Tuesday, October 6, 2026
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बोलने के लिए सही वक्त का इन्तजार करते हुए देर भी हो जाती है

मेंटल हेल्थ प्रोफेशनल का समाज से रिश्ता होता है मगर क्या एक बेहद सुविधाजनक जिंदगी बिताने की जगह अपने अनुभव उपेक्षितों और तस्करी की शिकार महिलाओं को आने लाने पर खर्च कर सकता है? अगर वह महिला हो तो क्या वह इस कदर उनसे प्यार कर सकती है कि वह हर एक युवती और महिला का नाम याद रखे और ऐसा महसूस हो कि ये सभी उसकी जिंदगी का हिस्सा हैं? जब उमा चटर्जी से हमारी मुलाकात हुई तो इन सारे सवालों के जवाब हाँ में मिले। संजोग नामक सामाजिक संस्था के जरिए वे प्रशासन और जीविता (सर्वाइवर) महिलाओं के बीच सम्पर्क बन रही है। साथ ही वे चेंज मंत्रा नामक कंसल्टेंसी फर्म भी साझा तौर पर चलाती हैं। संजोग की सह संस्थापक और चेंज मत्र की सह संचालक उमा चटर्जी से जो बातें कीं, उसी के खास अंश –
मेंटल हेल्थ प्रोफेशनल हूँ और तस्करी के खिलाफ भी काम कर रही हूँ
मैं मेंटल हेल्थ प्रोफेशनल हूँ। साइकोलॉजिस्ट और साइकोलॉजी पढ़ी है। काम तो मैंने 2003 से ही आरम्भ किया था और बतौर साइकोलॉजिकल ट्रेनर बच्चों, युवाओं और बड़ों के साथ काम करती रही हूँ। अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भी काम किया है। हमें हमेशा सिखाया जाता है कि दूसरों को खुश रहकर शांति मिलती है और यह खुश रहने का तरीका है मगर इस वजह से शांति रखने के लिए हम खामोश बैठ जाते हैं। अब तक हर तरह के अनुभव मिले और एक समय के बाद लगा कि बहुत हो गया और अब आवाज उठानी चाहिए और यह मुझे ठोस तरीके से करना होगा। मैंने बहुत सी सामाजिक कार्यकर्ताओं को काम करते देखा है, तस्करी की शिकार लड़कियाँ देखी हैं और उनके साथ काम किया है और हर बार लगा कि सबकी कहानी कहीं न कहीं एक जैसी है।
आज सकारात्मक परिवर्तन हो रहा है
आज स्थिति बदल रही है। आज से 10 साल पहले लड़कियाँ तस्करी और यौन उत्पीड़न के दलदल से निकलती थीं तो उनको कोई अपनाने के लिए तैयार नहीं होता था, परिवार उसे मरा हुआ मान लेता था। आज इन जीविताओं के परिवार खासकर पिता और भाई न सिर्फ उनको अपना रहे हैं बल्कि उनको लड़ने की हिम्मत भी दे रहे हैं। सकारात्मक परिवर्तन हुआ है और लोग जागरूक हो रहे हैं। आज युवा इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं।
तस्करी बिल एक सपना है, एक वचन है
इस बिल से हमें काफी उम्मीदें हैं क्योंकि यह पुनर्वास को अधिकार मानने की बात करता है। सबूत देने की जिम्मेदारी अभियुक्त की है मगर इसे और भी सख्त बनाने की जरूरत है। मानव तस्करी बिल कई सर्वाइवर्स और मानवाधिकार संरक्षकों के लिए एक सपना है। मानसून सत्र में यह लोकसभा में यह पारित हो चुका है। इस साल शीतकालीन सत्र में राज्यसभा में पारित कर इसे कानून बनाकर भारत एक इतिहास बना सकता है। यह वह वचन है जो प्रधानमंत्री ने दिया है। यह वह वचन है कि जिसे भारत को हर प्रकार की तस्करी के खिलाफ और तस्करी के सर्वाइवर्स के साथ मजबूती से खड़ा होने के लिए निभाना है। हमें उम्मीद है कि इस शीतकालीन सत्र में यह बिल पारित हो जाएगा। देखें, क्या होता है।

