Saturday, October 3, 2026
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जानिए होली और होलिका दहन की कुछ बातें…

होली भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक है। इसके पीछे पौराणिक कथाएं तो हैं ही लेकिन मुख्यत: यह कृषकों का उत्सव है। रबी की फेसल के आसपास मनाया जाने वाले इस त्योहार के अर्थ बहु आयामी है और वसंत की भावनाओं के अनुरूप है। इसलिए भी होली देश का बहुत लोकप्रिय त्योहार है। यह भारतीय मूल के हिंदुओं द्वारा हर जगह मनाया जाता है, हालांकि यह मुख्य रूप से भारत और नेपाल के लोगों द्वारा मनाया जाता है।

कब मनाई जाती है?

ऐसा माना जाता है कि भद्रा काल में होलिका दहन नहीं करना चाहिए, इससे अशुभ फल की प्राप्ति होती है। 1 मार्च को शाम 7 बजे 37 मिनट पर भद्रा समाप्त हो जाएगा और इसके बाद से होलिका दहन किया जाना शुभ होगा। शास्त्रों में बताए गए नियमों के अनुसार इस साल होलिका दहन के लिए बहुत ही शुभ स्थिति बनी हुई है।

धर्मसिंधु नामक ग्रंथ के अनुसार होलिका दहन के लिए तीन चीजों का एकसाथ होना बहुत शुभ है क्क पूर्णिमा तिथि हो, प्रदोष काल हो और भद्रा न लगा हो। इस साल होलिका दहन पर ये तीनों संयोग बन रहे हैं। इसलिए होली आनंददायक रहेगी।

होली मनाने के कारण

होलिकोत्सव के पीछे पौराणिक कारण तो हैं ही, लेकिन इसका संबंध मौसम और हमारी अर्थव्यवस्था भी है। इसकी कथा हमें बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश देती है। यह ‘फगवाह” के रूप में भी जाना जाता है, क्योंकि यह हिंदू कैलेंडर के अंतिम मास फागुन में मनाया जाता है। होली ‘होला” से उन्पन्ना हुआ है। मूलत: यह ईश्वर से अच्छी फेसल पाने के लिए की जाने वाली पूजा है।

होलिका की कथा

होलिका दहन की कथा बुराई पर अच्छाई की विजय की कथा है। यह कथा प्रल्हाद की कथा है, होलिका और हिरण्यकश्यप की कथा है। प्रल्हाद ईश्वर को समर्पित एक बालक था, परंतु उसके पिता ईश्वर को नहीं मानते थे। वह बहुत दंभी, घमंडी और क्रूर राजा था। कहानी कुछ ऐसी है कि प्रल्हाद के पिता एक नास्तिक राजा थे प्रल्हाद हर समय ईश्वर का नाम जपता रहता था। इस बात से आहत होकर वह अपने पुत्र को सबक सिखाना चाहता था। उसने अपने पुत्र को समझाने के सारे प्रयास किए, किंतु प्रल्हाद में कोई परिवर्तन नहीं आया।

जब वह प्रल्हाद को नहीं बदल पाया तो उसने उसे मारने का विचार किया। इस उद्देश्य से उसने अपनी बहन की मदद ली। उनकी बहन को यह वरदान प्राप्त था कि यदि वह अपनी गोद में किसी को भी लेकर अग्नि में प्रलेश करेगी तो स्वयं उसे कुछ नहीं होगा, परंतु उसकी गोद में बैठा व्यक्ति जलकर भस्म हो जाएगा। राजा की बहन का नाम होलिका था।

होलिका ने प्रल्हाद को जलाने के लिए अपनी गोद में बैठाया था, परंतु प्रल्हाद के स्थान पर वह स्वयं जल गई और ‘हरि ऊं” का जाप करने और ईश्वर को समर्पित होने के कारण प्रहलाद की आग से रक्षा हो गई और वह सुरक्षित बाहर आ गया।

हेमाद्रि ने भविष्योत्तर से उद्धरण देकर एक और कथा कही है। युधिष्टिर ने कृष्ण से पूछा कि फागुन मास में हरेक गांव-नगर और घर में उत्सव क्यों मनाया जाता है और होलाका क्यों जलाया जाता है उसमें किस देवता की पूजा की जाती है?

इकस उत्सव का प्रचार किया जाता है? इसमें क्या होता है और यह ‘अडाडा” क्यों कहीं जाती है। इसके जवाब में कृष्ण ने एक कथा सुनाई। राजा रघु के पास लोग यह कहने गए कि ‘डोण्ढा” नामक एक राक्षसी है, जिसे शिव ने वरदान दिया है कि उसे देव, मानव आदि नहीं मार सकते हैं और न वह अस्त्र-शस्त्र या जाड़ा या गर्मी या वर्सा से मर सकती है।

किंतु शिव ने इतना कह दिया कि वह खेलते-मस्ती करते बच्चों से भयभीत रहेगी। तब पुरोहित ने मुहुर्त निकाला और कहा कि फागुन की पूर्णिमा को जब जाड़ा खन्म होगा और ग्रीष्म का आगमन होगा, तब लगो लोग हंसे और आनंद मनाएं, बच्चे सूखी पत्तियां और टहनियां इकट्ठा करें।

