Thursday, October 8, 2026
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गद्य वद्य कुछ – नील कमल

अपने समकालीनों पर कुछ लिखना बेहद चुनौतीपूर्ण और साहस भरा निर्णय होता है । यह दोधारी तलवार की तरह होता है । जिसमें कलाई का घुमाव सही नहीं गया तो अपनी ही गर्दन कटने का डर बराबर बना रहता है ।

नील कमल की यह किताब आज ही डाक से मिली । इस ‘आलोचना जैसी’ पुस्तक में त्रिलोचन और मुक्तिबोध से लेकर अनुज लुगुन , शायक आलोक और शुभम श्री तक शामिल हैं । कवि और कविता का चुनाव बेहद दिलचस्प है । यह एक कवि-आलोचक की बौद्धिक यात्रा का आलोचकीय वृत्तांत है ।

किताब के लगभग दस लेख अभी-अभी पढ़कर पूरा किया है । कुछ बातों से सहमति है तो कुछ से घोर असहमति । यह ठीक भी है । मैं समझता हूँ रास्ता इसी के बीच से निकलेगा । यह बेहद महत्वपूर्ण है कि जब अमूमन सभी ‘बड़े आलोचक’ घी को देसी घी , गाय का घी , ऊँट और भैंस का घी घोषित करने में अपनी सम्पूर्ण ‘मेधा’ व्यय कर रहे हैं तब भी कुछ लोग हैं जो दूध को मथकर घी निकालने के काम में जुटे हुए हैं । लेखक नील कमल को बहुत बहुत बधाई ।

विहाग वैैभव की वॉल से

सौजन्य – आनन्द गुप्ता

26 दिसम्बर से शुरू हिन्दी मेले में फोकस महात्मा गाँधी पर

कोलकाता :  सप्ताह व्यापी 24वाँ हिंदी मेला मानिकतला के राममोहन और फेडेरेशन हॉल में 26 दिसम्बर से शुरू हो रहा है। इसमें विश्‍वविद्यालयों, कालेजों और स्कूलों के नौजवान और विद्यार्थी अपनी साहित्यिक कला का प्रदर्शन करेंगे। हिन्दी मेले में इस बार नाटक, काव्य आवृत्ति, काव्य संगीत, काव्य नृत्य, चित्रांकन, लोकगीत जैसी कई प्रतियोगिताओं के अलावा युवा काव्य उत्सव और ‘गांधी और आज का भारत’ पर राष्ट्रीय संगोष्ठी भी आयोजित है। सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन द्वारा हिन्दी मेला पिछले 24 सालों से अपसंस्कृति के विरुद्ध एक मुहिम के रूप में हो रहा है। यह हिंदी की युवा प्रतिभाओं का अपना सांस्कृतिक उत्सव है।
मिशन के संयुक्त महासचिव प्रो.संजय जायसवाल ने बताया कि गांधी पर राष्ट्रीय संगोष्ठी में हिंदी आलोचक डॉ.विजय बहादुर सिंह, बनारस हिंदू विश्‍वविद्यालय के प्रो.अवधेश प्रधान, भागलपुर विश्‍वविद्यालय के किशन कालजयी, दिल्ली विश्‍वविद्यालय के डॉ.राजीव रंजन गिरि और राँची विश्‍वविद्यालय के प्रो.अरुण कुमार विशेष रूप से भाग ले रहे हैं। विजयी युवा प्रतिभाओं के लिए 100 से अधिक पुरस्कार, उपहार और स्मृति चिह्न हैं। यह घोषणा की गई कि हिन्दी मेले में युगल किशोर सुकुल पत्रकारिता सम्मान मनोज्ञा लोइवाल को और माधव शुक्ल नाट्य सम्मान कल्पना ठाकुर को प्रदान किया जाएगा। इस अवसर पर डॉ.शंभुनाथ, महेश लोढ़ा, अनिता राय, पीयूषकांत राय, राहुल शर्मा, मधु सिंह, पंकज कुमार सिंह विशेष रूप से उपस्थित थे।

