Saturday, April 11, 2026
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कुछ भी करो कर्तव्य पथ से किंतु भागूंगा नहीं, वरदान मांगूंगा नहीं

शिवमंगल सिंह सुमन स्मरण -यह आलेख गत 5 अगस्त को लिखा गया था। हमारा प्रयास रहता है कि हमारे हर प्रयास में एक प्रेरणा रहे। यह उसी दृष्टि से किया गया प्रयास है। 

प्रो. जयराम शुक्ल

आज राष्ट्रकवि डा.शिवमंगल सिंह सुमन की जयंती है। सुमनजी, दिनकरजी की तरह ऐसे यशस्वी कवि थे जिनकी हुंकार से राष्ट्र अभिमान की धारा फूटती थी। संसद में अटलजी ने स्वयं की कविता से ज्यादा सुमनजी की कविताएँ उद्धृत की। हाल यह  कि सुमनजी की कई कविताएँ अब अटल बिहारी वाजपेयी के नाम से प्रचलित हैं। अटलजी सुमनजी को अपना साहित्यिक गुरू मानते हैं। वे सुमनजी ही थे जो अटलजी को कवि सम्मेलनों तक खींच ले गए। इसीलिए सुमनजी व अटलजी की रचनाधर्मिता में अद्भुत साम्य मिलता है।

सुमनजी दिनकर की भाँति राष्ट्रीय गौरव के उद्घोष थे। वैसे सुमनजी का जन्म 5 अगस्त 1915 को  झगरपुर उन्नाव में हुआ था पर वे खुद को रिमाड़ी मानने व कहे जाने पर गौरवान्वित महसूस करते थे। अमरपाटन सतना का प्रतापगढी से उनका ताल्लुकात रहा है। उनका परिवार रीवा राजघराने से सीधे जुडा़ है।

सन् 1990 में मध्यप्रदेश साहित्य सम्मेलन ने उन्हें भवभूति अलंकरण से अलंकृत करने का निर्णय लिया। मेरे आग्रह पर बाबू जी(श्री मायाराम सुरजन जो उस समय सम्मेलन के अध्यक्ष थे) ने यह आयोजन रीवा में रखा। मेरा सौभाग्य है कि मैं इस कार्यक्रम का संयोजक था।

मानस भवन में आयोजित वह समारोह आज भी जिसको याद होगा..वह निश्चित ही रोमांचित हो जाएगा उन क्षणों का स्मरण करके। सुमनजी उस कार्यक्रम में एक घंंटे से ज्यादा बोले, और भावविभोर होकर बोले। अपने बचपन,परिजन भाइयों को मंच से याद किया। विंध्य और रीवा की महत्ता बताई। कुछ कविताएं भी पढ़ी।

शुरुआत अपनी परिचयात्मक पंक्तियाँ से की..

मैं शिप्रा सा सरल तरल बहता हूँ

मैं कालिदास की शेषकथा कहता हूँ

ये मौत हमारा क्या कर सकती है

मै महाकाल की नगरी में रहता हूँ।

ये पंक्तियां सुमनजी के परिचय की ताउम्र सिग्नेचर ट्यून बनी रही।

अवंतिका वासी सौभाग्यशाली हैं कि उन्हें सुमनजी का सानिद्ध मिला और उन लोगों ने भी दैवतुल्य मान सम्मान दिया। मुझे याद है कि आयोजन की पूर्व संध्या सुमनजी का साक्षात्कार लेने मेजर साहब(कुंवर अर्जुन सिंह जी की ससुराल जहाँ वे रुके थे) के घर गया। मेजर शिवप्रसाद सिंह उनके चचेरे भाई थे। शाम का वक्त था वे अपने सभी भाइयों के साथ जमे रमे थे। लौटने लगा तो जबरिया बैठा लिया यह कहते हुए कि देखो हम भाई मिलते हैं तो कैसे धमाल मचता है। उस शाही महफिल में मेजर साहब तो थे ही शिवमोहन सिंह जी व शिवचरण सिंह कक्काजी भी थे।

