Thursday, July 9, 2026
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दिवंगत पिता के प्रति

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

सूरज के साथ-साथ
सन्ध्या के मंत्र डूब जाते थे,
घंटी बजती थी अनाथ आश्रम में
भूखे भटकते बच्चों के लौट आने की,
दूर-दूर तक फैले खेतों पर,
धुएँ में लिपटे गाँव पर,
वर्षा से भीगी कच्ची डगर पर,
जाने कैसा रहस्य भरा करुण अन्धकार फैल जाता था,
और ऐसे में आवाज़ आती थी पिता
तुम्हारे पुकारने की,
मेरा नाम उस अंधियारे में
बज उठता था, तुम्हारे स्वरों में।
मैं अब भी हूँ
अब भी है यह रोता हुआ अन्धकार चारों ओर
लेकिन कहाँ है तुम्हारी आवाज़
जो मेरा नाम भरकर
इसे अविकल स्वरों में बजा दे।

(२)

‘धक्का देकर किसी को
आगे जाना पाप है’
अत: तुम भीड़ से अलग हो गए।

‘महत्वाकांक्षा ही सब दुखों का मूल है’
इसलिए तुम जहाँ थे वहीं बैठ गए।
‘संतोष परम धन है’
मानकर तुमने सब कुछ लुट जाने दिया।

पिता! इन मूल्यों ने तो तुम्हें
अनाथ, निराश्रित और विपन्न ही बनाया,
तुमसे नहीं, मुझसे कहती है,
मृत्यु के समय तुम्हारे
निस्तेज मुख पर पड़ती यह क्रूर दारूण छाया।

(३)

‘सादगी से रहूँगा’
तुमने सोचा था
अत: हर उत्सव में तुम द्वार पर खड़े रहे।
‘झूठ नहीं बोलूँगा’
तुमने व्रत लिया था
अत:हर गोष्ठी में तुम चित्र से जड़े रहे।

तुमने जितना ही अपने को अर्थ दिया
दूसरों ने उतना ही तुम्हें अर्थहीन समझा।
कैसी विडम्बना है कि
झूठ के इस मेले में
सच्चे थे तुम
अत:वैरागी से पड़े रहे।

(४)

तुम्हारी अन्तिम यात्रा में
वे नहीं आए
जो तुम्हारी सेवाओं की सीढ़ियाँ लगाकर
शहर की ऊँची इमारतों में बैठ ग थे,
जिन्होंने तुम्हारी सादगी के सिक्कों से
भरे बाजार भड़कीली दुकानें खोल रक्खी थीं;
जो तुम्हारे सदाचार को
अपने फर्म का इश्तहार बनाकर
डुगडुगी के साथ शहर में बाँट रहे थे।

