Friday, April 10, 2026
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ग्लोबल वही हो सकता है जो संवेदनशील हो

कोलकाता  : पंजाबी विद्वान और आनंदपुर साहिब के ‘निशान-ए-खालसा’ से सम्मानित डॉ.जसपाल सिंह ने आज भारतीय भाषा परिषद द्वारा आयोजित कार्यक्रम में कहा कि ‘गुरुग्रंथ साहिब’ एक आध्यात्मिक संदेश होते हुए भी यह संदेश देते हैं कि कपड़े पर खून की एक बूंद भी छींटा हो तो वह गंदा हो जाता है, वर्तमान समय में हर तरफ इतना खून खराबा हो रहा है, हम आज की जिंदगी को सुंदर कैसे कह सकते हैं। उन्होंने आगे कहा कि ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ बड़े संवेदनशील है और उनका संदेश ग्लोबल है। दरअसल ग्लोबल वही हो सकता है जो संवेदनशील हो। ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ में 6 गुरुओं की वाणी के अलावा ऐसे 15 भक्तों के पद हैं जो विभिन्न धर्मों, जातियों और विभिन्न राज्यों के हैं। सिख धर्म एक उदारवादी धर्म है। इसमें ब्राह्मण रामानंद जिन्हें मंदिर से निकाल दिया गया था उन्हें गुरु ग्रंथ साहिब में उच्च स्थान मिला है। वहीं बंगाल के जयदेव हैं तो दलित रैदास भी हैं। यह धर्म सर्वसमावेशी और मानवतावादी है।
कार्यक्रम में सबसे पहले पूर्व कर्नल नरेंद्र सिंह ने रामानंद और शेख फरीद के पद गाकर सांप्रदायिक सौहार्द और प्रीति का संदेश दिया। डॉ.कसुम खेमानी ने पंजाबी विश्‍वविद्यालय के पूर्व-कुलपति डॉ.जसपाल सिंह का अभिनंदन करते हुए कहा कि ‘गुरुग्रंथ साहिब’ की सभा में न कोई बड़ा है और न छोटा है। सभी मनुष्य बराबर है।
परिषद के निदेशक डॉ.शंभुनाथ ने डॉ.जसपाल को शाल और स्मृति चिह्न देकर उनका सम्मान किया। मंत्री बिमला पोद्दार ने सभी पंजाबी विद्वानों डॉ.जसपाल सिंह, तंजीत सिंह, नरिन्दर सिंह, गुरुशरण सिंह एवं सुनीता अहलुवालिया पुष्प स्तवक देकर अभिनंदन एवं सम्मान किया। धन्यवाद ज्ञापन नंदलाल शाह ने दिया।
प्रेषक : सुशील कान्ति

माँ !मुझे अखरता है ,तेरा मेरे पास न होना

नीलम सिंह 

वर्षो बाद छलक अाई आँख मेरी
माँ !तेरी ममता याद करके /

मैने पोंछ लिया था आंसू ,
सोच कर कि ,
अब इसे नही बहना है /

आज याद आया मुझे
कि मैं आती जब दिन भर के बाद ,
तुम देखती मेरा मुरझाया मुँह ,
जान जाती तुम मेरी भूख ,
पीछे घुमती मेरे लेकर फ्लेट
करती मनुहार कुछ खाने को
कहती खा ले ,
दो केले ,एक सेव ,पी ले ग्लास भर दूध
व्रत है तेरा ,,
क्या पता कुछ खाया य़ा नही ,
रह गई यूँ ही सारा दिन /
जानती हूँ मैं ……..
तू है लापरवाह /

बार -बार मना करने पर भी ,
तुम नही मानती /

आज खलती है मुझे तेरी कमी ,
जब घूसते ही घर में ,
हर चेहरा नाराज दिखता है ,
हर लव शिकायत करती है ,
हर अाँख काम खोज़ता है /

बेमन उठती हूँ ,सारे छूटे काम निबटाती हूँ ,
करती हूँ याद तेरा ममता भरा स्पर्श ,
तेरी स्नेह से लिपटी बातें ,
तेरी गोद में सिर रखना ,
तेरे हाथों से साग भात खाना ,
गलती करने पर मेरी ढाल बनना /
माँ !मुझे अखरता है ,तेरा मेरे पास न होना /

माँ,न होती तो मैं न होती

आँखें खुली तो माँ को पाया ,
माँ के आँचल में झूला ,झूला।
माँ ने जब सहलाया मुझको,
तब मुझे चेतना आई।
माँ ने जब अँगुली पकडा़या,
तब,जाकर मुझे चलना आया।
पढ़ना-लिखना, हँसना -रोना,
सब मुझको माँ ने सिखलाया।
माँ,न होती तो मैं न होती
ये जीवन,ये संसार न होता।

बूढ़े मां-बाप को छोड़ने वाले बेटों को 6 महीने जेल भेजेगी सरकार

नई दिल्ली: पूरी दुनिया में आज (13 मई) को मदर्स डे मनाया जा रहा है. सोशल मीडिया पर लोग मां के प्रति अपनी भावनाएं और तस्वीरें शेयर कर रहे हैं। हालांकि बदलते दौर में मां-पिता की उपेक्षा की घटनाएं भी काफी बढ़ गई हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली मौजूदा केंद्र सरकार कानून में कुछ ऐसे बदलाव लाने की तैयारी में है, जिसके बाद कोई भी बेटा बुजुर्ग मां-बाप को अकेला छोड़ने से पहले हिचकेंगे। कानून में बदलाव कर प्रावधान किया जा रहा है कि अगर माता-पिता को छोड़ा या उनसे गलत व्‍यवहार किया तो अब छह महीने की जेल हो सकती है।

फिलहाल 3 महीने जेल का है प्रावधान
माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण व कल्याण अधिनियम 2007 के तहत आरोपी बेटों को तीन साल की सजा का प्रावधान है, जिसे बढ़ाकर छह महीने करने की तैयारी है। न्यूज एजेंसी PTI से बातचीत में एक वरिष्ठ अफसर ने बताया, ‘सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रलय ने संशोधन विधेयक का मसौदा भी तैयार कर लिया है। माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण बिल 2018 के मसौदे के तहत बच्चों की परिभाषा का दायरा भी बढ़ाने का प्रस्ताव किया गया है।

मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि बच्चों की परिभाषा में दत्तक या सौतेले बच्चों, दामाद और बहुओं, पोते – पोतियों, नाती-नातिनों और ऐसे नाबालिगों को भी शामिल करने की सिफारिश की गयी है जिनका प्रतिनिधित्व कानूनी अभिभावक करते हैं। मौजूदा कानून में सिर्फ सगे बच्चे और पोते – पोतियां शामिल हैं।

बच्चे देखभाल से करे इनकार तो कानून का सहारा लें मां-पिता
मंत्रालय ने माता – पिता और वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल और कल्याण कानून, 2018 का मसौदा तैयार किया है। कानूनी रूप मिलने के बाद यह 2007 के पुराने कानून की जगह लेगा।

