Sunday, July 5, 2026
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हम सब में कुछ कर गुजरने की अपूर्व क्षमता है

शिक्षण, पत्रकारिता, रंगमंच से लेकर उद्यमी बनने का सफर तय किया है पीहू पापिया ने। इस समय प्रतिष्ठित क्ष्री चैतन्य स्कूल, डनलप शाखा की हिन्दी की शिक्षिका हैं। जनवरी 2019 में हिन्दी ज्ञान, हिन्दी कार्य और हिन्दी कारवाँ संस्था द्वारा आयोजित हिन्दी शिक्षण प्रतियोगिता में द्वितीय पुरस्कार से सम्मानित हुईं। 2017 के दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में पहली पुस्तक का विमोचन हुआ है। रॉक क्लाइम्बिंग के रोमांचक खेल को भी आजमाया है। पापिया ने सफलतापूर्वक पश्चम बंगाल के पुरुलिया जिले में स्थित दो पहाड़ जयचंडी (2003) और माटाबुरो (2004) की चढ़ाई की है। बिंग विमेन संगठन की ओर से फलक 2019 के अंतर्गत नयी दिल्ली में स्वयं सिद्धा सम्मान (पश्चिम बंगाल) से सम्मानित हो चुकी हैं। पीहू पापिया से अपराजिता की मुलाकात, पेश हैं प्रमुख अंश –

मेरे बारे में
जन्म 2 फरवरी 1981, कोलकाता में हुआ। स्कूल केन्द्रीय विद्यालय बैरकपुर (वायुसेना) जिसे मिनी इंडिया कहती हूं। मेरा मानना है कि प्राथमिक तौर पर व्यक्तित्व निर्माण में स्कूल की महत्वपूर्ण भूमिका रहती। प्रेसीडेंसी कालेज, कोलकाता से पढ़ी फिर विश्वविद्यालय कलकत्ता विश्व विद्यालय से एम ए किया। कुछ अलग करने का जज्बा है। बेटी आर्या को एक बेहतर जिन्दगी व भविष्य देने का सपना है। दुनिया घूमने की चाहत है।
मीडिया में होता है भेदभाव
सच कहूँ तो मीडिया जगत से जुड़ने की कई वजहें थीं। एक जुनून, एक रोमांच सा खुद के अंदर महसूस करती थी, लेखन जगत को और संजीदगी से लेने से पहले बहुत सीखना चाहती थी। साथ ही मुझे ट्रेवलिंग यानी सफर का बहुत शौक है। इसलिए स्कूली दिनों में ही पत्रकारिता को अपना भावी पेशा चुन लिया था। यहाँ से मैंने बहुत कुछ जाना, सीखा और समझा। सन्मार्ग, प्रभात खबर, युवा शक्ति आदि समाचार पत्रों के साथ संलग्न रही। मैं नियमित क्षेत्र नहीं छोड़ना चाहती थी परन्तु कुछ निजी कारणों से मुझे ऐसा करना पड़ा जिसका मुझे अफसोस है। बच्चे मेरे दिल की धड़कन हैं। शायद उनका प्यार मुझे शिक्षा जगत में खींच लाया। पर जिन्दगी का सफर बड़ा ही अप्रत्याशित है। देखते है आगे के सफर में मेरे लिए क्या सरप्राइज छिपा है। आठ वर्ष पत्रकारिता के क्षेत्र में काम किया है। कई तरह के अनुवाद कार्य किये हैं जिसमें एक बंगला फिल्म की पटकथा का अनुवाद, लेख, विज्ञापन, समाचार, राजनीतिक प्रचार सामग्री, किताब, स्लोगन आदि शामिल है। मैं अँग्रेजी से हिन्दी व बांग्ला से हिन्दी में अनुवाद करती हूँ। मेरे ब्लॉग का नाम जुनूनी फितूर है। मेरी कलम को वहाँ प्राण मिलते हैं। महिला पत्रकारों की स्थिति पर बात करूँ तो मैं जानती हूँ पेशेवर जगत में आज भी राज्य, क्षेत्र, जिला, लिंग (जेंडर) को लेकर भेदभाव होता है। हर किसी को अपनी काबिलयत दिखाने का मौका मिलना चाहिए। साथ ही मैं मानती हूँ कि महिला सुरक्षा, स्वास्थ्य सुरक्षा का अधिकारों का पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए।
खुद को सीमाओं में बांधना पसंद नहीं
मैं स्वयं को खुशनसीब मानती हूँ कि ईश्वर ने मुझे हुनर दिये। इसलिए खुद को सीमाओं में बांधना पसंद नहीं। आज अगर मुझे कोई पुछता है कि क्या कर रही हो तो मैं कहती हूँ ” exploring life” यानी जीवन की खोज में निकली हूँ। इस छोटी सी जिन्दगी में नकारात्मक में वक्त बरबाद क्यों किया जाए। जी भर कर जी लेना चाहिए। कृत्रिम गहने बनाने का व्यवसाय शुरू करना मेरे उसी सफर का हिस्सा है। इसमें लेखन की तरह सृजन का सुकून मिलता है। मेरे ब्रांड का नाम “पीहू – हैंड मेड ट्रेजर” है, जो शनैः शनैः लोकप्रियता अर्जन कर रहा है। मैं ” औरा स्टूडियो” नामक फैशन फोटोग्राफी हाउस के लिए मॉडलों के लिए फैशन ज्वेलरी और एक्ससरीज़ डिजाइन करती व बनाती हूँ।


