नयी दिल्ली : महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की बार-बार अपील के बावजूद सरकार के साथ पंजीकरण नहीं कराने वाले देश भर के करीब 2,000 शिशु देखभाल संस्थानों (सीसीआई) पर बंद होने का खतरा मंडरा रहा है।
एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि अगर गैर-अनुपालन ऐसे ही जारी रहा तो ऐसे संस्थान बंद हो सकते हैं। झारखंड में हाल में मिशनरियों के कथित रूप से अवैध तरीके से बच्चों को गोद दिये जाने के मामलों पर संज्ञान लेते हुए केन्द्रीय मंत्री मेनका गांधी ने पिछले महीने सभी राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था कि सभी बालगृहों का पंजीकरण किया जाये और उन्हें एक महीने के अंदर देश की शीर्ष संस्था केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण (कारा) के साथ जोड़ा जाये।
महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया कि किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल एवं सुरक्षा) कानून, 2015 में सभी सीसीआई के पंजीकरण एवं कारा के साथ उन्हें जोड़ने का प्रावधान दिया गया है। दो साल पहले यह प्रभाव में आया लेकिन कुछ अनाथालयों ने इस अनुच्छेद की वैधता को चुनौती दी थी।
उत्तर प्रदेश के देवरिया में एक गैर पंजीकृत बालगृह में 24 लड़कियों के कथित यौन उत्पीड़न की घटना सामने आने के बाद मंत्रालय ने एक बार फिर सभी संस्थानों से पंजीकरण की अपील की।
सीसीआई में बाल गृह, अवलोकन गृह, विशेष गृह, सुरक्षा स्थान, विशेषीकृत दत्तक एजेंसी और खुले आश्रय गृह शामिल हैं।
देवरिया में नाबालिग लड़कियों के कथित यौन उत्पीड़न की घटना के बाद मेनका ने ऐसे बच्चों को रखने के लिये एक मात्र बड़े केन्द्रीय संस्थान के निर्माण का प्रस्ताव दिया था ताकि गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) के माध्यम से इनके ‘‘उत्पीड़न एवं दुर्व्यवहार’’ को रोका जा सके।
करीब 2,000 गैर पंजीकृत बालगृहों के बंद होने के आसार
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के मशहूर भाषणों के अंश
नयी दिल्ली : पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी एक प्रखर वक्ता थे और अपनी वाकपटुता के लिए जाने जाते थे। यहां परमाणु परीक्षण से लेकर कश्मीर और शिक्षा से लेकर प्रेस की आजादी तक कई तरह के विषयों पर उनके भाषण के अंश दिए जा रहे हैं:-
* 28 दिसंबर 2002 – विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के स्वर्ण जयंती समारोह के उद्घाटन अवसर पर – ‘‘शिक्षा अपने सही अर्थों में स्वयं की खोज की प्रक्रिया है। यह अपनी प्रतिमा गढ़ने की कला है। यह व्यक्ति को विशिष्ट कौशलों या ज्ञान की किसी विशिष्ट शाखा में ज्यादा प्रशिक्षित नहीं करती, बल्कि उनके छुपे हुए बौद्धिक, कलात्मक और मानवीय क्षमताओं को निखारने में मदद करती है। शिक्षा की परीक्षा इससे है कि यह सीखने या सीखने की योग्यता विकसित करती है कि नहीं, इसका किसी विशेष सूचना को ग्रहण करने से लेना-देना नहीं है।’’
* 1998 में परमाणु परीक्षण पर संसद में संबोधन – ‘‘पोखरण-2 कोई आत्मश्लाघा के लिए नहीं था, कोई पुरुषार्थ के प्रकटीकरण के लिए नहीं था। लेकिन हमारी नीति है, और मैं समझता हूं कि देश की नीति है यह कि न्यूनतम अवरोध (डेटरेंट) होना चाहिए। वो विश्वसनीय भी होना चाहिए। इसलिए परीक्षण का फैसला किया गया।’’

