पटना : पहली बार पटना में रहने वाली महिलाएं तरावीह की दुआ में हिस्सा ले सकेंगी। यह एक विशेष प्रकार की प्रार्थना होती है जो रमजान के पवित्र महीने में मस्जिद के अंदर की जाती है। पटना शहर के मितान घाट में स्थित खानक्वाह मुनीमिया और मस्जिद जिसे कि सूफी सेंटर के लिए जाना जाता है उसने फैसला लिया है कि महिलाओं को मस्जिद के अंदर दुआ करने दी जाए और इसके लिए तैयारी शुरू हो गई है।
छह मई में रमजान शुरू हो रहे हैं। मितान घाट मस्जिद में महिला नमाजियों के लिए न केवल प्रार्थना के लिए विशिष्ट स्थान होगा बल्कि वह वहां कुरान पढ़ सकेंगी। इसके अलावा उन्हें एक हाफिज भी मुहैया करवाया जाएगा जो कुरान के विशेषज्ञ होते हैं। मस्जिद अधिकारियों का कहना है कि महिलाओं को वजू के लिए विशेष स्थान उपलब्ध करवाया जाएगा। वजू औपचारिक प्रार्थना से पहले एक तरह का कर्मकांड शुद्धिकरण होता है जिसे इस्लाम में काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। यह मस्जिद बिहार की राजधानी में स्थित मस्जिदों से कई मायनों में अलग है। इसमें सूफी संतों और विद्वानों की कब्रें शामिल हैं। जिसमें मुल्ला मितान और हजरत मखदूम मुनेम पाक शामिल हैं। खानक्वाह सूफीवाद की पांडुलिपियों और पुस्तकों के अपने विशाल संग्रह के लिए दुनिया भर में लोकप्रिय है। जिसकी वजह से विभिन्न धर्मों और आस्था के लोगों की एक बड़ी संख्या यहां आती है। मस्जिद में भी बड़ी संख्या में गैर-मुस्लिम भक्त आते हैं।
खानक्वाह के प्रशासनिक प्रमुख हजरत सैयद शाह शमिमुद्दीन अहमद मुनेमी सज्जाद नशीन ने कहा, ‘आने वाले महीनों में यह खानक्वाह सूफीवाद पर एक विश्वविद्यालय में बदल जाएगा। हमारी योजना है कि समुदायों के बीच सद्भाव को बढ़ावा दिया जाए और सूफी अध्ययन केंद्र के जरिए इस देश की साझा संस्कृति को उजागर करें। ठीक इसी समय हम अपने समुदाय की महिलाओं की इच्छा और आकांक्षाओं से भी परिचित हैं और चाहते हैं कि उन्हें महसूस हो कि इस्लाम उनके लिए क्या है।’ मुनेमी ने कहा कि सदस्यों के साथ कुछ विचार-विमर्श और चर्चा के बाद यह फैसला लिया गया कि महिलाओं के लिए तरावीह की दुआ के लिए मस्जिद में विशेष इंतजाम किए जाएं। उन्होंने कहा, ‘हम इस सुविधा को मस्जिद की पहली मंजिल पर करने की योजना बना रहे हैं। जबकि भूतल पुरुषों को समर्पित किया जाएगा।
मस्जिद ने खोले महिलाओं के लिए अपने दरवाजे, रमजान में होंगे खास इंतजाम
पुरुष वनडे में अंपायरिंग करने वाली पहली महिला बनीं ऑस्ट्रेलिया की क्लेयर
दुबई : ऑस्ट्रेलिया की क्लेयर पोलोसेक पुरुष वनडे इंटरनेशनल मैच में अंपायरिंग करने वाली पहली महिला बन गई हैं। 31 साल की क्लेयर ने आईसीसी वर्ल्ड क्रिकेट लीग डिविजन 2 के फाइनल मैच में यह उपलब्धि हासिल की। यह मैच शनिवार को नामीबिया और ओमान के बीच खेला जा रहा है। क्लेयर इससे पहले महिलाओं के 15 वनडे मैच में अंपायरिंग कर चुकी हैं। 2016 में ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका की महिला टीम के बीच हुए वनडे मैच में उन्होंने पहली बार अंपायरिंग की थी। उन्होंने पिछले साल वुमन्स टी-20 वर्ल्ड कप के सेमीफाइनल में भी अंपायरिंग की थी। वह मैच इंग्लैंड और भारत के बीच खेला गया था।
