Thursday, October 1, 2026
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हर साल बेची जाती हैं नेपाली लड़कियां, आंकड़ा 12 हजार पार

नेपाल के शहर की चकाचौंध भरी ये गलियां किसी न किसी डांस बार पर जाकर खत्म होती हैं। यहां सूरज ढलते ही महफिल सजती है और सज-धजकर नाच रही लड़कियों के बीच फिल्मी धुनों पर लोग थिरकने लगते हैं। रात परवान चढ़ने लगती है और इस बीच एक अन्य समूह इन डांस बारों पर पहुंचता है। ये लोग खरीदार हैं जो बार में मौजूद लड़कियों की बोली लगाते हैं। सौदा तय हो जाता है और ये महफिल सुबह तक ऐसे ही चलती रहती है। इसके बाद ये लड़कियां बड़े-बड़े शहरों में मौजूद डांस बार में ले जाई जाती हैं।

नेपाल के लिए लड़कियों की तस्करी कोई नई समस्या नहीं है। 2015 में आए विनाशकारी भूकंप के बाद लड़कियों की तस्करी में अचानक देखी जा रही बढ़ोतरी ने नेपाल सरकार और नेपाल पुलिस की चिंता बढ़ा दी है।

नेपाल पुलिस के प्रवक्ता मनोज नेऊपाने ने कहा, समस्या कितनी बड़ी है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस साल नवंबर महीने तक नेपाल पुलिस ने 2,700 से भी ज्यादा नेपाली लड़कियों को तस्करों और दलालों के चंगुल से छुड़वाया है। मनोज ऊपाने कहते हैं,  मानव तस्करी का ये जाल बहुत बड़ा है और इसके तार यहाँ से लेकर भारत और विदेशों तक फैले हुए हैं। मानव तस्करी की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए नेपाल पुलिस में हमने एक विशेष प्रकोष्ठ बनाया है, हमें सफलता मिल रही है, मगर उतनी नहीं।

एक अमरीकी संस्थान के शोध के अनुसार हर साल 12,000 नेपाली लड़कियां तस्करी का शिकार हो रही हैं। भारत और नेपाल की 1,751 किलोमीटर लंबी सीमा पर तस्करी को रोकना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। ऐसा मानना है नेपाल-भारत की सीमा की चौकसी करने वाले सशस्त्र सीमा बल के अधिकारियों का।

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर से लगे सोनौली बॉर्डर पर तैनात उप समादेष्टा दिलीप कुमार झा कहते हैं,  उन लड़कियों को रोकना मुश्किल है जो वयस्क हैं और अपनी मर्जी से सरहद पार कर रही होती हैं। कई लड़कियां अपने सगे-सम्बन्धियों के साथ होती हैं।

दिलीप झा बताते हैं,  हमें पता है कि ये लड़कियां तस्करी का शिकार हो सकती हैं। मगर जानते हुए भी हम कुछ नहीं कर सकते क्योंकि उनके पास दस्तावेज सही होते हैं और वो वयस्क होती हैं। कभी जब शक पुख्ता होता है तो हम ऐसी लड़कियों को नेपाल पुलिस के अधिकारियों या वहां के सामजिक संगठनों के सुपुर्द कर देते हैं। मगर ये समस्या काफी बड़ी है। नेपाल के अधिकारियों और भारत के सीमा प्रहरियों का कहना है कि मानव तस्करी का सबसे बड़ा कारण है गरीबी, नेपाल के दूर-दराज के इलाकों में रोजगार के संसाधन नहीं होने की वजह से बड़े पैमाने पर पलायन हो रहा है। सुनीता दानुवर कम उम्र में ही तस्करी का शिकार हो गई थीं।

उन्हें मुंबई ले जाया गया जहां उनका बलात्कार हुआ, फिर उन्हें जबरन जिस्मफरोशी के काम में धकेला गया। मगर एक दिन उस जगह पुलिस का छापा पड़ा जहां सुनीता को रखा गया था। पुलिस ने उन्हें वहां से निकाला और वापस नेपाल भेज दिया। ये सिलसिला सिर्फ भारत के महानगरों तक सीमित नहीं है। सुनीता कहती हैं कि नेपाली लड़कियों को तस्करी के बाद उन्हें चीन, श्रीलंका और अरब देशों में बेचा जाता है जहां उन्हें जिस्मफरोशी के लिए मजबूर किया जाता है।

मगर तस्करी की पीड़ितों की विडंबना है कि वापसी के बाद उन्हें ना उनका परिवार अपनाता है और ना ही समाज, काठमांडू में बने एक पुनर्वास केंद्र में रहने वाली एक पीड़ित नेपाली लड़की का कहना है, मुझे अच्छी नौकरी का झांसा देकर दिल्ली ले जाया गया मगर जब मैं वहां पहुंची तो खुद को एक छोटे से गंदे से कमरे में पाया। वहां पर और भी नेपाली लड़कियां थीं। मैं बेबस थी और मुझे जिस्मफरोशी के काम में जबरदस्ती झोंक दिया गया। कई महीनों के बाद मैं किसी तरह वहां से निकलकर भाग सकी।

नाम नहीं बताने की शर्त पर बात करने को तैयार हुई तस्करी की शिकार एक अन्य नेपाली युवती ने कहा कि वो शादी के झांसे में आ गई और होश संभाला तो खुद को जिस्मफरोशी की मंडी में पाया। वो कहती हैं, मैं जिस लड़के से प्यार करती थी उसने मुझे मुंबई में बेहतर जिन्दगी का भरोसा दिलाया। मैं उसके साथ दिल्ली चली गई, मगर वो मुझे उम्रदराज आदमी के पास छोड़कर भाग गया। उस व्यक्ति ने मेरा बलात्कार किया। फिर मैं जिस्मफरोशी की मंडी में फंस गई।

सुनीता दानुवर कैमरे के सामने आकर अपनी आपबीती सुनाने में हिचकिचाती नहीं हैं, बल्कि अब उन्होंने एक सामजिक संगठन बनाकर पीड़ित लड़कियों के पुनर्वास के लिए काम करना शुरू किया है। वो कहती हैं कि ये काम भी इतना आसान नहीं है। वो बताती हैं, शुरू में हमने पीड़ितों को प्रशिक्षण देना शुरू किया ताकि वो बाहर जाकर नौकरी कर सकें और अपनी आजीविका चला सकें। ऐसा हुआ भी लेकिन जब लोगों को पता चला कि ये लड़कियां तस्करी का शिकार हुई थीं तो वो फायदा उठाने की कोशिश करने लगे।

अब हम यहीं पर इनके लिए रोजगार के मौके बढ़ाने की कोशिश पर काम कर रहे हैं। मगर नेपाल में संसाधनों की कमी है, इसलिए इन पीड़ितों को और भी ज्यादा संघर्ष करना पड़ रहा है।

हालांकि, कुछ एक सामाजिक संगठन इन पीड़ितों को सामान्य ज़िन्दगी में वापस लाने का प्रयास कर रहे हैं, मगर जिस्मफरोशी की मंडियों में बेची गईं इन नेपाली लड़कियों की आत्मा पर लगे घाव उन्हें हमेशा तकलीफ देते रहेंगे।

