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शिक्षा में अनुशासन आवश्यक, शिक्षा सभी के लिए आवश्यक है: निवेदिता भिड़े

निवेदिता भिडे समाजसेवा के क्षेत्र में एक नाम है जिन्होंने अपना पूरा जीवन समाज के लिए अर्पित कर दिया। जब वे स्कूल में पढ़ती थी उसी वक्त से उनके अन्दर भाव जगा था कि उन्हें देश और समाज के लिए कुछ करना है। बार-बार पिता से जिद करती थीं कि उन्हें समाज के लिए कार्य करना है। पिता को भी लगा था कि थोड़ी बड़ी होगी तो उसकी इच्छा में परिवर्तन आ जाएगा इसलिए उसे आश्वस्त किया था कि जैसे ही वह स्नातक करेगी उसे सेवा के क्षेत्र में जाने की इजाजत दे दी जाएगी। यह बात कच्चे मन में बैठ गई। समय बीता पर उसके साथ मन में बैठी इच्छा और अधिक बलवती हो गई। जिस दिन स्नातक स्तर का अन्तिम पर्चा देकर घर पहुंची तो सीधे जाकर कहा कि अब मुझे ले चलो। उसकी जिद के कारण उसे विवेकानन्द केन्द्र कन्या कुमारी से जुड़ीं। एकनाथ रानाडे ने उनकी प्रतिभा पहचान ली थी। समय के साथ ही उनका ग्रामीण क्षेत्रों में काम किया। उनके सेवा कार्य को मान्यता देते हुए उनका नाम पद्मश्री के लिए घोषित किया गया। इसके बाद कोलकाता में आई निवेदिता से वरिष्ठ पत्रकार वनिता वसन्त ने बातचीत की…पेश हैं प्रमुख अंश –
नारी शिक्षा और देश का विकास
नारी शक्ति का प्रतीक है। नारी सशक्तिकरण की बात कहते है वह स्वयं ही शक्ति स्वरूपा है उसको शक्ति देने वाले हम कौन ? हमें केवल उसको सही शिक्षा में आ रही अड़चनों को दूर करना है। उनके अन्दर के सारे गुण के विकास के मार्ग में आने वाली बाधा को दूर करना है। बस हमारा काम इतना ही है। उसके अन्दर की शक्ति अपने आप प्रकट होगी। यह कहना है विवेकानन्द केन्द्र कन्याकुमारी की उपाध्यक्षा पद्मश्री निवेदिता भिडे का। कुछ बातें साझा की। उन्होंने स्पष्ट कहा कि महिलाओं का विकास ही राष्ट्र और समाज के विकास की सीढ़ी है। उनको छोडक़र न घर चल सकता है और न देश। निवेदिता ने कहा कि महिलाएं सिर्फ व्यक्ति नहीं है वह किस परिवार व समाज का अंग, किसी राष्ट्र का अंग है। ऐसे में यदि वह सोचती है कि मैं, मेरा विकास या मैं जीवन में आगे बढ़ू तो क्यों बढ़ूँ इसलिए बढ़े ताकि परिवार का, मेरे समाज का मेरे राष्ट्र का अच्छा करने के लिए आगे बढ़ूं पर दुखद है कि यह भाव मन में नहीं आता। हम अभी माई च्वाएश की तर्ज पर आगे बढ़ रहे है यानी मैं चाहे यह करु मैं चाहे वह करु मेरी मर्जी। चाहे वह कपड़े पहनने हो, खाना हो या फिर संबंध बनाना हो सिर्फ इच्छा पर केन्द्रित हो गया है। ऐसा आत्मकेन्द्रित व्यक्ति भोगवाद को जन्म देता है। भोगवाद से हम अपने ही इंद्रियों के गुलाम बन कर रह जाते हैं। इससे जीवन में जो योगदान वह कर सकते थे वह नहीं कर पाते। शिक्षा हो या नारी सशक्तिकरण दोनों ही परिपेक्ष्य में चिन्तन होना चाहिए वैसा हो नहीं रहा है।
शिक्षा व उसका परिवेश