युवाओं ने किया कहानी का नाटकीय पाठ

कोलकाता :  लिटिल थेस्पियन तथा भारतीय भाषा परिषद के संयुक्त आयोजन में कहानी का नाटकीय पाठ किया गया। इसमें हरिशंकर परसाई की कहानियों में- ‘भोलाराम का जीव’ कहानी का सूर्य देव रॉय, पार्वती कुमारी शॉ, विनोद यादव, राजीव कुमार शाह तथा आतिफ अंसारी ने नाटकीय पाठ किया। ‘अपनी अपनी बीमारी’ कहानी का नाटकीय पाठ पुष्पा सुराणा, रूपेश कुमार यादव, सौमिता बिस्वास ने किया। ‘दो नाक वाले लोग’ का पाठ सुशील कुमार पांडे, अमित चक्रवर्ती और कुसुम वर्मा ने किया। ‘बदचलन’ कहानी का पाठ पूजा कुमारी गोंड तथा शाहीन परवीन ने किया।
भारतीय भाषा परिषद में लिटिल थेस्पियन के सहयोग से तीन-तीन महीने का ‘कहानी-कविताओं की नाटकीय प्रस्तुति’ नाम से एक कोर्स चलाया जाता है। इसमें हर बार लगभग बीस छात्र-छात्राएँ एवं इच्छुक कोई भी व्यक्ति एक सामान्य सी मासिक फीस के साथ यह कोर्स करते हैं। तीसरे महीने के अंतिम दिन प्रशिक्षुओं को अपनी प्रस्तुति देनी पड़ती है। आज के प्रस्तुति में विशेषज्ञ के तौर पर श्री राज्यवर्धन जी उपस्थित थे। सत्र विशेषज्ञ के रूप में उमा झुनझुनवाल एवं परिषद की मंत्री बिमला पोद्दार उपस्थित रहीं।  सभी प्रतिभागियों ने अपने अपने अनुभव भी साझा किए। बांग्ला भाषी प्रतिभागी ने हिंदी सीखने के प्रति अपनी आंतरिक इच्छा जाहिर की।
प्रेषक : सुशील कान्ति

‘साहित्यिकी’ संस्था की मासिक गोष्ठी आयोजित

 कोलकाता :  महानगर की ‘साहित्यिकी’ संस्था के तत्वावधान में शुक्रवार, दिनांक २१ दिसंबर २०१८ को मासिक संगोष्ठी के अंतर्गत ‘साहित्यिकी पत्रिका’ के २८वें संस्करण ‘बदलते पर्यावरण में’ पर केन्द्रित परिचर्चा आयोजित की गई थी. मंजूरानी गुप्ता ने स्वागत भाषण में संस्था का परिचय व कार्यक्रमों की जानकारी दी. साथ ही संस्था की बड़ी पहचान के रूप में महिलाओं की एकमात्र हस्तलिखित पत्रिका की विशेषताओं से भी परिचित कराया I वरिष्ठ आलोचक, साहित्यकार तथा छपते-छपते के दीपावली अंक के संपादक कार्यक्रम के मुख्य वक्ता श्रीनिवास शर्मा जी ने पर्यावरण सम्बन्धी अपने विचारों से उपस्थित जनों को अवगत कराया. उन्होंने कहा कि ‘प्रदूषण और पर्यावरण-सुरक्षा’ जैसे ज्वलंत विषय का चुनाव करना और रचनाओं के रूप में सदस्य महिलाओं की भारी हिस्सेदारी इस बात का प्रमाण है कि यह चिंता किसी जाति, वर्ग या समुदाय विशेष की नहीं है. मनुष्य और प्रकृति के बीच आज एक द्वंद्व सा चल रहा है. तेज़ी से बढ़ती आबादी और उसकी ज़रूरतों को पूरी करने की समस्या इतनी विकट है कि विकास और पर्यावरण के बीच असंतुलन बढ़ता ही जा रहा है. संतुलन को बनाये रखने में प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका महत्त्वपूर्ण है. इसी क्रम उन्होंने उन महिलाओं को भी पर्यावरण सुरक्षा सम्बन्धी अभियान का हिस्सा बनाने की आवश्यकता पर बल दिया जो शिक्षा और विकास के साधनों से वंचित रह गईं हैं.. श्रीनिवास जी ने बदलते समय और परिस्थितियों के अनुकूल पत्रिका को प्रिंट रूप में प्रकाशित करने सुझाव भी संस्था के समक्ष रखा. सुषमा हंस ने संपादन के दौरान होने वाले अपने अनुभवों को साझा किया और कहा कि दृष्टि बदलने से दृश्य बदल जाते हैं अतएव पर्यावरण-सुरक्षा के सम्बन्ध में लोगों के दृष्टिकोण में पहले बदलाव आना चाहिए. पूनम पाठक ने धार्मिक उत्सवों, अनुष्ठानों और पर्वों के बढ़ते व्यवसायीकरण को ‘आस्था पर प्रदूषण का प्रहार’ कह चिंता व्यक्त की तथा इसको रोकने में महिलाओं की जागरूकता और सार्थक प्रयासों की आवश्यकता को रेखांकित किया. वाणी बाजोरिया ने सरकार द्वारा किये गए प्रयासों के ठोस कार्यान्वयन और कड़े नियमों व् दंड के प्रावधान की आवश्यकता पर बल दिया. अध्यक्षीय भाषण में कुसुम जैन ने वैज्ञानिक सोच व तकनीकि की सहायता से पर्यावरण सम्बन्धी आन्दोलन को आगे बढ़ाने की पेशकश करते हुए साहित्य के माध्यम से समाज के प्रति महिलाओं के उत्तरदायित्त्व को भी महत्त्वपूर्ण माना. गीता दुबे ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए समाज के प्रति संस्था के समर्पित योगदान का उल्लेख किया. संगोष्ठी में संस्था की अनेक सदस्याओं के अतिरिक्त अन्य गणमान्य जन भी उपस्थित थे I कार्यक्रम का सफल सञ्चालन मंजूरानी गुप्ता ने किया था.