शाहरुख़ पर लगा चोरी का आरोप, उठाया ऐसा क़दम कि बन गए ज़ीरो से हीरो

शाहरुख़ ख़ान को बातों का बाज़ीगर यूं ही नहीं कहा जाता। अपनी वाकपटुता से विपरीत परिस्थियों में भी जीतकर बाहर आने का हुनर उनसे सीखना चाहिए। ज़ीरो कैसे हीरो बनता है, ये कहानी भी शाहरुख़ सिखाते हैं। हाल ही में किंग ख़ान पर साहित्यिक चोरी का इल्ज़ाम लगा, जिसको लेकर सोशल मीडिया में उनकी जमकर खिंचाई हुई, मगर सीनाज़ोरी दिखाने की बजाय उन्होंने उभरते हुए लेखक को उसकी पंक्तियों के लिए शुक्रिया अदा करके बाज़ी अपने नाम कर ली।

क़िस्सा पहली जनवरी को शुरू हुआ, जब शाहरुख़ ने अपनी नई फ़िल्म ज़ीरो का फ़र्स्ट लुक और टाइटल ट्विटर पर फ़ैंस के साथ साझा किया। फ़र्स्ट लुक आते ही छा गया और देखते ही देखते इसे 3.2 करोज़ व्यूज़ मिल गए। शाहरुख़ ने फैंस का शुक्रिया अदा करने में कोई देरी नहीं की और ट्विटर पर सबका धन्यवाद किया। मगर, इस शानदार उपलब्धि को आलोचनाओं का ग्रहण तब लगा, जब उन पर साहित्यिक चोरी का सनसनीखेज़ आरोप लगा। ज़ीरो में शाहरुख़ के बौने लुक को जितनी तारीफ़ें मिलीं, उतनी ही आलोचना इस चोरी करने के लिए भी की गयी। किंग ख़ान ने फ़र्स्ट लुक के साथ अपने स्टेटस में कुछ पंक्तियां हिंदी में लिखीं। ये लाइंस थीं- ”टिकटें लिए बैठें हैं लोग मेरी ज़िंदगी की, तमाशा भी पूरा होना चाहिए

इन पंक्तियों को पढ़ने वाले वाह-वाह कर उठे, मगर सोशल मीडिया के दौर में चोरी पकड़ने में देर नहीं लगती। इस ट्वीट के जवाब में कुछ फॉलोअर्स ने लिखा कि दरअसल ये पंक्तियां मिथिलेश बारिया नाम के लेखक की हैं, जो ट्विटर पर भी मौजूद हैं। बस फिर क्या था, यूज़र्स शाहरुख़ के पीछे पड़ गए और असली लेखक को क्रेडिट ना देने के लिए उन्हें ट्रोल करने लगे।

शाहरुख़ एक-दो दिन तक ख़ामोश रहे, मगर शनिवार 6 जनवरी को उन्होंने भूल सुधार किया। लेखक की पुस्तक का फोटो शेयर करके उन्होंने संदेश लिखा कि उनकी किताब उन्हें बहुत अच्छी लगी। साथ ही ये भी जता दिया कि वो इतना अच्छा लिखते हैं कि सोशल मीडिया में शेयर हो जाता है। शाह रुख़ ने टिकट वाली पंक्तियों के लिए मिथिलेश का शुक्रिया भी अदा किया। शाहरुख़ के संदेश को पढ़कर ऐसा महसूस होता है, जैसे लेखक ने अपनी किताब भेजकर उन्हें चोरी के बारे में आगाह किया हो, जिसके बाद शाहरुख़ ने लेखक को क्रेडिट दिया।

बहुत बहुत धन्यवाद। आपकी किताब मिली और पढ़कर बहुत अच्छा लगा। सोशल मीडिया पर आपने साबित कर दिया की हर जगह पर अच्छी बातें ही पसंद आती हैं। और “टिक्केटें लिये…” वाली पंक्तियों के लिए भी शुक्रिया ।

बता दें कि आनंद एल राय निर्देशित फ़िल्म इसी साल दिसंबर में रिलीज़ हो रही है। कटरीना कैफ़ और अनुष्का शर्मा फ़ीमेल लीड में हैं। शाह रुख़ मेरठ के बौने के रोल में हैं, जो बड़े-बड़े सपने देखता है। फ़िल्म के टाइटल को लेकर काफ़ी सस्पेंस रहा था, जिसे किंग ख़ान ने 1 जनवरी को खोला।

रंगमंच पर दोहरा संघर्ष कर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं स्त्रियाँ

रंगमंच की दुनिया में कुछ लोग होते हैं जो नाटक करते हैं और कुछ होते हैं जो नाटकों को जीते हैं। लिटिल थेस्पियन की सह संस्थापक और निदेशक उमा झुनझुनवाला और अजहर आलम की जोड़ी ऐसी ही जोड़ी है। लिटिल थेस्पियन 23 साल पूरे कर चुकी है…देश भर में प्रशंसित और पुरस्कृत हो चुकी है…और हिन्दी का पहले थियेटर फेस्टिवल करने का श्रेय भी संस्था को जाता है। हाल ही में नीलांबर के लिटरेरिया में लिटिल थेस्पियन को रवि दवे स्मृति सम्मान प्रदान किया गया। नाटकों को उपेक्षित करते आ रहे हिन्दी प्रदेश में नाट्यकर्मी उमा झुनझुनवाला ने नाटकों न सिर्फ प्रतिष्ठित किया बल्कि नयी पीढ़ी और खासकर लड़कियों को इस विधा से जुड़ने का आत्मविश्वास दिया। आगामी 3 नवम्बर से लिटिल थेस्पियन जश्न ए रंग 2017 का वृहद आयोजन करने जा रहा है…। नाटकों का उत्सव जब सजने वाला है तो नाटकों पर बात होनी ही है…तो अपराजिता से लिटिल थेस्पियन की सह संस्थापक व निदेशक उमा झुनझुनवाला ने साझा की ढेर सारी बातें नाटकों, उसके इतिहास और नाटकों में स्त्री पर। पेश हैं कुछ अंश

“किसी भी क्षेत्र में स्त्रियों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है” – कह देने मात्र से ही बात पूरी नहीं हो जाती हैl अभी चारों तरफ इसी तरह की बातें लिखी और कही जा रही हैं कि २१वी सदी महिलाओं के बहुआयामी प्रतिभाओं की सदी है, जागरूकता और दावेदारी की सदी है। समाज, राजनीति और कला सहित जीवन का कोई भी क्षेत्र महिलाओं की इस दावेदारी से अछूता नहीं है।

व्यक्तिगत तौर पर मैं लिंग-भेद के दृष्टिकोण से किसी भी विषय या चर्चा की पक्षधर नहीं हूँ…लेकिन उसके बावजूद एक स्त्री होने के नाते किसी भी सृजन की प्रसव पीड़ा से ठीक उसी तरह अवगत हूँ जैसे एक माँ होती है। उस पीड़ा को पुरुष समाज अलग अलग धरातल पर काव्यात्मक ढंग से महसूस कर उसे वर्णित तो कर सकता है किन्तु हर औरत के लिए उस पीड़ा की अनुभूति सामान्य तौर एक जैसी ही होती है – उदहारण स्वरुप किसी औरत या लड़की का नाटक करने जाना ही उसके पिता/पति के परिवारवालों के लिए स्वीकार्य नहीं हो पाता है कि मंच पर जाकर लोगो के सामने अभिनय करना, नाचना गाना वगैरह वगैरह अधर्म होता है, किसी तरह जाने की स्वीकृति मिल जाए तो और दूसरे पचासों सवाल सुरसा राक्षसी की तरह मुंह बाये खड़ी रहती हैं – मसलन- डायरेक्टर कौन है, रोल क्या है, समय पर घर आ जाना, आज देर क्यों हो गयी, फलाने एक्टर के साथ किस तरह का दृश्य है, रोज़ रोज़ जाना ज़रूरी है क्या ?