हर एक व्यक्ति के अन्दर जो श्रेष्ठता है, अच्छाई है उसका प्रकटीकरण ही शिक्षा है। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जिसमें मनुष्य को स्वयं पर नियन्त्रण करने की क्षमता आनी चाहिए। जैसे विवेकानन्द कहते है प्रत्येक आत्मा सुप्त ईश्वरत्व है। उसका प्रकटीकरण करना अनुभूति करना ही मनुष्य जीवन का लक्ष्य है। इसलिए शिक्षा में अनुशासन आना चाहिए। हमें दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए वह आना चाहिए। चाहे लडक़ी हो चाहे लडक़ा हो दोनों को ऐसी शिक्षा की आवश्यकता है। आज के समय के शिक्षण में नियन्त्रण, अनुशासन आता ही नहीं है। ज्यादा से ज्यादा स्वयं का विचार करो, स्व केन्द्रित बनो। मेरा क्या है, मेरा विकास तक ही सोच रहे है। यदि हम एक बार यह विचार करे की हम इस परिवार का, समाज का, राष्ट्र का, देश का अंग है। उसके प्रति भी हमारा कत्वर्य है। मैं समाज में रहता हूं तो हमारे व्यवहार खुद बु खुद अच्छा ही होगा क्योंकि यदि हम उसे अंग मान रहे है तो समाज की बुराई के लिए कुछ गलत कदम नहीं उठाएंगे। यदि समाज का अंग हूं और यदि मैं गलत करता हूं तो समाज बिगड़ेगा और समाज बिगड़ेगा तो मैं उसका अंग होने के नाते हमारा जीवन भी कही न कही प्रभावित होगा।
पाठ्यक्रम में बदलाव
पाठ्यक्रम में बदलाव लाने से बदलाव आएगा ऐसा मुझे नहीं लगता। पर बदलाव से सब ठीक हो जाएगा यह जरूरी नहीं है। क्योंकि घर का वातारण भी योग्य होना चाहिए। हमारा पाठ्यक्रम सही नहीं था फिर भी समाज काफी हद तक चल रहा है उसका कारण हमारे घर के संस्कार थे। लेकिन वह भी कम होते जा रहे हो तो पाठ्यक्रम ठीक करने से कुछ होगा नहीं। मान लीजिए पाठ्यक्रम में महाराणा प्रताप की कहानी है जिसे शिक्षक बेमन से पढ़ा रहा है उसमें महाराणा प्रताप के हृदय में प्रति भाव नहीं है वह भाव वह बच्चों तक प्रसारित नहीं करेगा। वह सिर्फ जानकारी प्रेषित करेगा। हमारे समाज में ऐसे भी शिक्षक है जो पूरे मनोयोग और पूरे भाव के साथ बच्चों को पढ़ाते है पर हमारे समाज में उनको एक्नोलेज, सम्मान नहीं किया जाता। उनको समझा नहीं जाता। ऐसे शिक्षिक जो मूल्य बोध देते है उन्हें आगे लाना और पाठ्यक्रम में थोड़ा बदलाव लाया जा सकता है। परिवेश और संस्कार ठीक रहे तभी शिक्षा अपने आप में सम्पूर्ण होगी।
मानव जीवन का लक्ष्य
मानव जीवन को पशु जीवन से ऊपर उठना फिर मानव जीवन से खुद को उससे ऊपर उठाना यानी फिर दैवीय व ईश्वरीय स्तर तक ऊपर उठाना ही मनुष्य जीवन का लक्ष्य है तभी तो हम विकास की ओर जाएगा जिसे हम आत्मविश्वास कहते है मनुष्य में थोड़ा उच्च प्रकार का व्यवहार अपेक्षित है। इंस्टीग्टि बेस नहीं है। मनुष्य इंटेलिक्ट बेस है। तर्क से अपने जीवन का प्रयोजन समझते समझते वह जो कार्य करता है जिससे आखिर उसमें अन्तप्रेरणा भी आती है। तो वह अन्तरप्रेरणा जागृत करना भी शिक्षा का भी इम्पावरमेंट का गी हेतू होना चाहिए। उन्होंने कहा कि हम सभी अपने बच्चों को डाक्टर, इंजीनियर बनाना चाहते है जिस दिन हम उन्हें अच्छा इंसान बनाने पर जोर देंगे उस दिन समाज की बहुत सारी समस्याएं खत्म हो जाएगी। जब हम राष्ट्र का पुनउत्थान कहते है उसका अर्थ है कि राष्ट्र मैं सभी को सही शिक्षा, भोजन, मेडिकल आदि की मूलभूत अवसरंचना हो। यदि सिर्फ बाहरी विकास पर ही ध्यान देना है तो राष्ट्र को राष्ट्र ही है बोल नहीं कह सकते है। जैसे ग्रीस है पुराने पुरखो की ही पीढिय़ां है। अवसंरचना है पर ग्रीस संस्कृति नहीं है। इसलिए पुरातन राष्ट्र चला गया। राष्ट्र का पुनउत्थान कहते है तो स्वामीजी तो उसका आशय यह है कि हर राष्ट्र का कोई विशेषता होती है। जो सारे मानव समाज के विकास के लिए आवश्यक होती है। हर राष्ट्र को कुछ न कुछ योगदान करना है। हमारे राष्ट्र को आत्मीयता पर आधारित परिवार कैसे होता है, समाज कैसा होता इसी आत्मीयता के कारण ही विविधता के कारण ही एक साथ रहने की एक साथ कैसे रह सकते है। यह हमारा ही राष्ट्र सीखा सकता है क्योंकि यह ताकत हमारे राष्ट्र में है। विशेषज्ञों का भी मानना है कि विविधता के साथ कैसे एक साथ होकर रहा जा सकता है तो वह केवल भारत ही सीखा सकता है। यह सत्य है।
