Wednesday, July 8, 2026
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‘तुलसी की अनुभूति और अभिव्यक्ति में कोई अन्तर नहीं’

कोलकाता : गोस्वामी तुलसीदास हर युग में प्रासंगिक हैं, तुलसीदास जी की अनुभूति और अभिव्यक्ति में कोई अन्तर नहीं है। उन्होंने जो अनुभव किया था, जो समाज में था, उसको उसी रूप में रचा। उक्त बातें सेठ सूरजमल जालान पुस्तकालय द्वारा आयोजित तुलसी जयन्ती समारोह में मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित डॉ. अवनिजेश अवस्थी ने कहीं। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे शान्ति निकेतन के डॉ. रामेश्‍वर मिश्र ने तुलसी साहित्य के प्रभाव पर प्रकाश डाला। वरिष्ठ साहित्यकार पद्मश्री डॉ. कृष्ण बिहारी मिश्र ने अपने आशीर्वचन में तुलसी साहित्य की महत्ता पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम में उपस्थित सभी अतिथियों ने गो×स्वामी तुलसीदास को श्रद्धांजलि दी। कार्यक्रम की शुरुआत पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को श्रद्धांजलि देकर की गयी। सेठ सूरजमल जालान बालिका विद्यालय तथा जालान गर्ल्स कॉलेज की छात्राओं ने तुलसी के भजन तथा पद प्रस्तुत किये। अतिथियों का स्वागत इशान जालान और अपूर्वी जालान ने किया। कार्यक्रम का संचालन दुर्गा व्यास ने किया। कार्यक्रम में शहर के प्रतिष्ठित साहित्यकार तथा साहित्यप्रेमी उपस्थित थे। यह जानकारी पुस्तकालय के पुस्तकाध्यक्ष श्रीमोहन तिवारी ने दी।

साहित्य संवाद में शामिल हुए युवा पीढ़ी के रचनाकार

कोलकाता : सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन एवं भारतीय भाषा परिषद के संयुक्त तत्त्वावधान में आयोजित ‘साहित्य-संवाद’ के अन्तर्गत विभिन्न विश्वविद्यालयों के शोधार्थियों ने आलेख एवं युवा कवियों ने काव्य-पाठ किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विमला पोद्दार ने कहा कि साहित्य-संवाद का यह मंच नई प्रतिभाओं को मंच प्रदान करता है। स्वागत भाषण रखते हुए भारतीय भाषा परिषद के निदेशक शंभुनाथ ने कहा कि इस तरह के विमर्श से शोधार्थियों का अनुसंधान कार्य और अधिक समृद्ध होगा। ‘कवि सप्तक’ के अंतर्गत शिव कुमार यादव, नीलकमल, विमलेश त्रिपाठी, रितु तिवारी, राहुल शर्मा, संदीप प्रसाद और धर्मेंद्र राय ने अपनी कविताओं का पाठ किया। आलेख पाठ के अंतर्गत विश्व भारती विश्वविद्यालय की शोध छात्रा पूजा पाठक ने ‘मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यासों में स्त्री-चेतना’ विषय पर विचार रखते हुए कहा कि ‘देह विमर्श को लेकर जो रूढ़ियाँ हैं, उसे हमें ध्वस्त करना होगा।’
कलकत्ता विश्वविद्यालय के शोधार्थी रंजीत संकल्प ने ‘साम्प्रदायिकता विमर्श और हिंदी उपन्यास’ शीर्षक विषय पर विचार रखते हुए कहा कि हिंदी उपन्यासों में सांप्रदायिकता को लेकर लेकर एक गंभीर विमर्श की परम्परा है। वर्द्धमान विश्व विद्यालय के शोधार्थी शिव कुमार दास ने ‘ भूमंडलीकरण के दौर में साहित्य के समक्ष चुनौतियाँ’ विषय पर विचार रखते हुए आज के दौर को बाज़ार का दौर कहा। कलकत्ता विश्वविद्यालय के शोधार्थी पीयूषकांत राय ने ‘समकालीन उपन्यास और स्थानीयता का विमर्श’ शीर्षक के अंतर्गत ‘मंडल, कमंडल और भूमंडल के त्रिभुज से प्रभावित समाज का मूल्यांकन समकालीन हिंदी उपन्यासों के परिप्रेक्ष्य में किया सभी आलेखों पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कवयित्री रजनी गुप्त ने कहा कि सभी आलेख मौलिक चिंतन से जुड़ी हैं और हमें यह पीढ़ी आश्वस्त भी करती हैं ।कार्यक्रम का संचालन संजय जायसवाल ने कहा कि साहित्य संवाद का यह मंच रचनात्मकता का मंच है जो हमें रचने और संवाद के लिए प्रेरित करता है । धन्यवाद ज्ञापन आनंद गुप्ता ने दिया ।