और अगर शादीशुदा है तो – घर की सारी जिम्मेदारियां तय वक़्त पर ही पूरी होनी चाहिए, रात को देर से आओगी तो खाना कैसे बनेगा, बच्चों की पढाई का कौन ध्यान रखेगा, फलाने मर्द के साथ क्यों आई, दृश्य में दूरी बना के रखो, फलाने के साथ तुम्हारा क्या सम्बन्ध है, आदि आदिl उफ्फ्फ ये सारे सवाल सिर्फ स्त्रियों के लिए ही होते हैं इसलिए इनका संघर्ष दोहरा होता है – इन सारे सवालों की जवाबदेही के साथ साथ रंगमंच पर अपने हस्ताक्षर को दर्ज कराना मामूली बात नहीं हो सकती l ऐसा नहीं है कि ऐसी परिस्थिति का सामना हर स्त्री शब्द को करना पड़ता है; लेकिन अपनी मर्ज़ी के काम में रजामंदी के मोहर की आवश्यकता मुझे लगता है हर किसी को पड़ ही जाती है l खैर समय के साथ ये सवाल उठने लगा था कि वर्तमान परिस्थितियों में परिवर्तन लाये बिना समाज का विकास संभव नहीं और इसके लिए औरतों को भी समाज की संपूर्ण कलात्मक गतिविधियों में हिस्सा लेने की पूरी स्वाधीनता होनी चाहिए l

अपितु, परिवर्तित सामाजिक ढाँचे की विषमताओं और जटिलताओं के चलते कला की अन्य विधाओं की अपेक्षा रंगमंच में स्वयं को घोषित करना निस्संदेह असाधारण कार्य है परन्तु असंभव कतई नहीं और इसलिए ये सूची भी मामूली नहीं जहाँ महिला रंगकर्मियों की एक लम्बी कतार है –जोहरा सहगल, कुदसिया जैदी, शांता गाँधी,  रशीद जहाँ, शीला भाटिया, दीना पाठक, अंजला महर्षि, अनामिका हक्सर, प्रतिभा अग्रवाल, लक्ष्मी चन्द्रा, कपिला मलिक वात्स्यायन, क्षमा आहूजा, नीलम मानसिंह, रानी बलबीर कौर, बी. जयश्री, अरुंधती राजे, एस. मालती, सौम्य वर्मा, नादिरा बब्बर, जे. शैलजा, अमाल अल्लाना, अनुराधा कपूर, गिरीश रस्तोगी, कीर्ति जैन, तृप्ति मित्रा, उषा गांगुली, त्रिपुरारी शर्मा, मंजू जोशी, कुसुम हैदर, विजया मेहता, माया कृष्ण राव, शबनम हाशमी, अरुंधती नाग, कविता नागपाल, रेखा जैन, सांवली मित्र, अमला राय, उषा बनर्जी, उमा सहाय, नंदिता दास, उत्तरा बावकार, चेतना जालान, रेखा जैन, भागीरथी, विभारानी (और आप लोग चाहें तो मेरा भी नाम दर्ज कर सकते हैं इसमें उमा झुनझुनवाला)

१९वीं सदी के अंतिम दशकों में पारसी थियेटर का बोलबाला अपने चरम पर था l मूनलाइट, मिनर्वा आदि थियटरों में व्यावसायिक दृष्टिकोण से एक के बाद एक सफल नाटकों की प्रस्तुतियाँ होती रहीं l इनका मूल उद्देश्य दर्शकों का सतही तौर पर मनोरंजन करके पैसा कमाना था l १९३०-३४ तक इसका असर बड़ा व्यापक रहा l लेकिन ये काल आन्दोलनों और क्रांतियों का काल था l देश की आज़ादी के साथ साथ समाज में व्याप्त जड़ता के ख़िलाफ़ तथा पारसी थिएटर की फूहड़ प्रस्तुतियों स व्याकुल होकर साहित्यकारों की कलम ने काम करना शुरू किया l फलस्वरूप हर स्तर पर नवजागरण की लहर ने लोगो की विचारधारा में एक सशक्त परिवर्तन लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई l नवजागरण काल के लेखकों में एक विशेष लक्षण दृष्टिगोचर होती है  इनका विस्तार एक साथ कई कई विधाओं में था l साहित्य को कला का ही अभिन्न अंग मानते हुए इनलोगों ने ऐसे नाटकों के मंचन पर विशेष बल दिया जिनका साहित्यिक महत्व हो और सुसंस्कृत विचारों की स्थापना में सक्षम हों l प्रभावस्वरूप इन नाटकों ने पारसी नाटकों की अतिरंजना के प्रभाव को धूमिल करना शुरू कर दिया जो लोगो को उनके वास्तविक जीवन से नहीं जोड़ पा रही थी l  इनमे भारतेंदु हरिश्चंद्र, बालकृष्ण भट्ट, पंडित माधव शुक्ल आदि प्रमुख थे l इनका मानना था साहित्य की समझ के लिए समाज का शिक्षित हों ज़रूरी है क्योंकि शिक्षा मनुष्य को विचारवान बनती है और निम्न कोटि के साहित्य के रसापान से रोकती है l इनलोगों ने अंग्रेजों के ख़िलाफ़ नाटक को एक सशक्त हथियार बनाया और देशप्रेम से ओतप्रोत नाटक खेले l इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु १९०६ में हिंदी नाट्य समिति की स्थापना हुई और मुंशी भृगुनाथ के नेतृत्व में भारतेंदु हरिश्चंद्र ने नीलदेवी और राधेश्याम ने कथावाचक का वीर अभिमन्यु जैसे सामाजिक विषयों पर नाटक खेलना शुरू किया और हिंदी रंगमंच को पारसी बालाओं की जुल्फों और पतली कमर से बाहर निकाल कर दर्शकों को भारतीय संस्कृति और सभ्यता पर आधारित जीवन मूल्यों के प्रति सचेत होने की प्रेरणा दीl सत्य विजय, पांडव विजय, भारत रमणी, सती पद्मनी, सम्राट परीक्षित, स्कूल की लड़की आदि नाटकों के मंचन के माध्यम से सामाजिक जागरूकता को सस्जक्त बनाया l इन नाटकों से तत्कालीन समाज के स्वरुप को भलीभांति समझा जा सकता है l

