Monday, April 13, 2026
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अंतर्राष्ट्रीय क्षत्रिय वीरांगना फ़ाउंडेशन की पश्चिम बंगाल कार्यकारिणी का गठन

हावड़ाः अंतर्राष्ट्रीय क्षत्रिय वीरांगना फ़ाउंडेशन की पश्चिम बंगाल प्रदेश कार्यसमिति की एक बैठक प्रदेश अध्यक्ष प्रतिभा सिंह के नेतृत्व में हावड़ा के लिलुआ स्थित अग्रसेन स्ट्रीट में सम्पन्न हुई। बैठक में सर्वसम्मति से वीरांगना की प.बंगाल प्रदेश कार्यकारिणी का गठन किया गया। इसमें प्रतिभा सिंह अध्यक्ष, इंदु सिंह उपाध्यक्ष, प्रतिमा सिंह महासचिव, पूजा सिंह कोषाध्यक्ष तथा किरण सिंह, सुमन सिंह, मीनू सिंह, रीता सिंह व ज्योति सिंह सदस्य बनाये गये। यह भी निर्णय लिया गया कि वीरांगना की प्रदेश भर में आंचलिक इकाइयां गठित होंगी जिसमें कोलकाता महानगर अंचल की अध्यक्ष मीनू सिंह, सोदपुर अंचल की अध्यक्ष ज्योति सिंह, उपाध्यक्ष सुनीता सिंह व सचिव ललिता सिंह, हावड़ा जिला अंचल की अध्यक्ष रीता सिंह, उपाध्यक्ष ऋचा सिंह, कार्यकारिणी की सदस्य किरण प्रकाश सिंह व रागिनी सिंह, टालीगंज अंचल की अध्यक्ष सुमन सिंह, कांचरापाड़ा की अध्यक्ष किरण सिंह बनायी गयीं। आंचलिक समितियों की पूरी कार्यकारिणी का गठन और विस्तार जल्द होगा।

महिलाओं के व्यापक हितों के लिए काम करेंगी वीरांगनाएं-प्रतिभा सिंह

वीरांगना प्रदेश अध्यक्ष प्रतिभा सिंह ने बताया कि जल्द ही एक भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम की रूपरेखा तैयारी की जा रही है। उसके बाद महिला सशक्तीकरण और जागरूकता से जुड़े विभिन्न कार्यक्रम प्रदेश के विभिन्न जिलों में होंगे। उन्होंने कहा कि भले ही ये कार्यक्रम क्षत्रिय वीरांगनाओं द्वारा संचालित होंगे लेकिन वे जाति, धर्म और राजनीतिक खेमे से उठकर महिलाओं के व्यापक हितों से जुड़े होंगे। साल में एक अंतर्राष्ट्रीय समारोह भी बंगाल में होगा।

खिदिरपुर कॉलेज में हिन्दी दिवस समारोह का आयोजन

कोलकाता : खिदिरपुर कॉलेज की ओर से कॉलेज परिसर में हिंदी दिवस पालन किया गया । कार्यक्रम में जहां एक ओर कॉलेज के विभिन्न विभागों के विभागाध्यक्ष एवं सहायक शिक्षक तथा शिक्षिकाओं ने मातृभाषा हिंदी पर अपने वक्तव्य प्रस्तुत किए । वहीं 14 भिन्न-भिन्न भाषाओं को लेकर विद्यार्थियों ने अपनी कविताएं प्रस्तुत कीं । विभागाध्यक्ष डॉ इतु सिंह ने स्वागत भाषण और अतिथि का स्वागत किया तथा यह बताया कि हिंदी केवल राजभाषा नहीं बल्कि समन्वय की भाषा है । वहीं विभाग की शिक्षिका डॉ अर्चना पांडे ने गोपाल सिंह नेपाली की कविता का पाठ किया। राजनीति विज्ञान की शिक्षिका डॉक्टर सुदक्षिणा सरकार राय , बांग्ला विभागाध्यक्ष डॉक्टर रूमा बनर्जी , अंग्रेजी विभाग के शिक्षिका डॉक्टर सुनंदा मुखर्जी , कॉमर्स विभाग की शिक्षिका डॉक्टर सुहाग जोरदार , अर्थशास्त्र विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ स्वाति पाल, फिजिकल एजुकेशन के विभागाध्यक्ष डॉ दिब्येंदु राय ने हिंदी के संबंध में अपने वक्तव्य प्रस्तुत किए । दर्शन विभाग की शिक्षिका डॉक्टर प्रभावती दास मल्लिक ने मीरा की कविता का गायन किया । कार्यक्रम का संचालन हाजरा खातून, निष्ठा कुमारी, कंचन चौधरी और मुबीना खातून ने किया । स्वागत गीत सूबी सिंह ने प्रस्तुत किया । शाहीन परवीन ने हिंदी दिवस पर विशेष भाषण प्रस्तुत किया । शिवमंगल सिंह सुमन की कविता ‘ वरदान नहीं माँगूगा ‘ – स्मिता ने , निराला की ‘ जागो फिर एक बार ‘ कविता – पार्वती साव , केदारनाथ सिंह की कविता ‘ मेरी भाषा के लोग ‘ अंकिता कुमारी , रामप्रसाद बिस्मिल की गजल शिखा सिंह , विद्यापति के गीत का गायन – प्रभास कुमार झा , हिंदीतर भाषा की कविताएँ पंजाबी की कविता अवतार सिंह संधू ‘पाश’ (सलाम) – मुबीना खातून , मराठी की नारायण सर्वे की कविता ‘ सावधान ‘ – ज्योति साव , बांग्ला की कविता जीवनानंद दास (मैंने देखा है बंगाल का चेहरा) – असमिया की कविता हीरेन भट्टाचार्य (पृथ्वी मेरी कविता) – सचिन बिंद , उड़िया की कविता सीताकांत महापात्र (धान कटाई) – किशन कुमार , कन्नड़ की कविता ‘ बादल ‘ विनायक कृष्ण गोकाक – नेहा कुमारी , कश्मीरी की कविता मोतीलाल ‘साकी’ (बाँसुरी वादक) – कांतेश्वर कुमार , गीत – हरिवंश राय बच्चन – कंचन , गुजराती की कविता संस्कृति रानी देसाई (ढोल) – स्वीटी सोनी , तमिल की कविता सुब्रमण्यम भारती (स्वतंत्रता) – पूजा चौधरी , तेलुगु की कविता डॉ सी. नारायण रेड्डी (पेड़) – शाहीन परवीन , मलयालम की कविता के सचिदानंदन (पहला प्यार) – नेहा कुमारी भास्कर , मणिपुरी की कविता लेनचेनबा मीतै (तुझे नहीं खेया नाव) – विनीता कुमारी , सिंधी की कविता कृष्ण राही (वोट) – रीमा यादव , डोंगरी की कविता पद्मा सचदेव (डोगरी) – पार्वती साव , महादेवी की कविता (वे मुस्काते फूल) – कंचन साव , समूह गान शाहीन परवीन …. नृत्य संजना शर्मा , सोना सिंह , नाजिया परवीन ने प्रस्तुत किया । धन्यवाद ज्ञापन हिंदी विभाग विभाग की शिक्षिका डॉ रमा मिश्रा ने प्रस्तुत किया। कॉलेज के सभी सहायक शिक्षक तथा शिक्षिकाओं ने साथ ही साथ प्रथम द्वितीय एवं तृतीय वर्ष के छात्र छात्राओं ने कार्यक्रम को सफल बनाने में अहम भूमिका निभाई ।