लैंगिक समानता के लिए काम करता है संजोग
संजोग लैंगिक समानता के साथ स्त्री पुरुष के संबंधों में संतुलन लाने और तस्करी और असमानता के शिकार लोगों के लिए काम कर रहा है। संजोग का मतलब हिन्दी में इक्तेफाक होता है मगर बांग्ला में इसका मतलब जोड़ना होता है। कानूनी तौर पर इसकी शुरुआत 2012 में हुई थी। संजोग में उत्थान नामक लीडरशिप ग्रुप है जो लड़कियों में नया आत्मविश्‍वास और जीने की उम्मीद भरने की कोशिश कर रहा है। हम शोध करते हैं। राज्य की टास्क फोर्स के सदस्य है और केन्द्रीय स्तर पर स्टैंडिंग कमेटी के सदस्य हैं।
सकारात्मक सोच वाले लड़कों को साथ लाना है
लड़कियों को और सशक्त बनाना है। उनका सपोर्ट सिस्टम मजबूत करना है। सच है कि आप किसी के लिए लड़ नहीं सकते इसलिए हम चाहते हैं कि ये लोग अपनी लड़ाई खुद लड़े, हम बस उनको सहयोग करने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। जो लड़के सकारात्मक सोच रखते हैं, हमें उनको साथ लाना है। कोशिश है कि नीति निर्धारकों और समस्या से जूझ रहे लोगों के बीच की खाई दूर की जाए।
बोलने के लिए सही वक्त का इन्तजार करते हुए देर भी हो जाती है
बोलना जरूरी है और इसके लिए सही वक्त का इंतजार करना कतई जरूरी नहीं है क्योंकि चीजों के सही होने का इंतजार करने तक बहुत देर हो चुकी होती है। सब कुछ करीने से सजा हो, यह जरूरी नहीं है। लोग अनगढ़ कहानियाँ भी ध्यान से सुनते हैं।