दूसरे दशक में पंडित माधव शुक्ल और भोलानाथ बर्मन के द्वारा हिंदी नाट्य परिषद् की स्थापना हुई l गाँधीजी के आन्दोलनों का प्रभाव हर तरफ था; साहित्य भी इससे अछूता नहीं था, कला पर भी इन आंदोलनों का प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता था l बंगाल क्रांतिकारी गतिविधियों में अग्रणी रहा है l कलकत्ता का साहित्य सृजन, कला सृजन, रंगकर्म आदि गतिविधियाँ राष्ट्रीय नवजागरण में अदभुत सक्रिय भूमिका का निर्वहन कर रहा था l देशभक्ति से ओतप्रोत नाटकों को अंग्रेज़ सरकार प्रतिबंधित करने लगी तो इन रंगकर्मियों ने नाटकों के नाम बदल कर से खेलना शुरू कर दिया l इस कड़ी में महाराणा प्रताप, महाभारत, विश्वप्रेम, चन्द्रगुप्त, नूरजहाँ, शाहजहाँ, महात्मा ईसा आदि नाटक खेले गए l इस तरह रंगमंच पर देशप्रेम की धारा बहने लगी l इस बीच में और भी कई नाट्य संस्थाएँ अस्तित्व में आईं l लेकिन १९४७ में तरुण संघ की स्थापना ने रंगमच में स्त्रियों की भागेदारी को महत्वपूर्ण बनाया l भंवरमल सिंघी, श्यामानंद जालान, विमल लाठ आदि महत्वपूर्ण लोगो के साथ सुशीला भंडारी, सुशीला सिंघी और प्रतिभा अग्रवाल ने रंगमंच की बागडोर संभाली l बाल विवाह, विधवा विवाह, पर्दा-प्रथा, फूहड़ नाचगान, शादी-विवाह पर होने वाली फिजूलखर्ची, दिखावाबाज़ी, आडम्बर आदि पर खुलकर नाटक लिखे गए और मंचित भी हुए l ये प्रस्तुतियां बड़ी सफल और सार्थक साबित हुईं l

१९५५ में अनामिका की स्थापना एक नई ऊर्जा साबित हुई– अनुवादों की श्रृंखला में नाट्य शोध की संस्थापक प्रतिभा अग्रवाल का नाम भी अग्रणी है. १९३० में इनका जन्म हुआ था. मारवाड़ी समाज की किसी महिला का अभिनय में आना ही उस वक़्त के लिहाज से बहुत बड़ी क्रांति थी l प्रतिभा जी ने कलकत्ता के हिंदी रंगमंच को राष्ट्रीय स्तर पर जो पहचान दिलाई वो अतुलनीय है l अनामिका द्वारा साहित्यिक नाटकों की प्रस्तुतियाँ जनमानस की रुचियों का शुद्धिकरण के साथ लोगो में साहित्य के पठन पाठन के चलन को बढ़ाया l प्रतिभा जी के अनुवादों ने भाषाओँ के मध्य सेतु का काम किया और विभिन्न साहित्य के नए नए आस्वादों से दर्शकों को परिचित कराया l प्रतिभा जी के नेतृत्व में हम हिन्दुस्तानी, जनता का शत्रु, आषाढ़ का एक दिन, पाटलिपुत्र के खँडहर में, अंजो दीदी, घर-बाहर, छलावा, छपते छपते, मादा कैक्टस, लहरों के राजहंस, शुतुरमुर्ग, आधे-अधूरे, एवम इन्द्रजीत, पगला घोड़ा, हयवदन आदि पचास से भी अधिक नाटक हैं जो कलकत्ता के हिंदी रंगमंच के इतिहास में विशेष महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय हैं l प्रतिभा अग्रवाल कलकत्ता के हिंदी रंगमंच का एक स्वर्णिम नाम है l

उन्नीसवीं सदी के चौथे दशक में किसानों, लेखकों, छात्रों, मजदूरों के अनेक संगठन बने जिन्होंने जन आंदोलनों को नया मोड़ दिया. 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के बाद और बंगाल कल्चरल स्क्वायड, मुंबई का कल्चरल स्कावड, बैग्लोर की सांस्कृतिक इकाई की सफ़लता के बाद एक राष्ट्रीय मंच की आवश्यक्ता की पुर्ति के लिये इप्टा का 25 मई 1943 को गठन हुआ. ब्रिटिश साम्राज्य, अन्तर्राष्ट्रीय फ़ासीवाद और भारतीय सामंतवाद के खिलाफ़ संघर्ष में आम जनता के वैचारिक पहलुओं को दिशा देने के लिये प्रदर्शनकारी कला के प्रयोजन के महत्त्व को समझा गया. इप्टा ने गीत, संगीत, नृत्यरचना आदि के द्वारा समय के यथार्थ को प्रदर्शनकारी रूपों में व्यक्त करने की जरूरत बताई. लेखक, कलाकार, नर्तक, अभिनेता इसमें शामिल हुए. विभिन्न भारतीय भाषाओं में इसकी शाखाएं बनी. नुक्कड़ नाटकों का दौर शुरू हुआ… बंगाल में हिंदी में नुक्कड़ नाटक को एक आन्दोलन के तौर पर महेश जायसवाल ने लिया और लगातार लिखते और करते रहे l उषा गांगुली ने भी नुक्कड़ नाटको को महत्व दिया था और कई प्रस्तुतियां की l मैंने भी कई नुक्कड़ नाटक लिखे और उनकी हज़ार से ऊपर प्रस्तुतियां की हैं l नवजागरण युग के प्रभाव की तरह इप्टा के जन्म ने नाटकों को एक नई दिशा दी l रंगमंच से जुड़ा हर व्यक्ति किसी न किसी रूप से इप्टा और इप्टा के आंदोलनों से जुड़ने लगा था l फलस्वरूप रंगकर्म को एक नया कैनवास मिला लोगो के बीच में उनका होकर उनकी समस्याओं को लेकर उनके बीच पहुँचने के लिए l

१९४४ में जन्मी उषा गांगुली ने १९७६ में रंगकर्मी की स्थापना कर प्रगतिशील नाटकों के साथ कलकत्ता के हिंदी रंगमंच पर अपनी धूम मचा दी l सत्तर के बाद बंगाल में मार्क्सवाद और समाजवाद ने ज़ोर पकड़ना शुरू किया l चाहे बंगाली समाज या हिंदी समाज, पूरा बंगाल इसके प्रभाव में डूबा हुआ था l

समाजवाद और मार्क्सवाद लोगो के जीवन का एक अहम् हिस्सा हो गया था l सारा साहित्य और रंगमच मार्क्समयी हो गया था l गण-नाट्य का प्रभाव बहुत ही जन व्यापी था l इस तरह बंगाली समाज या यूँ कहूँ कि मार्क्सवाद में डूबा बंगाली समाज पहली बार हिंदी रंगमंच के लिए बहुत बड़ा दर्शक वर्ग बन कर उभरा l