वे इसके अलावा 2017 में वुमन्स वनडे वर्ल्ड कप के 4 मुकाबलों में भी अंपायरिंग की जिम्मेदारी निभा चुकी हैं। क्लेयर 2017 में ऑस्ट्रेलिया में पुरुषों के किसी क्रिकेट मैच में अंपायरिंग करने वाली पहली महिला अंपायर बनी थीं। तब उन्होंने पुरुषों के लिस्ट ए के मैच में अंपायरिंग की थी। पिछले साल दिसंबर में क्लेयर और साउथ ऑस्ट्रेलिया की एलोइस शेरीडेन ने महिला बिग बैश लीग में अंपायरिंग की थी। यह पहला मौका था जब ऑस्ट्रेलिया में प्रोफेशनल क्रिकेट में पहली बार मैच में दोनों फील्ड अंपायर महिलाएं थीं।
महिला अंपायरों को बढ़ावा देना जरूरी : क्लेयर
पुरुष वनडे की अंपायर बनने पर क्लेयर ने कहा, ‘पुरुष वनडे में अंपायरिंग करने वाली पहली महिला बनकर मैं रोमांचित हूं। मैंने अंपायर के तौर पर कितना लंबा सफर तय कर लिया है। वास्तव में महिला अंपायरों को बढ़ावा देना बहुत अहम है। कोई कारण नहीं है कि महिलाएं क्रिकेट में अंपायर नहीं हो सकती हैं। यह बाधाएं तोड़ने, जागरुकता फैलाने वाला है, ताकि ज्यादा से ज्यादा महिलाएं इस भूमिका में आ सकें।’
क्लेयर महिलाओं की रोल मॉडल : आईसीसी मैनेजर
इससे पहले आईसीसी के सीनियर मैनेजर (अंपायर्स और रेफरी) एड्रियान ग्रिफिथ ने कहा, ‘यह ऑस्ट्रेलियाई उन महिलाओं के लिए रोल मॉडल हैं, जो ऑफिशियल बनना चाहती हैं और यह साबित करती हैं कि एक बार वे सही रास्ते पर चलकर सफल हो सकती हैं और अवसर पा सकती हैं।’
पांच साल से छोटे बच्चों को स्क्रिन पर बिताने चाहिए केवल 60 मिनट: डब्ल्यूएचओ
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के नए दिशानिर्देशों के अनुसार, एक वर्ष से कम उम्र के शिशुओं को इलेक्ट्रॉनिक स्क्रीन से बिल्कुल भी परिचित नहीं होना चाहिए और पांच साल से कम उम्र के बच्चों के लिए स्क्रीन देखने का समय एक दिन में एक घंटे से अधिक नहीं होना चाहिए। इन दिशानिर्देशों को वैश्विक मोटापे के संकट से निपटने के लिए एक अभियान के तहत जारी किया गया है, जिसमें यह सुनिश्चित किया गया कि छोटे बच्चे फिट रहें और उनका विकास अच्छी तरह से हो, खासकर जीवन के पहले पांच वर्षों में, जिस दौरान बच्चों के विकास का आजीवन उसके स्वास्थ्य पर प्रभाव रहता है। संयुक्त राष्ट्र की स्वास्थ्य एजेंसी ने पहली बार पांच साल से छोटे बच्चों के लिए विशेष रूप से दिशानिर्देश तैयार किए हैं, जिसमें कहा गया कि दुनिया भर में लगभग 4 करोड़ बच्चों का वजन सामान्य से अधिक है, जो कुल का लगभग छह प्रतिशत हैं। उनमें से आधे अफ्रीका और एशिया के हैं।
डब्ल्यूएचओ ने कहा कि पांच साल से कम उम्र के बच्चों को स्क्रीन देखने में बहुत कम समय बिताना चाहिए, या प्रैम और सीट पर एक ही जगह नहीं बैठे रहना चाहिए। स्वस्थ रहने के लिए पूरी नींद लेनी चाहिए और सक्रिय खेलकूद पर अधिक समय देना चाहिए। डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक टेड्रोस एडनॉम घेब्रियेसस ने कहा, ‘सभी लोगों के स्वस्थ रहने का मतलब लोगों के जीवन की शुरुआत से स्वास्थ्य का ध्यान रखना है।’ घेब्रियेसस ने कहा, ‘बचपन के प्रारंभिक दौर में बच्चों का विकास तेजी से होता है और यह ऐसा समय है जब स्वस्थ रहने के लिए परिवार की जीवन शैली को उसके अनुकूल ढाला जा सकता है।’