जायसवाल एडुकेशन ट्रस्ट द्वारा मेधावी विद्यार्थियों का सम्मान

कोलकाता :  जायसवाल एडुकेशन ट्रस्ट एवं सहयोगी संस्थाओं द्वारा आयोजित 13वें योग्यता पुरस्कार में 80 प्रतिशत या इससे अधिक अंक पाने वाले 46 विद्यार्थियों को सम्मानित किया गया। विद्यार्थियों को बैग, कलम सेट, घड़ी एवं 1100 रुपये नकद देकर श्री कृष्ण जायसवाल लोहा सोसायटी भवन में सम्मानित किया गया। कार्यक्रम का संचालन सचिव राजेश कुमार जायसवाल ने किया। अध्यक्ष जगदीश प्रसाद साव ने स्वागत भाषण दिया। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रोफेसर नैन्सी जायसवाल ने की। सहयोगी संस्था के रूप में पश्चिम बंगाल कलचुरी जायसवाल समवर्गीय सभा, नन्दरानी सेवा ट्रस्ट, स्वर्गीय कंचन जायसवाल स्मृति ने सर्वोच्च अंक पाने वाले छात्र को पदक तथा 2500 रुपये नकद प्रदान किये।
बिन्दू जायसवाल, कविता जायसवाल, कुणाल जायसवाल, कुणाल गुप्ता, अनिल राय, श्रीमोहन तिवारी, द्वारका दास जायसवाल, तारकनाथ साव, विजय साव, अमित जायसवाल, ने वक्तव्य रखे।

अटल बिहारी वाजपेयी की दो कवितायें

मौत से ठन गई

ठन गई!
मौत से ठन गई!

जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,

रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई।

मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,
ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं।

मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ,
लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ?

तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ,
सामने वार कर फिर मुझे आज़मा।

मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र,
शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर।

बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,
दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।

प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।

हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये,
आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए।

आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,
नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है।

पार पाने का क़ायम मगर हौसला,
देख तेवर तूफ़ाँ का, तेवरी तन गई।

मौत से ठन गई।

 

ऊँचाई 

ऊँचे पहाड़ पर,
पेड़ नहीं लगते,
पौधे नहीं उगते,
न घास ही जमती है।

जमती है सिर्फ बर्फ,
जो, कफ़न की तरह सफ़ेद और,
मौत की तरह ठंडी होती है।
खेलती, खिलखिलाती नदी,
जिसका रूप धारण कर,
अपने भाग्य पर बूंद-बूंद रोती है।

ऐसी ऊँचाई,
जिसका परस
पानी को पत्थर कर दे,
ऐसी ऊँचाई
जिसका दरस हीन भाव भर दे,
अभिनंदन की अधिकारी है,
आरोहियों के लिये आमंत्रण है,
उस पर झंडे गाड़े जा सकते हैं,

किन्तु कोई गौरैया,
वहाँ नीड़ नहीं बना सकती,
ना कोई थका-मांदा बटोही,
उसकी छाँव में पलभर पलक ही झपका सकता है।

सच्चाई यह है कि
केवल ऊँचाई ही काफ़ी नहीं होती,
सबसे अलग-थलग,
परिवेश से पृथक,
अपनों से कटा-बँटा,
शून्य में अकेला खड़ा होना,
पहाड़ की महानता नहीं,
मजबूरी है।
ऊँचाई और गहराई में
आकाश-पाताल की दूरी है।

जो जितना ऊँचा,
उतना एकाकी होता है,
हर भार को स्वयं ढोता है,
चेहरे पर मुस्कानें चिपका,
मन ही मन रोता है।

ज़रूरी यह है कि
ऊँचाई के साथ विस्तार भी हो,
जिससे मनुष्य,
ठूँठ सा खड़ा न रहे,
औरों से घुले-मिले,
किसी को साथ ले,
किसी के संग चले।