* मई 2003 – संसद में – ‘‘आप मित्र तो बदल सकते हैं, लेकिन पड़ोसी नहीं।’’
* 23 जून 2003 –
पेकिंग यूनिवर्सिटी में – ‘‘कोई इस तथ्य से इनकार नहीं कर सकता कि अच्छे पड़ोसियों के बीच सही मायने में भाईचारा कायम करने से पहले उन्हें अपनी बाड़ ठीक करने चाहिए।’’
* 1996 में लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा का जवाब देते हुए – यदि मैं पार्टी तोड़ू और सत्ता में आने के लिए नए गठबंधन बनाऊं तो मैं उस सत्ता को छूना भी पसंद नहीं करूंगा।’’
* जनवरी 2004 –
इस्लामाबाद स्थित दक्षेस शिखर सम्मेलन में दक्षिण एशिया पर बातचीत करते हुए – ‘‘परस्पर संदेह और तुच्छ प्रतिद्वंद्विताएं हमें भयभीत करती रही हैं। नतीजतन, हमारे क्षेत्र को शांति का लाभ नहीं मिल सका है। इतिहास हमें याद दिला सकता है, हमारा मार्गदर्शन कर सकता है, हमें शिक्षित कर सकता है या चेतावनी दे सकता है….इसे हमें बेड़ियों में नहीं जकड़ना चाहिए। हमें अब समग्र दृष्टि से आगे देखना होगा।’’
* 31 जनवरी 2004 –
शांति एवं अहिंसा पर वैश्विक सम्मेलन के उद्घाटन अवसर पर प्रधानमंत्री का संबोधन – ‘‘हमें भारत में विरासत के तौर पर एक महान सभ्यता मिली है, जिसका जीवन मंत्र ‘शांति‘ और ‘भाईचारा’ रहा है। भारत अपने लंबे इतिहास में कभी आक्रांता राष्ट्र, औपनिवेशिक या वर्चस्ववादी नहीं रहा है। आधुनिक समय में हम अपने क्षेत्र एवं दुनिया भर
* 13 सितंबर 2003 –
‘दि हिंदू’ अखबार की 125वीं वर्षगांठ पर – ‘‘किसी के विश्वास को लेकर उसे उत्पीड़ित करना या इस बात पर जोर देना कि सभी को एक खास नजरिया स्वीकार करना ही चाहिए, यह हमारे मूल्यों के लिए अज्ञात है।’’
* 23 अप्रैल 2003 ‘
जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर संसद में -‘बंदूक किसी समस्या का समाधान नहीं कर सकती, पर भाईचारा कर सकता है। यदि हम इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत के तीन सिद्धांतों द्वारा निर्देशित होकर आगे बढ़ें तो मुद्दे सुलझाए जा सकते हैं।’’
कैदियों को प्रेरित करने के लिए सुनाई जाएंगी वाजपेयी की कविताएं!
लखनऊ : उत्तर प्रदेश की जेलों में बंद कैदियों को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की लिखी कविताएं और उनकी जीवनी सुनाई जा सकती हैं ताकि वे अटल जी के जीवन से प्रेरणा लेकर मुख्यधारा में शामिल होने के लिए प्रेरित हों।
प्रदेश के जेल राज्य मंत्री जय कुमार सिंह जैकी ने कहा कि, ‘मैं मुख्यमंत्री (योगी आदित्यनाथ) से कहूंगा कि उत्तर प्रदेश की जेलों में कैदियों के बीच में अटल जी की जीवनी और उनकी कविताएं सुनाई जाएं। मुझे पूरा भरोसा है कि प्रदेश के बंदी अगर उनकी कविताओं और जीवनी से प्रेरणा लेंगे तो वे अपराध को छोड़कर समाज की मुख्यधारा से जुड़ जाएंगे।’
पिछले साल दिसंबर में वाजपेयी की 93 वीं वर्षगांठ के मौके पर योगी सरकार ने प्रदेश की विभिन्न जेलों से 93 कैदियों को रिहा किया था। ये वो कैदी थे जिन्होंने अपनी सजा तो पूरी कर ली थी लेकिन अर्थदंड न चुका पाने के कारण जेलों में बंद थे। एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक उत्तर प्रदेश की 71 जेलों में करीब 98 हजार कैदी और बंदी हैं। इनमें सजायाफ्ता और जिन पर मुकदमे चल रहे हैं दोनो शामिल हैं।
ट्रेंडी और इको फ्रेंडली एक्ससरीज का पता यह रहा
अब जब फेस्टिव सीजन शुरू हो रहा है तो इंडियन लुक आप चाहती हैं मगर ऐक्सेसरीज ऐसी चाहिए जो जीन्स से लेकर साड़ी या लहँगे के साथ चल सके। शादी से लेकर मेहन्दी और फिलहाल तो रक्षा बन्धन और इसके बाद दुर्गा पूजा की तैयारी। अगर आप इको फ्रेंडली, ट्रेडी और ट्रेडिशनल पाइच, मोबाइल पाउच और पर्स खोज रही हैं तो जरा इन पर निगाह डालिए। वैसे राखी पर अपनी बहन के लिए भी ये आइडिया बुरा नहीं है। ये इको फ्रेंडली ही नहीं, पॉकेट फ्रेंडली भी हैं। इस कलेक्शन में पर्स, बैग्स, पोटली के साथ मोबाइल पाउच भी शामिल हैं।
फोल्डेबल पर्स – मटेरियल – कॉटन। जिपर और मैग्नेटिक लॉक के साथ कीमत -100 रुपए प्रति पीस

शगुन पोटली – नेट और लेस की सजावट के साथ, कीमत – 20 रुपये प्रति पीस

मोबाइल पाउच – फोम्ड मोबाइल पाउच, लेस के साथ, कीमत 26 रुपये प्रति पीस

मोबाइल पाउच – अतिरिक्त पॉकेट के साथ, मटेरियल – जूट और डेकोरेटेड लेस, बटन लॉक, कीमत -60 रुपये प्रति पीस

पोटली – मटेरियल – जूट, ब्रोकेड और नेट, टेजेल और मोती लेस की सजावट, कीमत – 50 से 100 रुपये से शुरू

छोटी पोटली – मोती की सजावट, कीमत -50 रुपये प्रति पीस

ट्रेन्डी पर्स – मटेरियल – जूट और नेट, गोल्डेन बॉर्डर के साथ, कीमत -100 रुपये प्रति पीस

जूट पाउच – मटेरियल -जूट और रंगीन लेस, कीमत – 80 रुपये प्रति पीस

जूट बैग – मैचिंग कॉटन फैब्रिक के साथ, कीमत -100 रुपये प्रति पीस

आदि हैंडमेड क्रिएशन सिग्नेचर द्वारा पेश किये गये ये पर्स और बैग्स खरीदने के लिए आप इस नम्बर पर कॉल या मैसेज कर सकती हैं –
आदि हैंडमेड क्रियेशन्स – 9831022689
एक नहीं, अनेक तरीकों से किसी भी मौके पर पहनें साड़ी
त्योहार या मौका कोई भी हो, कोशिश हमारी रहती है कि साड़ी पहनें। साड़ी एक ऐसा परिधान है जो इस देश को एक सूत्र में बाँधती है। भारत के हर राज्य में अलग – अलग तरीके से साड़ी पहनी जाती है और इसकी वैरायटी का तो कुछ कहना ही नहीं है। साड़ी की विविधता को देखकर राज्य की विविधता के बारे में जानना आसान हो जाता है। साड़ी के साथ सही ब्लाउज का चयन आपके लुक को पूरा करता है। साड़ी आपको पारम्परिक भी बना सकती है और अल्ट्रा मॉडर्न भी। यही वजह है कि हर बड़ा डिजाइनर या फिर छोटे से छोटा व्यवसायी साड़ी अपनाता है। इलाके की दुकान से लेकर शॉपिंग मॉल और रैम्प पर, हर जगह साडी का राज है मगर साड़ी पहनने के तरीके आपका लुक सुन्दर बनाते हैं। आम तौर पर हम उल्टे पल्ले की साड़ी पहनते हैं मगर साड़ी पहनने के और भी कई तरीके हैं जो आपको न सिर्फ खूबसूरत बनायेंगे बल्कि आप अलग भी दिखेंगे। ऐसे ही कुछ आसान और सदाबहार तरीकों को आइए, जानते हैं –
बंगाली स्टाइल
बंगाली स्टाइल की साड़ी ट्रेडिशनल लुक देने के मामले में सबसे आगे है। यह न केवल आपको अभिजात्यतापूर्ण बनाती है बल्कि इसे पहनना और सम्भालना भी खास मुश्किल नहीं है। इस लुक के लिए हैंडलूम या हल्की कॉटन की बॉर्डर वाली साड़ियां अच्छी रहती हैं। दुर्गापूजा और पोएला बैशाख पर इस तरह साड़ी पहनकर देखें। इसके साथ फ्रिल वाला या पूरी बाँह वाला ब्लाउज जबरदस्त लगता है।
लहंगा स्टाइल

इस स्टाइल में आप किसी भी तरह की साड़ी को लहंगे जैसा लुक दे सकती हैं। प्लेट्स की मददसे साड़ी को कुछ इस तरह बांधते हैं कि यह लहंगे जैसा लुक देती है। यह आजकल काफी चलन में भी है। इस तरह से आम तौर पर राजस्थान और गुजरात में साड़ी पहनी जाती है। आप किसी पार्टी या शादी में इसे पहन सकती हैं।
जलपरी स्टाइल