कानून में मासिक देख – भाल भत्ता की 10,000 रुपये की अधिकतम सीमा को भी समाप्त कर दिया गया है। यदि बच्चे माता-पिता की देखभाल करने से इनकार कर देते हैं तो वह कानून का सहारा ले सकते हैं।

बातें जो हर माँ आपसे पूछती हैं

आज मदर्स डे है। हर मां ऐसी ही होती है, जो बच्चों के लिए अपनी ज़िंदगी उनके नाम कर देती है। जीवन में कोई भी उतार-चढ़ाव आए, लेकिन मां का प्यार कभी नहीं बदलता। हर परेशानी हर दिक्कत को पार कर मां-बच्चों का प्यार हमेशा एक-सा बना रहता हैं कुछ ऐसी बातें हैं जो हर माँ पूछती है या कहती है…कुछ ऐसी बातें –

खाना खाया या नहीं?
आप रात के 2 बजे भी घर क्यों ना पहुंचे, आपकी माँ आपसे हर बार ये जरूर पूछेंगी कि आपने खाना खाया या नहीं?

 मेरा बच्चा सबसे सुंदर
सच में! आपको खुद को भी पता है कि आप खूबसूरती के मामले में कैसे हैं लेकिन आपकी माँ के लिए आप हमेशा राजा बेटा या रानी बिटियां ही रहेगें, जो कि इस दुनिया का सबसे खूबसूरत बच्चा है।

ये क्या पहना है?
जब भी कुछ नए कपड़े ट्राय किया जाए तो हर माँ का सवाल होता है कि ये क्या पहना है? अगर आप भी नए स्टाइल्स अपनाना करना पसंद करते हैं तो ये सवाल आपकी मम्मी भी जरूर पूछती होंगी.

आज क्या खाओगे?
चाहे आप स्कूल में हो या ऑफिस में हर मां अपने बच्चों से ये जरूर पूछेंगी कि आज खाने में क्या बनाऊं? सिर्फ अभी ही नहीं अगर आप 50 साल के भी क्यों ना हो जाएं माँ का ये सवाल हर बार यही रहेगा.

24 घंटे फोन में क्यों घुसे रहते हो!
अब मम्मियों को कौन समझाए कि वॉट्सऐप, फेसबुक, इंस्टाग्राम, स्नैपचैट, ट्विटर जैसे ढेरो ऐप हैं जिन्हें अपडेट करना होता है. खैर, मम्मियों का ये सवाल कभी भी बंद नहीं हो सकता।

 तबीयत ठीक है?
ये बात तो सच है कि जितना ख्याल एक माँ रख सकती है उतना कोई भी नहीं कर सकता। अगर आप घर में थोड़ा थक कर भी पहुंचे तो आपकी मां आपसे जरूर पूछेंगी कि तबीयत ठीक है?

घर कब आ रहे हो?
आप चाहे अपनी मां से 400 किलोमीटर दूर कहीं दूसरे शहर में काम या पढ़ाई के लिये रहें या फिर सिर्फ 4 किलोमीटर दोस्तों के साथ निकलें, हर मां एक ही सवाल पूछती है कि घर कब आ रहे हो?

(साभार)

विरासत ए फैशन – सादगी और अभिजात्यता का संगम बाटिक

बाटिक का नाम सुनते ही दिमाग में शांतिनिकेतन की याद आ जाती है। बंगाल की यह अनमोल धरोहर है मगर यह सिर्फ बंगाल तक सीमित नहीं है। आइए इस धरोहर को जानते हैं…
बाटिक कला का जन्म कहाँ और कब हुआ इसके विषय में मतभेद है। इसके सबसे प्राचीन नमूने बारहवीं शताब्दी के हैं जो इन्डोनेशिया के द्वीप जावा में पाए गए हैं लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि जावा में ही इस कला का आविष्कार हुआ या यह भारतीय पर्यटकों द्वारा वहाँ लायी गयी। खुजराहो की गुफाओं के चित्रों में इसका आरम्भिक रूप बताया जाता है।

मध्यपूर्व, मिस्र, टर्की, चीन जापान और पश्चिम अफ्रीका में भी प्राचीन बाटिक के नमूने मिले हैं किन्तु ये भारतीय और इन्डोनेशियाई कलाकृतियों जैसे कलात्मक नहीं हैं। भारत अत्यंत प्राचीन काल से वस्त्रों पर छपाई और कलाकृतियों के लिये विश्व विख्यात रहा है। यहाँ पर यह कला में उस समय पराकाष्ठा पर थी जिस समय योरप और अन्य देशों में इसका प्रारंभ भी नहीं हुआ था।

मुगलों और अंग्रेज़ों के शासन काल में इस कला में गहरी गिरावट आई, किन्तु २०००वी सदी में इसका उस समय पुनरूद्धार हुआ जब कलकत्ता के प्रसिद्ध शांतिनिकेतन विश्वविद्यालय में इसे एक विषय के रूप में स्थान दिया गया। दक्षिण में मद्रास के निकट प्रसिद्ध शिल्पग्राम चोलमंडल में बाटिक को कलात्मक रूप में ढालने का काम किया गया। बंगाल और मद्रास दोनों के ही बाटिक लोकप्रिय और कला की दृष्टि से संपन्न हुए किन्तु इन दोनों की शैली में काफी अंतर है। बंगाल में अल्पना अाकृतियों का बाहुल्य है और मद्रास में अमूर्त कला को चटकीले रंगों से निखारा गया है।


बाटिक का सही उच्चारण बतीक है जिसका अर्थ है मोम से लिखना या चित्र बनाना। बाटिक की प्रक्रिया में पहले कपड़े पर चित्र बनाया जाता है। इसके बाद जिन स्थानों को बिना रंग के रखना होता है उस पर मोम लगा कर कपड़े को रंग में डुबो दिया जाता है जहाँ जहाँ मोम लगा होता है वहाँ रंग नहीं चढ़ता लेकिन मोम की टूटी हुई दरारों में रंग ज्यामिति के सुन्दर अमूर्त आकारों की दरारें बनाता है।

बाटिक का यही दरार सौन्दर्य इसे अन्य कलाओं से अलग करता है। बंगाल में कपड़ों के साथ चमड़े यानि लेदर बैग और चप्पलों पर भी आपको बाटिक का काम दिखेगा।आज भारत में बाटिक लगभग हर जगह लोकप्रिय और सुलभ है। इसके सीखने और सिखाने की सुविधाएँ लगभग हर नगर में हैं और इसकी लोकप्रियता बेमिसाल है। न केवल वस्त्रों बल्कि कलाकृतियों के रूप में भी इसका प्रयोग अत्यंत लोकप्रिय है।

