Wednesday, July 8, 2026
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इन कोशिशों से आगे और आगे बढ़ रही है हिन्दी

सुषमा त्रिपाठी

हिन्दी का मतलब सिर्फ हिन्दी साहित्य ही नहीं बल्कि हिन्दी साहित्य के साथ और आगे देखना है। जीवन के हर क्षेत्र में पैठ बनाना है। यह तो मानी हुई बात है कि हिन्दी मीडिया का वर्चस्व है मगर हिन्दी को आज युवा वर्ग भी बहुत आगे ले जा रहा है। हालांकि तकनीक, विज्ञान और कम्प्यूटर के क्षेत्र में और भी काम करने की जरूरत है मगर ऐसा नहीं है कि काम नहीं हो रहा है। नये प्रयोग और नयी तकनीक के साथ नयी सोच हिन्दी को आम जनता से जोड़ रही है। इन प्रयासों का स्वागत करते हुए हम आपको ऐसी ही कुछ संस्थाओं और वेबसाइट्स व यू ट्यूब चैनलों के बारे मे बता रहे हैं जिनको आपको देखना चाहिए ताकि जब आपके सामने कोई हिन्दी के नाम पर मातम मनाए तो आप उनको खरी – खरी सुना सकें। हिन्दी दिवस काी शुभकामनाओं के साथ पेश है जानकारी –


हिन्दी कविता – अमरिका के मियामी में बस चुके एक सफल फिल्म निर्माता और व्यवसायी, मनीष गुप्ता ने जब मैथिलीशरण गुप्त, रामधारी सिंह दिनकर, महादेवी वर्मा, अमृता प्रीतम और कवियों की कविताओं के सम्बन्ध में लोगों की अरुचि देखी तो उन्होनें हिन्दी कविता उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री के बेहतरीन कलाकारों के द्वारा जाने-माने समकालीन और पुराने कवियों की कविताएँ प्रस्तुत कराने का निश्चय किया। इस का नतीजा बेहतरीन रहा! मनोज वाजपेयी द्वारा पढ़ी गयी ‘दिनकर’ की ‘रश्मिरथी‘ को 1,90,000 दर्शक मिले और लेखक–अभिनेता पीयूष मिश्रा की स्वरचित कविता ‘प्रेमिकाओं के नाम‘ को 86,000 से ज्यादा दर्शक मिले। कविता को विशेष तौर पर युवाओं केबीच में प्रयास आरम्भ कर दिया और आज कई सेलिब्रिटी हिन्दी कविता पढ़ते नजर आते हैं। हिन्दी कविता की सृजनात्मकता को बरकरार रखते हुए हिन्दी कविता ने इसे बॉलीवुड से खूबसूरती से जोड़ा। चैनल देखें तो पुष्पा भारती की आवाज में कनुप्रिया जरूर सुनें।

https://www.youtube.com/channel/UCBHtPALSbWn0WaRusU9_gFg


गाँव कनेक्शन – गाँव को समझने, गाँव की समस्याओं को समझने में इसकी बड़ी भूमिका है। ग्रामीण भारत को समझने के लिए गाँव कनेक्शन देखना बहुत फायदेमंद है। गाँव कनेक्शन की। यह 5 साल पुराना है। कुछ ख़बरों को अगर देश के सबसे बड़े पत्रकारिता पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। गांव के लोगों, किसानों के अख़बार गांव कनेक्शऩ की शुरुआत 2 दिसंबर 2012 को उत्तर प्रदेश के एक गांव में हुई थी। इन पांच वर्षों में गाँव कनेक्शन ने नए मुकाम हासिल किए, पहले साप्ताहिक, फिर दैनिक अखबार के बाद अब डिजिटल माध्यम से ग्रामीण भारत की अलग झलक को देश-दुनिया तक पहुंचा रहा है। इन पांच वर्षों में गाँव कनेक्शन को पत्रकारिता के क्षेत्र के कई उत्कृष्ट सम्मानों से सम्मानित किया गया। साथ ही गाँव कनेक्शन के काम को देश-विदेश की कई मीडिया संस्थानों ने इसके काम को सराहा।

https://www.gaonconnection.com/


लल्लन टॉप – आजतक की वेबसाइट पर समसामायिक विषयों और खोजपरक सामग्री से लेकर खबरों तक का विश्लेषणपरक आज की पीढ़ी को ध्यान में रखकर यहाँ पेश किया जाता है। कहने की जरूरत नहीं कि यह बेहद लोकप्रिय हो चुका है। आप यू ट्यूब पर इसके वीडियो देख सकते हैं। कई मुद्दों पर आपकी असहमति हो सकती है मगर निश्चित रूप से यह प्रयास हिन्दी के प्रसार को बढ़ा रहा है।

https://www.thelallantop.com/

डेवलपमेंट फाइल्स – प्रख्यात लेखक अमरेन्द्र किशोर का यह चैनल सीधे हमारे जमीनी मुद्दों की पड़ताल करता है जिसमें खेती से लेकर जंगल और आदिवासियों जैसे अनगिनत मुद्दे शामिल हैं। अमरेन्द्र किशोर इसके प्रबन्ध सम्पादक हैं। हर वीडियो गहन रिसर्च और कड़ी मेहनत को साफ दर्शाता है। ऐसे कई और चैनलों की जरूरत है। भारत की जमीनी हकीकत समझनी है तो आपको यह चैनल जरूर देखना चाहिेए।

https://www.youtube.com/channel/UC_e7qUVXna8HhCHLjdMLAtw


द बेटर इंडिया – अगर आपको भारत का स्वच्छ, सकारात्मक चेहरा देखना है तो आप इस वेबसाइट पर जरूर जायें। यह भारत के हर कोने से चुनकर सकारात्मक खबरें लाता है। यह हिन्दी और अँग्रेजी, दोनों में उपलब्ध है।

https://hindi.thebetterindia.com/

योर स्टोरी – हिन्दी रोजगार और स्टार्ट अप की भाषा है। ऐसी कई कहानियाँ और युवा उद्यमियों से लेकर दिग्गजों की कहानियाँ आपको इस वेबसाइट पर मिलती हैं और साथ ही मिलते ही सुझाव। यह वेबसाइट भी हिन्दी और अँग्रेजी, दोनों में उपलब्ध है।

https://hindi.yourstory.com


नीलांबर कोलकाता – नीलांबर की स्थापना का मूल उद्देश्य है –साहित्य और संस्कृति के साथ आम जन से सरोकार स्थापित करना। इसकी स्थापना 26 दिसंबर 1999 को ‘और अंत में प्रार्थना ’ के मंचन के साथ ही हुआ था। 1999 से 2005 तक संस्था ने कई प्रकार के साहित्यिक –सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया। नीलाम्बर द्वारा आयोजित कविता जंक्शन, एक साँझ कविता की, जैसे आयोजन काफी सफल रहे हैं। यह टीम युवाओं की टीम है और इसने कविता को तकनीक से जोड़कर उसका फलक और भी विस्तृत बनाया है। नीलाम्बर का कविता कोलाज और कई नाटकों का मंचन काफी सराहा गया है। देश भर के साहित्यकारों को साथ लाने का काम करते हुए नीलाम्बर ने लिटरेरिया की शुरुआत की जो कि इतिहास ही कहा जा सकता है क्योंकि देश के सारे साहित्यकारों को वापस कोलकाता की तरफ मोड़ने का काम नीलाम्बर ने किया है जिससे शहर लोकप्रिय हुआ है। नरेश सक्सेना, राजेश जोशी, अनामिका जैसे कई दिग्गज कवि और नयी पौध को शहर में लाने का श्रेय इसी संस्था को जाता है। बगैर किसी खास आर्थिक सहयोग के इतना बड़ा काम करना यह एक उम्मीद तो जगाता ही है। यह संस्था फेसबुक पर हिन्दी को आम आदमी तक ले जाने का काम बखूबी कर रही है। यू ट्यूब लिंक यह रहा –