दुबली हैं और आपका फिगर परफेक्ट है तो यह तरीका आपके लिए बेस्ट है। यह साड़ी लो वेस्ट से पहनी जाती हैऔर स्कर्ट जैसा लुक देती है। इसे पहनने के बाद फिगर स्लिम लगता है। आमतौर पर यह स्टाइल उनसाड़ियों पर अच्छा लगता है जिनमें पल्लू पर अधिक काम होता है।
तितली स्टाइल

दीपिका या प्रियंका की तरह दिखना चाहती हैं, तो इस स्टाइल में साड़ी में पहन सकती हैं।इसमें पल्लू काफी पतला रखा जाता है, जिससे फिगर और निखरकर आती है। यह स्टाइलशिफॉन, नेट जैसी साड़ियों पर खूब अच्छी लगत है। किसी कॉकटेल पार्टी में दोस्तों के बीच पहनिए, अच्छी लगेंगी। इसे नीवी स्टाइल साड़ी भी कहते हैं।
राजरानी स्टाइल

हेवी सिल्क या भारी नेट की साड़ियों के लिए राजरानी स्टाइल बेहतरीन विकल्प है। यह गुजराती स्टाइल का ही एक रूप है। इस पैटर्न से साड़ी पहनते वक्त पल्लू दाईं ओर से लिया जाता है और सामने से वी आकार में ले जाकर पिनअप कर दें। अपनी साड़ी का खूबसूरत आँचल दिखाना चाहती हैं, तो यह तरीका सही है।
मुमताज स्टाइल

तीज की पार्टी में जाते वक्त रेट्रो लुक के लिए मुमताज स्टाइल से बेहतर विकल्प क्या हो सकता है।आपका खूबसूरत फिगर है तो आपके लिए इस स्टाइल से बेहतर कोई विकल्प नहीं है। कॉकटेल, रिसेप्शन या कॉलेज में ऐसे साड़ी पहनें।
सीधा पल्ला

इस तरह से गुजरात, उत्तर प्रदेश, बिहार और कभी – कभी राजस्थान में साड़ी पहनी जाती है। किसी धार्मिक अनुष्ठान में इस तरह से साड़ी पहनें, पारम्परिक लुक दिखेगा। अगर साड़ी का भारी आँचल दिखाना चाहती हैं तो उसके लिए भी यह तरीका परफेक्ट है।
उल्टा पल्ला

यह आम तरीका है और इस तरीके से आप कहीं भी, कभी भी साड़ी पहन सकती हैं। पल्लू और आँचल पिनअप करें तो यह आपको प्रोफेशनल व क़ॉरपोरेट लुक देगा। आम तौर पर महिला नेत्रियाँ भी इसे अपनाती हैं और आप भी हैंडलूम और जवाहर जैकेट या पूरा कवर ब्लाउज पहनकर कॉटन या हैंडलूम के साथ सिल्क से ये यह लुक पा सकती हैं। दक्षिण भारत में काँजीवरम इसी तरीके से पहनी जाती है और असम की मेखला चादर या उत्तर – पूर्वी राज्यों में यह लुक आपको दिखेगा। यह सदाबहार तरीका है।
मराठी स्टाइल

बेल्ट खरीद और लगा रहे हैं तो इन बातों को न भूलें
बेल्ट एक ऐसी एक्सेसरीज है जो आप इस्तेमाल करते ही होंगे। आम तौर पर कोई भी लेदर बेल्ट आपने खरीद ली मगर इसे खरीदते वक्त कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है क्योंकि बेल्ट और उसको पहनने का तरीका आपके लुक को बदल सकता है। ऐसे में इसे पहनते और खरीदते वक्त कुछ बातों का ध्यान जरूर रखें –

बेल्ट का रंग आपके व्यक्तित्व पर काफी प्रभाव डालता है। पोशाक से बिल्कुल कंट्रास्ट रंग की बेल्ट आपको अधिक स्लिम व लंबा लुक देगी जबकि मैचिंग शेड की बेल्ट अधिक लंबे व दुबले लोगों के लिए अच्छा विकल्प है।
अमूमन बेल्ट को हम वेस्टलाइन पर बांधते हैं लेकिन थोड़ा ऊपर या नीचे पहनने से भी आपका लुक पूरी तरह बदल जाता है। लंबे और पतले लोग वेस्टलाइन से नीचे बेल्ट लगा सकते हैं जबकि छोटे कद के मोटे लोग इसे वेस्टलाइन पर ही पहनें तो अच्छा लगेगा।

