की नीति रही है और आज भी यही चला आ रहा है। सोशल मीडिया पर यह जुबानी गंदगी तो छायी रहती है….आप कल्पना कीजिए कि हमें कहाँ बढ़ना था और हम कहाँ तक गिर रहे हैं….इस राष्ट्र ने कभी भी एक विशेष विचारधारा को कभी प्रश्रय नहीं दिया और अगर दिया होता तो वसुधैव कुटुम्बकम की परम्परा नहीं रही होती। जिस देश में पूरी वसुधा को समेटने की शक्ति है…उसे किसी एक धर्म, सम्प्रदाय और में समेटना ही ही परम्परा का अपमान है और राष्ट्रवाद के नाम पर यही हो रहा है। आप एक परिवार की परिकल्पना कीजिए जिसमें बहुएँ बाहर से ही आती हैं…सम्बन्ध बाहर से ही जुड़ते हैं..क्या आप यह कह सकते हैं कि परिवार के इन सदस्यों को घर में रहने का अधिकार नहीं है क्योंकि ये बाहर से हैं या आप उनको अपने परिवार का हिस्सा नहीं मानते। यही बात इस देश रूपी विशाल परिवार पर भी लागू होती है..हो सकता है कि हिन्दू या द्रविड़ सभ्यता यहाँ रही हो..और अन्य जातियाँ बाहर से हों मगर अब वे इस देश की संस्कृति का हिस्सा हैं…इसलिए यह देश उनका भी है जैसे कि आपका है और वसुधैव कुटुम्बकम की परम्परा का निर्वाह ही आपकी जड़ों को मजबूत करेगा…धर्म जड़ता नहीं है…समय के साथ वह खुद को कट्टर नहीं बल्कि उदार बनाता है। जो लोग लव जेहाद की बातें करते हैं…उनको एक बार इतिहास पर नजर डालनी चाहिए क्योंकि विदेशियों से विवाह तो तभी से चला आ रहा है…। अपनी कमजोरियों से भाग कर हम कभी मजबूत नहीं बन सकते। कला और साहित्य हमें आइना दिखाते हैं तो इसका सम्मान कीजिए और अगर कुछ गलत है तो उसका प्रतिवाद भी सृजनात्मक तरीके से ही होना चाहिए….दबाकर विद्रोह को रोका नहीं जा सकता…और न ही इतिहास चाटुकारिता में बदलेगा मगर आपकी हरकतें आपको एक अँधी और क्रूर याद के रूप में कैद जरूर कर देंगी। इतिहास को हम अपने स्वार्थ के हिसाब से नहीं ढाल सकते क्योंकि उसमें आपकी अच्छाई और बुराई दोनों समाहित है।

भारत की पहली महिला डॉक्टर  रुखमाबाई :  जिन्होंने  बाल विवाह के खिलाफ लड़ी जंग

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रुखमाबाई का जन्म 22 नवंबर 1864 में हुआ। अपने जीवन में उन्होंने कड़े संघर्ष के बाद सफलता हासिल की थी। मुंबई के बढ़ई जाति से संबंध रखने वाले जनार्धन पांडूरंग और जयंतीबाई के यहां उनका जन्म हुआ।

रुखमाबाई ने मेडिकल की पढ़ाई तब की जब भारत पर ब्रिटिश राज था और महिलाओं को उनके मूल अधिकारों तक के लिए वंचित रखा जाता था। इंग्लैंड से पढ़ाई करने के बाद वो भारत की पहली महिला डॉक्टर बनीं। इसके साथ ही उन्होनें महिलाओं के मूल अधिकारों के लिए कार्य किए, अनेकों अखबारों से उन्होनें लोगों के दिल में अपने लिए जगह बनाई और लोगों के द्वारा दिए गए फंड से ही लंडन स्कूल ऑफ मेडिसिन से पढ़ाई पूरी की थी। रुखमाबाई ने कई समाज कार्यों में अपनी भूमिका निभाई और बाल विवाह और पर्दा प्रथा जैसी कुरीतियों के खिलाफ बेबाक बोल लिखे। रुखमाबाई एक डॉक्टर के साथ एक समाजसेवक भी थीं। रुखमाबाई ने शिक्षा और अपनी निडरता से अपने साथ आगे आने वाली महिलाओं की पीढ़ी के लिए शिक्षा के रास्ते तो खोले और उन्हें बाल विवाह और पर्दा प्रथा जैसी कुरितियों से मुक्त करवाया।

