Monday, April 20, 2026
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ब्रिक्स देश बनाएंगे काॅमन ऐप, 5 देशों में होगा भुगतान

मॉस्को : ब्रिक्स के पांचों देश (भारत, चीन, ब्राजील, रूस और दक्षिण अफ्रीका) अपने यहां एक नए पेमेंट सिस्टम पर काम कर रहे हैं। रूसी मीडिया ने इस बारे में जानकारी दी है। इस पेमेंट सिस्टम को ब्रिक्स पे कहा जा रहा है। इसके तहत एक ही कार्ड से पांचों देशों में भुगतान हो सकेगा। पश्चिमी देशों पर निर्भरता कम करने के लिए यह व्यवस्था लाई जा रही है।
स्पेशल ऑनलाइन वॉलेट बनाया जाएगा
नए पेमेंट सिस्टम के तहत ब्रिक्स सदस्य देशों में एक ऑनलाइन वॉलेट बनाया जाएगा। रूस का वेल्थ फंड डिपार्टमेंट भारत और चीन के साथ मिलकर यह काम कर रहा है। बताया जा रहा है कि ब्रिक्स पे, एपल पे और सैमसंग पे की तरह काम करेगा। इसके तहत यूजर्स मोबाइल ऐप के जरिए भुगतान कर सकेंगे। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि यूजर के खाते से कौन सी करंसी जुड़ी हुई है। सिस्टम ठीक से काम करे, इसके लिए ब्रिक्स देशों के नेशनल पेमेंट सिस्टम को एक खास क्लाउट प्लेटफॉर्म से जोड़ा जाएगा। पेमेंट सिस्टम के पायलट वर्जन की टेस्टिंग अप्रैल में दक्षिण अफ्रीका में होगी। रशियन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट फंड के वाइस प्रेसिडेंट के मुताबिक, ब्रिक्स का खुद का पेमेंट सिस्टम होने के बाद हमारी ट्रांजिशनल पेमेंट ऑर्गनाइजेशंस पर निर्भरता काफी कम हो जाएगी।
ब्रिक्स देशों के सेंट्रल बैंक, शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन (एससीओ), रूस की अगुआई वाला यूरेशियन इकोनॉमिक यूनियन (ईईयू) भी एक ज्वाइंट पेमेंट सिस्टम बनाने पर काम कर रहें हैं। दक्षिण अफ्रीका का छोड़कर सभी ब्रिक्स देशों का अपना नेशनल पेमेंट सिस्टम है। इसमें भारत का रूपे, चीन का यूनियन पे, ब्राजील का ईएलओ और रूस का मीर पेमेंट सिस्टम है।

पहलवान बजरंग पूनिया ने जीता स्वर्ण, विंग कमांडर अभिनंदन को किया समर्पित

रूसे (बुल्गारिया): भारतीय पहलवान बजरंग पूनिया और पूजा ढांडा ने यहां डेन कोलोव-निकोला पेट्रोव इंटरनेशनल रैंकिंग सीरीज में अपने-अपने भार वर्ग में गोल्ड मेडल जीत लिए. बजरंग ने शनिवार रात पुरुषों के 65 किग्रा फ्रीस्टाइल वर्ग के फाइनल में अमेरिका के जॉर्डन माइकल ओलिवर को शिकस्त देकर गोल्ड मेडल अपने नाम किया. बजरंग पहले 0-3 पीछे चल रहे थे, लेकिन फिर इसके बाद उन्होंने लगातार 12 अंक लेकर चैम्पियन बनने का गौरव हासिल कर लिया. बजरंग ने इस जीत के बाद कहा, “मैं यह पदक विंग कमांडर अभिनंदन वर्धमान को समर्पित करता हूं. उन्होंने मुझे बहुत प्रभावित किया है. मैं उनसे मिलना चाहूंगा और उनसे हाथ मिलाना चाहूंगा.”
मैं अपना स्वर्ण पदक हमारे बहादुर वायु योद्धा #WingCommandorAbhinandan को समर्पित करना चाहता हूं। उन्होंने मुझे बहुत प्रेरणा दी और मुझमें जोश भर दिया। मैं किसी दिन उनसे मिलकर उनसे हाथ मिलाना चाहता हूं।
साक्षी को 65 किग्रा के फाइनल में स्वीडन की हेना जोहानसन से 3-8 से हार का सामना करना पड़ा. साक्षी ने सेमीफाइनल में वल्र्ड चैम्पियन पेट्रा ओली को हराया था। 59 किग्रा फ्रीस्टाइल वर्ग में विश्व चैम्पियनशिप-2018 की ब्रॉन्ज मेडल विजेता पूजा ने राउंड रोबिन फॉर्मेट में कोई मैच नहीं गंवाया और गोल्ड मेडल जीता. वे तीनों मैच जीतने में सफल रहीं। पूजा ने हमवतन सरिता मोर, लिथुआनिया की कोरनेलिजा जैयसेवेयूटे और किर्गिस्तान की एसुलु टिनबेकोवा को मात दी।