भीड़ में खो जाना,
यादों में डूब जाना,
स्वयं को भूल जाना,
अस्तित्व को अर्थ,
जीवन को सुगंध देता है।

धरती को बौनों की नहीं,
ऊँचे कद के इंसानों की जरूरत है।
इतने ऊँचे कि आसमान छू लें,
नये नक्षत्रों में प्रतिभा की बीज बो लें,

किन्तु इतने ऊँचे भी नहीं,
कि पाँव तले दूब ही न जमे,
कोई काँटा न चुभे,
कोई कली न खिले।

न वसंत हो, न पतझड़,
हो सिर्फ ऊँचाई का अंधड़,
मात्र अकेलेपन का सन्नाटा।

मेरे प्रभु!
मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना,
ग़ैरों को गले न लगा सकूँ,
इतनी रुखाई कभी मत देना।

अरे मोटापा ! अब तो चले जाओ

अरे मोटापा ! तुम तो बड़े हठी हो। जिद्दी हो। कब से टिके हुए हो। अब तो तुम चले जाओ। मैंने तो तुम्हें कभी नहीं बुलाया। तुम तो पुराने जमाने के मेहमान की तरह हो, जो आ तो गये, टिक ही गये। जाने का नाम ही नहीं ले रहे हो। पहले लोगों के यहाँ मेहमान जाया करते थे, अब तो फेसबुक और व्हाट्अप का जमाना है। आजकल के बच्चे तो मेहमान शब्द ही नहीं जानते और ना मेहमान नामक चिड़िया को पहचानते हैं। और तुम तो बड़े बेशर्म निकले। जब नहीं आये थे, तो नहीं आये। और अब आ गये तो जाने का नाम ही नहीं ले रहे। जिंदगी का एक हिस्सा तो तुम बिल्कुल कट्टी थे। कितना अच्छा लगता था। हल्का-फुल्का शरीर। उछलने –कूदने वाला शरीर। पर एक समय के बाद लोगों ने टोकना शुरू कर दिया। अरे, तुम्हारे शरीर पर मांस क्यों नहीं चढ़ता। खाना तुम खाती हो, या खाना तुमको खाता है।
अरे महिलाओं ने तो कानाफूसी भी शुरू कर दी कि लगता है इसको पेट भर खाना नहीं मिलता, देखो चारों ओर हड्डी ही हड्डी दिखती है। बहुत बड़े होने तक भी मैं रिक्शा में भैया-भाभी की गोदी में बैठकर ही जाती थी। सभी यही कहते थे, इसका क्या ये तो किसी भी कोने में बैठ जायेगी। कभी-कभी खराब लगता, तो कभी –कभी अपने दुबलेपन पर नाज होता। शादी के समय भी वहीं दुबला-पतला शरीर था। मुझे तो बड़ा अच्छा लगता था, लेकिन जो देखता वहीं कहता अरे बाबा इतनी दुबली। शरीर कैसा रुखा-सुखा दिखता है। लगता है जैसे भगवान ने उनकी बात सुन ली और बस कुछ सालों बाद ही मांस ऐसा चढ़ना शुरू किया, कि चढ़ता ही जा रहा है, चढ़ता ही जा रहा है। उतरने का नाम ही नहीं ले रहा है। बिल्कुल महंगाई की तरह। नेता की तरह। नेता जिस तरह कुर्सी से चिपक जाता है, ठीक वैसे ही मांस की परत-दर-परत चिपकती जा रही है और आयतन बढ़ाता जा रहा है।
दूर से ही लोग मुझे देख कर हाय तौबा करते होंगे। सलवार सूट और कुर्ती तो इतनी तेजी से छोटी होती है, जैसे आजकल के समय में घरों में खुशी होती है। अच्छे-अच्छे डिजाइन वाली या स्टाइल वाली की बात तो दूर, कई दुकानदार तो पूछने पर सबसे पहले बोल देते हैं कि ‘ना बाबा आपनार जने होबे ना’। अरे क्या मैं दुनिया में सबसे ज्यादा मोटी हो गई हूँ, कि मेरे लिए दुकान में सिले-सिलाये कपड़े नहीं मिलते। मॉल में भी कई बार डबल एक्सट्रा या एक्सट्रा एक्सट्रा लार्ज भी अटक जाता है।
हाय राम मेरा मोटापा है या देश में फैला भ्रष्टाचार। जो कम होने का नाम ही नहीं ले रहा है। कई बार सोचती हूँ कि अगर मम्मी होती तो मेरे मोटापा कम करने के लिए व्रत, उपवास रख लेती और मैं स्लिम, स्लिम हो जाती। कितना मजा आता। लेकिन मैं …मैं … तो उपवास भी नहीं रख सकती। किसी तरह एक तीज व्रत कर लेती हूँ। जब दुबली थी, तो व्रत कर लिया करती थी। उस समय की बात ही कुछ और थी। अरे माँ से याद आया। मेरी सासू माँ के बारे में मैंने सुना है, वह बहुत दुबली पतली थीं। पूरा परिवार ही दुबला-पतला था। वो कहती थीं कि मेरी बहुएँ मोटी-ताजी हो जिससे घर भरा-भरा लगे। कहीं भगवान ने उनकी बात तो नहीं सुन ली।
सब कहते हैं चावल मत खाओ, आलू मत खाओ, मिठाई और चीनी तो जानलेवा है। अरे बाबा, आलू नहीं खाऊँ तो क्या खाऊं। क्या खाऊँ। यही सोच-सोच कर भूख बढ़ जाती है। फलों में आम मत खाओ। कभी आम खा लूँ तो लगता है जैसे कोई पाप कर रही हूँ। तो खाऊँ क्या, खीरा और पीने के लिए गर्म पानी। यह भी कोई खाने-पीने की चीज है। आज कल तो सेल्फी लेने में भी ध्यान रखती हूँ कि कहीं मोटापा नहीं दिख जाये। और कभी-कभार पूरी-की-पूरी फोटो खींची जाती है तो जल्दी ही डिलीट कर देती हूँ, क्योंकि मैं खुद अपनी फोटो देखकर डरने लगती हूँ। अरे मोटापा अब तो चले जाओ, विमान से चले जाओ और लौट कर आने की मत सोचना। समझे…। नहीं तो खैर नहीं…।