पिता! तुम्हारी अन्तिम यात्रा में वे नहीं आए
वे नहीं आए

पिता को भी देना चाहिए अब पितृत्व अवकाश

नयी दिल्ली : बच्चे को माँ के साथ पिता की भी जरूरत है मगर हमारे समाज में ऐसा नहीं दिखता। पितृत्व की भूमिका को व्यवस्थाओं और प्रावधानों ने सीमित करके रखा है। यूनीसेफ की ताजा रि‍पोर्ट के अनुसार भारत दुनिया के उन 90 देशों में शामिल है जहां कि पितृत्व को लेकर कोई राष्टीय नीति नहीं है। निजी ढांचों में तो नवजात बच्चों की देखभाल और उनके साथ समय बि‍ताने के लिए पर्याप्त वैतनि‍क छुट्टियों तक का प्रावधान नहीं हो पाया है। केवल भारत ही नहीं, रि‍पोर्ट के मुताबि‍क दुनि‍या में नए-नए आए दो ति‍हाई तकरीबन (9 करोड) बच्‍चे ऐसे हैं जि‍नके पि‍ताओं को एक भी दि‍न का वैतनि‍क अवकाश नहीं मि‍लता है।
हमें यह बात सोचनी चाहिए कि भारत दुनिया के उन संवेदनशील देशों में है जहां कि नवजात मृत्यु दर एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। यह एक बड़े कलंक की तरह है, लेकिन इससे निपटने के उपायों में केवल एक पक्ष ही शामिल क्यों हो। भारत में बच्चों की स्थिति वैसे ही नाजुक है। नवजात बच्चों की तो और भी ज्यादा। देखिए कि भारत में वर्ष 2008 से 2015 के बीच आठ साल में 62.40 लाख नवजात शिशु मृत्यु का शिकार हुए हैं। जन्म के 28 दिन के अंदर मरने वाले इन बच्चों की यह संख्या थोड़ी नहीं है। देश के चार राज्यों (उत्तरप्रदेश, राजस्थान, बिहार और मध्यप्रदेश) में देश की कुल नवजात मौतों की संख्या में से 56 प्रतिशत मौतें दर्ज होती हैं। एक महीने से पांच साल की उम्र में बच्चों की मृत्यु का जितना जोखिम होता है, उससे 30 गुना ज्यादा जोखिम इन 28 दिनों में होता है। इसलिए सबसे बेहतर है कि इन 28 दिनों में बच्चों के खतरे को कम से कम करने के लिए उन्हें ज्यादा सुरक्षा, ज्यादा ध्यान और लाड़—प्यार दिया जाए, लेकिन ऐसा हो कहां पाता है। अपने आसपास ही देख लीजिए। कितने पिताओं को इसके लिए व्य​वस्थित रूप से छुटिटयां मिल पाती हैं, या दूसरी सुविधाएं मिल पाती हैं।
एकल परिवार और नौकरीपेशा महि‍लाओं की बढती संख्‍या के कारण बच्चों की पर​वरिश का संकट और भयंकर रूप से बढ़ा है। परंपराओं में गर्भ से लेकर मातृत्व को प्राप्त होने तक और उसके बाद एक नवजात शिशु की परवरिश के जो ताने—बाने थे, वह भी तो इसके साथ ही साथ बिखर रहे हैं। देखिए कि आठ सालों में 26.30 लाख नवजात शिशुओं की मृत्यु समय पूर्व जन्म लेने के कारण हुई यानी 948 बच्चे हर रोज समय से पहले जन्म लेने के कारण ही मर जाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन मानता है कि शिशु का समयपूर्व जन्म मृत्यु और जीवन में किसी न किसी किस्म की विकलांगता का बड़ा कारण बनता है। अब इस बात पर भी गौर किया जाना चाहिए कि समय पूर्व जन्म लेने वाले बच्चों की क्या चुनौतियां होती होंगी।
आखिर यह हालात बन ही क्यों रहे कि बड़ी संख्या में पहले ही जन्म हो रहे हैं। और यदि हो भी रहे हैं तो ऐसी परिस्थितियों में पिताओं की भूमिका कहीं बढ़कर हो जाती है, क्योंकि जन्म देने वाली ​स्त्री के पास उस परिस्थिति को भुगतने के सिवाय बहुत विकल्प नहीं होते, लेकिन ऐसी परिस्थितियों में निर्णय लेने से लेकर उसे अंजाम तक पहुंचा देने का काम तो केवल पिता का होता है। इस बात पर गौर भले ही नहीं किया जाता, पर मातृत्व की ​तरह पितृत्व भी तो उन्हीं ​चुनौतियों से गुजरता है।
वैसे इस बात पर अब चर्चा शुरू हो गई है। इस बात पर भी विचार किया जा रहा है कि पितृत्व को एक व्यवस्थित स्वरूप देकर उसे कानून प्रावधानों और नीतियों में लाया जाए। देखना है कि यह कब तक हो पाता है।

(साभार)

