Sunday, July 5, 2026
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रायपुर में नीलांबर द्वारा रंग विनोद का आयोजन, सम्मानित किये गये कवि विनोद कुमार शुक्ल

रायपुर : नीलांबर कोलकाता द्वारा हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि एवं लेखक विनोद कुमार शुक्ल पर केंद्रित कार्यक्रम ‘रंग विनोद’ का आयोजन रायपुर के वृंदावन सभागार में 21 अप्रैल को किया गया।कार्यक्रम के आरंभ में उनके जीवन एवं रचनाकर्म पर आधारित ‘हम जैसा उन्हें जानते हैं’ शीर्षक से नीलांबर द्वारा निर्मित एक वीडियो फिल्म दिखाई गई।स्वागत वक्तव्य देते हुए नीलांबर संस्था के अध्यक्ष यतीश कुमार ने कहा कि संस्था हमेशा साहित्य के उत्थान के लिए प्रयासरत है।उन्होंने बताया है कि नीलांबर द्वारा प्रत्येक वर्ष किसी एक महत्वपूर्ण रचनाकार के समग्र रचनाकर्म पर आधारित कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे । इसी श्रृंखला का यह पहला आयोजन है।इस कार्यक्रम की अध्यक्षता हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि एवं आलोचक अशोक वाजपेयी ने की। इस कार्यक्रम के व्याख्यान सत्र में विनोद कुमार शुक्ल के रचना कर्म को समग्रता से देखने का प्रयास किया गया।इस सत्र के मुख्य वक्ता थे नरेश सक्सेना, बसंत त्रिपाठी, संजीव बख्शी, गीत चतुर्वेदी, शाश्वत गोपाल शुक्ल, आशीष मिश्र और योगेश तिवारी। सभी वक्ताओं ने उनके रचना कर्म के विभिन्न पहलुओं पर सारगर्भित चर्चा की।
सर्वप्रथम शाश्वत गोपाल शुक्ल ने अपने पिता विनोद कुमार शुक्ल के जीवन एवं रचनाकर्म से जुड़े कई संस्मरण सुनाए।उन्होंने कहा कि पिताजी ने घर पर पढ़ने का संस्कार दिया।मुक्तिबोध और हरिशंकर परसाई से हमारा साक्षात्कार उन्हीं के मार्फत हुआ। युवा आलोचक योगेश तिवारी ने विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यासों में प्रकृति चित्रण पर विस्तार से बताते हुए कहा कि उनके उपन्यासों की दुनिया जादुई यथार्थ रचते हैं। उनके उपन्यासों की प्रकृति अज्ञेय की असाध्य वीणा की तरह है। विनोद कुमार शुक्ल की भाषा पर प्रकाश डालते हुए युवा आलोचक आशीष मिश्र ने कहा कि वे भाषा की स्वाभाविकता को तोड़ते हैं। उन्हें पढ़ते हुए रघुवीर सहाय याद आते हैं।इनकी कविताओं के बिम्ब विस्तार से खुलते हैं।यह वस्तुसत्ता का सूक्ष्म अन्वेषण है।कथाकार संजीव बख्शी जी ने विनोद कुमार शुक्ल की कविता में छत्तीसगढ़ को रेखांकित किया। उनकी कविता ‘रायपुर-बिलासपुर संभाग’ के संदर्भ के आधार पर उनकी कविता और भाषा में छत्तीसगढ़ी शब्द शक्ति पर प्रकाश डाला।अन्य कविताओं में छत्तीसगढ़ी समाज जिस तरह आया उसे विस्तार से व्यक्त किया।वे छत्तीसगढ़ी सरलता, सहजता के चितेरे हैं।बसंत त्रिपाठी ने विनोद कुमार शुक्ल के ‘जादुई यथार्थ’ पर प्रकाश डाला। उनके उपन्यासों में अविश्वसनीय चित्र हैं जो विमुग्धकारी है।वे ‘लकड़ी की बंदूक’ से धायं की आवाज निकालने वाले लेखक हैं।वे उपन्यास कहते हैं, लिखते नहीं।गीत चतुर्वेदी ने विनोद कुमार शुक्ल की कविता में प्रेम पर प्रकाश डाला।उनकी कविता में जहाँ प्रेम नहीं हो वहां भी वे प्रेम स्थापित कर लेते हैं ।उनकी कविताओं में अबोध प्रेम की भावना अधिक है।उनकी कविताएं मनुष्य को देखने की दृष्टि है। उनकी कविताओं में सूक्ष्म काया का प्रेम है। उनकी कविता में घर पृथ्वी की तरह आता है और प्रेम भी उसी तरह आता है।उनकी कविता में प्रेम सर्वकल्याणकारी तत्व की तरह रहा है। उन्होंने कविता के आस्वादन की परंपरा को बदल दिया।वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना ने उनके आरंभिक दिनों को रेखांकित किया।