गलत बकल का चुनाव आपके लुक को आधा कर सकता है इसलिए बकल खरीदते वक्त सावधानी बरतना जरूरी है। बहुत अधिक तड़क-भड़क वाले बकल्स आपके लुक का ग्रेस खत्म कर देते हैं। लेदर बेल्ट के लिए मीडियम साइज के सिंपल बकल ही स्टाइलिश लगते हैं।
बेल्ट हमेशा अपनी कमर के साइज से दो इंच लम्बी खरीदें। यानी अगर आपकी कमर 32 इंच की है तो आप बेल्ट कम से कम 34 इंच की लें। इससे लुक भी अच्छा लगता है और पहनने में भी सुविधा होती है।
नहीं रहे पूर्व लोकसभाध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी
अधिकारी ने बताया कि चटर्जी को कल ‘‘दिल का हल्का दौरा’’ पड़ा था जिसके बाद उनकी हालत बिगड़ गई और आज सुबह करीब सवा आठ बजे उनका निधन हो गया। चटर्जी को किडनी से संबंधित बीमारी थी और उन्हें गत मंगलवार को गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
अधिकारी ने पीटीआई-भाषा को बताया, ‘‘उनके कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया था और बीती रात से उनपर इलाज का कोई असर नहीं हो रहा था। आज सुबह करीब सवा आठ बजे उनका निधन हो गया।’’ चटर्जी को कल सुबह दिल का दौरा पड़ा था। उनका आईसीयू में इलाज चल रहा था।
लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष को पिछले महीने मस्तिष्क में रक्तस्राव हुआ था।उनका पिछले 40 दिन से इलाज चल रहा था और स्वास्थ्य में सुधार होने के चलते उन्हें तीन दिन के लिए अस्पताल से छुट्टी दी गई थी। अधिकारी ने बताया कि पिछले मंगलवार को उनकी हालत बिगड़ गई और उन्हें फिर से अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। दस बार लोकसभा के सांसद रहे चटर्जी माकपा की केंद्रीय समिति के सदस्य थे। वह 1968 में माकपा में शामिल हुए थे।वह वर्ष 2004 से 2009 तक लोकसभा के अध्यक्ष रहे।
माकपा के संप्रग-1 सरकार से समर्थन वापस ले लेने के बावजूद चटर्जी ने लोकसभा के अध्यक्ष के पद से इस्तीफा देने से इनकार कर दिया था। इस वजह से वरिष्ठ नेता को वर्ष 2008 में माकपा से निष्कासित कर दिया गया था। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने चटर्जी के निधन पर शोक जताया और कहा कि सभी दलों के सांसद उनका सम्मान करते थे।गांधी ने ट्वीट कर कहा, ‘‘10 बार सांसद रहे पूर्व लोकसभा अध्यक्ष श्री सोमनाथ चटर्जी के निधन पर मैं शोक प्रकट करता हूं।’’
छात्रा ने किया शराबियों पर नकेल कसने वाला आविष्कार
भोपाल /पटना : भोपाल के लक्ष्मी नारायण कॉलेज ऑफ टेक्नोलॉजी एंड साइंस से बीटेक कर रही पूर्णियां (बिहार) के गांव भवानीपुर की छात्रा ऐश्वर्य प्रिया ने ‘अल्कोहल डिटेक्टर एंड ऑटोमेटिक इंजन लॉकिंग सिस्टम’ का आविष्कार किया है। यह सिस्टम किसी भी फोर ह्विलर के इंजन में फिट कर देने पर वह शराबी सवारी को सूंघ लेता है और इंजन अपनेआप तत्काल बंद हो जाता है। जब तक शराबी वाहन सवार नीचे नहीं उतरेगा यानी वाहन से बाहर नहीं होगा, इंजन ऑटोमेटिकली चालू नहीं हो सकेगा। इस सिस्टम को लगाने में मात्र नौ सौ रुपए खर्च होते हैं।
हमारे देश में सड़क दुर्घटनाएँ इतनी बड़ी और खतरनाक समस्या बन गई हैं कि हर वर्ष लगभग एक छोटे शहर के बराबर की जनसंख्या मौत का शिकार हो जाती है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार हर वर्ष देश में सड़क हादसों में लगभग डेढ़ लाख लोग मर जाते हैं और उनसे कई गुना ज्यादा लोग घायल और अपंग हो जाते हैं। इस तरह हादसों से देश को हर वर्ष भारी आर्थिक और सामाजिक कीमत चुकानी पड़ती है। आकलन में ये पाया गया है कि नशे की हालत में गाड़ी चलाना इन दुर्घटनाओं का सबसे बड़ा कारण है।
केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी का कहना है कि सड़क हादसों में रोजाना करीब 400 लोगों की जान चली जाती है। उनमें ज्यादातर लोगों की मौत शराब पीकर वाहन चलाने से होती है। ऐसे में ऐश्वर्य प्रिया का आविष्कार देश के लिए किसी वरदान से कम नहीं। बिहार में शराबबंदी के बावजूद ऐसे हादसों में कोई कमी नहीं आई है। इसी को ध्यान में रखते हुए ऐश्वर्य प्रिया इस प्रोजेक्ट पर लगातार काम करती रहीं। कड़ी मेहनत के बाद उन्हें यह आश्चर्यजनक सफलता मिली है। सरकार यदि वाहनों में इस यंत्र का इस्तेमाल कराना सुनिश्चित कर दे तो शराब पीकर कोई गाड़ी नहीं चला पाएगा।
कॉलेज के प्रोफेसर भी इस काम में उनकी मदद कर रहे थे। ऐश्वर्य का आविष्कार सड़क हादसे रोकने में ऐतिहासिक भूमिका निभा सकता है। ऐश्वर्य ने अपना आविष्कार पिता रवि गुप्ता एवं मां इंदू देवी को समर्पित किया है। ऐश्वर्य बताती हैं कि वाहन के इंजन में लगने वाला यह सिस्टम बहुत कम स्पेस लेता है। इसलिए इसे कार या किसी भी बड़े वाहन के डैश बोर्ड पर रखा जा सकता है। इस सिस्टम का एक तार वाहन की बैटरी से और दूसरा तार इंजन से जोड़ दिया जाता है। इसके बाद यह शराबी चालकों या सवारियों की जासूसी शुरू कर देता है। यह सिस्टम जिस भी वाहन में फिट होगा, कोई शराबी उसे स्टार्ट नहीं कर पाएगा। सिस्टम उसकी सांस से अल्कोहल को डिटेक्ट कर लेता है। दोबारा वाहन तभी स्टार्ट होगा, शराबी वाहन से बाहर निकल जाए।
आजादी की लड़ाई में औरतों ने भी खूब दीं कुर्बानियाँ
आजादी के आंदोलन में हिंदुस्तान की महिलाओं का अविस्मरणीय योगदान रहा है। तमाम वीर स्त्रियों ने पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर स्वतंत्रता संग्राम का जयघोष किया। उन स्वातंत्र्य योद्धा महिलाओं में आज कस्तूरबा गांधी, विजयलक्ष्मी पंडित, अरुणा आसफ अली, सिस्टर निवेदिता, मीरा बेन, कमला नेहरू, मैडम भीकाजी कामा, सरोजिनी नायडू, सुचेता कृपलानी, रानी लक्ष्मीबाई, बेगम हज़रत महल, ऐनी बेसेंट, कश्मीर की प्रसिद्ध कवयित्री ललद्दद, भगतसिंह को सुरक्षा देने वाली दुर्गा भाभी, रायगढ़ की रानी अवंतीबाई, कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान को याद कर हमारा देश हमेशा गौरवान्वित होता है।
वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई खुद को बहादुर मानने वाली देशभक्त महिलाओं की आज भी प्रेरणा हैं। देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (1857) में उन्होंने अपने पराक्रम से अंग्रेजों को नाको चने जबवा दिए थे। अपनी वीरता के किस्सों को लेकर वह किंवदंती बन गईं। लखनऊ में जंगे-आज़ादी के दौरान नज़रबंद बागी बेगम हज़रत महल ने वाजिद अली शाह को छुड़ाने के लिए लार्ड कैनिंग के सुरक्षा दस्ते में भी सेंध लगा दी थी। ऐसी ही एक वीरांगना ऊदा देवी थीं, जिनके पति चिनहट की लड़ाई में वीरगति को प्राप्त हुए। ऐसा माना जाता है कि डब्ल्यू गार्डन अलक्जेंडर एवं तत्पश्चात क्रिस्टोफर हिबर्ट ने अपनी पुस्तक ‘द ग्रेट म्यूटिनी’ में लखनऊ में सिकन्दरबाग किले पर हमले के दौरान जिस वीरांगना के अदम्य साहस का वर्णन किया है, वह ऊदा देवी ही थीं। ऊदा देवी ने पीपल के घने पेड़ पर छिपकर लगभग 32 अंग्रेज सैनिकों को मार गिराया। अंग्रेज असमंजस में पड़ गये और जब हलचल होने पर कैप्टन वेल्स ने पेड़ पर गोली चलाई तो ऊपर से एक मानवाकृति गिरी। नीचे गिरने से उसकी लाल जैकेट का ऊपरी हिस्सा खुल गया, जिससे पता चला कि वह महिला है। उस महिला का साहस देख कैप्टन वेल्स की आंखें नम हो गईं, तब उसने कहा कि यदि मुझे पता होता कि यह महिला है तो मैं कभी गोली नहीं चलाता। ऊदा देवी का जिक्र अमृतलाल नागर ने अपनी कृति ‘गदर के फूल’ में बकायदा किया है। इसी तरह की एक वीरांगना आशा देवी थीं, जिन्होंने 8 मई 1857 को अंग्रेजी सेना का सामना करते हुए शहादत पाई। आशा देवी का साथ देने वाली
वीरांगनाओं में रनवीरी वाल्मीकि, शोभा देवी, वाल्मीकि महावीरी देवी, सहेजा वाल्मीकि, नामकौर, राजकौर, हबीबा गुर्जरी देवी, भगवानी देवी, भगवती देवी, इंदर कौर, कुशल देवी और रहीमी गुर्जरी इत्यादि शामिल थीं। ये वीरांगनाएं अंग्रेजी सेना के साथ लड़ते हुए शहीद हो गईं।