भारतीय मूल की गायिका ने 6 धुनों पर गाई हनुमान चालीसा
भारतीय मूल की दक्षिण अफ्रीकी गायिका वंदना नारन के छह अलग-अलग धुनों पर हनुमान चालीसा गाकर उसकी सीडी लांच करने के बाद बधाई संदेशों की बाढ़ आ गई है। जोहान्सबर्ग के दक्षिण स्थित इंडियन टाउनशिप लेनासिया में आयोजित वार्षिक संयुक्त हनुमान चालीसा कार्यक्रम में नारन ने कुछ पर प्रस्तुतियां भी दीं।
कार्यक्रम में देश भर के भजन समूहों ने 20-20 मिनट के सत्र में 12 घंटे तक बिना रुके प्रार्थना का जाप किया। नारन ने कहा, ‘हमने इस सीडी में हनुमान चालीसा की विभिन्न धुनों को एक साथ रखने का फैसला किया ताकि यह हर आयु वर्गों के लोगों को आकर्षित कर सके।’ उन्होंने कहा, ‘पारम्परिक धुन बुजुर्गों को अधिक आकर्षित करेंगी, युवाओं के लिए इसमें अधिक आधुनिक संगीत है, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक संगीत का उपयोग शामिल है।’ नारन के मुताबिक, ‘इनके बोल वही हैं लेकिन प्रस्तुतियां अलग-अलग धुनों पर हैं।’ नारन के पूरे परिवार ने नेल्सन मंडेला की 150वीं पुण्यतिथि पर गतवर्ष आयोजित कार्यक्रम में भी प्रस्तुति दी थी।
वंदना नारन ने कई स्थानीय स्पर्धाएं जीती हैं और अंतरराष्ट्रीय प्रस्तुतियां भी दी हैं। उन्होंने अमेरिका में बचपन से अपनी बहन जागृति के साथ शास्त्रीय संगीत में प्रशिक्षण लिया, जहां उनके पिता जगदीश ने चार साल के लिए काम किया था। दक्षिण अफ्रीका आने के बाद उनकी संगीत में रुचि और बढ़ गई। यहां आने के बाद नारन ने गायन पर ध्यान लगाया और जागृति ने संगीत रचना पर। उनका पूरा परिवार संगीत में रुचि रखता है।
पैरों से लिखी परीक्षा और प्रथम श्रेणी से पास हुए तुषार
लखनऊ : लखनऊ के अमौसी स्थित अवध विहार कॉलोनी के राजेश विश्वकर्मा के बेटे तुषार ने परीक्षा में बड़ी सफलता पायी। सरोजिनीनगर के क्रिएटिव कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ने वाला तुषार दोनों हाथों से दिव्यांग हैं। जिसके कारण उसे लिखने में दिक्कत होती थी। मगर लगन के पक्के तुषार ने पढ़ाई नहीं छोड़ी। कठिन परिश्रम व अभ्यास के जरिए पैरों से हाथ का भी काम लेना शुरू कर दिया। इसका नतीजा शनिवार को आया, जब पता चला कि तुषार ने 67 प्रतिशत से 10वीं की बोर्ड परीक्षा पास कर ली है। तुषार ने अपनी मेहनत और आत्मविश्वास से उन लोगों के लिए मिसाल पेश की है जो छोटी-छोटी मुश्किलें आने पर ही जीवन से हार जाते हैं। पिता राजेश विश्वकर्मा बताते हैं कि तुषार ने यह सिद्ध कर दिया कि मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। तीन भाई बहनो में तुषार सबसे छोटा है। बाकी दोनों बच्चे सामान्य हैं पर तुषार को जन्म से शारीरिक दिक्कत है। अपने भाई-बहन को स्कूल जाता देख वह भी साथ जाने की जिद करता। पहले उसे घर पर ही पढ़ाने की कोशिश हुई लेकिन उसकी जिद स्कूल जाने की थी, सो परिवार को मानना पड़ा। पहले काफी परेशानी हुई लेकिन फिर अपनी कोशिशों, शिक्षको के प्रोत्साहन से तुषार ने पैरों से लिखना शुरू किया और आज मिसाल बन चुका है।