रक्षोघ्न मंत्रों के साथ उसमें आग लगाएं, तालियां बजाएं, अग्नि की तीन बार प्रदक्षिणा करें, आनंद मनाएं, इसी शोरगुल-अट्टहास और होम से वह राक्षसी मरेगी। जब राजा ने यह सब करवाया तो राक्षसी मर गई और वह दिन ‘अडाडा” या ‘होलिका” कहा गया।

आगे पुराण में आया कि ‘जब शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि पर पतझड़ समाप्त हो जाता है और वसंत ऋतु का प्रात: आगमने होता है तो जो व्यक्ति चंदन के लेप के साथ आम्र-मंजरी खाता है वह आनंद से रहता है।

इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि होलिका भूतकाल के बोझ का सूचक है जो प्रल्हाद की निश्छलता को जला देना चाहती थी। परंतु नारायण भक्ति की गहराई तक जुड़े हुए प्रल्हाद ने सभी पुराने संस्कारों को स्वाहा कर दिया और फिर नए रंगों के साथ आनंद का उद्गम हुआ। जीवन एक उन्सव बन जाता है।

भूतकाल को छोड़कर हम एक नई शुरुआत की तरफ बढ़ते हैं। हमारी भावनाएं आग की तरह हमें जला देती हैं, परंतु जब रंगो का फव्वारा फूटता है तब हमारे जीवन में आकर्षण आ जाता है। अज्ञानता में भावनाएं एक बोझ के समान होती है, जबकि ज्ञान में वही भावनाएं जीवन में रंग भर देती है।

सभी भावनाओं का संबंध एक रंग से होता है। जैसे कि – लाल रंग क्रोध से, हरा ईर्ष्या से, पीला पुलकित होने या प्रसन्नाता से, गुलाबी प्रेम से, नीला रंग विशालता से, श्वेत शांति से और केसरिया संतोष/त्याग और बैंगनी ज्ञान से जुड़ा हुआ है।

 

होली के रंग बिखरे जरा अलग अन्दाज में

अगर हम यह कहें कि होली में लड़कों को बहुत ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है तो शायद यह कहना गलत नहीं होगा। दरअसल, यह जरूरी है कि आपके पहनावे से लेकर आपके बर्ताव का असर पड़ता है। आमतौर पर ये माना जाता है कि ल़ड़कों को अपने गेटअप पर ध्यान देने की जरूरत नहीं है मगर यह जरूरी है कि आप खुद को बहुत ज्यादा नजरअन्दाज न करें और मामला जब होली का हो तो कुछ बातों का ध्यान तो रखना ही होगा –

अच्छी सी टीशर्ट और ट्राउजर आप पहन सकते हैं। होली खेलते समय बरमूडा या पजामा भी चलेगा मगर लुंगी भूलकर भी न पहनें वरना आपका ध्यान उसी पर रहेगा। सफेद या किसी हल्के रंग का कुरता और लाइटवेट डेनिम पहन सकते हैं।

जालीदार बनियान आपकी इमेज का कचरा कर सकती है। जितनी भी शरारत हो मगर कपड़ों में एक गरिमा आपके व्यक्तित्व में चार चाँद लगा सकती है।

बालों और शरीर पर तेल जरूर लगा लें, रंग आसानी से छूटेगा। फेसपैक, मॉश्चराइजर आपके लिए भी इतना ही जरूरी है।

 

कोल्हापुरी चप्पल या लेदर चप्पलें पहनी जा सकती हैं मगर अपने महँगे जूते पहनकर बाहर न निकलें।

किसी ने पैर पर अबीर रख दिया तो आप मना तो नहीं कर सकेंगे मगर बाद में जूतों को नया बनाना कठिन होगा।

बालों को बचाने के लिए पगड़ी, कैप या टोपी के साथ आँखों को बचाने के लिए गॉगल्स पहन सकते हैं।

चाहे तो कमर पर दुप्पटे की तरह बाँघनी का स्टोल बाँध सकते हैं। खाली बदन रंग खेलना न आपकी सेहत के लिए सही है और न ही ये शिष्टाचार के तहत आता है।

कीचड़ और बलूनमार वाली होली और केमिकल रंग आपकी होली का मजा बिगाड़ सकते हैं।

जबरन किसी को रंग लगाने की गलती न करें। किसी महिला को तो हरगिज नहीं, फिर भले ही वह आप उसे भाभी बुलाते हों। जरूरी नहीं कि वह आपको देवर मानती हो इसलिए होली के बहाने जबरदस्ती की रिश्तेदारी न बनायें।

अगर आप होली पर रंग नहीं खेलना चाहते तो विनम्रता से मना कर दें। अगर घर से नहीं निकलना चाहें तो न निकलें। अगर कोई रंग लगाना ही चाहें तो आप एक हल्का सा टीका लगवा सकते हैं।

आपका मन भी रह जायेगा और सामने वाले की बात भी रह जायेगी। मिस्टर खंडूस बने बगैर भी मना किया जा सकता है।

ससुराल जा रहे हों तो साली आधी घरवाली का फॉर्मूला बिल्कुल न अपनायें। ये नियम सस्ती किताबों में अच्छा लग सकता है मगर लड़कियाँ इसे सही नहीं मानतीं।