भूख से बिलखते कुपोषित बच्चे को स्तनपान कराकर सोशल मीडिया पर छाईं

ब्यूनोस एयर्स : अर्जेंटीना की एक महिला पुलिसकर्मी मिट्टी से सने कपड़े पहने कुपोषित बच्चे को स्तनपान कराकर सोशल मीडिया पर छा गई है। दरअसल, केलेस्ते अयाला राजधानी ब्यूनोस आयर्स के जिस अस्पताल में सुरक्षागार्ड के रूप में तैनात थीं, वहां सड़क किनारे मिले भूख से तड़पते एक कुपोषित बच्चे को लाया गया था। अयाला बच्चे को देख खुद को रोक नहीं पाईं। उन्होंने दूध पिलाकर बच्चे की भूख शांत की।
स्थानीय मीडिया को दिए इंटरव्यू में अयाला ने कहा, ‘वह बार-बार अपना हाथ मुंह में डालते हुए रो रहा था। मुझे एहसास हुआ कि उसे बहुत भूख लगी है। इसलिए मैंने उसे सीने से लगाने और दूध पिलाने की इजाजत मांगी। यह बेहद दर्दनाक पल था। उसे भूख से तड़पता देख मेरी रूह कांप गई थी। देश और समाज को भूखमरी और कुपोषण को मुद्दे को लेकर गंभीर होना पड़ेगा। हम मासूमों को ऐसे भूख से तड़पने और मरने के लिए नहीं छोड़ सकते।’
बकौल अयाला, ‘दूध पीने के बाद बच्चा एकदम शांत हो गया। उसके होठों पर मुस्कान और चेहरे पर अजब-सी संतुष्टि का भाव था। बच्चे को हंसता देख मेरी आंखों से भी खुशी के आंसू छलक पड़े।’ स्थानीय मीडिया के अनुसार बच्चा छह भाई-बहनों में सबसे छोटा है। उसके पिता का अता-पता नहीं है और मां भीख मांगकर गुजर-बसर करती है। अग्निशमन विभाग के कर्मचारियों को बच्चा रोते हुए सड़क किनारे मिला था, जिसके बाद उसे अस्पताल ले जाया गया।
अस्पताल कर्मियों ने हाथ लगाने से मना कर दिया
-अयाला की साथी मार्कोस हेरेदिया ने बताया कि अस्पताल कर्मी भूख से तड़पते बच्चे पर ध्यान देने के बजाय अन्य मरीजों के इलाज में व्यस्त थे। एक-दो कर्मचारियों ने तो बच्चे को गंदा बताते हुए उसे हाथ लगाने तक से इनकार कर दिया था। तभी अयाला डॉक्टरों से मिलीं और उसे स्तनपान कराने की इजाजत मांगी। डॉक्टरों के मानने पर उन्होंने बच्चे को गोद में लिया और दूध पिलाने लगीं। मार्कोस ने बच्चे को स्तनपान कराती अयाला का फोटो सोशल मीडिया पर डाल दिया और यह मिनटों में वायरल हो गया। शुरुआती घंटों में ही इसे 68000 लाइक, 94000 शेयर और 300 कमेंट मिल गए।
-‘तुमने एक अजनबी बच्चे के प्रति प्यार की जो मिसाल पेश की है, उसे मैं सार्वजनिक करना चाहती हूं। तुमने यह नहीं सोचा कि बच्चे ने गंदे कपड़े पहन रखे हैं। वह मिट्टी में सना हुआ है। तुम उसके लिए मां की भूमिका निभाने में जरा भी नहीं हिचकिचाई। हमें तुम पर गर्व है दोस्त।’ : अयाला के साथी पुलिसकर्मी