दूसरे दिन इस महफिल का उन्होंने मंच से अपने भाषण में भी उल्लेख किया..और अपने व भाइयों के नाम महिमा बताने लगे कि देखो हम सभी भाई शिव के गण हैं।

बहरहाल सुमनजी ने तबीयत से साक्षात्कार दिया वह देशबंन्धु के पहले पन्ने पर छपा। फिर सम्मेलन की पत्रिका .विवरणिका..ने भी विशेषांक के रूप में छापा। वह मेरे श्रेष्ठ साक्षात्कारों में से एक है।

सुमनजी ने कविता की शर्त बताई.. जो जन की जुबान में बस जाए वही कविता है। मैने भले ही जितना लिखा पर जो भी जन की जुबान पर है मैं मानता हूँ कि उतना ही सार्थक लिखा। मैंने साक्षात्कार की जो भूमिका लिखी थी समारोह में प्रायः सभी ने उसका उल्लेख किया। ..लिखने, दिखने और बोलने का त्रिवेणी संगम देखना है तो सुमनजी में देखिए।

सुमनजी लिखते तो अद्भुत थे ही, उससे अच्छा प्रस्तुत करते थे..उनकी भाषण कला बेहतर थी या लेखन कला तय कर पाना मुश्किल। दिखने में तो शुभ्रवस्त्रावृता थे ही साक्षात् वाणी पुत्र लगते थे। उनकी स्मृति को नमन…

यहां वो कविता प्रस्तुत कर रहे हैं जिसे अटलजी  ने तेरह दिन की सरकार के पतन के दिन संसद में पढी थी..आज भी इस कविता को प्रायः लोग अटल जी की ही मानकर चलते हैंं।

संघर्ष पथपर जो मिले

यह हार एक विराम है

जीवन महासंग्राम है

तिल-तिल मिटूँगा पर दया की भीख मैं लूँगा नहीं।

वरदान माँगूँगा नहीं।।

स्‍मृति सुखद प्रहरों के लिए

अपने खंडहरों के लिए

यह जान लो मैं विश्‍व की संपत्ति चाहूँगा नहीं।

वरदान माँगूँगा नहीं।।

क्‍या हार में क्‍या जीत में

किंचित नहीं भयभीत मैं

संधर्ष पथ पर जो मिले यह भी सही वह भी सही।

वरदान माँगूँगा नहीं।।

लघुता न अब मेरी छुओ

तुम हो महान बने रहो

अपने हृदय की वेदना मैं व्‍यर्थ त्‍यागूँगा नहीं।

वरदान माँगूँगा नहीं।।

चाहे हृदय को ताप दो

चाहे मुझे अभिशाप दो

कुछ भी करो कर्तव्‍य पथ से किंतु भागूँगा नहीं।

वरदान माँगूँगा नहीं।।

(साभार)

अमेरिका ने भारत से कहा, ‘ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे’

नयी दिल्ली :   अमेरिका ने फ्रेंडशिप डे पर खास अंदाज में भारत से दोस्ती का इजहार किया है। भारत में स्थित अमेरिकी दूतावास ने ‘शोले’ फिल्म के गाने ‘ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे’ की मिसाल देते हुए फ्रेंडशिप डे पर भारत को मुबारकबाद दी है।

इसके साथ ही अमेरिकी दूतावास ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हाथ मिलाते हुए फोटो भी ट्वीट की है। इसमें दोनों नेता हंसते हुए दिखाई दे रहे हैं। हाल में भारत और अमेरिका के बीच संबंधों में काफी प्रगति हुई है।

एक दिन पहले ही अमेरिका ने भारत को ‘रणनीतिक व्यापार अधिकार-पत्र-1’ (एसटीए-1) का दर्जा दिया है। अभी तक यह दर्जा एशिया में सिर्फ जापान और दक्षिण कोरिया के पास ही था।  गौरतलब है कि दोस्ती के मामले में भारतीय सिनेमा की यादगार फिल्म शोले के जय-वीरू की मिसाल अक्सर दी जाती है।