होली पार्टी कर रहे हैं तो अश्लील गीतों से बचें। अगर कोई महिला आपकी मित्र हुई और पार्टी में आमंत्रित है तो वह असहज तो होगी ही, आपकी छवि भी हमेशा के लिए खराब हो सकती है।

दफ्तर में होली खेलते समय या रंग लगाते समय विशेष सावधानी की जरूरत है। आप सूखे अबीर से होली खेल सकते हैं मगर एक सीमा में। शराब और भांग को किसी भी पार्टी के मेन्यू से दूर रखें। ठंडाई या शरबत इसकी जगह काफी है।

होली एक ऐसा मौका है जब वास्तव में आपके व्यवहार की परख होती है। महिलाओं को जहाँ – तहाँ और होली के नाम पर अश्लीलता की हद तक जाकर रंग लगाना आपकी नीयत को भी सामने ला देता है। मौके की नजाकत और अपनी शराफत को हमेशा बरकरार रखें…..होली की खूबसूरती आपके अन्दाज में नजर आयेगी।

 

 

होली मनाइए रंगीले और सजीले अन्दाज में

रंगों के मौसम में रंगों से भला कोई कैसे बच सकता है मगर रंगों के साथ अपनी खूबसूरती का ख्याल रखना भी बहुत जरूरी है और हमारा पूरा लुक हमारे अन्दाज पर निर्भर करता है। होली की मस्ती का रंग जरूर चढ़ाइए कि मगर थोड़ी तैयारी के साथ और इस तरह कि होली के बाद भी अपना खूबसूरत अंदाज बरकरार रखें।

ये सही है कि होली में सफेद रंग पर हर रंग खिलता है। अगर आप सफेद रंग पहनना चाहती हैं तो जरूर पहनिए मगर कुछ अलग करने का मन है तो थोड़े खिले – खिले रंग पहनकर देखिए। पीला, हरा, गुलाबी, नीले रंग और ढेर सारे पेस्टल शेड्स…और दिखिए थोड़ी सी अलग। सफेद रंग पहनना है तो बाँधनी या रंगे – बिरंगे दुप्पटे,स्टोल या जैकेट के साथ पहन सकती हैं।

होली में धमाल मचाना है तो थोड़ी आजादी और बेफिक्री तो जरूरी है और हर दो मिनट के बाद आप अपना दुप्पटा सम्भालती रहेंगी या स्लीव्स को गिरने से बचाती रहेंगी तो धमाल कैसे मचाएंगी? तो पारदर्शी और तंग कपड़ों को न कह दीजिए…इसके बाद आप पलाजो पहनिए या ट्राउजर या पटियाला आपकी मर्जी। भारी कपड़े न पहनें क्योंकि बाद में तो सम्भालना भी आपको है और धोना भी आपको है…तो भारी – भरकम डेनिम पहनकर होली खेलना अच्छा आइडिया नहीं है क्योंकि भीगने से बचने के लिए भागना भी पड़ता है।
फ्लोरल प्रिंट पहन सकती हैं और हल्के रंगों में फ्लोरल प्रिंट बहुत अच्छे लगते हैं। आजमाकर देख लीजिए।

होली में खुले बाल रखना समझदारी नहीं है…बेहतर है कि बालों में तेल लगा लें और पोनीटेल बना लें। चोटी भी कर सकती हैं….बाल बचे रहेंगे और तेल लगा रहेगा तो बाद में बाल धोने में भी सुविधा होगी। हिल पहनने की गलती न करें….भागने पर पैर टूटने का डर रहेगा। न्यूड कलर के फुटवेयर होली के रंग से जल्दी गंदे हो जाते हैं। गहरे रंग के फ्लैट्स पहनें और यह निश्चित करें कि पानी में चप्पल फिसले नहीं। टाँगें बचाने के लिए चप्पल की सोल पर ध्यान देना जरूरी है।

नेलपॉलिश लगा लें। इससे रंग आपके नाखूनों के अंदर नहीं जायेगा। आप होली नेल आर्ट डिजाइन अपने नाखूनों पर बना सकती हैं। बेस कोट के अलावा आप अलग-अलग रंगों के साथ अपने नाखूनों को सजा सकती हैं। होली खेलते समय मेकअप से परहेज रखें…ये हमारा सुझाव है क्योंकि रंगों से पोते जाने के बाद चेहरे पर कुछ नहीं दिखने वाला। चेहरे पर अच्छी सी क्रीम लगा लें। रंग खेलने के बाद अच्छा फेसपैक लगाना न भूलें। वैसे भी हर दिन तो मेकअप करना ही है….एक दिन ऐसे दिखें जो आप हैं…..। तो मनाइए होली…..जमकर सजीले अन्दाज में।

 

पति और बेटियों का सहारा बनकर प्रतिमा ने थामी बस की स्टीयरिंग

पेशेवर ड्राइविंग एक ऐसा ही काम है जिसके बारे में समाज सोचता है कि यह तो पुरुषों का काम है। लेकिन कोलकाता में इस बंधन को तोड़कर प्रतिमा पोद्दार इस मानसिकता को करारा जवाब दे रही हैं। 42 वर्षीय प्रतिमा कोलकाता की इकलौती महिला बस ड्राइवर हैं। वह निमता – हावड़ा पर रोजाना दो-तीन चक्कर लगाती हैं। कोलकाता शहर में रोज कई सारी दुर्घटनाएं होती रहती हैं। खासतौर पर बस से तो रोज टक्कर होती है। लेकिन पिछले 6 सालों से बस चला रहीं प्रतिमा से आज तक एक भी एक्सिडेंट नहीं हुआ।