जहां दिन में जेवर बिकते हैं और रात में जायके

इंदौर : बामुश्किल 20 फुट चौड़ी और आधा किलोमीटर लम्बी गली में लज्जतों की विरासत से सजी कोई 250 दुकानें और इनमें सैकड़ों “चटोरों” की ठसाठस भीड़…. यह इंदौर की मशहूर सर्राफा चौपाटी है। नाम से धोखा मत खा जाइयेगा क्योंकि रिवायती जायकों की यह दुनिया सदी भर से हर रोज रात को तब आबाद हो रही है, जब सर्राफा बाजार में जेवरात की दुकानें बंद हो जाती हैं।

रात्रिकालीन सर्राफा चौपाटी एसोसिएशन के अध्यक्ष नंदकिशोर शिवगिरि ने “पीटीआई-भाषा” को बताया कि  “आपको पारम्परिक खान-पान की ऐसी जगह शायद कहीं नहीं मिलेगी, जहां पिछले 100 सालों से मांसाहारी व्यंजनों की, दुकानों पर सख्त मनाही है। आप पश्चिमी मध्यप्रदेश के मालवा अंचल के अलग-अलग जायकों का लुत्फ सर्राफा चौपाटी में बेहद किफायती दामों पर ले सकते हैं।”

शिवगिरि का परिवार सर्राफा चौपाटी में मिठाइयों की दुकान चलाता है। उनकी दुकान में हालांकि चुनिंदा मिठाइयां उपलब्ध हैं। लेकिन स्वाद के इस रात्रिकालीन बाजार में परोसी जाने वाली मिठाइयों की फेहरिस्त लम्बी है… गुलाब जामुन, काला जामुन, शाही रबड़ी, कलाकन्द, मूंग का हलवा, मालपुए, मावा बाटी, बासुंदी, श्रीखण्ड, शिकंजी, फालूदा, राजभोग आदि। स्वाद के शौकीनों का पेट भर जाता है, पर मिठाई से मन नहीं भरता।

मुंह मीठा हो गया हो, तो अब कुछ नमकीन और चटपटा नोश फ़रमा लिया जाये। भुट्टे का “कीस”, मटर और हरे चने की कचोरी और गराड़ू (तलकर पकाया जाने वाला दुर्लभ कंद जिसे चटपटा मसाला बुरककर और नींबू निचोड़कर परोसा जाता है) सर्राफा चौपाटी की खासियतों में शुमार हैं ।