विंग कमांडर अभिनंदन जैसी मूंछें रख रहे हैं लोग

बेंगलुरू : अभिनंदन की मूंछ का स्टाइल मशहूर हो रहा है। बेंगलुरू में एक युवक ने विंग कमांडर के मूंछ की तरह अपना भी मूंछ रख ली है। पाकिस्तान की कैद में साठ घंटे बिताकर भारत लौटे वायुसेना के विंग कमांडर अभिनंदन वर्तमान की वीरता से देश के लोग काफी प्रभावित हैं। अभी तक आपने किसी के हेयर स्टाइल को लोकप्रिय होते सुना होगा लेकिन अब अभिनंदन की मूंछ भी मशहूर हो रही है। बेंगलुरू में एक युवक ने विंग कमांडर के मूंछ की तरह अपनी भी मूंछ रख ली है। बेंगलुरू में एक स्थानीय नागरिक मुहम्मद चांद ने बताया कि वह विंग कमांडर अभिनंदन वर्तमान का फैन(fan) है, हम उन्हें फॉलो कर रहे हैं। मुहम्मद चांद ने कहा कि हमें उनकी मूंछ की स्टाइल पसंद और वह रीयल में हीरों हैं। मैं काफी खुश हूं।

अद्भुत हैं कैलाश पर्वत के ये रहस्य

भगवान शंकर के निवास स्थान कैलाश पर्वत के पास स्थित है कैलाश मानसरोवर। यह अद्भुत स्थान रहस्यों से भरा है। शिवपुराण, स्कंद पुराण, मत्स्य पुराण आदि में कैलाश खंड नाम से अलग ही अध्याय है, जहाँ इसकी महिमा का गुणगान किया गया है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इसी के पास कुबेर की नगरी है। यहीं से महाविष्णु के कर-कमलों से निकलकर गंगा कैलाश पर्वत की चोटी पर गिरती है, जहां प्रभु शिव उन्हें अपनी जटाओं में भर धरती में निर्मल धारा के रूप में प्रवाहित करते हैं। कैलाश पर्वत के ऊपर स्वर्ग और नीचे मृत्यलोक है। जानते हैं इसके 12 रहस्य –
1.धरती का केंद्र : धरती के एक ओर उत्तरी ध्रुव है, तो दूसरी ओर दक्षिणी ध्रुव। दोनों के बीचोबीच स्थित है हिमालय। हिमालय का केंद्र है कैलाश पर्वत। वैज्ञानिकों के अनुसार यह धरती का केंद्र है। कैलाश पर्वत दुनिया के 4 मुख्य धर्मों- हिन्दू, जैन, बौद्ध और सिख धर्म का केंद्र है।
2.अलौकिक शक्ति का केंद्र : यह एक ऐसा भी केंद्र है जिसे एक्सिस मुंडी (Axis Mundi) कहा जाता है। एक्सिस मुंडी अर्थात दुनिया की नाभि या आकाशीय ध्रुव और भौगोलिक ध्रुव का केंद्र। यह आकाश और पृथ्वी के बीच संबंध का एक बिंदु है, जहां दसों दिशाएं मिल जाती हैं। रशिया के वैज्ञानिकों के अनुसार एक्सिस मुंडी वह स्थान है, जहां अलौकिक शक्ति का प्रवाह होता है और आप उन शक्तियों के साथ संपर्क कर सकते हैं।
3.पिरामिडनुमा है यह पर्वत : कैलाश पर्वत एक विशालकाय पिरामिड है, जो 100 छोटे पिरामिडों का केंद्र है। कैलाश पर्वत की संरचना कम्पास के 4 दिक् बिंदुओं के समान है और एकांत स्थान पर स्थित है, जहां कोई भी बड़ा पर्वत नहीं है।
4. शिखर पर कोई नहीं चढ़ सकता : कैलाश पर्वत पर चढ़ना निषिद्ध है, परंतु 11वीं सदी में एक तिब्बती बौद्ध योगी मिलारेपा ने इस पर चढ़ाई की थी। रशिया के वैज्ञानिकों की यह रिपोर्ट ‘यूएनस्पेशियल’ मैग्जीन के 2004 के जनवरी अंक में प्रकाशित हुई थी। हालांकि मिलारेपा ने इस बारे में कभी कुछ नहीं कहा इसलिए यह भी एक रहस्य है।
5. दो रहस्यमयी सरोवरों का रहस्य : यहां 2 सरोवर मुख्य हैं- पहला, मानसरोवर जो दुनिया की शुद्ध पानी की उच्चतम झीलों में से एक है और जिसका आकार सूर्य के समान है। दूसरा, राक्षस नामक झील, जो दुनिया की खारे पानी की उच्चतम झीलों में से एक है और जिसका आकार चन्द्र के समान है। ये दोनों झीलें सौर और चन्द्र बल को प्रदर्शित करती हैं जिसका संबंध सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा से है। जब दक्षिण से देखते हैं तो एक स्वस्तिक चिह्न वास्तव में देखा जा सकता है। यह अभी तक रहस्य है कि ये झीलें प्राकृतिक तौर पर निर्मित हुईं या कि ऐसा इन्हें बनाया गया?
6.यहीं से क्यों सभी नदियों का उद्गम : इस पर्वत की कैलाश पर्वत की 4 दिशाओं से 4 नदियों का उद्गम हुआ है- ब्रह्मपुत्र, सिन्धु, सतलज व करनाली। इन नदियों से ही गंगा, सरस्वती सहित चीन की अन्य नदियां भी निकली हैं। कैलाश की चारों दिशाओं में विभिन्न जानवरों के मुख हैं जिसमें से नदियों का उद्गम होता है। पूर्व में अश्वमुख है, पश्चिम में हाथी का मुख है, उत्तर में सिंह का मुख है, दक्षिण में मोर का मुख है।