प्रतिमा के पति शिबेश्वर भी पहले ड्राइवर थे लेकिन एक हादसे के बाद वह बस चलाने में असमर्थ हो गए। इसके बाद घर चलाने की जिम्मेदारी प्रतिमा ने ले ली। प्रतिमा पहले एक अस्पताल में एंबुलेंस चलाती थीं। उसके बाद वह बस चलाने लगीं। वह रोजाना सुबह 3.30 बजे घर से निकल जाती हैं ताकि सबसे पहली ट्रिप में देरी न हो। अपने पति के बारे में बताते हुए वह कहती हैं, ‘क्योंकि मेरे पति बस नहीं चला सकते इसलिए मैंने बस चलाने की जिम्मेदारी उठा ली और इस बात पर मुझे गर्व भी है कि आज तक मेरा एक्सिडेंट नहीं हुआ। मैं बाकी पुरुष ड्राइवरों के जैसे ही तेज बस चला सकती हूं, लेकिन मैं हमेशा सुरक्षा का पूरा ख्याल रखती हूं।’

हावड़ा स्टेशन के पुलिस और रोज बस से सफर करने वाले यात्री प्रतिमा को अच्छी तरह जानने लगे हैं और वे प्रतिमा पर पूरा भरोसा भी रखते हैं। हावड़ा स्टेशन पर एक पुलिसवाले ने कहा, ‘मैं शायद ही कभी प्रतिमा को ओवरस्पीड बस चलाते हुए देखा हो। वह कभी भी सवारियों को मोड़ पर भी नहीं उतारती जबकि बाकी बस ड्राइवर अक्सर ऐसा करते हैं।’ हालांकि प्रतिमा स्वीकारती हैं कि कभी कभार छोटी-छोटी भूलें उनसे हो जाती हैं लेकिन कभी दुर्घटना नहीं होती। वह बताती हैं, ‘मेरे पति का 2011 में ऐक्सिडेंट हो गया था जिसके बाद वह बड़े वाहन चलाने लायक नहीं बचे। इसके बाद मैंने बस चलाने की जिम्मेदारी अपने सिर पर ले ली।’

प्रतिमा बताती हैं कि शुरू में ड्राइविंग के पेशे में जाने के बारे में सोचना अजीब लगता था। लेकिन रोजी रोटी चलाने का एकमात्र यही जरिया था। इसी से मैं बस का लोन चुका रही हूं और अपनी बेटियों की फीस भरने के साथ-साथ घर को भी संभाल रही हूं। प्रतिमा ने सिर्फ 12वीं तक की पढ़ाई की है। उन्होंने बीए में दाखिला लिया था, लेकिन एक साल के बाद ही उन्हें पढ़ाई छोड़नी पड़ी। वह अपनी बेटियों को खूब पढ़ाना चाहती हैं। उनकी बड़ी बेटी राखी जिम्नास्टिक प्लेयर है और वह राज्य स्तर पर कई मेडल भी जीत चुकी है। अभी वह जादवपुर यूनिवर्सिटी से मैथमैटिक्स ऑनर्स से ग्रैजुएशन कर रही है। वहीं दूसरी बेटी अभी 9वीं में है और वह वह भी पढ़ाई में अच्छा कर रही है।

प्रतिमा बताती हैं कि उन्होंने काफी कम उम्र में ही ड्राइविंग सीख ली थी, लेकिन इसे कभी पेशा बनाने के बारे में नहीं सोचा। उनके पति पहले एक छोटी मिनी बस चलाते थे। उससे इतना गुजारा हो जाता था कि परिवार अच्छे से चल जाता था। बाद में उन्हें लगा कि अगर खुद की बस हो जाए तो अच्छा होगा। इस वजह से उन्होंने एक नई बस खरीद ली। बस में कुछ दिन तक प्रतिमा ने कंडक्टर के तौर पर काम किया था, लेकिन इसके बाद ही हादसा हो गया और शिबेश्वर बिस्तर पर आ गए। घर चलाना मुश्किल हो रहा था इसलिए प्रतिमा ने प्राइवेट नौकरी खोजने की कोशिश की, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। इसके बाद उन्होने एंबुलेंस और टैक्सी चलाया। इसके बाद शिबेश्वर थोड़े ठीक हुए और उन्होंने प्रतिमा को बस चलाना भी सिखाया। इसके बाद उन्हें लाइसेंस भी मिल गया और अब वह भिरती से हावड़ा तक रोज बस चलाती हैं।

होली के रंग और उड़ता गुलाल, बहुरंगी स्वाद की गुझिया के साथ

होली का जिक्र हो और गुझिया की याद न आये तो ऐसा तो हो ही नहीं सकता। ये अलग बात है कि हर बार एक तरह के भरावन से आप से हटकर आप कुछ नया करना चाहती हैं तो गुझिया के कई बहुरंगी इन अन्दाजों पर गौर फरमाइए….मनाइये होली का त्योहार गुझिया के बहुरंगी स्वादों के साथ – 

बेक्ड गुझिया

गुझिया सबसे ज्यादा स्वादिष्ट तब लगती है जब वह तली हुई होती है। हालांकि अगर आप इसे पौष्टिक बनाना चाहें तो इसे तलने की जगह बेक कर सकती हैं। आप गुझिया में मनचाहा भरावन भरकर और बिना तेल का इस्तेमाल किए इसे बेक कर सकती हैं। यह खाने में फ्राई गुझिया से बेहतर भी लग सकती है.