भारत के साथ साथ श्रीलंका, मलेशिया, इंदोनेशिया और मलेशिया ने भी बाटिक की अपनी अलग अलग पद्धतियाँ विकसित की हैं। हर देश की पद्धति मे थोड़ी बहुत विंभिन्नता और अपने देश की संस्कृति का समन्वय है पर अगर आप ध्यान से देखें तो भारत का प्रभाव हर जगह नज़र आता है। कहीं रंगों में, कहीं शैली में तो कहीं विषय वस्तु में।
(साभार – अभिव्यक्ति)

कामकाजी हों या होममेकर, रहें तरोताजा हरदम

यह सही है कि काम और जिम्मेदारियों के बीच होने वाली भागदौड़ में अपना ख्याल ऱखना आसान नहीं है। आप कामकाजी हों या घर की कमान सम्भाल रही हों, खूबसूरत दिखना आपकी लक्जरी नहीं बल्कि अधिकार और जरूरत है। बहुत ज्यादा मेकअप भले ही अजीब लगे मगर फ्रेश दिखना आपका आत्मविश्वास बढ़ाता है इसलिए जरूरी है कि थोड़ा वक्त आप खुद के लिए भी निकालें। कुछ ऐसे तरीके यहाँ बताये जा रहे हैं जो आपको खूबसूरत ही नहीं बनाएंगे बल्कि तरोताजा होने का एहसास भी देंगे
बाल धोने के बाद सुखाने में वक्त ज्यादा लगता है और हड़बड़ी हो तो ड्रायर का रोजाना इस्तेमाल बालों की जड़ें कमजोर करता है। आप कॉटन टी-शर्ट का इस्तेमाल कर सकती हैं। कॉटन टी-शर्ट तौलिए की तुलना में बालों को जल्दी सुखाती हैं।
अगर आपकी आंखों की पलके हल्की हैं तो उन्हें घना दिखाने के लिए मस्कारा लगाने से पहले अपनी पलकों पर बेबी पाउडर लगाएं। इसके बाद मस्कारा के दो तीन कोट्स लगा दें।
अगर आपको बहुत पसीना आता है तो इस समस्‍या से निजात पाने के लिए सुबह तैयार होते समय आर्मपिट पर थोड़ा-सा बेकिंग सोडा छिड़क लें। ऐसा करने से पूरा दिन आप पसीने की दुर्गंध से दूर रहेंगे। परफ्यूम स्प्रे की जरूरत भी नहीं पड़ेगी।
धूप में रहने की वजह से अगर आपकी त्त्वचा पर भी लाल निशान या मुहांसे हो जाते हैं तो त्वचा पर बर्फ़ रगड़ें, तुरंत राहत मिलेगी। इसके अलावा आइस क्यूब त्वचा में कसावट लाने का भी काम करती हैं।
तरोताजा और साफ दिखने के लिए ऑफिस में एक से दो बार मुंह जरुर धोएं। इससे चेहरे पर आने वाला तेल हटेगा और चेहरा तरोताजा नजर आएगा।
लिपस्टिक को लम्‍बा टिकाए रखने के लिए दो कोट लिपस्ट‍िक का लगाए। पहला कोट लगाने के बाद उसे हल्का करना भी जरूरी है। इससे लिपस्टिक जम जाती है और इसके फैलने का डर भी नहीं रह जाता। अब आप चाहें तो अपनी इच्छानुसार हल्का या गाढ़ा, दूसरा कोट लगा सकती हैं। लिपस्टिक को लम्‍बी देर तक टिकाएं रखने के लिए लिप ब्लोटिंग करें। टिशू पेपर को होंठों के बीच कुछ देर तक दबाकर रखें। ऐसा करने से लिप्स पर मौजूद अतिरिक्त तेल निकल जाएगा। उसके बाद होंठों पर लिपस्टिक लगाएं।
घर हो या ऑफ़िस, देर तक कंप्यूटर पर काम करने की वजह से या फिर देर रात तक जागने की वजह से आपकी आँखें थकी हुई लग रही हैं तो आंखों के निचले हिस्से पर वाइट काजल लगाएं। इसके बाद ऊपरी पलकों पर ब्राउन काजल या लाइनर लगाएं।
ऑफिस में टफ शेड्यूल होने के वजह से आपके पास हाथ पांव की देखभाल के लिए समय नहीं बचता है तो आप रात को सोने से पहले अपने हाथों और पैरों में पेट्रोलयम जेली लगाए। इसके बाद पैरों में जुराबे पहन ले और हाथों को किसी कपड़े से ढक लें। इससे त्वचा में प्राकृतिक नमी बनी रहेगी।

भारत की धरोहर…. महाभारतकालीन इन्द्रप्रस्थ यानि आज का पुराना किला

कुछ जगहें ऐसी होती हैं जिनमें रहस्य भी छुपे हैं और संवेदना भी..मगर लोग महसूस कर पाते होंगे…यह कहना कठिन है। एक वक्त के बाद इमारतें खंडहर में तब्दील हो जाती हैं और वह जगह लोगों के मनोरंजन और वक्त बिताने की जगह बन जाती है। अफसोस है कि दिल्ली का प्राचीन ऐतिहासिक और पुराना किला भी ऐसी जगह बनता जा रहा है। कुछ लोग होते हैं जिनको किले के विशाल परिसर में दबे इतिहास के प्रति मोह और कौतुहल होता है खासकर महाभारत से इस किले का संबंध होना इस मोह को और बढ़ाता है मगर सबके आने का मकसद एक जैसा नहीं होता।

लोग यहाँ वक्त बिताने आते हैं और युवा जोड़ों के लिए तो यह भीड़ से दूर एक शरणस्थली है…आप हर दो कदम पर किले के विशाल परिसर में प्रेमिल मुद्राओं में देख सकते हैं…। फिलहाल किले में खुदाई चल रही है जो शीघ्र ही समाप्त होने वाली है। पुराने किले के बाहर और भीतर सँग्रहालय में इस किले के महाभारतकालीन होने का उल्लेख किया गया है। यहाँ दी गयी जानकारी के अनुसार पांडवों और कौरवों, दोनों की राजधानी यमुना नदी के तट पर स्थित थी।

महाभारत के युद्ध के उपरांत परिक्षित के बाद क्रमानुसार पाँचवें नरेश निचक्षु ने अपनी राजधानी को हस्तिनापुर से कौशाम्बी स्थानांतरित किया था पर इससे इन्द्रप्रस्थ का महत्व कम नहीं हुआ। इन्द्रप्रस्थ का नाम परवर्ती पुराणों में आता है मगर कोई विशेष जानकारी नहीं मिलती और ऐसा प्रतीत होता है कि गुप्त काल तक आते – आते इसकी महत्ता खत्म होने लगी थी।