https://www.youtube.com/channel/UCAMk14W3SIV7o2tZz83uLoA?app=desktop


बोल पोयट्री – बोल पोएट्री तीन दोस्त धीरज पांडेय, विहान गोयल ( ऐक्टर ) और विरेंद्र राय चलाते हैं। यह कविता को वीडियो प्रारूप में पेश करता है और सीधे युवाओं की समस्याओं पर बात करता है। लड़के खासकर अपनी आवाज इसकी कविताओं में पाते हैं। वैसे सामाजिक समस्याओं पर भी यह चैनल मुखर है। मजे की बात है कि इसकी पहली कविता ‘क्या तुम समझती हो’ पहले कई बड़े प्रडक्शन हाउसों और फ़ेस्बुक/यूटूब के बड़े चैनलों ने यह कह कर खारिज कर दी थी कि कविता में दम नहीं है। हर जगह रिजेक्ट होने के बावजूद भी तीनों निराश नहीं हुए और एक सीमित बजट में कुछ दोस्तों की मदद से वीडियो शूट किया और उसके बाद जो हुआ, वह तो इतिहास ही है।

https://www.facebook.com/poetrybol/


सुनो कहानी – फेसबुक, सीरिखा माध्यम बहुत बड़ा वर्चुअल अड्डा है…! जहां हम सब भाती भाती के अनुभव से दो चार होते है. ये माध्यम किसी भी तरह की सूचनाओं को बड़ा फलक तक ले जाना का एक महत्वपूर्ण टूल भी है. इस माध्यम ने बहुत से लोगों से जुड़ने का मौका दिया. जो इस माध्यम का खूबसूरत पहलू है…इला से नबम्बर २०१६ के आस-पास जुड़ना हुआ. फिर हम गाहे-बगाहे कहानियों पर खूब बातें करने लगे…जहां मुझे ज्ञात हुआ कि इला ने समकालीन कहानियाँ कम पढ़ी है…लेकिन समकालीन को जानने व समझने की रूचि उनमेँ लगीं.और मैंने उन्हें कुछ कहानियाँ पढ़ने के लिए भेजी. ये सिलसिला कुछ महीनों तक चलता रहा…इसे सिलसिले के आधार पर हमें समकालीन हिन्दी कहानियों को केंद्र में रखकर कुछ करने का विचार आया…एक बहुत बड़ा वर्ग हैं जो आज नेट इस्तेमाल करता है…और उस वर्ग को साहित्य से जोड़ने के लिए आज साउंड क्लाउड और यू ट्यूब सबसे उपयोगी टूल हैं! .तो हमनें सोचा कि कहानियों को रिकॉर्ड कर यू ट्यूब पर डाला जाए…इस तरह के उपक्रम की शुरुआत हम लोगों ने ‘कथा कथन’ नामक यू ट्यूब चैनल पर कुछ कहानियां डाल कर की. जो भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने का एक मंच हैं. लेकिन, कुछ समय बाद हमें लगा कि एक चैनल क्यूँ न ऐसा शुरू किया जाए जो हिंदी कहानियों पर ही फ़ोकस हो…! उसी आईडिया का नाम -“सुनो कहानी” है… जहाँ समकालीन लेखकों के साथ स्थापित लेखकों की भी कहानियां आप सुन सकेंगे… हर शुक्रवार आप एक नई कहानी से रूबरू होंगे. इस मुहीम में उन लेखकों की भी कहानियां समय-समय पर सुनाई जाएगी जो शायद कहीं छपे नहीं हो! हर उपक्रम को पूरा करने के लिए एक टीम की भी जरूरत रहती हैं. तो ‘सुनो कहानी’ की छोटी सी टीम इस प्रकार हैं-इला जोशी, अनिमेष जोशी, मयंक सक्सेना, अनुज श्रीवास्तव, आलोक कुमार।

https://www.youtube.com/channel/UCW_xd1Eyin-kqVeAbLBe2kA


वैचारिकी – चारिकी भारतीय विद्यामंदिर की ओर से प्रकाशित की जा रही शोध पत्रिका है । धर्म , दर्शन ,विज्ञान , साहित्‍य, लोकसाहित्‍य , इतिहास एवं पुरातत्‍व जैसे महत्‍वपूर्ण विषयों पर शोध परक आलेख प्रकाशित करने वाली यह द्वैमासिक पत्रिका पिछले 31 सालों से निरंतर प्रकाशित हो रही है । सिम्‍पलेक्‍स इन्‍फ्रास्‍ट्रक्‍चर्स लिमिटेड के सौजन्‍य से प्रकाशित हाने वाली इस पत्रिका के पाठक देश के लगभग सभी भागों में तो है ही विदेशों में भी है। पत्रिका की कुल 4500 प्रतिया पूरे देश में वितरित होती है । भारतीय संस्‍कृति के प्रचार प्रसार के लिए प्रतिबद्ध पत्रिका में विभिन्‍न क्षेत्रों के विद्वानों के साथ ही पाठकों के भी शोध परक आलेख प्रकाशित होते हैं। सत्‍यनारायण पारीक, डा गणपति चंद्र गुप्‍त, डा मनोहर शर्मा इसके सम्‍पादक रह चुके हैं । वर्तमान में डा बाबूलाल शर्मा वैचारिकी के सम्‍पादक हैं।यह कोलकाता से ही निकलने वाली हिन्दी की शोध पत्रिका है जो इतिहास और परम्परा के साथ साहित्य को साथ लेकर चलती हैं। इसमें आपको अतीत झाँकता नजर आयेगा। हिन्दी के साथ अगर राजस्थानी को समझना हो तो वैचारिकी जरूर पढ़ें।
विज्ञान वार्ता – विज्ञान वार्ता एक ब्लॉग है जो विज्ञान के एक सहायक शिक्षक द्वारा चलायी जा रही है। आज लगभग हर लेखक व साहित्यकार की रचनायें और हिन्दी शिक्षण भी आपको यू ट्यूब पर मिल सकती हैं।

सारी दुनिया में छायी मेहंदी है फैशन स्टेटमेंट

मेहंदी भारत ही नहीं बल्कि सारी दुनिया  मेहंदी कुछ समय के लिए ही सही, पर उनकी त्वचा की पहचान बन जाती है, अतः अब वे अपनी उँगलियों तथा पैरों में भी मेहंदी लगवाती हैं। यह प्रथा पाकिस्तान, भारत, बांग्लादेश तथा अन्य अरब के देशों में विख्यात है। आजकल शादियों एवं अन्य उत्सवों में मेहंदी का प्रयोग हाथों तथा पैरों पर भी किया जाता है। हेना का प्रयोग करने वाले ऐसे कई विशेषज्ञ हैं जो आपके पैरों और उँगलियों को खूबसूरत डिज़ाइनों से रंगने में सक्षम हैं। नीचे ऐसी ही कुछ डिज़ाइनों के प्रकार दिए जा रहे हैं।

मेहंदी लगाना एक काफी खूबसूरत प्रथा है जिसका पालन एशियाई देशों में विभिन्न उत्सवों के मौके पर किया जाता है। यह तीज, करवाचौथ, ईद, शादी के समारोहों आदि के समय लगाया जाता है। मेहंदी कई प्रकार की होती हैं और ये एक महिला के हाथों तथा पैरों में एक अलग सुंदरता ले आती है। दुनियाभर में कई महिलाएं ऐसी हैं जो मेहंदी लगाने की दीवानी हैं, और कई ऐसे विशेषज्ञ भी हैं जो उनकी इस इच्छा को पूरा करने के उद्देश्य से नयी नयी डिज़ाइनों की मेहंदी लेकर आते रहते हैं। इसके कुछ उदाहरण हैं पाकिस्तानी मेहंदी, इंडो अरेबिक मेहंदी (Indo Arabic mehndi), मुग़लई मेहंदी, गुजरात मेहंदी आदि। नीचे मेहंदी की डिजाइन के कुछ प्रकार दिए गए हैं।