सूजी गुझिया

मैदे का ज्यादा इस्तेमाल हानिकारक हो सकता है, इसी वजह से गुझिया की बाहरी परत बनाने के लिए आप ज्यादा सूजी को उपयोग में ला सकती हैं और मनचाहा भरावन भरकर गुझिया बना सकते हैं।

बेक्ड ओट्स गुझिया

अगर आप ज्यादा मीठी गुझिया खाकर बोर हो जाएं तो उसकी जगह आप नमकीन बेक्ड ओट्स गुझिया भी बना सकती हैं। इसे बनाने के लिए सिर्फ आटा, सूखे मेवे और ओट्स की जरूरत पड़ेगी, यह गुझिया आपकी होली को और भी स्पेशल बना देगी।

खजूर और अंजीर गुझिया

खजूर और अंजीर बहुत पोषक हैं इनका इस्तेमाल आप खोए की जगह कर सकती हैं। यह गुझिया उन लोगों के लिए भी अच्छा विकल्प है जिन्हें मधुमेह की बीमारी की शिकायत है। गुझिया को और ज्यादा हेल्दी बनाने के लिए आप इन्हें फ्राई करने की जगह बेक करें।

ड्राई फ्रूट्स गुझिया

इसका भरावन बनाने के लिए बादाम, पिस्ता, किशमिश, खजूर और काजू का इस्तेमाल किया जाता है। राजस्थान में इसे घुघ्रस के नाम से भी जाना जाता है. होली के मौके पर ड्राई फ्रूट्स गुझिया काफी लोकप्रिय मिठाई है।

मिक्स फ्रूट गुझिया

आप बादाम, काजू, किशमिश और नारियल के साथ सेब, नाशपाती और आलूबुखारे का इस्तेमाल कर सकती हैं। तैयार की गई गुझिया को बेक करके अपने दोस्तों और परिवार के साथ इन टेस्टी गुझिया का मजा लें सकती हैं।

गाजर की गुझिया 

गाजर लगभग हर मौसम में मिल जाती है, आप ड्राई फ्रूट्स और नारियल के साथ गाजर को मिलाकर स्वादिष्ट गुझिया बना सकती हैं।

93 साल के नक्कू बाबू रखते हैं 200 साल से भी ज्यादा पुरानी चीजों का खजाना

कोलकाता को सिटी ऑफ जॉय के नाम से भी जाना जाता है। यानी ये खुशियों का शहर है। यहां हर एक गली में कोई न कोई कहानी मिल जाती है जो आपके दिल को छू जाएगी। ऐसी ही एक कहानी है 93 वर्षीय सुशील कुमार चटर्जी की। घूमने और चीजों को गहराई से महसूस करने वाले सुशील के पास कई अनमोल चीजों का खजाना है। लोग उन्हें नक्कू बाबू के नाम से जानते हैं। वे उत्तर कोलकाता के नलिन सरकार स्ट्रीट में एक तीन मंजिल के मकान में रहते हैं। उनके घर में एक 10X12 का कमरा है जिसमें काफी पुरानी चीजें सुरक्षित रखी हुई हैं। यह कमरा पुराने सामानों से इतना भरा है कि यहां दो लोग आराम से खड़े भी नहीं हो सकते।

नक्कू बाबू को पुरानी दुर्लभ चीजों को सहेजने का शौक तब से है जब वो सिर्फ 10 साल के थे। वह कहते हैं कि इन चीजों में कोई लौकिक शक्ति है जो उन्हें अपनी ओर खींच लेते हैं। उन्होंने कोलकाता के स्कॉटिश चर्च कॉलेज से अपनी पढ़ाई की है। उनसे बातें करते वक्त आप पुराने दिनों में चले जाएंगे। ले लगातार अपनी बचपन की यादों को साझा करते रहते हैं। उन्होंने कई सारे मशहूर कवियों, कलाकारों और लेखकों के साथ अच्छा समय बिताया है जिसकी याद उनके जेहन में अभी भी ताजा हैं।

हिंदुस्तान टाइम्स से बात करते हुए नक्कू बाबू ने कहा, ‘मैंने सबसे पहले पुराने पत्थरों को इकट्ठा करना शुरू किया था। उनकी अजीबोगरीब बनावट मुझे अपनी ओर आकर्षित करती थी। इसके बाद ऐसी चीजों से मुझे लगाव बढ़ता गया।’ एक वेबसाइट के मुताबिक नक्कू बाबू के पास प्रथम विश्व युद्ध के दौरान सेना द्वारा प्रयोग किए गए रिसीवर से लेकर 18वीं सदी का कॉलिंग बेल भी है जिसे इंग्लैंड में निर्मित किया गया था। उनके पास 1930 में स्विस स्टॉपवॉच भी है। उनके कमरे में 200 साल पुरानी तुरही और लगभग 3,000 म्यूजिक रिकॉर्ड्स हैं। एक कोने में जर्मनी में बना 16mm का साउंड प्रॉजेक्ट है, तो दूसरे कोने में कोलकाता में पहली बार आयात किया गया हेडफोन भी है।