7.सिर्फ पुण्यात्माएं ही निवास कर सकती हैं : यहां पुण्यात्माएं ही रह सकती हैं। कैलाश पर्वत और उसके आसपास के वातावरण पर अध्ययन कर चुके रशिया के वैज्ञानिकों ने जब तिब्बत के मंदिरों में धर्मगुरुओं से मुलाकात की तो उन्होंने बताया कि कैलाश पर्वत के चारों ओर एक अलौकिक शक्ति का प्रवाह है जिसमें तपस्वी आज भी आध्यात्मिक गुरुओं के साथ टेलीपैथिक संपर्क करते हैं।
9.येति मानव का रहस्य : हिमालयवासियों का कहना है कि हिमालय पर यति मानव रहता है। कोई इसे भूरा भालू कहता है, कोई जंगली मानव तो कोई हिम मानव। यह धारणा प्रचलित है कि यह लोगों को मारकर खा जाता है। कुछ वैज्ञानिक इसे निंडरथल मानव मानते हैं। विश्वभर में करीब 30 से ज्यादा वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि हिमालय के बर्फीले इलाकों में हिम मानव मौजूद हैं।
10. कस्तूरी मृग का रहस्य : दुनिया का सबसे दुर्लभ मृग है कस्तूरी मृग। यह हिरण उत्तर पाकिस्तान, उत्तर भारत, चीन, तिब्बत, साइबेरिया, मंगोलिया में ही पाया जाता है। इस मृग की कस्तूरी बहुत ही सुगंधित और औषधीय गुणों से युक्त होती है, जो उसके शरीर के पिछले हिस्से की ग्रंथि में एक पदार्थ के रूप में होती है। कस्तूरी मृग की कस्तूरी दुनिया में सबसे महंगे पशु उत्पादों में से एक है।
11. डमरू और ओम की आवाज : यदि आप कैलाश पर्वत या मानसरोवर झील के क्षेत्र में जाएंगे, तो आपको निरंतर एक आवाज सुनाई देगी, जैसे कि कहीं आसपास में एरोप्लेन उड़ रहा हो। लेकिन ध्यान से सुनने पर यह आवाज ‘डमरू’ या ‘ॐ’ की ध्वनि जैसी होती है। वैज्ञानिक कहते हैं कि हो सकता है कि यह आवाज बर्फ के पिघलने की हो। यह भी हो सकता है कि प्रकाश और ध्वनि के बीच इस तरह का समागम होता है कि यहां से ‘ॐ’ की आवाजें सुनाई देती हैं।
12. आसमान में प्रकाश का चमकना : दावा किया जाता है कि कई बार कैलाश पर्वत पर 7 तरह की लाइटें आसमान में चमकती हुई देखी गई हैं। नासा के वैज्ञानिकों का ऐसा मानना है कि हो सकता है कि ऐसा यहां के चुम्बकीय बल के कारण होता हो। यहां का चुम्बकीय बल आसमान से मिलकर कई बार इस तरह की चीजों का निर्माण कर सकता है।

(साभार – वेबदुनिया पर प्रकाशित अनिरुद्ध जोशी का आलेख)

जहाँ शिव-पार्वती की मूर्तियों से आती है ठंडी हवा

बाहर की चिलचिलाती गर्मी से जैसे ही आप मंदिर के अंदर प्रवेश करेंगे तो आपको एकदम ठंडक का एहसास होगा। ओडिशा के टिटलागढ़ का शिव-पार्वती मंदिर एक चमत्कारिक मंदिर है। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि ओड़िशा एक गर्म राज्य है। इसके बावजूद टिटलागढ़ काफी ठंडा रहता है। देशभर में जैसे-जैसे गर्मी बढ़ती जाती है, यह जगह ठंडी होती जाती है।
यह जगह ओडिशा के बालांगीर जिले के टिटलागढ़ में मौजूद है। लोगों का कहना है कि शिव-पार्वती का यह मंदिर काफी चमत्कारी है। यहां कुम्हड़ा पहाड़ की पथरीली चट्टानों के कारण तापमान बहुत ज्यादा रहता है। इस पहाड़ की ऊंचाई पर तापमान 55 डिग्री तक पहुंचता है। इतनी गर्मी पड़ने के बावजूद कुम्हड़ा पहाड़ के एक हिस्से में बना यह मंदिर और उसके आस-पास की कुछ जगह बेहद ठंडा रहती है।