1 मिनट 45 सेकेंड का वीडियो

अमेरिकी दूतावास द्वारा फ्रेंडशिप डे पर किए गए ट्वीट में दूतावास के कर्मचारी ‘ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे’ गाने पर डांस करते दिख रहे हैं। 1 मिनट 45 सेकेंड के इस वीडियो को अब तक 1500 से ज्यादा लोग देख चुके हैं। वीडियो के साथ लिखा गया है कि भारत अमेरिका की दोस्ती साल 2018 में मजबूत होती गई है। हम आप सभी को फ्रेंडशिप डे की मुबारकबाद देते हैं।

रक्षा व्यापार में भी बढ़ोतरी

भारत और अमेरिका के बीच लगातार रक्षा व्यापार बढ़ रहा है। एशिया में चीन की बढ़ती चुनौती को देखते हुए अमेरिका भारत की अहमियत को बहुत अच्छी तरह समझता है।

वहीं भारत भविष्य की रणनीतियों को देखते हुए विदेश नीति में अमेरिका को अहम स्थान दे रहा है। गौरतलब है कि अमेरिका भारत को अहम रणनीतिक साझेदार का दर्जा पहले ही दे चुका है।

यारी…तेरी यारी

दोस्ती की कसमें खाना एक बात है और उसे निभाना दूसरी बात है। दोस्ती हो या कोई भी रिश्ता, वह एक दिन की कहानी नहीं है। एक पल से शुरू हुई बात अफसाना बन सकती है और यह हमारे हाथ में है। दोस्त तो हर जगह हो सकते हैं मगर उनको सहेजना भी एक कला है। आप भी यह कला जान सकते हैं, बस इन बातों का ध्यान जरूर रखें –
दोस्त बनिए बॉस नहीं। ठीक है कि दोस्तों पर हक जताया जा सकता है मगर हक जताने और हुकूम चलाने में फर्क है। इस फर्क को समझना और दोस्तों की सुनकर उनको समझना भी जरूरी है।
दोस्तों के बीच हंसी-मजाक होते रहते हैं, लेकिन बात-बात पर अपने दोस्तों का मजाक बनाने से बचें। दोस्तों का काम एक-दूसरे को सपोर्ट करना होता है न की एक-दूसरे को नीचा दिखाना नहीं होता।
आज के दौर में वक्त देना मुश्किल है। ऐसे में आप सबको समय चुराना पड़ेगा। थोड़ी सी कोशिश से यह मुमकिन है। दोस्त ताजी हवा का झोंका हैं तो उनके साथ तो एक शाम बनती ही है। अगर मुमकिन हो तो सप्ताहांत में या छुट्टियों में घूम आया कीजिए। कोशिश कीजिए कि उसकी जरूरत के वक्त वह अकेला न रहे, आप उसके साथ रहें।
गलती किसी से भी हो सकती है और अपनी गलती को मान लेने में ही समझदारी होती है। अगर आपकी किसी गलती की वजह से आपका दोस्त आप से नाराज हो जाए तो उसे सॉरी कहिए और मना लीजिए। कभी – कभी एहसास दिलाना पड़ता है दोस्तों को कि वह हमारे लिए कितने खास हैं।
कुछ लोग ऐसे होते हैं जो सिर्फ मतलब पड़ने पर या काम पड़ने पर ही अपने दोस्तों को याद करते हैं। अगर आप भी ऐसा करते हैं तो एक बार अपने बर्ताव पर ध्यान दें। अगर आपको दोस्त ऐसे मिले हैं तो एक दूरी बनाकर रखें मगर दोस्ती तोड़ें नहीं।

(तस्वीर – साभार)