दूसरे आरंभिक दिनों में रंगकर्मी के नाटकों में साहित्यिक नाटकों की भाषा की गूढता और जटिलता भी नहीं थी l इसलिए बंगाली दर्शकों ने इसे बड़े ही सहज रूप से लिया l महाभोज, लोक कथा, होली, रुदाली, शोभा यात्रा, कोर्ट मार्शल, हिम्मत माई, सरहद पार मंटो, काशीनामा, भोर, चंडालिका आदि नाटकों की सफल प्रस्तुतियों से उषा गांगुली एक मजबूत हस्ताक्षर हैं भारतीय हिंदी रंगमंच में l

1972 में श्यामानन्द जालान ने अनामिका से अलग हटकर पदातिक की स्थापना की l चेतना जालान (१९४७) ने श्यामानंद के निर्देशन में लहरों के राजहंस में अलका की भूमिका करके एक संवेदनशील कलाकार के रूप में अपनी पहचान बनाई और इसक बाद एवम इन्द्रजीत में मौसी और मानसी के द्वैत भूमिका में अभिनय करके अपनी कुशलता का लौहा मनवा लिया l इतना ही नहीं विजय तेंदुलकर के गीधाड़े और सखाराम बाइंडर में चंपा के अभिनय में उन्होंने अपने साहसिक कलाकार होने का भी परिचय दिया l

1994 में मैंने और अज़हर ने लिटिल थेस्पियन की स्थापना की थी l लेकिन ये दौर किसी आंदोलनों का दौर नहीं था l थोड़ी बहुत राजनीतिक उठापटक के अलावा समाज एक सीधी रेखा पर ही चल रहा था l लेकिन टीवी सीरियलों का कुप्रभाव नज़र आने लगा था l सन 2000 के बाद तो हमने छात्र वर्ग के मध्य से साहित्यिक संगोष्ठियों के चलन का खात्मा भी देखा l हिंदी भाषियों में नाटक और रंगमंच अतीत की गाथा में सीमित हो कर रह गया था l लेकिन लिटिल थेस्पियन की साहित्यिक और सामाजिक सरोकारों से जुड़े नाटकों की लगातार प्रस्तुतियों ने हिंदी दर्शकों को एक बार फिर नया आस्वाद देने में सफलता हासिल की l

रेंगती परछाइयाँ (मेरे द्वारा लिखित), कबीरा खड़ा बाज़ार में, अलका, गैंडा, पतझड़, लोहार, बड़े भाईसाहब, प्रश्नचिह्न, यादों के बुझे हुए सवेरे, हयवदन, शुतुरमुर्ग, कांच के खिलौने आदि 30 से अधिक नाटक और कथा-कोलाज के अंतर्गत ३२ कहानियों की प्रस्तुतियों ने दर्शकों को ये कहने पर मजबूर किया है कि इन प्रस्तुतियों की बात कुछ अलग है l

इसके अलावा मैंने भारत सरकार के जूनियर फेल्लोशिप के अंतर्गत मैंने कोलकाता में कहानियों के मंचन पर कई स्तरों पे काम किया है l कहानियों में कोई बदलाव किये बगैर उनका मंचन दर्शकों के लिए एक अद्भुत अनुभूति साबित हुयी l चूँकि अनुवाद भी मेरा क्षेत्र है, अंग्रेजी, उर्दू और बांगला से कई नाटकों का अनुवाद किया है मैंने जिनका अलग अलग नाट्य निर्देशकों द्वारा मंचन भी हुआ है l

डॉली बासु मूलतः बंगला नाटकों में और रमनजीत कौर अंग्रेजी नाटकों में एक सशक्त हस्ताक्षर हैं लेकिन इन्होने हिंदी नाटको को भी मंचित कर हिंदी नाटको के विकास में अहम भूमिका निभाई हैं l निर्देशन के अलावा अभिनय के क्षेत्र में भी कलकत्ता का स्त्रीवर्ग अग्रणी रहा है l यामा सराफ, संचिता भट्टाचार्य, उमा जयसवाल, अनुभवा फतेहपुरिया, श्राबोनी राय, सेंजुती मुखोपाध्याय, शुभ्रा खेतान अग्रवाल, हीना परवेज़, अर्पिता बोस, अनीता दास, चंद्रेयी दत्ता मित्रा, आरज़ू सज्जाद, अंजना मंडल कई नाम हैं जिन्होंने कलकत्ता के रंगकर्म को अतुलनीय बनाया है l

रंगमंच में स्त्रियों की भूमिका पर बात हो और बंगाल की उस अदाकारा का नाम ना लिया जाए तो पूरी बात अधूरी रह जायेगी। मेरा इशारा नटी विनोदिनी की तरफ है जिसे एक महत्वपूर्ण चरित्र  के रूप में हर महिला अभिनेत्री ज़रूर खेलती हैं  नटी विनोदिनी सिर्फ बंगाल की ही अभिनेत्री नहीं थी बल्कि संपूर्ण भारतीय रंगमंच की एक महान कलाकार थीं. विनोदिनी ने अपनी आत्म-कथा “आमार कथा” में अपने संघर्ष की कथा को कुछ इस तरह वर्णित किया है – “वारांगनाओं का जीवन कलंकित और घृणित होता है, लेकिन वह घृणित और कलंकित क्यों होता है? माँ के गर्भ से ही तो पतिता नहीं होती, अपने जन्म के लिए वो तो दोषी नहीं होती, सोचना चाहिए की किसने सबसे पहले उसका जीवन घृणा योग्य बनाया?

यह संभव कि कुछ स्त्रियाँ स्वेच्छा से अँधेरे में डूब कर नरक के रास्ते चलती हैं, लेकिन ज़्यादातर पुरुषों के छल कपट का शिकार बन कलंक का बोझ सर पे लादे नरक यंत्रणा सहती हैं ऐसी स्त्रियाँ ही जानती हैं कि वारांगनाओं का जीवन कितना असहनीय होता है? विनोदिनी की ये पंक्क्तियाँ उनके साथ हुई सारी ज़्यादतियों का खुलासा ही करती हैं l

कलकत्ता में रंगमंच के सफ़र को सौ साल से भी ज़्यादा हो चुके हैं और इस बात में कोई संदेह नहीं कि हिंदी रंगमंच में स्त्रियों की एक सुदृढ़ परंपरा रही है जिन्होंने एक से बढ़ कर एक नए नए प्रयोग  किये हैं l परन्तु महिलाओं का काम संगठित होने की बजाय कुछेक टोलियों में बंट कर रह गया l

वर्तमान समय में हम आदर्शवाद और यथार्थवाद के मध्य के संघर्ष को नए रूप में देख रहें हैं l फलस्वरूप नाटकों के प्रति रूचि उत्पन्न करने के लिए विभिन्न स्तरों पर दर्शकों के लिए सेमिनारों, संगोष्ठियों और वर्कशॉप के आयोजन की आवश्यकता है और ये ज़िम्मेदारी सभी सांस्कृतिक संस्थाओं की भी है ताकि सिर्फ़ स्त्रियों की ही नहीं बल्कि पुरुषों की भी भागीदारी रंगमंच में सशक्त रूप में हो l

मौलिक हिन्दी नाटक कम लिखे जाते हैं। आम तौर पर साहित्यकार साहित्य की अन्य विधाओं पर ही अपना समय देना पसंद करते हैं। नाटक लिखने में बहुत उत्साहजनक रुचि नहीं दिखाई देती। नतीजतन रंगकर्मियों को अक्सर अनूदित नाटकों का सहारा लेना पड़ता है। या फिर स्क्रिप्ट चयन में समझौता करना पड़ता है।