रुखमाबाई का विवाह 11 साल की उम्र में 19 साल के दादाजी भिकाजी से उनकी बिना मर्जी के विवाह करवा दिया गया था लेकिन वो 12 साल की उम्र में अपने पति का घर छोड़ आई थीं। उनकी विधवा माता ने उनका साथ दिया और रुखमाबाई ने उनके साथ रहना शुरु कर दिया। माता जयंतीबाई ने असिस्टेंट सर्जन सखाराम अर्जुन के साथ विवाह किया, जिन्होनें रुखमाबाई की पढ़ाई को जारी रखा और हर मुद्दे पर उनका साथ दिया। रुखमाबाई के पति दादाजी भिकाजी ने बॉम्बे हाई कोर्ट में पत्नी पर हक के लिए केस कर दिया। जिसमें कोर्ट ने रुखमाबाई को पति के साथ रहने का फैसला सुनाया और कहा कि दादाजी भिकाजी के साथ रहना होगा अन्यथा सजा के तौर पर जेल जाना पड़ेगा। जिसपर रुखमाबाई ने कहा कि वो इस तरह के रिश्ते में रहने से बेहतर जेल जाना पसंद करेंगी। ये केस ने इंग्लैंड में भी चर्चित हो गया और उसके बाद महारानी विक्टोरिया और ब्रिटिश सरकार ने शारीरिक संबंध बनाने के लिए रजामंदी की उम्र से जुड़ा कानून 1891 में पारित किया।

रुखमाबाई अपने पेन नेम ‘ए हिंदू लेडी’ से कई जगह लेख लिखे जिसमें उनके नारीवादी विचार झलकते थे। इसी तरह के एक लेख में उन्होनें अपने डॉक्टर बनने की इच्छा जाहिर की और उनके शुभचिंतकों ने फंड इकठ्ठे करके उन्हें पढ़ाई के लिए 1889 में इंग्लैंड भेजा। वहां से 1894 में एक प्रोफेशनल फिजिशियन बनकर लौंटने के बाद उन्होनें सूरत में एक अस्पताल में सेवाएं देनी शुरु कर दी थी। 1904 में दादाजी भिकाजी की मृत्यु के बाद हिंदू धर्म के अनुसार विधवा रुप में रहने लगी और 1918 में उन्होनें राजकोट के एक महिला अस्पताल में काम करना शुरु किया। वहां करीब 35 साल काम करने के बाद वो बंबई 1930 के आस-पास लौटीं और महिलाओं के लिए बनी पर्दा प्रथा और अनेकों कुरीतियों के लिए काम करना शुरु किया और अपने बेबाक शब्दों से उन्होनें लोगों को जागरुक करने का प्रयास किया और एक लंबी लड़ाई के बाद 1955 में हिंदू मैरिज एक्ट आया जिसमें पति-पत्नी के रिश्ते के लिए दोनों पक्षों की मंजूरी होना आवश्यक किया गया। रुखमाबाई ने शिक्षा और अपनी निडरता से अपने साथ आगे आने वाली महिलाओं की पीढ़ी के लिए शिक्षा के रास्ते तो खोले और उन्हें बाल विवाह और पर्दा प्रथा जैसी कुरितियों से मुक्त करवाया।

 

पत्नी को रखने के लिए पति को जबरन राजी नहीं कर सकतीं अदालतें: सुप्रीम कोर्ट

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नयी दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अदालतें ‘पत्नी को रखने’ के लिए पति को मजबूर नहीं कर सकती हैं। न्यायालय ने पेशे से पायलट एक व्यक्ति को अलग रह रही पत्नी और बेटे की परवरिश के लिए 10 लाख रुपए अंतरिम गुजारा भत्ता के तौर पर जमा कराने के लिए कहा है। शीर्ष अदालत ने मद्रास उच्च न्यायालय के उस जमानत आदेश को बहाल कर दिया है जिसे पति द्वारा सुलह समझौता मानने से इनकार करने के कारण रद्द कर दिया गया था।

न्यायमूर्ति आदर्श गोयल और न्यायमूर्ति यू यू ललित ने कहा कि हम एक पति को पत्नी को रखने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। यह मानवीय रिश्ता है। आप (व्यक्ति) निचली अदालत में 10 लाख रुपए जमा कराएं जिसे पत्नी अपनी फौरी जरूरतों को पूरा करने के लिए बिना शर्त निकाल पाएगी। जब व्यक्ति के वकील ने कहा कि राशि को कम किया जाए तो पीठ ने कहा कि शीर्ष न्यायालय परिवार अदालत नहीं है और इसपर कोई बातचीत नहीं हो सकती है।

 

डिजिटल विज्ञापन पर खर्च दिसंबर, 2018 तक 13,000 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान : सर्वे