सुषमा कनुप्रिया को लाडली मीडिया ज्यूरी एप्रिशिएशन सर्टिफिकेट

लाडली मीडिया एंड एडवर्टाइजिंग अवार्ड्स के 9वें संस्करण में सलाम दुनिया की पत्रकार तथा अपराजिता की संस्थापक व सम्पादक सुषमा त्रिपाठी कनुप्रिया को लाडली मीडिया अवार्ड 2017 का ज्यूरी एप्रिशियेशन सर्टिफिकेट मिला है। उनको यह प्रमाणपत्र सलाम दुनिया में प्रकाशित ‘जान को दाँव पर लगाकर बन्ध्याकरण करवाती महिलायें’ रपट के लिए दिया गया जो परिवार नियोजन के तरीकों और उसकी भागीदारी पर आधारित है।

 

लैंगिक समानता के लिए काम कर रहे पॉपुलेशन फर्स्ट द्वारा आयोजित लाडली मीडिया अवार्ड के लिए देश भर से विभिन्न श्रेणियों में 1500 प्रविष्टियाँ भेजी गयी थीं जिसमें से 90 विजेताओं का चयन किया गया। इनमें से 82 प्रतिभागियों को अवार्ड तथा 14 प्रतिभागियों को प्रमाणपत्र दिया गया। विभिन्न क्षेत्रों के 60 निर्णायक थे। हाल ही में इसका पुरस्कार वितरण समारोह आयोजित किया गया जिसमें रैमन मैगसेसे पुरस्कार विजेता पी. साईनाथ उपस्थित थे। इस अवसर पर पद्मश्री शोभना नारायण ने प्रस्तुति की।