अंत में मैं यही कह कर अपनी बात समाप्त करती हूँ कि रंगमंच पर स्त्री का लक्ष्य कला के विभिन्न पहलुओं के लिए, दर्शकों और जनता के लिए और स्वयं उसके लिए एक महान और विशिष्ट स्थान रखता है और इसलिए स्त्रियों ने रंगमंच को मानवता के हित में समृद्ध किया है l जीवन के अन्य क्षेत्रों की तरह रंगमंच में भी ऐसी अनेक स्त्रियाँ मौजूद हैं जिनपर हम गर्व कर सकते हैं l

जब स्वामी विवेकानंद ने भूखे रहकर बच्चों को दे दी रोटियाँ

स्वामी विवेकानंद के जीवन से जुड़ी घटनाएं प्रेरक प्रसंगों के रूप में भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी पढ़ी-सुनी जाती हैं। ऐसा ही एक प्रेरक वाकया है, जिसमें उन्होंने स्वयं भूखे होने के बावजूद अपनी सारी रोटियां बच्चों में बांट दी।

किस्सा कुछ यूं है कि एक बार स्वामी जी अमेरिका गए। वहां वे अक्सर लंबी यात्राएं करते और अलग-अलग शहरों में भारत की महान संस्कृति और सनातन धर्म के बारे में व्याख्यान देते। लोग दूर-दूर से उन्हें सुनने आते और जब

लौटते तो धर्म और अध्यात्म के नजरिए से तृप्त होकर लौटते। ऐसे ही एक बार व्याख्यान के बाद स्वामी जी घर लौटे। तब वे अमेरिका में एक महिला के घर पर ठहरे थे। वे अपना भोजन खुद बनाते थे।

उस दिन सुबह से शाम तक भूखे ही व्याख्यान देकर स्वामी जी ने घर लौटकर बहुत यत्नपूर्वक भोजन बनाया। उस दिन उन्होंने अपनी रोजाना की मात्रा से कुछ ज्यादा ही रोटियां बनाईं। भोजन बनाकर, भगवान को भोग लगाकर, जैसे ही वे भोजन करने बैठे, कुछ बच्चों का झुंड उनके पास आ गया। वैसे भी अक्सर बच्चे उनके पास आ जाया करते थे। भोजन देखकर बच्चों के मुंह

में पानी आ गया और उन्होंने स्वामी जी से रोटियां मांग लीं। स्वामी जी ने भी झट से एक-एक करके रोटी सब बच्चों को दे दी। रोटियां खत्म हो गईं और स्वामी जी भूखे रह गए।

यह सारा दृश्य उस महिला ने देख लिया, जिसके घर में स्वामी जी रहते थे। उसने पूछा कि आप सुबह से भूखे हैं, फिर भी अपनी रोटियां बच्चों को क्यों दे दीं ? तब स्वामी जी ने कहा – ‘मां, ये रोटियां तो मेरे पेट की क्षुधा ही शांत कर सकती हैं, मेरे अंतर्मन की क्षुधा तो मेरे शास्त्रों और धर्म ग्रंथों ने पहले ही शांत कर दी। पेट की क्षुधा उतनी महत्वपूर्ण नहीं, जितनी अंतर्मन की!

अटल बिहारी वाजपेयी की दो कविताएँ

अटल बिहारी वाजपेयी

क़दम मिलाकर चलना होगा

बाधाएँ आती हैं आएँ

घिरें प्रलय की घोर घटाएँ,

पावों के नीचे अंगारे,

सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ,

निज हाथों में हँसते-हँसते,

आग लगाकर जलना होगा।

क़दम मिलाकर चलना होगा।

 

हास्य-रूदन में, तूफ़ानों में,

अगर असंख्यक बलिदानों में,

उद्यानों में, वीरानों में,

अपमानों में, सम्मानों में,

उन्नत मस्तक, उभरा सीना,

पीड़ाओं में पलना होगा।

क़दम मिलाकर चलना होगा।

 

उजियारे में, अंधकार में,

कल कहार में, बीच धार में,

घोर घृणा में, पूत प्यार में,

क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,

जीवन के शत-शत आकर्षक,

अरमानों को ढलना होगा।

क़दम मिलाकर चलना होगा।

 

सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ,

प्रगति चिरंतन कैसा इति अब,

सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ,

असफल, सफल समान मनोरथ,

सब कुछ देकर कुछ न मांगते,

पावस बनकर ढ़लना होगा।

क़दम मिलाकर चलना होगा।

 

कुछ काँटों से सज्जित जीवन,

प्रखर प्यार से वंचित यौवन,

नीरवता से मुखरित मधुबन,

परहित अर्पित अपना तन-मन,

जीवन को शत-शत आहुति में,

जलना होगा, गलना होगा।

क़दम मिलाकर चलना होगा।

 

हरी हरी दूब पर

ओस की बूंदे

अभी थी,

अभी नहीं हैं|

ऐसी खुशियाँ

जो हमेशा हमारा साथ दें

कभी नहीं थी,

कहीं नहीं हैं|

 

क्काँयर की कोख से

फूटा बाल सूर्य,

जब पूरब की गोद में

पाँव फैलाने लगा,

तो मेरी बगीची का

पत्ता-पत्ता जगमगाने लगा,

मैं उगते सूर्य को नमस्कार करूँ

या उसके ताप से भाप बनी,

ओस की बुँदों को ढूंढूँ?

 

सूर्य एक सत्य है

जिसे झुठलाया नहीं जा सकता

मगर ओस भी तो एक सच्चाई है

यह बात अलग है कि ओस क्षणिक है

क्यों न मैं क्षण क्षण को जिऊँ?

कण-कण मेँ बिखरे सौन्दर्य को पिऊँ?

 

सूर्य तो फिर भी उगेगा,

धूप तो फिर भी खिलेगी,

लेकिन मेरी बगीची की

हरी-हरी दूब पर,

ओस की बूंद

हर मौसम में नहीं मिलेगी|

पिकनिक का मजा बढ़ा देंगे ब्रेड स्नैक्स

ब्रेड उत्तपम

सामग्री – ब्रेड की चार स्लाइस, आधा कप सूजी, दो बड़े चम्मच मैदा, आधा कप दही, एक बारीक कटा टमाटर, एक बारीक कटी शिमला मिर्च, दो बारीक कटी, आधा कप बारीक कटा हरा धनिया, एक बड़ा चम्मच कसा अदरक, दो बारीक कटी हरी मिर्च, नमक स्वादानुसार, तेल आवश्यकतानुसार, पानी आवश्यकतानुसार