497 का खत्म होना अपराधी नहीं बनाता मगर बेवफाई का लाइसेंस भी नहीं

गुजरे माह का अंतिम सप्ताह गहमागहमी से भरा रहा। कई फैसले सुप्रीम कोर्ट में ने दिए और कुछ ऐसे फैसले भी दिए जिससे परम्परागत भारतीय समाज हिल गया है। धारा 377 के झटके से अभी लोग उबरे नहीं थे कि धारा 497 को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में स्त्री को सम्पत्ति मानने से इनकार कर दिया मतलब अवैध कहे जाने वाले यानि अडल्टरी के मामले में औरतों को सजा के दायरे में लाने से इनकार कर दिया और अब लोग सीधे इसे शादी, परिवार और समाज की सोच पर हमला करने वाला फैसला बता रहे हैं। देखा जाए तो औरतों को इस कानून के निरस्त हो जाने का लाभ मिलेगा, ऐसा दिखता तो नहीं है बल्कि अडल्टरी के जिस सेफ्टी वॉल्व के हथियार से अब तक वे रिश्ते और परिवार को बचाती आ रही थीं, वह भी टूट जायेगा।
अगर हम यह कहें कि अवैध सम्बन्ध नहीं होते तो यह गलत है, होते हैं मगर समाज और बच्चों के दबाव में एक छत के नीचे अजनबी की तरह रहते हुए भी तमाम उपेक्षाओं के बावजूद जीवन काट लेती हैं। पुरुष मजबूरन आवरण रखता है, छोड़कर जाता है फिर बुढ़ापे में लौट आता है या कई बार दोनों रिश्ते एक साथ निभाकर प्रतिष्ठा के साथ रहता है। 3 -4 पत्नियों की स्वीकृति समाज में है मगर जब बात महिलाओं की आती है तो यह बात गले नहीं उतारी जाती। महिलाओं के ऐसे रिश्ते भी या तो उच्च वर्ग में होते हैं या निम्न मध्यम वर्ग में और यहाँ पर भी ढके – छिपे रहते हैं। कला के क्षेत्र में तो किसी तीसरे का होना प्रेरणा की तरह होता है जिसे सब जानते हैं मगर स्वीकार कर लेते हैं।
पत्नियों को यह भरोसा होता है कि अन्ततः उनका पति उनका ही है इसलिए भी वे खामोशी साध लेती हैं, ये जानते हुए भी उनका पति कई लड़कियों की जिन्दगी बर्बाद कर रहा है, उनको कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उनका घर और परिवार सुरक्षित है। वे लड़कियों से लड़ बैठती हैं मगर अपने पति के खिलाफ जुबान नहीं हिलातीं क्योंकि उनका घर सुरक्षित है, उनका दर्जा सुरक्षित है, वे आर्थिक और सामाजिक रूप से सुरक्षित हैं। कारण यह है कि उच्च वर्ग में ऐसा हुआ तो पत्नियों के नाम अच्छी – खासी सम्पत्ति लिख देते हैं और प्राथमिकता भी अपने बच्चों और परिवार को ही देते हैं मगर वफादारी निभाने के चक्कर में शोषित होती है वह दूसरी औरत और अन्ततः उसे कहीं जगह नहीं मिलती। कभी अन्या से अनन्या पढ़ें तो आपको इस दोहरेपन का वीभत्स चित्रण मिलेगा। अवैध कहे जाने वाले सम्बन्धों को लेकर लिखा खूब गया है। फिल्में भी बनी हैं मगर भारतीय समाज ने उनको स्वीकार नहीं किया। यश चोपड़ा की सिलसिला से लेकर करण जौहर की कभी अलविदा न कहना बुरी तरह पिटी मगर समय बदल रहा है। अच्छा अब कल्पना कीजिए, अगर कानून निरस्त न होता और आपकी इच्छा के अनुसार महिलाओं को भी सजा दी जाने लगती तो क्या आप उनको जीने देते? क्या आप यह दावा कर सकते हैं कि आप उनको हदें नहीं बतातें। अभी भी तो अधिकतर ऐसे मामलों में पत्नी की हत्या करना ही तो आम बात है न, ऐसे में तो यही कहा जा सकता है कि यह एक विरोधाभासी फैसला है मगर आपके रवैये ने इसे न्यायसंगत बना दिया है।
औरतों को औरतों के रूप में देखिए न इन्सान की तरह, अपनी तरह, ये देवी बनाकर अपनी जिम्मेदारियों से पीछा छुड़ाने का कोई मतलब है। कोर्ट ने बस इतना ही कहा है कि औरतें भी आपकी तरह ही इन्सान हैं, सम्पत्ति नहीं जिसके आप मालिक बने बैठे हैं।
सवाल तो एक छोटा सा ही है कि क्या जिस देश को रिश्तों और परम्पराओं के लिए जाना जाता रहा है, वहाँ यह डोर क्या इतनी कमजोर थी कि एक कानून खत्म होने से रिश्ते भी टूट जायेंगे? क्या नैतिकता की यह डोर इतनी कमजोर है, अगर हाँ तो इसे टूट ही जाने दीजिए? दरअसल, आप डरे इसलिए हैं क्योंकि आप शादियाँ ही कई बार इमोशनल ब्लैकमेलिंग करके करवाते रहे हैं कि शादी के बाद सब ठीक हो जाएगा। आपने अपनी शान और इज्जत के नाम पर बेटों की जिन्दगी से प्यार छीना तो बेटियों की पढ़ाई छुड़वाकर दूर ब्याहा तो आपका डरना तो स्वाभाविक है। जिस समाज में रिश्तों को भय और घुटन के बीच ढोया जा रहा है, वहाँ तो कुछ न कुछ टूटेगा और आपको डर है कि अब आपराधिक मामले में फँसा भी नहीं सकते तो आप तो दूसरा तरीका भी आजमाते हैं…सीधे मार डालते हैं। ऑनर किलिंग को लेकर सुप्रीम कोर्ट कितनी बार आपको टोक चुका है, आप बदले? नहीं बदले तो एक 497 के न रहने से क्या फर्क पड़ेगा। आप प्यार छीनकर किसी को भावुकता के जाल में फँसाकर उसे दूसरी जगह अपने स्टेटस के हिसाब से बाँध सकते हैं, प्यार नहीं बना सकते हैं, समझौता करना सिखा सकते हैं। आपने यही किया है सदियों से और इसलिए आप तो डरेंगे ही। भारत में 80 प्रतिशत अडल्टरी के किस्से ऐसे ही खत्म हो जाएंगे अगर अविवाहित लड़कियों या लड़कों को घुमाना भी इसका आधार माना जाए और पति या पत्नी इसे लेकर ईमानदारी से सख्ती बरतें। हमारे देश में बेवफाई का किस्सा भी अजीब होता है या यूँ कहें कि उसकी परिभाषा भी बड़े अजीब तरीके से होती है। अगर बात न्याय की करनी है तो ईमानदारी के साथ विवाहित ही नहीं अविवाहित लड़कियों या लड़कों को घुमाना भी अपराध के दायरे में लाइए…दूसरी औरत या दूसरे पुरुष की जगह एक नजर खुद पर और अपने आदर्श जीवनसाथी पर भी डालिए और हर फैसला ईमानदारी से लीजिए….फिर किसी सेफ्टी वॉल्व की जरूरत नहीं पड़ेगी जैसे अब 497 की नहीं है। यह अपराध का नहीं रहा मगर तलाक का आधार तो अब भी है।  497 का खत्म होना आपको अपराधी नहीं बनाता मगर यह बेवफाई का लाइसेंस भी नहीं है।