मनुष्य और उसकी संभावनाओं के कवि हैं प्रियंकर पालीवाल” – प्रो0 अरुण होता

कोलकाता :  बंगीय हिंदी परिषद् की ओर से हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि, आलोचक और संस्कृति चिंतक प्रियंकर पालीवाल की कविता पुस्तक “वृष्टि-छाया प्रदेश का कवि” पर एक परिचर्चा का आयोजन किया गया।परिचर्चा गिष्ठी की अध्यक्षता करते हुए हिंदी के सुप्रसिद्ध आलोचक प्रो0 अरुण होता ने कहा कि यह कविता संग्रह प्रियंकर जी के पिछले 53-54 सालों की सबसे समृद्ध कमाई है। लगभग 34 साल पहले उन्होंने कविता-लेखन को गंभीर रूप से देखना शुरू किया था और इतने दिनों में 53 कविताओं का जो संग्रह हिंदी जगत को सौंपा है, वह बताता है कि कितने धैर्य के साथ, बिना किसी हड़बड़ी के कवि ने कैसे अपने समाज, संस्कृति , परम्परा और वर्तमान को समझने की कोशिश की है।यथार्थ के चित्रण में कवि की जो व्यापक भविष्य दृष्टि समाहित है वह सबसे खराब दौर से गुजर रहे मनुष्य में भी संभावनाओं की खिड़की खोल देती है। वे धैर्य और स्थैर्य के कवि हैं। विद्यासागर कॉलेज के विभागाध्यक्ष डॉ आशुतोष ने कहा कि प्रियंकर पालीवाल के व्यक्तित्व में जो धैर्य, गंभीरता,सरलता और शालीनता है उसे उनकी कविताओं में भी देखा जा सकता है।शहर और गाँव दोनों की विसंगतियों, सौंदर्य, परंपरा और संस्कृति को जितनी बारीकी से कवि ने चित्रित किया है वही कवि को विशिष्ट बनाती हैं। परंपरा और हमारा सांस्कृतिक इतिहास उनके लिए बड़े महत्व के हैं परंतु वे कहीं भी कवि के पैर की बेड़ी नहीं बनने पाए हैं। युवा आलोचक डॉ मृत्युंजय पांडेय ने कहा कि पालीवाल जी संभावनाओं से अधिक यथार्थ के कवि हैं। उनके अंदर एक गाँव बसता है, उसकी परम्परा और संस्कृति इनकी काव्य ऊर्जा और शक्ति के रूप में प्रतिबिंबित होते हैं। पालीवाल जी गम्भीरता पूर्वक पढ़े जाने की माँग करते हैं। उन्हें हल्के ढंग से नहीं पढ़ा जा सकता है। यथार्थ के साथ -साथ वे उम्मीद यकीन और भरोसे के कवि हैं। युवा साहित्य चिंतक पीयूषकांत राय ने कहा कि ‘वृष्टि-छाया प्रदेश का कवि’ संकलन की कविताएँ शिल्प और भाषा की दृष्टि से इतनी सुगठित हैं कि एक भी शब्द को आप हिला नहीं सकते।किसी भी शब्द को अगर उसके स्थान से हटा दिया जाय तो कविता का सौंदर्य नष्ट हो जाएगा।किसी भी कवि में यह क्षमता वर्षों की काव्य-यात्रा के पश्चात ही आ पाती है। पिछले 34 सालों की इनकी काव्य यात्रा को इस रूप में देखना चाहिए।कवि के अचार और विचार में जो निकटता है वही युवा पीढ़ी को उनके नजदीक ले जाता है।आज के युग में नयी पीढ़ी को सत्य और मूल्य से जोड़ने में तमाम बड़े आचार्य इसलिए विफल हैं क्योंकि उनका अचार तुच्छ है। उनके विचार बड़े हैं किन्तु अचार बौने हैं।हमें गर्व है कि हमारे शहर में एक ऐसा कवि है जिसके अचार और विचार में दूरी नहीं है और वही सत्य इनकी कविताओं की सबसे बड़ी शक्ति है।वे हमारे शहर के बौद्धिक संपदा हैं। गोष्ठी में स्वयं कवि ने अपनी रचना प्रक्रिया के अनुभवों को साझा किया और अपने आत्म-संघर्ष से साक्षात्कार कराते हुए कहा मेरी कविताएँ समय समय पर अपने समय के साथ की गईं मुठभेड़ हैं, वे मेरी आत्म-समीक्षा का परिणाम हैं।कविता मेरे लिए जीवन को समझने का उपक्रम है।मैं खुद को एक सचेत नागरिक – कवि के रूप में देखता हूँ। मंच के संचालक युवा आलोचक डॉ कुमार संकल्प ने कहा कि प्रियंकर पालीवाल जी की कविताएँ अपने समय और उसकी दिशा पर गहरे सोच-विचार की माँग करती हैं।उन्हें पढ़ते हुए आप अपने युग की हलचलों को पढ़ सकते हैं और तमाम तरह के संकटों से लड़ने का नैतिक सामर्थ्य जुटा सकते हैं। दाम्पत्य प्रेम की कविताओं की दृष्टि से वे केदारनाथ अग्रवाल और नागार्जुन की परंपरा के कवि हैं । निराला ने पुत्री पर कविता लिखी थी ‘सरोज-स्मृति’।हिंदी साहित्य में बहन पर गिनी चुनी ही कविताएँ लिखीं गयीं हैं । कवि के इस संग्रह से यह शिकायत हिंदी जगत को नहीं रह जाएगी। धन्यवाद ज्ञापन करते हुए परिषद् की अध्यक्ष और कलकत्ता गर्ल्स कॉलेज की प्राचार्या (प्रिंसिपल) प्रो0 सत्या उपाध्याय ने कहा कि प्रियंकर पालीवाल की कविताएँ हिंदी जगत को समृद्ध करती हैं। इसमें राजस्थान की धड़कन के साथ – साथ हिंदी प्रदेश का स्पंदन है।परिचर्चा में परिषद् के उपाध्यक्ष डॉ सत्यप्रकाश तिवारी, सदीनामा के संपादक जितेंद्र जितांशु, प्रसिद्ध कहानी लेखक कुशेश्वरजी, सेराज खान बातिश, प्रो0 शुभ्रा उपाध्याय,शहर के प्रसिद्ध ग़ज़लकार ज्ञान प्रकाश पांडेय,श्रीमोहन तिवारी, अनिल उपाध्याय,सर्वेश राय,कवि रमाकांत सिन्हा, कवि रामनारायण झा,स्कॉटिश चर्च कॉलेज के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ बीरेंद्र सिंह,उमेश पांडेय,आनंद प्रकाशन के नीलू त्रिपाठी,प्रेसिडेंसी विवि से गोपाल, अनूप, अंजली, शनि,बंगबासी कॉलेज से प्रियंका, सुलेखा,ज्योति,श्रीकांत,साहिल,कोलकाता विवि से राजकुमार गुप्ता ,डॉ कमल आदि ने भाग लिया।