वैसे “चटोरों के स्वर्ग” में दही बड़े, चाट पकौड़ी, पानी पूरी, दही पूरी, सेंव पूरी, पाव भाजी और छोले टिकिया की भी खूब दुकानें हैं। नयी पीढ़ी की पसंद के मुताबिक वहां मोमोज, नूडल्स, मंचूरियन और हॉट डॉग की दुकानें भी खुल गयी हैं। लेकिन मजे की बात यह है कि सर्राफा चौपाटी में इन “परदेसी” व्यंजनों को भी शुद्ध शाकाहारी रेसिपी के साथ खूब पारंपरिक मसाले डालकर कुछ इस तरह पकाया जाता है जिससे लगता है कि इनकी उत्पत्ति इंदौर में ही हुई हो।

हर रोज रात आठ बजे के बाद जेवरात की दुकानें बंद होते ही सर्राफा बाजार, सर्राफा चौपाटी में बदल जाता है और इन दुकानों के बाहर खाने-पीने के प्रतिष्ठान सजने लगते हैं। स्वाद का यह पारंपरिक बाजार रात दो बजे तक खुला रहता है। सप्ताहांत और छुट्टियों के वक्त तो वहां इतनी भीड़ उमड़ती है कि पैर रखने की भी जगह नहीं मिलती।

सर्राफा चौपाटी एसोसिएशन के अध्यक्ष शिवगिरि ने कहा, “आम दिनों में रात दो बजे तक का समय हमारे कारोबार के लिये पर्याप्त है। हालांकि, प्रशासन से हमारी मांग है कि होली, नवरात्रि, दशहरा तथा दीवाली सरीखे बड़े त्योहारों और 31 दिसंबर की रात सर्राफा चौपाटी को तड़के चार बजे तक खुला रखने की अनुमति दी जाये।”

इमरान खान: एक क्रिकेटर जो बन गया पाकिस्तान का प्रधानमंत्री

इस्लामाबाद : क्रिकेट से सियासत में आए इमरान खान को भ्रष्टाचार से रूग्न पाकिस्तान को एक इस्लामी कल्याणकारी राज्य में तब्दील करने के लिए प्रधानमंत्री बनने का अपना सपना साकार करने में 22 साल का तवील सियासी सफर तय करना पड़ा। बहरहाल वह इस देश के प्रधानमंत्री बन चुके हैं।

आम चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में पाकिस्तान तहरीक-ए- इंसाफ (पीटीआई) के उभरने के बाद खान ने पाकिस्तान के 22वें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। खान ने 1996 में पीटीआई की स्थापना की जिसका अर्थ न्याय के लिए आंदोलन है। एक ऐसे देश की राजनीति में खुद को और एक नयी पार्टी को स्थापित करना बेहद मुश्किल काम था जिसकी राजनीति दो प्रमुख पार्टियों पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज(पीएमएल-एन) और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के ही इर्दगिर्द घूमती रही है। अपनी पार्टी को पहचान दिलाने के लिए खान ने अथक परिश्रम किया।

वह 2002 में हुए चुनाव में संसद सदस्य बने और 2013 में नेशनल असेंबली के लिए हुए चुनाव में वह फिर से निर्वाचित हुए और इन चुनावों में लोगों के जबर्दस्त समर्थन से उनकी पार्टी दूसरी सबसे पार्टी के रूप में उभर कर सामने आई। चुनाव के अगले ही साल मई 2014 में खान ने आरोप लगाया कि चुनाव में धांधली हुई हैं। इन चुनाव में नवाज शरीफ की पार्टी पीएमएल-एन विजयी हुई थी और शरीफ प्रधानमंत्री बने थे।

शपथ ग्रहण करते हुए

अगस्त 2014 में कथित चुनावी धांधली की जांच कराने की मांग और शरीफ के इस्तीफे की मांग करते हुए खान ने समर्थकों के साथ लाहौर से इस्लामाबाद तक रैली निकाली थी। इसके एक माह के भीतर ही खान ने पाकिस्तान मूल के कनाडाई धर्मगुरू ताहिर उल कादरी के साथ गठबंधन कर लिया। इस गठबंधन ने मिल कर शरीफ के इस्तीफे की मांग करते हुए उग्र प्रदर्शन किया। इस मामले की जांच के लिए न्यायिक आयोग बनाने का समझौता होने के बाद ही इनका प्रदर्शन समाप्त हुआ। शरीफ सरकार के साथ खान और कादरी यह समझौता हुआ था।