शिक्षा को वास्तविकता से जोड़िए, जबरन सरलीकरण समाधान नहीं बल्कि घातक है
दाखिले का मौसम बस चल ही रहा है..मेधा का आधार परीक्षाओं में प्राप्त अधिकतम अंक ही रह गये हैं। नतीजा यह है कि मेधावी विद्यार्थी भी अब 98 प्रतिशत पाकर भी असन्तुष्ट हैं। अधिक से अधिक अंक बटोरने के चक्कर में उनका जीवन अब स्कूल और कोचिंग के बीच सिमटता जा रहा है मगर इसका नतीजा क्या हो रहा है, इस पर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। इस बीच जिन बच्चों को अच्छे अंक नहीं मिले हैं, उनके बारे में सोचिए…माता – पिता से लेकर रिश्तेदारों और शिक्षण संस्थानों और बोर्ड तक ने यह माहौल बना दिया है जैसे उनको जीने का अधिकार ही नहीं है। बच्चे यही समझ भी रहे हैं और इसलिए बोर्ड और प्रतियोगी परीक्षाओं में पिछड़ने वाले बच्चों को मौत जिन्दगी से अधिक प्यारी लग रही है मगर सोचिए तो क्या ये बच्चों का दोष है? ऐसे ही बच्चे तो नशे की चपेट में आते हैं, अवसादग्रस्त होते हैं और कई बार अपराध की राह पर निकल पड़ते हैं। कहने को हमें सन्तोष और परिश्रम को धन मानना सिखाया गया है मगर खुद से पूछिए क्या आपकी जिन्दगी का हिस्सा हैं या ये सिर्फ किताबों तक ही सीमित रह गये हैं? अगर आप अपना हर छोटा काम बनाने के लिए पहुँच, सिफारिश, रिश्वत और ताकत का सहारा ले रहे हैं तो क्या आपको अधिकार है कि आप बच्चों से नैतिकता और विश्वास की उम्मीद करें। अपने बोर्ड को बेहतर बनाने के चक्कर में हर एक बोर्ड, यहाँ तक कि राज्य स्तर के बोर्ड भी परीक्षाओं का अत्यधिक सरलीकृत कर रहे हैं। उनका जोर इस बात पर है कि बच्चों को अधिक से अधिक अंक मिले मगर यह उनकी चिन्ता का विषय नहीं है कि बच्चा क्या सीख रहा है और जीवन की लम्बी दौड़ में ये अंक इस गलाकाट प्रतियोगिता में कहाँ तक साथ दे रहे हैं या दे सकते हैं। हर साल टॉपर आते हैं, जाते हैं मगर कुछ समय बाद वे कही नहीं दिखायी देते। बच्चा बस्ते का बोझ लेकर घूम रहा है मगर उसे जानकारी और व्यावहारिक ज्ञान न के बराबर मिल रहा है। स्कूलों में शिक्षक कई बार बगैर सिखाए मुश्किल प्रोजेक्ट देते हैं तो कहने की जरूरत नहीं है कि ये प्रोजेक्ट भी अभिभावक ही पूरा करते हैं। बच्चे ने कुछ नहीं सीखा…एक समय था जब 40 प्रतिशत अंक पाकर भी जीने की लालसा और कुछ करने की उम्मीद बनी रहती थी क्योंकि हमारा जोर सीखने और सिखाने पर रहता था। कक्षा में प्रथम आने वाले छात्र – छात्राएँ कुछ दिनों तक भले ही अकड़ में रहें मगर बात जब गतिविधियों की होती थी तो उनको भी साथ आना पड़ता था। टॉपर न रहने पर भी तब लिखना सिखाया जाता था, बड़े प्रश्न लिखने में कोई दिक्कत नहीं होती थी। हिन्दी में शत – प्रतिशत अंक कभी नहीं मिले मगर फिर भी लिखना आ गया…आज शत – प्रतिशत अंक पाने वाले बच्चे भी यह दावा नहीं कर सकते है कि वे लिखना जानते हैं या उनसे त्रुटियाँ नहीं होंगी। वे अपने विषय की पूर्ण जानकारी होने का दावा नहीं कर सकते।