उन्होंने युवा अवस्था में लिखी कविताओं और संस्मरणों को रोचकता से प्रस्तुत किया ।वे साधारण को असाधारण तरीके से प्रस्तुत करने वाले हिंदी के अकेले कवि हैं।उनकी कविता भाषा के व्याकरण को लगातार बदलती रहती है। अशोक बाजपेयी ने हिंदी कविता की परंपरा में विनोद कुमार शुक्ल की जगह तलाशते हुए कहा कि वे गोत्रहीन और वंशहीन कवि हैं।साहित्य में उनका कोई पूर्वज नहीं है।वे अतियथार्थ के कवि हैं। उनमें किसी नाटकीयता का उद्यम नहीं है। वे स्थानीयता के लिहाज से मुक्तिबोध और श्रीकांत वर्मा से भी बड़े कवि हैं। उनकी कविता में पारंपरिक रस फिट नहीं बैठते हैं इसलिए मैं इसे एक नया रस मानते हुए ‘विनोद रस’ कहता हूँ। वे विचारशील कवि हैं एवं उनकी कविता का भूगोल आश्चर्यजनक है। व्याख्यान सत्र का संचालन संजय राय ने किया।
दूसरे सत्र की शुरुआत विनोद कुमार शुक्ल की कविता ‘हताश से एक व्यक्ति बैठ गया था’ पर नीलांबर द्वारा निर्मित वीडियो के प्रदर्शन से हुआ। इसके बाद नीलांबर की टीम द्वारा उनके साहित्य के हिस्सों को लेकर बने कोलाज एवं उनकी कहानी ‘गोष्ठी’ पर इसी नाम से बनी फिल्म प्रदर्शित की गयी, जिसे ऋतेश पांडेय ने निर्देशित किया है। इस फिल्म में मूख्य भूमिका निभाई ऋतेश पांडेय, यतीश कुमार, विमलेश त्रिपाठी,स्मिता गोयल,विशाल पांडेय एवं दीपक कुमार ठाकुर ने।विमलेश त्रिपाठी ने विनोद कुमार शुक्ल पर लिखी कविता सुनाई।कार्यक्रम के अंत में उनके रचनाकर्म के सहयात्री रहे नरेश सक्सेना के हाथों मानपत्र एवं अशोक वाजपेयी के हाथों स्मृति चिन्ह देकर विनोद कुमार शुक्ल का सम्मान किया गया।मान पत्र का पाठ अनिला राखेचा ने किया। विनोद कुमार शुक्ल की पत्नी सुधा शुक्ल का सम्मान रंगकर्मी एवं अभिनेत्री कल्पना झा द्वारा किया गया । इस कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण रहा विनोद कुमार शुक्ल का कविता पाठ।धन्यवाद ज्ञापन छत्तीसगढ़ फिल्म और विजु़अल आर्ट सोसायटी के अध्यक्ष सुभाष मिश्र ने किया। सत्र का संचालन आनंद गुप्ता और ममता पांडेय ने किया। इस अवसर पर छत्तीसगढ़ और देश के विभिन्न हिस्सों से भारी संख्या में आए साहित्यप्रेमी मौजूद थे।कार्यक्रम के संयोजन में मनोज झा एवं अभिषेक पांडेय की महत्वपूर्ण भूमिका रही।कार्यक्रम के आयोजन में छत्तीसगढ़ फिल्म एंड विजु़अल आर्ट सोसायटी ने सहयोग किया।