‘चीन की जगह भारत को विनिर्माण का केंद्र बनाने को इच्छुक हैं 200 अमेरिकी कम्पनियां’
वाशिंगटन : अमेरिका की करीब 200 कंपनियां अपना विनिर्माण केंद्र आम चुनाव के बाद चीन से भारत ले जाना चाहती हैं। अमेरिका और भारत के संबंधों को मजबूत बनाने की पैरवी करने वाले स्वयंसेवी समूह यूएस-इंडिया स्ट्रेटजिक एंड पार्टनरशिप फोरम ने यह टिप्पणी की है। समूह ने कहा कि चीन की जगह कोई अन्य विकल्प तलाश कर रही कंपनियों के लिये भारत में शानदार अवसर उपलब्ध हैं। समूह के अध्यक्ष मुकेश अघी ने कहा कि कई कंपनियां उनसे बात कर रही हैं और पूछ रही हैं कि भारत में निवेश कर किस तरह से चीन का विकल्प तैयार किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि समूह नयी सरकार को समूह सुधारों को तेज करने तथा निर्णय लेने की प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने का सुझाव देगा। उन्होंने पीटीआई भाषा को एक साक्षात्कार में कहा, ‘‘मुझे लगता है कि यह संवेदनशील है। हम प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता लाने तथा 12 से 18 महीने में इसे अधिक परामर्श योग्य बनाने का सुझाव देंगे। हम देख रहे हैं कि ई-कॉमर्स, डेटा का स्थानीय स्तर पर भंडारण आदि जैसे निर्णयों को अमेरिकी कंपनियां स्थानीय कारक न मानकर अंतरराष्ट्रीय कारक मान रही हैं।’ यह पूछे जाने पर कि निवेश आकर्षित करने के लिये नयी सरकार को क्या करना चाहिये, अघी ने कहा कि नयी सरकार को सुधार की गति तेज करनी चाहिये, निर्णय लेने की प्रक्रिया में पारदर्शिता लानी चाहिये तथा अधिक पक्षों के साथ परामर्श पर जोर देना चाहिये। उन्होंने भारत और अमेरिका के बीच मुक्त व्यापार समझौते की भी पैरवी की।
चिकित्सा विज्ञान की श्रेष्ठता को पछाड़ 27 साल बाद कोमा से लौटी महिला
नयी दिल्ली : संयुक्त अरब अमीरात की एक महिला ने चिकित्सा विज्ञान की प्रधानता को धता बताते हुए 27 साल बाद अपनी चेतना को वापस पा लिया। दरअसल महिला 27 साल पहले एक सड़क हादसे का शिकार हो गई थीं। दिमाग में गंभीर चोट लगने से वह कोमा में चली गई थीं। मुनिरा अब्दुल्ला का वर्ष 1991 में सड़क दुर्घटना में जख्मी होने के बाद वह सालों तक अचेत रहीं। घटना के 27 साल बाद जून 2018 में पहली बार अब्दुल्ला ने जर्मनी के एक क्लिनिक में अपनी आंखें खोलीं। डॉक्टर वहां सालों से उनका उपचार कर रहे थे। महिला के 32 वर्षीय बेटे ओमर ने कहा, ‘मैंने उनको लेकर कभी हार नहीं मानी, क्योंकि मुझे हमेशा ऐसा लगता था कि एक दिन वह जरूर उठकर बैठेंगी।’ महिला के साथ जब यह हादसा हुआ तब ओमर चार साल के थे। डॉक्टर मुलर ने कहा, ‘महिला के चामत्कारिक रूप से ठीक होने का पहला संकेत पिछले साल दिखाई पड़ा, जब अब्दुल्ला ने अपने बेटे का नाम लेना शुरू किया। पहले तो हमें विश्वास नहीं हुआ, लेकिन आखिर में यह साफ हो गया कि वह अपने बेटे का ही नाम ले रही थीं।’ डॉक्टरों ने बताया कि उसके दो हफ्ते बाद महिला कुरान की आयतें दोहराने लगी, जो उन्होंने दशकों पहले सीखी थीं। अब्दुल्ला जैसे केस में ठीक होने की उम्मीद बेहद कम रहती है। ऐसे चंद लोग ही हैं, जो इस अवस्था में स्वस्थ हो पाए हैं। ऐसा एक मशहूर केस टेरी वॉलिस का है, जिन्होंने कोमा में जाने के दो दशक बाद पहला शब्द ‘मॉम’ बोला था। मुनिरा अब्दुल्ला संयुक्त अरब अमीरात लौट चुकी हैं और अबू धाबी में उनका इलाज चल रहा है।
जानबूझकर कर्ज न चुकाने वालों नामों का खुलासा करे आरबीआई : सुप्रीम कोर्ट
नयी दिल्ली : भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत जानबूझकर कर्ज न चुकाने वालों समेत बैंकों व अन्य वित्तीय संस्थानों की वार्षिक ऑडिट रिपोर्ट का खुलासा करना ही होगा। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि राष्ट्रीय आर्थिक हित का हवाला देकर आरबीआई आरटीआई के तहत बैंकों की वार्षिक जांच रिपोर्ट आदि का खुलासा करने से इनकार नहीं कर सकती, जब तक कोई कानून उसके आड़े नहीं आ रहा हो। जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस एमआर शाह की पीठ ने आरटीआई के तहत बैंकों से संबंधित सूचना का खुलासा करने के लिए आरबीआई से अपनी नीति की समीक्षा करने के भी निर्देश दिए। पीठ ने कहा कि यह कानून के तहत उसकी ड्यूटी की बाध्यता है। साथ ही आरबीआई को 30 दिसंबर, 2016 को जारी उस डिस्क्लोजर (प्रकटन) नीति को वापस करने का आदेश दिया है जिसमें जानबूझकर कर्ज न चुकाने वालों, बैंकों की वार्षिक जांच रिपोर्ट आदि से संबंधित जानकारी का खुलासा नहीं करने की बात थी। आरबीआई का कहना था कि इस नीति के तहत इन जानकारियों का खुलासा न करना उसके नियंत्रण और नियम के तहत है। पीठ ने इस पर नाराजगी जताई कि 16 दिसंबर 2015 के उसके आदेश का पालन नहीं किया गया। अपने आदेश में कोर्ट ने आरटीआई के तहत आरबीआई को बैंकों व अन्य वित्तीय संस्थानों की वार्षिक जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक करने का आदेश दिया था। पीठ ने कहा कि आरटीआई के तहत आरबीआई बैंकों की वार्षिक रिपोर्ट समेत अन्य जानकारी को सार्वजनिक करने के लिए बाध्य है, बशर्ते कोई मामला देश की सुरक्षा से जुड़ा न हो। हमारे आदेश का पालन न किए जाने पर हम सख्त रुख अपना सकते थे लेकिन अब आरबीआई को डिस्क्लोजर पॉलिसी को वापस लेने का आखिरी मौका देते हैं। कोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि फिर से आदेश की अवहेलना की गई तो वह उसे बेहद गंभीरता से लेगा। दिसंबर, 2015 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद आरबीआई 30 दिसंबर, 2016 को डिस्क्लोजर पॉलिसी लेकर आई थी। इसमें आरटीआई के तहत सभी जानकारी का खुलासा न करने की बात थी।
अवमानना याचिका दायर की थी