उनके इस कमरे में घुसने के बाद आपको पता ही नहीं चलेगा कि आप किस दुनिया में आ गए हैं। इसी वजह से उनके कमरे से निकलने में घंटो लग जाते हैं फिर भी आपका मन नहीं भरता। उनके पास प्रथम विश्व युद्ध के दौरान इस्तेमाल किए गए कैमरे भी हैं। इसके अलावा इतनी सारी चीजें कमरे में रखी हैं कि अगर एक-एक चीज गिनने लगें तो लिस्ट काफी लंबी हो जाएगी। नक्कू बाबू अपनी पत्नी और तीन बेटों के साथ रहते हैं। उनका ये शौक हमें हर एक पल, हर एक लम्हे को खुशी के साथ जीने की प्रेरणा देता है।

(साभार – योर स्टोरी)

 

नकली चेहरा छोड़कर खुद को स्वीकार करना ही वास्तविक सशक्तीकरण है

सिनेमा हमारी रग – रग में बसा है…। जिन्दगी की हर घटना और हर एक क्षण में हिन्दी फिल्मों…उसके नायकों और नायिकाओं का एक हिस्सा जरूर होता है…हम हर बात में उनका जिक्र करते हैं और वह हमारी उपमा में मौजूद रहते हैं और हमारी कसौटी पर खरा उतरने के लिए सितारे भी बहुत  मेहनत करते हैं। अपना व्यक्तित्व भूलकर वे वह बन जाते हैं जैसा हम उनको देखना चाहते हैं। वह हमारे दिल में रहना चाहते हैं और वहाँ उनकी जगह कोई न ले सके, इसके लिए वह अपनी जान पर खेल जाते हैं या अप्राकृतिक तरीके अपनाते हैं…समय को थाम लेने और उसे रोक लेने का असम्भव प्रयास करते हैं। श्रीदेवी ने भी यही किया….तमाम नायिकायें यही करती हैं और सामान्य और साधारण औरतें भी यही करती हैं। परदे पर यह मजबूरी असुरक्षा के कारण होती है…खो जाने का डर…कद्र खत्म हो जाने का डर…शो बिजनेस में ही नहीं….आम जिन्दगी में लड़कियाँ और औरतें…इसी डर के बीच जीती हैं क्योंकि उनको जो महत्व दिया जाता है या जिस दर्जे को हासिल करती हैं, वह उनकी खूबसूरती के कारण ही है..।

हर उम्र की ये खूबसूरती है

देखा जाये तो खूबसूरती को महत्व मिलना गलत नहीं है मगर जब यह पूरे व्यक्तित्व और सम्मान और जिन्दगी पर भारी पड़ जाये और हमारा आकलन बस इसके इर्द – गिर्द सिमट जाये तो यकीनन सशक्त होने की तमाम मजबूत दीवारें ढह जाती हैं। खूबसूरती आपको गर्व दे सकती है मगर वो भी क्षणिक है, वह आपको जीवन भर का स्वाभिमान नहीं दे सकती क्योंकि चेहरे तो ढलते हैं और हर रोज नये चेहरे आते हैं…स्वाभिमान तो उस काम से आता है जिसके लिए आपको याद किया जाये। दिक्कत यह है कि हम सशक्तीकरण की बात करते हैं मगर इसका दायरा जिस्मानी खूबसूरती, महँगे कपड़ों के चारों ओर समेट लेते हैं और इसे हर कीमत पर हासिल करने के लिए और नहीं खोने देने की जिद में असुरक्षा में जीते हैं। श्रीदेवी समेत अन्य नायिकायें और अधिकतर स्त्रियाँ इसी असुरक्षा में जीती हैं….खूबसूरत न रही तो शादी नहीं होगी, लोग मजाक उड़ायेंगे….नौकरी नहीं मिलेगी…..पति छिन जायेगा…लोग भूल जायेंगे..ऐसे न जाने कितने ही तमाम डर हैं जो आपको सामान्य होने ही नहीं देतें और आपको एक आवरण में लपेटकर जीती हैं। ये आवरण ही आपकी कमजोरी है…असली खूबसूरती आपकी शख्सियत में है। उन बातों में है जिनकी मदद से आप एक बेहतर दुनिया बना सकती हैं और खुद पर नाज कर सकती हैं। खूबसूरती उस ताकत में है जो आपको वह ताकत देती है जिससे आप कुछ बेहतर कर सकती हैं। झुर्रियाँ आपकी कमजोरी नहीं बन जातीं…वह आपका मापदंड भी नहीं हो सकती हैं…।