…रिपोर्ट, पूनम पाठक और वाणी बाजोरिया के सौजन्य से.

 

आपके कम्प्यूटर पर होगी सरकार की नजर

नयी दिल्ली : केंद्र सरकार ने 10 केंद्रीय एजेंसियों को किसी भी कम्प्यूटर सिस्टम में रखे गए सभी डेटा की निगरानी करने और उन्हें देखने के अधिकार दिए हैं। केंद्रीय गृह मंत्रालय के साइबर एवं सूचना सुरक्षा प्रभाग द्वारा गत गुरुवार देर रात गृह सचिव राजीव गाबा के जरिए यह आदेश जारी किया गया। आदेश के मुताबिक, 10 केंद्रीय जांच और खुफिया एजेंसियों को अब सूचना प्रौद्योगिकी कानून के तहत किसी कम्प्यूटर में रखी गई जानकारी देखने, उन पर नजर रखने और उनका विश्लेषण करने का अधिकार होगा।
इन 10 एजेंसियों में खुफिया ब्यूरो (आईबी), नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी), प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी), राजस्व खुफिया निदेशालय (डीआरआई), केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई), राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए), रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ), सिग्नल खुफिया निदेशालय (जम्मू-कश्मीर, पूर्वोत्तर और असम में सक्रिय) और दिल्ली पुलिस शामिल हैं।
आदेश में कहा गया, ‘‘उक्त अधिनियम (सूचना प्रौद्योगिकी कानून, 2000 की धारा 69) के तहत सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों को किसी कम्प्यूटर सिस्टम में तैयार, पारेषित, प्राप्त या भंडारित किसी भी प्रकार की सूचना के अंतरावरोधन (इंटरसेप्शन), निगरानी (मॉनिटरिंग) और विरूपण (डीक्रिप्शन) के लिए प्राधिकृत करता है।’ सूचना प्रौद्योगिकी कानून की धारा 69 किसी कंप्यूटर संसाधन के जरिए किसी सूचना पर नजर रखने या उन्हें देखने के लिए निर्देश जारी करने की शक्तियों से जुड़ी है।
पहले के एक आदेश के मुताबिक, केंद्रीय गृह मंत्रालय को भारतीय टेलीग्राफ कानून के प्रावधानों के तहत फोन कॉलों की टैपिंग और उनके विश्लेषण के लिए खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों को अधिकृत करने या मंजूरी देने का भी अधिकार है।

तो क्या कश्मीर में बीता था ईसा मसीह का आखिरी वक्त!