2015 के आदेश का पालन नहीं करने पर आरटीआई कार्यकर्ताओं सुभाष चंद्र अग्रवाल, गिरीश मित्तल समेत अन्य ने आरबीआई के खिलाफ अवमानना याचिका दायर की थी। याचिका में कहा गया था कि आरबीआई ने आर्थिक हित, व्यावसायिक विश्वास, भरोसे का संबंध या जनहित का हवाला देते हुए जानकारी देने से इनकार कर दिया। याचिकाकर्ताओं ने आरबीआई से आईसीसीआई बैंक, आईसीआईसीआई बैंक, एक्सिस बैंक, एचडीएफसी बैंक और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की वार्षिक जांच रिपोर्ट के अलावा सहारा समूह की कंपनियों से संबंधित जानकारी मांगी थी। एक अन्य याचिकाकर्ता ने विदेशी डेरिवेटिव कांट्रेक्ट मामलों में देश को हुए 32000 करोड़ रुपये के नुकसान के बारे में बैंकवार जानकारी मांगी थी।
पीएम मोदी ने जिनके पैर छुए, उनके आगे इंग्लैंड भी झुका
वाराणसी : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाराणसी लोकसभा सीट से परचा दाखिल करने के बाद जिन अन्नपूर्णा शुक्ला के पांव छुए थे, उन्होंने ही इंग्लैंड को भी झुकने के लिए मजबूर कर दिया था। अन्नपूर्णा की ही देन है कि आज दुनिया भर के हर ‘बेबी फ़ूड’ पर लिखा होता है कि ‘मां का दूध बच्चे के लिए सबसे उपर्युक्त आहार है’. अन्नपूर्णा वाराणसी लोकसभा सीट पर 2019 के चुनावों के लिए इस बार पीएम मोदी की चार प्रस्तावकों में से एक हैं.
आपने अक्सर बेबी फ़ूड प्रोडक्ट्स पर लिखा देखा होगा कि, ‘मां का दूध नवजात के लिए बेहद जरूरी है क्योंकि यह बच्चों में रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास करता है।’ खासकर बच्चों के लिए आने वाले दूध के पाउडर के डब्बों पर ये ज़रूर लिखा रहता है। अन्नपूर्णा शुक्ला ने ही अपनी रिसर्च में पाया था कि माँ के दूध से बेहतर नवजात बच्चों के लिए कुछ भी नहीं है। इस रिसर्च के सामने आने के बाद ब्रिटेन की सबसे बड़ी बेबी फूड कंपनी ने इस बात को अपने हर प्रोडक्ट की पैकेजिंग के साथ छापना शुरू किया था।
बता दें कि अन्नपूर्णा की रिसर्च को ध्यान में रखकर ही ड़ब्ल्यूएचओ (वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन) ने नवजात के लिए छह महीनों तक मां का दूध ज़रूरी करार दिया था। उनकी ये रिसर्च साल 1969-72 में ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में प्रकाशित हुई थी। ये उनकी पीएचडी का रिसर्च टॉपिक भी था। अन्नपूर्णा बताती हैं कि हमने पाया था कि जो लोग नवजात के स्तनपान पर ध्यान नहीं दे रहे थे उनके बच्चे ओवरवेट और कम सक्रिय थे। इन रिसर्च के बाद कुछ बेबी फ़ूड कंपनियों ने तो ये सन्देश छापने पर सहमति दे दी थी लेकिन कुछ ऐसा करने पर ऐतराज जाता रहे थे जिन्हें ड़ब्ल्यूएचओ के निर्देशों के बाद ऐसा करना पड़ा था।
अन्नपूर्णा ने एक अंग्रेजी अखबार से बातचीत में बताया कि जब मोदी ने उनके पांव छुए तो उन्होंने सिर्फ इतना कहा- ‘तुम और ऊंचे शिखर पर जाओगे।’ बता दें कि अन्नपूर्णा शुक्ला को मदन मोहन मालवीय की मानस पुत्री माना जाता है। अन्नपूर्णा शुक्ला बीएचयू महिला महाविद्यालय की प्रोफ़ेसर रही हैं और उन्होंने मेडिकल की पढ़ाई भी बीएचयू से ही की है। अन्नपूर्णा लहुराबीर स्थित काशी अनाथालय की संस्था वनिता पॉलीटेक्निक की मानद निदेशिका भी हैं। अन्नपूर्णा शुक्ला के पति बीएन शुक्ला गोरखपुर विवि के कुलपति रह चुके हैं और रूस में भारत के राजनयिक भी रहे हैं।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के पहले स्वतंत्रता सेनानी तिलका मांझी