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नयी दिल्ली : देश में डिजिटल विज्ञापन पर खर्च दिसंबर, 2018 तक बढ़कर 13,000 करोड़ रुपये पर पहुंच जाएगा। एक सर्वे में कहा गया है कि डिजिटल विज्ञापन खर्च में सालाना 35 प्रतिशत की दर से वृद्धि का अनुमान है।

उद्योग मंडल एसोचैम और केपीएमजी के सर्वे में कहा गया है कि स्मार्टफोन और डेटा शुल्क में गिरावट की वजह से डिजिटल विज्ञापन खर्च में वृद्धि होगी।

सर्वे में कहा गया है कि फिलहाल डिजिटल विज्ञापन पर खर्च 9,800 करोड़ रुपये है। 3जी और 4जी सेवाओं के विस्तार तथा इंटरनेट की पहुंच बढ़ने से डिजिटल विज्ञापन पर खर्च में बढ़ोतरी होगी।

वर्ष 2016 के आंकड़ों का हवाला देते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि 2016 के अंत तक डिजिटल विज्ञापन पर खर्च करीब 7,500 करोड़ रुपये रहा था।

इसमें कहा गया है कि कुल विज्ञापन खर्च में करीब 50 प्रतिशत डिजिटल के जरिये होता है। इसके बाद ई-कामर्स, दूरसंचार, प्रौद्योगिकी और बैंकिंग, वित्तीय सेवाओं और बीमा कंपनियों का नंबर आता है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि स्मार्टफोन और टैबलेट की मांग बढ़ने से विज्ञापनदाताओं को अब अधिक लोगों तक पहुंचने में मदद मिली है। डिजिटल विज्ञापनों के साथ खास बात यह है कि ये लचीले होते हैं और किसी भी तरह के उपकरण मसलन टेलीविजन, लैपटॉप, टैबलेट या स्मार्टफोन पर इन्हें देखा जा सकता है।

सर्वे में बताया गया है कि देश में 23.5 करोड़ लोग मोबाइल उपकरणों के जरिये इंटरनेट पर जाते हैं। मोबाइल एप्लिकेशंस की वजह से अब ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में भी पहुंचने में मदद मिल रही है।

 

कांग्रेस नेता प्रियरंजन दासमुंशी का निधन

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नयी दिल्ली : कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रियरंजन दासमुंशी का निधन अस्पताल में हो गया। वह वर्ष 2008 से ही कोमा में थे। वह 72 वर्ष के थे। अपोलो अस्पताल के अधिकारियों ने बताया, ‘ पिछले एक महीने से उनकी हालत नाजुक बनी हुई थी और उनकी मृत्यु आज दोपहर 12 बजकर 10 मिनट पर हुई। निधन के समय उनकी पत्नी और बेटे अस्पताल में मौजूद थे।’ पूर्व केंद्रीय मंत्री को साल 2008 में आघात आया था और वह तब से अस्पताल में भर्ती थे। बीमार पड़ने से पहले दासमुंशी ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन (एआईएफएफ) चला रहे थे।

 

इरा जोशी दूरदर्शन समाचार की महानिदेशक बनीं

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नयी दिल्ली  : पत्र सूचना ब्यूरो (पीआईबी) की महानिदेशक इरा जोशी को दूरदर्शन समाचार का महानिदेशक नियुक्त किया गया। वह वीना जैन की जगह लेंगी जो सेवानिवृत्त हो चुकी हैं। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने यह जानकारी दी।
पीआईबी के महानिदेशक घनश्याम गोयल को विज्ञापन एवं दृश्य प्रचार :डीएवीपी: का नया महानिदेशक नियुक्त किया गया है। उन्होंने ईस्थर कार का स्थान लिया है जिन्हें ‘अनिवार्य प्रतीक्षा’ में डाल दिया गया है।
वीना जैन को मई, 2015 में दूरदर्शन समाचार का डीजी नियुक्त किया गया था। वह इस साल अगस्त में सेवानिवृत्त हो गईं। इसके बाद आल इंडिया रेडियो के समाचार सेवा प्रभाग के डीजी सितांशु कार को इस पद का अतिरिक्त प्रभार दिया गया।
आदेश में मंत्रालय ने कहा है कि जोशी को दूरदर्शन समाचार का नया महानिदेशक नियुक्त किया गया है। दूरदर्शन समाचार फिलहाल हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू और संस्कृत भाषाओं में समाचार सामग्री तैयार करता है और प्रस्तुत करता है।

 