बाहर की चिलचिलाती गर्मी से जैसे ही आप मंदिर के अंदर प्रवेश करेंगे तो आपको एकदम ठंडक का एहसास होगा, जबकि यहां कोई एसी या कूलर नहीं लगा है। बाहर जितनी गर्मी होती है अंदर उतना ही ज्यादा ठंडा रहता है। इस चमत्कारिक मंदिर में भगवान शिव और मां पार्वती की मूर्ति है। ऐसा माना जाता है कि इन मूर्तियों से ही ठंडी हवा आती है, जो यहां के वातावरण को गर्म नहीं होने देती हैं।
कम्बल ओढ़ कर बैठते हैं पुजारी
यहां के लोग बताते हैं कि, जब मंदिर के दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं तो इन हवाओं से अंदर बहुत ठंडक हो जाती है। कई बार यहां इतनी ठंड बढ़ जाती है कि पुजारियों को कम्बल ओढ़ना पड़ता है। वहीं, मंदिर के बाहर इतनी गर्मी होती है कि 5 मिनट में आप पसीने से पूरी तरह तर हो जाएं और हो सकता है कि लू लग जाए।
3000 साल पुराना है मंदिर
मंदिर के पुजारी पं. सुमन पाढ़ी बताते हैं कि यह मंदिर करीब 3000 साल पुराना है। चट्टान के ऊपर पहले एक छोटी-सी जगह में शिव-पार्वती की प्रतिमाएं थीं। तब लोगों को लेटकर भीतर जाना पड़ता था। बाद में चट्टान के नीचे के हिस्से को काटकर गुफानुमा मंदिर बनाया गया। इस पहाड़ के ऊपर एक पुरानी बावड़ी भी है जो अब पूरी तरह से सूख चुकी है।
(साभार- नयी दुनिया)

चलना हमारा काम है

शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

गति प्रबल पैरों में भरी
फिर क्यों रहूं दर दर खडा
जब आज मेरे सामने
है रास्ता इतना पडा
जब तक न मंजिल पा सकूँ,
तब तक मुझे न विराम है,
चलना हमारा काम है।

कुछ कह लिया, कुछ सुन लिया
कुछ बोझ अपना बँट गया
अच्छा हुआ, तुम मिल गई
कुछ रास्ता ही कट गया
क्या राह में परिचय कहूँ,
राही हमारा नाम है,
चलना हमारा काम है।

जीवन अपूर्ण लिए हुए
पाता कभी खोता कभी
आशा निराशा से घिरा,
हँसता कभी रोता कभी
गति-मति न हो अवरूद्ध,
इसका ध्यान आठो याम है,
चलना हमारा काम है।

इस विशद विश्व-प्रहार में
किसको नहीं बहना पडा
सुख-दुख हमारी ही तरह,
किसको नहीं सहना पडा
फिर व्यर्थ क्यों कहता फिरूँ,
मुझ पर विधाता वाम है,
चलना हमारा काम है।

मैं पूर्णता की खोज में
दर-दर भटकता ही रहा
प्रत्येक पग पर कुछ न कुछ
रोडा अटकता ही रहा
निराशा क्यों मुझे?
जीवन इसी का नाम है,
चलना हमारा काम है।

साथ में चलते रहे
कुछ बीच ही से फिर गए
गति न जीवन की रूकी
जो गिर गए सो गिर गए
रहे हर दम,
उसी की सफलता अभिराम है,
चलना हमारा काम है।

फकत यह जानता
जो मिट गया वह जी गया
मूंदकर पलकें सहज
दो घूँट हँसकर पी गया
सुधा-मिक्ष्रित गरल,
वह साकिया का जाम है,
चलना हमारा काम है।