रंगमंच से नाता स्कूली दिनों से जुड़ गया था
रंगमंच से नाता स्कूली दिनों से जुड़ गया था। अब यह मेरे वजूद का हिस्सा बन गया है। तीन साल पहले अपने नाटक दल “कालकूट” का गठन किया था और कोलकाता के हिन्दी मेला में ‘दादी माँ का भूत’ नाटक का मंचन किया था। बच्चों के साथ काम करना बहुत भाता है। जिन्दगी की आपाधापी में शायद नियमित मंचन न कर पाऊँ पर जब-जब मंच मुझे बुलाता है निकल पड़ती हूँ एक नये यादगार सफर पर। भविष्य के कई सपने मन में संजो रखें हैं, देखते हैं कब पूरा करने का मौका मिले। मेरा एक छोटा नाटक दल है “कालकूट”। मौका मिलते ही मंच के रोमांच से रूबरू हो जाते हैं। 2016 दिसम्बर में सांस्कृतिक पुर्ननिर्माण मिशन कोलकाता द्वारा आयोजित “हिन्दी मेला” में कालकूट ने “दादी माँ का भूत” नाटक प्रस्तुत किया था जो वृद्ध व बुजुर्गों की अवस्था पर केन्द्रित था। इस नाटक के लिए मुझे “सर्वश्रेष्ठ निर्देशक” का पुरुस्कार मिला था। मैंने बांग्ला फिल्म “नॉट ए डर्टी फिल्म” में प्रसिद्ध बंगला अभिनेत्री माधवी चट्टोपाध्याय की आवाज की हिन्दी में डबिंग की है।