1955 में पुराना किला टीले पर उत्खनन हुआ और यहाँ स्थित लगभग 1 हजार ई.पू. प्राचीन बस्ती जिसमें धूसर मृदभांड का प्रयोग होता था, के प्रमाण प्राप्त हुए। इसके बाद 1969 में बृजवासी लाल, बालकृष्ण थापर और मुनीश चन्द्र जोशी में नेतृत्व में 4 वर्ष तक उत्खनन हुआ और पुरात्वविदों को मौर्य, कुषाण, परवर्ती गुप्त, राजपूत, दिल्ली सल्तनत और मुगल काल से संबंधित अवशेष प्राप्त हुए। यह महाभारत में व्याख्यायित स्थान है।

किला जिस टीले पर है, उसके नीचे इन्द्रप्रस्थ अथवा इन्दरपत बस्ती है। खांडवप्रस्थ के अतिरिक्त बागपत, तिलपत,सोनीपत और पानीपत, ये गाँव पांडवों ने माँगे थे। उत्तर – दक्षिण की ओर बहती यमुना, खांडवप्रस्थ के पूर्व में तथा अरावली पहाड़ की रिज नामक श्रृंखला के पश्चिम में थी। पुरात्विक उत्खनन से ज्ञात हुआ है कि यहाँ लगभग 1000 ई.पू. बस्ती बस चुकी थी और यह कोटला फिरोजशाह तथा हुमायूँ के मकबरे के बीच स्थित थी। इन्द्रप्रस्थ का जिक्र इतिहासकारों ने यहाँ तक कि अबुल फजल ने भी आइने अकबरी में किया है।

आश्चर्य की बात यह है कि ह्वेनसांग और मेगस्थनीज खामोश हैं मगर अलेक्जेन्ड्रिया के भूगोलशास्त्री टॉलेमी ने इन्द्रप्रस्थ के निकट दैदला नामक स्थान का उल्लेख किया है। किले की विद्यमान प्राचीर एवं अन्य इमारतें शेरशाह सूरी ने हुँमायूँ द्वारा 1533 में स्थापित दीनपनाह नामक शहर को ध्वस्त कर निर्मित की थीं। 1555 में फारस से लौटने के बाद मृत्यु पयर्न्त हुँमायूँ यही रहा। पुराना किला एक अनियमित आयत के रूप में बना है और इसके कोनों तथा पश्चिमी दीवार पर बुर्ज हैं। उत्तर, पश्चिम तथा दक्षिण की ओर किले के तीन प्रमुख द्वार हैं जिनके ऊपर छतरियाँ हैं। इनको क्रमशः तलाकी., बड़ा और हुमायूँ दरवाजा कहते हैं।

कहते हैं कि इसी पुस्तकालय में किताबों के बोझ ले लदा हुमायूँ सीढ़ियों से गिरा था और उसकी मृत्यु हो गयी थी

किले की भीतरी इमारतों में शेरशाह की मस्जिद तथा शेर मण्डल के नाम से प्रसिद्ध मंडप उल्लेखनीय है। प्रारम्भ में दुर्ग प्राचीर के चारों ओर एक खाई थी जो पहले यमुना से जुड़ी थी।इंद्रप्रस्थ बारहमासी नदी यमुना के किनारे है जो आज से लगभग 5000 साल पहले पांडवो की राजधानी के रूप में स्थापित की गयी थी।

सँग्रहालय में रखे गये पुरातन आभूषण

किले के भीतर एक कुंती मंदिर भी मौजूद है, ऐसा माना जाता है की कुंती जो पांडवो की माता थी यही रहा करती थीं। ऐसा भी माना जाता है की ये किला दिल्ली का पहला शहर हुआ करता था। शोधकर्ताओं ने इस बात की पुष्टि की है, 1913 तक एक गांव जिसे इंद्रपत कहा जाता था का अस्तित्व केवल किले की दीवारो के भीतर तक ही था।

यहाँ अब इन्द्रप्रस्थ और पांडवों के आधार पर खुदाई चल रही है

जब एडविन लुटियन द्वारा 1920s दशक के दौरान ब्रिटिश इंडिया की नई राजधानी के रूप में नई दिल्ली को तैयार किया तब उन्होंने केंद्रीय विस्टा, जिसे अब राजपथ कहा जाता है और पुराना किला को श्रेणी बध्य किया। भारत के विभाजन के वक्त, अगस्त 1947 के दौरान पुराना किला हुमायूँ के मकबरे के सबसे समीप था, जो नए पाकिस्तान से आये मुस्लिमो के लिए शरण शिविरों का स्थल बन गया था।

किले के पीछे की झील

इन सभी व्यक्तियों में 12,000 से अधिक सरकारी कर्मचारी थे जिन्हे पाकिस्तान की सेवा के लिए चुना गया था और 150,000 – 200,000 के बीच मुस्लिम शरणार्थियों थे, जो सितंबर 1947 तक पुराने किले में ही रहे जब भारत सरकार ने दो शिविरो का प्रबंध लिया था। पुराना किला कैंप सन 1948 की शुरुआत तक कार्यात्मक रूप से चलता रहा।

किले को संरक्षण की जरूरत है

किले के सँग्रहालय में उत्खनन से प्राप्त प्रागऐतिहासिक मृदभांड के अतिरिक्त तत्कालीन आभूषण और खुदाई स्थल के छायाचित्र व मानचित्र भी देखे जा सकते हैं। ये मृदभांड महाभारतकालीन बताये जा रहे हैं। यह तो तय है कि खुदाई को सही दिशा में ले जाने पर कई नये रहस्य खुलेंगे मगर किले को संरक्षित करने के लिए अधिक सख्ती और जागरुकता की जरूरत है जिससे लोग इसे गम्भीरता से लें।

आधुनिक हिन्दी भाषा और साहित्य के प्रणेता थे आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी

राजेन्द्र परदेसी

हिन्दी के गद्य एवं पद्य दोनों को ही नया स्वरुप, नयी ऊर्जा और नये आस्वाद से सुसम्पन्न करने वाले युगावतार आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जैसे साहित्य साधक ने जो अनन्यतम साहित्यिक अवदान किया है वह हिन्दी के साहित्येतिहास में स्वर्ण अध्याय के रूप में व्यक्त हुआ है। इसकी आभा कभी भी मंद नहीं होगी और हिन्दी के सृजेताओं का युगों-युगों तक मार्ग दर्शन करती रहेगी। आचार्य द्विवेदी जैसे युग प्रवर्तक साहित्य सेवी एवं सम्पादक युगों बाद जन्मते हैं।