ईसाई समुदाय के सबसे बड़े पर्व के करीब आने के साथ ही ईश्‍वर के पुत्र ईसा मसीह को लेकर तमाम हैरतअंगेज बातों का जिक्र चल पड़ता है. ईसा मसीह के जन्म से लेकर उनकी मृत्यु और दोबारा जीवित होना जैसी बातों पर लगातार विवाद रहा है. ऐसी भी मान्यता है कि ईसा मसीह ने अपनी जिंदगी के कई साल भारत में गुजारे थे। खासकर उनका अंतिम वक्त कश्मीर में गुजरा था. कहा जाता है कि जब इजरायल में ईसा मसीह को सलीब पर लटकाया गया तो वो उसके बाद भी जिंदा रहे थे. लेकिन रहस्यमय तरीके से कहां गायब हो गए। ये आज भी रहस्य है. कुछ इतिहासकारों और शोधकर्ताओं का मानना है कि ईसा का ये रहस्यकाल कश्मीर में बीता। श्रीनगर के रोजाबल श्राइन को ईसा मसीह की करीब दो हजार साल पुरानी कब्र माना जाता है।
कई शोधकर्ताओं का मानना है कि जीसस की मृत्यु सूली पर चढ़ाने से नहीं हुई थी. रोमन द्वारा सूली पर चढ़ाए जाने के बाद भी वो बच गए। फिर मध्यपूर्व होते हुए भारत आ गए. उनका बाकी का जीवन भारत में बीता। रोजाबल में जिस व्यक्ति का मकबरा है, उसका नाम यूजा असफ है। शोधकर्ताओं का मानना है कि यूजा असफ कोई और नहीं बल्कि ईसा मसीह या जीसस ही हैं।

तमाम डॉक्युमेंट्रीज और किताबों में जिक्र
क्राइस्ट के भारत आने पर बीबीसी लंदन ने 42 मिनट की डॉक्यूमेंट्री ‘जीसस इन इंडिया” बनायी। श्रीलंका में करीब सवा घंटे की एक डॉक्यूमेंट्री बनाई गयी। ”जीसस वाज ए बौद्धिस्ट मंक”. ईसा के भारत आने पर तमाम किताबें लिखी गयीं। कई दशकों पहले कश्मीर के जाने-माने लेखक अजीज कश्मीरी ने अपनी किताब ”क्राइस्ट इन कश्मीर” से लोगों को ध्यान खींचा. आंद्रेयस फेबर कैसर ने ”जीसस डाइड इन कश्मीर” लिखी तो जाने माने लेखक एडवर्ड टी मार्टिन ने ”किंग ऑफ ट्रेवलर्स: जीसस लास्ट ईयर इन इंडिया” लिखी।

रोजाबल की वो दरगाह, जिसकी कब्र के बारे में माना जाता है कि ये ईसा मसीह की है. हालांकि इसको लेकर अलग अलग दावे हैं

पहलगाम में यहूदी नस्ल के बाशिंदे
सुजैन ओस ने भी इसी विषय पर चर्चित किताब लिखी. जम्मू-कश्मीर आर्कियोलॉजी, रिसर्च एंड म्यूजियम में अर्काइव विभाग के पूर्व डायरेक्टर डॉ. फिदा हसनैन की भी इस विषय में दिलचस्पी तब पैदा हुई जब वो लद्दाख गए और उन्हें इस बारे में बताया गया। तब उन्होंने राज्य में इस संबंध में पुरानी किताबें और साक्ष्य तलाशने शुरू किए. जो कुछ उन्हें मिला, वो इशारा करता था कि ईसा के भारत आने की बात में दम है। पहलगाम का क्षेत्र डीएनए संरचना अनुसार मुसलमान बने यहूदी नस्ल के लोगों से भरा हुआ है।
सवाल भी हैं
कई विद्वानों ने शोध से साबित करने की कोशिश की कि ये कब्र किसी और की नहीं, बल्कि ईसा मसीह या जीसस की है। सवाल उठता है कि अगर जीसस की मौत सूली पर चढ़ाए जाने की वजह से येरूशलम में हुई तो उनका मकबरा 2500 किमी दूर कश्मीर में कैसे हो सकता है। बाइबल भी ईसा को सूली पर चढ़ाने के बाद उनके 12 बार अलग-अलग समय पर लोगों के सामने आकर मानव रूप में जीवित होने का प्रमाण देना कहती है।