किसी भी प्रकार के आरक्षण के खिलाफ हूँ
मैं किसी भी प्रकार के आरक्षण के खिलाफ हूँ। कोई भी क्षेत्र या मामला हो, निर्णय मेधा से होना चाहिए। इससे गुणवत्ता बरकरार रहती है जो विकास की गति को भी बढ़ावा देती है। पुरुषों और स्त्रियों में शारीरक बल में भिन्नता है, बस उसमें एक पैमाना निर्धारित कर दिया जाए। यहाँ तक की शिक्षा, नौकरी आदि में भी कोई आरक्षण नहीं होना चाहिए। अगर हो भी तो जातिगत नहीं आर्थिक स्थिति पर हो ताकि अमीर-गरीब का भेद मिटे और सभी रूप से प्रगति कर सकें।
सशक्तिकरण की परिभाषा
मेरे लिए सशक्तिकरण की परिभाषा है – आर्थिक आत्मनिर्भरता। घर हो या बाहर कर्म की संस्कृति को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। कोई भी व्यक्ति हो वह बिना कर्म किए बैठा न रहे। कोई भीख न माँगे। इससे देश की प्रगति में हमारी हिस्सेदारी और बढ़ेगी। देश फिर से सोने की चिड़िया बन जायेगा।
लेखन क्षेत्र
एक काव्य संग्रह ” जिन्दा हूँ” प्रकाशित हो चुका है। अभी एक लघुकथा संग्रह, दो काव्य संग्रह, एक उपन्यास व एक बाल काव्य संग्रह पर काम कर रही ही। सारी बाधाओं से उभर कर जल्द ही पाठकों तक पहुँचाऊंगी। अयन प्रकाशन, नयी दिल्ली द्वारा अयन प्रकाशन की ओर से “कविता अभिराम” में चार कविता संकलित। मैं पीहू के नाम से ही लिखती हूँ। यह एक काव्य-संग्रह है। आने वाली किताबों पर अभी काम कर रही हूँ। रचनाएं पत्र-पत्रिकाओं में भी प्रकाशित हुईं।
मेरी ताकत
मेरी बेटी का प्यार, माता-पिता का बगैर किसी शर्त के सम्बल, मेरे गाड ब्रदर मानस भइया, मेंटर अनुपम भइया, मित्रों का कठिन वक्त में साथ और प्रेम मुझे जूझने की ताकत देता है।
भविष्य योजना
भविष्य में मेरे चाहने वालों के लिए बहुत सरप्राइज पड़े हैं जिनको अभी उजागर नहीं करुँगी। वैसे लेखन, ज्वेलरी डिजाइन व्यवसाय, फिल्म, संगीत, शिक्षा, अभिनय, रंगमंच आदि क्षेत्रों में बहुत काम करना है।
सन्देश
खुद को कम न आँकें। हम सब में कुछ कर गुजरने की अपूर्व क्षमता है। जिस दिन आप ऐसा कर लेंगे आपको अपने हर हौसले के आगे जीत दिखेगी।

देश महिलाओं की नेतृत्व क्षमता पर भरोसा कर रहा हैः प्रतिभा सिंह

कोलकाता : अंतर्राष्ट्रीय क्षत्रिय वीरांगना फ़ाउंडेशन पश्चिम बंगाल की अध्यक्ष तथा प्रसिद्ध गायिका प्रतिभा सिंह के नेतृत्व में कोलकाता महानगर इकाई की कार्यकारिणी का गठन किया गया। मीनू सिंह अध्यक्ष, इंदु सिंह महासचिव, राजेश्वरी सिंह उपाध्यक्ष, सुनिता सिंह सचिव, संचिता सिंह कोषाध्यक्ष तथा लाजवंती सिंह सदस्य बनायी गयीं। काशीपुर में आयोजित बैठक में कोलकाता महानगर इकाई की संरक्षिका गिरजा दारोगा सिंह और गिरजा दुर्गादत्त सिंह बनायी गयीं। इस अवसर पर प्रदेश इकाई की कार्यकारिणी की बैठक भी हुई, जिसमें प्रदेश महासचिव प्रतिमा सिंह, उपाध्यक्ष इंदु सिंह, कोषाध्यक्ष पूजा सिंह, उप कोषाध्यक्ष रीता सिंह, संयुक्त महासचिव ममता सिंह विशेष तौर पर उपस्थित थीं। बालीगंज इकाई की अध्यक्ष सुमन सिंह, सदस्य रीता सिंह, सोदपुर इकाई की महासचिव सुनिता सिंह, उपाध्यक्ष रीना सिंह, बैरकपुर इकाई की संयोजक आशा सिंह भी उपस्थित थीं। इस अवसर पर प्रदेश व अंचल इकाइयों की भावी योजनाओं पर विचार-विमर्श किया गया। प्रतिभा सिंह ने इस अवसर पर कहा कि महिलाओं को मिल-जुलकर एक दूसरे की मदद करनी होगी और उनकी बाधाओं को दूर करने में अपना योगदान देना होगा। देश में होने वाली शैक्षणिक परीक्षाओं में बेटियों ने साबित कर दिया है कि वे बेटों से कहीं अधिक मेधावी हैं। देश महिलाओं के नेतृव क्षमता पर भी भरोसा कर रहा है, यह सुखद है।