विधि – सबसे पहले ब्रेड के किनोरों को काटकर अलग निकाल लें। अब ब्रेड के सफेद हिस्से को सूजी, मैदा, पानी और दही के साथ मिक्स कर पीस लें और एक गाढ़ा पेस्ट तैयार कर लें। पेस्ट में टमाटर, शिमला मिर्च, प्याज, अदरक , हरी मिर्च और नमक मिलाएं।  मध्यम आंच में एक तवा पर थोड़ा सा तेल गरम करने के लिए रखें। तेल के गरम होते ही उत्तपम का तैयार पेस्ट डालें। एक साइड से सिक जाने के बाद इसे पलटकर दूसरे साइड से भी सुनहरा होने तक सेंक लें।  तैयार है ब्रेड उत्तपम। चटनी या टोमैटो सॉस के साथ सर्व करें।

नोट – आप चाहें तो थोड़ा सब्जियां बचाकर इसे ऊपर से भी डाल सकती हैं। उत्तपम को पलटते समय किनारों पर थोड़ा तेल लगा लें। पलटने में आसानी होगी।

ब्रेड पापड़ी चाट

सामग्री – आठ ब्रेड स्लाइस, एक छोटी कटोरी उबले हुए काबुली चने, एक छोटी कटोरी दही, दो छोटा चम्मच लाल मिर्च पाउडर, दो छोटा चम्मच जीरा पाउडर, दो छोटी चम्मच मीठी चटनी, दो छोटी चम्मच तीखी चटनी, नमक स्वादानुसार, तेल तलने के लिए, एक छोटी कटोरी नमकीन सेव, एक छोटी कटोरी बूंदी

विधि – सबसे पहले सभी ब्रेड्स को बीच में से गोलाकार शेप में काट लें। इसके बाद तेज आंच में एक पैन में तेल गरम करने के लिए रखें। तेल के गरम होते ही ब्रेड के कटे हुए पीस डालकर सुनहरा तल लें और एक प्लेट में निकालकर रख लें। एक बॉउल में दही में नमक डालकर अच्छे से फेंट लें। अब ब्रेड पर उबले काबुली चने फैलाएं। फिर उसके बाद आलू के टुकड़े रखें, दही डालें।  दही के ऊपर मीठी और तीखी चटनी डालकर लाल मिर्च पाउडर और जीरा पाउडर छिड़कें।  तैयार है ब्रेड पापड़ी चाट। नमकीन सेव और बूंदी से गार्निश सर्व कर खाएं और सर्व करें।

नोट – ब्रेड तेज आंच पर ही तलें क्योंकि ब्रेड बहुत ज्यादा तेल सोख लेती है। आप चाहें तो नमकीन सेव और बूंदियों के साथ अनार के दानों से भी गार्निश कर सकते हैं।

डब्ल्यूईएफ के वैश्विक विनिर्माण सूचकांक में भारत 30वें स्थान पर, जापान शीर्ष पर

विश्व आर्थिक मंच :डब्ल्यूईएफ: के वैश्विक विनिर्माण इंडेक्स में भारत को 30वें स्थान पर रखा गया है। इस सूची में भारत चीन से पीछे है। चीन पांचवें स्थान पर है। हालांकि, ब्रिक्स के अन्य सदस्य देशों ब्राजील, रूस और दक्षिण अफ्रीका की तुलना में भारत की रैंकिंग बेहतर है।

डब्ल्यूईएफ की भविष्य के उत्पादन की तैयारियों पर रिपोर्ट में जापान अव्वल रहा है। जापान में उत्पादन का ढांचा सबसे बेहतर आंका गया है। सूची में जापान के बाद दक्षिण कोरिया, जर्मनी, स्विट्जरलैंड, चीन, चेक गणराज्य, अमेरिका, स्वीडन, आस्ट्रिया और आयरलैंड शीर्ष दस स्थान पर हैं।

ब्रिक्स राष्ट्रों में इस सूचकांक में रूस 35वें, ब्राजील 41वें और दक्षिण अफ्रीका 45वें स्थान पर रहा है।

रिपोर्ट में आधुनिक औद्योगिक रणनीतियों के विकास का विश्लेषण किया गया है और इसमें सामूहिक कार्रवाई पर जोर दिया गया है। इसमें 100 देशों को चार समूहों में वर्गीकृत किया गया है। ये हैं…अग्रणी (मजबूत मौजूदा आधार, भविष्य के लिए उच्चस्तर की तैयारियां), बेहतर संभावना (सीमित मौजूदा आधार, भविष्य के लिये बेहतर संभावना), विरासती (मजबूत मौजूदा आधार, भविष्य में जोखिम) और उदीयमान (सीमित मौजूदा आधार, भविष्य की तैयारियां भी निचले स्तर पर) ।

भारत को इस सूची में हंगरी, मेक्सिको, फिलिपींस, रूस, थाइलैंड तथा तुर्की सहित अन्य देशों के साथ विरासत वाले वर्ग में रखा गया है। चीन अग्रणी देशों में शामिल है। जबकि ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका शुरुआती स्तर वाले वर्ग में हैं।

डब्ल्यूईएफ की यह रिपोर्ट उसकी इसी महीने दावोस, स्विट्जरलैंड में होने वाली वार्षिक बैठक से पहले आई है। डब्ल्यूईएफ ने कहा है कि इस सूची में शीर्ष 25 देशों को उत्पादन प्रणाली में होने वाले बदलावों का सबसे अधिक लाभ होगा।

भारत के बारे में डब्ल्यूईएफ ने कहा है कि यह दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है और भारत में विनिर्मित उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है। डब्ल्यूईएफ ने कहा कि पिछले तीन दशकों में भारत का विनिर्माण क्षेत्र सालाना आधार पर औसतन सात प्रतिशत बढ़ा है। विनिर्माण क्षेत्र का देश के सकल घरेलू उत्पाद :जीडीपी: में 16 से 20 प्रतिशत योगदान है।

सर्दियों में स्वेटर से बरकरार रखिए फैशन की गरमाहट

भारी-भारी वुलन कपड़ों को पहनने में बाद कहीं आप भी तो अपने स्टाइल और फैशन को नहीं भूल जाते। या फिर आपने भी मान लिया कि सर्दियों ने आपके स्टाइल स्टेटमेंट को भी जकड़ लिया है। अगर आपको भी ऐसा लगने लगा है तो इसका मतलब ‌कि आप अपनी शारीरिक बनावट के हिसाब से स्वेटर नहीं चुन पा रहे हैं, नहीं तो सर्दियां तो होती ही है स्टाइल में रहने के लिए। मतलब एक से बढ़कर एक जैकेट, स्वेटर सब कुछ पर्सनलिटी को चार चांद जो लगा देता है।

इस सर्दियों अगर आप इस हिसाब से वुलन वियर खरीदेंगे तो शर्त लगा लीजिए ये सर्दियां भी आपको स्टाइल को जकड़ नहीं पाएगी।

बटन या जिप वाले स्वेटर्स

थोड़े हेल्दी या हेवी पर्सनलिटी वाले लोगों के लिए बटनटार स्वेटर या जिपर सबसे सुरक्षित विकल्प हैं। इन्हें पहनने से उनका लुक थोड़ा सा स्लिम लगेगा। हां, थोड़ी पतली काया वाले लोग चाहें तो लूज जिपर ट्राइ कर सकते हैं जो जैकेट जैसा लुक देंगे।