फाइलों में आज भी जिंदा है राम पथ विकास योजना

सुमन त्रिपाठी
भोपाल :  कभी प्रदेश की भाजपा सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी योजनाओं में शामिल रही राम वन गमन पथ विकास योजना भले ही सियासी भंवर में उलझकर जमीनी हकीकत न बन पाई हो, लेकिन सरकारी फाइलों में यह योजना आज भी जिंदा है। संस्कृति विभाग के बजट में न सिर्फ इसका जिक्र है, बल्कि इसके लिए एक हजार रुपए का टोकन बजट भी आवंटित है। यह योजना भले ही सरकार के ठंडे बस्ते में चली गई है, लेकिन चुनाव के पहले कांग्रेस ने इसे हवा देकर मुद्दे को फिर गर्मा दिया है।
मध्यप्रदेश में सत्तारूढ़ होते ही भाजपा ने राम के नाम पर सियासी दांव खेलते हुए उन क्षेत्रों को सांस्कृतिक और पर्यटन की दृष्टि से विकसित करने की योजना बनाई थी, जहां से होकर भगवान राम वनवास की अवधि के दौरान गुजरे थे। इसे राम वन गमन पथ विकास योजना नाम दिया गया था। इस योजना पर सरकार ने विचार 2004 में किया था, लेकिन इसे अमली जामा पहनाने की घोषणा 2007 के आखिरी दिनों में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने चित्रकूट में की थी।
यह वह समय था जब 2008 के विधानसभा चुनावों की सुगबुगाहट शुरू हो गई थी। मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद संस्कृति विभाग सक्रिय हुआ और रामकथा, साहित्य, पुरातत्व, भूगोल, हिन्दी और भूगर्भशास्त्र जैसे विषयों के विद्वजनों की एक बैठक बुलाकर चर्चा लंबी चर्चा की गई। इसके बाद शोध और सर्वेक्षण के लिए 11 विद्वानों की एक समिति गठित की गई थी। इसका संयोजक अवधेश प्रसाद पांडे को बनाया गया था, जो पौराणिक शोधों से जुड़े हुए थे।
पौराणिक मान्यता है वनवास के दौरान भगवान राम ने माता सीता और लक्ष्मण जी के साथ चित्रकूट के रास्ते वर्तमान मध्यप्रदेश में प्रवेश किया था। इसके बाद वे अमरकंट होते हुए नर्मदा पार करके रामेश्वरम की ओर चले गए थे। उनका भ्रमण पथ प्रदेश के वर्तमान रीवा, सतना, पन्ना, छतरपुर, शहडोल, अनूपपुर, विदिशा, उज्जैन आदि जिलों में है। राम वन गमन पथ योजना के तहत इन क्षेत्रों में सांस्कृतिक और पर्यटन की दृष्टि से विकास के साथ इनके लिए एक रूट तैयार करना भी था।
संस्कृति विभाग के बजट में आवंटित है राशि
एक हजार रुपये का टोकन बजट शामिल
 दो सालों से दिया जा रहा है टोकन बजट
शासन द्वारा गठित शोध एवं सर्वेक्षण समिति ने मार्च 2009 से दिसंबर 2010 के बीच काम करके रिपोर्ट तैयार की और शासन को सौंप दी। उसके बाद क्या हुआ यह बता पाने की स्थिति में कोई नहीं है। राम वन गमन पथ विकास योजना भले ही ठंडे बस्ते में चली गई हो लेकिन सरकार की फाइलों में योजना आज भी जिंदा है। संस्कृति विभाग के बजट में योजना का जिक्र भी है और इसके लिए टोकन बजट भी आवंटित है। वित्तीय वर्ष 2018-19 के लिए पेश किए गए बजट में मांग संख्या 26 के तहत कला एवं संस्कृति संवर्द्धन शीर्ष के तहत जिन कामों का जिक्र किया गया है उनमें रामपथ विकास भी शामिल है। इस शीर्ष में मद संख्या- 5494–रामपथ विकास के लिए वित्तीय वर्ष 2018-19 में एक हजार रुपए का बजट आवंटन है। इसके पहले वित्तीय वर्ष 2017-18 में भी इसी मद में एक हजार रुपए के बजट का आवंटन किया गया है। इससे स्पष्ट है कि शासन स्तर पर राम पथ विकास का खाता अभी खुला हुआ है।
भाजपा सरकार और संगठन दोनों ने इस योजना को भुला दिया है। यहां तक कि कोई इस योजना का जिक्र तक नहीं करता है। पर्यटन विभाग ने चित्रकूट में जरूर कुछ काम उस समय कराए थे। लेकिन यह दावे के साथ नहीं कहा जा सकता है कि पर्यटन विकास के तहत हुए थे या फिर रामपथ विकास के तहत कराए गए थे। संस्कृति विभाग ने समिति के गठन और उसकी रिपोर्ट आने तक जो सक्रियता दिखाई थी, वह नदारत हो गई। धीरे धीरे प्रदेश की जनता भी भूल गई कि रामभक्त सरकार ने ऐसी कोई योजना बनाई थी। लेकिन हाल में ही विधानसभा चुनाव को लेकर सक्रिय हुई कांग्रेस ने एक बार फिर इस मुद्दे को हवा दे दी है। कांग्रेस का दावा कि वह सत्ता में आने पर रामवन गमन पथ का विकास करेगी। कांग्रेस के दिग्गज नेता बहुत जल्द राम वन गमन पथ यात्रा भी शुरू करने जा रहे हैं। कांग्रेस की यह सियासी चाल शायद प्रदेश में फिर से राम वन गमन पथ के विकास की राह खोल दे।
योजना के तहत काफी काम हुआ है
 राम वन गमन पथ विकास योजना के तहत संस्कृति विभाग को शोध और सर्वेक्षण का काम करना था, वह काम काफी पहले पूरा करके रिपोर्ट सरकार को दे दी गई है। वैसे योजना के तहत काफी काम हुआ है। पर्यटन विभाग ने इसके तहत चित्रकूट, मैहर, उज्जैन, अमरकंटक जैसे कई स्थानों पर काफी काम किया है। संस्कृति विभाग ने टोकन बजट का प्रावधान इसलिए किया गया है कि कभी कई और शोध कार्य होना है तो किया जा सकेगा। -मनोज श्रीवास्तव, अपर मुख्य सचिव, संस्कृति विभाग, मप्र शासन
(लेखिका भोपाल की वरिष्ठ पत्रकार हैं)