डॉ. कुसुम खेमानी को ‘मीरा स्मृति सम्मान’ एवं ‘गाथा रामभतेरी’ उपन्यास का लोकार्पण

कोलकाता : राज भवन में साहित्य भंडार, इलाहाबाद की ओर से कथाकार डॉ. कुसुम खेमानी को प्रतिष्ठित मीरा स्मृति पुरस्कार से सम्मानित किया गया| यह पुरस्कार राज्यपाल डॉ केसरीनाथ त्रिपाठी के हाथों प्रदान किया गया| इलाहाबाद से पधारे ‘मीरा स्मृति न्यास’ के सतीश चंद्र अग्रवाल ने कुसुम खेमानी का परिचय पुरस्कार से पहले पढ़कर सुनाया| साथ ही ऐसे सफल आयोजन के लिए सबका धन्यवाद किया| इसी अवसर पर कुसुम खेमानी के नए उपन्यास ‘गाथा रामभतेरी’ का लोकार्पण भी राज्यपाल के हाथों संपन्न हुआ| राज्यपाल ने उक्त अवसर पर मीरा स्मृति सम्मान के लिए कुसुम खेमानी को बधाई दी और ‘गाथा रामभतेरी’ पर अपने विचार प्रकट किए| उन्होंने कहा कि इस उपन्यास में लेखिका के अनुभव और शोध दिखता है जो उपन्यास को काफी रोचक और पठनीय बनाता है|
कुसुम खेमानी ने मीरा स्मृति सम्मान की कृतज्ञता स्वीकार करते हुए कहा कि यह साहित्य की सफलता ही है कि इतनी संख्या में लोग हॉल में उपस्थित हो जाते हैं| लोगों की उपस्थिति सृजन के लिए उत्साहित करती है|
कार्यक्रम की शुरुआत कल्लोल बनर्जी द्वारा रवींद्र संगीत के सुमधुर गायन से हुआ| कार्यक्रम का संचालन करते हुए कलकत्ता विश्‍वविद्यालय हिन्दी विभाग की प्रोफेसर राजश्री शुक्ला ने राज्यपाल की कई कविताओं का पाठ किया एवं सबों का धन्यवाद ज्ञापन किया|

राष्ट्र की भावात्मक एकता का मंच है साहित्य 

कोलकाता : नाटक और फिल्म विधाएँ इस समय व्यावसायिकता की मार झेल रही हैं लेकिन समाज को जोड़ने और सचेतन करने में इनकी एक बड़ी भूमिका है। दोनों के बीच एक समान चीज है अभिनय। भरत ने अपने नाट्य शास्त्र में यह विद्या विशेष कर समाज के साधारण वर्गों को इस उद्देश्य से दी थी कि वे इसके माध्यम से अपना दुख-सुख कह सकें। भारतीय भाषा परिषद और सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन द्वारा आज आयोजित साहित्य संवाद में विचारकों ने यह बात कही। आरंभ में इबरार खान ने अपने शोध पत्र में हिंदी और उर्दू नाटकों का तुलनात्मक विवेचन किया। इसके अलावा मधु सिंह ने हिंदी कथा साहित्य के फिल्मीकरण पर अपना आलेख पाठ किया।
आयोजन के दूसरे सत्र में युवा कवियों का काव्यपाठ हुआ। इसमें प्रियंकर पालीवाल, निर्मला तोदी, राज्यवर्द्धन, विश्‍वबंधु, सुरेश शॉ और नीलम कुमारी ने हिस्सा लिया। लेखों और कविताओं पर डॉ.अवधेश प्रसाद सिंह, जितेंद्र जीतांशु और रामप्रवेश रजक ने अपने विचार व्यक्त किए। अध्यक्षीय भाषण देते हुए डॉ.शंभुनाथ ने कहा कि हमें आत्मप्रलाप से संवाद की ओर बढ़ना होगा। इसमें सबसे अधिक सहायक हो सकता है साहित्य। साहित्य राष्ट्र की भावात्मक एकता का मंच है जहाँ किसी भेद-भाव के लिए स्थान नहीं होता। आयोजन का संचालन करते हुए विद्यासागर विश्‍वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. संजय जायसवाल ने कहा कि हमारे समय में सर्जनात्मकता और सामाजिकता के बीच संबंध आवश्यक है। मोबाइल के युग में आमने-सामने बैठ कर कविताएँ सुनना और विचारों का आदान-प्रदान करना हमारी मानवता को सींचेगा। यह आयोजन इसीलिए है।
आरंभ में भारतीय भाषा परिषद की मंत्री बिमला पोद्दार ने विद्वानों और कवियों का स्वागत करते हुए कहा कि साहित्य संवाद नई पीढ़ी का मंच है जहाँ युवा पीढ़ी का हमेशा स्वागत है। राहुल शर्मा ने धन्यवाद दिया। इस आयोजन के लिए डॉ.कुसुम खेमानी ने अपना शुभकामना संदेश भेजा था।