रेमन मैगसायसाय पुरस्कार विजेताओं में दो भारतीयों का नाम शामिल

मनीला : दो भारतीय नागरिकों भरत वटवाणी और सोनम वांगचुक का नाम इस वर्ष के रेमन मैगसायसाय पुरस्कार के विजेताओं में शामिल है। इस पुरस्कार को एशिया का नोबेल पुरस्कार माना जाता है। इन दोनों भारतीयों का नाम उन छह लोगों में शामिल है जिन्हें आज विजेता घोषित किया गया। रेमन मैगसायसाय अवार्ड फाउंडेशन ने कहा कि वटवाणी की यह पहचान भारत के मानसिक रूप से पीड़ित निराश्रितों को सहयोग एवं उपचार मुहैया कराने में उनके साहस और करुणा तथा समाज द्वारा नजरंदाज किये गए व्यक्तियों की गरिमा को बहाल करने के कार्य के प्रति उनके दृढ़ और उदार समर्पण के लिए की गई है। ’वांगचुक (51) को यह पहचान उत्तर भारत के दूरदराज के क्षेत्रों में ‘‘ शिक्षा की विशिष्ट व्यवस्थित , सहयोगी और समुदाय संचालित सुधार प्रणाली के लिए की गई है जिससे लद्दाखी युवाओं के जीवन के अवसरों में सुधार हुआ। इसके साथ ही यह आर्थिक प्रगति के लिए विज्ञान एवं संस्कृति का उपयोग करने के लिए रचनात्मक रूप से स्थानीय समाज के सभी क्षेत्रों को सकारात्मक रूप से लगाने को लेकर उनके कार्य के लिए किया गया है। उनके इस कार्य से विश्व में अल्पसंख्यक लोगों के लिए एक उदाहरण बना। ’इसके साथ ही इस पुरस्कार के अन्य विजेताओं में युक चांग (कंबोडिया), मारिया डी लोर्ड्स मार्टिंस क्रूज (पूर्वी तिमोर), होवर्ड डी (फिलिपिंस) और वी टी होआंग येन रोम (वियतनाम) शामिल हैं। रेमन मैगसायसाय अवार्ड फाउंडेशन अध्यक्ष कारमेनसिता एबेला ने कहा कि विजेता स्पष्ट रूप से एशिया की उम्मीद के नायक हैं जिन्होंने अपने प्रयासों से समाज को आगे बढ़ाया। रेमन मैगसायसाय पुरस्कार एशिया का सबसे बड़ा पुरस्कार है। इसकी स्थापना 1957 में फिलिपिन के तीसरे राष्ट्रपति की स्मृति में की गई थी और इस पुरस्कार का नाम उनके नाम पर रखा गया है। यह पुरस्कार औपचारिक रूप से 31 अगस्त 2018 को फिलिपिन के सांस्कृतिक केंद्र में आयोजित एक कार्यक्रम में प्रदान किया जाएगा।

गोवा सरकार बनाएगी 60,000 जैव शौचालय: पर्रिकर

पणजी : गोवा सरकार राज्य को खुले में शौच से मुक्त बनाने के लिए 280 करोड़ रुपए की लागत से 60,000 जैव शौचालय बनवाएगी। मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर ने  हाल ही में  प्रश्नकाल के दौरान कांग्रेस विधायक विल्फ्रेड़ डिसूजा के प्रश्न के उत्तर में यह जानकारी दी।
मुख्यमंत्री ने कहा , ‘‘ हम स्वच्छ भारत अभियान के तहत राज्य को खुले में शौच से मुक्त बनाने के लिए 60,000 जैव शौचालय बनवाएंगे।राज्य संचालित गोवा अपशिष्ट प्रबंधन निगम इस योजना के तहत 12 अगस्त तक जैव शौचालय की खरीद के लिए निविदांए जारी करेगा। ’पंचायत निदेशालय तथा ग्रमीण विकास एजेंसी (आरडीए) इस योजना को लागू करने में निगम का सहयोग करेगी।
उन्होंने कहा , ‘‘ निगम निविदाएं जारी करेगा लेकिन एक ही कॉन्ट्रैक्टर के लिए दो तीन माह में 60,000 शौचालय तैयार कर पाना मुश्किल है इस लिए हमने सात से आठ कॉन्ट्रैक्टर को लेने का निर्णय किया है। ’उन्होंने बताया कि पूरी परियोजना की लागत 280 करोड़ रुपए है और प्रत्येक शौचालय पर 35,000 से 40,000 रुपए के बीच खर्च आएगा , जो उसकी गुणवत्ता पर निर्भर करेगा। उन्होंने कहा , ‘‘ जहां हमें जमीन मिलने में मुश्किलें आएंगी हम सामुदायिक शौचालय बनवाएंगे। ’’