खान ने 2018 में अपने चुनाव प्रचार में भ्रष्टाचार से निपटने, गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम लागू करने, स्वास्थ्य सेवाएं और शिक्षा के क्षेत्र को बहतर बनाने का वादा किया था। माना जा रहा है कि खान को देश की शक्तिशाली सेना का समर्थन हासिल है और उन्होंने एक कल्याणकारी इस्लामिक राज्य के रूप में नए पाकिस्तान बनाने का वादा किया है।

पिछले माह उन्होंने जीत के बाद अपने भाषण में कहा था कि वह भारत के साथ पाकिस्तान के संबंध बेहतर बनाने के लिए तैयार हैं और उनकी सरकार चाहेगी कि दोनों पक्षों के नेता बातचीत के जरिए कश्मीर साहित सभी विवादों को निपटारा करे।

इसके अलावा खान पाकिस्तान और अमेरिका के बीच संतुलित संबंध बनाना चाहते हैं। ऑक्सफोर्ड से शिक्षा दीक्षा प्राप्त बेहद आकर्षक व्यक्तित्व के धनी खान अपने समय में लड़कियों के बीच बेहद लोकप्रिय थे। उन्होंने तीन शादियां की। उनकी पहली शादी 1995 में जेमिमा गोल्डस्मिथ के साथ हुई जो नौ साल चली थी। उनसे खान के दो बेटे हैं। इसके बाद दोनों का तलाक हो गया।

खान की दूसरी शादी टीवी प्रस्तोता रेहम खान से 2015 में हुई जो एक साल भी नहीं चली। इस साल की शुरूआत में खान में अपनी आध्यात्मिक गाइड बुशरा मनेका से शादी की। इमरान का जन्म मियांवाली में 1952 में इकरामुल्ला खान नियाजी और शौकत खानम के घर में हुआ था। उनके पिता पश्तून नियाजी कबीले से संबंध रखते हैं। उनका परिवार लाहौर में रहता है।

मछली बेचने पर ट्रोल होने वाली छात्रा ने केरल बाढ़ राहत के लिए दिए 1.5 लाख रुपये

तिरुवनंतपुरम : अपनी पढ़ाई की जरूरतों को पूरा करने के लिए मछली बेचने के लिए सोशल मीडिया पर ट्रोल हुई 21 वर्षीय कॉलेज छात्रा ने बाढ़ से प्रभावित केरल राज्य के मुख्यमंत्री आपदा राहत कोष में 1.5 लाख रुपये का योगदान किया है।
कोच्ची की रहने वाली छात्रा हनान ने कहा कि यह पैसा उसके पढ़ाई के लिए किए जा रहे संघर्ष के सोशल मीडिया पर शेयर किए जाने के बाद लोगों ने उसकी और उसके परिवार की मदद के लिए दिया गया था। हनान ने कहा यह पैसा मुझे लोगों से मिला था और जरुरतमंदों की मदद के लिए इसे वापस देकर मैं बहुत खुश हूं।
अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए विभिन्न कार्यक्रमों में एंकर की भूमिका निभाने वाली हनान ने लोगों से राहत कार्य के लिए अधिक से अधिक दान करने की गुजारिश की है। इडुक्की जिले के थोडुपुझा में एक निजी कॉलेज में बीएससी की छात्रा हनान के संघर्ष की कहानी मलयालम दैनिक में प्रकाशित होने के बाद वायरल हो गई थी। लेकिन, सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं के एक धड़े ने उसकी कहानी पर संदेह जताया था और उसे फर्जी करार दिया था।
हनान के अलावा, जीवन के विभिन्न क्षेत्रों के लोग उदारता से मदद करने के लिए धन और विभिन्न आवश्यक योगदान दे रहे हैं। एक सरकारी कर्मचारी और नर्स लिनी पुथुसरी जिसकी एक मरीज की सेवा के दौरान निपा वायरस से संक्रमित होने के बाद मौत हो गई थी के पति सजीश ने अपना पहला वेतन (25,000 रुपये) राहत कोष में दिया है। केरल सरकार ने लिनी की नि:स्वार्थ सेवा को देखते हुए सजीश को स्वास्थ्य क्षेत्र में नौकरी दी है।
600 रुपये की मासिक पेंशन पाने वाली कन्नूर जिले के थलसेसरी की साठ वर्षीय रोहिणी ने राहत कोष में 1000 रुपये का योगदान किया है। रोहणी का आय का कोई अन्य स्रोत नहीं है। राहत कोष में योगदान देने वालों में सोशल मीडिया ग्रुप्र, विद्यार्थी, अभिनेता और एनजीओ भी शामिल हैं।