– आनंद गुप्ता
नीलांबर कोलकाता

स्त्री मन की कथा है कतरा कतरा जिन्दगी

कोलकाता : कलकत्ता गर्ल्स कॉलेज के हिंदी विभाग की ओर से युवा लेखिका शुभ्रा उपाध्याय के नवीनतम कहानी संग्रह ‘ कतरा कतरा जिंदगी ‘ पर एक परिचर्चा का आयोजन किया गया । स्वागत वक्तव्य देते हुए कॉलेज की प्राचार्य डॉ. सत्या उपाध्याय ने कहा कि हिंदी विभाग की ओर से नए रचनाकारों की पुस्तकों पर चर्चा के लिए एक श्रृंखला का आयोजन किया गया है ताकि पठन-पाठन के साथ रचनात्मकता पर चर्चा हो सके,इसी कड़ी में यह परिचर्चा आयोजित की गई है । उन्होंने कहा कि शुभ्रा उपाध्याय हमारे समय की संभावनाशील कथाकार हैं ।डॉ मृत्युंजय पांडे ने कहा कि शुभ्रा उपाध्याय की कहानियों में जीवन की छोटी सी छोटी घटना का जिक्र है। डॉ. गीता दुबे ने कहा कि शुभ्रा उपाध्याय की कहानियों में स्त्री मन की कथा का आख्यान है,वे स्त्रियों के मन की बात को बेबाकी से कहती हैं ।नाटककार उमा झुनझुनवाला ने उनकी भाषा और कहन शैली को काव्यात्मक और बिम्बात्मक मानते हुए कहा कि उनकी कहानियों में पाठकों को बांधने की क्षमता है।प्रो आशुतोष सिंह ने कहा कि शुभ्रा उपाध्याय का यह संग्रह स्त्री लेखन को व्यापक बनाने की दिशा में सार्थक प्रयास है। लेखिका में ईमानदारी के साथ संवेदना का प्रबल आग्रह है। आलोचक प्रियंकर पालीवाल ने कहा कि शुभ्रा उपाध्याय की कहानियां परिपक्व और पठनीय है । पुस्तक की लेखिका शुभ्रा उपाध्याय ने सभी अपनों के प्रति आभार प्रकट करते हुए कहा कि मेरे आसपास की घटनाओं ने कुछ लिखने के लिए प्रेरित किया है। अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए सेराज खान बातिश ने सभी वक्ताओं और लेखिका के विचारों पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इस पुस्तक में सामाजिक मूल्यों के प्रति गहरी आस्था है। कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ धनंजय साव एवं धन्यवाद ज्ञापन प्रो अम्बर चौधरी ने दिया ।इस अवसर पर डॉ इतु सिंह, प्रो. संजय कुमार जायसवाल, राज्यवर्धन, जीतेंद्र जीतांशु,सुफिया यास्मीन,प्रो रूद्राक्षा पांडेय, सुषमा त्रिपाठी, मधु सिंह, राहुल गौड़ सहित सैकड़ों छात्र एवं साहित्य प्रेमी उपस्थित थे ।

इतिहास की नजर से इतिहास को देखती एक किताब

हम भारतीय अगर किसी चीज को गम्भीरता से नहीं लेते तो वह हमारा इतिहास है। ऐसे में अपनी ऐतिहासिक विरासतों को हम कितनी गम्भीरता से लेते हैं, यह भी जाहिर है मगर इतिहास के प्रति आम आदमी को जागरुक करने में बड़ी भूमिका होती है किसी पुरात्वविद की। वह सच पर से परदा उठाता है और धरोहरों को सहेजता है। राजनीति और धर्म के घालमेल के बीच इस देश में यह काम कितना मुश्किल है और जोखिम भरा है, यह बात समझ आती है जब हम के के मुहम्मद की किताब मैं हूँ भारतीय पढ़ते हैं। लेखक के अनुसार मार्क्सवादी विचार के प्रख्यात इतिहासकारों का सामना भी उनको करना पड़ा है और इस क्रम में हैरतअंगेज तरीके से जो नाम सामने आता है, वह प्रो. इरफान हबीब का है। हबीब और मुहम्मद के तीखे मतभेदों की कहानी इस किताब में है और लेखक ने तो हबीब को षडयंत्रों का आचार्य तक कह डाला है। मुहम्मद ने बाबरी मस्जिद समस्या को एक साम्प्रदायिक समस्या के रूप में प्रचारित करने के लिए हबीब को आड़े हाथों लिया है तो हिन्दुत्ववादियों की बुद्धिहीनता को कोसने से भी नहीं चूके हैं। मुहम्मद को मुगल भारत में पहले ईसाई चर्च की खोज करने का भी श्रेय प्राप्त है। जिन्दगी में गुजरे रास्ते, मिले हुए लोग, किये गये यज्ञ, किताब का सार भी यही है। वह बताते हैं कि अपने कार्यकाल में हिन्दू और मुस्लिम चश्मे से अपने काम को नहीं देखा और अप्रिय सत्य कहते रहे इसलिए वे किसी के प्रिय न हो सके। मुहम्मद को उनकी माँ मुसलियार यानी एक प्रकार का मुस्लिम धार्मिक पुरोहित बनाना चाहती थीं। आप दुर्लभ मूर्तियों के बेचने के गोरख धंधे के बारे में जान पाते हैं। आपको पता चलता है कि भारत में 10 लाख में बिकने वाली मूर्ति अमेरिका में जाकर 10 करोड़ की हो जाती है। मुहम्मद कहते हैं, हमारे पुराणों और इतिहास में बताए गए महत्वपूर्ण क्षेत्रों का उत्खनन करके इतिहास की सच्चाई सामने दिखाने में विलम्ब हो गया है। हस्तिनापुर, मथुरा जैसे इलाकों की स्थिति शोचनीय है। मुहम्मद ने वैशाली में केसरिया स्तूप का पता लगाया। इतिहास के राजनीतिक दुरुपयोग पर बात करते हुए वे बताते हैं कि किस तरह सारनाथ के बौद्ध स्तूप को लेकर उन पर राजनीतिक दबाव डाला गया। इसी प्रकार ताज कॉरिडोर में मायावती के कुछ अफसरों ने दबाव डाला। वे ताज परिसर में 200 से अधिक व्यापार समुच्चय बनाना चाहते थे मगर तब आगरा परिमण्डल के अधीक्षण पुरात्वविद के रूप में मुहम्मद ने इसकी अनुमति नहीं दी। इसी मामले पर तत्कालीन भाजपा – मायावती सरकार गिरी भी थी।