बोलने के लिए सही वक्त का इन्तजार करते हुए देर भी हो जाती है

मेंटल हेल्थ प्रोफेशनल का समाज से रिश्ता होता है मगर क्या एक बेहद सुविधाजनक जिंदगी बिताने की जगह अपने अनुभव उपेक्षितों और तस्करी की शिकार महिलाओं को आने लाने पर खर्च कर सकता है? अगर वह महिला हो तो क्या वह इस कदर उनसे प्यार कर सकती है कि वह हर एक युवती और महिला का नाम याद रखे और ऐसा महसूस हो कि ये सभी उसकी जिंदगी का हिस्सा हैं? जब उमा चटर्जी से हमारी मुलाकात हुई तो इन सारे सवालों के जवाब हाँ में मिले। संजोग नामक सामाजिक संस्था के जरिए वे प्रशासन और जीविता (सर्वाइवर) महिलाओं के बीच सम्पर्क बन रही है। साथ ही वे चेंज मंत्रा नामक कंसल्टेंसी फर्म भी साझा तौर पर चलाती हैं। संजोग की सह संस्थापक और चेंज मत्र की सह संचालक उमा चटर्जी से जो बातें कीं, उसी के खास अंश –
मेंटल हेल्थ प्रोफेशनल हूँ और तस्करी के खिलाफ भी काम कर रही हूँ
मैं मेंटल हेल्थ प्रोफेशनल हूँ। साइकोलॉजिस्ट और साइकोलॉजी पढ़ी है। काम तो मैंने 2003 से ही आरम्भ किया था और बतौर साइकोलॉजिकल ट्रेनर बच्चों, युवाओं और बड़ों के साथ काम करती रही हूँ। अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भी काम किया है। हमें हमेशा सिखाया जाता है कि दूसरों को खुश रहकर शांति मिलती है और यह खुश रहने का तरीका है मगर इस वजह से शांति रखने के लिए हम खामोश बैठ जाते हैं। अब तक हर तरह के अनुभव मिले और एक समय के बाद लगा कि बहुत हो गया और अब आवाज उठानी चाहिए और यह मुझे ठोस तरीके से करना होगा। मैंने बहुत सी सामाजिक कार्यकर्ताओं को काम करते देखा है, तस्करी की शिकार लड़कियाँ देखी हैं और उनके साथ काम किया है और हर बार लगा कि सबकी कहानी कहीं न कहीं एक जैसी है।
आज सकारात्मक परिवर्तन हो रहा है
आज स्थिति बदल रही है। आज से 10 साल पहले लड़कियाँ तस्करी और यौन उत्पीड़न के दलदल से निकलती थीं तो उनको कोई अपनाने के लिए तैयार नहीं होता था, परिवार उसे मरा हुआ मान लेता था। आज इन जीविताओं के परिवार खासकर पिता और भाई न सिर्फ उनको अपना रहे हैं बल्कि उनको लड़ने की हिम्मत भी दे रहे हैं। सकारात्मक परिवर्तन हुआ है और लोग जागरूक हो रहे हैं। आज युवा इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं।
तस्करी बिल एक सपना है, एक वचन है
इस बिल से हमें काफी उम्मीदें हैं क्योंकि यह पुनर्वास को अधिकार मानने की बात करता है। सबूत देने की जिम्मेदारी अभियुक्त की है मगर इसे और भी सख्त बनाने की जरूरत है। मानव तस्करी बिल कई सर्वाइवर्स और मानवाधिकार संरक्षकों के लिए एक सपना है। मानसून सत्र में यह लोकसभा में यह पारित हो चुका है। इस साल शीतकालीन सत्र में राज्यसभा में पारित कर इसे कानून बनाकर भारत एक इतिहास बना सकता है। यह वह वचन है जो प्रधानमंत्री ने दिया है। यह वह वचन है कि जिसे भारत को हर प्रकार की तस्करी के खिलाफ और तस्करी के सर्वाइवर्स के साथ मजबूती से खड़ा होने के लिए निभाना है। हमें उम्मीद है कि इस शीतकालीन सत्र में यह बिल पारित हो जाएगा। देखें, क्या होता है।