हिन्दी में हस्ताक्षर करने की प्रतिज्ञा लें : प्रो० सुनील कुमार ‘सुमन’ 

कोलकाता :  महाराजा श्रीशचंद्र  कॉलेज में हिन्दी दिवस समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रिंसिपल श्यामल भटाचार्य ने कहा कि हिन्दी राष्ट्र भाषा है जो भारत के विभिन्न राज्यों को संपर्क भाषा के रूप में जोड़ने का काम करती है। मुख्य अतिथि महात्मा गाँधी अंतराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉक्टर सुनील कुमार सुमन कहा कि  संविधान निर्माण के समय सबसे ज्यादा बहस राजभाषा के रूप में हिन्दी को लेकर हुई हैं। उन्होंने कहा कि हिन्दी का ज्यादा विकास हिंदीतर भाषियों के द्वारा हुआ है। उन्होंने यह भी कहा कि हिन्दी में रोजगार के विकल्प काफी ज्यादा  हैं। हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ कार्तिक चौधरी ने कहा कि हमारे देश में राष्ट्र-ध्वज, राष्ट्र-गान का जो महत्व है वही महत्व राजभाषा हिन्दी भाषा का है। सिटी कॉलेज के हिन्दी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो संदीप प्रसाद ने अपने वक्तवय में हिन्दी में अन्य भाषाओं से आए हुए शब्दों के प्रयोग में सावधानी बरतने तथा हिन्दी से अन्य भाषाओं से तुलना न कर उसे बढ़ावा देने की बात की। कलकत्ता गर्ल्स कॉलेज  के प्रो  अम्बर चौधरी ने कहा कि हिन्दी सम्मान की भाषा है। हिन्दी दिवस के इस कार्यक्रम में विद्यार्थियों ने स्वरचित नाटक ‘हिन्दी बोल रही है’ का मंचन किया। कार्यक्रम में महाविद्यालय के विभिन्न विभागों के अध्यापकों को सम्मानित एवं विभिन्न प्रतियोगिताओं में सफल विद्यार्थियों को पुरस्कृत किया गया। पूरे कार्यक्रम के आयोजन में विक्रम साव, सुशील सिंह, राहुल चौधरी, उत्तम गुप्ता, श्रुति राय, मेहरून नाज, दीपक सिंह, पूजा सिंह आदि ने प्रमुख भूमिका निभाई।

काँचरापाड़ा हार्नेट इंग्लिश मीडियम स्कूल में मनाया गया हिन्दी दिवस

काँचरापाड़ा : काँचरापाड़ा हार्नेट इंग्लिश मीडियम स्कूल में हिन्दी दिवस मनाया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विद्यालय के प्रधानाचार्य श्यामल कुमार बनर्जी ने कहा कि हिन्दी एक मात्र ऐसी भाषा है जो सम्पूर्ण भारत को एकता के सुत्र में बांधें रखी है। हिन्दी राष्ट्र की गौरव है। इस अवसर पर विद्यालय के छात्रों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए। साथ ही काव्य आवृति तथा भाषण प्रतियोगिता भी आयोजित की गई जिसमें छात्रों ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया जिसमें अद्वीति तिवारी, मुस्कान शर्मा, संचिता, कयनात, शिवांक्षी कुमारी, प्रिया यादव, ऋतु कुमारी, अभिनव कुमार, आयुष कुमार ,कुसुम कुमारी ,प्रियांशु दास प्रमुख रूप से भागीदारी निभाई। शिक्षकों में चमेली पाल, डॉ मधुमिता धोषाल, प्लावनी राय सेनगुप्ता,अर्पिता राय, पिंटू कुमार ठाकुर ने हिन्दी पर अपने विचार रखें तथा हिन्दी के महत्व से बच्चों को अवगत कराया। कार्यक्रम का संचालन धर्मेंद्र राय ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन विद्यालय की उपप्रधानाचार्य ज्योत्षना बनर्जी ने किया।