मेहंदी की डिजाइन के प्रकार  – विभिन्न सांस्कृतिक परिवेशों के आधार पर मेहंदी को कई भागों में बांटा जा सकता है। पाकिस्तानी, अरबी, भारतीय तथा अफ़्रीकी। इन अलग अलग क्षेत्रों के डिज़ाइन भी काफी भिन्न होते हैं।

पाकिस्तानी मेहंदी डिज़ाइन –  मेहंदी डिजाइन फोटो में पाकिस्तानी मेहंदी के डिज़ाइन –  काफी गूढ़ अरबी और भारतीय डिज़ाइनों का मिश्रण होते हैं। इन डिज़ाइनों में काफी बारीकी होती है तथा ये दुल्हनों के द्वारा मेहँदी तथा शादी के मौके पर पहने जाते हैं। बच्चे भी ईद के मौके पर इन डिज़ाइनों का प्रयोग करते हैं।

अरबी मेहंदी डिज़ाइन/अरेबियन मेहंदी डिजाइन –  भारतीय मेहंदी की गूढ़ डिज़ाइनों की तुलना में अरेबियन मेहंदी डिजाइन बनाने में आसान होती है। इनमें ज़्यादातर फूल, पत्तियों और डालियों की चित्रकारी का प्रयोग किया जाता है। अगर आप अपने हाथों और पैरों के ज़्यादातर भाग में मेहंदी लगाना चाहती हैं तो आपके लिए ये डिज़ाइन काफी अच्छे साबित होंगे। अरबी डिज़ाइनों की एक और ख़ास बात यह होती है कि इनमें आकारों को भरा नहीं जाता और सिर्फ बाहरी रूपरेखा बनाई जाती है। ये डिज़ाइन आपके हाथों और पैरों को पूरी तरह से नहीं भरते। इन डिज़ाइनों में काफी कम मेहंदी खर्च होती है और ये आसानी से सूख भी जाते हैं, जिसका अर्थ है कि आपको ज़्यादा देर तक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती।

अफ़्रीकी मेहंदी डिज़ाइन –  मेहंदी डिजाइन फोटो में अरबी मेहंदी के डिज़ाइनों की तरह ही अफ़्रीकी मेहंदी में भी आकारों को भरा नहीं जाता। ये डिज़ाइन सामान्य ज्यामितिक (geometric) आकार के होते हैं तथा रेखाओं, चौकोर आकारों तथा बिन्दुओं से भरपूर होते हैं। इस प्रकार की मेहंदी में अरबी मेहंदी की तरह रेखाओं के बीच ज़्यादा जगह नहीं होती। ये आपके हाथों और पैरों को अच्छी तरह से भर लेते हैं।

इंडो अरेबिक मेहंदी डिज़ाइन – इसमें अरबी/अरेबिक मेहंदी अंदाज़ में बाहरी रूपरेखा बनाई जाती है जिसे अच्छे से भरा जाता है। इसमें पारम्परिक भारतीय आकार और साज सज्जा उकेरी जाती है जिसे आप अपने हिसाब से ढाल सकती हैं। यह अरेबिक मेहंदी भारतीय शादियों में प्रयुक्त होने वाली सबसे बेहतरीन डिज़ाइन है।

फूलों वाली मेहंदी की डिज़ाइन – फूल प्रकृति के सबसे खूबसूरत नज़ारों में से एक होते हैं। फूलों के डिज़ाइन मेहंदी को एक नया रंग देने के लिए आसानी से प्रयोग में लाए जा सकते हैं। फूलों की कलाकारी में अगर ग्लिटर तथा शिमर (glitters and shimmers) भी शामिल कर लिए जाएं तो ये शादियों तथा अन्य ख़ास उत्सवों में लगाए जाने के लिए काफी बेहतरीन मेहंदी साबित होगी। इन्हें अच्छे से बनाए जाने तथा पेश किये जाने पर ये काफी सुन्दर दिखते हैं। आप विभिन्न डिज़ाइनों में से कोई भी चुन सकती हैं जिसका प्रयोग कार्यक्रम के अनुसार किया जा सके।

चूड़ियों के जैसी मेहंदी की डिज़ाइन –  मेहंदी का यह प्रकार चूड़ियों के जैसा है। इसकी गोलाकार आकृति आपके हाथों एवं पैरों को काफी खूबसूरत रंग प्रदान करती हैं। इस स्टाइल (style) का प्रयोग करने पर आपको चूड़ियाँ पहनने के बारे में ज़्यादा सोचना नहीं पड़ेगा, क्योंकि ये डिज़ाइन मेहंदी में ही दी गयी है। यह एक अलग रंग से बनाया गया खूबसूरत डिज़ाइन है जिससे आप और आपके हाथ काफी सुन्दर और रंग बिरंगे दिखते हैं।

मोरक्कन मेहंदी –  मोरक्कन हेना डिज़ाइन(mehandi ke design) स्वभाव से काफी ज्यामितिक (geometric) होती है। फूलों के असमान पैटर्न (pattern) इस मेहंदी को काफी खूबसूरत बनाते हैं। यह एक ऐसी डिज़ाइन है जिसका प्रयोग ज़्यादा से ज़्यादा महिलाएं करना चाहती हैं क्योंकि यह काफी आसान और गरिमामय मेहंदी की डिज़ाइन है। यह कलाइयों की लम्बाई पर काफी सुन्दर लगता है।

राजस्थानी मेहंदी की डिज़ाइन –  इसमें काफी गूढ़ कलाकारी की जाती है तथा मोर, फूल तथा बीच बीच में कुछ घुँघरालेपन तथा कर्व्स (curves) की आकृतियां बनायी जाती हैं। इसमें बीच में ज़्यादा जगह नहीं छोड़ी जाती। इन्हें ज़्यादातर महीन रेखाओं में बनाया जाता है जिसमें हाथों को उँगलियों के सिरे से लेकर कोहनियों तक तथा पैरों को अंगूठे से घुटनों तक अच्छे से ढका जाता है।

ग्लिटर मेहंदी –  यह भारतीय और अरबी डिज़ाइन का मिश्रण है। इनके डिज़ाइन काफी उभरे हुए होते हैं तथा इनकी बाहरी रूपरेखा नाज़ुक पैटर्न और अलग अलग आकारों से भरपूर होते हैं। इन डिज़ाइन्स को और बेहतर बनाने के लिए इनपर चमक (sparkles) का प्रयोग किया गया है। यह आजकल मेहंदी की डिज़ाइन का सबसे प्रचलित आकर्षण है। इन डिज़ाइनों की रूपरेखा को विभिन्न रंगों के पत्थरों से सजाया गया है।