पैर के निशान

ईसा सिल्क रूट से कश्मीर आ गए!
ईसा मसीह ने 13 साल से 30 साल की उम्र के बीच क्या किया, ये रहस्य सरीखा ही है. बाइबल में उनके इन वर्षों का कोई जिक्र नहीं मिलता। 30 वर्ष की उम्र में उन्होंने येरूशलम में यूहन्ना (जॉन) से दीक्षा ली. दीक्षा के बाद वो लोगों को शिक्षा देने लगे. ज्यादातर विद्वानों के अनुसार सन 29 ई. को ईसा येरूशलम पहुँचे। वहीं उनको दंडित करने का षड्यंत्र रचा गया. जब उन्हें सलीब पर लटकाया गया, उस वक्त उनकी उम्र करीब 33 वर्ष थी। इसके दो दिन बाद ही उन्हें उनकी कब्र से पास जीवित देखा गया. फिर वो कभी यहूदी राज्य में नजर नहीं आए. उसके बाद के समय में उनके कश्मीर में होने का उल्लेख है। ईसा ने दमिश्क, सीरिया का रुख करते हुए सिल्क रूट पकड़ा। वह ईरान, फारस होते हुए भारत पहुँचे.जहां कश्मीर में वो 80 वर्ष की उम्र तक रहे। जीसस के भारत आने को लेकर कई किताबें लिखी गयीं जिसमें उनके कश्मीर आकर रहने का उल्लेख है।
अहमदिया समुदाय भी मानता है
हिंदू ग्रंथ भविष्यपुराण में भी कथित उल्लेख है कि ईसा मसीह भारत आए थे। उन्होंने कुषाण राजा शालीवाहन से मुलाकात की थी। मुस्लिमों का अहमदिया समुदाय भी यकीन करता है कि रोजाबल में मौजूद मकबरा ईसा या जीसस का ही है।अहमदिया समुदाय के संस्थापक हजरत मिर्जा गुलाम अहमद ने 1898 में लिखी अपनी किताब ‘मसीहा हिन्दुस्तान में’ ये लिखा कि रोजाबल स्थित मकबरा जीसस का ही है जिनकी शादी कश्मीर प्रवास के दौरान मरजान से हुई. उनके बच्चे भी हुए।
रूसी विद्वान ने पहली बार किया था ये दावा
जर्मन लेखक होलगर्र कर्सटन ने अपनी किताब ‘जीसस लीव्ड इन इंडिया’ में इस बारे में विस्तार से लिखा है। पहली बार सन 1887 में रूसी विद्वान, निकोलाई अलेक्सांद्रोविच नोतोविच ने संभावना जाहिर की थी कि शायद जीसस भारत आए थे। नोतोविच कई बार कश्मीर आए थे. जोजी ला पास के नजदीक स्थित एक बौद्ध मठ में वो मेहमान थे, जहां एक भिक्षु ने उन्हें एक बोधिसत्व संत के बारे में बताया जिसका नाम ईसा था। नोतोविच ने पाया कि ईसा औऱ जीसस क्राइस्ट के जीवन में कमाल की समानता है। निकोलस नोतोविच एक रूसी यहूदी राजदूत, राजनीतिज्ञ और पत्रकार थे. उन्होंने अंतरराष्ट्रीय तौर पर पहली बार ये दावा किया था। रूसी विद्वान और लेखक निकोलाई नोतोविच, जो लद्दाख के बौद्ध मठ में ठहरे और फिर “अननोन ईयर्स ऑफ जीसस” किताब लिखी।
भारत सरकार की डॉक्युमेंट्री क्या कहती है
इस बारे में भारत सरकार द्वारा बनाई गई करीब 53 मिनट की डॉक्यूमेंट्री ”जीसस इन कश्मीर” कमाल की है. इसने बहुत प्रमाणिक ढंग से बताया है कि किस तरह जीसस भारत में आकर रहे। उनका ये प्रवास लद्दाख और कश्मीर में था. हालांकि रोमन कैथोलिक चर्च और वेटिकन इसे नहीं मानते. ये डॉक्युमेंट्री इशारा करती है कि जीसस अपने खास लोगों के साथ कश्मीर आए थे. फिर यहीं के होकर रह गए। उनके साथ आए यहूदी यहीं के वाशिंदे हो गए। इजरायल का ये ट्राइबल मैप बताता है कि सैकड़ों साल पहले जो कबीले वहां से गायब हो गए थे, वो अब कश्मीर में हैं। ये लोग अपने नाम भी उसी तरह रखते हैं, जिस तरह इजरायली।