लेखक इस सन्दर्भ में आदिवासियों की भूमिका की प्रशंसा करते हैं जहाँ उन्होंने 100 से अधिक मंदिरों का जीर्णोद्धार किया। डाकुओं की मदद से वटेश्वर मंदिर को दोबारा सँवारा गया। इस मामले में उन्होंने ज्योतिराजे सिन्धिया और यशोधरा राजे सिन्धिया के सहयोग की सराहना की है। बात जब दिल्ली के पुराने किले की आते है तो हमें मुहम्मद के माध्यम से पता चलता है कि इस किले की ध्वनि व प्रकाश प्रस्तुति में इन्द्रप्रस्थ का उल्लेख ही नहीं है जबकि महाभारत कालीन धूसर मृतभांड इस किले में मिलते हैं। एक महत्वपूर्ण बात यह है कि हमारे पास शिव और गंगा की नगरी काशी का मह्त्व बताने वाला एक भी सँग्रहालय नहीं है क्योंकि हम इतिहास को इतिहास की तरह नहीं देखते बल्कि एक साम्प्रदायिक दृष्टिकोण के साथ देखते हैं। मुहम्मद एक बड़ी बात कहते हैं, -प्रतीकों को हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई कहकर बाँट देना इतिहास के साथ भद्दा मजाक है। बाबरी मस्जिद प्रकरण में वे वामपंथी इतिहासकारों को लेकर सवाल उठाते हैं जिन्होंने उग्रपंथी मुस्लिम गुट की मदद करते हुए बाबरी मस्जिद नहीं छोड़ने को कहा। मुहम्मद के मुताबिक 15 दिसम्बर 1990 को उन्होंने बयान दिया कि बाबरी मस्जिद के नीचे मंदिर के अंशों को उन्होंने खुद देखा है। कुल मिलाकर यह किताब उन तमाम पहलुओं को उठाती है जिनसे मुहम्मद खुद गुजरे हैं, जिनको यह कहने में गुरेज नहीं कि भाजपा सरकार के समय में ऐतिहासिक स्थलों तथा इमारतों के संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया गया। मुझे लगता है कि एक पुरात्वविद कहीं अधिक निष्पक्षता के साथ चीजों को देखता है क्योंकि वह उसका ध्येय है माध्यम नहीं। किताब में तस्वीरों के माध्यम से मुहम्मद द्वारा ऐतिहासिक इमारतों की कायापलट दिखायी गयी है, उनकी उपलब्धियाँ भी हैं। मतभेद अपनी जगह हैं मगर कई रहस्यों को यह किताब खोलती है।। इस किताब से गुजरना एक अच्छा अनुभव रहा। ऐसी किताबें लिखी भी जानी चाहिए और पढ़ी भी जानी चाहिए।
मैं हूँ भारतीय
के के मुहम्मद
प्रभात प्रकाशन

लोकतन्त्र और चुनाव

सिम्पी मिश्रा

भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में चुनाव आज भी अपने मूल रीति-नीति को नहीं अपना पा रहा है. अब इसे हमारे देश का दुर्भाग्य कहें या दलदली राजनीति का प्रतिफल , यह जनता और राजनेता स्वयं तय करें तो बेहतर होगा! आमतौर पर चुनाव का मूल केंद्रबिंदु राष्ट्र, समाज और जनता के मूल मुद्दों को देखना, समझना उन्हें महसूस करना और सत्ता प्राप्ति के पंचवर्षीय कार्यकालों के दौरान उन तमाम समस्याओं का समाधान करना होना चाहिए  परन्तु यहाँ  मामला एकदम इसके उलट दिखाई देता है। सवा सौ करोड़ जनता वाले इस देश में 29 राज्यों के लगभग 500-600 व्यक्ति महज अपना पद- रुतबा और अपनी तिजोरी को लक्ष्य मानकर उन्हें बनाने और बचाने के लिए जाने कितने वादें, झूठ फरेब, घड़ियाली आँसू, दो चार दस पद यात्राएं, अपशब्द, बेतुके, विषाक्त, हीनता-नीचता, अमर्यादित भाषा, उपाधियों एवं जुमलों से परिपूर्ण गलाफाड़ भाषण देने को अनिवार्य प्रक्रिया मानकर दंगे, फसाद भड़का कर अपनी रोटी सेंकने में विश्वास रखते हैं और कदाचित इसको लक्ष्य मानकर चंद दिनों की “जी तोड़ मेहनत” करके अगले पाँच सालों तक इसका फल भी जम कर खाते हैं एवं अपने घर-परिवार, रिश्ते-नातेदारों, करीबियों को खिलाते भी हैं और जनता वापस से चली जाती है वहीं जहां ये राजनेता चाहते हैं  ‘भाड़’ में।