बीमा कंपनियों के पास बिना दावे के पड़े हैं 15,167 करोड़ रुपये

नयी दिल्ली : देश की 23 बीमा कंपनियों के पास बीमाधारकों का 15,167 करोड़ रुपये बिना दावे का पड़ा है। इस पैसे का कोई लेनदार नहीं है। भारतीय बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण (इरडा) ने बीमा कंपनियों से इस तरह के बीमाधारकों की पहचान करने और उन्हें उनका पैसा देने के निर्देश दिए हैं।
हर बीमा कंपनी में पॉलिसीधारक की सुरक्षा के लिए बनायी गई निदेशक स्तरीय समिति को जिम्मेदारी दी गई है कि वह बीमाधारकों के सभी बकायों का समय से भुगतान करे। बिना दावे वाली कुल 15,166.47 करोड़ रुपये की राशि में से भारतीय जीवन बीमा निगम के पास अकेले ही 10,509 करोड़ रुपये पड़े हैं। जबकि निजी क्षेत्र की अन्य 22 बीमा कंपनियों के पास ऐसे 4,657.45 करोड़ रुपये पड़े हैं जिनका कोई दावेदार सामने नहीं आ रहा है।
निजी बीमा कंपनियों में आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल लाइफ इंश्योरेंस के पास 807.4 करोड़ रुपये, रिलायंस निप्पॉन लाइफ इंश्योरेंस के पास 696.12 करोड़ रुपये, एसबीआई लाइफ इंश्योरेंस के पास 678.59 करोड़ रुपये और एचडीएफसी स्टैंडर्ड लाइफ इंश्योरेंस में 659.3 करोड़ रुपये पड़े हैं।
इरडा ने इन जीवन बीमा कंपनियों से कहा है कि वह सभी अपनी वेबसाइट पर एक खोज सुविधा उपलब्ध करायें जिसपर पॉलिसी धारक अथवा लाभार्थी या फिर उनके परिवार के सदस्य इस बात का पता लगा सकें कि क्या उनका कोई बकाया कंपनी के पास लंबित है। पालिसीधारक को बीमा कंपनियों की वेबसाइट पर अपना पालिसी नंबर, पैन, नाम, जन्मतिथि और आधार नंबर आदि डालना होगा। बीमा कंपनियों से यह भी कहा गया है कि वह हर छह महीने में उनके पास पड़ी बिना दावे के बीमा राशि के बारे में जानकारी को अद्यतन करें।