मुग़ल मेहंदी डिज़ाइन –यहाँ ये डिज़ाइन काफी साफ़ सुथरे और बारीकी से भरे हुए हैं। इनका एक अलग ही अंदाज़ है जहां हर कर्ल (curl) और हर बिंदु का अपना महत्त्व तथा अपनी अलग जगह है। मुगलई सबसे पुरानी और सबसे पारम्परिक डिज़ाइनों में से एक है। इनमें फूलों तथा ज्यामिति से जुड़ी हुई डिज़ाइनों का प्रयोग है जिसे हाथों पर काफी खाली जगह छोड़कर उकेरा गया है। आमतौर पर ये नीचे की दिशा में उँगलियों के सिरों से कलाइयों तक जाते हैं। इनमें फूल, पत्तियों और पंखुड़ियों के साथ महत्वपूर्ण रेखाओं और बिन्दुओं का मिश्रण किया गया है। इनमें विभिन्न प्रकार के नमूने, फूल और अन्य पैटर्न ऊपर से नीचे तक फैले हुए होते हैं। इनकी शुरुआत उँगलियों के सिरों से होती है तथा ये हाथ के आधे हिस्से तक जारी रहते हैं। इनमें बहाव के अंदाज़ में विभिन्न नमूनों का प्रयोग किया गया है। इसमें मौजूद अलग अलग रेखाएं, कर्व्स (curves) तथा बिंदु इस मेहंदी को काफी खूबसूरत रूप प्रदान करते हैं। भारत एवं अन्य एशियाई देशों की दुल्हनें इस मेहंदी को काफी पसंद करती हैं।

 

कई रंगों की मेहंदी की डिज़ाइन –  कई रंगों में बनने वाली यह मेहंदी काफी फैशनेबल (fashionable) तथा आजकल के समय में काफी प्रचलन में हैं। इन्हें एक शेडेड अंदाज़ (shaded style) में बनाया गया है। इनमें कई भिन्न भिन्न रंगों का प्रयोग है तथा कई छोटे पत्थरों की सजावट भी है, जिससे इस पैटर्न की खूबसूरती में काफी इज़ाफ़ा हो रहा है।

(आलेख – साभार हिन्दी टिप्स डॉट कॉम)

मेहंदी लायेगी गहरा रंग इस तरह

भारतीय सौन्दर्य सज्जा में मेहंदी का खास स्थान है और इसे अधिकतर राज्यों में लगाया जाता है, फिर चाहे वह करवाचौथ हो या ईद। शादी में भी मेहंदी का होना बेहद जरूरी है और आज मेहंदी बहुत अच्छा प्रोफेशन भी है जिसके लिए डिग्री की नहीं, बस कल्पना और हुनर की जरूरत है। मेहंदी सिर्फ लड़कियाँ ही नहीं पुरुष भी लगाते हैं और बड़े प्रेम से लगाते हैं। मॉल्स में आपको मेहन्दी कॉर्नर भी मिलेंगे। सच कहा जाये तो मेहन्दी अब सिर्फ सौन्दर्य ही नहीं बल्कि एक फैशन स्टेटमेंट और कॅरियर भी है। जरूरी है कि इसे देखने का नजरिया हम बदलें। आइए जानते हैं कि मेहंदी से जुड़ी कुछ खास बातें और इसे गहरा बनाने के तरीके –
मेहंदी का इतिहास
मेहंदी को समर्पित एक वेब पेज की जानकारी बताती है कि मेहंदी संस्कृत शब्द मेदिक्का से ली गई है, हल्दी और हिना पेस्ट का उपयोग हिंदू अनुष्ठान ग्रंथों और इतिहास द्वारा समर्थित है। मेहंदी या भारत में प्रयुक्त हेन्ना मेहेन्दी पौधे से ली गई है जो वैज्ञानिक रूप से लॉसनिया इन्रर्मिस के रूप में जाना जाता है और इसे लोकप्रिय रूप से हेन्ना पेड़ कहा जाता है। यह फूल पौधे अरब प्रायद्वीप, उत्तरी अफ्रीका, पूर्व और दक्षिण अफ्रीका के निकट है। कई अरब देशों में मेहेन्दी प्रथा धूमधाम से मनाई जाती है। इतिहास साबित करता है कि मेहेन्डी या हिना को 1 9वीं शताब्दी में यूरोप में इस्तेमाल किया गया था। यह अरबी संस्कृतियां भारतीय परंपरा का एक अभिन्न हिस्सा बन गई हैं। मेहंदी भारत के सभी समुदायों में एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान बन गई है और आम तौर पर डीजे रातों जैसे अन्य मजेदार भरे कार्यक्रमों का पालन किया जाता है। हिना एक पेस्ट है जो मणि पौधे के उपजी और पत्तियों से बनाई जाती है और जब हाथ पर इसे लागू किया जाता है तो यह मेहंदी बन जाती है।

मेहंदी के गुण – मेहंदी की तासीर ठंड़ी होती हैं। यह बालों में चमक के साथ-साथ दिमाग को शांत रखती है।
मेहंदी का प्रयोग केवल बालों को सुदंर बनाने के लिए ही नहीं किया जाता है, बल्कि इसका प्रयोग विभिन्न रोगों के इलाज में किया जाता है।
ख़ून के विकार, उल्टी, कब्ज, कफ-पित्त, कुष्ठ (कोढ़), बुखार, जलन, रक्तपित्त, पेशाब करने में कठिनाई होना (मूत्रकृच्छ) तथा खुजली आदि रोगों में मेहंदी काफ़ी लाभकारी है।
उच्च रक्तचाप से पीड़ित व्यक्ति के पैरों के तलवों और हथेलियों पर मेहंदी का लेप समय-समय पर करने से आराम मिलता है।
मेहंदी लगाने से शरीर की बढ़ी हुई गर्मी बाहर निकल जाती है।
रात के समय मेहंदी को साफ़ पानी में भिगो दें और सवेरे के समय छानकर पीयें। इसके पीने से ख़ून की सफाई होने के साथ-साथ शरीर के अन्दर की गर्मी भी शांत हो जाती है।
इन बातों का ध्यान रखें, मेहंदी रंग लायेगी
साफ हाथों में मेहंदी लगाएं – मेहंदी लगाने या लगवाने से पहले अपने हाथों को अच्छे से धोकर साफ कर लें। अगर मेहंदी लगाने से पहले आपने अपने हाथों में किसी तरह का लोशन या फिर ऑयल लगाया है तो साबुन से हाथों को धोने से वह निकल जाएगा।
चीनी और नींबू का मिश्रण – इस बात को हर कोई जानता है कि मेहंदी लगाने के बाद जब वह सूख जाए, तो उसमें चीनी और नींबू का मिश्रण लगाने से वह काफी गहरी हो जाती है। इस पेस्ट के चिपचिपे होने की वजह से यह मेहंदी को निकलने नहीं देता और आपकी मेहंदी ज्यादा समय तक गहरी रहेगी।
सरसों का तेल लगाएं – मेहंदी को हटाने से 30 मिनट पहले सरसों के तेल को अपने हाथों में लगा लें। सरसों का तेल हथेलियों पर लगाने से मेहंदी आसानी से निकल जाती है। इसके अलावा यह मेहंदी को डार्क भी करती है।
मेहंदी को कभी भी पानी से न धोएं – कई महिलाएं मेहंदी लगाने के बाद मेहंदी वाले हाथों को पानी से धो लेती हैं। ऐसा नहीं करना चाहिए ऐसा करने से मेहंदी साफ होने के साथ अपना रंग भी छोड़ देती है। मेहंदी छुड़ाने का सबसे आसान तरीका है कि आप या तो अपने हाथों को एक दूसरे के साथ अच्छे से रब कर लें या तो आप एक बटर नाइफ की मदद भी ले सकती हैं। इसके बाद आप अपनी मेहंदी को देखेंगे तो वह गहरे नारंगी रंग की दिखाई देगी। इसके बाद आप अपने हाथों पर पसीना न होने दें, क्योंकि जैसे जैसे समय बितेगा, मेहंदी उतनी ही गहरी हो जाएगी।
सूरज की गर्मी से दूर रहें – मेहंदी लगाते समय सूरज में बैठने से बचना चाहिए। क्योंकि यह आपकी मेहंदी को जल्दी सुखा देगा और आपकी मेहंदी को हल्का बना देगा। गहरी मेहंदी पाने के लिए हमें सूरज की रोशनी से दूरी बनाकर चलना पड़ता है।
विक्स लगाएं – मेहंदी को ऐसे समय में लगाए कि वह पूरी रात भर आपके हाथों में लगी रहे। मेहंदी को हटाने के बाद आप अपने हाथों पर विक्स या आयोडेक्स लगा लें। इन बाम के गर्म होने के कारण यह मेहंदी को गहरा रंग दे देता है।
दस्ताने पहनें – गर्मी के कारण हाथों में मेहंदी का रंग काफी गहरा होने लगता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आप किसी गर्म उपकरण के सामने जाकर बैठ जाएं। इसके लिए आपको अपने हाथों पर विक्स और आयोडेक्स लगाना चाहिए। इसके बाद दस्ताने पहन कर सो जाना चाहिए। ऐसा करने से हाथों में गर्मी होने लगती है और मेहंदी का रंग गहरा होने लगता है।
वैक्सिंग और स्क्रबिंग न करें – वैक्सिंग और स्क्रबिंग आपको मेहंदी लगाने से पहले करनी चाहिए ना कि बाद में। मेहंदी लगाने के बाद स्क्रब या वैक्स करने से हाथों से मेहंदी का रंग हल्का होने लग जाता है।
पानी से दूर रहें – अगर आप चाहती हैं कि आपकी मेहंदी काफी गहरी हो तो ऐसे में आपको पानी से दूरी बनानी चाहिए। मेहंदी वाले हाथों में पानी पड़ने से मेहंदी का रंग हल्का हो जाता है। हम जानते है कि ऐसे कई काम होते हैं जिनमें पानी की जरूरत होती हैं। ऐसे में आप अपने घरवालों और दोस्तों की मदद ले सकती हैं। इसके अलावा आप दस्ताने पहनकर भी अपने काम कर सकती हैं। लेकिन ध्यान रहे कि यह दस्ताने ज्यादा समय के लिए ना पहने, ऐसा करने से हाथों में काफी अधिक पसीना आ जाता है जिससे मेहंदी हल्की भी हो सकती है।