यदि हम तनिक भी सचेतनता की दृष्टि से जाति, धर्म,वर्ग और लिंग के घेरे से बाहर निकल कर देखें तो वर्तमान समय में किसी भी पार्टी के घोषणा पत्र में जनता की वास्तविक और जमीनी समस्याओं से जुड़े मुद्दें नजर नहीं आयेंगे। हर जगह सिर्फ एक-दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप , बेतुकी बातें और बड़प्पन वाले जुमले ही कभी टिमटिम करते तो कभी भकभकातें हुए आँखों को चौंधियाने वाले प्रतीत होते हैं. हर संस्था यहां किसी न किसी अन्य संस्था का या तो चाटुकार या तो धुर विरोधी ही नज़र आता है।

हर दल हरेक पार्टी भ्रष्टाचार और एक से बढ़ कर एक जुमलेबाज़ी के अथाह समुद्र में गोते लगाता नजर आता है।  मूलभूत समस्याएं जैसे – रोजगार , शिक्षा, स्वास्थ्य इत्यादि गड़े मुर्दे की भांति ही नज़र आते हैं। चुनाव आते ही इन मुर्दों के ताबूत को कभी-कभी साफ़ सफाई के बहाने याद कर लिया जाता है किन्हीं तथाकथित सजग और जनप्रिय ‘नेता’ के द्वारा, तत्पश्चात परिणाम वही “ढाक के तीन पात” रहते है।

कहीं न कहीं जनता की भी उदासीनता इसका एक कारण है परन्तु इससे कही अधिक यह ‘दलदली राजनीति’ और ‘वंश के दंश’ से आहत जुगलबंदी का परिणाम है। कभी कभी ऐसा प्रतीत होता है कि ‘लोकतंत्र का यह महापर्व’ जिसे हम चुनाव कहते है वह महज सतारूढ़ होने की लाॅटरी हो गई है या यूँ कहें कि बाहुबलियों और समर्थ व्यक्तियों द्वारा अपनी किस्मत को आजमाने का पंचवर्षीय अनुष्ठान बन गया है जिसमें हर प्रत्याशी येन-केण-प्रकारेण सफल होना चाहता है, जिसमें जनता एवं उनके और तमाम जरूरी मुद्दें इस अनुष्ठान की हवन सामग्री बन जाती है जिसे इनके चुनाव प्रचार के सभारुपी कुंड में ‘स्वाहा-स्वाहा’ के मंत्र के साथ प्रविष्ट किया जाता है और सत्तासीन सरकारों का जो दावा होता है  कि विगत पाँच सालों में उनकी उपलब्धियां ‘ऐसी रही –वैसी रही’ वो महज इस आयोजित अनुष्ठान का वो बासी प्रसाद सिद्ध होता है जिसे जाने कितने आशावादी भक्तों की हथेली प्राप्त भी नहीं कर पाती , न जाने कितने मुंह भी  इस प्रसाद से अछूते रह जाते हैं!

तो इस तरह ये चुनावी महापर्व (अनुष्ठान) खुद ही एक दायरे में जाने कितनी वर्जनाओं में जकड़ा हुआ है तो फिर इसका फल भला विशुद्ध कैसे हो! ये हम जनता जनार्दन स्वयं अनुमान लगा सकते हैं। अतः आवश्यकता इस बात की है कि “चुनाव को महज चुनाव” ही रहने दिया जाए। इसे ना तो भगवा में रंग कर देखा  जाय, ना ही बिना सोचे समझे हाथ का साथ मिलना चाहिये, ना बिना आकलन के लाल मान लिया जाए , ना ही बिना पड़ताल के हरा बना दिया जाय अर्थात इसे इसकी ‘सफेदी’ मतलब मूल तिरंगे के रूप  में ही रहने दिया जाय एवं “जनता का जनता के लिए जनता के द्वारा” उक्ति के वास्तविक स्वरुप तक पहुँचने दिया जाय। तभी चुनाव का यह महापर्व सफल और सार्थक हो सकता है।

 