रोजबेला शीरिन

इजरायल के 10 यहूदी कबीलों के वंशज कश्मीर में
भारत सरकार के फिल्म प्रभाग की ये डॉक्यूमेंट्री प्रमाणिक रूप से भारत में ईसा मसीह के संबंध पर ध्यान खींचती है। भारतीय सेंसर बोर्ड से पास इस डॉक्यूमेंट्री में 2000 साल पुराने शिव मंदिर के अभिलेखों, संस्कृत और बौद्ध पांडुलिपियों में यीशू के यहूदी नाम यसूरा के इस्तेमाल, सम्राट कनिष्क के अनदेखे सिक्कों और तिब्बती ऐतिहासिक पांडुलिपियों द्वारा उनके कश्मीर आने को साबित किया जाता है। इजरायल के कुल 12 यहूदी कबीलों में गुम हुए 10 यहूदी कबीलों में कुछ के वंशज अफगान और कश्मीर में ही बसे हुए हैं। उन्हें “बनी इजरायल ” कहा जाता है. वो सभी बेशक मुस्लिम बन चुके हैं, लेकिन उनका खानपान और रीति रिवाज कश्मीरियों से अलग हैं। वो कश्मीरियों से रोटी-बेटी के सम्बन्ध नहीं रखते।
कहाँ है श्रीनगर में ये कब्र
श्रीनगर के जिस छोटे से मोहल्ले खानयार में ये कब्र बताई जाती है और पिछले कुछ सालों में दुनियाभर के ईसाईयों और धार्मिसाक इतिहासकारों के आकर्षण का केंद्र भी बनती रही है। खानयार के रोजाबल में जो कब्र है, वो उत्तर-पूर्व दिशा में है जबकि मुसलमानों की कब्रें दक्षिण-पश्चिम में होती हैं।

(साभार – न्यूज 18)

स्टार्टअप के लिए अनुकूल माहौल उपलब्ध कराने मे डीआईपीपी की रैकिंग में गुजरात अव्वल

नयी दिल्ली : गुजरात स्टार्टअप के लिए अनुकूल माहौल उपलब्ध कराने के मामले में सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाला राज्य बना है। औद्योगिक नीति एवं संवर्द्धन विभाग (डीआईपीपी) द्वारा उभरते उद्यमियों के लिए राज्यों द्वारा अधिक अनुकूल तंत्र विकसित करने के प्रदर्शन के आधार पर रैंकिंग जारी की गई है। इस रैंकिंग में गुजरात शीर्ष पर रहा है।
डीआईपीपी सचिव रमेश अभिषेक ने कहा, ‘‘इस रैंकिंग से राज्यों को स्टार्टअप को प्रोत्साहन के लिए पारिस्थितिकी तंत्र को सुधारने में मदद मिलेगी।’’ इस रैंकिंग का आधार राज्यों द्वारा स्टार्टअप के लिए अनुकूल तंत्र विकसित करने के लिए किए गए प्रयास है। इस प्रक्रिया में 27 राज्य और तीन संघ शासित प्रदेशों ने भाग लिया।
रैंकिंग रूपरेखा में हस्तक्षेप के सात क्षेत्रों और 38 कार्रवाई बिंदुओं को शामिल किया गया। इसमें नीतिगत समर्थन, इनक्यूबेशन केंद्र, शुरुआती पूंजी, एंजल और उद्यम वित्तपोषण और सुगम नियमन शामिल हैं। इसमें गुजरात के बाद सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाले चार राज्य कर्नाटक, केरल, ओड़िशा और राजस्थान हैं। वहीं पांच राज्यों आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और तेलंगाना को अगुवा (लीडर) आंका गया है। हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल को अगुवा बनने की आकांक्षा रखने वाले की श्रेणी में रखा गया है। असम, दिल्ली और गोवा सहित आठ राज्यों को उभरते राज्य माना गया है। शुरुआत करने वाले राज्यों और संघ शासित प्रदेशों में चंडीगढ़, मणिपुर, मिजोरम, नगालैंड, पुडुचेरी, सिक्किम और त्रिपुरा शामिल हैं। अभिषेक ने कहा कि राज्यों और संघ शासित प्रदेशों को रैंकिंग देने के विचार के पीछे मकसद किसी को ‘शर्मिंदा’ करना नहीं है, बल्कि उनको प्रोत्साहित करना है। उन्होंने कहा कि यह पूरी प्रक्रिया क्षमता विकास के लिए की गई है। अभी तक 22 राज्यों ने अपनी-अपनी स्टार्टअप नीति बनाई है।
सरकार ने स्टार्टअप इंडिया कार्य योजना जनवरी में शुरू की थी। इसका मकसद देश में उभरते उद्यमियों को प्रोत्साहन देना है। योजना के तहत कर अवकाश, इंस्पेक्टर राज से मुक्त व्यवस्था और पूंजीगत लाभ कर की छूट दी जा रही है।