बेगम हजरत महल के बाद अवध के मुक्ति संग्राम में जिस दूसरी वीरांगना ने प्रमुखता से भाग लिया, वे थीं गोंडा से 40 किलोमीटर दूर तुलसीपुर रियासत की रानी राजेश्वरी देवी। राजेश्वरी देवी ने होपग्रांट के सैनिक दस्तों से जमकर मुकाबला लिया। अवध की बेगम आलिया ने भी अपने अद्भुत कारनामों से अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी। बेगम आलिया 1857 के एक वर्ष पूर्व से ही अपनी सेना में शामिल महिलाओं को शस्त्रकला में प्रशिक्षण देकर सम्भावित क्रांति की योजनाओं को मूर्त रूप देने में संलग्न हो गई थीं। अपने महिला गुप्तचर के गुप्त भेदों के माध्यम से बेगम आलिया ने समय-समय पर ब्रिटिश सैनिकों से युद्ध किया और कई बार अवध से उन्हें भगाया। इसी प्रकार अवध के सलोन जिले में सिमरपहा के तालुकदार वसंत सिंह बैस की पत्नी और बाराबंकी के मिर्जापुर रियासत की रानी तलमुंद कोइर भी इस संग्राम में सक्रिय रहीं। अवध के सलोन जिले में भदरी की तालुकदार ठकुराइन सन्नाथ कोइर ने विद्रोही नाजिम फजल अजीम को अपने कुछ सैनिक और तोपें, तो मनियारपुर की सोगरा बीबी ने अपने 400 सैनिक और दो तोपें सुल्तानपुर के नाजिम और प्रमुख विद्रोही नेता मेंहदी हसन को दी। इन सभी ने बिना इस बात की परवाह किए हुए कि उनके इस सहयोग का अंजाम क्या होगा, क्रांतिकारियों को पूरी सहायता दी।
झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने महिलाओं की एक अलग टुकड़ी ‘दुर्गा दल’ बनायी हुई थी। इसका नेतृत्व कुश्ती, घुड़सवारी और धनुर्विद्या में माहिर झलकारीबाई के हाथों में था। झलकारीबाई ने कसम उठायी थी कि जब तक झांसी स्वतंत्र नहीं होगी, न ही मैं श्रृंगार करूंगी और न ही सिन्दूर लगाऊंगी। अंग्रेजों ने जब झांसी का किला घेरा तो झलकारीबाई जोशो-खरोश के साथ लड़ी। चूंकि उसका चेहरा और कद-काठी रानी लक्ष्मीबाई से काफी मिलता-जुलता था, सो जब उसने रानी लक्ष्मीबाई को घिरते देखा तो उन्हें महल से बाहर निकल जाने को कहा और स्वयं घायल सिहंनी की तरह अंग्रेजों पर टूट पड़ी और शहीद हो गयीं। झलकारीबाई का जिक्र मराठी पुरोहित विष्णुराव गोडसे की कृति ‘माझा प्रवास’ में भी मिलता है। रानी लक्ष्मीबाई की सेना में जनाना फौजी इंचार्ज मोतीबाई और रानी के साथ चौबीस घंटे छाया की तरह रहने वाली सुन्दर-मुन्दर और काशीबाई सहित जूही और दुर्गाबाई भी दुर्गा दल की ही सैनिक थीं। इन सभी ने अपने जान की बाजी लगाकर रानी लक्ष्मीबाई पर आंच नहीं आने दी और अन्तोगत्वा वीरगति को प्राप्त हुईं।
कानपुर 1857 की क्रांति का प्रमुख गवाह रहा है। पेशे से तवायफ अजीजनबाई ने यहां क्रांतिकारियों की संगत में 1857 की क्रांति में लौ जलायी। एक जून 1857 को जब कानपुर में नाना साहब के नेतृत्व में तात्याटोपे, अजीमुल्ला खान, बालासाहब, सूबेदार टीका सिंह और शमसुद्दीन खान क्रांति की योजना बना रहे थे तो उनके साथ उस बैठक में अजीजनबाई भी थीं। इन क्रांतिकारियों की प्रेरणा से अजीजन ने मस्तानी टोली के नाम से 400 महिलाओं की एक टोली बनायी जो मर्दाना भेष में रहती थीं। एक तरफ ये अंग्रेजों से अपने हुस्न के दम पर राज उगलवातीं, वहीं नौजवानों को क्रांति में भाग लेने के लिये प्रेरित करतीं। सतीचौरा घाट से बचकर बीबीघर में रखी गईं 125 अंग्रेज महिलाओं और बच्चों की रखवाली का कार्य अजीजनबाई की टोली के ही जिम्मे था। बिठूर के युद्ध में पराजित होने पर नाना साहब और तात्याटोपे तो पलायन कर गये लेकिन अजीजन पकड़ी गयी। युद्धबंदी के रूप में उसे जनरल हैवलॉक के समक्ष पेश किया गया। जनरल हैवलॉक उसके सौन्दर्य पर रीझे हुए बिना न रह सका और प्रस्ताव रखा कि यदि वह अपनी गलतियों को स्वीकार कर क्षमा मांग ले तो उसे माफ कर दिया जायेगा। किंतु अजीजन ने एक वीरांगना की भांति उसका प्रस्ताव ठुकरा दिया और पलट कर कहा कि माफी तो अंग्रेजों को मांगनी चाहिए, जिन्होंने इतने जुल्म ढाये। इतने पर आग बबूला हो हैवलॉक ने अजीजन को गोली मारने के आदेश दे दिये। क्षण भर में ही अजीजन का अंग-प्रत्यंग धरती मां की गोद में सो गया।कानपुर के स्वाधीनता संग्राम में मस्तानीबाई की भूमिका भी कम नहीं है। बाजीराव पेशवा के लश्कर के साथ ही मस्तानीबाई बिठूर आई थी। अप्रतिम सौन्दर्य की मलिका मस्तानीबाई अंग्रेजों का मनोरंजन करने के बहाने उनसे खुफिया जानकारी हासिल कर पेशवा को देती थी। नाना साहब की मुंहबोली बेटी मैनावती भी देशभक्ति से भरपूर थी। नाना साहब बिठूर से पलायन कर गये तो मैनावती यहीं रह गयी। जब अंग्रेज नाना साहब का पता पूछने पहुंचे तो मौके पर 17 वर्षीया मैनावती ही मिली। नाना साहब का पता न बताने पर अंग्रेजों ने मैनावती को जिन्दा ही आग में झोंक दिया|