शिव सिखाते हैं,सच्चे प्रेम का मतलब क्‍या है

जब बात अच्छे जीवनसाथी को पाने की होती है तो व्रत का जिक्र खुद ही आ जाता है। आप कहीं भी देखिए, अच्छी पत्नी और अच्छा परिवार पाने के लिए तमाम उपदेश भरे आलेख मिल जाते हैं। अधिकतर व्रत स्त्रियाँ ही करती हैं तो ऐसे में यह सवाल तो बनता है कि क्या पार्वती को ही शिव चाहिए? क्या शिव को पार्वती की जरूरत नहीं? अगर ऐसा है तो सिर्फ पार्वती ने ही व्रत क्यों किया? नियम और जब परम्परायें जब अपनी सुविधा में ढले हों तो उनको बदलने की जरूरत कोई महसूस नहीं करता मगर अधकचरा और अपूर्ण ज्ञान कई बार जानबूझकर रखा जाता है क्योंकि इस पुरुष प्रधान व पितृसत्तात्मक समाज की सुविधा इसी में थी कि स्त्रियाँ सज -धजकर परिवार और पति के लिए व्रत रखें। मैंने सुना है कि शिव ने भी पार्वती के लिए व्रत रखा था, बहुत कुछ सम्भव है मगर आज इसका उल्लेख न के बराबर होता है। यह कहने में संकोच नहीं है कि प्राचीन भारत में स्त्रियों को समानता का अधिकार था मगर यह विवाद अपनी जगह है। तीज या शिवरात्रि के मौके होते हैं कि शिव जैसे पति की कामना का जिक्र खूब होता है। आप एक पति के रूप में उनके जैसा आदर चाहते हैं, पार्वती सा भक्ति भाव चाहते हैं मगर सवाल तो यह है कि क्या आपके अन्दर शिव बनने की सामर्थ्य है या उनका एक भी गुण हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि सामाजिक परम्पराओं के बहाने पत्नी का व्रत रखना आपके इगो को संतुष्ट करने के लिए जरूरी हो गया है? बहुत से पुरुष आज बदल रहे हैं और समानता की बातें भी करते हैं मगर बदलाव तो आपके हाथ में हैं और चयन का अधिकार भी। स्त्रियों की दुनिया रातों रात तब तक नहीं बदलेगी जब तक कि पुरुष उसका साथ न दें। परम्परायें आसान हो जाती हैं जब उनमें समानता और सहयोगिता की भावना हो और ऐसा करना आपके हाथ में है। पुरानी पीढ़ी न सही मगर आज के युवाओं से तो उम्मीद की ही जानी चाहिए कि वे आसमान के चाँद न सही सहयोग और सहकारिता का चाँद अपनी पत्नी के हाथ में रख दें। एक बार अपनी पत्नी के लिए भूखा रहकर देखिए और इन परम्पराओं में भागेदारी कीजिए। मैं पढ़ रही। द क्विन्ट पर प्रकााशित शिल्पी झा का आलेख शिव के उन महत्वपूर्ण पहलुओं पर बात करता है जिस पर बात कम की गयी है। अपराजिता का प्रयास रहता है कि नयी सोच की बातें आपके साथ साझा करे तो हम आपको यह आलेख पढ़वा रहे हैं। इसे पढ़िए और तय कीजिए कि क्या आप इन मानकों पर खरे उतरते हैं –

शिव सिखाते हैं,सच्चे प्रेम का मतलब क्‍या है

शिल्‍पी झा
शिवरात्रि दिन कुंवारी लड़कियों के लिए शिव सा पति मांगने का है, तो शादीशुदा औरतों के लिए पार्वती सा अखंड अहिबात मांगने का. समय चाहे कितना भी बदल जाए, पति या प्रेमी के तौर पर शिव की प्रासंगिकता कभी खत्म नहीं होगी। चूंकि शिव सच्चे अर्थों में आधुनिक, मेट्रोसेक्सुअल पुरुषत्व के प्रतीक हैं, इसलिए हर युग में स्त्रियों के लिए काम्य रहे हैं।
शिव जैसा सरल और सहज कोई नहीं
शिव का प्रेम सरल है, सहज है, उसमें समर्पण के साथ सम्मान भी है। शिव प्रथम पुरुष हैं, फिर भी उनके किसी स्वरूप में पुरुषोचित अहंकार यानी मेल ईगो नहीं झलकता। सती के पिता दक्ष से अपमानित होने के बाद भी उनका मेल ईगो उनके दाम्पत्य में कड़वाहट नहीं जगाता। अपने लिए न्‍योता नहीं आने पर भी सती के मायके जाने की जिद का शिव ने सहजता से सम्मान किया।
आज के समय में भी कितने ऐसे मर्द हैं, जो पत्नी के घरवालों के हाथों अपमानित होने के बाद उसका उनके पास वापस जाना सहन कर पाएंगे? शिव का पत्नी के लिए प्यार किसी तीसरे के सोचने-समझने की परवाह नहीं करता लेकिन जब पत्नी को कोई चोट पहुँचती है, तब उनके क्रोध में सृष्टि को खत्म कर देने का ताप आ जाता है।
शिवरात्रि दिन कुंवारी लड़कियों के लिए शिव सा पति मांगने का है तो शादी-शुदा औरतों के लिए पार्वती सा अखंड अहिबात मांगने का दिन है। हिन्दू मान्यताएं कहती हैं कि बेटा राम सा हो, प्रेमी कृष्ण सा, लेकिन पति शिव सा होना चाहिए। पार्वती के अहिबात सा दूसरा कोई सुख नहीं विवाहिता के लिए. क्यों? क्योंकि शिव सा पति पाने के लिए केवल पार्वती ने ही तप नहीं किया, शिव ने भी शक्ति को हासिल करने लिए खुद को उतना ही तपाया।
शक्ति के प्रति अपने प्रेम में शिव खुद को खाली कर देते हैं। कहते हैं, पार्वती का हाथ माँगने शिव, उनके पिता हिमालय के दरबार में सुनट नर्तक का रूप धरकर पहुंच गए थे. हाथों में डमरू लिए, अपने नृत्य से हिमालय को प्रसन्न कर जब शिव को कुछ माँगने को कहा गया, तब उन्होंने पार्वती का हाथ उनसे माँगा।
शिव न अपने प्रेम का हर्ष छिपाना जानते हैं, न अपने विरह का शोक। उनका प्रेम निर्बाध और नि:संकोच है, वह मर्यादा और अमर्यादा की सामयिक और सामाजिक परिभाषा की कोई परवाह नहीं करता। अपने ही विवाह भोज में जब शिव को खाना परोसा गया, तो श्वसुर हिमालय का सारा भंडार खाली करवा देने के बाद भी उनका पेट नहीं भरा. आखिरकार उनकी क्षुधा शांत करने पार्वती को ही संकोच त्याग उन्हें अपने हाथों से खिलाने बाहर आना पड़ता है। फिर पार्वती के हाथों से तीन कौर खाने के बाद ही शिव को संतुष्टि मिल गयी।
यूं व्यावहारिकता के मानकों पर देखा जाए, तो शिव के पास ऐसा कुछ भी नहीं, जिसे देख-सुनकर ब्याह पक्का कराने वाले मां-बाप अपने बेटी के लिए ढूंढते हैं। औघड़, फक्कड़, शिव, कैलाश पर पत्नी की इच्छा पूरी करने के लिए एक घर तक नहीं बनवा पाए, तप के लिए परिवार छोड़ वर्षों दूर रहने वाले शिव। साथ के जो सेवक वो भी मित्रवत, जिनके भरण की सारी जिम्मेदारी माता पार्वती पर पार्वती के पास अपनी भाभी, लक्ष्मी की तरह एश्वर्य और समृद्धि का भी कोई अंश नहीं।