नेताओं से बदलाव की उम्मीद छोड़िए..खुद आगे बढ़िए

ये मई बहुत ऐतिहासिक होने जा रही है,,न सिर्फ इसलिए कि देश को एक नयी सरकार मिलेगी बल्कि यह हमारे देश की विकास की दिशा भी तय करेगी। एक मतदाता के तौर पर जनता की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। बहरहाल, चुनाव के नतीजों पर कुछ भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि जनता का मूड क्या है, कोई नहीं जानता मगर बतौर नागरिक हमारी जिम्मेदारी जरूर है कि हम ऐसी सरकार चुनें जो हमारे देश को समृद्ध ही न करे बल्कि सुरक्षित भी करे। सुरक्षा ही विकास और समृद्धि का आधार है। यकीन नहीं होता तो सीरिया और इराक जैसे उदाहरण हमारे सामने हैं, सुरक्षा की चूक कितनी भारी पड़ सकती है, यह हमने मुम्बई आतंकी हमले में देखा और इस वक्त श्रीलंका को यह बात समझनी है। जब देश सुरक्षित होंगे तो हमारी धरती भी सुरक्षित होगी…दिक्कत यह है कि इसे लेकर हमारे देश में पक्ष – विपक्ष हर ओर से बयानबाजी खूब हो रही है। भाषणों का स्तर गिरा है, नितान्त व्यक्तिगत हमले हो रहे हैं और अभद्र व जातिवाद को उकसाने वाली राजनीति हो रही है। दरअसल, हम जातिवादी सोच में बँधे हैं इसलिए पार्टियों को इतनी हिम्मत होती है कि वे कायस्थ, हिन्दू, मुसलमान देखकर प्रत्याशी चुनती हैं..सोच रही हूँ कि क्या वह दिन कभी आएगा जब हम इन संर्कीणताओं से दूर होंगे। जो चीजें नेताओं का कर्तव्य हैं, वह निभा दें तो अब हमें उपलब्धि लगने लगी है और नेताओं के लिए उनकी परम्परागत सीट अपनी पैतृक सम्पत्ति लगने लगी है। यही कारण हैं कि देर से बेड टी मिलती है तो मुनमुन सेन जैसी अभिनेत्री सांसदों को हिंसा नहीं दिखती और दिखती भी है तो वह बहुत छोटी बात होती है। यह सोच चाहे किसी भी दल की हो मगर अन्ततः हमारे देश को एक बार तो उसी राजशाही की ओर ले ही जा रही है जिससे हम पूरे 200 साल संघर्ष करने के बाद आजाद हुए। सच तो यह है कि हमें अब नेताओं से बदलाव की उम्मीद छोड़ देनी चाहिए और खुद को बदलना होगा..अच्छे लोगों को राजनीति में आना होगा और पूरे संकल्प के साथ आगे आना होगा तभी हम आगे बढ़ सकेंगे और एक स्वस्थ व सकारात्मक सोच के साथ देश को आगे ले जा सकेंगे..आप तैयार हैं न।

मान्यता अब भी पुरुष फोटोग्राफरों को अधिक मिलती है

फोटोग्राफी बहुत सृजनात्मक क्षेत्र है और अब भी बहुत कम लड़कियाँ इस क्षेत्र में अपना कॅरियर बनाती हैं। वहीं माधुरी दुग्गड़ ने न सिर्फ इस क्षेत्र को चुना बल्कि खुद को सफलता के साथ स्थापित किया। आज स्नीजी शूटर्स के माध्यम से से वे हर अवसर को बतौर पेशेवर फोटोग्राफर खूबसूरती से कैद कर रही हैं और तेजी से अपनी पहचान बना रही हैं। अपराजिता ने  स्नीजी  शूटर्स की संस्थापक व  वरिष्ठ फोटोग्राफर माधुरी दुग्गड़ से उनके इस सफर को जाना…पेश है प्रमुख अंश –
प्र. आपको इस क्षेत्र में आने की प्रेरणा किससे मिली?
उ. प्रेरणा हमारे चारों ओर है। यह दुनिया मुझे प्रेरित करती है। दुनिया ऐसी घटनाओं और कहानियों से भरी पड़ी है जिनको बताने की जरूरत है, जिनको बताया जा सकता है। मुझे कई जगहों से प्रेरणा मिलती है, ऊर्जा और गति मुझे प्रेरित करती है, प्रकाश और छाया मुझे प्रेरित करती है, मानव और मानवता मुझे प्रेरित करती है, मेरे माता-पिता मुझे प्रेरित करते हैं। इस पर भी मुझे उस तस्वीर से ज्यादा कुछ भी प्रेरित नहीं करता जो मेरे विषय की आत्मा तक पहुँचती है, उसे पकड़ती है। मेरे द्वारा खींची तस्वीर को देखकर लोगों के चेहरों पर मुस्कान आता है तो यह यह मुझे रोमांचित करता है।