रटन्त विद्या से वे भले ही प्रोजेक्ट प्रदशर्नियों में रटकर सुना दें मगर क्या उनमें समझाने, समूह में सबको साथ लेकर चलने और असफलता को सफलता में बदलने का गुण हैं? क्या आपकी शिक्षा पद्धति अनजाने ही उनको मशीन में नहीं बदल रही है, क्या उनको इतना कमजोर नहीं बना रही है कि वे जीवन की चुनौतियों का सामना करने की बजाय नशे और अवसाद की चपेट में आ रहे? सब जानते हैं कि अंक जीवन की दौड़ में बहुत दूर तक साथ नहीं देते..अगर ऐसा होता तो पढ़े – लिखे युवा अवसाद की चपेट में नहीं आते। अन्ततः आपका आत्मबल ही जीवन में आपका साथ देता है, अंक नहीं देते तो फिर क्यों शिक्षा प्रणाली का जबरन सरलीकरण किया जा रहा है जो घातक है…इससे किसी बोर्ड का भला हो सकता है मगर न तो ये विद्यार्थी के हित में है और न ही देश के भविष्य के लिए फायदेमंद हैं। जरूरी है कि शिक्षा को जड़ों से जोड़ा जाए…हमारी परम्परागत कलाओं और हस्तशिल्प को पाठ्यक्रम में फैशन के लिए ही न रखें…बच्चों को खेत और जंगल दिखाएँ..कारखाने दिखाएँ….। आज कई शिक्षित युवाा अपनी डिग्री को लेकर इतने अधिक मोहग्रस्त होते हैं कि कोई और काम करना उनको अपनी तौहीन लगता है मगर वह ये नहीं जानते कि ऐसा करके वे अवसरों को अपनी सीमा बना रहे हैं जो बाद में उनको एकाकी और हताश ही करेगा। शिक्षा ऐसी हो जो हमारे पारम्परिक क्षेत्रों को मजबूत बनाएँ जिससे किसी किसान को आत्महत्या न करनी पड़े जो मजदूरी को सुरक्षित बनाए और सम्मान बनाए। कारीगर न हों तो कोई भी उद्योग नहीं चल सकता तो श्रम का सम्मान देना भी आवश्यक है और यह शिक्षा प्रणाली के सरलीकरण से नहीं होगा। पढ़ाई के साथ उनके पास विकल्प हो जिससे अगर उनको नौकरी न मिले तो भी उनके लिए रोजगार का अभाव समस्या न बनें। ताकि वे जीवन की वास्तविकता समझें वरना शिक्षा का सरलीकरण घातक ही साबित होगा।
अनसुलझी समस्याओं को छोडऩे का नतीजा अतिवाद : प्रो.अरुण त्रिपाठी
कोलकाता : भारत सहित समूचे विश्व में अतिवाद हावी होता जा रहा है और इसकी उत्पत्ति अनसुलझे सामाजिक, आर्थिक और दूसरी मौलिक समस्याओं से हुई हैं। ये बातें महात्मा गांधी हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा के प्रोफेसर अरुण त्रिपाठी ने कहीं। इस मौके पर पत्रकार स्नेहाशीष सूर ने पत्रकारिता में तथ्य और संतुलित नजरिया अपनाने की सलाह दी। दोनों विनय तरुण स्मृति समारोह में अतिवादों के दौर में पत्रकारिता और गांधीवाद विषय पर बोल रहे थे।
दस्तक की ओर से आयोजित समारोह में प्रो. त्रिपाठी ने कहा कि हर युग, कालखंड में अतिवाद रहा है। सभ्यताओं के संघर्ष और वैश्वीकरण से दुुनिया में अतिवादी हावी होता रहा। भारत में इसके अलावा जाति संघर्ष और गरीबी ने अतिवाद को जन्म दिया है, जो इन दिनों हावी है। उन्होंने कहा कि अतिवाद एक रूप में खत्म होता है तो दूसरे नए रूप में पैदा हो जा रहा है। इन दिनों महात्मा गांधी, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस सहित दूसरे महापुरूषों के आदर्शों को अपनी तरह से व्याख्या कर नए नए अतिवाद को जन्म दिया जा रहा है। व्यक्तिगत और तर्कपूर्ण अभिव्यक्ति पर बंदिश लगाई जा रही है। सुजात बुखारी जैसे पत्रकार की हत्या कर दी गई। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता में उदारता खत्म होती जा रही है और उसकी जगह अतिवाद स्थान ले रहा है। ऐसे में वैकल्पिक रास्ता ढ़ंूढना पत्रकारों की जिम्मेदारी है और यह महात्मा गांधी के सत्याग्रह आदर्श के जरिए प्राप्त किया जा सकता है। वजह गांधी खुद में समवन्य के दौर हैं। इससे पहले पत्रकार स्नेहाशीष सूर ने कहा कि महात्मा गांधी सबसे बड़ा पत्रकार थे। उन्होंने सत्य और अङ्क्षहसा की राह पर चलने का उपदेश दिया था। भारतीय पत्रकारिता में भी अतिवाद प्रवेश कर गया है। समाचार चैनल और कुछ अखबार सिर्फ सरकार के खिलाफ लिखते हैं तो कुछ सिर्फ उसके पक्ष में लिखते हैं।