भारतेन्दु युग के बाद सन् १९०० के आसपास साहित्यिक सुधारों के कारण द्विवेदी युग का आरम्भ हुआ जो साहित्य के क्षेत्र में खडी बोली को काव्योपयुक्त भाषा के रूप में मान्यता प्रदान किया साथ ही द्विवेदी युग की मान्यता प्रदान किया। साथ ही भारतेन्दु युग की भाषायी कमियों को सुधारते हुए उसे व्याकरण सम्मत बनाने का प्रयास किया गया। जन की रूचि एवं आकांक्षाओं के अनुरूप साहित्य को अनुशासित ढांचे में ढालने के उद्देश्य से समकालीन रचनाकारों के दिशा निर्देशक आचार्य के रूप मे पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी का साहित्य जगत में आगमन हुआ, जिन्होंने साहित्य के भाशा को संस्कारबद्ध बनाने के संल्प को पूरा करने में अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया और इन्हीं के नाम पर साहित्य का यह युग ‘द्विवेदी युग’ के नाम पुकारा जाने लगा।
आधुनिक काल के आरम्भिक दो उप विभाग हिन्दी जगत के लिए काफी महत्वपूर्ण रहे। भारतेन्दु युग रीतिकालीन परम्पराओं से साहित्य को अलग किया तो द्विवेदी युग भाषा और साहित्य में नया सुधार लाया और खडी बोली को साहित्य की भाषा का दर्जा दिया। ये उपलब्धियाँ दो साहित्यकारों की सक्रियता से ही संभव हो सकी। भारतेन्दु हरिशचन्द्र और पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी, वास्तव में ये व्यक्त नहीं एक युग थे। इसीलिए इन दो साहित्यकारों के नाम पर ही साहित्य युग का नामकरण किया गया।
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का जन्म १५ मई १८६४ को उत्तर प्रदेश के रायबरेली जनपद के दौलतपुर ग्राम में हुआ था। प्रारम्भिक शिक्षा गांव के पाठशाला में ही हुई। उसके पश्चात अंग्रेजी पढने के लिए रायबरेली शहर के विद्यालय में प्रवेश लिया। यहाँ की पढाई करने के बाद पिता के पास मुम्बई चले गये। जहाँ पर संस्कृत, गुजराती, मराठी और अंग्रेजी का ज्ञान प्राप्त किया। पढाई समाप्त कर वह रेलवे में नौकरी करने लगे। किन्तु उच्चाधिकारियों से अनबन होने के कारण रेलवे की नौकरी छोडकर साहित्य सेवा में लग गये। सन् १९०३ में साहित्यिक पत्रिका के सम्पादक बने जहाँ सन १९२० तक बडी निष्ठा और लगन से हिन्दी भाषा और साहित्य के उत्थान में संलग* रहे। उन्होंने अपने रचनाकाल में दो महत्वपूर्ण कार्य किये। एक ओर सरस्वती के सम्पादक के रूप में भाषा के परिष्कार और स्वरूप निर्धारण का काम किया तो दूसरी ओर हिन्दी के लेखकों एवं कवियों की एक सशक्त पीढी तैयार किया। काव्य-मंजूषा, कविता-कलाप, सुमन, काव्यकुन्ज, अबला विलाप, गंगालहरी ऋतुतरंगिणी, कुमारसम्भव सार (काव्य) आलोचनांजलि, प्राचीन पंडित और कवि नाट्यशास्त्र, साहित्य संदर्भ, हिन्दी भाषा की उन्नति (निबंध) विनय-विनोद, भामिनी-विलाप (अनुवाद) इत्यादि इनकी प्रमुख
रचनाएं हैं।
आधुनिक हिन्दी साहित्य में नवीन भावनाओं और अवधारणाओं के अभ्युत्थान का श्रेय एक ओर भारतेन्दु को मिला तो उन नवीन भावनाओं के परिष्कार एवं शोधन का श्रेय आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी को। गद्य यो या पद्य सब पर द्विवेदी जी ने अपना प्रभाव डाला। उनके प्रयासों से साहित्य जगत को उच्च कोटि के अनेक साहित्यकार मिले। उन्होंने अपनी लेखनी से पूरे युग के साहित्यकारों का नियमन किया। उनके सद्प्रयासों से खडी बोली हिन्दी न केवल अस्तित्व में आयी, अपितु उसका पर्याप्त सम्बर्द्धन भी हुआ, भावों के परिष्कार के साथ-साथ भाषा को व्याकरण सम्मन संस्कार मिला। भारतेन्दु युगीन साहित्यकारों की साहित्य सर्जना के मनमाने पन पर अंकुश लगा। आचार्य महावीर प्रसाद ने मनमाने पर पर अंकुश लगाया। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की ही देन है कि हिन्दी आज जगह बना
पायी है।
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी मूलतः निबंधकार थे। उन्होंने निबंधकला को पत्रकारिता से जोडकर उसके प्रसार में काफी महत्वपूर्ण कार्य किया। उन्होंने करीब ढाई सौ निबंध लिखा, बेंटेन को आदर्श मानकर उनके निबंधों का अनुवाद भी किया। उसके बहुसंख्यक निबंध परिचयात्मक और आलोचनात्मक टिप्पणियों के रूप में दिखायी देते हैं, वस्तुः उनके निबंधों कें आत्मव्यंजना कम मिलती है। आक्रोश और क्षोभ की स्थिति में कहीं-कहीं उन्होंने अनुचित कार्यों का जब विरोध किया है वहाँ व्यंग्य रूप में उनकी आन्तरिक भावना अवश्य उजागर हुई है। जिसमें न्यायनिष्ठ आत्मा की झलक मिलती है, म्युनिसिपैलिटी के कारनामें, निबंध में व्यंग्य शैली देखने योग्य है, आत्मनिवेदन, प्रभात, सुतापराधे, जनकस्य दण्ड आदि निबंधों में व्यक्तित्व-व्यंजना के तत्व देखे जा सकते हैं।