दुनिया को बेहतर बनाने की जब ताकत हो, तो खूबसूरती खुद ही आ जाती है

फिर भी खासकर शो बिजनेस से जुड़ी महिलाओं की जिन्दगी में ऐसा नहीं है। वे जाने कितनी बार प्लास्टिक सर्जरी करवाती हैं, एंटी एजिंग दवाएं खाती हैं…..मेकअप की परतें थोपती हैं और कपड़ों का स्टोर हाउस बनती हैं और उनको कोई नहीं रोकता…कोई नहीं बताता कि तुमको ये सब करने की कोई जरूरत नहीं…तुम जैसी हो…हमें वही चाहिए। सबको पता है कि बोनी कपूर श्रीदेवी की खूबसूरती के कायल थे।क्या उनको पता नहीं था कि श्रीदेवी सुन्दर बने रहने के लिए किस तरह के तरीके अपना रही हैं…उनको रोकना चाहिए…मगर कोई नहीं रोकता। इनकी नकल में आम औरतें भी अक्सर ऐसा ही करती देखी जाती हैं मगर ये जानना जरूरी है कि आपको किसी की परछाई बनने या किसी के जैसा होने की जरूरत नहीं है। आप अपनी पहचान आप हैं।

आपके दिल में प्यार हो तो आपके आगे खूबसूरती केे सारे मापदंड छोटे पड़ जाते हैं

क्या सशक्त होने के लिए प्रकृति से लड़ना जरूरी है। अच्छा दिखना अच्छी बात है मगर यह आपके पूरे व्यक्तित्व के आकलन का मापदंड नहीं हो सकती। सबसे बड़ी बात यह है कि जो आपको आपकी तरह न जीने दे…उससे प्यार करने का कोई मतलब है? प्यार तो वह है जो आपको आपकी तरह स्वीकार करे। कुदरत ने जो जिन्दगी दी है, हमारा फर्ज है कि हम उसका सम्मान करें और नकली चेहरे को छोड़कर खुद से प्यार करें, वास्तविक सशक्तीकरण यही है। जिस दिन हम यह समझ गये…महिला सशक्तीकरण तो बस यूँ ही आ जायेगा। अलग से महिला दिवस नहीं मनाना पड़े या खूबसूरती की परिभाषा थोड़ी सार्थक हो…हम एक नकलीपन से निकलकर खुली साँस ले सकें…हमें इसी दिन का इंतजार है।

कविताएं सिर्फ मनोरंजन नहीं हो सकतीं, उससे आगे की बात करती हैं

लेखन संसार में पंखुरी सिन्हा महत्वपूर्ण हस्तक्षेप हैं और उनका सृजन संसार छोटे से छोटे और बड़े से बड़े मुद्दों को उठाता आ रहा है। बहुचर्चित और बहुप्रशंसित इस कवियित्री ने जीवन के तमाम झंझावातों को न सिर्फ जीया बल्कि उसे अपनी कलम में सहेज दिया है। पंखुरी को पढ़ना उन मुद्दों की गहराई तक जाना और समझना हो…चाहे वह विस्थापन हो या स्त्री के अंदर की चीख या विकास का मुद्दा। हिन्दी और अँग्रेजी, दोनो भाषाओं में उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पत्रकार भी रह चुकी हैं और उनकी कवितायें सीधे मार करती हैं। अपराजिता में इस बार की मुलाकात पंखुरी सिन्हा के साथ….पेश हैं महत्वपूर्ण अंश –

प्र. कविता कर्म की शुरुआत कैसे की ?

उ. लिखती बचपन से थी, स्नातक स्तर पर जाते ही औपचारिकतापूर्वक लिखने की शुरुआत की। इतिहास लेकर पढ़ रही थी। स्नातक के बाद पत्रकारिता की पढ़ाई भी की। पत्रकारिता के क्षेत्र थोड़े समय के लिए रही, फ्रीलांसिग की और कई साक्षात्कार लिए। गिरिजाप्रसाद माथुर पुरस्कार मिला और कलम चल पड़ी।

प्र. आप पत्रकार भी रह चुकी हैं। आज की पत्रकारिता के बारे में क्या कहना चाहेंगी?

उ.  पत्रकारिता भ्रष्टाचार के खिलाफ होनी चाहिए। विकास की गाथा और परेशानियों के साथ चुनौतियों को सामने रखे, ऐसी पत्रकारिता होनी चाहिए। मगर आज पत्रकारिता खासकर टीवी पत्रकारिता टीवी केन्द्रित और राजनेताओं पर केन्द्रित है। पत्रकार रहते हुए भी लिखने की इच्छा प्रबल रही। सहारा में दो साल रही मगर इसके बाद पूरी तरह लिखना शुरू किया। नौकरी में बहुत समय जाता था।

प्र. कहानी या कविता, आपको क्या लिखना पसन्द है?

उ. कहानियाँ लिखना चाहती थीं, अभी कविताएँ लिख रही हूँ और कहानियाँ भी लिखना जारी है। ज्ञानपीठ से दो सँग्रह आए। वागर्थ समेत कई पत्रिकाओं में कविताएँ छपीं। थोड़े समय पहले बिहार में बाढ़ आयी, फसलें प्रभावित हुईं। वैषम्य की बात कई कविताओं में हैं। विकास लोगों तक नहीं पहुँच पा रहा हैं, इस पर कई कविताएँ हैं। राजस्थान पत्रिका की ओर से सम्मानित हुई। कई बार आपकी निजता में हस्तक्षेप होता है, कई सामाजिक मुद्दे हैं और कई बार आप जन – मानस तक पहुँचना चाहते हैं, जब ऐसी कविताएँ लिखती हैं तो मनोरंजन से एक कदम आगे होती हैं और तब लोगों को समझाने की जरूरत पड़ती हैं। ये सारी उसकी चुनौतियाँ हैं।

प्र. ऐसे क्षण जिनको आप भूल नहीं पातीं?