फिर भी शिव के संसर्ग में पार्वती के पास कुछ ऐसा है, जिसे हासिल कर पाना आधुनिक समाज की औरतों के लिए आज भी बड़ी चुनौती है। पार्वती के पास अपने फैसले स्वयं लेने की आजादी है. वो अधिकार, जिसके सामने दुनिया की तमाम दौलत फीकी पड़ जाए।
पार्वती के हर निर्णय में शिव उनके साथ है। पुत्र के रूप में गणेश के सृजन का फैसला पार्वती के अकेले का था, वो भी तब, जब शिव तपस्या में लीन थे लेकिन घर लौटने पर गणेश को स्वीकार कर पाना शिव के लिए उतना ही सहज रहा, बिना कोई प्रश्न किए, बिना किसी संदेह के। पार्वती का हर निश्चय शिव को मान्य है।
शिव अपनी पत्नी के संरक्षक नहीं, पूरक हैं। वह अपना स्वरूप पत्नी की तत्कालिक जरूरतों के हिसाब से निर्धारित करते हैं। पार्वती के मातृत्व रूप को शिव के पौरुष का संरक्षण है, तो रौद्र रूप धर विनाश के पथ पर चली काली के चरणों तले लेट जाने में भी शिव को कोई संकोच नहीं।
शिव के पौरुष में अहंकार की ज्वाला नहीं, क्षमा की शीतलता है। किसी पर विजय पाने के लिए शिव ने कभी अपने पौरुष को हथियार नहीं बनाया, कभी किसी के स्त्रीत्व का फायदा उठाकर उसका शोषण नहीं किया। शिव ने छल से कोई जीत हासिल नहीं की. शिव का जो भी निर्णय है, प्रत्यक्ष है।

वहीं दूसरी ओर शक्ति अपने आप में संपूर्ण है, अपने साथ पूरे संसार की सुरक्षा कर सकने में सक्षम। उन्हें पति का साथ अपने सम्मान और रक्षा के लिए नहीं चाहिए, प्रेम और साहचर्य के लिए चाहिए. इसलिए शिव और शक्ति का साथ बराबरी का है। पार्वती, शिव की अनुगामिनी नहीं, अर्धांगिनी हैं।
कथाओं की मानें, तो चौसर खेलने की शुरुआत शिव और पार्वती ने ही की। इससे इस बात की पुष्टि होती है कि गृहस्थ जीवन में केवल कर्तव्य ही नहीं होते, स्वस्थ रिश्ते के लिए साथ बैठकर मनोरंजन और आराम के पल बिताना भी उतना ही जरूरी है। शिव और पार्वती का साथ सुखद गृहस्थ जीवन का अप्रतिम उदाहरण है।
अलग-अलग लोक कथाओं में शिव और शक्ति कई बार एक-दूसरे से दूर हुए, लेकिन हर बार उन्‍होंने एक-दूसरे को ढूंढकर अपनी संपूर्णता को पा लिया. इसलिए शिव और पार्वती का प्रेम हमेशा सामयिक रहेगा, स्थापित मान्यताओं को चुनौती देता हुआ, क्योंकि शिव होने के मतलब प्रेम में बंधकर भी निर्मोही हो जाना है, शिव होने के मतलब प्रेम में आधा बंटकर भी संपूर्ण हो जाना है।

ये हैं भारत के प्रसिद्ध गणेश मंदिर

गणेश चतुर्थी का त्योहार भारत में बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है इस बार गणेश उत्सव 13 सितंबर को पड़ रहा है। भारत में कई गणेश मंदिर है लेकिन कुछ मंदिर ऐसे हैं जिनकी काफी मान्यता है और हमेशा यहां भक्तों का तांता लगा रहता है। गणेश चतुर्थी के दिन इन मंदिरों की भव्यता और माहौल अलग ही होता है। अगर आप इस बार गणेशोत्सव को कुछ अलग तरीके से मनाना चाहते हैं तो देश के इन प्रसिद्ध गणेश मंदिरों में जरूर जाएं –
श्री सिद्धिविनायक मंदिर, मुम्बई

तस्वीर -साभार

यह मंदिर न केवल मुंबई बल्कि पूरे भारत में प्रसिद्ध है। यहां गणेश चतुर्थी के दिन त्योहार जैसा माहौल होता है। गणेश चतुर्थी से कुछ दिन पहले ही मंदिर सजने लगता है। महानगर मुंबई में होने के कारण इस मंदिर में बड़े-बड़े सेलिब्रिटी भी आते हैं। इस मंदिर का निर्माण 1801 में लक्ष्मण विथू और देऊभाई पाटिल ने करवाया था।

मोती डूँगरी गणेश मंदिर, जयपुर


यह जयपुर का सबसे प्रसिद्ध गणेश मंदिर है जो शहर में मोती डूंगरी पहाड़ी के ऊपर स्थित है। इसका निर्माण 1761 में किया गया था। जबकि इसमें स्थित मूर्ति करीब 500 साल पुरानी बताई जाती है। इस मंदिर के प्रागण में शिवलिंग भी है जो केवल महाशिवरात्रि के दिन ही श्रद्धालुओं के लिए खुलता है। इस मंदिर का निर्माण नागरा शैली में किया गया है।
कनिपकम विनायक मंदिर, चित्तूर


यह एक प्राचीन मंदिर है जिसका निर्माण 11वीं सदी में चोल राजा कुलोथुंगा चोला ने करवाया था। यहां रखी भगवान गणेश की मूर्ति सफेद, पीली और लाल रंग की है। इस मंदिर का ऐतिहासिक महत्व है। ऐसा माना जाता है कि मंदिर के पवित्र जल में स्नान करने से सभी पाप और परेशानियों से छुटकारा मिल जाता है।
दगडूशेठ हलवाई गणपति मंदिर, पुणे