‘भारतीय भाषाओं के बीच एक सांस्कृतिक पुल है हिन्दी ’

मिदनापुर : विद्यासागर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग की ओर से हिन्दी दिवस के अवसर पर `हिन्दी का राष्ट्रीय संदर्भ’ विषय पर परिचर्चा का आयोजन किया गया । इस कार्यक्रम में सर्वप्रथम साहित्यकार विष्णु खरे के निधन पर एक मिनट का मौन रखकर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई । इस अवसर पर कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विद्यासागर विश्वविद्यालय के कला और वाणिज्य विभाग के संकायाध्यक्ष प्रो. दामोदर मिश्र ने कहा कि हिन्दी अस्मिता की पहचान की भाषा है । ऐसे में समाज और राष्ट्रीय-मूल्यों को बचाने का संकल्प हिन्दी  से जुड़ा है । हमें मिलकर सभी भारतीय भाषाओं को बचाना होगा । डॉ. श्रीकांत द्विवेदी ने कहा कि हिन्दी का सहज होना उसे ज्यादा व्यापकत्व प्रदान करता है, हमें हिन्दी को ज्यादा से ज्यादा लोगों के चिंतन और सृजन का हिस्सा बनाना होगा । शोधार्थी दीपनारायण ने कहा कि हिन्दी के अधिकाधिक प्रयोग से ही पूरे देश में एक सेतु का निर्माण होगा । अमित राय ने कहा कि हिंदी पूरे देश से संवाद स्थापित करते हुए सबको साथ लेकर चलने का आह्वान करती है । मधुलिका कुमारी ने कहा कि हिन्दी जुबान की गुलामी का माध्यम बन रही है । इस अवसर पर अभिलक्ष्य आनंद, प्रियंका गुप्ता, विनय प्रसाद, रीता जायसवाल, रुखसार परवीन, पूनम गुप्ता ने अपने विचार रखे । इस अवसर पर आयोजित आशुभाषण में प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय स्थान क्रमशः पूनम गुप्ता, श्रद्धा उपाध्याय एवं टीना परवीन को मिला । साहित्य प्रश्नोत्तरी में प्रथम स्थान मधु सिंह, रेशमी वर्मा, श्रद्धा के दल को, द्वितीय स्थान पूनम गुप्ता, अनिल शाह, सलोनी शर्मा के दल को तथा तृतीय स्थान अभिलक्ष्य आनंद, धनंजय प्रसाद, शारदा महतो के दल को मिला । एम. फिल की छात्रा रेशमी वर्मा ने कविता पर नृत्य प्रस्तुत किया । विभाग के विद्यार्थियों ने कविता पर सुंदर आवृत्ति प्रस्तुत की । मधु सिंह, पूनम गुप्ता, शारदा महतो, सलोनी शर्मा, विनय प्रसाद, श्रद्धा उपाध्याय, बिट्टू कौर ने अपनी स्वरचित कविताओं का पाठ किया ।
कार्यक्रम का सफल संचालन करते हुए विभागाध्यक्ष संजय जायसवाल ने कहा कि हिन्दी ने नवजागरण-काल में पूरे भारत को एकता के सूत्र में बांधा । हिन्दी पूरे देश में आभिभावक की भूमिका में है, जो सभी भारतीय भाषाओं को साथ लेकर चलने के संकल्प के साथ अपना विस्तार कर रही है । धन्यवाद ज्ञापन अमित राय ने दिया ।

बंद वातायन

राज्यपाल व कवि केसरीनाथ त्रिपाठी की कविता का पाठ  प्रख्यात रंगकर्मी तथा कवियित्री  उमा झुनझुनवाला ने किया है

नहीं रहे मशहूर कवि-पत्रकार विष्णु खरे

नयी दिल्ली : मशहूर कवि और पत्रकार विष्णु खरे नहीं रहे। वे 78 साल के थे। पिछले हफ्ते ब्रेन हैमरेज के बाद उन्हें दिल्ली के जीबी पंत अस्पताल में भर्ती कराया गया था। जहां बुधवार को उन्होंने आखिरी सांस ली। खरे ने 30 जून को हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष का पद संभाला था। इंदौर से पत्रकारिता की शुरुआत की थी विष्णु खरे का जन्म मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा में 1940 में हुआ था। उन्होंने इंदौर में इंग्लिश से एमए करने के बाद बतौर हिंदी पत्रकार करियर की शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने लखनऊ, जयपुर, दिल्ली समेत कई शहरों में हिंदी अखबार के संपादक की भूमिका निभाई। खरे का पहला काव्य संग्रह ‘एक गैर रूमानी समय में’ था। 2008 में प्रकाशित ‘पठांतर’ उनके पांच काव्य संग्रहों में आखिरी था। खरे ने ब्रिटिश कवि टीएस इलियट की कविताओं समेत कई किताबों के अनुवाद भी किए।