लैंगिक समानता के लिए काम करता है संजोग
संजोग लैंगिक समानता के साथ स्त्री पुरुष के संबंधों में संतुलन लाने और तस्करी और असमानता के शिकार लोगों के लिए काम कर रहा है। संजोग का मतलब हिन्दी में इक्तेफाक होता है मगर बांग्ला में इसका मतलब जोड़ना होता है। कानूनी तौर पर इसकी शुरुआत 2012 में हुई थी। संजोग में उत्थान नामक लीडरशिप ग्रुप है जो लड़कियों में नया आत्मविश्‍वास और जीने की उम्मीद भरने की कोशिश कर रहा है। हम शोध करते हैं। राज्य की टास्क फोर्स के सदस्य है और केन्द्रीय स्तर पर स्टैंडिंग कमेटी के सदस्य हैं।
सकारात्मक सोच वाले लड़कों को साथ लाना है
लड़कियों को और सशक्त बनाना है। उनका सपोर्ट सिस्टम मजबूत करना है। सच है कि आप किसी के लिए लड़ नहीं सकते इसलिए हम चाहते हैं कि ये लोग अपनी लड़ाई खुद लड़े, हम बस उनको सहयोग करने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। जो लड़के सकारात्मक सोच रखते हैं, हमें उनको साथ लाना है। कोशिश है कि नीति निर्धारकों और समस्या से जूझ रहे लोगों के बीच की खाई दूर की जाए।
बोलने के लिए सही वक्त का इन्तजार करते हुए देर भी हो जाती है
बोलना जरूरी है और इसके लिए सही वक्त का इंतजार करना कतई जरूरी नहीं है क्योंकि चीजों के सही होने का इंतजार करने तक बहुत देर हो चुकी होती है। सब कुछ करीने से सजा हो, यह जरूरी नहीं है। लोग अनगढ़ कहानियाँ भी ध्यान से सुनते हैं।

497 का खत्म होना अपराधी नहीं बनाता मगर बेवफाई का लाइसेंस भी नहीं

गुजरे माह का अंतिम सप्ताह गहमागहमी से भरा रहा। कई फैसले सुप्रीम कोर्ट में ने दिए और कुछ ऐसे फैसले भी दिए जिससे परम्परागत भारतीय समाज हिल गया है। धारा 377 के झटके से अभी लोग उबरे नहीं थे कि धारा 497 को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में स्त्री को सम्पत्ति मानने से इनकार कर दिया मतलब अवैध कहे जाने वाले यानि अडल्टरी के मामले में औरतों को सजा के दायरे में लाने से इनकार कर दिया और अब लोग सीधे इसे शादी, परिवार और समाज की सोच पर हमला करने वाला फैसला बता रहे हैं। देखा जाए तो औरतों को इस कानून के निरस्त हो जाने का लाभ मिलेगा, ऐसा दिखता तो नहीं है बल्कि अडल्टरी के जिस सेफ्टी वॉल्व के हथियार से अब तक वे रिश्ते और परिवार को बचाती आ रही थीं, वह भी टूट जायेगा।
अगर हम यह कहें कि अवैध सम्बन्ध नहीं होते तो यह गलत है, होते हैं मगर समाज और बच्चों के दबाव में एक छत के नीचे अजनबी की तरह रहते हुए भी तमाम उपेक्षाओं के बावजूद जीवन काट लेती हैं। पुरुष मजबूरन आवरण रखता है, छोड़कर जाता है फिर बुढ़ापे में लौट आता है या कई बार दोनों रिश्ते एक साथ निभाकर प्रतिष्ठा के साथ रहता है। 3 -4 पत्नियों की स्वीकृति समाज में है मगर जब बात महिलाओं की आती है तो यह बात गले नहीं उतारी जाती। महिलाओं के ऐसे रिश्ते भी या तो उच्च वर्ग में होते हैं या निम्न मध्यम वर्ग में और यहाँ पर भी ढके – छिपे रहते हैं। कला के क्षेत्र में तो किसी तीसरे का होना प्रेरणा की तरह होता है जिसे सब जानते हैं मगर स्वीकार कर लेते हैं।
पत्नियों को यह भरोसा होता है कि अन्ततः उनका पति उनका ही है इसलिए भी वे खामोशी साध लेती हैं, ये जानते हुए भी उनका पति कई लड़कियों की जिन्दगी बर्बाद कर रहा है, उनको कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उनका घर और परिवार सुरक्षित है। वे लड़कियों से लड़ बैठती हैं मगर अपने पति के खिलाफ जुबान नहीं हिलातीं क्योंकि उनका घर सुरक्षित है, उनका दर्जा सुरक्षित है, वे आर्थिक और सामाजिक रूप से सुरक्षित हैं। कारण यह है कि उच्च वर्ग में ऐसा हुआ तो पत्नियों के नाम अच्छी – खासी सम्पत्ति लिख देते हैं और प्राथमिकता भी अपने बच्चों और परिवार को ही देते हैं मगर वफादारी निभाने के चक्कर में शोषित होती है वह दूसरी औरत और अन्ततः उसे कहीं जगह नहीं मिलती। कभी अन्या से अनन्या पढ़ें तो आपको इस दोहरेपन का वीभत्स चित्रण मिलेगा। अवैध कहे जाने वाले सम्बन्धों को लेकर लिखा खूब गया है। फिल्में भी बनी हैं मगर भारतीय समाज ने उनको स्वीकार नहीं किया। यश चोपड़ा की सिलसिला से लेकर करण जौहर की कभी अलविदा न कहना बुरी तरह पिटी मगर समय बदल रहा है। अच्छा अब कल्पना कीजिए, अगर कानून निरस्त न होता और आपकी इच्छा के अनुसार महिलाओं को भी सजा दी जाने लगती तो क्या आप उनको जीने देते? क्या आप यह दावा कर सकते हैं कि आप उनको हदें नहीं बतातें। अभी भी तो अधिकतर ऐसे मामलों में पत्नी की हत्या करना ही तो आम बात है न, ऐसे में तो यही कहा जा सकता है कि यह एक विरोधाभासी फैसला है मगर आपके रवैये ने इसे न्यायसंगत बना दिया है।
औरतों को औरतों के रूप में देखिए न इन्सान की तरह, अपनी तरह, ये देवी बनाकर अपनी जिम्मेदारियों से पीछा छुड़ाने का कोई मतलब है। कोर्ट ने बस इतना ही कहा है कि औरतें भी आपकी तरह ही इन्सान हैं, सम्पत्ति नहीं जिसके आप मालिक बने बैठे हैं।
सवाल तो एक छोटा सा ही है कि क्या जिस देश को रिश्तों और परम्पराओं के लिए जाना जाता रहा है, वहाँ यह डोर क्या इतनी कमजोर थी कि एक कानून खत्म होने से रिश्ते भी टूट जायेंगे? क्या नैतिकता की यह डोर इतनी कमजोर है, अगर हाँ तो इसे टूट ही जाने दीजिए? दरअसल, आप डरे इसलिए हैं क्योंकि आप शादियाँ ही कई बार इमोशनल ब्लैकमेलिंग करके करवाते रहे हैं कि शादी के बाद सब ठीक हो जाएगा। आपने अपनी शान और इज्जत के नाम पर बेटों की जिन्दगी से प्यार छीना तो बेटियों की पढ़ाई छुड़वाकर दूर ब्याहा तो आपका डरना तो स्वाभाविक है। जिस समाज में रिश्तों को भय और घुटन के बीच ढोया जा रहा है, वहाँ तो कुछ न कुछ टूटेगा और आपको डर है कि अब आपराधिक मामले में फँसा भी नहीं सकते तो आप तो दूसरा तरीका भी आजमाते हैं…सीधे मार डालते हैं। ऑनर किलिंग को लेकर सुप्रीम कोर्ट कितनी बार आपको टोक चुका है, आप बदले? नहीं बदले तो एक 497 के न रहने से क्या फर्क पड़ेगा। आप प्यार छीनकर किसी को भावुकता के जाल में फँसाकर उसे दूसरी जगह अपने स्टेटस के हिसाब से बाँध सकते हैं, प्यार नहीं बना सकते हैं, समझौता करना सिखा सकते हैं। आपने यही किया है सदियों से और इसलिए आप तो डरेंगे ही। भारत में 80 प्रतिशत अडल्टरी के किस्से ऐसे ही खत्म हो जाएंगे अगर अविवाहित लड़कियों या लड़कों को घुमाना भी इसका आधार माना जाए और पति या पत्नी इसे लेकर ईमानदारी से सख्ती बरतें। हमारे देश में बेवफाई का किस्सा भी अजीब होता है या यूँ कहें कि उसकी परिभाषा भी बड़े अजीब तरीके से होती है। अगर बात न्याय की करनी है तो ईमानदारी के साथ विवाहित ही नहीं अविवाहित लड़कियों या लड़कों को घुमाना भी अपराध के दायरे में लाइए…दूसरी औरत या दूसरे पुरुष की जगह एक नजर खुद पर और अपने आदर्श जीवनसाथी पर भी डालिए और हर फैसला ईमानदारी से लीजिए….फिर किसी सेफ्टी वॉल्व की जरूरत नहीं पड़ेगी जैसे अब 497 की नहीं है। यह अपराध का नहीं रहा मगर तलाक का आधार तो अब भी है।  497 का खत्म होना आपको अपराधी नहीं बनाता मगर यह बेवफाई का लाइसेंस भी नहीं है।