चुनावी फायदे के लिए कर्ज माफी के बीज मत बोइए – स्वामीनाथन

नयी दिल्ली :  देश में किसान कर्ज के बढ़ते बोझ और फसलों की सही लागत नहीं मिलने से जूझ रहे हैं। राजनीतिक दल इसी का फायदा उठाते हुए कर्ज माफी का वादा कर रहे हैं। हाल ही में हुए 5 में से 3 राज्‍यों में कांग्रेस ने इसी वादे के सहारे चुनाव जीता। हालांकि हरित क्रांति के जनक एमएस स्‍वामीनाथन कर्ज माफी को अर्थव्‍यवस्‍था के लिए उपयुक्‍त नहीं मानते। उन्‍होंने राजनेताओं से अपील की है कि चुनावी फायदे के लिए वे इस तरह के कदम ना उठाएं।
एक निजी चैनल से बातचीत में उन्‍होंने कहा, ‘खेती की समस्‍या आर्थिक है। मानसून और बाजार छोटे किसानों के लिए दो बड़े जरूरी तत्‍व हैं। चुनावी फायदे के लिए राजनेताओं को आर्थिक रूप से अव्‍यावहारिक नीतियों को बढ़ावा नहीं देना चाहिए।’ मध्‍य प्रदेश, छत्‍तीसगढ़ और राजस्‍थान में कांग्रेस ने सरकार बनाते ही किसानों के कर्ज माफ करने का ऐलान किया। इस ऐलान के तहत दो लाख रुपये तक का कर्ज माफ होगा।

स्‍वामीनाथन ने कहा कि कर्ज माफी कृषि नीति का हिस्‍सा नहीं बनना चाहिए।उन्‍होंने कहा, ‘कर्ज तभी माफ होना चाहिए जब किसान को पैसा लौटाने में काफी दिक्‍कत हो रही हो और यह कदम भी कभी-कभार ही लेना चाहिए। यह कभी भी कृषि नीति का हिस्‍सा नहीं बनना चाहिए क्‍योंकि जरूरत खेती को लाभ देने वाली और आर्थिक रूप से व्‍यावहारिक बनाने की है।’
बता दें कि स्‍वामीनाथन ने किसानों और खेती की बेहतरी के लिए एक रिपोर्ट दी थी लेकिन उसे लागू नहीं किया गया है। किसान संगठन लगातार इस रिपोर्ट को लागू करने की मांग कर रहे हैं। न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य(एमएसपी) के बारे में उन्‍होंने कहा, ‘एमएसपी तभी कामयाब होगी जब खरीद प्रक्रिया होगी। कीमतों, खरीद और सार्वजनिक वितरण के लिए एक नीति है। यदि पर्याप्‍त खरीद नहीं होगी तो हो सकता है कि एमएसपी का फायदा न मिले इसलिए हमें कीमतों और खरीद के लिए एक संपूर्ण नीति चाहिए।’
स्‍वामीनाथन ने इस बात पर जोर दिया कि किसानों की आर्थिक दशा सुधारने और युवाओं को इसकी तरफ आकर्षित करने की जरूरत है। उन्‍होंने कहा, ‘खेती को आर्थिक रूप से व्‍यावहारिक और लाभप्रद बनाने की जरूरत है। हमारे पास मौका है कि हम ऐसी नीति बनाए जिससे कि किसानों की माली हालत सुधरे और इसके साथ ही खेती युवाओं को आकर्षित करे।

साइकिल से दुनिया का चक्कर लगाने वाली सबसे तेज एशियाई महिला बनी वेदांगी

मुम्बई : पुणे की 20 साल की वेदांगी कुलकर्णी साइकिल से दुनिया का चक्कर लगाने वाले सबसे तेज एशियाई बन गयी हैं। वेदांगी ने रविवार को कोलकाता में तड़के साइकिल चलाकर इसके लिए जरूरी 29,000 किलोमीटर की मानक दूरी को तय किया। उन्होंने इस सफर की शुरूआत जुलाई में पर्थ से की थी और इस रिकार्ड को पूरा करने के लिए वह ऑस्ट्रेलिया के इस शहर में वापस जाएंगी। वेदांगी ने बताया कि उन्होंने 14 देशों का सफर किया और 159 दिनों तक रोजाना लगभग 300 किलोमीटर साइकिल चलाती थी। इस दौरान उन्हें कुछ ‘‘ अच्छे और बुरे’’ अनुभव हुए। उनके पिता विवेक कुलकर्णी ने बताया दुनिया में कुछ ही लोगों ने इस मुश्किल चुनौती को पूरा किया है और उनकी बेटी दुनिया का चक्कर लगाने के मामले में सबसे तेज एशियाई है। ब्रिटेन की जेनी ग्राहम (38) के नाम महिलाओं के बीच सबसे कम दिनों में साइकिल से चक्कर लगाने का रिकार्ड है जिन्होंने इसके लिये 124 दिन का समय लिया था। यह रिकार्ड पिछले रिकार्ड से तीन सप्ताह कम था। इस अभियान को पूरा करने के दौरान वेदांगी को कई चुनौतियों को सामना करना पड़ा। कनाडा में एक भालू उनका पीछे करने लगा था। रूस में बर्फ से घिरी जगहों पर उन्होंने कई रात अकेले गुजारी तो वहीं स्पेन में चाकू की नोक पर उनसे लूटपाट हुई।
ब्रिटेन के बॉउर्नेमाउथ विश्व विद्यालय की खेल प्रबंध की इस छात्रा ने बताया कि उन्होंने इसके लिये दो साल पहले ही तैयारी शुरू कर दी। उन्होंने साइकिल पर लगभग 80 प्रतिशत यात्रा को अकेले पूरा किया। यात्रा के दौरान उन्होंने शून्य से 20 डिग्री कम से 37 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान को झेलना पड़ा। इस दौरान वह ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, कनाडा, आइसलैंड, पुर्तगाल, स्पेन फ्रांस, बेल्जियम, जर्मनी, डेनमार्क, स्वीडन, फिनलैंड और रूस से होकर गुजरी।