पंचों को बेटियों का करारा जवाब, पिता की अंतिम इच्छा पूरी कर दी मुखाग्नि

बूंदी : राजस्थान में पहले जहां पंचों ने एक पांच साल की बच्ची को घर से बेघर करने का फरमान सुनाया। अब फिर बूंदी में ही खाफ पंचायत का खौफ सामने आया है। जहां पंचों ने बेटियों को अपने पिता के अंतिम संस्कार करने से रोका। जिसके विरुद्ध जाकर बेटियां ने अपने पिता की अंतिम इच्छा को पूरी करते हुए मुखाग्नि दी।चार बेटियों ने पिता की अर्थी को कंधा दिया और रोटरी मुक्तिधाम पहुंच कर विधिविधान से पिता को मुखाग्नि दी। बड़ी बेटी मीना, कलावती, जया, ज्योति ने पंचों की एक भी नहीं चलने दी। और अब वह पूरे 12 दिनों तक हिन्दू रीति-रिवाज की सभी परम्परा निभाएंगी।
मृतक पिता का नहीं था कोई बेटा, तो चारों बेटियां आगे आई
जानकारी के अनुसार बाहरली बूंदी निवासी दुर्गाशंकर रेगर शराब व्यवसाय से जुड़े थे। जो साल 2012 में बीमारी के चलते लकवा से पीड़ित थे। पिछले पांच साल से वह जिंदगी और मौत से जंग लड़ रहे थे। अचानक शनिवार देर रात दुर्गा शंकर की तबीयत बिगड़ गई और घर पर ही मौत हो गई। दुर्गाशंकर रैगर के कोई बेटा नहीं था। उनके चार पुत्रियां ही थी। जो वह चारों बेटियों को बेटे के समान मानते थे और आखिर इच्छा उनकी यही थी की पुत्रिया उनको अंतिम विदाई दे। जैसे ही पिता दुर्गाशंकर रैगर की मौत की खबर सुनीं तो चारों बेटियों कोटा से बूंदी पहुंची और पिता की इच्छा पूरी करने की तैयारी शुरू की।


पंचों ने बेटियों को अंतिम संस्कार करने से रोका
जब इन सब की खबर पंचों को लगी तो उन्होंने ने पंचायत को बुलाया और रैगर पंचायत पंच पटेल बैठे और उन्हें अंतिम संस्कार करने से मना कर दिया। साथ ही अगर वह फैसले के खिलाफ गए तो चारों पुत्री एंव परिवार के लोगो को अंतिम संस्कार करने से पहले पंचों के पौरों में पड़कर माफी मांगनी होगी। अगर वह ऐसा नहीं करते है तो उन्हें समाज के खिलाफ मना जाएगा और जो भी अंतिम संस्कार में शामिल हुए उन्हें भी माफी मांगनी पड़ेगी।
बेटियों ने की पिता की आखिरी इच्छा पूरी
विवाद बढ़ा तो बेटियों ने जिद्द पकड़ ली की वह पिता को अंतिम विदाई देकर ही रहेगी और ऐसी परम्पराओं को खत्म करके रहेगी। आखिर में वह पिता को कंधा देते हुए घर से तीन किलोमीटर दूर पिता को रिश्तेदारों और परिवार के साथ कंधा देते हुए मुक्तिधाम लेकर पहुंची जहां पिता को पंच तत्वों में विलीन किया। इस दौरान बड़ी बेटी मीना रेगर और कलावती रैगर ने बताया की पिता की हमने आखिरी इच्छा पूरी की समाज कुछ भी कहे हमने पिता का अंतिम संस्कार किया। जीकर 4 बेटियों ने पंच पटेलों को मुँह तोड़ जवाब दिया और उनके खिलाफ खड़ी होकर पिता को मुखाग्नि दी।