इस मौके पर भारतीय भाषा परिषद के निदेशक शंभुनाथ ने कहा कि लोकतंत्र में विरोध से संवाद खत्म करने से लोकतंत्र ध्वस्त हो जाता है और दुराचार व अतिवाद पैदा होता है। इन दिनों देश में अतिवाद और तर्कहिंसा का दौर चल रहा है। पत्रकारिता से उसका मूल चरित्र प्रतिवाद करना ही खत्म हो गया है। इसका अंत और सत्य की वापसी संभव है। इस मौके पर डॉ. सुधांशु कुमार की पुस्तक नारद कमीशन का विमोचन किया गया। कार्यक्रम का संचालन पत्रकार अखिलेश्वर पाण्डे ने किया और मौके पर दिवंगत पत्रकार विनय तरुण के सहपाठी उपस्थित थे।
हिंदी और हावड़ा के गौरव थे पत्रकार राजकिशोर
कोलकाता : देश के प्रतिष्ठित पत्रकार राजकिशोर हिंदी के एक कुशल गद्यकार, राजनीतिक विश्लेषक और चिंतक थे। उनके पाठकों का एक बड़ा समुदाय था। वे कवि और उपन्यासकार होने के अलावा अपने युवा काल में विभिन्न आंदोलनों से भी जुड़े रहे हैं। हावड़ा उनकी जन्मभूमि और लंबे समय तक कोलकाता कर्मभूमि थी। कोलकाता से प्रकाशित साप्ताहिक ‘रविवार’ में अपनी अद्वितीय प्रतिभा का परिचय देते हुए दिल्ली के ‘नवभारत टाइम्स’ में छह साल तक थे। वे गांधी और लोहिया के विचारों से प्रभावित थे। सही अर्थों में स्वतंत्र पत्रकार और हिंदी के प्रायः सभी बड़े अखबारों के स्तंभ लेखक के रूप में उन्होंने हिंदी पत्रकारिता में एक कीर्तिमान स्थापित किया है।
राजकिशोर की 71 साल की अवस्था में दिल्ली में निधन के बाद लालबाबा कॉलेज, बेलूड़ में आयोजित एक स्मरण सभा में हिंदी लेखकों और समाजसेवियों ने अपने प्रिय लेखक को याद किया और श्रद्धांजलि अर्पित की। इस अवसर पर उनकी जीवन-यात्रा पर सौमित्र जायसवाल ने एक सुंदर डिजिटल प्रस्तुति की। राजकिशोर के विद्यार्थी जीवन के सखा डॉ.शंभुनाथ ने कहा कि राजकिशोर की सहज, चुटीली और तार्किक भाषा ने हिंदी पत्रकारिता का एक आदर्श खड़ा किया है। उन्होंने विचारों और मूल्यों के लिए जीवन में कभी समझौता नहीं किया। दिल्ली में उनकी अंत्येष्टि तक बहुत सादगी से हुई, जैसा वे चाहते थे। अभावों तथा शारीरिक व्याधियों से जूझते हुए 50 सालों तक बिना थके वे लिखते रहे। लेखन ही राजकिशोर का जीवन था। राजकिशोर ने भारतीय भाषा परिषद द्वारा आठ खंडों में शीघ्र प्रकाश्य ‘हिंदी साहित्य ज्ञानकोश’ के भाषा संपादक के रूप में भी काम किया है।
एमएसटीसी के महाप्रबंधक और लेखक मृत्युंजय ने उन्हें याद करते हुए कहा कि राजकिशोर बड़े सहज, मिलनसार और खुशदिल इन्सान थे। वे सच्चे अर्थों में बौद्धिक रूप से स्वतंत्र पत्रकार थे। विद्यासागर विश्वविद्यालय के प्रो.संजय जायसवाल ने कहा कि उनका छल कपट से रहित पारदर्शी व्यक्तित्व और उनके विचार नई पीढ़ी को प्रेरणा देते रहेंगे। राजकिशोर के मित्र और प्रसिद्ध नाट्यकर्मी महेश जायसवाल ने कहा कि वे अपने निजी दुखों से ज्यादा देश-दुनिया की चिंता करते थे।