आतंक के खिलाफ है हमारे देश की जंग, पाक की जनता और मीडिया भी साथ आए

यह समय बहुत नाजुक और बहुत हद तक निर्णायक है। आतंक के खिलाफ एक निर्णायक लड़ाई की शुरुआत है। आज का दिन खास है क्योंकि हमारे अभिनन्दन लौट रहे हैं। पुलवामा के बाद भारतीय वायु सेना ने जो पराक्रम दिखाया, वह हमारे लिए गर्व का विषय है मगर इसके साथ ही हमें सजग रहने की भी जरूरत है। 350 आतंकी मार गिराए गए हैं मगर सबसे ज्यादा जरूरी है कि आतंक की जड़ें जहाँ हैं, उनको खोज निकाला जाए और खत्म किया जाए। इस काम में अब पाकिस्तान की जनता को मदद करनी होगी, पाक मीडिया को आगे आने होगा। अब शुक्रगुजार हैं कि अभिनन्दन के मामले में उन्होंने अपनी सरकार पर दबाव बनाया मगर शांति प्रक्रिया तब तक पूरी नहीं हो सकती जब तक आपकी सरकार और सेना आतंकवाद को अपना प्रश्रय देना बंद नहीं करती। अगर आप यह कदम पहले उठाते तो शायद हमारे रिश्ते इतने तल्ख नहीं होते और न ही दोनों देशों के इतने जवान शहीद होते। अब जरूरी है कि पाकिस्तान की जनता भी अपना हस्तक्षेप जारी रखे। एक जंग हम लड़ रहे हैं, अपने मुल्क दहशतगर्दी को रोकने के लिए आप भी कदम बढ़ाइए। हमने आतंकी ठिकानों पर हमला बोला, पाक ने हमारे सैन्य ठिकानों पर हमला किया। युद्ध की तरह पत्रकारिता के भी कुछ मूल्य होते हैं। भारत ने कभी युद्ध नहीं चाहा,इस बार भी नहीं चाहता मगर जब आपके जवानों की जान निरन्तर जाती रहे, आतंकी हमले होते रहें, बातचीत के बावजूद आतंकियों को पनाह दी जाती रहे तो एक सशक्त राजनीतिक हस्तक्षेप जरूरी होता है। अगर ऐसा न किया जाए तो न सिर्फ आपका दुश्मन आपको हल्के में लेने लगता है बल्कि सेना का मनोबल भी टूटता है। आखिर ये जवान किसके लिए अपनी जान दाँव पर लगा रहे हैं, हमारे और आपके लिए, तो जरूरी है कि एक बार उनके बारे में सोचा जाए।
पाक सेना की जिद और गुरूर का नतीजा पाकिस्तान की आम जनता को झेलना पड़ रहा है। अभी पाक सेना शांति की बात कर रही है मगर इस स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन है? पाक सरकार और सेना, दोनों से यह प्रश्न है कि आपने हाफिज सईद, मसूद अजहर और दाउद जैसे न जाने कितने दहशतगर्दों को पनाह दी, उससे आपको हासिल क्या हुआ? क्या वे आपके लिए इतने महत्वपूर्ण हैं कि आप अपनी जनता की जरूरतों को भी भूल जाएं? इमरान खान खुद खेल की दुनिया में रह चुके हैं, वह खुद जानते हैं कि भारत में उनके खेल के कितने प्रशंसक हैं,फिर वह उसी खतरनाक रास्ते पर क्यों चल रहे हैं? ये कैसी मैत्री है कि एक तरफ आप ऐटम बम गिराने की धमकी दे रहे हैं और दूसरी तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा रहे हैं और दूसरी तरफ हमारी सीमा पर गोली और बम चलवा रहे हैं। आखिर आप पर कैसे भरोसा किया जाए जबकि आपने हर बार धोखा ही दिया है। कभी कन्धार, कभी संसद हमला, कभी 26 नवम्बर, कभी उड़ी, कभी पठानकोठ और अब पुलवामा। पहले खुद को इस लायक तो बनाइए कि आप पर विश्वास करने की वजह बने। हमारा देश शांति का देश है, युद्ध नहीं चाहते हम मगर आपको भी यह सुनिश्चित करना होगा कि आप अपने देश और जनता की खुशहाली चुनते हैं या उन आतंकियों को, जो आज आपके मुल्क की दुर्दशा का कारण बन रहे हैं। इमरान खान तय करें कि उनकी जवाबदेही अपनी जनता के प्रति है कि मसूद अजहर और हाफिज जैसे आतंकियों के प्रति..जब तक इस सवाल का जवाब हमारा पड़ोसी मुल्क नहीं खोज लेता और सही उत्तर नहीं खोज लेता…वह कभी आगे नहीं बढ़ सकता। इतिहास को एक अच्छी दिशा में मोड़ना इस वक्त इमरान खान के हाथ में है।
एक सवाल हमारे देश में बैठे पाक परस्त लेखकों, बुद्धिजीवियों और पत्रकारों से है कि आखिर राष्ट्र से प्रेम करना अन्ध भक्ति कैसी हो सकती है? आखिर आपको मानवता और शांति जैसे शब्द आतंकियों, अलगाववादियों के मरने पर ही क्यों याद आते हैं? वायु सेना की एयर स्ट्राइक के बाद इनके चेहरे पर किसी प्रकार की खुशी नहीं दिखी बल्कि वे सवाल ही उठाते रहे?
हमारे अनुभव यही कहते हैं कि पााकिस्तान पर भरोसा नहीं किया जा सकता। इस समय ठहरकर सभी को यह सोचने की जरूरत है कि कहीं आपसी और निजी हित राष्ट्रहित पर भारी तो नहीं पड़ रहे? इसका सबूत है कि रक्षा मंत्रालय और सेना के अनुरोध के बावजूद सोशल मीडिया पर धड़ल्ले से विंग कमाण्डर की तस्वीरें शेयर की जाती रहीं। देश हित में कम, अपने मत स्थापित करने के लिए बातें की जा रहीं। जिन बातों को गोपनीय रखना था, वे सब अखबारों में छापे गए और थोड़े दिन की शांति के बाद विपक्ष ने हमला बोल दिया। हम मानते हैं कि लोकतन्त्र में प्रश्न करने का अधिकार सभी को है मगर यह भी सच है कि यह समय हमारे साथ खड़े रहने का है, एक दूसरे पर उँगली उठाने के लिए भी हमारा सुरक्षित होना जरूरी है। इस पूरे प्रकरण में महिला सशक्तीकरण का नया रूप दिखा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अतिरिक्त विदेश मंत्री सुषमा स्वराज तथा रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण ने जिस तरीके से स्थिति सम्भाली, वह महिला सशक्तीकरण की नयी परिभाषा रचती है। हमें इसी परिभाषा की जरूरत है। बहरहाल हमारे देश में कुछ दिन में ही चुनाव घोषित होने जा रहे हैं। एक सजग नागरिक बनकर सही फैसला लेने की बारी आपकी है।