प्र. आप जब आई तब परिदृश्य कैसा था?
उ. मुझे सबसे प्रोत्साहन मिला, सबने सहयोग किया। मेरा मानना ​​है कि लोगों को लगता है कि महिलाएं हस्तक्षेप भी कम करती हैं और धमकाती भी कम हैं। मुझे लगता है कि एक महिला होने के नाते अक्सर लोग मुझ पर बहुत जल्दी भरोसा करते हैं और मुझे उन जगहों तक पहुँचने की अनुमति देते हैं जो कभी-कभी पुरुषों के लिए थोड़ा कठिन हो सकता है। 2016 में पेशेवर तौर पर शुरुआत की, फोटो स्टूडियो खोला। मेरी कम्पनी स्नीजी शूटर्स में हम तरह की तस्वीरें हम खींचते हैं और किसी भी मौके के लिए खींचते हैं।

प्र. किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा?
उ. 2019 है! मैं एक नारीवादी हूँ और मैं हमेशा महिला अधिकारों और समानता के लिए लड़ती रही हूँ। कई प्रतिभाशाली महिला फ़ोटोग्राफ़र होने के बावजूद पुरुषों को अभी भी अधिक मान्यता प्राप्त है। कॅरियर को लेकर इन अड़चनों को तोड़ना सबसे आसान नहीं है, आपको वास्तव में फोटोग्राफी के बारे में जुनून रखने की जरूरत है और तभी आप अपने इस प्यार को बनाए रख सकते हैं, टिके रह सकते हैं और सफल हो सकते हैं।

प्र. आपकी नजर में आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि क्या है?
उ. हर अच्छी तस्वीर और उसकी वजह से मेरे क्लाइंट के चेहरे की मुस्कान मेरे लिए एक उपलब्धि है। यह कुछ लोगों के लिए कठिन लग सकता है, लेकिन दिन भर की मेहनत के बाद शांति से सो सकती हूँ। अंततः अपने क्लाइंट को खुश देखना मेरी उपलब्धि है।

प्र. भविष्य को लेकर खासकर समाज के प्रति आपकी योजनाएं क्या हैं?
उ. व्यावहारिक रूप से, मैं भाग्यशाली हूँ कि मैंने ऐसे समय में फ़ोटोग्राफ़ी चुनी जब यह अब केवल क्षणों को कैद करने भर के लिए एक उपकरण मात्र नहीं है। विज्ञापन, समाचार रिपोर्टिंग और मनोरंजन के अन्य सभी रूपों के लिए फ़ोटोग्राफ़ी सब कुछ का साधन बन गयी है। दुनिया पूरी तरह से फोटोग्राफी पर निर्भर करती है और हर क्षेत्र में अब फोटोग्राफी की आवश्यकता है।

फिर इतिहास लिखूँगी

सुषमा त्रिपाठी

आनन्द प्रकाशन

वर्ष 2018

उपलब्धताअमेजन तथा आनन्द प्रकाशन, कोलकाता

किताब के बारे में – 14 नारी पात्रों की कहानी आत्मकथानक शैली में आज के युग के अनुरूप कही गयी है। किताब में जो चित्र हैं, वह कवियित्री ने खुद बनाये हैं। द्रौपदी, कुन्ती, सरस्वती जैसे पात्रों को एक अलग दृष्टि से देखने का प्रयास किया गया है।

कालक्रम के प्रहार से खण्डहर में बदल गयी प्रस्तर मूर्तियों को कालकर उनका पुनरुद्धार करना एक महत्वपूर्ण सामाजिक दायित्व है। इसी प्रकार इतिहास के धूलि धूसरित पन्नों में दर्ज स्त्री अस्मिता की घुट रही भिव्यक्ति को स्वर देना भी एक महत्वपूर्ण सामाजिक दायित्व है। स्त्री मुक्ति और स्त्री विमर्श की इस इक्कसवीं सदी में कवयित्री सुषमा त्रिपाठी ने अपने कविता सँग्रह ‘फिर इतिहास लिखूँगी’ में स्त्री अस्मिता के प्रश्न को एक अलग दृष्टिकोण से, संवेदना के धरातल से उठाने का प्रयास किया है। अस्मिता का यह प्रश्न स्त्री के अस्तित्व से ही जुड़ा हुआ नहीं है, बल्कि उसके अतीत, वर्तमान एवं भविष्य के प्रति समाज के दृष्टिकोण से टकराते हुए उद्भभूत हुआ है। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की पंक्तियों में – हम कौन थे? क्या हो गए हैं? और क्या होंगे अभी? आओ विचारें आज मिलकर, ये समस्याएँ सभी (इसी किताब से)

 

अब वो आसमान तोड़ रही है

सुषमा त्रिपाठी

मानव प्रकाशन

वर्ष -2016

उप्लब्धता – अमेजन

पुस्तक  के बारे में – यह किताब दरअसल एक डायरी है जिसे कविताओं की शक्ल दी गयी है। कविताएं आस -पास के वातावरण और उनसे मिलने वाले अनुभवों का प्रतिफलन है। आप रवीन्द्र सरणी स्थित आनन्द प्रकाशन से किताब खरीद सकते हैं