साल 1857 में मंगल पांडे की बन्दुक से निकली गोली ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ़ विद्रोह का आगाज़ किया। इस विद्रोह को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का पहला विद्रोह माना जाता है और मंगल पांडे को प्रथम क्रांतिकारी। हालांकि, 1857 की क्रांति से लगभग 80 साल पहले बिहार के जंगलों से अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ़ जंग छिड़ चुकी थी। इस जंग की चिंगारी फूंकी थी एक आदिवासी नायक, तिलका मांझी ने, जो असल मायनों में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के पहले क्रांतिकारी थे। भले ही आपको हमारे इतिहास में तिलका मांझी के योगदान का कोई ख़ास उल्लेख न मिले, पर समय-समय पर कई लेखकों और इतिहासकारों ने उन्हें ‘प्रथम स्वतंत्रता सेनानी’ होने का सम्मान दिया है। महान लेखिका महाश्वेता देवी ने तिलका मांझी के जीवन और विद्रोह पर बांग्ला भाषा में एक उपन्यास ‘शालगिरर डाके’ की रचना की। एक और हिंदी उपन्यासकार राकेश कुमार सिंह ने अपने उपन्यास ‘हुल पहाड़िया’ में तिलका मांझी के संघर्ष को बताया है। तिलका मांझी का जन्म 11 फरवरी, 1750 को बिहार के सुल्तानगंज में ‘तिलकपुर’ नामक गाँव में एक संथाल परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम सुंदरा मुर्मू था। वैसे उनका वास्तविक नाम ‘जबरा पहाड़िया’ ही था। तिलका मांझी नाम तो उन्हें ब्रिटिश सरकार ने दिया था। पहाड़िया भाषा में ‘तिलका’ का अर्थ है गुस्सैल और लाल-लाल आँखों वाला व्यक्ति। साथ ही वे ग्राम प्रधान थे और पहाड़िया समुदाय में ग्राम प्रधान को मांझी कहकर पुकारने की प्रथा है। तिलका नाम उन्हें अंग्रेज़ों ने दिया। अंग्रेज़ों ने जबरा पहाड़िया को खूंखार डाकू और गुस्सैल (तिलका) मांझी (समुदाय प्रमुख) कहा। ब्रिटिशकालीन दस्तावेज़ों में भी ‘जबरा पहाड़िया’ का नाम मौजूद हैं पर ‘तिलका’ का कहीं उल्लेख नहीं है।

तिलका ने हमेशा से ही अपने जंगलो को लुटते और अपने लोगों पर अत्याचार होते हुए देखा था। गरीब आदिवासियों की भूमि, खेती, जंगली वृक्षों पर अंग्रेज़ी शासकों ने कब्ज़ा कर रखा था। आदिवासियों और पर्वतीय सरदारों की लड़ाई अक्सर अंग्रेज़ी सत्ता से रहती थी, लेकिन पर्वतीय जमींदार वर्ग अंग्रेज़ी सत्ता का साथ देता था। धीरे-धीरे इसके विरुद्ध तिलका आवाज़ उठाने लगे। उन्होंने अन्याय और गुलामी के खिलाफ़ जंग छेड़ी। तिलका मांझी राष्ट्रीय भावना जगाने के लिए भागलपुर में स्थानीय लोगों को सभाओं में संबोधित करते थे। जाति और धर्म से ऊपर उठकर लोगों को देश के लिए एकजुट होने के लिए प्रेरित करते थे। साल 1770 में जब भीषण अकाल पड़ा, तो तिलका ने अंग्रेज़ी शासन का खज़ाना लूटकर आम