महिला-पुरुषों के बीच आर्थिक बराबरी में लग जाएंगे 202 साल

जेनेवा : दुनियाभर में कार्यस्थल पर महिलाओं को पुरुषों की बराबरी तक पहुंचने में 202 साल लग जाएंगे। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की मंगलवार को जारी ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट में यह बात सामने आई। इसके मुताबिक वेतन समेत आर्थिक अवसरों के मामलों में महिलाओं और पुरुषों की स्थिति में भारी अंतर है।
टॉप-10 देशों में एशिया से सिर्फ फिलीपींस शामिल
रिपोर्ट के मुताबिक राजनीति, शिक्षा और स्वास्थ्य में महिला-पुरुष असमानता की स्थिति में इस साल में सुधार हुआ है। लेकिन, इन क्षेत्रों में समानता का लक्ष्य पाने में 108 साल लग जाएंगे। क्योंकि, एक साल के अंदर स्थिति में 0.1% से भी कम सुधार हुआ है। पिछले साल महिला-पुरुषों की उपलब्धियों और वेलफेयर में फासला बढ़ गया था। दस साल में पहली बार ऐसा हुआ था। महिला-पुरुष समानता में आइसलैंड 85.8% स्कोर के साथ लगातार 10वें साल पहले नंबर पर रहा है। महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण में भी यह टॉप पर है। हालांकि, यहां जनप्रतिनिधि, सीनियर अफसर और मैनेजर के तौर पर महिलाओं के प्रतिनिधित्व में गिरावट आई है।
149 देशों की सूची में भारत 108वें नंबर पर
महिला-पुरुष समानता के मामले में दुनिया में भारत 66.5% स्कोर के साथ 108वें नंबर पर है। राजनीतिक सशक्तिकरण में देश में महिला-पुरुषों की स्थिति में करीब 40% फासला है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में मैनेजर स्तर के पदों पर सिर्फ 34% महिलाएं हैं। महिला-पुरुषों के वेतन में 63% अंतर है। मध्य – पूर्व और उत्तर अफ्रीका की स्थिति सबसे खराब है। यूएन वूमेन की रीजनल डायरेक्टर अन्ना-करिन जेटफोर्स का कहना है कि दुनियाभर में ऐसा कोई देश नहीं जिसने पूरी तरह महिला-पुरुष के बीच समानता का लक्ष्य हासिल कर लिया हो। लैंगिक असमानता दुनिया की सच्चाई है। महिलाओं की जिंदगी से जुड़े हर पहलू में यह दिखाई दे रहा है। महिला-पुरुष के बीच आर्थिक समानता हासिल करने के लिए 202 साल का वक्त बहुत ज्यादा है। एशिया में फिलीपींस की स्थिति सबसे अच्छी है। ग्लोबल इंडेक्स में इसका आठवां नंबर है। शिक्षा, राजनीति और वेतन के मामले में यहां महिला-पुरुषों में समानता बाकी एशियाई देशों से ज्यादा है। एशियाई देशों में दूसरा नंबर लाओस का है। लेकिन, फिलीपींस के काफी नीचे है। ग्लोबल इंडेक्स में लाओस का 26वां, सिंगापुर और 67वां और चीन का 103वां नबर है।