पिता ने लाड़ली बिटिया की शादी के कार्ड में छपवाया खर्च; लिखा- न आएं शराब पीकर

मुरैना (ग्वालियर) : दहेज बंदी का पालन गुर्जर समाज में शुरू हो गया है जिससे कि समाज बिना दहेज के बिटिया की विदाई को तैयार हैं। इसकी शुरूआत एक पिता ने अपनी बेटी की शादी से कर रहे हैं। जानकारी के मुताबिक पिता का नाम इन्द्र सिंह गुर्जर है और वो अपनी बिटिया के विवाह में कोई दहेज नहीं दे रहे हैं इसका प्रमाण बिटिया की शादी के लिए छपवाया गया कार्ड है। पूजा के विवाह के कार्ड में संत हरि गिरि महाराज द्वारा तय किए गए खर्च का पूरा उल्लेख है। जिसमें लिखा गया है कि विवाह पढ़ने आने वाले पंडित जी को 1100 रुपए की दक्षिणा दी जाएगी। इसके अलावा थाली 5100 रुपए, लगुन 1100 रुपए, दरवाजा 1100 रुपए, भात 5100 रुपए, अंक माला 10 रुपए, टीका 50 रुपए, पान 1100 रुपए व पांच बर्तन और कूलर, अलमारी, पलंग प्रदान किए जा रहे हैं। बारात में केवल 100 बारातियों का सत्कार किया जाएगा। पिता ने बताया कि उनकी बिटिया पूजा का विवाह अतेन्द्र सिंह गुर्जर के साथ 20 जून को है। शादी कार्ड पर न केवल दहेज बंदी का उल्लेख है बल्कि शराबबंदी का असर भी नजर आ रहा है। कार्ड पर स्पष्ट रूप से नोट लिखा गया है कि कोई भी व्यक्ति शराब पीकर शादी समारोह में न आएं। कार्ड में कराए गए इस नोट में बताया गया है कि यह आदेश संत हरि गिरि महाराज का है। लड़की के चाचा ने बताया कि समाज में शराब बंदी पहले ही हो चुकी है और अब दहेज बंदी का भी पालन हो रहा है। यह सब संत की कृपा से हुआ है।
पूजा के विवाह का शादी कार्ड बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ की अपील भी कर रहा है। कार्ड के एक हिस्से में बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ और न दहेज लेंगे न दहेज देंगे की अपील की गई है। इसके अलावा एक शादी कार्ड पर छपा स्लोगन सब कुछ जाहिर कर रहा है।
स्लोगन कुछ इस तरह है कि –
“मृत्यु भोज और माला छूटी, खाना छूटा मेज पे। बाजे छूटे दारू छूटी, अब की चोट दहेज पे।।”

गर्मी से राहत देंगे ये शीतल पेय

आमतौर पर गर्मी लगी नहीं कि आप कोल्ड ड्रिंक की ओर दौड़ लगा देते हैं जो कि आपकी जेब पर भारी पड़ते हैं मगर घर में ही आसानी से ऐसे पेय तैयार किये जा सकते हैं जो आपको तरोताजा रखेंगे।

चंदन का शर्बत

सामग्री :1 किलो चीनी, 3 लीटर पानी, 10 ग्राम चंदन पाउडर, 2 बड़ा चम्मच नींबू का रस , 2 बड़ा चम्मच दूध


विधि : सबसे पहले चंदन पाउडर को एक सूती कपड़े में बांधकर पोटली बना लें। एक बड़े बर्तन में चीनी और पानी मिलाकर मीडियम आंच में उबलने के लिए रखें। कुछ देर बाद आंच तेजकर इसे खौलाएं। जब पानी में अच्छी तरह उबाल आ जाए तो इसमें दूध डालकर 3-4 मिनट तक और उबालें। इसके बाद इसमें नींबू का रस डालकर 4-5 मिनट तक और उबालें। इसकी जाँच करें कि एक तार की चाशनी बनी है या नहीं। अगर चाशनी बन गई है तो इसे आंच से उतार  लें और इसमें चंदन की पोटली डाल दें। इस शरबत को रातभर ऐसे ही रख दें। अगले दिन इसे छानकर बोतल में भर लें।

                             स्ट्रॉबेरी लेमोने़ड

सामग्री 500 ग्राम स्ट्रॉबेरी, आधा कप नींबू का रस, एक कप चीनी, एक गिलास पानी, 3 गिलास सोडा, 4 आइस क्यूब
सजावट के लिए : स्ट्रॉबेरी स्लाइस, नींबू के स्लाइस

विधि : स्ट्रॉबेरी के हरे डंठल निकालकर अच्छे से धो लें। अब बाकी स्ट्रॉबेरी को दो भागों में काट लें। एक स्ट्रॉबेरी और एक नींबू को स्लाइस में काटकर अलग रख लें सजाने के लिए। अब स्ट्रॉबेरी को अच्छे से पीस लें और छलनी से छान लें। स्ट्रॉबेरी के जूस को एक जग में डाल लें। पानी और चीनी मिलाकर अच्छे से घोलें। अब स्ट्रॉबेरी के जूस में नींबू का रस और चीनी का पानी डालकर अच्छे से मिलाएं। स्ट्रॉबेरी लेमोनेड तैयार है। गिलास में सोडा, लेमनेड डालें और इनके ऊपर लेमन व स्ट्रॉबेरी स्लाइस लगाकर गार्निश कर सर्व करें।