गरीब लोगों में बाँट दिया। उनके इन नेक कार्यों और विद्रोह की ज्वाला से और भी आदिवासी उनसे जुड़ गये। इसी के साथ शुरू हुआ उनका ‘संथाल हुल’ यानी कि आदिवासियों का विद्रोह। उन्होंने अंग्रेज़ों और उनके चापलूस सामंतो पर लगातार हमले किए और हर बार तिलका मांझी की जीत हुई। साल 1784 में उन्होंने भागलपुर पर हमला किया और 13 जनवरी 1784 में ताड़ के पेड़ पर चढ़कर घोड़े पर सवार अंग्रेज़ कलेक्टर ‘अगस्टस क्लीवलैंड’ को अपने जहरीले तीर का निशाना बनाया और मार गिराया। कलेक्टर की मौत से पूरी ब्रिटिश सरकार सदमे में थी। उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि जंगलों में रहने वाला कोई आम-सा आदिवासी ऐसी हिमाकत कर सकता है। साल 1771 से 1784 तक जंगल के इस बेटे ने ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध लंबा संघर्ष किया। उन्होंने कभी भी समर्पण नहीं किया, न कभी झुके और न ही डरे। उन्होंने स्थानीय सूदखोर ज़मींदारों एवं अंग्रेज़ी शासकों को जीते जी कभी चैन की नींद सोने नहीं दिया। अंग्रेज़ी सेना ने एड़ी चोटी का जोर लगा लिया, लेकिन वे तिलका को नहीं पकड़ पाए। ऐसे में, उन्होंने अपनी सबसे पुरानी नीति, ‘फूट डालो और राज करो’ से काम लिया। ब्रिटिश हुक्मरानों ने उनके अपने समुदाय के लोगों को भड़काना और ललचाना शुरू कर दिया। उनका यह फ़रेब रंग लाया और तिलका के समुदाय से ही एक गद्दार ने उनके बारे में सूचना अंग्रेज़ों तक पहुंचाई। सूचना मिलते ही, रात के अँधेरे में अंग्रेज़ सेनापति आयरकूट ने तिलका के ठिकाने पर हमला कर दिया। लेकिन किसी तरह वे बच निकले और उन्होंने पहाड़ियों में शरण लेकर अंग्रेज़ों के खिलाफ़ छापेमारी जारी रखी। ऐसे में अंग्रेज़ों ने पहाड़ों की घेराबंदी करके उन तक पहुंचने वाली तमाम सहायता रोक दी। इसकी वजह से तिलका मांझी को अन्न और पानी के अभाव में पहाड़ों से निकल कर लड़ना पड़ा और एक दिन वह पकड़े गए। कहा जाता है कि तिलका मांझी को चार घोड़ों से घसीट कर भागलपुर ले जाया गया। 13 जनवरी 1785 को उन्हें एक बरगद के पेड़ से लटकाकर फांसी दे दी गई थी। जिस समय तिलका मांझी ने अपने प्राणों की आहुति दी, उस समय मंगल पांडे का जन्म भी नहीं हुआ था। ब्रिटिश सरकार को लगा कि तिलका का ऐसा हाल देखकर कोई भी भारतीय फिर से उनके खिलाफ़ आवाज़ उठाने की कोशिश भी नहीं करेगा। पर उन्हें यह कहाँ पता था कि बिहार-झारखंड के पहाड़ों और जंगलों से शुरू हुआ यह संग्राम, ब्रिटिश राज को देश से उखाड़ कर ही थमेगा। तिलका के बाद भी न जाने कितने आज़ादी के दीवाने हंसते-हंसते अपनी भारत माँ के लिए अपनी जान न्योछावर कर गये। आज़ादी की इस लड़ाई में अनगिनत शहीद हुए, पर इन सब शहीदों की गिनती जबरा पहाड़िया उर्फ़ तिलका मांझी से ही शुरू होती है। तिलका मांझी आदिवासियों की स्मृतियों और उनके गीतों में हमेशा ज़िंदा रहे। न जाने कितने ही आदिवासी लड़ाके तिलका के गीत गाते हुए फांसी के फंदे पर चढ़ गए। अनेक गीतों तथा कविताओं में तिलका मांझी को विभिन्न रूपों में याद किया जाता है-