इतिहास के पन्नों में न जाने ऐसी कितनी दास्तान हैं, जहां वीरांगनाओं ने अपने साहस और जीवटता के दम पर अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए। मध्यप्रदेश में रामगढ़ की रानी अवन्तीबाई ने 1857 के संग्राम के दौरान अंग्रेजों का प्रतिकार किया और घिर जाने पर आत्मसमर्पण करने की बजाय स्वयं को खत्म कर लिया। मध्य प्रदेश में ही जैतपुर की रानी ने अपनी रियासत की स्वतंत्रता की घोषणा कर दतिया के क्रांतिकारियों को लेकर अंग्रेजी सेना से मोर्चा लिया। तेजपुर की रानी भी इस संग्राम में जैतपुर की रानी की सहयोगी बनकर लड़ीं। मुजफ्फरनगर के मुंडभर की महावीरी देवी ने 1857 के संग्राम में 22 महिलाओं के साथ मिलकर अंग्रेजों पर हमला किया। अनूप शहर की चौहान रानी ने घोड़े पर सवार होकर हाथों में तलवार लिए अंग्रेजों से युद्ध किया और अनूप शहर के थाने पर लगे यूनियन जैक को उतार कर हरा राष्ट्रीय झंडा फहरा दिया। इतिहास गवाह है कि 1857 की क्रांति के दौरान दिल्ली के आस-पास के गावों की लगभग 255 महिलाओं को मुजफ्फरनगर में गोली से उड़ा दिया गया था। 1857 की गदर में भारतीय महिलाओं में गजब की देश की भक्ति देखने को मिली। कई मौकों पर आजादी की लड़ाई में पुरुषों से आगे निकल गई महिलाएं।
बंगाल की प्रीतिलता वादेदर, कमला दास, मातांगिनी हाजरा, आजाद हिन्द फौज की कैप्टन लक्ष्मी सहगल समेत ऐसे कई नाम हैं जो हाशिये पर ही रह गये। सच तो ये है कि सन् 1857 के स्वतंत्रता आंदोलन से पहले ही कश्मीर की प्रसिद्ध कवयित्री ललद्दद स्वतंत्रता के गीत गाने लगी थीं। आजादी की लड़ाई में कस्तूरबा गांधी ने न सिर्फ हर कदम पर अपने पति महात्मा गांधी का साथ दिया था, बल्कि वह कई बार गाँधीजी के मना करने के बावजूद जेल गईं। सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लेने के कारण जवाहरलाल नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी पंडित को जेल में कैद कर दिया गया था। बाद में वह भारत के इतिहास में देश की पहली महिला मंत्री, संयुक्त राष्ट्र की पहली भारतीय महिला अध्यक्ष, पहली महिला राजदूत बनीं। हरियाणा के एक रूढ़िवादी बंगाली परिवार में जनमीं अरुणा आसिफ अली को अँग्रेजों की हुकूमत ने बार-बार गिरफ्तार कर जेल भेजा। ऐतिहासिक भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान 9 अगस्त, 1942 को उन्होंने मुंबई के गोवालिया टैंक मैदान में राष्ट्रीय झंडा फहराकर आंदोलन की अगुवाई की।
विदेशी मूल की मारग्रेट नोबल, जिन्हें लोग सिस्टर निवेदिता के नाम से याद करते हैं, स्वामी विवेकानंद से प्रभावित होकर आजादी के आंदोलन में कूद पड़ी थीं। थियोसोफिकल सोसाइटी और भारतीय होम रूल आंदोलन में अपनी विशिष्ट भागीदारी निभाने वाली ऐनी बेसेंट भी विदेशी मूल की स्त्री स्वातंत्र्य योद्धा थीं। उन्होंने भारत में महिला अधिकारों की भी लड़ाई लड़ी। इसी तरह लंदन के एक सैन्य अधिकारी की बेटी मैडलिन स्लेड, जिन्हे बाद में मीरा बेन कहा जाने लगा था, महात्मा गाँधी से अनुप्राणित होकर हिंदुस्तान आईं और यहीं की होकर रह गईं। पंडित जवाहर लाल नेहरू की धर्मपत्नी कमला नेहरू लौह स्त्री की तरह स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में हुकूमत विरोधी धरना-जुलूसों में अँग्रेजों का सामना करती रहीं। जब टीबी से पीड़ित होकर स्विटजरलैंड के अस्पताल में दम तोड़ रही थीं, उस समय नेहरू जी जेल में थे।
कांग्रेस रेडियो जिसे ‘सीक्रेट कांग्रेस रेडियो’ के नाम से भी जाना जाता है, की शुरुआत करने वाली सावित्रीबाई फूले (ऊषा मेहता) को 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान पुणे की येरवाड़ा जेल में रहना पड़ा। इंदिरा गांधी ने भी जब अंग्रेजों के विरुद्ध लोहा लेना चाहा तो उनकी टोली को वानर सेना का नाम दिया गया जो विदेशी कपड़ों की होली जलाने में सहयोग करती थी।
इसी कड़ी में रानी झलकारी बाई और शहीदे आजम भगत सिंह को सुरक्षा देने वाली दुर्गा भाभी का नाम भी लिया जाता है। रायगढ़ की रानी अवंतीबाई ने अंग्रजों के विरुद्ध संघर्ष का ऐलान कर मंडला के खेटी गांव में मोर्चा जमा लिया। अंग्रेज सेनापति वार्टर के घोड़े के दो टुकड़े कर दिए तो वह रानी के पैरों पर गिरकर प्राणों की भीख मांगने लगा था। हमेशा मिलिट्री यूनीफॉर्म में हाथ में तलवार लिए अजीजन बाई युवतियों की टोली के साथ घोड़ों पर सवार होकर नौजवानों को आजादी की लंड़ाई में शामिल होने का आह्वान करती रहीं। वह घायल सैनिकों का इलाज भी करती थीं। जब कर्नल विलियम ने कानपुर क्रांतिकारियों की सूची बनाई तो उसमें सबसे ऊपर अजीजन का ही नाम था। नाना साहब की पुत्री मैनादेवी के त्याग को भी भला कौन विस्मृत कर सकता है। जब अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया तो क्रांतिकारियों के बारे में जानकारी न देने पर उन्हें जिंदा जला दिया गया।
माई लार्ड