फोटोग्राफी की भाषा एक ही होती है मगर वह हजार शब्दों को पहुँचाती है

फोटोग्राफ्री की दुनिया में काम करना बेहद चुनौतीपूर्ण है और फोटो पत्रकारिता तो और भी चुनौतीपूर्ण क्योंकि इसमें एक पल की देर भी सारी मेहनत पर पानी फेर सकती है। फोटो पत्रकारिता अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है क्योंकि एक तस्वीर सारी कहानी बयां कर सकती है। इसके बावजूद इस पुरुष प्रधान क्षेत्र में महिला फोटो पत्रकारों की तादाद लम्बे अरसे से कम रही है और आज भी महिलाओं के लिए काम करना इतना आसान नहीं है। ऐसी चुनौतीपूर्ण स्थिति में 20 साल से फोटो पत्रकारिता के क्षेत्र में अपना लोहा मनवा रही हैं सुचेता दास। कई देश – विदेश के महत्पूर्ण मीडिया समूहों तथा समाचार एजेंसियों में काम कर चुकीं सुचेता की छायाचित्र प्रदर्शनी कई देशों में लग चुकी है मगर वे महज फोटो पत्रकार ही नहीं हैं बल्कि नयी पीढ़ी की राह को आसान करने के लिए वे अपना संस्थान ’इमेजेस रिडिफाइन्ड फोटोग्राफी इंस्टीट्यूट’ चला रही हैं। जुझारू फोटो पत्रकार व अध्यापक के रूप में एक सशक्त छाप छोड़ने वाली सुचेता दास के अनुभव जानते हैं –

मुझे बचपन से ही फोटोग्राफर बनना था
मेरे पिता शौकिया तौर पर फोटोग्राफी करते थे। वह तब मेरी तस्वीरें उतारतें। हमारे घर में बहुत से अखबार आते थे और उनमें बहुत सी तस्वीरें छपती थीं तब मुझे लगता था कि एक दिन मैं भी उनकी तरह तस्वीरें खीचूँगी और वह ऐसे ही अखबार में छपेगी। पहली बार सातवीं कक्षा में थी जब उन्होंने बनारस में पहली बार बंदरों की तस्वीरें खींची थी। छुट्टी होती थी तो पिता मुझे ऐसी जगहों पर ले जाया करते जहाँ बहुत सी तस्वीरें खींची जाती थीं। अगर मैं स्कूल के कार्यक्रमों में खींची गयी तस्वीरों को भी याद करूँ तो तस्वीरें खींचते ही मुझे लगभग 27 साल हो गए मगर प्रोफेशनल फोटोग्राफी मैं पिछले 21 साल से कर रही हूँ।

शुरुआत आसान नहीं थी
शुरुआती दिन इतने आसान नहीं थे। मेरे पिता मुझे प्रोफेसर बनाना चाहते थे और मैंने कलकत्ता विश्‍वविद्यालय से ज्योग्राफी ऑनर्स की पढ़ाई पूरी भी की मगर तब भी पढ़ाई के साथ ही फ्रीलॉसिंग करती रही। स्नातक की पढ़ाई के बाद, मेरा नाम एम एस सी के लिए सीयू के साथ जेयू की मेधातालिका में भी आ गया था मगर तब तक मैंने फोटोग्राफी पर ही खुद को केन्द्रित करने का फैसला कर लिया था और इस फैसले ने पापा को थोड़़ा नाराज कर दिया था। तब शुरुआत करना आसान नहीं था क्योंकि मेरे समय में आज की तरह फोटोग्राफी सिखाने के लिए कोई संस्थान नहीं था। इंटरनेट की सुविधा का तो प्रश्न ही नहीं उठता था। और जहाँ भी जाती लोग सिफारिश माँगते थे और पूछा जाता था कि ‘किसने भेजा है या फिर शाम को मैं क्या कर रही हूँ?’ कई बार ऐसा भी हुआ कि मेरी तस्वीरों की तारीफें की गयी मगर सवाल का जवाब से असन्तुष्ट होने पर उनको खारिज भी कर दिया गया। ऐसी स्थिति में टाइम्स ऑफ इंडिया के स्थानीय सम्पादक उत्तम दा ही थे जिन्होंने मेरे काम को सराहा और प्रोत्साहन भी दिया।

महिलाओं के लिए काम करना तब भी आसान नहीं था और अब भी आसान नहीं है
महिलाओं के लिए काम करना तब भी आसान नहीं था और अब भी आसान नहीं है। तब आज की तरह इंटरनेट नहीं था इसलिए शोध करना हो या कुछ खोजना कहीं अधिक कठिन था और मेहनत अधिक करनी पड़ती थी। अच्छा काम करने पर भी पुरुषों की तुलना में महिलाओं को अवसर और सुविधाएं कम मिलती थीं क्योंकि मान लिया जाता है कि पुरुषों का काम कहीं अधिक बेहतर है। अगर मैं अपनी बात करूँ तो मैंने कभी किसी नियोक्ता को किसी काम या असाइन्मेंट के लिए मना नहीं किया और सुविधाएं भी अधिक नहीं लीं। असाइनमेंट के दौरान भी बहुत से हार्ड न्यूज यानी गम्भीर खबरें कवर कीं, पत्रकारिता के दौरान पुलिस लाठीचार्ज, खदान विस्फोट और आग जैसे हादसों को कवर करते समय में कई बार चोट लगी,घायल भी हुई।