भारत अपनी धार्मिक अल्पसंख्यक आबादी को ‘अभूतपूर्व’ सुविधाएं देता है : रिपोर्ट

वाशिंगटन :अमेरिका स्थित एक हिंदू अधिकार समूह की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत सरकार धार्मिक अल्पसंख्यक आबादी को ‘अभूतपूर्व’ सुविधाएं देती है। समूह के मुताबिक भारतीय क्षेत्र में स्थिरता के लिये यह एक बड़ी वजह है। हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन (एचएएफ) ने ‘भारत: विविधता में लोकतंत्र’ शीर्षक वाले अपने हालिया संक्षिप्त नीति विवरण में कहा कि क्षेत्र में व्यापक स्थायित्व लाने और कट्टरपंथी इस्लामी तथा कम्युनिस्ट/माओवादी आतंकवाद को लगाम लगाने के लिये यह कितना जरूरी है और इसे इस बात से समझा जा सकता है कि अमेरिका लगातार भारत के साथ अपने रिश्तों को मजबूत बना रहा है। अमेरिकी संसद की ऐतिहासिक इमारत में जारी किये गए इस नीतिगत दस्तावेज में भारत के सदियों पुराने बहुधर्मी और बहुजातीय दर्जे को रेखांकित करने के साथ ही राष्ट्र राज्य के उसके महत्व को भी दर्शाया गया है। इसके साथ ही दस्तावेज में यह भी कहा गया है कि भारत दुनिया के चार प्रमुख धर्मों की जन्मस्थली है और कई दूसरे धर्मों व जातियों के लिये शरणस्थली भी। रिपोर्ट में इस बात का भी विस्तार से जिक्र है कि कैसे भारत सरकार ने ‘‘अपनी धार्मिक अल्पसंख्यक आबादी को अभूतपूर्व सुविधाएं दीं’’ । वर्ष 2016-17 में इन्हें 60 करोड़ अमेरिकी डॉलर से ज्यादा की योजनाओं से लाभान्वित किया गया।

रील नहीं, रियल लाइफ नायकों की जिंदगी पर बने बायोपिक : अक्षय कुमार

मुम्बई : हिंदी फिल्मों में बायोपिक के बढ़ते चलन पर अभिनेता अक्षय कुमार ने कहा कि वह कभी नहीं चाहेंगे कि उनकी जिंदगी पर बायोपिक बने। इस तरह की फिल्में रील नायकों पर नहीं बल्कि रियल लाइफ यानी असल जिंदगी के नायकों पर बननी चाहिए। हाल में अभिनेता संजय दत्त की जिंदगी पर आधारित राजकुमार हिरानी की फिल्म ‘संजू’ ने बॉक्स आफिस पर बेहतरीन कारोबार किया. मगर लोगों ने इसमें संजय की साफ सुथरी छवि पेश किये जाने की आलोचना की। अक्षय ने एक साक्षात्कार में कहा, ‘मैं कभी नहीं चाहूंगा कि मेरे ऊपर बायोपिक बनायी जाए और मैं कभी अपनी जिंदगी पर कोई किताब नहीं लिखूंगा।’ उन्होंने कहा कि हमारे पास तपन दास (गोल्ड फिल्म का चरित्र) और अरूणाचलम मुरूगनाथम (पैडमैन का चरित्र) जैसी कई बेहतरीन स्टोरी हैं जिनकी मदद से भारत को सकारात्मक दिशा में ले जाया जा सकता है।उन्होंने कहा, ‘मैं बेवकूफ होऊंगा जो खुद पर बायोपिक बनाऊंगा। मैं इसके बारे में कभी सोचना भी नहीं चाहूंगा। मैं चाहता हूं बायोपिक वास्तविक जिंदगी के नायकों पर बननी चाहिए। रील लाइफ के हीरो पर नहीं.’ तेजी से बायोपिक की बढ़ती संख्या के बारे में अक्षय ने कहा कि यह हमारे फिल्म उद्योग का चलन है। यदि कोई एक काम करता है तो लगभग सभी उसी तरह का काम करने लगते हैं। यह केवल बायोपिक या किसी अन्य के बारे में नहीं है। यदि कुछ फिल्में असफल हो जाती हैं तो हर कोई कुछ और करना चाहेगा।