वरिष्ठ साहित्यकार चारुचन्द्र चंदोला का निधन

देहरादून : वरिष्ठ साहित्यकार, पत्रकार व कवि चारुचन्द्र चंदोला का निधन हो गया था। उन्हें मस्तिष्काघात के कारण दून अस्पताल के आईसीयू में एक हफ्ते पहले भर्ती कराया गया था, जहां उपचार के दौरान कल देर रात उनका निधन हो गया। चंदोला जी अपने पीछे पत्नी राजेश्वरी, बड़ी बेटी शेफाली, छोटी बेटी साहित्या को शोकाकुल छोड़ गए। अपनी पत्रकारिता व कविताओं के माध्यम से व्यवस्था की कमियों पर हमला करने वाले चंदोला जी का जन्म 22 सितम्बर 1938 को म्यॉमार (बर्मा ) में हुआ। मूल रुप से पौड़ी के कपोलस्यूँ पट्टी के थापली गॉव के थे और पिछले लगभग 5 दशकों से देहरादून के पटेल मार्ग में अपने पैत्रिक आवास गढ़वालायन में रह रहे थे।
चारु चंद्र ने अपनी पत्रकारिता का सफर “टाइम्स ऑफ इंडिया ” मुम्बई से प्रशिक्षु के रूप में शुरु किया। उसके बाद मुम्बई के फ्री प्रेस जर्नल , पूना हेरल्ड , पायनियर, स्वतंत्र भारत, नेशनल हेरल्ड, अमर उजाला ( मेरठ ) , युगवाणी आदि विभिन्न पत्र पत्रिकाओं से जुड़े। वे पिछले 5 दशकों से ” युगवाणी ” अखबार व पत्रिका के समन्वय सम्पादक थे।
उनकी हिन्दी में लिखी गई कविताओं का पहला प्रकाशन हिन्दी पत्रिका धर्मयुग में हुआ। उनकी कविताएं साप्ताहिक हिन्दुस्तान, जनसत्ता में भी प्रकाशित हुई। कुछ समय पौड़ी से हिमवन्त साप्ताहिक का सम्पादन, प्रकाशन किया। एक स्तम्भकार के रूप में मन्जुल, मयंक, मनभावन, यात्री मित्र, कालारक्त, अग्निबाण, त्रिच और सर्गदिदा उपनामों से तीखे राजनैतिक व सामाजिक व्यंग्य भी लिखे। युगवाणी में सर्गदिदा उनका स्तम्भ बहुत ही चर्चित रहा था। हेमवती नन्दन बहुगुणा विश्वविद्यालय , श्रीनगर ( गढ़वाल ) के बीए के पाठ्यक्रम में उनकी कविताएं शामिल हैं। उनकी प्रकाशित कविता की पुस्तकों में कुछ नहीं होगा, अच्छी सांस , पौ, पहाड़ में कविता, उगने दो दूब हैं। उन्हें पत्रकारिता व कविता में उल्लेखनीय योगदान के लिए उमेश डोभाल स्मृति सम्मान व आदि शंकाराचार्य पत्रकारिता सम्मान भी मिले। पत्रकारिता सम्मान से उन्हें द्वारिका पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरुपानन्द सरस्वती जी ने सम्मानित किया था। चंदोला जी की कविताएं जनसरोकारों से जुड़ी होती थी। जिनमें वे सीधे व्यवस्था पर चोट करते। युगवाणी के माध्यम से गढ़वाल में अनेक नवोदित पत्रकारों व कवि को संवारने और दिशा देने का काम किया। आधुनिक नई कविताओं को प्रारम्भिक दौर में उन्होंने युगवाणी के माध्यम से ही पाठकों के सामने रखा, उनकी आलोचना भी हुई। उन पर परम्परागत कविता लेखन के स्वरुप को बिगाड़ने के आरोप लगे। पर वे आलोचनाओं से विचलित नहीं हुए। हिन्दी की आधुनिक कविताओं के अनेक कवियों को तराशने का काम उन्होंने किया।