 

निर्भया फंड : 13 राज्यों में होंगी साइबर फॉरेंसिक लैब और डीएनए टैस्ट सुविधाएं

नयी दिल्ली : महिलाओं के खिलाफ बढ़ रहे मामलों की जांच में तेजी लाने के लिए 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में जल्द ही साइबर फॉरेंसिक लैबोरेट्री और डीएनए जांच सुविधाएं मिलेंगीं। गृह मंत्रालय ने बताया कि 131 करोड़ रुपए की लागत से उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, प. बंगाल, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, महाराष्ट्र, पंजाब, राजस्थान, मिजोरम, मणिपुर, त्रिपुरा और दिल्ली स्थित फॉरेंसिक साइंस लैबोरेट्रियों में डीएनए जांच सुविधाएं बनेंगी।
अधिकारियों का कहना है कि इन राज्यों में महिला और बच्चों के खिलाफ ‘साइबर अपराध रोकथाम प्रोजेक्ट’ के तहत साइबर फॉरेंसिक लैबोरेट्री और साइबर फॉरेंसिक प्रशिक्षण सुविधाएं बन रही हैं। वहीं अरुणाचल प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, तेलंगाना और उत्तराखंड समेत पांच राज्यों में साइबर फॉरेंसिक लैबोरेट्री पहले से बनी हुई हैं। प्रोजेक्ट के अंतर्गत 410 सरकारी अभियोजकों समेत 3664 कर्मचारियों को प्रशिक्षण दिया गया है। आपको बता दें कि यह कार्य महिला सुरक्षा सुधारने के मकसद से निर्भया फंड के तहत हो रहा है। इस प्रोजेक्ट की समीक्षा और निगरानी का जिम्मा एक एम्पावर्ड समिति के पास है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक 2016 में 12,187 साइबर अपराध दर्ज हुए थे, यह आंकड़ा 2015 से 6.3 फीसदी ज्यादा था, जबकि 2015 में 2014 के मुकाबले साढ़े 20 फीसदी बढ़ोतरी हुई थी।

महिलाओं ने बेलचों से तोड़ दी बर्फ की दीवार, बहाल कर दी ढाई किमी सड़क

केलांग : बर्फ से जाम ढाई किमी सड़क को ग्रामीणों ने खुद ही बहाल कर दिया। महिलाओं ने बढ़-चढ़कर श्रमदान किया। महिलाओं ने ग्रामीणों के साथ मिलकर बर्फ की दीवार तोड़ दी। लाहौल-स्पीति की तोद वैली में कोलंग-खंगसर सड़क बहाल कर लोगों ने खंगसर मतदान केंद्र को जिला मुख्यालय से जोड़ दिया है। भारी बर्फबारी के कारण घाटी में कई संपर्क मार्ग अभी भी बंद पड़े हैं। लाहौल में कृषि सीजन की शुरूआत हो गई है। गांव तक कृषि उपकरण के साथ खाद्य वस्तुओं को पहुंचाना मुश्किल हो गया है।
खंगसर के ग्रामीणों ने खुद इस संपर्क मार्ग को बहाल करने का फैसला लिया। बेलचों से बर्फ हटाने से पहले लोगों ने इस पर मिट्टी डाली। कुछ दिन बाद सड़क पर जमी बर्फ की मोटी परत पिघलना शुरू हो गई। महिला यंगचेन, सुनीता, रिंचेन अंगमो, शरभ डोलमा, यनगजोम, पदमा अंगमो, यंगचेन लामो ने बताया कि करीब दो सप्ताह की मेहनत के बाद सड़क को बहाल कर दिया गया। अब गांव तक वाहन आसानी से पहुंच रहे हैं। उपप्रधान सोनम टशी, ग्रामीण आदर्श, ठीले मिंगयुर और बलदेव ने बताया कि बर्फ हटाने के इस अभियान में महिलाओं ने बढ़-चढ़ कर श्रमदान किया। लोनिवि की मशीनें घाटी के अन्य संपर्क मार्गों पर तैनात होने से खंगसर सड़क बहाली में देरी हो रही थी। ऐसे में ग्रामीणों ने खुद बेलचों की मदद से बर्फ हटाने का फैसला किया। सहायक निर्वाचन अधिकारी अमर नेगी ने कहा कि खंगसर के ग्रामीणों ने विशेषकर महिलाओं ने सड़क से बर्फ हटा कर सामुदायिक सहभागिता की एक मिसाल पेश की है। लोनिवि केलांग सब डिवीजन के सहायक अभियंता किशन लाल ने कहा कि ग्रामीणों की मदद से खंगसर सड़क बहाल हो गई है।

(साभार – अमर उजाला )