‘सरस्वती’ के माध्यम से आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने परिचयात्मक आलोचना का सूत्रपात किया। समालोचना को वे पत्रकारिता से जोडकर ही देखते थे। इसमें भी उन्होंने कुछ आदर्श और सिद्धान्त निर्धारित किया। समालोचक के कर्त्तव्य पर टिप्पणी करते उन्होंने लिखा है – किसी पुस् क या प्रबंध में क्या लिखा गया है, किस ढंग से लिखा गया है, वह विषय उपयोगी है या नहीं, उससे किसी का मनोरंजन हो सकता है या नहीं, उससे किसी को भी लाभ पहुँच सकता है या नहीं। लेखक ने कोई नई बात लिखी है या नहीं यही विचारणीय विषय है। समालोचक को प्रधानतः इन्हीं बातों पर विचार करना चाहिए।
द्विवेदी जी ने विषय विवेचना के साथ-साथ भाषा संबंधी त्रुटियों की ओर भी विशेष ध्यान दिया। वे सिद्धान्तों से समझौता करना जानते ही नहीं थे। भाषा और साहितय में स्वयं अनुशासित थे और अन्य को भी अनुशासित देखना चाहते थे। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने उनके महत्व को स्वीकार करते हुए लिखा है – यदि द्विवेदी जी न उठ खडे होते तो जैसी अव्यवस्थित, व्याकरण विरुद्ध और ऊटपटांग भाषा चारों ओर दिखायी पडती थी, उसकी परम्वपरा जल्दी न रूकती निर्णयात्मक आलोचना की शुरूआत आचार्य द्विवेदी ने ही की। कालिदास की आलोचना नैषधचरितचर्चा और विक्रमांक देव चरित चर्चा जैसी आलोचनाएं लिखी। अपने काव्य सिद्धांत प्रतिपादक कुछ निबंधों में कई अंग्रेज लेखकों को भी आधार बनाया। इसका प्रभाव यह हुआ कि इस क्षेत्र में ऐसी पृष्ठ भूमि तैयार हुई, जिस पर आगे चलकर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल तथा बाबू श्याम सुंदर दास ने हिन्दी की वैज्ञानिक आलोचना की भव्य इमारत को
खडा किया और आलोचना एक स्वतंत्र विषय के रूप में स्वीकृत हुई।
गद्य साहित्य की अन्य विधाओं में भी आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का रचनात्मक व्यक्तित्व उजागर हुआ है भारतेन्दु हरिशचन्द्र की भाँति ही आचार्य द्विवेदी ने भी जीवनी साहित्य में रूचि दिखायी और समकालीन रचनाकारों का मार्गदर्शन किया। उनके द्वारा रचित जीवनियाँ, प्राचीन पंडित और कवि (१९१८) सुकवि संर्कीतन (१९२४),
चरित चर्चा (१९२९) आदि ग्रंथों में प्रकाशित है। पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से संस्मरण साहित्य भी आचार्य द्विवेदी के द्वारा अस्तित्व में आया। ‘सरस्वती’ में समय-समय पर रोचक संस्मरण प्रकाशित हुए। उन्होंने अनुमोदन का अंत (फरवरी १९०५), सभा की सभ्यता (अप्रेल १९०७), विज्ञानाचार्य बसु का विज्ञान मंदिर (जनवरी १९१८) की रचना करके संस्मरण साहित्य को समृद्ध किया।
शिक्षा के क्षेत्र में भी आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के रचनात्मक व्यक्तित्व का निखार हुआ है, उनके द्वारा शिक्षा पर आधारित शिक्षा (१९१६) एक महत्वपूर्ण गं*थ है। भाषा, व्याकरण और लिपि संबंधी विचार-विमर्श की शुरुआत भी इस युग में हुई। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी और बालमुकुन्द गुप्त जैसे साहित्यकारों ने इन विषयों पर विद्वतापूर्ण लेखों की रचना की है।
वस्तुतः महावीर प्रसाद द्विवेदी आलोचक, निबंधकार, अनुवादक तथा पत्र-सम्पादक थे, किन्तु काव्य-रचना में भी इनका कोशल दिखायी देता है। वैसे कविता के क्षेत्र में इनकी रूचि नहीं थी। गद्य लेखन में ही आचार्य द्विवेदी को विशेष सफलता मिली। कविता में तत्सम प्रधान समस्त भाषा तथा प्रचलित शब्दावली युक्त सरल भाषा का समिश्रण मिलता है दृष्टव्य है –
पृथ्वी-समुद्र सरित नर-नाग सृष्टि
मांगल्य-मूल-मय वारिद-वारि दृष्टि
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के सम्पादन काल में ‘सरस्वती’ के माध्यम से साहित्य का सृजन, समाज-सुधार, स्वतंत्रता चरित्र निर्माण तथा व्यापक राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर किया गया, इसलिए द्विवेदी युग में कलात्मक निखार कम, किन्तु साहित्य का स्वर गंभीर और दायित्व बोध से अधिक अनुप्राणित रहा7 साहित्य को सभ्य और शिष्ट समाज में सही जगह मिली। भाषा और साहित्य को जो गौरव इस युग में प्राप्त हुआ उसका सारा श्रेय आचार्य द्विवेदी को ही है। प्रखर प्रतिभा के बल पर अपनी साहित्य साधना से हिन्दी भाषा और साहित्य को मौलिक स्वरूप प्रदान करने में उनकी भूमिका अवसिमरणीय है। एक युगान्तकारी व्यक्तित्व के रूप में उनकी छवि स्मरणीय ही नहीं अनुकरणीय भी है। २१ दिसम्बर १९३८ को हिन्दी का इतना बडा साहित्य सेवी देश दुनिया को अलविदा करकर पंचतत्व में विलीन हो गया।
(साभार – राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर)