लालबाबा कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ.संजय कुमार ने उन्हें श्रद्धांजलि व्यक्त करते हुए कहा कि हावड़ा ने अपना एक बड़ा साहित्यिक रत्न खो दिया। स्मरण सभा में शंकर कुमार सान्याल, शैलेंद्र, प्रो.आशुतोष सिंह, बिहारी लाल चौधरी, शिवनारायण गुप्त, चंद्रिका प्रसाद अनुरागी, मंजू बैज, श्रद्धांजलि सिंह, यशवंत सिंह, पूजा गुप्ता, सेराज खान बातिश, जितेंद्र सिंह, ब्रजमोहन सिंह, प्रो.ललित कुमार झा आदि ने अपने भावोद्गार व्यक्त किए। श्रद्धांजलि देन वालों में थे- डॉ.शिवनाथ पांडेय, विष्णु गोस्वामी, जितेंद्र जितांशु, रघुनाथ सिंह, रामजी प्रसाद, काली प्रसाद गुप्त और राजकिशोर के परिवार के अशोक साव, सोनालाल साव आदि।
आदि शिव…अनादि शिव….आदि योगी ….नृत्य के प्रणेता…..अनन्त शिव
भगवान शिव अर्थात पार्वती के पति शंकर जिन्हें महादेव, भोलेनाथ, आदिनाथ आदि कहा जाता है। शिव ही आदि योगी हैं। कहते हैं कि इन्होंने ही कृष्ण को योगेश्वर बनाया। इनकी मुद्राओं से ही नृत्य की उत्पत्ति हुई। कैलाश पर्वत पर इनका वास है और कहते हैं कि इनके ही त्रिशूल पर काशी टिकी है। भारत के प्रत्येक काल खंड में शिव विविध रूपों में रहे हैं। शिव सिर्फ कल्पना नहीं है क्योंकि देश के कई हिस्सों में इनके पदचिह्न हैं…शिव भारत का विश्वास हैं। शिव से सम्बन्धित रहस्य हैं –


35.शिव हर काल में : भगवान शिव ने हर काल में लोगों को दर्शन दिए हैं। राम के समय भी शिव थे। महाभारत काल में भी शिव थे और विक्रमादित्य के काल में भी शिव के दर्शन होने का उल्लेख मिलता है। भविष्य पुराण अनुसार राजा हर्षवर्धन को भी भगवान शिव ने दर्शन दिए थे।
“साहित्यिकी” द्वारा “गांव मेरा देश” पर परिचर्चा का आयोजन
कोलकाता : साहित्यिकी की ओर से 23 जून 2018 की शाम को भारतीय भाषा परिषद के सभाकक्ष में संस्था की संस्थापक एवं अध्यक्ष सुकीर्ति गुप्ता की पांचवीं पुण्य तिथि के अवसर पर सुप्रसिद्ध गांधीवादी आलोचक भगवान सिंह की सद्यप्रकाशित पुस्तक “गांव मेरा देस” पर परिचर्चा का आयोजन किया गया। सचिव गीता दूबे ने अतिथियों का स्वागत करते हुए सुकीर्ति जी पुण्य स्मृति को नमन किया एवं संस्था के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। अनीता ठाकुर ने अपने वक्तव्य में पुस्तक को स्मृति चारण का अन्यतम नमूना बताया जिसमें गांव के वैशिष्ट्य और स्वरूप को समग्रता से उभारा गया है। उन्होंने कहा कि यह पुस्तक हिन्दी साहित्य की अनुपम कृति है। श्री सुधांशु शेखर ने अपने वक्तव्य में श्रीभगवान सिंह की ओर संकेत करते हुए कहा यह आदमी गांव पर लिखनेवाला एक उपयुक्त आदमी है। लेखन और जीवन दोनों ही स्तर पर वह पुरानी परंपराओं को बचाने के प्रति प्रयासरत हैं। वह अपनी स्मृतियों से ताकत बटोरकर जगत से मुठभेड़ करते हैं। इन्होंने भारतीय कृषक के जीवन को गांधी दर्शन के माध्यम से व्याख्यायित किया है। गंवई संस्कृति पर छाए संकट को लेखक बखूबी रेखांकित करता है।
ऋषिकेश राय ने कहा कि डाॅ. सिंह की किताब पर नेस्टालाजिया या स्मृति का गहरा दबाव है। डा. सिंह ने पश्चिमी आधुनिकता के बरक्स देशज आधुनिकता को ग्राम संस्कृति और कृषि संस्कृति में खोजने का प्रयास किया है। गांव के अपने अंतर्विरोध हैं पर कृषि संस्कृति के मूल्य इन सारे अंतर्विरोधों का अतिक्रमण कर जाते हैं। इस पुस्तक को पढ़ते हुए कभी ललित निबंध पढ़ने का आनंद आता है तो कभी उपन्यास का। ग्राम संस्कृति के प्रति उनका अनवरत अनुराग इस पुस्तक में परीलक्षित होता है।