अब तक 62 राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुकी हूँ
मेरी ली गयी तस्वीरें ‘टाइम्स’, ‘वॉशिंग्टन पोस्ट’, ‘लंदन टाइम्स’, ‘नेशनल ज्योग्राफिक वेब पेज’, ‘न्यूज वीक’, ‘न्यूयार्क टाइम्स’ जैसी कई समाचार पत्रों तथा मीडिया में प्रकाशित हो चुकी हैं। ‘राइटर्स इंटरनेशनल न्यूज एजेंसी’, ‘गल्फ न्यूज (दुबई)’ से लेकर ‘एसोसिएटेड प्रेस’ से लेकर कोलकाता के मशहूर समाचार पत्रों के लिए काम किया है। अब तक 62 राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय अवार्ड जीत चुकी हूँ जिनमें ‘वर्ल्ड प्रेस अवार्ड’, ‘गोल्डन आई अवार्ड,’ ‘ह्यूमैनिटी फोटो अवार्ड’, नेशनल ज्योग्राफी अवार्ड मास्टर कप’ योनहॉप इंटरनेशनल प्रेस फोटो अवार्ड, लेकर भारतीय विदेश मंत्रालय द्वारा ‘नेशनल नेशनल मीडिया ग्रांट (2 बार), नेशनल प्रेस फोटो अवार्ड (तीन श्रेणियों में) जैसे कई सारे अवार्ड शामिल हैं। ब्रिटेन में 2012 वर्ल्ड फोटोग्राफिक क्लब में मेरी तस्वीरों को लेकर 2011 का सर्वश्रेष्ठ फोटोग्राफर चुना गया। दक्षिण एशिया की सबसे अधिक बिकने वाली पत्रिका बेटर फोटोग्राफी में भारत की फोटो पत्रकार के रूप में चुना गया। 2012 में इंडियन नामक पुस्तक भी प्रकाशित हुई है और संस्कृति मंत्रालय के कैलेंडर के लिए भी मेरी तस्वीरें इस्तेमाल की गयी हैं। इस समय में अपना समय मानव कल्याण से जुड़ी परियोजनाओं और विकासशील देशों के सामाजिक विकास में लगा रही हूँ।

नयी पीढ़ी के लिए रास्ते आसान करना चाहती हूँ
हमारे समय में कोई संस्थान नहीं था, मार्गदर्शक नहीं था और जब इमेजेस रिडिफाइंड शुरू किया तो सोच यही थी कि नयी पीढ़ी के लिए रास्ते आसान बना सकूँ। फटोग्राङ्गी में डेढ़ साल का डिप्लोमा देने वाला हमारा संस्थान एकमात्र संस्थान है। इमेजेस रि़डिफाइन्ड भारत का एकमात्र संस्थान है जहाँ विद्यार्थी 1 साल से 6 महीने का डिप्लोमा फोटो पत्रकारिता में पाते हैं। संस्थान शुरू करने के बाद अब फोटो पत्रकारिता के लिए वक्त कम मिलता है अब मैं जरूरतमंदो वंचितों के लिए काम करना चाहती हूँ और इसका असर भी पड़ता है। मेरे विद्यार्थी मशहूर मीडिया संस्थानों में काम कर रहे हैं।

कुछ लोगों को देखकर समूचे क्षेत्र के बारे में गलत धारणा न बनाएं
अच्छे और बुरे लोग पत्रकारिता में ही नहीं बल्कि हर जगह हैं इसलिए कुछ लोगों को देखकर समूचे क्षेत्र के बारे में राय नहीं बनानी चाहिए। फोटोग्राफी की भाषा एक ही होती है मगर हजार शब्दों को पहुँचा सकती है। मैं युवाओं से एक ही बात कहना चाहूँगी कि वे अपने काम के प्रति ईमानदार रहें। अपना सर्वश्रेष्ठ दें और वे इसका हजार गुना वापस पाएंगे।

नहीं रहे प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह

नयी दिल्ली :  हिंदी जगत के प्रख्यात साहित्यकार और आलोचक नामवर सिंह नहीं रहे। 93 वर्षीय नामवर सिंह पिछले कई दिनों से वे बीमार चल रहे थे, उन्होंने मंगलवार की रात 11.51 बजे अंतिम सांस ली। जनवरी में वे अचानक अपने रुम में गिर गए थे जिसके बाद उन्हें इलाज के लिए दिल्ली स्थित एम्स अस्पताल में भर्ती कराया गया था।

डॉक्टरों के मुताबिक उन्हें ब्रेन हेमरेज हुआ था, हालांकि उनके इलाज में कुछ सुधार हुआ था लेकिन वे पूरी तरह से स्वस्थ नहीं हो पाए थे। बता दें कि उन्हें 1971 में साहित्य अकादमी सम्मान से भी नवाजा जा चुका है। हिंदी साहित्य में उन्होंने कविताएं, कहानियां, आलोचनाएं, विचारधाराएं कई सारी चीजें लिखी हैं। नामवर सिंह का जन्म 28 जुलाई 1927 को जायतपुर, वाराणसी (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। अपने अधिकतर आलोचनाओं, साक्षात्कार इत्यादि विधाओं में साहित्य कला का सृजन किया है। उन्होंने ना सिर्फ साहित्य की दुनिया में अपना खासा योगदान दिया है बल्कि शिक्षण के क्षेत्र में भी उनका काफी योगदान है।