माई लार्ड! लड़कपन में इस बूढ़े भंगड़ को बुलबुल का बड़ा चाव था। गांव में कितने ही शौकीन बुलबुलबाज थे। वह बुलबुलें पकड़ते थे, पालते थे और लड़ाते थे, बालक शिवशम्भु शर्मा बुलबुलें लड़ाने का चाव नहीं रखता था। केवल एक बुलबुल को हाथ पर बिठाकर ही प्रसन्न होना चाहता था। पर ब्राह्मणकुमार को बुलबुल कैसे मिले? पिता को यह भय कि बालक को बुलबुल दी तो वह मार देगा, हत्या होगी। अथवा उसके हाथ से बिल्ली छीन लेगी तो पाप होगा। बहुत अनुरोध से यदि पिता ने किसी मित्र की बुलबुल किसी दिन ला भी दी तो वह एक घण्टे से अधिक नहीं रहने पाती थी। वह भी पिता की निगरानी में।
सराय के भटियारे बुलबुलें पकड़ा करते थे। गांव के लड़के उनसे दो-दो, तीन-तीन पैसे में खरीद लाते थे पर बालक शिवशम्भु तो ऐसा नहीं कर सकता था। पिताकी आज्ञा बिना वह बुलबुल कैसे लावे और कहां रखे? उधर मन में अपार इच्छा थी कि बुलबुल जरूर हाथ पर हो। इसी से जंगल में उड़ती बुलबुल को देखकर जी फड़क उठता था। बुलबुल की बोली सुनकर आनन्द से हृदय नृत्य करने लगता था। कैसी-कैसी कल्पनाएं हृदय में उठती थीं। उन सब बातों का अनुभव दूसरों को नहीं हो सकता। दूसरों को क्या होगा? आज यह वही शिव शम्भु है, स्वयं इसी को उस बालकाल के अनिर्वचनीय चाव और आनन्द का अनुभव नहीं हो सकता।
बुलबुल पकड़ने की नाना प्रकार की कल्पनाएं मन ही मन में करता हुआ बालक शिवशम्भु सो गया। उसने देखा कि संसार बुलबुलमय है। सारे गांव में बुलबुलें उड़ रही है। अपने घर के सामने खेलने का जो मैदान है, उसमें सैकड़ों बुलबुल उड़ती फिरती है। फिर वह सब ऊंची नहीं उड़तीं। बहुत नीची नीची उड़ती है। उनके बैठने के अड्डे भी नीचे नीचे है। वह कभी उड़ कर इधर जाती हैं और कभी उधर, कभी यहां बैठती है और कभी वहां, कभी स्वयं उड़कर बालक शिवशम्भुके हाथ की उंगलियों पर आ बैठती है। शिवशम्भु आनन्द में मस्त होकर इधर-उधर दौड़ रहा है। उसके दो तीन साथी भी उसी प्रकार बुलबुलें पकड़ते और छोड़ते इधर उधर कूदते फिरते है।
आज शिवशम्भु की मनोवाञ्छा पूर्ण हुई। आज उसे बुलबुलों की कमी नहीं है। आज उसके खेलने का मैदान बुलबुलिस्तान बन रहा है। आज शिवशम्भु बुलबुलों का राजा ही नहीं, महाराजा है। आनन्द का सिलसिला यहीं नहीं टूट गया। शिवशम्भुने देखा कि सामने एक सुन्दर बाग है। वहीं से सब बुलबुलें उड़कर आती हैं। बालक कूदता हुआ दौड़कर उसमें पहुंचा। देखा, सोने के पेड़ पत्ते और सोने ही के नाना रंग के फूल हैं। उन पर सोने की बुलबुलें बैठी गाती हैं और उड़ती फिरती हैं। वहीं एक सोने का महल है। उस पर सैकड़ों सुनहरी कलश हैं। उन पर भी बुलबुलें बैठी हैं। बालक दो तीन साथियों सहित महल पर चढ़ गया। उस समय वह सोने का बागीचा सोने के महल और बुलबुलों सहित एक बार उड़ा। सब कुछ आनन्द से उड़ता था, बालक शिवशम्भु भी दूसरे बालकों सहित उड़ रहा था। पर यह आमोद बहुत देर तक सुखदायी न हुआ। बुलबुलों का ख्याल अब बालक के मस्तिष्क से हटने लगा। उसने सोचा – हैं! मैं कहां उड़ा जाता हूं? माता पिता कहां? मेरा घर कहां? इस विचार के आते ही सुखस्वप्न भंग हुआ। बालक कुलबुलाकर उठ बैठा। देखा और कुछ नहीं, अपना ही घर और अपनी ही चारपाई है। मनोराज्य समाप्त हो गया।
आपने माई लार्ड! जब से भारतवर्ष में पधारे हैं, बुलबुलों का स्वप्न ही देखा है या सचमुच कोई करने के योग्य काम भी किया है? खाली अपना खयाल ही पूरा किया है या यहां की प्रजा के लिये भी कुछ कर्तव्य पालन किया? एक बार यह बातें बड़ी धीरता से मन में विचारिये। आपकी भारत में स्थिति की अवधिके पांच वर्ष पूरे हो गये अब यदि आप कुछ दिन रहेंगे तो सूद में, मूलधन समाप्त हो चुका। हिसाब कीजिये नुमायशी कामों के सिवा काम की बात आप कौन-सी कर चले हैं और भड़कबाजी के सिवा ड्यूटी और कर्तव्य की ओर आपका इस देश में आकर कब ध्यान रहा है? इस बार के बजट की वक्तृताही आपके कर्तव्यकाल की अन्तिम वक्तृता थी। जरा उसे पढ़ तो जाइये फिर उसमें आपकी पांच साल की किस अच्छी करतूत का वर्णन है। आप बारम्बार अपने दो अति तुमतराक से भरे कामों का वर्णन करते हैं। एक विक्टोरिया मिमोरियल हाल और दूसरा दिल्ली-दरबार। पर जरा विचारिये तो यह दोनों काम “शो” हुए या “ड्यूटी”? विक्टोरिया मिमोरियलहाल चन्द पेट भरे अमीरों के एक दो बार देख आने की चीज होगा उससे दरिद्रों का कुछ दु:ख घट जावेगा या भारतीय प्रजा की कुछ दशा उन्नत हो जावेगी, ऐसा तो आप भी न समझते होंगे।