मॉनसून में खूबसूरत रहें आपके पैर

बारिश का मौसम सभी को पसंद होता है लेकिन यह मौसम अपने साथ कई तरह की परेशानियां भी लाता है। इन दिनों पैरों की समस्या आम देखने को मिलती है। गीलेपन और नमी की वजह से पैरों के तलवे खराब हो जाते हैं और कई लोगों के तो उंगलियों में छाले पड़ जाते हैं। जिस वजह से काफी परेशानी होती है और पैर भी बदसूरत लगने लगते हैं। ऐसे में कुछ आसान तरीके अपनाकर इस मानसून सीजन पैरों की खूबसूरती बरकरार रख सकते हैं।

नमक वाला पानी
बरसात के मौसम में पैरों की खास देखभाल रखना जरूरी होता है। ऐसे में दिन में कम से कम 2-3 बार पानी से पैर जरूर धोएं और तौलिए से अच्छे से पौंछ कर रखें।

फिटकरी
अधिक देर तक पानी में रहने की वजह से पैरों के तलवों में मोटे-मोटे दाने निकल जाते हैं और जमीन पर पैर रखने से ही काफी दर्द महसूस होती है। इसके लिए पानी में फिटकरी डालकर उसे गर्म करें और इस पानी में 15-20 मिनट तक पैरों को डुबोकर रखें।

नारियल तेल
पैरों को खूबसूरत और मुलायम बनाए रखने के लिए हर रोज रात को सोने से पहले गुनगुने नारियल तेल से पैरों की मसाज करें।

नींबू
इस मौसम में कई महिलाओं की एड़ियां फट जाती हैं जिससे पैरों की खूबसूरती खराब हो जाती है। ऐसे में रोजाना आधे नींबू को एड़ियों पर रगड़ें। इसके अलावा गुनगुने पानी में 1 नींबू का रस निचोड़ कर उसमें 20 मिनट के लिए पैरों को डूबो कर रखें और फिर तौलिए से अच्छे से पौंछ लें।

 

विरासत ए फैशन : बिहार की कलात्मक विरासत है मधुबनी

मधुबनी लोक कला बिहार के मधुबनी स्थान से संबन्धित है। मधुबन का अर्थ है ‘शहद का वन’ और यह स्थान राधा कृष्ण की मधुर लीलाओं के लिये प्रसिद्ध है। मधुबनी की लोक कला में भी कृष्ण की लीलाओं को चित्रित किया गया है तो रामायण और पुराणों की कई कहानियाँ इस कला के माध्ययम से अभिव्यक्ति पाती है। कला आम और केलों के झुरमुट में कच्ची झोपड़ियों से घिरे हरे भरे तालाब वाले इस ग्राम में पुश्तों पुरानी है और मधुबन के आसपास पूरे मिथिला इलाके में फैली हुई है। विद्यापति की मैथिली कविताओं के रचनास्थल इस इलाके में आज मुज़फ्फपुर, मधुबनी, दरभंगा और सहरसा ज़िले आते हैं।

मधुबनी की कलाकृतियों तैयार करने के लिये हाथ से बने कागज़ को गोबर से लीप कर उसके ऊपर वनस्पति रंगों से पौराणिक गाथाओं को चित्रों के रूप में उतारा जाता है। कलाकार अपने चित्रों के लिये रंग स्वयं तैयार करते हैं और बाँस की तीलियों में रूई लपेट कर अनेक आकारों की तूलिकाओं को भी स्वयं तैयार करते हैं ।

इन कलाकृतियों में गुलाबी, पीला, नीला, सिदूरा (लाल) और सुगापाखी (हरा) रंगों का प्रयोग होता है। काला रंग ज्वार को जला कर प्राप्त किया जाता है या फिर दिये की कालिख को गोबर के साथ मिला कर तैयार किया जाता है, पीला रंग हल्दी और चूने को बरगद की पत्तियों के दूध में मिला कर तैयार किया जाता है पलाश या टेसू के फूल से नारंगी, कुसुंभ के फूलों से लाल और बेल की पत्तियों से हरा रंग बनाया जाता है। रंगों को स्थायी और चमकदार बनाने के लिये उन्हें बकरी के दूध में घोला जाता है।

मानव और देवी देवताओं के चित्रण के साथ साथ पशुपक्षी, पेड़ पौधे और ज्यामितीय आकारों को भी मधुबनी की कला में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। ये आकार भी पारंपरिक तरीको से बनाए जाते हैं ।