नामवर सिंह ने काशी विश्वविद्यालय में एमए और पीएचडी की इसके बाद इसी विश्वविद्यालय में उन्होंने प्रोफेसर के पद कई वर्षों तक अपनी सेवाएं भी दीं। नामवर सिंह ने सागर विश्वविद्यालय में भी अध्यापन का काम किया, लेकिन यदि सबसे लंबे समय तक रहने की बात करें तो वे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्याल में रहे। जेएनयू से सेवानिवृत्त होने के बाद नामवर सिंह को महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्व विद्यालय, वर्धा के चांसलर के रूप में नियुक्त किया गया। उन्होंने लोकसभा  चुनाव भी लड़ा था। उन्होंने 1959 में चकिया चन्दौली के लोकसभा चुनाव में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार रूप में चुनाव लड़ा लेकिन उन्हें इसमें हार मिली थी। उन्होंने समीक्षा, छायावाद, औऱ विचारधारा जैसी किताबें लिखीं हैं जो बेहद चर्चित है। इनके अलावा उनकी अन्य किताबें इतिहास और आलोचना, दूसरी परंपरा की खोज, कविता के नये प्रतिमान, कहानी नई कहानी, वाद विवाद संवाद आदि मशहूर हैं। उनका साक्षात्कार ‘कहना न होगा’ भी सा‍हित्य जगत में लोकप्रिय है।

नीदरलैंड की साहित्यकार प्रो.पुष्पिता अवस्थी का सम्मान एवं काव्यपाठ

कोलकाता : भारतीय भाषा परिषद के तत्वावधान में सभी भाषाओं को साथ लेकर चलने वाली काव्य लहरी-2 की काव्य गोष्ठी इस बार संस्कृत ,हिंदी और मैथिली भाषा पर केन्द्रित थी  जिसकी अध्यक्षता कलकत्ता विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के आचार्य डॉ रवींद्रनाथ भट्टाचार्य ने की।काव्य-लहरी का मुख्य उद्देश्य ही है विभिन्न भारतीय भाषाओं के बीच सौहार्द-स्थापन ।
अभिलाषा तिवारी ने देवी का लोकगीत ‘ पचरा ‘ प्रस्तुत कर काव्य संध्या की शुरुआत की। प्रो राजश्री शुक्ला ने अतिथियों का परिचय एवं सम्मान कराते हुए स्वागत भाषण किया ।उन्होंने कहा कि फाल्गुन मास वसंत के साथ साथ नई फसलों के आगमन और उमंग के स्वागत का समय है,जिसका आध्यात्मिक और लौकिक रूप भी है । विशिष्ट वक्ता डॉ ऋषिकेश राय ने संस्कृत और मैथिली के काव्य इतिहास पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संस्कृत किसी एक वर्ग की भाषा नहीं है, यह प्रतिरोध , लोकधर्म की भाषा है । महाकाव्य सबसे ज्यादा संस्कृत में ही लिखे जा रहे हैं । नीदरलैंड से आईं हिंदी यूनिवर्स फाउंडेशन की निदेशक प्रो. पुष्पिता अवस्थी को भारतीय भाषा परिषद की अध्यक्षा डॉ कुसुम खेमानी ने शाल, अभिनन्दन पत्र एवं संस्था का स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया।काव्यगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे आचार्य डॉ. रवींद्र नाथ भट्टाचार्य एवं अन्य गणमान्य अतिथियों का सम्मान परिषद के उपाध्यक्ष ईश्वरी प्रसाद टांटिया, मंत्री नंदलाल शाह एवं विमला पोद्दार सहित सरला टांटिया और सरोजनी शाह ने किया।
प्रो. पुष्पिता अवस्थी ने अपनी हिंदी कविता पृथ्वी ,मुखौटा ,मधुबन के पाठ से श्रोताओं को मुग्ध किया । भाष्करानंद झा ‘भाष्कर’ ने मैथिली भाषा में ग़ज़ल प्रस्तुत करके खूब वाह-वाही बटोरी । डॉ रवींद्रनाथ भट्टाचार्य ने अपना अध्यक्षीय भाषण आतंकवाद विषय पर संस्कृत में दिया तथा संस्कृत में काव्यपाठ किया । धन्यवाद ज्ञापन भारतीय भाषा परिषद के मंत्री नन्दलाल शाह ने दिया । काव्य-गोष्ठी का संचालन काव्य-लहरी के संयोजक हास्य-व्यंग्य कवि गिरिधर राय ने किया । कार्यक्रम के प्रारम्भ में पुलवामा में शहीद हुए सैनिकों को एक मिनट का मौनव्रत पालन कर श्रद्धांजलि दी गई।कार्यक्रम में डॉ. रामप्रवेश रजक, डॉ. विवेक सिंह, शकुन त्रिवेदी इत्यादि गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे ।