कविताएं सिर्फ मनोरंजन नहीं हो सकतीं, उससे आगे की बात करती हैं

लेखन संसार में पंखुरी सिन्हा महत्वपूर्ण हस्तक्षेप हैं और उनका सृजन संसार छोटे से छोटे और बड़े से बड़े मुद्दों को उठाता आ रहा है। बहुचर्चित और बहुप्रशंसित इस कवियित्री ने जीवन के तमाम झंझावातों को न सिर्फ जीया बल्कि उसे अपनी कलम में सहेज दिया है। पंखुरी को पढ़ना उन मुद्दों की गहराई तक जाना और समझना हो…चाहे वह विस्थापन हो या स्त्री के अंदर की चीख या विकास का मुद्दा। हिन्दी और अँग्रेजी, दोनो भाषाओं में उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पत्रकार भी रह चुकी हैं और उनकी कवितायें सीधे मार करती हैं। अपराजिता में इस बार की मुलाकात पंखुरी सिन्हा के साथ….पेश हैं महत्वपूर्ण अंश –

प्र. कविता कर्म की शुरुआत कैसे की ?

उ. लिखती बचपन से थी, स्नातक स्तर पर जाते ही औपचारिकतापूर्वक लिखने की शुरुआत की। इतिहास लेकर पढ़ रही थी। स्नातक के बाद पत्रकारिता की पढ़ाई भी की। पत्रकारिता के क्षेत्र थोड़े समय के लिए रही, फ्रीलांसिग की और कई साक्षात्कार लिए। गिरिजाप्रसाद माथुर पुरस्कार मिला और कलम चल पड़ी।

प्र. आप पत्रकार भी रह चुकी हैं। आज की पत्रकारिता के बारे में क्या कहना चाहेंगी?

उ.  पत्रकारिता भ्रष्टाचार के खिलाफ होनी चाहिए। विकास की गाथा और परेशानियों के साथ चुनौतियों को सामने रखे, ऐसी पत्रकारिता होनी चाहिए। मगर आज पत्रकारिता खासकर टीवी पत्रकारिता टीवी केन्द्रित और राजनेताओं पर केन्द्रित है। पत्रकार रहते हुए भी लिखने की इच्छा प्रबल रही। सहारा में दो साल रही मगर इसके बाद पूरी तरह लिखना शुरू किया। नौकरी में बहुत समय जाता था।

प्र. कहानी या कविता, आपको क्या लिखना पसन्द है?

उ. कहानियाँ लिखना चाहती थीं, अभी कविताएँ लिख रही हूँ और कहानियाँ भी लिखना जारी है। ज्ञानपीठ से दो सँग्रह आए। वागर्थ समेत कई पत्रिकाओं में कविताएँ छपीं। थोड़े समय पहले बिहार में बाढ़ आयी, फसलें प्रभावित हुईं। वैषम्य की बात कई कविताओं में हैं। विकास लोगों तक नहीं पहुँच पा रहा हैं, इस पर कई कविताएँ हैं। राजस्थान पत्रिका की ओर से सम्मानित हुई। कई बार आपकी निजता में हस्तक्षेप होता है, कई सामाजिक मुद्दे हैं और कई बार आप जन – मानस तक पहुँचना चाहते हैं, जब ऐसी कविताएँ लिखती हैं तो मनोरंजन से एक कदम आगे होती हैं और तब लोगों को समझाने की जरूरत पड़ती हैं। ये सारी उसकी चुनौतियाँ हैं।

प्र. ऐसे क्षण जिनको आप भूल नहीं पातीं?

उ. अपने तलाक और घर से विस्थापन के बाद, जिसका ज़िक्र, मैंने अपनी कविता ‘किनारे की हुस्न हिना’ कविता में किया है, जब मैं कैलगरी में अपनी पीएचडी की पढ़ाई कर रही थी, भूकंप के कई झटके मेरी बगल से गुज़रे। ‘हम हक़ मांगने वाले’ शीर्षक इस कविता में, चिली के भूकंप के बाद के त्रास का वर्णन है, उस स्थिति में जब आपकी रूममेट चिलियन रही हो! दरअसल, चिली के भूकंप से भी पहले मैंने हेटी के भूकंप को और करीब से देखा। यह भयानक भूकंप जिस दिन आया, उस दिन हमारी यूनिवर्सिटी में चर्चित इतिहासकार, प्रोफेसर माइकल इगनेटीएफ, अपना चुनाव प्रचार करने आये थे—जो कनाडा की लिबरल पार्टी के टिकट पर प्रधान मंत्री का चुनाव लड़ रहे थे. और, इस पूरे संकटपूर्ण समय में, मेरे पास सिंगल एंट्री स्टडी परमिट थी, जो कि अपने आप में एक विरल बात है, और बेहद तकलीफदेह। और ये सिंगल एंट्री वीसा, मुझे लगभग हासिल ग्रीन कार्ड की चोरी के बाद मिला था, इसलिए और भी तकलीफदेह था। यह ग्रीन कार्ड दरअसल एक साज़िश के तहत मुझसे छीना गया–पहले मैंने यूनिवर्सिटी द्वारा प्रस्तावित स्टडी परमिट स्वीकारते, अपना लगभग हासिल ग्रीन कार्ड ड्राप किया–और उस प्रोफेसर की फ़र्ज़ी कंप्लेंट पर, जो दरअसल, मेरा पीछा कर रहा था, मेरा स्टडी परमिट रद्द किया गया. इस वाकये के डिटेल्स यूट्यूब पर भी एक बातचीत में उपलब्ध हैं. लेकिन, इस त्रासदी का क्लाइमेक्स यह है की जब मैं कैलगरी पहुंची ९ महीने के भीतर मेरा पासपोर्ट एक्सपायर कर रहा था–और अपने स्टडी परमिट रिन्यूअल में मुझे २ साल इंतज़ार करना पड़ा, जिसकी वजह से मेरा शोध पूरा नहीं हो सका. लेकिन, भूकंप को इतने करीब से महसूसना अपने आप में एक त्रासद अनुभव है।

प्र.  आप संदेश देना चाहेंगी?     

उ. पाठक कविता और कहानियों में नयी चीजों को तलाशें। लोग कविताओं को पसन्द कर रहे हैं, चिट्ठियाँ और संदेश आते हैं, मैं सभी पाठकों को धन्यवाद देना चाहूँगी। अपने शहर को स्वच्छ बनाएँ।

 

 

 

शुभजिता

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