हिन्दी में हस्ताक्षर करने की प्रतिज्ञा लें : प्रो० सुनील कुमार ‘सुमन’ 

कोलकाता :  महाराजा श्रीशचंद्र  कॉलेज में हिन्दी दिवस समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रिंसिपल श्यामल भटाचार्य ने कहा कि हिन्दी राष्ट्र भाषा है जो भारत के विभिन्न राज्यों को संपर्क भाषा के रूप में जोड़ने का काम करती है। मुख्य अतिथि महात्मा गाँधी अंतराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉक्टर सुनील कुमार सुमन कहा कि  संविधान निर्माण के समय सबसे ज्यादा बहस राजभाषा के रूप में हिन्दी को लेकर हुई हैं। उन्होंने कहा कि हिन्दी का ज्यादा विकास हिंदीतर भाषियों के द्वारा हुआ है। उन्होंने यह भी कहा कि हिन्दी में रोजगार के विकल्प काफी ज्यादा  हैं। हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ कार्तिक चौधरी ने कहा कि हमारे देश में राष्ट्र-ध्वज, राष्ट्र-गान का जो महत्व है वही महत्व राजभाषा हिन्दी भाषा का है। सिटी कॉलेज के हिन्दी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो संदीप प्रसाद ने अपने वक्तवय में हिन्दी में अन्य भाषाओं से आए हुए शब्दों के प्रयोग में सावधानी बरतने तथा हिन्दी से अन्य भाषाओं से तुलना न कर उसे बढ़ावा देने की बात की। कलकत्ता गर्ल्स कॉलेज  के प्रो  अम्बर चौधरी ने कहा कि हिन्दी सम्मान की भाषा है। हिन्दी दिवस के इस कार्यक्रम में विद्यार्थियों ने स्वरचित नाटक ‘हिन्दी बोल रही है’ का मंचन किया। कार्यक्रम में महाविद्यालय के विभिन्न विभागों के अध्यापकों को सम्मानित एवं विभिन्न प्रतियोगिताओं में सफल विद्यार्थियों को पुरस्कृत किया गया। पूरे कार्यक्रम के आयोजन में विक्रम साव, सुशील सिंह, राहुल चौधरी, उत्तम गुप्ता, श्रुति राय, मेहरून नाज, दीपक सिंह, पूजा सिंह आदि ने प्रमुख भूमिका निभाई।