नृत्य और संगीत से अलग नहीं हो सकती मैं

वह जब थिरकती हैं तो आपकी नजर बस ठहर जाती है। सोशल मीडिया पर अक्सर वह अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करती रहती हैं मगर रुकिये, वह एक कुशल नृत्यांगना ही नहीं, एक मेधावी छात्रा भी हैं। इसके साथ ही वह शिक्षिका और पत्रकार भी रह चुकी हैं। कलकत्ता विश्वविद्यालय से हिन्दी में स्नातकोत्तर कर रही मधुरिमा के मजबूत इरादे बताते हैं कि उनकी उड़ान आसमान से कहीं आगे हैं। अपराजिता ने मधुरिमा भट्टाचार्य से उनके नये – नये सफर की कुछ बातें जानीं, आप भी जानिए –

प्र. अपने बारे में बताइए?
उ. मूल रूप से मैं त्रिपुरा की रहने वाली हूँ । ढाई साल की थी जब से नृत्य सीख रही हूँ। जी बांग्ला के प्रख्यात डांस शो ‘डांस बांग्ला डांस’ के सिलसिले में मेरा कोलकाता आना हुआ। इसके बाद स्नातकोत्तर की पढ़ाई के लिए फिर कोलकाता आई। कलकत्ता विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य की पढ़ाई की और अब परीक्षा दी है।
प्र. आप बांग्लाभाषी हैं और हिन्दी से पढ़ाई कर रही हैं। लोगों को हैरत नहीं हुई?
. बांग्लाभाषी हूँ तो लोगों को आश्चर्य हुआ हो रहा था कि मैंने हिन्दी को क्यों चुना मगर हिन्दी से पढ़ाई की क्योंकि उत्तर -पूर्वी क्षेत्रों में हिन्दी को जगह बनाते देखना चाहती हूँ जो अब तक बन नहीं सकी है। कोशिश करूँगी कि आगे चलकर हिन्दी के लिए कुछ करूँ।
प्र. डांस बांग्ला डांस में चयन कैसे हुआ?
उ. कत्थक, भरतनाट्यम और रवीन्द्र नृत्य में 18 साल की उम्र तक, तीनों नृत्य शैलियों में विशारद कर चुकी हूँ। 2014 में जब स्नातक कर रही थी और प्रथम वर्ष में थी। तभी अचानक विश्वविद्यालय जाते हुए रास्ते में डांस बांग्ला डांस के ऑडिशन के बोर्ड्स देखते हुए पहली बार किसी ऑडिशन में गयी और चयन भी हो गया।


प्र. कैसा रहा अनुभव?
उ. इस शो के जज प्रख्यात अभिनेता देव थे। उनसे शो के दौरान काफी तारीफें मिलीं। नुसरत भी उस शो में जज थीं। इसके अलावा मुम्बई, कोलकाता और दूसरी जगहों के भी विशेषज्ञ थे। सभी से खूब सराहना मिली। शो तो नहीं जीत सकी मगर काफी कुछ हासिल हुआ और आज इस जगह पर हूँ। इसके अलावा मैंने अभिनेत्री देवश्री रॉय तथा दादागिरी में सौरव गाँगुली के साथ भी स्क्रीन शेयर किया।
प्र. नृत्य के अलावा क्या पसन्द है? आगे क्या करना है?
उ. अभिनय भी करती हूँ। 2010 में अभिनय के लिए भारत सरकार का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। बहुत से लोगों का मानना है कि मैं अभिनय में हाथ क्यों नहीं आजमाती मगर अब मुझे पीएचडी और सिविल सर्विस की तैयारी करनी है।
प्र. सफलता का श्रेय किसे देना चाहेंगी?
उ. परिवार से पूरा समर्थन मिला वरना उत्तर – पूर्वी राज्य से आकर मुकाम बनाना आसान नहीं होता। इसका पूरा श्रेय परिवार को ही जाता है।
प्र. क्या आगे भी नृत्य और संगीत आपके साथ रहने वाले हैं?
उ. उम्मीद है कि ऊँचा मुकाम जरूर हासिल कर सकूँगी। नृत्य के साथ संगीत , ये दोनों मेरे जीवन का अभिन्न अंग हैं जिसे चाहकर भी मैं कभी अलग नहीं हो सकती।