सदाबहार कार्डिगन्स

पुरुष, कार्डिगन्स का समझदारी से चयन करें तो ये हर दौर में फैशनेबल व ग्रेसफुल लगेंगे। खास तौर पर खाकी ट्राउजर या कॉटराय ट्राउजर के साथ ये बेहद स्मार्ट और स्टाइलिश लुक देंगे। बहुत अच्छी पर्सनलिटी वाले लोगों के लिए ये विकल्प बेहतरीन है।

टर्टल नेक स्वेटर्स

बहुत अधिक ठंड में लंबे गले के यानी टर्टल नेक स्वेटर बहुत ज्यादा इस्तेमाल में आते हैं। ये स्वेटर बहुत अधिक पतले या लंबे गले वाले लोगों के लिए सबसे बेहतरीन विकल्प हैं। आप इन्हें किसी भी सेमीफॉर्मल जैकेट के भीतर भी ट्राइ कर सकते हैं। खासतौर पर प्लेन टर्टन लेक स्वेटर जैकेट के साथ पहनने के लिए सबसे अच्छा विकल्प है।

गोल गला या क्रयू नेक स्वेटर्स

वैसे तो गोल गले के स्वेटर्स सदाबहार होते हैं और इन्हें हर तरह की बनावट वाले लोग पहन सकते हैं फिर भी ये युवाओं पर सबसे ज्यादा फबते हैं। खासतौर पर किसी भी कैजुअल ब्लू जीन्स पर गोल गले के स्वेटर बिल्कुल कैजुअल और कंफर्टेबल लुक देते हैं। बहुत अधिक लंबे और बहुत पतले लोगों के लिए ये सबसे सुरक्षित विकल्प हैं।

सर्दियों में पुरुष रखें अपनी त्वचा का ख्याल

सर्दियों में ठंडी हवाओं की वजह से त्वचा की नमी गायब हो जाती है और त्वचा का रूखापन बढ़ जाता है। ऐसा सिर्फ महिलाओं ही नहीं बल्कि पुरुषों की त्वचा के साथ भी होता है। पुरुषों की त्वचा महिलाओं की स्किन से थोड़ी अलग होती है। इसलिए दोनों की स्किन के लिए ट्रीटमेंट भी अलग-अलग होते हैं। पुरुषों को सर्दियों के दौरान अपनी त्वचा में नमी बरकरार रखने के लिए सही ब्यूटी प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करना चाहिए जिससे त्वचा में बिना किसी तरह का नुकसान पहुंचे नमी को बरकरार रखा जा सके। तो चलिए जानते हैं कि सर्द हवाओं के बीच पुरुष अपनी त्वचा को नम कैसे रखें।

अगर आपकी त्वचा शुष्क है तो सर्दियों में इसे हाइड्रेट रखना बहुत जरूरी होता है। इसके लिए आप नेचुरल फेस मॉइश्चराइजर्सर का इस्तेमाल कर सकते हैं। नहाने के बाद और सोने से पहले दिन में दो बार मॉइश्चराइजर लगाने से त्वचा की नमी बरकरार रहती है।

सर्दियों में होंठ रूखे होकर फटने लगते हैं। ऐसे में केमिकलयुक्त लिप बाम के इस्तेमाल की जगह ऑर्गेनिक लिप बाम का इस्तेमाल करना चाहिए। दिन भर में कई बार और सोने से पहले लिप बाम लगाने से होंठ सर्दियों में भी नर्म बने रहते हैं।

सर्दियों में त्वचा की ऊपरी परत कसी हुई होती है। ऐसे में रेजर से शेविंग करने से कटने-पिटने का खतरा बढ़ जाता है। खास तौर पर अगर आपकी स्किन सेंसिटिव है तो आपको शेविंग में ज्यादा सावधानी बरतने की जरूरत होती है। सर्दियों में शेविंग के लिए इलेक्ट्रिक ट्रिमर का इस्तेमाल ज्यादा सही रहता है। इससे कटने-छिलने की आशंका कम होती है।

सन्सक्रीम का इस्तेमाल गर्मियों में सूरज की पराबैगनी किरणों से बचने के लिए किया जाता है। लेकिन सर्दियों में भी अगर आप तीस मिनट या उससे ज्यादा वक्त के लिए बाहर रहते हैं तो आपको अपनी त्वचा पर सन्सक्रीम लगा लेना चाहिए।

अल्ट्रा मॉइश्चराइजिंग हैंड लोशन सर्दियों में आपके फटे हाथों से निजात दिलाने में मदद करता है। इसके लिए एख ऐसे नेचुरल हैंड लोशन का इस्तेमाल करें जो स्किन को हाइड्रेटेड रखे और त्वचा पर कोई तैलीय परत न छोड़े।

गुलाबी गैंग के बाद अब बनीं लाल गैंग, महिलाओं की कर रहीं है मदद

शराबियों को सबक सिखाने एक साल पहले रहली क्षेत्र में बनी गुलाबी गैंग से प्रेरित होकर जिले में महिलाओं की मदद के लिए अब एक नई गैंग तैयार हुई है, नाम है लाल गैंग। इस गैंग की महिलाओं द्वारा गरीब, अनपढ़ महिलाओं की मदद के लिए कार्य किया जाता है। गैंग में फिलहाल 9 महिलाएं शामिल हैं, जो घरेलू कार्यों के साथ महिलाओं की मदद के लिए भी कार्य करती हैं।

अधिकारियों को आवेदन देकर बताती हैं समस्याएं

लाल गैंग की सदस्य सपना चौरसिया ने बताया कि हमारी गैंग में कोई अध्यक्ष, उपाध्यक्ष नहीं बल्कि सभी सदस्य हैं। हम लोग अपने-अपने क्षेत्र की महिलाओं की राशन, पेंशन, कुटीर, घरेलू हिंसा सहित अन्य कई समस्याओं का आवेदन तैयार करके अधिकारियों को अवगत कराते हैं ताकि घरों में चूल्हा फूंकने वाली इन गरीब महिलाओं को शासन की योजनाओं का लाभ मिल सके। उन्होंने कहा कि कई महिलाएं पढ़ी लिखी नहीं होने के कारण हम लोग उनका आवेदन बनाकर उनकी मदद करते हैं।

दिल्ली की मैडम देती हैं प्रशिक्षण

दल की सदस्यों का कहना है कि दिल्ली की एक माइक्रोफाइनेंस कंपनी की मैडम हम लोगों को इस संबंध में ट्रेनिंग देती हैं कि कैसे कार्य करें और महिलाओं की समस्या कैसे दूर करें। इसमें एक कानूनी सलाहकार नरेंद्र अहिरवार भी हमारी मदद करते हैं, जिसके बाद हम लोग इन महिलाओं की मदद करते हैं। इसलिए इन महिलाओं की मदद के लिए मंगलवार को हम लोग यहां इन महिलाओं को लेकर आए हैं ताकि उनकी समस्याएं दूर हो सके। दल की सदस्यों का कहना है कि टीवी और अखबारों में जिले में एक गुलाबी गैंग की खबर पढ़ी थी, जो शराब के लिए अभियान चलाती है। इस गैंग की लंबे समय से कोई गतिविधि नहीं दिखी तो हम लोग महिलाओं की मदद के लिए यह कार्य कर रहे हैं।