इस मंदिर में भगवान गणेश की 7.5 फीट ऊंची और 4 फीट चौड़ी मूर्ति लगी है जिसपर करीब 8 किलो सोना लगा है। यह मंदिर का निर्माण 1800 वीं सदी में दगडूशेठ नाम के हलवाई ने करवाया था। 1893 में इसका निर्माण खत्म हुआ था। यहां गणेश चतुर्थी काफी धूमधाम से मनाई जाती है।

अन्तरराष्ट्रीय बाल फिल्म महोत्सव कर ‘बाल आयोजकों’ ने भरी उड़ान

मालदा : बच्चों की बात कहना ही नहीं बल्कि सुनना भी उतना ही जरूरी है। इससे भी ज्यादा जरूरी है कि उनमें नेतृत्व का गुण विकसित किया जाये जिससे वे खुद बड़ी जिम्मेदारी निभा सकें। आपने बच्चों के लिए फिल्म महोत्सव सुना होगा मगर एक बाल फिल्म महोत्सव ऐसा है जो सिर्फ बच्चों के लिए है और बच्चों द्वारा ही आयोजित किया जाता है। आयोजन की सफलता निरन्तरता में है और दूसरी बार यूनिसेफ तथा मालदा जिला प्रशासन के सहयोग से यह अन्तरराष्ट्रीय बाल फिल्म महोत्सव आयोजित कर किशोरों ने अपने हौसले का परिचय दे दिया है। मालदा के एडीएम पद्म सुनाम ने इस अन्तरराष्ट्रीय बाल फिल्म महोत्सव का उद्घाटन करते हुए किशोरों के हौसलों की जमकर तारीफ की। ये बाल आयोजक तलाश सोसायटी के नेतृत्व में काम कर रहे बच्चों और किशोरों की 30 सदस्यों वाली कमेटी के सदस्य थे। इस फिल्म महोत्सव की शुरुआत लोकप्रिय बाल फिल्म ‘रेन्बो जेली’ से हुई। इस फिल्म के निर्देशक सौकर्य बसु तथा बाल कलाकार महाब्रत बसु इस अवसर पर उपस्थित थे। फिल्म महोत्सव के अन्तर्गत ‘अरण्यदेब’ फिल्म का भी प्रदर्शन किया गया। ‘अरण्यदेब’ के निर्देशक देवाशीष सेन शर्मा भी इस मौके पर मौजूद थे। यूनिसेफ की चाइल्ड ऑफिसर स्वप्नदीपा विश्‍वास ने बताया कि यह बाल फिल्म महोत्सव का दूसरा संस्करण है जिसमें संचालक, प्रदर्शन करने वाले कलाकार, इवेन्ट मैनेजर, डिजाइनर्स, वॉलेन्टियर्स और मीडिया प्रवक्ता की भूमिका में भी बच्चे और किशोर ही थे। इस साल यूनिसेफ की थीम ‘वैल्यू ऑफ गर्ल्स’ यानि ‘लड़कियों का सम्मान’ है। इस बाल फिल्म महोत्सव के माध्यम से उन विषमताओं और भेदभाव को सामने लाने का प्रयास किया जा रहा है जिससे विभिन्न क्षेत्रों में लड़कियाँ जूझ रही हैं। यूनिसेफ का उद्देश्य सभी लड़कियों तक विभिन्न कार्यशालाओं, परिचर्चाओं और फिल्मों के प्रदर्शन के माध्यम से समानता के अधिकारों को प्रोत्साहित करना है।
तलाश सोसायटी की सदस्य सागरिका बांजुरिया ने बताया कि इस फिल्म महोत्सव की तैयारी जुलाई से ही की जा रही थी। यह बाल फिल्म महोत्सव ग्रामीण अँचल को उन वंचित बच्चों तक सिनेमा को पहुँचाने की कोशिश है जो इस तरह के महोत्सवों तक नहीं पहुँच पाते। उसने बताया कि इस वर्ष मालदा के अन्तरराष्ट्रीय बाल फिल्म महोत्सव को सफल बनाने में तलाश सोसायटी यूनिसेफ को मालदा जिला प्रशासन, यूनिसेफ और सिने सेन्ट्रल का महत्वपूर्ण सहयोग मिला। इस बाल फिल्म महोत्सव के तहत मालदा के 8 ब्लॉकों में फिल्में प्रदर्शित की गयीं। इन ब्लॉकों में कालियाचक 3, हरीशचन्द्रपुर 1, चांचल 1, रतुआ1, रतुआ 2, हबीबपुर, गाजोल और ओल्ड मालदा शामिल हैं। फिल्म महोत्सव 7 सितम्बर तक चला।

कुलपी ने हासिल की 99 फीसदी संस्थागत शिशु प्रसव दर

कुलपी : पश्‍चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के कुलपी ब्लॉक ने अत्याधुनिक सुविधाओं द्वारा 99 फीसदी संस्थागत शिशु प्रसव दर हासिल कर ली है। एक अधिकारी ने इस बात की जानकारी दी। डायमंड हार्बर स्वास्थ्य जिले के उप मुख्य चिकित्सा अधिकारी त्रिदिब दास ने कहा, ‘भारत सरकार की स्वास्थ्य प्रबन्धन रिपोर्ट के मुताबिक, हमने 2017-18 में 99 फीसदी संस्थागत प्रसव दर हासिल की है।’ इस प्रयास के बारे में विस्तार से बताते हुए कुलपी ग्रामीण अस्पताल के स्वास्थ्य, ब्लॉक चिकित्सा अधिकारी ए.एस. मोहम्मद महफूज उल करीम ने कहा, ‘हमें ग्रामीण समुदाय के लोगों और महिलाओं का विश्‍वास जीतना था, जो कि घरों में अपने बच्चों को जन्म देने में सहज महसूस करती थीं। सरकार और यूनीसेफ की मदद के साथ हमने बुनियादी सुविधाओं की कमी, प्रशिक्षिण की कमी और महिलाओं की सुरक्षा जैसी समस्याओं को हल किया व आशा कार्यकर्ताओं की मदद से जागरूकता फैलाई।’ कुलपी कोलकाता से 62 किलोमीटर दूर है। करीम के मुताबिक एक ग्रामीण अस्पताल का बेहतर माहौल लोगों का विश्‍वास जीतने में जादुई काम कर सकता है। लिहाजा, बदले हुए प्रसव कक्षों, प्रसव के बाद वाले वार्ड ने इसमें अहम भूमिका निभाई। करीम ने कहा कि हमने सुनिश्‍चित किया कि एक सरकारी अस्पताल होने के कारण यहाँ एक मरीज को फर्श पर नहीं लेटना पड़े और स्वच्छता को नजरअंदाज न किया जाए। दक्षिण 24 परगना में संस्थागत प्रसव और रूटीन बचाव के उपायों को बढ़ावा देने वाली एक पहल ‘आनंदी’ की शुरुआत 20 अगस्त 2015 को हुई थी। यूनीसेफ ने परियोजना के लिए अवधारणा, योजना, समर्थन, निगरानी, सहायक पर्यवेक्षण में तकनीकी सहायता और समग्र मार्गदर्शन मुहैया कराया था। पूरे दक्षिण 24 परगना जिले में संस्थागत प्रसव दर में 20 फीसदी से ज्यादा का सुधार देखा गया। यहां 2014-15 में यह दर 65 फीसदी थी, जो 2017-18 में 90 फीसदी से ज्यादा दर्ज की गयी। कुलपी उन ब्लॉकों में से एक है, जहां बीएमओएच, चिकित्सा अधिकारियों, स्टाफ नर्स और अन्य की सक्रिय भागीदारी से उल्लेखनीय सुधार देखा गया।