जितनी सहज न्यूयॉर्क में थी, उतनी ही कृष्णनगर की सड़कों पर हैं महुआ

कृष्णानगर : तृणमूल के टिकट पर लोकसभा पहुँचीं महुआ मोएत्र कॉरपोरेट जगत से हैं। तृणमूल की मुखर नेत्रियों में शामिल महुआ के मुताबिक  कृष्णनगर की गलियों तक पहुँचने का उनका सफर अमेरिका में मैसाच्यूसेट्स से शुरू हुआ था।  वह बताती हैं,  ‘मैंने वहाँ इकोनोमिक्स और मैथ्स की पढ़ाई की। ग्रेजुएशन के बाद बैंकिंग क्षेत्र में कदम रखा। धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए जेपी मॉर्गन में वाइस प्रेसिडेंट बन गई। न्यूयॉर्क और लंदन में काम किया। लेकिन, किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। कहां तो मैं लुई वितें के हैंडबैग, बॉबी ब्राउन के आइलाइनर और कारनेशन लिप कलर जैसे ब्रांड्स पसंद करती थी, लेकिन अब मुझे फुलिया कॉटन की स्थानीय साड़ी भी उतनी ही पसंद है। मुझे इन दोनों दुनियाओं में कोई टकराव नहीं दिखता। मैं न्यूयॉर्क में जितना सहज थी, उतनी ही कृष्णनगर की सड़कों पर हूँ। यह रास्ता मैंने खुद चुना है। मैंने नदिया जिले की करीमनगर सीट से विधानसभा चुनाव लड़ा। वहाँ मैंने अपने तमाम बैंकिंग अनुभव जमीन पर उतारे। 150 करोड़ रुपये के काम कराए। इसी से साबित किया कि मैं लोकसभा चुनाव के लिए प्रबल दावेदार हूँ। ममता बनर्जी को मेरा काम पसन्द आया। होलयोक कॉलेज से निकलकर मेरे साथी रियूनियन में किस्से सुनाते थे, कि कौन कहां डायरेक्टर, मैनेजिंग डायरेक्टर और प्रेसीडेंट बन गया। जुलाई 2008 में कांग्रेस की सिपाही बन गयी। राहुल गाँधी ने आम आदमी की सिपाही प्रोग्राम चलाया हुआ था। यह मेरे लिए नर्सरी थी। 2009 का चुनाव कांग्रेस ने तृणमूल के साथ मिलकर लड़ा। कृष्णानगर सीट ममता की पार्टी ने जीती। दो साल बाद मैं ममता के साथ चली गई।’ 43 साल की महुआ तृणमूल सांसद हैं। पं बंगाल के कृष्णानगर से जीती हैं। सियासत में आने से पहले जेपी मार्गन कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट थीं। 2008 में राहुल कांग्रेस में लाए।