स्वाभिमान और वीरता के प्रतीक महाराणा प्रताप

महाराणा प्रताप मेवाड़ के शासक और एक वीर योद्धा थे जिन्होंने कभी अकबर की अधीनता स्वीकार नही की। उनका जन्म सिसोदिया कुल में हुआ था। महाराणा प्रताप जीवनपर्यन्त मुगलों से लड़ते रहे और कभी हार नही मानी। महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को राजस्थान के कुम्भलगढ़ में हुआ था। उनके पिता का नाम महाराणा उदय सिंह द्वितीय और माता का नाम रानी जीवंत कंवर [जयवंता बाई] था। महाराणा प्रताप अपने पच्चीस भाइयो में सबसे बड़े थे इसलिए उनको मेवाड़ का उत्तराधिकारी बनाया गया। वो सिसोदिया राजवंश के 54वें शासक कहलाते हैं।

महाराणा प्रताप को बचपन में ही ढाल तलवार चलाने का प्रशिक्षण दिया जाने लगा क्योंकि उनके पिता उन्हें अपनी तरह कुशल योद्धा बनाना चाहते थे। बालक प्रताप ने कम उम्र में ही अपने अदम्य साहस का परिचय दे दिया था। धीरे धीरे समय बीतता गया। दिन महीनों में और महीने सालों में परिवर्तित होते गये। इसी बीच प्रताप अस्त्र शस्त्र चलाने में निपुण हो गये।
महाराणा प्रताप के काल में दिल्ली पर अकबर का शासन था और अकबर की निति हिन्दू राजाओं की शक्ति का उपयोग कर दूसरे हिन्दू राजा को अपने नियन्त्रण में लेना था। 1567 में जब राजकुमार प्रताप को उत्तराधिकारी बनाया गया उस वक्त उनकी उम्र केवल 27 वर्ष थी और मुगल सेनाओं ने चित्तोड़गढ़ को चारों ओर से घेर लिया था। उस वक्त महाराणा उदय सिंह मुगलों से भिड़ने की बजाय चित्तोड़गढ़ छोड़कर परिवार सहित गोगुन्दा चले गये। वयस्क प्रताप सिंह फिर से चित्तोड़गढ़ जाकर मुगलों से सामना करना चाहते थे लेकिन उनके परिवार ने चित्तोड़गढ़ जाने से मना कर दिया।
गोगुन्दा में रहते हुए महाराणा उदय सिंह और उसके विश्वासपात्रों ने मेवाड़ की अस्थायी सरकार बना ली थी। 1572 में महाराणा उदय सिंह अपने पुत्र प्रताप को महाराणा का खि़ताब देकर मृत्यु को प्राप्त हो गये। वैसे महाराणा उदय सिंह अपने अंतिम समय में अपनी प्रिय पत्नी रानी भटियानी के प्रभाव में आकर उनके पुत्र जगमाल को राजगद्दी पर बिठाना चाहते थे। महाराणा उदय सिंह के मृत्यु के बाद जब उनके शव को श्मशान तक ले जाया जा रहा था तब प्रताप भी उस शवयात्रा में शामिल हुए थे जबकि परम्परा के अनुसार राजतिलक के वक्त राजकुमार प्रताप को पिता के शव के साथ जाने की अनुमति नहीं होती थी बल्कि राजतिलक की तैयारी में लगना पड़ता था। प्रताप ने राजपरिवार की इस परिपाटी को तोड़ा था और इसके बाद ये परम्परा कभी नहीं निभायी गयी।
प्रताप ने अपने पिता की अंतिम इच्छा के अनुसार उसके सौतेले भाई जगमाल को राजा बनाने का निश्चय किया लेकिन मेवाड़ के विश्वासपात्र चुंडावत राजपूतों ने जगमाल के सिंहासन पर बैठने को विनाशकारी मानते हुए जगमाल को राजगद्दी छोड़ने को बाध्य किया। जगमाल सिंहासन को छोड़ने का इच्छुक नहीं था लेकिन बदला लेने के लिए अजमेर जाकर अकबर की सेना में शामिल हो गया और उसके बदले उसको जहाजपुर की जागीर मिल गयी। इस दौरान राजकुमार प्रताप को मेवाड़ के 54वें शासक के साथ महाराणा का खि़ताब मिला।
1572 में प्रताप सिंह मेवाड़ के महाराणा बन गये थे लेकिन वो पिछले पांच सालों से चित्तोड़गढ़ कभी नहीं गये थे। उनका जन्म स्थान और चित्तोड़गढ़ का किला महाराणा प्रताप को पुकार रहा था। महाराणा प्रताप को अपने पिता के चित्तोड़गढ़ को पुन: देख बिना मौत हो जाने का बहुत अफ़सोस था। अकबर ने चित्तोड़गढ़ पर तो कब्जा कर लिया था लेकिन मेवाड़ का राज अभी भी उससे दूर था। अकबर ने कई बार अपने हिंदुस्तान के जहापनाह बनने की चाह में कई दूतों को महाराणा प्रताप से संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए भेजा लेकिन हर बार राणा प्रताप ने शांति संधि करने की बात कही लेकिन मेवाड़ की प्रभुता उनके पास ही रहेगी। 1573 में संधि प्रस्तावों को ठुकराने के बाद अकबर ने मेवाड़ का बाहरी राज्यों से सम्पर्क तोड़ दिया और मेवाड़ के सहयोगी दलों को अलग थलग कर दिया जिसमें से कुछ महाराणा प्रताप के मित्र और रिश्तेदार थे। अकबर ने चित्तोड़गढ़ के सभी लोगों को प्रताप की सहायता करने से मना कर दिया।
महाराणा प्रताप ने मुगलों से सामना करने के लिए अपनी सेना को सचेत कर दिया। प्रताप ने अपनी सेना को मेवाड़ की राजधानी कुम्भलगढ़ भेज दिया। उसने अपने सैनिकों को अरावली की पहाड़ियों में चले जाने की आज्ञा दी और दुश्मन के लिए पीछे कोई सेना नही छोड़ी। महाराणा युद्ध उस पहाड़ी इलाके में लडऩा चाहते थे जिसके बारे में मेवाड़ सेना आदि थी लेकिन मुगल सेना को बिलकुल भी अनुभव नहीं था। अपने राजा की बात मानते हुए उनकी सारी सेना पहाड़ियों की ओर कूच कर गयी। अरावली पहाड़ियों पर रहने वाले भील भी राणा प्रताप की सेना के साथ हो गये। महाराणा प्रताप खुद जंगलों में रहे ताकि वो जान सकें कि स्वंत्रतता और अधिकारों को पाने के लिए कितना दर्द सहना पड़ता है। उन्होंने पत्तल में भोजन किया, जमीन पर सोये और दाढ़ी नहीं बनाई। दरिद्रता के दौर में वो  कच्ची झोपड़ियों में रहते थे जो मटि्टी और बांस की बनी होती थीं।
शांति प्रयत्नों की विफलता के कारण 18 जून 1576 को महाराण प्रताप के 20000 और मुगल सेना के 80000 सैनिकों के बीच हल्दीघाटी का युद्ध शुरू हो गया। उस समय मुगल सेना की कमान अकबर के सेनापति मान सिंह ने संभाली थी। महाराणा प्रताप की सेना मुगलों की सेना को खदेड़ रही थी। महाराणा प्रताप की सेना में झालामान, डोडिया भील, रामदास राठोड़ और हाकिम खां सूर जैसे शूरवीर थे। मुगल सेना के पास कई तोंपे और विशाल सेना थी लेकिन प्रताप की सेना के पास केवल हिम्मत और साहसी जांबाजों की सेना के अलावा कुछ भी नहीं था। महाराणा प्रताप की सेना तो पराजित नहीं हुयी लेकिन महाराणा प्रताप स्वयं मुगल सैनिकों से घिर गये थे। महाराणा प्रताप के बारे में कहा जाता है कि उनके भाले का वजन 80 किलो और कवच का वजन 72 किलो हुआ करता था और इस तरह उनके भाले, कवच, ढाल और तलवारों को मिलाकर कुल 200 किलो का वजन साथ लेकर युद्ध करते थे। ऐसा कहा जाता है इस वक्त राणा प्रताप के हमशक्ल भाई शक्ति सिंह ने प्रताप की मदद की। एक दूसरी दुर्घटना में महाराणा प्रताप का प्रिय और वफादार घोड़ा चेतक प्रताप की जान बचाते हुए वीरगति को प्राप्त हो गया।