इस पुस्तक को पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि आप संस्कृतिलोक की यात्रा कर रहे हैं। भगवान सिंह ने अपने लेखकीय वक्तव्य में कहा कि कलकत्ता आकर मुझे हमेशा अच्छा लगता है। गांधी और उनके हिंद स्वराज्य को पढ़कर गांव पर लिखने की प्रेरणा मिली। गांव को बचाना जरूरी है और मैं अपने तई गंवई संस्कृति और मूल्यों को बचाने के लिए निरंतर प्रयासरत हूं। अमरनाथ जी ने गांव से जुड़े अपने अनुभवों को साझा करते हुए कहा सरकार कि नीतियां किसानों के बिल्कुल विरुद्ध हैं।
अध्यक्षीय वक्तव्य में रेणु गौरीसरिया जी ने कहा कि इस कृति को पढ़ते हुए एक उपन्यास पढ़ने का सुख मिलता है। यह एक उद्देश्यपरक कृति है। लेखक की शैली अद्भुत है और उन्होंने कहावतों और लोकोक्तियों को बेहद सरस शैली में पिरोया है। व्यवस्था को पलटने की तड़प भी पुस्तक में दिखाई देती हैं। कार्यक्रम का संचालन गीता दूबे एवं धन्यवाद ज्ञापन सरोजिनी शाह ने किया। इस परिसंवाद में शहरभर के बुद्धिजीवी , रचनाकार और संस्कृति प्रेमी बड़ी संख्या में मौजूद थे।
नीलांबर व नवल प्रयास ने आयोजित की काव्य संध्या
कोलकाता : नवल प्रयास ,शिमला एवं नीलांबर कोलकाता के संयुक्त तत्वावधान में भारतीय भाषा परिषद में एक काव्य संध्या आयोजित की गयी। वरिष्ठ कवि शैलेन्द्र शांत की अध्यक्षता में आयोजित इस काव्य संध्या में वरिष्ठ कवि नवल, विनोद प्रकाश गुप्ता,विमलेश त्रिपाठी,राज्यवर्द्धन, सेराज खान बातिश, यतीश कुमार, आनंद गुप्ता, ऋतेश पांडेय, अखिलेश्वर पांडेय, सुषमा त्रिपाठी, रेवा टिबरेवाल, सुरेश शॉ,शैलेश गुप्ता,ममता पांडेय,अनिला राखेचा, रौनक अफरोज, रचना शरण, रामनाथ बेखबर, जूली जाह्नवी, रजनी गुप्ता एवं अजय सिंह कविता पाठ किया ।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वागर्थ के संपादक एवं आलोचक डॉ. शंभुनाथ थे । नवल प्रयास संस्था के अध्यक्ष विनोद प्रकाश गुप्ता ने स्वागत वक्तव्य दिया। कार्यक्रम का संचालन आनंद गुप्ता ने किया। पूनम सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन किया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी उपस्थित हुए ।कार्यक्रम के सफल आयोजन में नीलांबर के साथियों ने महत्वपूर्ण सहयोग किया।
उसने हल्के से हाथ हिला दिया….
वनिता वसन्त

कोलकाता शहर के विधान सरणी के ट्राम लाइन से ट्राम गुजर रही थी। मुझे धर्मतल्ला जाना था। 5 नम्बर की ट्राम आई और मैं उसमें चढ़ गई। कुछ देर बाद टिकट लेने के लिए कंडेक्टर मेरे पास आया मैंने पांच रूपए उसके आगे बढ़ा दिए। उसने मुझे टिकट पकड़ा दिया। पास की ही सीट पर बच्ची को लेकर एक मां बैठी थी।
उसने सौ रुपए का नोट पकड़ाया और दो टिकट काटने को कहा। ऐसे में कण्डेक्टर भडक़ गया। उसने कहा खुदरा पैसा (छुट्टा पैसा) दो। सब चढ़ जाते हैं और बड़ा-बड़ा नोट पकड़ा देते हैं। हिन्दी बांग्ला मिलाकर बोल रहे केंडेक्टर के गुस्से से महिला खबरा गई। याचक के रूप में कहा भैया एक ही नोट है। प्लीज दे दीजिए टिकट। उसने कहा कि उसके पास भी खुदरा पैसे नहीं है। कन्डेक्टर ने कहा आप उतर जाइए। खुदरा मिलने के बाद दूसरी ट्राम में चढ़ जाइएगा। कन्डेक्टर को लग रहा था कि महिला के पास छुट्टा पैसे है पर वह सौ का नोट खुदरा करवाना चाह रही है। दबाव बनाने पर वह खुदरा जरूर निकालेगी।