काँचरापाड़ा हार्नेट इंग्लिश मीडियम स्कूल में मनाया गया हिन्दी दिवस

काँचरापाड़ा : काँचरापाड़ा हार्नेट इंग्लिश मीडियम स्कूल में हिन्दी दिवस मनाया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विद्यालय के प्रधानाचार्य श्यामल कुमार बनर्जी ने कहा कि हिन्दी एक मात्र ऐसी भाषा है जो सम्पूर्ण भारत को एकता के सुत्र में बांधें रखी है। हिन्दी राष्ट्र की गौरव है। इस अवसर पर विद्यालय के छात्रों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए। साथ ही काव्य आवृति तथा भाषण प्रतियोगिता भी आयोजित की गई जिसमें छात्रों ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया जिसमें अद्वीति तिवारी, मुस्कान शर्मा, संचिता, कयनात, शिवांक्षी कुमारी, प्रिया यादव, ऋतु कुमारी, अभिनव कुमार, आयुष कुमार ,कुसुम कुमारी ,प्रियांशु दास प्रमुख रूप से भागीदारी निभाई। शिक्षकों में चमेली पाल, डॉ मधुमिता धोषाल, प्लावनी राय सेनगुप्ता,अर्पिता राय, पिंटू कुमार ठाकुर ने हिन्दी पर अपने विचार रखें तथा हिन्दी के महत्व से बच्चों को अवगत कराया। कार्यक्रम का संचालन धर्मेंद्र राय ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन विद्यालय की उपप्रधानाचार्य ज्योत्षना बनर्जी ने किया।

‘भारतीय भाषाओं के बीच एक सांस्कृतिक पुल है हिन्दी ’

मिदनापुर : विद्यासागर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग की ओर से हिन्दी दिवस के अवसर पर `हिन्दी का राष्ट्रीय संदर्भ’ विषय पर परिचर्चा का आयोजन किया गया । इस कार्यक्रम में सर्वप्रथम साहित्यकार विष्णु खरे के निधन पर एक मिनट का मौन रखकर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई । इस अवसर पर कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विद्यासागर विश्वविद्यालय के कला और वाणिज्य विभाग के संकायाध्यक्ष प्रो. दामोदर मिश्र ने कहा कि हिन्दी अस्मिता की पहचान की भाषा है । ऐसे में समाज और राष्ट्रीय-मूल्यों को बचाने का संकल्प हिन्दी  से जुड़ा है । हमें मिलकर सभी भारतीय भाषाओं को बचाना होगा । डॉ. श्रीकांत द्विवेदी ने कहा कि हिन्दी का सहज होना उसे ज्यादा व्यापकत्व प्रदान करता है, हमें हिन्दी को ज्यादा से ज्यादा लोगों के चिंतन और सृजन का हिस्सा बनाना होगा । शोधार्थी दीपनारायण ने कहा कि हिन्दी के अधिकाधिक प्रयोग से ही पूरे देश में एक सेतु का निर्माण होगा । अमित राय ने कहा कि हिंदी पूरे देश से संवाद स्थापित करते हुए सबको साथ लेकर चलने का आह्वान करती है । मधुलिका कुमारी ने कहा कि हिन्दी जुबान की गुलामी का माध्यम बन रही है । इस अवसर पर अभिलक्ष्य आनंद, प्रियंका गुप्ता, विनय प्रसाद, रीता जायसवाल, रुखसार परवीन, पूनम गुप्ता ने अपने विचार रखे । इस अवसर पर आयोजित आशुभाषण में प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय स्थान क्रमशः पूनम गुप्ता, श्रद्धा उपाध्याय एवं टीना परवीन को मिला । साहित्य प्रश्नोत्तरी में प्रथम स्थान मधु सिंह, रेशमी वर्मा, श्रद्धा के दल को, द्वितीय स्थान पूनम गुप्ता, अनिल शाह, सलोनी शर्मा के दल को तथा तृतीय स्थान अभिलक्ष्य आनंद, धनंजय प्रसाद, शारदा महतो के दल को मिला । एम. फिल की छात्रा रेशमी वर्मा ने कविता पर नृत्य प्रस्तुत किया । विभाग के विद्यार्थियों ने कविता पर सुंदर आवृत्ति प्रस्तुत की । मधु सिंह, पूनम गुप्ता, शारदा महतो, सलोनी शर्मा, विनय प्रसाद, श्रद्धा उपाध्याय, बिट्टू कौर ने अपनी स्वरचित कविताओं का पाठ किया ।
कार्यक्रम का सफल संचालन करते हुए विभागाध्यक्ष संजय जायसवाल ने कहा कि हिन्दी ने नवजागरण-काल में पूरे भारत को एकता के सूत्र में बांधा । हिन्दी पूरे देश में आभिभावक की भूमिका में है, जो सभी भारतीय भाषाओं को साथ लेकर चलने के संकल्प के साथ अपना विस्तार कर रही है । धन्यवाद ज्ञापन अमित राय ने दिया ।