आइसीजे के लिए फिर चुने गए भारत के दलवीर भंडारी

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अंतरराष्ट्रीय अदालत की एक सीट के लिए हो रहे चुनाव में भारत के न्यायमूर्ति दलवीर भंडारी एक बार फिर चुन लिए गए हैं। संयुक्त राष्ट्र महासभा में मिले अभूतपूर्व समर्थन और ब्रिटेन की ओर से अपने उम्मीदवार का नाम वापस लिए जाने से उनकी जीत आसान हो गई। इस पद के लिए इससे पहले हुए 11 दौर के मतदान में कोई नतीजा नहीं निकला था। पर्यवेक्षकों का कहना है कि भंडारी की जीत से दुनिया की प्रमुख शक्तियों को बदलाव की नई बयार के बारे में कड़ा संकेत जाएगा। संयुक्त राष्ट्र महासभा में भंडारी को पिछले 11 दौर के मतदान में अभूतपूर्व समर्थन मिलने के बाद ब्रिटेन को अपने उम्मीदवार का नाम वापस लेने पर बाध्य होना पड़ा। अंतरराष्ट्रीय अदालत के 71 साल के इतिहास में ऐसा पहली  बार हुआ है, जब उसके 15 सदस्यीय पीठ में एक भी ब्रिटिश नहीं है। देश के लिए बहुपक्षीय मंच पर सबसे बड़ी कूटनीतिक जीतों में से एक इस चुनाव के दौरान संयुक्त राष्ट्र महासभा में भंडारी को 193 में से 183 वोट मिले। वहीं सुरक्षा परिषद में सभी 15 मत भारत के पक्ष में गए। इस चुनाव के लिए न्यूयॉर्क स्थित संगठन के मुख्यालय में अलग से मतदान करवाया गया था।
अंतरराष्ट्रीय अदालत के पांच में से चार न्यायाधीशों के चुनाव के बाद पांचवें न्यायाधीश के तौर पर पुन: निर्वाचन के लिए भारत के भंडारी और ब्रिटेन के क्रिस्टोफर ग्रीनवुड के बीच बेहद कड़ा मुकाबला था। ब्रिटेन ने ग्रीनवुड की उम्मीदवारी आखिरी वक्त में वापस ले ली। इसके साथ ही 70 साल के भंडारी नौ साल के अगले कार्यकाल के लिए आइसीजे में निर्वाचित हो गए।

 

शुभांगी बनीं इंडियन नेवी की पहली महिला पायलट

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भारतीय नौसेना ने पहली बार किसी महिला की नियुक्ति पायलट पद के लिए की है। इस गौरव को हासिल करने वाली ऑफिसर का नाम है शुभांगी स्वरूप। शुभांगी जल्द ही आकाश की अनंत ऊंचाइंयों में एयरक्राफ्ट उड़ाएंगी। शुभांगी स्वरूप मेरीटाइम रिकानकायसन्स विमान उड़ाएंगी। शुभांगी स्वरूप उत्तर प्रदेश की हैं और विमानों को उड़ाने को तमन्ना उन्हें बचपन से ही थी। इसके अलावा नयी दिल्ली की आस्था सेगल, पुड्डूचेरी की रूपा ए और केरल की शक्ति माया एस को नौसेना की नेवल आर्मामेंट इंस्पेक्टोरेट (एनएआई) शाखा में देश की पहली महिला अधिकारी बनने का गौरव हासिल हुआ है। चारों महिलाओं ने एझीमाला नौसेना अकादमी में नेवल ओरियन्टेशन कोर्स पास करने के बाद पासिंग आउट परेड में हिस्सा लिया।

इस समारोह में नौसेना प्रमुख एडमिरल सुनील लांबा मौजूद थे। दक्षिणी नेवल प्रवक्ता कमांडर श्रीधर वॉरियर ने बताया कि वैसे तो शुभांगी नौसेना में पहली पायलट हैं लेकिन नौसेना की एविएशन ब्रांच में पहले भी वायु यातायात नियंत्रण अधिकारी और विमान में ‘पर्यवेक्षक’ अधिकारी के तौर पर महिलाएं काम कर चुकी हैं।एनएआई शाखा पर नौसेना के हथियारों और गोला-बारूद के ऑडिट एवं आकलन की जिम्मेदारी होती है। कमांडर वॉरियर ने कहा कि सभी चारों महिला अधिकारियों को ड्यूटी पर तैनात किए जाने से पहले उनकी चुनिंदा शाखाओं में प्रशिक्षण दिया जाएगा। शुभांगी को हैदराबाद में वायु सेना अकादमी में प्रशिक्षण दिया जाएगा, जहां सेना, नौसेना और वायु सेना के पायलटों को प्रशिक्षण दिया जाता है।