अब दरबार की बात सुनिये कि क्या था? आपके खयाल से वह बहुत बड़ी चीज था। पर भारतवासियों की दृष्टिमें वह बुलबुलों के स्वप्न से बढ़कर कुछ न था। जहां जहां से वह जुलूस के हाथी आये, वहीं वहीं सब लौट गये। जिस हाथी पर आप सुनहरी झूलें और सोने का हौदा लगवाकर छत्र-धारण-पूर्वक सवार हुए थे, वह अपने कीमती असबाब सहित जिसका था, उसके पास चला गया। आप भी जानते थे कि वह आपका नहीं और दर्शक भी जानते थे कि आपका नहीं। दरबारमें जिस सुनहरी सिंहासनपर विराजमान होकर आपने भारत के सब राजा महाराजाओं की सलामी ली थी, वह भी वहीं तक था और आप स्वयं भलीभांति जानते हैं कि वह आपका न था। वह भी जहां से आया था वहीं चला गया। यह सब चीजें खाली नुमायशी थीं। भारतवर्ष में वह पहलेही से मौजूद थीं। क्या इन सबसे आपका कुछ गुण प्रकट हुआ? लोग विक्रम को याद करते हैं या उसके सिंहासन को, अकबरको या उसके तख्त को? शाहजहां की इज्जत उसके गुणों से थी या तख्तेताऊस से? आप जैसे बुद्धिमान पुरुष के लिये यह सब बातें विचारने की हैं।
चीज वह बनना चाहिये जिसका कुछ देर कयाम हो। माता-पिता की याद आते ही बालक शिवशम्भुका सुखस्वप्न भंग हो गया। दरबार समाप्त होते ही वह दरबार-भवन, वह एम्फीथियेटर तोड़कर रख देने की वस्तु हो गया। उधर बनाना, इधर उखाड़ना पड़ा। नुमायशी चीजों का यही परिणाम है। उनका तितलियों का-सा जीवन होता है। माई लार्ड! आपने कछाड़ के चाय वाले साहबों की दावत खाकर कहा था कि यह लोग यहां नित्य हैं और हम लोग कुछ दिन के लिये। आपके वह “कुछ दिन” बीत गये। अवधि पूरी हो गई। अब यदि कुछ दिन और मिलें तो वह किसी पुराने पुण्यके बल से समझिये। उन्हीं की आशा पर शिवशम्भु शर्मा यह चिट्ठा आपके नाम भेज रहा है, जिससे इन माँगे दिनों में तो एक बार आपको अपने कर्तव्य का खयाल हो।
जिस पद पर आप आरूढ़ हुए वह आपका मौरूसी नहीं – नदी नाव संयोग की भांति है। आगे भी कुछ आशा नहीं कि इस बार छोड़ने के बाद आपका इससे कुछ सम्बन्ध रहे। किन्तु जितने दिन आपके हाथ में शक्ति है, उतने दिन कुछ करने की शक्ति भी है। जो कुछ आपने दिल्ली आदि में कर दिखाया उसमें आपका कुछ भी न था, पर वह सब कर दिखाने की शक्ति आपमें थी। उसी प्रकार जाने से पहले, इस देश के लिये कोई असली काम कर जाने की शक्ति आप में है। इस देश की प्रजा के हृदय में कोई स्मृति-मन्दिर बना जाने की शक्ति आप में है। पर यह सब तब हो सकता है, कि वैसी स्मृति की कुछ कदर आपके हृदय में भी हो। स्मरण रहे धातु की मूर्तियों के स्मृतिचिह्न से एक दिन किले का मैदान भर जायगा। महारानी का स्मृति-मन्दिर मैदान की हवा रोकता था या न रोकता था, पर दूसरों की मूर्तियां इतनी हो जावेंगी कि पचास पचास हाथ पर हवा को टकराकर चलना पड़ेगा। जिस देश में लार्ड लैंसडौन की मूर्ति बन सकती है, उसमें और किस किसकी मूर्ति नहीं बन सकती? माई लार्ड! क्या आप भी चाहते हैं कि उसके आसपास आपकी एक वैसी ही मूर्ति खड़ी हो?
यह मूर्तियां किस प्रकार के स्मृतिचिह्न है? इस दरिद्र देश के बहुत-से धन की एक ढेरी है, जो किसी काम नहीं आ सकती। एक बार जाकर देखने से ही विदित होता है कि वह कुछ विशेष पक्षियों के कुछ देर विश्राम लेने के अड्डे से बढ़कर कुछ नहीं है। माई लार्ड! आपकी मूर्ति की वहां क्या शोभा होगी? आइये मूर्तियां दिखावें। वह देखिये एक मूर्ति है, जो किले के मैदानमें नहीं है, पर भारतवासियों के हृदय में बनी हुई है। पहचानिये, इस वीर पुरुषने मैदान की मूर्ति से इस देश के करोड़ों गरीबों के हृदय में मूर्ति बनवाना अच्छा समझा। यह लार्ड रिपन की मूर्ति है। और देखिये एक स्मृतिमन्दिर, यह आपके पचास लाख के संगमरमर वाले से अधिक मजबूत और सैकड़ो गुना कीमती है। यह स्वर्गीया विक्टोरिया महारानी का सन् 1858 ई. का घोषणापत्र है। आपकी यादगार भी यहीं बन सकती है, यदि इन दो यादगारों की आपके जी में कुछ इज्जत हो।
मतलब समाप्त हो गया। जो लिखना था, वह लिखा गया। अब खुलासा बात यह है कि एक बार ‘शो’ और ड्यूटीका मुकाबिला कीजिये। ‘शो’ को ‘शो’ ही समझिये। ‘शो’ ड्यूटी नहीं है! माई लार्ड! आपके दिल्ली दरबार की याद कुछ दिन बाद उतनी ही रह जावेगी जितनी शिव शम्भु शर्मा के सिर में बालकपन के उस सुखस्वप्न की है।
[‘भारत मित्र’,11, अप्रैल 1903 ]