‘विलेज रॉकस्टार’ ऑस्कर 2019 के लिये भारत की आधिकारिक प्रविष्टि

मुम्बई : रीमा दास की राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म ‘विलेज रॉकस्टार्स’ को 91वें अकादमी पुरस्कारों में विदेशी भाषा की सर्वश्रेष्ठ फिल्म की श्रेणी में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिये चुना गया है। फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया (एफएफआई) ने शनिवार को इसकी घोषणा की। यह फिल्म गरीबी में पली बढ़ी लड़की धुनू की कहानी है जो इन परिस्थितियों में भी रॉक बैंड बनाने और किसी दिन अपना गिटार हासिल करने के अपने सपने से पीछे नहीं हटती। इस घोषण से प्रसन्न दास कहती हैं कि ‘विलेज रॉकस्टार’ के चुने जाने से पूर्वोत्तर के फिल्म निर्माताओं की एक बड़ी पहचान मिली है। दास ने पीटीआई-भाषा से कहा, ‘‘बहुत अच्छा लग रहा है। इसे बताने के लिए मेरे पास ज्यादा शब्द नहीं हैं। पूरी यात्रा किसी परी कथा के समान है। यह पूर्वोत्तर के लिए एक बड़ी पहचान है और मुझे लगता है कि चयनित होने वाली यह पहली असमिया फिल्म है। इसलिए मेरा मानना है कि इससे क्षेत्र के फिल्मकारों के लिए बड़ा बदलाव आएगा।’’ उन्होंने कहा, ‘‘मुझे हमेशा से उम्मीद थी। मैं हमेशा ऐसे फेस्टिवल्स में जाना और पुरस्कार पाना चाहती थी। लेकिन मेरे लिए सबसे अहम यह है कि लोग इस फिल्म से खुद को जुड़ा हुआ महसूस करें। इस फिल्म के जरिए मुझे उसी प्रकार का भावनात्मक जुड़ाव मिला है।’’
इसकी घोषणा एफएफआई की ऑस्कर पुरस्कार चयन समिति के अध्यक्ष एस वी राजेंद्र सिंह बाबू ने की। उन्होंने संवाददाताओं से कहा, ‘‘यह मानवीय पहलू पर बनी तकनीकी रूप से अच्छी फिल्म है जो विश्व भर में लोगों को पसंद आएगी। हम ऐसी फिल्म को सम्मान दे रहे हैं जो ऑस्कर के मंच पर पहुंचने की हकदार है। हमें इस बात की उम्मीद है कि लोग इसे देखेंगे और इसे सम्मान देंगे।’’
फिल्म का वर्ल्ड प्रीमियर टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (टीआईएफएफ) 2017 में हुआ था और 70 से अधिक प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय फिल्म महोत्सवों में यह फिल्म दिखाई जा चुकी है। संजय लीला भंसाली की ‘पद्मावत’, आलिया भट्ट अभिनीत ‘राजी’, रानी मुखर्जी अभिनीत ‘हिचकी’, शूजित सरकार की ‘अक्टूबर’, तबरेज नूरानी निर्देशित ‘लव सोनिया’, ‘तुमबाद’, ‘हल्का’, ‘कड़वी हवा’ और हाल में प्रदर्शित ‘मंटो’ उन 28 फिल्मों की सूची का हिस्सा थी, जिसे अगले साल के ऑस्कर के लिये सौंपा गया था। गौरतलब है कि किसी भी भारतीय फिल्म ने अब तक ऑस्कर पुरस्कार नहीं जीता है। विदेशी भाषा की सर्वश्रेष्ठ फिल्म की श्रेणी में अंतिम पांच में जगह बनाने वाली आखिरी भारतीय फिल्म आशुतोष गोवरीकर निर्देशित ‘लगान’ थी। अमित मासुरकर निर्देशित और राजकुमार राव अभिनीत हिंदी फिल्म ‘न्यूटन’ पिछले साल ऑस्कर के लिये भारत की आधिकारिक प्रविष्टि थी।