बच्चों ने उठाया पिज्जा पार्टी का आनन्द

कोलकाता : कई बार चेहरों पर मुस्कान लाने के लिए छोटी – छोटी खुशियाँ बहुत मायने रखती हैं। लायन्स क्लब ऑफ कलकत्ता, सियालदह, डिस्ट्रिक्ट 322बी वन ने ऐसी ही पहल करते हुए बच्चों को पिट्जा खिलाया। हो सकता है कि यह हम सबके लिए आम बात हो मगर जो बच्चे तमाम सुविधाओं से वंचित हैं, उनके लिए यह मौका बहुत यादगार था। प्रेमचन्द शिशु शिक्षा केन्द्र के बच्चों को इस क्लब ने पिट्जा पार्टी दी। स्कूल की शिक्षिका काकुली साधुखां ने बताया कि स्कूल में बच्चे जरूरतमन्द वर्ग से हैं और इन बच्चों के लिए इस तरह का पहला अनुभव था। किसी भी क्लब के साथ स्कूल ने पहली बार इस तरह की पहल की। सबसे अच्छी बात यह रही कि डोमेनोज पिट्जा के इस आउटलेट में बच्चों ने भी पिज्जा बनाने में हाथ बँटा दिया। खाने वाले और खिलाने वाले, दोनों ने इस मौके का लुत्फ उठाया। इस पिज्जा पार्टी में बच्चों को पिज्जा खिला रही डीपीएस, न्यू टाउन की छात्रा तन्वी गुप्ता ने कहा कि वह स्कूल के इन्ट्रैक्ट क्लब से जुड़ी है मगर यहाँ बच्चों को यह खुशी देकर बहुत अच्छा लगा। प्रेमचन्द शिशु शिक्षा केन्द्र की छात्रा नेहा राय ने कहा कि वह भी आगे चलकर ऐसी ही खुशी दूसरे बच्चों को देना चाहती है। स्कूल के संचालक नन्द किशोर जायसवाल ने स्कूल की अन्य गतिविधियों की जानकारी दी। कार्यक्रम को सफल बनाने में क्लब के अध्यक्ष अशोक जायसवाल, सचिव आशीष गुप्ता तथा कार्यक्रम की संयोजक ऋतु गुप्ता का योगदान रहा।

भारतीय भाषा परिषद और नीलांबर द्वारा साहित्यम का आयोजन

कोलकाता : शहर एक और शानदार साहित्यिक आयोजन का साक्षी बना। मौका था भारतीय भाषा परिषद और नीलांबर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम “साहित्यम्” की शानदार प्रस्तुति। नीलांबर सर्वदा ही हिंदी साहित्य में नए प्रयोग करने के लिए प्रयासरत रहता है जिसमें आधुनिक तकनीक के समावेश से आम लोगों के बीच में हिंदी साहित्य को पहुंचाने में इनकी शानदार कोशिश देखी जा रही है। इस कार्यक्रम में आमंत्रित अतिथि थे वागर्थ पत्रिका के संपादक,आलोचक एवं भारतीय भाषा परिषद के निदेशक डॉ शंभुनाथ और भारतीय भाषा परिषद की अध्यक्ष श्रीमती कुसुम खेमानी साथ ही नीलांबर समूह के अध्यक्ष,युवा साहित्यकार और कवि विमलेश त्रिपाठी। मुख्य अतिथि थे ब्रेथवेट एंड कंपनी के चेयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर और सशक्त युवा कवि यतीश कुमार। कार्यक्रम के आरंभ में डॉ कुसुम खेमानी ने नीलांबर द्वारा साहित्य के क्षेत्र में योगदान की सराहना की। डॉ शंभुनाथ ने कहा कि नीलांबर ने साहित्य के लोकप्रियकरण के लिए सार्थक प्रयास किया है।विमलेश त्रिपाठी ने नीलांबर को एक परिवार की तरह बताया जो साहित्य और संस्कृति के लिए समर्पित है।यतीश कुमार ने इस साझा आयोजन को नदी और समंदर का मेल कहा।वक्तव्य के बाद कार्यक्रम का मंचन आरंभ हुआ जिसमें हिंदी साहित्य की विविध विधाओं का संगम देखने को मिला।शुरुआत में नीलांबर द्वारा निर्मित कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता “कभी मत करो माफ” और कवि मुक्तिबोध की कविता “भूल गलती” पर मोंताज वीडियो की प्रस्तुति हुई जिनकी आवृत्तिकार हैं ममता पांडेय।दोनों कविताओं के मोंताज वीडियो की परिकल्पना और तकनीक पर ऋतेश पांडेय,मनोज झा और विशाल पांडेय ने काम किया है। कविता कोलाज “बदलते दृश्य” इस कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण रहा जिसमें नीलांबर टीम के कलाकार ऋतेश, पूनम,स्मिता,ममता, दीपक, विशाल, अभिषेक और प्रदीप ने कवि राकेश श्रीमाल,अभिज्ञात, निर्मला तोदी और अदनान कफ़ील दरवेश की कविताओं के अंश पर प्रस्तुति दी।इसके बाद लेखिका वंदना राग की कहानी “क्रिसमस कैरोल” पर फिल्म प्रदर्शित की गई।आशा पांडे की आवाज में कहानी पाठ के साथ-साथ कहानी के दृश्यों को स्क्रीन पर दिखाया गया जो अपने आप में एक नया अनुभव रहा। फिल्म में मुख्य भूमिका निभाई है-प्रख्यात रंगकर्मी और अभिनेत्री कल्पना झा,आशा पांडेय और विशाल पांडेय ने। नीलांबर टीम के अन्य कलाकारों का भी मुख्य कलाकारों के साथ अभिनय में समन्वय अद्भुत था।इस पूरे कार्यक्रम के सत्र का संचालन नीलांबर टीम की सदस्य एवं युवा शायरा रौनक अफरोज ने किया। आनंद गुप्ता ने सभी दर्शकों, श्रोताओं और अतिथियों का आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापन दिया ।

अलग-अलग युगों में श्री गणेश ने लिए 32 अवतार

अलग -अलग युगों में गणपति ने अलग – अलग अवतार लिए। जानिए इन अवतारों के नाम –

श्री ढुण्डि गणपति – चार भुजाधारी रक्तवर्णी शरीर
श्री क्षिप्र प्रसाद गणपति – छ: भुजाधारी रक्ववर्णी, त्रिनेत्र धारी
श्री ऋण मोचन गणपति – चार भुजाधारी लालवस्त्र धारी
श्री एकदंत गणपति – छ: भुजाधारी श्याम वर्ण शरीरधारी
श्री सृष्टि गणपति – चार भुजाधारी, मूषक पर सवार रक्तवर्णी शरीरधारी
श्री द्विमुख गणपति – पीले वर्ण के चार भुजाधारी और दो मुख वाले
श्री उद्दण्ड गणपति – बारह भुजाधारी रक्तवर्णी शरीर वाले, हाथ में कुमुदनी और अमृत का पात्र होता है।
श्री दुर्गा गणपति – आठ भुजाधारी रक्तवर्णी और लाल वस्त्र पहने हुए।
श्री त्रिमुख गणपति – तीन मुख वाले, छ: भुजाधारी, रक्तवर्ण शरीरधारी
श्री योग गणपति – योगमुद्रा में विराजित, नीले वस्त्र पहने, चार भुजाधारी
श्री सिंह गणपति – श्वेत वर्णी आठ भुजाधारी, सिंह के मुख और हाथी की सूंड वाले
श्री संकष्ट हरण गणपति – चार भुजाधारी, रक्तवर्णी शरीर, हीरा जडि़त मुकूट पहने।