तोते, कछुए, मछलियाँ, सूरज और चांद मधुबनी के लोकप्रिय विषय हैं। हाथी, घोड़े, शेर, बाँस, कमल, फूल, लताएँ और स्वास्तिक धन धान्य की समृद्धि के लिये शुभ मानकर चित्रित किये जाते हैं।

 

कागज़ पर बनी कलाकृतियों के पीछे महीन कपड़ा लगा कर इन्हें पारिवारिक धरोहर के रूप में सहेज कर रखा जाता है। यही कारण है कि हर परिवार में मधुबनी कलाकृतियों के आकार, रंग संयोजन और विषय वस्तु में भिन्नता के दर्शन होते हैं। यह भिन्नता ही उस परिवार की विशेषता समझी जाती है।

पारंपरिक रूप से विशेष अवसरों पर घर में बनाई जाने वाली यह कला आज विश्व के बाज़ारों में लोकप्रिय हो चली है। हालाँकि इसके कलाकार आज भी अत्यंत सादगीपूर्ण जीवन बिता रहे हैं।

दीवार और कागज़ के साथ यह कला मिट्टी के पात्रों, पंखों और विवाह के अवसर पर प्रयुक्त होने वाले थाल और थालियों पर भी की जाती है।

आज मधुबनी कलाकृतियाँ कला दीर्घाओं, संग्रहालयों और हस्तकला की दूकानों के साथ विश्वजाल पर भी खरीदी जा सकती हैं।

(साभार – अभिव्यक्ति डॉट कॉम)

जब करनी हो मॉनसून शॉपिंग

मॉनसून यानि झमाझम बारिश के दिन। आम तौर पर होता है कि आप अपने तमाम पुराने कपड़े बारिश के दिनों में पहन जाती हैं जो बुरा नहीं है मगर हर जगह पुराने कपड़े तो नहीं पहने जा सकते इसलिए जरूरी है कि खरीददारी की जाए मगर ऐसे कि उसे बारिश की नजर न लगे।
जल्दी सूखने वाले फैब्रिक लें
इस मौसम में टाइस जीन्स तो न ही पहनें तो बेहतर होगा। आप पटियाला. पलाजो और नीचे से ढीले पैंट पहन सकती हैं जिससे आपको जलजमाव के बीच चलना पड़े तो इनको जरा सा ऊपर उठा सकें। दफ्तर में नहीं हैं तो कैपरी पहनें और दफ्तर में हल्की स्कर्ट के नीचे घुटनों तक कैपरी पहन सकती हैं जिससे आपको अपने कपड़ों पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत नहीं पड़ेगी। आप शिफॉन, मिक्स्ड कॉटन जैसे फैब्रिक पहन सकती हैं जो जल्दी सूखते हैं।
स्मार्ट लुक के लिए ट्रेंचकोट
ट्रेंचकोट एक अच्छा विकल्प हो सकता है। बारिश के मौसम कॉटन, लाइक्रा आदि टेक्सचर के ट्रेंचकोट बेहतर रहेंगे। बेंज, लाल, नारंगी, पर्पल जैसे रंग इस मॉनसून के परफेक्ट रंग हैं। इस सीजन में आप फ्लावरी प्रिंट या पोल्का डॉट प्रिंट वाले ट्रेंचकोट भी पहन सकती हैं। ब्रिक रेड कलर पहनें।
फुटवेयर हो खास
वैसे तो मॉनसून में स्लीपर्स का ट्रेंड बढ़ जाता है पर आप अगर कुछ खास करना चाहते हैं तो गमबूट और मैकक्वीन हील्स ट्राई करें। ये सुविधानजन तो हैं ही, साथ ही शॉर्ट ड्रेसेज के साथ स्टाइलिश भी लगते हैं। हां, मॉनसून में काले या भूरे लेदर बूट्स को न ही पहनें तो बेहतर होगा। जहां तक रंगों का सवाल है, कलरफुल फुटवेयर के लिए यह मौसम ही सबसे फिट है। आप फॉर्मल पोशाकों के साथ भी चटकीले रंगों के फुटवेयर पहन सकती हैं।
सतरंगी हो छतरी
बारिश के दिनों में बाहर निकलते वक्त छतरी या रेनकोट तो हमारी जरूरत का ही एक हिस्सा है। क्यों न इस जरूरत को ही हम चलन में बदल दें। आजकल फ्लोरल प्रिंट की ट्रांस्पेरेंट छतरी काफी चलन में हैं। इसके अलावा, आप ऑरेंज, ऑलिव ग्रीन जैसे रंगों को कंट्रास्ट रंग की ड्रेसेज के साथ ट्राई कर सकते हैं।
मॉनसून की एक्सेसरीज
चाहे बैग हो या बेल्ट, मॉनसून के फैशन की बात आती है तो इनमें फंकी लुक ही सबसे फिट लगता है। बैग्स के लिए इस मौसम में लेदर हैंडबैग्स की जगह कपड़े, जूट, कॉर्डराय और रैक्सीन जैसे विकल्पों का चयन बेहतर है। फ्लावर प्रिंट वाले बैग्स इस सीजन में चलन में हैं। बेल्ट के लिए पीले और रेड जैसे बोल्ड रंग अच्छे लगेंगे।