महिला रुआंसी हो गई थी उसे मेडिकल कालेज में जाना था बच्ची के इलाज के लिए। उसे रास्ते की भी ज्यादा जानकारी नहीं थी। ट्राम बिल्कुल ही उस्पताल के पास पहुंचाता। मैं देख रही थी। फिर अचानक ही मेरा हाथ पर्स में गया और दोनों का टिकट मांगा। महिला और भी शर्म से लाल हो गई। वह ना – ना कहने लगी। मैंने कहा कि कोई बात नहीं मैडम जी। पृथ्वी गोल है। कही न कही मिल ही जाएंगे तब आप मेरा उधार चुका देना। महिला ने धन्यवाद दिया। बात कुछ आगे बढ़ती तभी मेडिकल कालेज आ गया और वह उतर गई। उतरकर वह ट्राम को जाते हुए देख रही थी। मैंने हल्के से हाथ हिला दिया।
घटना को सालों हो गए थे। मैं इस घटना को लगभग भूल ही गई थी। आफिस टाइम था बस पूरी तरह से भीड़ से भरी हुई थी। किसी तरह से थोड़ी सी जगह लेकर मैं खड़ी थी। उसी वक्त बस में एक महिला बच्चे को लेकर चढ़ी। गोद में बच्चा था। वह संतुलन नहीं बना पा रही थी। इसके-उसके ऊपर गिर रही थी। अचानक एक जगह पर भीड़ उतरने लगी। वह भी लपककर उतर गई। मैं खाली मिली सीट पर बैठ गई। अचानक मैंने देखा मेरे बैग की चैन खुली है और अन्तर रखा पैसों का पर्स गायब है।
तभी कन्डेक्टर आया और टिकट मांगने लगा। मैं बैग के इधर-उधर खाने को देखने लगी। पर्स तो था नहीं किसी कौने में भी कोई नोट नहीं मिला। झेंप गई। कहा भाई मेरा पर्स चोरी हो गया। कन्डेक्टर को लगा जैसे मैं झूठ बोल रही हूं। तभी पास में बैठी महिला ने कहा – हां वह बच्चे को लेकर चढ़ी थी वह चोर है। हर रोज का वहीं काम है। बस वाले जानते हैं फिर भी चढऩे देते हैं। मैं चुपचाप बस से उतरने वाली थी क्योंकि पैसे नहीं थे तभी एक महिला ने हाथ बढ़ाते हुए मेरा टिकट दे दिया। मैं उसकी ओर बेबस नजरों से देख रही थी।
चाह कर भी उसे मना नहीं कर पाई। उसने मुस्कुराते हुए कहा कोई बात नहीं, कभी न कभी फिर इसी बस में हमारी मुलाकात हो ही जाएगी तब आप मेरा टिकट ले लेना। मुझे एकाएक सालों पहले वाली घटना याद आ गई। संसार भी समुद्र की तरह ही है जो भी आप फेकेंगे वहीं आप को लौट देगा। मेरे चेहरे पर पर्स खोने के दर्द के स्थान पर विश्वास और प्रेम का भाव दिख रहा था। वह महिला उतरने लगी। मैं बस की खिडक़ी से मुस्कुराते हुए उसे जाते हुए देख रही थी…..उसने हल्के से हाथ हिला दिया।
एस. बालासुब्रमणियम भारती इंफ्राटेल के सीएफओ नियुक्त
नयी दिल्ली : मोबाइल टावर कंपनी भारतीय इंफ्राटेल ने एस बालासुब्रमणियम को कंपनी का मुख्य वित्तीय अधिकारी (सीएफओ) नियुक्त किया है। वह 10 अगस्त से कामकाज संभालेंगे। बालासुब्रमणियम कंपनी में पंकज मिगलानी का स्थान लेंगे। पंकज मिगलानी को भारती समूह में ही दूसरी भूमिका में भेजा जा रहा है। भारती इंफ्राटेल ने बंबई शेयर बाजार को भेजी सूचना में कहा है , ‘‘ पंकज मिगलानी 9 अगस्त 2018 को कंपनी के सीएफओ पद को छोड़ देंगे। उन्हें भारती समूह में ही दूसरी जिम्मेदारी दी जायेगी। ’’
इसमें कहा गया है कि कंपनी के निदेशक मंडल ने 22 जून को हुई बैठक में एस बाला सुब्रमणियम को कंपनी का मुख्य वित्तीय अधिकारी नियुक्त किया है। कंपनी प्रबंधन में इस महत्वपूर्ण जिम्मेदारी को वह 10 अगस्त 2018 से संभालेंगे। बालासुब्रमणियम ने 2005 में भारती एयरटेल में काम की शुरुआत की थी। इस दौरान उन्होंने कंपनी में कई महत्वपूर्ण वित्तीय जिम्मेदारियां संभाली हैं।