इतिहासकार कर्नल टॉड ने हल्दी घाटी के युद्ध को मेवाड़ की ‘‘थर्मोपल्ली‘‘ की संज्ञा दी है। इस युद्ध में महाराणा प्रताप का स्वामी भक्त एवं प्रिय घोड़ा चेतक मारा गया। हल्दी घाटी के युद्ध में पराजय के बावजूद महाराणा प्रताप के यश और कीर्ति में कोई कमी नहीं आई। बल्कि हल्दी घाटी को इस युद्ध ने समूचे भारत के स्वाधीनता प्रेमियों के लिए पूजनीय क्षेत्र बना दिया। वहीं इस युद्ध ने महाराणा प्रताप को जननायक के रूप में सम्पूर्ण भारत वर्ष में प्रसिद्ध कर दिया। हल्दी घाटी के युद्ध में पराजय के बाद राणा प्रताप के जीवन में जिस संकट काल का प्रारंभ हुआ वह लगभग दस वर्ष (1576-1586) तक चला और बीतते समय के साथ वह अधिक विषम होता चला गया। इस दौरान गोगुन्दा से दक्षिण में स्थित राजा गांव में राणा के परिवार को घास की रोटी भी नसीब नहीं हुई और एक बार वन विलाव उनके भूख से बिलखते बच्चों के हाथ से घास की रोटी भी छीन कर ले गया था।
सम्पूर्ण मेवाड़ प्रान्त पर अपना आधिपत्य जमाने और प्रताप को पकड़ने के उद्देश्य से अकबर ने अक्टूबर 1576 को पुन: मेवाड़ पर चढ़ाई कर दी, परन्तु वह प्रताप को पकड़ने में सफल नहीं हो सका। अकबर ने 15 अक्टूबर 1577 को अपने शिपहसालार शाहबाज खां को कुम्भलमेर के गढ़ को फतेह करने के लिए भेजा। उसने जून 1578 में किला तो फतेह कर लिया, किन्तु वह भी महाराणा प्रताप को नहीं पकड़ सका।
इस संकट के समय में महाराणा प्रताप के मंत्री भामाशाह और उनके भाई ताराचंद ने मुल्क मालवे से दण्ड के 25 लाख रूपए तथा 20 हजार स्वर्ण मुद्राएं उनको भेंट कर अपनी स्वामी भक्ति का परिचय दिया। इस धन से उन्होंने पुन: सेना जुटाकर ‘‘दिवेर” को जीत लिया और ‘‘चांवड‘‘ पंहुचकर अपना सुरिक्षत मुकाम बनाया। मेवाड़ के बचे भाग पर फिर से महाराणा का ध्वज लहराने लगा। बांसवाडा और डूंगरपुर के शासकों को भी पराजित कर प्रताप ने अपने अधीन कर लिया। यह समाचार पाकर अकबर तिलमिला उठा और उसने पुन: शाहबाज खां को 15 दिसंबर 1578 को महाराणा को कुचलने के लिए शाही लवाजमें के साथ यह आदेश देते हुए भेजा कि यदि तुम प्रताप का दमन किए बिना वापिस लौटे, तो तुम्हारे सिर कलम कर दिए जाएंगे। शाही लवाजमें और कठोर आदेश के बावजूद शाहबाज खां प्रताप को नहीं पकड़ सका। तीसरी बार बादशाह ने 9 नवम्बर 1579 को शाहबाज खां को प्रताप को पकड़ने के लिए मेवाड़ भेजा, जिसमें उसे सफलता नहीं मिली।
1580 में बादशाह अकबर ने अब्दुर्रहीम खानखाना को अजमेर का सूबेदार नियुक्त किया और उसे मेवाड़ विजय का अभियान सौंपा। अब्दुर्रहीम ने अपने परिवार को शेरगढ़ में छोड़कर राणा पर चढ़ाई कर दी। कुंवर अमरसिंह ने खानखाना का ध्यान बढ़ाने के लिए शेरगढ़ के पास आक्रमण किया और खानखाना की बेगमों सहित उसके परिवार को बंदी बना लिया। जब महाराणा प्रताप को इस बात का पता चला, तो उन्हें बहुत आत्मग्लानि हुई और उन्होंने कुंवर को खानखाना के परिवार को ससम्मान पंहुचाने की आज्ञा दी। इससे प्रमाणित होता है कि प्रताप अपने शत्रु की स्त्रियों को भी कितना सम्मान देते थे। अकबर ने प्रताप को समाप्त कर उसके साम्राज्य पर आधिपत्य करने के उद्देश्य से विभिन्न सेनापतियों को समय-समय पर मेवाड भेजा, किन्तु 12 वर्ष तक उसे इस उद्देश्य में सफलता नहीं मिली।
अकबर के आक्रमक अभियानों की समाप्ति के बाद मेवाड़ में नए युग का सूत्रपात हुआ। महाराणा प्रताप ने एक वर्ष में ही चितौडग़ढ़ और जहाजपुर को छोड़कर सम्पूर्ण मेवाड़ पर सत्ता कायम कर ली। उन्होंने चांवड को अपनी राजधानी बनाकर सारे राज्य में शांति व्यवस्था कायम की, जिससे खेत फिर से लहलहाने लगे, उद्योग-व्यवसायों में प्रगति हुई और उजड़े नगर-कस्बे पुन: आबाद हुए और मेवाड़ फिर से चमन बन गया।
महाराणा प्रताप कुशल प्रशासक होने के साथ-साथ पीड़ितों और विद्वानों का आदर भी करते थे। उनकी प्रेरणा से ही मथुरा के चक्रपाणी मिश्र ने‘‘ विश्व वल्लभ‘‘ नामक स्थापत्य तथा ”मुहूर्त माला” नामक ज्योतिष ग्रंथ की रचना की। चांवड में चावंड माता के मंदिर का निर्माण भी राणा प्रताप ने ही करवाया था। उनके दरबार में कई विख्यात चारण कवि भी थे, जिनमें कविवर माला सांदू और दुरासा आढा ने उनकी प्रशंसा में उच्च कोटि की काव्य रचना की। सादडी में जैन साधू हेमरत्न सूरि ने ”गोरा बादल-पद्मिनी चौपाई” की रचना भी प्रताप के समय ही की थी। महाराणा प्रताप ने चावंड को चित्रकला का केन्द्र बनाकर नई चित्र शैली ”मेवाड शैली” का प्रारम्भ करवाया।
महाराणा प्रताप की 11 रानियां, 17 पुत्र और 5 पुत्रिया थीं। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम दिनों में अपने पहले पुत्र अमर सिंह को सिंहासन पर बिठाया। महाराणा प्रताप कभी चित्तोड़गढ़ वापस नहीं जा सके लेकिन वो उसे पाने के लिए जीवनपर्यन्त प्रयास करते रहे। जनवरी 1597 को मेवाड़ के महान नायक महाराणा प्रताप शिकार के दौरान बुरी तरह घायल हो गये और उनकी 56 वर्ष की आयु में मौत हो गयी। उन्होंने मृत्यु से पहले अमर सिंह को मुगलों के सामने कभी समर्पण ना करने का वचन लिया और चित्तोड़गढ़ पर फिर विजय प्राप्त करने को कहा। ऐसा कहा जाता है कि प्रताप की मौत पर अकबर खूब रोया था कि एक बहादुर वीर इस दुनिया से अलविदा हो गया। उनके शव को 29 जनवरी 1597 को चावंड लाया गया। इस तरह महाराणा प्रताप इतिहास के पन्नों में अपनी बहादुरी और जनप्रियता के लिए अमर हो गये। महाराणा प्रताप अपनी मृत्यु तक घास के बिछौने पर सोते थे, क्योंकि चितौड़गढ़ को मुक्त करने की उनकी प्रतिज्ञा पूरी नहीं हुई थी।