कविता को और जीवंत बना गयी कविता की एक साँझ -4

 कोलकाता :  10 जून की शाम कोलकाता की साहित्यिक संस्था नीलांबर के द्वारा कला कुंज सभागार में ‘एक साँझ कविता की -4’ का शानदार आयोजन किया गया।पिछले कुछ वर्षों के दौरान नीलांबर ने अपने आयोजनों के द्वारा पूरे देश के साहित्य प्रेमियों का ध्यान खींचा है।संस्था ने आधुनिक तकनीक का प्रयोग करके साहित्य को आम लोगों के बीच पहुँचाने के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किया है।इसी कड़ी में यह आयोजन था।सबसे पहले दिवंगत कवि केदारनाथ सिंह को श्रद्धांजलि स्वरूप कविता कोलाज की प्रस्तुति की गई, जिसमें ममता पाण्डेय, स्मिता गोयल,ऋतु तिवारी एवं विशाल पाण्डेय ने हिस्सा लिया।इसके बाद घनश्याम कुमार देवांश की कविता ‘नौकरी चुड़ैल है’ पर दीपक कुमार ठाकुर द्वारा मूक अभिनय प्रस्तुत किया गया। तुषार धवल सिंह की कविता ‘अधूरे में’ पर विजय शर्मा द्वारा निर्देशित लघु फिल्म दिखाई गई जिसमें विशाल पाण्डेय, अन्नु राय एवं शाश्वत झा ने अभिनय किया था।’नृत्यंगनाज’ संस्था की रश्मि बंदोपाध्याय एवं समूह ने अनामिका की कविता ‘सृष्टि’ पर भाव नृत्य प्रस्तुत किया।इस कविता में आज के समय में स्त्रियों की दशा का मार्मिक चित्र मौजूद है।राजेश जोशी की कविताओं पर बाशा शिक्षण संस्थान एवं नीलांबर संस्था के बच्चों के द्वारा युग्म रूप से कविता कोलाज की प्रस्तुति की गई।

लिटरेरिया के पोस्टर का अनावरण भी किया गया

इसके अतिरिक्त नरेश सक्सेना की कविता ‘गिरना’ पर स्मिता गोयल के द्वारा  तैयार वीडियो मोंताज दिखाया गया।कविता की इस साँझ में देश के प्रतिष्ठित कवि राजेश जोशी की अध्यक्षता में कविता पाठ में शामिल होने वाले कवियों में शामिल थे अनामिका, तुषार धवल और घनश्याम कुमार देवांश। सारी प्रस्तुतियाँ एवं कवियों का पाठ मंत्रमुग्ध करने वाला रहा एवं  श्रोताओं ने इसकी बहुत प्रशंसा की। इस मौके पर अतिथि के रूप में मौजूद थे वागर्थ पत्रिका के संपादक एवं आलोचक डॉ शंभुनाथ और कुसुम खेमानी।आगत अतिथियों ने कविता कोलज में हिस्सा लेने वाले बच्चों को उपहार प्रदान किया ।साथ में संस्था के अगले बड़े कार्यक्रम ‘लिटरेरिया 2018’ की विधिवत घोषणा करते हुए पोस्टर जारी किए। कार्यक्रम का संचालन अभिनेत्री एवं नाट्यकर्मी कल्पना झा ने किया। नीलांबर संस्था के अध्यक्ष विमलेश त्रिपाठी ने आगत सभी अतिथियों एवं स्रोताओं का स्वागत अपने वक्तव्य से किया। पूरे कार्यक्रम के संयोजन में शामिल थे,  आशा पांडेय, मनोज झा, आनंद गुप्ता,ऋतु तिवारी,स्मिता गोयल, अभिषेक पांडेय, मंटू कुमार साव, पूनम सिंह,रेवा टिबरेवाल,विजय शर्मा, भरत साव, प्रियंका सिंह,निधि पाण्डेय एवं विनोद कुमार।संस्था के उपाध्यक्ष यतीश कुमार ने नीलांबर संस्था एवं उसके आने वाले कार्यक्रमों एवं योजनाओं की संक्षिप्त जानकारी दी। संस्था के सचिव ऋतेश पाण्डेय ने धन्यवाद ज्ञापन किया।कार्यक्रम में बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी  एवं शिक्षक उपस्थित रहें।