‘टाइम’ पत्रिका 19 करोड़ डॉलर में बिकी

वाशिंगटन : अमेरिकी मीडिया कंपनी मेरेडिथ कॉर्प ने मशहूर ‘टाइम’ पत्रिका सेल्सफोर्स के सह-संस्थापक मार्क बेनीऑफ और उनकी पत्नी को 19 करोड़ डॉलर में बेच दिया है। द वॉल स्ट्रीट जर्नल की खबर के मुताबिक यह पत्रिका सेल्सफोर्स के चार सह-संस्थापकों में एक मार्क बेनीऑफ को 19 करोड़ डॉलर में बेची गई है। सेल्सफोर्स ‘क्लाउड कंप्यूटिंग’ की दिग्गज कंपनी है।’पीपल’ और ‘बेटर होम्स एंड गार्डन्स’ जैसी पत्रिकाओं का प्रकाशन करने वाली मेरेडिथ ने ‘टाइम इन्क’ के चार पत्रिकाओं को मार्च में बेचने की पेशकश की थी। ‘टाइम’ के बाद अब बची हुई तीन पत्रिकाओं फॉर्च्यून, मनी और स्पोर्ट्स इल्टस्ट्रेटेड की बिक्री पर भी मोल-भाव चल रहा है।

तीन तलाक देने पर 3 साल जेल, मोदी सरकार के अध्यादेश को राष्ट्रपति की मंजूरी

नयी दिल्ली : एक बार में तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) देना अब अपराध हो जाएगा। ऐसा करने पर 3 साल जेल की सजा होगी। केंद्रीय कैबिनेट ने बुधवार को इससे संबंधित अध्यादेश को मंजूरी दे दी। जिस पर देर रात राष्ट्रपति ने मंजूरी दे दी। सुप्रीम कोर्ट पहले ही इसे अवैध बता चुका है।
यह अध्यादेश छह महीने तक लागू रहेगा। इस दौरान तीन तलाक विधेयक को राज्यसभा से पारित कराना होगा। 9 अगस्त को यह विधेयक लोकसभा में पारित हो गया था। कांग्रेस इसमें कुछ बदलाव चाहती है। इसलिए यह राज्यसभा से पारित नहीं हो पाया था। पिछले साल 22 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने इस पर फैसला सुनाया था। कोर्ट ने कहा था कि एक साथ तीन तलाक कहने की प्रथा यानी तलाक-ए-बिद्दत असंवैधानिक और गैर-कानूनी है। केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि इस अध्यादेश का मुख्य घटक यह है कि अपराध सिर्फ तभी संज्ञेय होगा जब पीड़ित पत्नी या उसके परिवार (मायके या ससुराल) के सदस्य एफआईआर दर्ज कराएं। अभियुक्त को पुलिस जमानत नहीं दे सकेगी। मजिस्ट्रेट पीड़ित पत्नी का पक्ष सुनने के बाद वाजिब वजहों के आधार पर जमानत दे सकते हैं। उन्हें पति-पत्नी के बीच समझौता कराकर शादी बरकरार रखने का भी अधिकार होगा। बच्चा मां के संरक्षण में ही रहेगा। उसका भी गुजारा देना होगा। रविशंकर प्रसाद ने बताया कि जनवरी 2017 से सितंबर 2018 तक तीन तलाक के 430 मामले सामने आए। इनमें 229 मामले सुप्रीम कोर्ट के आदेश से पहले और 201 केस उसके बाद के हैं।
इस दौरान सबसे ज्यादा तीन तलाक के मामले उत्तरप्रदेश में सामने आए। कोर्ट के फैसले से पहले वहां 126 और उसके बाद 120 मामले सामने आए। संविधान के अनुच्छेद 123 के मुताबिक, जब संसद सत्र नहीं चल रहा हो तो राष्ट्रपति केन्द्र के आग्रह पर कोई अध्यादेश जारी कर सकते हैं। यह अध्यादेश अगला सत्र समाप्त होने के बाद छह सप्ताह तक लागू रह सकता है। जिस विधेयक पर अध्यादेश लाया जाता है, उसे संसद में अगले सत्र में पारित करवाना होता है। ऐसा नहीं होने पर राष्ट्रपति इसे दोबारा भी लागू कर सकते हैं।