उ. अपने तलाक और घर से विस्थापन के बाद, जिसका ज़िक्र, मैंने अपनी कविता ‘किनारे की हुस्न हिना’ कविता में किया है, जब मैं कैलगरी में अपनी पीएचडी की पढ़ाई कर रही थी, भूकंप के कई झटके मेरी बगल से गुज़रे। ‘हम हक़ मांगने वाले’ शीर्षक इस कविता में, चिली के भूकंप के बाद के त्रास का वर्णन है, उस स्थिति में जब आपकी रूममेट चिलियन रही हो! दरअसल, चिली के भूकंप से भी पहले मैंने हेटी के भूकंप को और करीब से देखा। यह भयानक भूकंप जिस दिन आया, उस दिन हमारी यूनिवर्सिटी में चर्चित इतिहासकार, प्रोफेसर माइकल इगनेटीएफ, अपना चुनाव प्रचार करने आये थे—जो कनाडा की लिबरल पार्टी के टिकट पर प्रधान मंत्री का चुनाव लड़ रहे थे. और, इस पूरे संकटपूर्ण समय में, मेरे पास सिंगल एंट्री स्टडी परमिट थी, जो कि अपने आप में एक विरल बात है, और बेहद तकलीफदेह। और ये सिंगल एंट्री वीसा, मुझे लगभग हासिल ग्रीन कार्ड की चोरी के बाद मिला था, इसलिए और भी तकलीफदेह था। यह ग्रीन कार्ड दरअसल एक साज़िश के तहत मुझसे छीना गया–पहले मैंने यूनिवर्सिटी द्वारा प्रस्तावित स्टडी परमिट स्वीकारते, अपना लगभग हासिल ग्रीन कार्ड ड्राप किया–और उस प्रोफेसर की फ़र्ज़ी कंप्लेंट पर, जो दरअसल, मेरा पीछा कर रहा था, मेरा स्टडी परमिट रद्द किया गया. इस वाकये के डिटेल्स यूट्यूब पर भी एक बातचीत में उपलब्ध हैं. लेकिन, इस त्रासदी का क्लाइमेक्स यह है की जब मैं कैलगरी पहुंची ९ महीने के भीतर मेरा पासपोर्ट एक्सपायर कर रहा था–और अपने स्टडी परमिट रिन्यूअल में मुझे २ साल इंतज़ार करना पड़ा, जिसकी वजह से मेरा शोध पूरा नहीं हो सका. लेकिन, भूकंप को इतने करीब से महसूसना अपने आप में एक त्रासद अनुभव है।

प्र.  आप संदेश देना चाहेंगी?     

उ. पाठक कविता और कहानियों में नयी चीजों को तलाशें। लोग कविताओं को पसन्द कर रहे हैं, चिट्ठियाँ और संदेश आते हैं, मैं सभी पाठकों को धन्यवाद देना चाहूँगी। अपने शहर को स्वच्छ बनाएँ।

 

 

 

उड़ि गुलाल घूँघर भई

बिहारी

उड़ि गुलाल घूँघर भई तनि रह्यो लाल बितान।
चौरी चारु निकुंजनमें ब्याह फाग सुखदान॥
फूलनके सिर सेहरा, फाग रंग रँगे बेस।
भाँवरहीमें दौड़ते, लै गति सुलभ सुदेस॥
भीण्यो केसर रंगसूँ लगे अरुन पट पीत।
डालै चाँचा चौकमें गहि बहियाँ दोउ मीत॥
रच्यौ रँगीली रैनमें, होरीके बिच ब्याह।
बनी बिहारन रसमयी रसिक बिहारी नाह॥

 रिटायर होंगे सुप्रीम कोर्ट के 7 जज, 6 जजों की है जरूरत

नयी दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट के सात जज इस वर्ष एक मार्च के बाद सेवानिवृत्त हो जाएंगे। सुप्रीम कोर्ट में वर्तमान में छह जजों की कमी है जबकि दो जजों की नियुक्ति की अनुशंसा सरकार के पास लंबित है। सुप्रीम कोर्ट और कानून मंत्रालय की वेबसाइट के अनुसार जस्टिस अमिताव राय 1 मार्च को रिटायर होंगे इसके बाद जस्टिस राजेश अग्रवाल 4 मार्च को रिटायर हो रहे हैं। जस्टिस राय के कामकाज का अंतिम दिन शुक्रवार था क्योंकि शीर्ष अदालत होली की छुट्टियों के बाद 5 मार्च को खुल रहा है।

वेबसाइट पर बताया गया है कि शीर्ष अदालत में चीफ जस्टिस बाद वरिष्ठतम जज जे. चेलमेश्वर 22 जून को रिटायर होंगे। इसके बाद जस्टिस आदर्श गोयल 6 जुलाई को सेवानिवृत्त होंगे। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा 2 अक्तूबर को रिटायर होंगे। इसके बाद जस्टिस कुरियन जोसफ 29 नवंबर और जस्टिस मदन बी लोकुर 30 दिसंबर को रिटायर होंगे। जजों के रिटायर होने और छह जजों की कमी से कॉलेजियम पर दबाव बढ़ेगा कि वह नामों की अनुशंसा करें और सरकार पर नियुक्तियों में तेजी लाने का दबाव होगा।