तो क्या रघुकुल  के मान सम्मान के लिए कैकेयी ने भेजा था श्री राम को वनवास?

हिंदू धर्म के पवित्र ग्रन्थ रामायण के अनुसार श्री राम को उनकी सौतेली माँ कैकेयी ने चौदह वर्षों के वनवास पर भेज दिया था ताकि श्री राम के स्थान पर उनके अपने पुत्र भरत को अयोध्या का राजा बना दिया जाए। लेकिन क्या आप यह जानते हैं कि कैकेयी के ऐसा करने के पीछे असली वजह कुछ और ही थी जिसे जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे। तो आइए जानते हैं अपने सगे पुत्र से भी ज़्यादा श्री राम से स्नेह रखने वाली माता कैकेयी ने आखिर ऐसा क्यों किया।
राजा दशरथ और बाली का युद्ध जैसा कि हम सब जानते हैं कि राजा दशरथ की तीन रानियां थी कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी। कहते हैं इन तीनों रानियों में रानी कैकेयी अस्त्र-शस्त्र और रथ संचालन में पारंगत थी इसलिए वह अकसर युद्ध में राजा दशरथ के साथ होती थीं। राजा को भी अपनी इस रानी पर बेहद गर्व था।
एक बार राजा दशरथ और बाली के बीच युद्ध हो रहा था क्योंकि बाली को यह वरदान प्राप्त था कि वह जिस पर भी अपनी नजर डालेगा, उसकी सारी शक्तियाँ स्वयं उसके पास आ जाएंगी इसलिए दशरथ की भी सारी शक्तियां बाली में समा गयीं और युद्ध में उनकी पराजय हुई। उस युद्ध में दशरथ के साथ कैकेयी भी मौजूद थीं।
युद्ध में दशरथ को हराने के बाद बाली ने उनसे कहा कि या तो वे अपने रघुकुल की शान का प्रतीक अपना मुकुट उसे दे जाएं या फिर अपनी रानी कैकेयी को उसे सौंप दे। तब दशरथ ने कैकेयी की जगह अपना मुकुट बाली को दे दिया और अपनी रानी को लेकर वापस अयोध्या लौट गए।
कैकेयी ने भेजा श्री राम को वनवास राजा दशरथ के युद्ध में हारने के बाद रानी कैकेयी मुकुट को लेकर हमेशा चिंतित रहती। वे हर पल सोचती कि आखिर रघुकुल की इज़्ज़त को वापस कैसे लाया जाए इसलिए उन्हें याद आया कि राजा दशरथ ने उन्हें वचन दिया था कि वे जब चाहे उनसे कुछ भी मांग सकती है।
कैकेयी इस बात को भलीभांती जानती थी कि रघुकुल की मान सम्मान की रक्षा उनके पुत्र श्री राम से बेहतर और कोई नहीं कर सकता है इसलिए उन्होंने राजा दशरथ से अपने वचन को पूरा करने के लिए कहा, जिसमें उन्होंने दशरथ से श्री राम के लिए चौदह वर्षों का वनवास मांग लिया और साथ ही अपने पुत्र भरत का राजतिलक।
यह सुनकर सभी हैरान रह गए और कैकेयी माता से कुमाता बन गयीं। जब श्री राम को अपने पिता के दिए हुए वचन के बारे में पता चला तब बिना सोचे समझे उन्होंने फ़ौरन वनवास के लिए हाँ कर दी ताकि राजा दशरथ का दिया हुआ वचन खाली न जाए। जब श्री राम बाली से मिले कहा जाता है कि वनवास पर जाने से पहले रानी कैकेयी ने श्री राम को उस मुकुट के बारे में बताया था जो युद्ध में हार के बाद राजा दशरथ ने बाली को सौंप दिया था। साथ ही उन्होंने श्री राम को यह भी आज्ञा दी थी कि वे बाली के साथ युद्ध कर उसे पराजित करें और अपने पिता का दिया हुआ मुकुट उससे वापस लेकर आएं।
वनवास के दौरान श्री राम ने बाली के छोटे भाई सुग्रीव को न्याय दिलाने के लिए बाली से युद्ध किया जिसमें उसकी हार हुई। तब श्री राम ने उससे अपने पिता के मुकुट के विषय में पूछा बाली ने उन्हें बताया कि वह मुकुट छल से रावण अपने साथ ले गया है। साथ ही उसने श्री राम को आश्वासन दिया कि उसका पुत्र अंगद अपनी जान की बाज़ी लगाकर भी रावण से वह मुकुट वापस लेकर आएगा लेकिन इसके लिए वह अंगद को अपनी शरण में ले लें। जब अंगद ने रावण से वापस लिया राजा दशरथ का मुकुट अपने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए अंगद ने राजा दशरथ का मुकुट वापस लाने की ज़िम्मेदारी ले ली इसलिए वह श्री राम का दूत बनकर लंका पहुंचा।
वहां पहुंचकर उसने सभा में उपस्थित सभी वीरों को चुनौती दे डाली कि उसके पैर को हिला कर दिखाएं। जब सभी ने हार मान ली तब अंत में रावण आगे आया और जैसे ही वह अंगद के पैर को हिलाने के लिए नीचे झुका उसके सिर का मुकुट ज़मीन पर गिर पड़ा। यह देख अंगद ने फ़ौरन वह मुकुट उठाया और सीधे श्री राम के पास पहुंचा ताकि उन्हें उनकी अमानत वापस लौटा सके।

(साभार – द बोल्ड स्काई)

विस्फोट में गंवा दिए दोनों पैर, फिर भी ड्यूटी पर लौटा है सीआरपीएफ का यह जांबाज़ सिपाही!

नयी दिल्ली :   सीमा पर हमारी रक्षा करता हर जवान हमारे आदर का पात्र है, पर इनमें से भी कुछ की कहानी इतनी प्रेरणा भरी होती है कि हम जीवन भर उसे भुला नहीं पाते। ऐसी ही एक कहानी है सीआरपीएफ जवान बी. रामदास के जीवन की, जो इनके शौर्य और अदम्य साहस से भरी हुई है।
नवम्बर, 2017 में छत्तीसगढ़ के सुकुमा जिले में नक्सलियों द्वारा लगाए गए आईईडी ब्लास्ट में वह बुरी तरह से घायल हो गए थे। इस हादसे में उन्होंने अपने दोनों पैर खो दिए।
ज़ी न्यूज़ की रिपोर्ट के मुताबिक, 208 बटालियन कोबरा जवान और जिला पुलिस की एक संयुक्त टीम उप-कमांडेंट अम्बुज कुमार श्रीवास्तव के नेतृत्व में किस्ताराम ज़िले में एक ऑपरेशन पर थी। जब टीम पुलिस स्टेशन से 2 किलोमीटर दूर एक जंगल में निरीक्षण कर रही थी तब रामदास का पैर दबाव संचालित विस्फोटक उपकरण पर पड़ गया और जिसके चलते हुए विस्फोट में वो घायल हो गए।
रामदास को डॉ अनिल द्वारा शुरुआती उपचार दिया गया था, उस वक्त वह अपनी टीम के साथ किस्ताराम में मौजूद थे। रामदास के दोनों पैर गंभीर रूप से चोटिल हुए थे। इसके बाद उन्हें बेहतर इलाज के लिए हेलिकॉप्टर से रायपुर भेज दिया गया।
ऑपरेशन के दौरान उनका जीवन बचाने के लिए उनके दोनों पैरों को घुटने के नीचे से काटना पड़ा।
पर रामदास ने हार स्वीकार नहीं की और हाल ही में ठीक होने के बाद उन्होंने 208 कोबरा टीम में वापसी की है। रामदास और उनकी पत्नी की फोटो साँझा करते हुए मेजर सुरेंद्र पुनिया ने लिखा कि सैनिक घायल होते हैं पर हारते कभी नहीं। इनके लिए देश सबसे बढ़कर है।

( साभार – द बेटर इंडिया)