साभार – दैनिक भास्कर

नौकरी तलाश रही थीं इंजीनियरिंग से स्नातक चन्द्राणी, बन गयीं सबसे युवा सांसद

किओन्झार (ओडिशा)  :   चन्द्राणी मुर्मू 17वीं लोकसभा में सबसे युवा सांसद बन गयी हैं। उन्होंने  2017 में मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बीटेक किया। तभी से मैं नौकरी ढूंढ रही थी। चार कम्पनियों में आवेदन किया था। सरकारी नौकरी की भी लगभग सभी परीक्षाएँ दे रखी हैं। वह बताती हैं कि  31 मार्च को अचानक उनके मामा (हरमोहन सोरेन) ने फोन करके पूछा कि चुनाव लड़ सकती हो? उन्होंने कहा, ‘सीएम नवीन पटनायक किसी पढ़ी-लिखी महिला को टिकट देने की सोच रहे हैं। मैंने तुरंत सहमति दे दी। दरअसल, मेरे नाना 1980 और 1984 में दो बार कांग्रेस से सांसद थे। नाना की वजह से मुझ पर राजनीतिक असर रहा है। एक अप्रैल को मुझे फोन आया कि सीएम मिलना चाहते हैं। मैं उनसे मिली। तब भी मुझे नहीं लगा कि टिकट मिलेगा। फिर 2 अप्रैल को मेरा नाम घोषित हो गया। अगले 45 दिन में मैं अनंत सर को हराकर सांसद बन गई। सच पूछिए तो मैं सभी इलाकों में प्रचार भी नहीं कर सकी। प्रचार के दौरान पहली बार हेलीकॉप्टर में बैठी। सोचिए, मध्यम वर्ग में हेलीकॉप्टर किसे नसीब होता है? वह वाइल्ड ड्रीम में भी हेलीकॉप्टर के बारे में नहीं सोचता। चुनाव अभियान के दौरान जब मुझे टिकट मिला मेरा एक वीडियो (मोर्फ्ड फोटो के साथ) वायरल हो रहा था। मेरे नाम से अफवाह फैली। टिकट मिलने से एक तरफ नाम हो रहा था, वहीं दूसरी ओर बदनाम किया जा रहा था। इस घटना से बहुत आहत हुई। लेकिन, सबने भरोसा मुझमें भरोसा जताया तो मैं इस सदमे से उबर आई। राजनीति में मेरी रुचि थी और मैंने सोचा था कि अगर जीवन में कभी छोटा-मोटा मौका मिलेगा तो इस दिशा में जरूर जाऊँगी। ‘
25 साल की बीजद सांसद चन्द्राणी हैं मुर्मू। ओडिशा के किओन्झार से दो बार सांसद रहे भाजपा के अनंत नायक को 66203 वोट से हराकर संसद पहुंची हैं।

यूएनओ हैल्थकेयर अवार्ड / विश्व के 10 सबसे प्रभावशाली व्यक्तियों की सूची में आचार्य बालकृष्ण

जिनेवा : पतंजलि के प्रबंध निदेशक आचार्य बालकृष्ण को यूएनओ की संस्था यूएनएसडीजी (यूनाइटेड नेशंस सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल) ने विश्व के 10 सबसे प्रभावशाली लोगों की सूची में शामिल किया है। शनिवार को उन्हें जेनेवा में यूएनएसडीजी हेल्थकेयर अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। बालकृष्ण का कहना है कि उन्हें खुशी है कि भारतीय संस्कृति के प्रसार के लिए यह सम्मान मिला। बाबा रामदेव ने उन्हें बधाई देते हुए कहा कि बालकृष्ण को यह उपलब्धि आयुर्वेद और योग के क्षेत्र में नए अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए मिली है। बालकृष्ण ने भारतीय चिकित्सा पद्धति योग व आयुर्वेद को सम्पूर्ण विश्व में फिर से स्थापित किया है। जिनेवा में शनिवार को आयोजित हुए समारोह में विश्व भर के कई लोगों को सम्मानित किया गया। यह पहली बार है जब यूएनएसडीजी ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में दुनिया भर के नामचीन लोगों को सम्मानित किया। इन लोगों ने विश्व स्तर पर स्वास्थ्य क्षेत्र में बहुमूल्य योगदान दिया है। प्राइमरी हेल्थ केयर, नॉन कम्युनिकेबल डिजीज कंट्रोल और डिजिटल हेल्थ को बढ़ाने देने के लिए बड़े पैमाने पर वित्त पोषण करना यूएनएसडीजी का लक्ष्य है। इस सम्मेलन में 50 देशों से लगभग 500 प्रतिभागियों ने भाग लिया। पतंजलि के उत्पाद आज दुनियाभर में अपनी पकड़ बना चुके हैं। 1995 में हरिद्वार में दिव्य फार्मेसी के रूप में शुरू किए गए पतंजलि ग्रुप के प्रमुख बालकृष्ण को फोर्ब्स की रईसों की सूची में भी शामिल किया गया है। उनकी निजी संपदा 25,000 करोड़ रुपये आँकी गयी है। पतंजलि के 97% शेयर बालकृष्ण के पास हैं।

वांगचुक से प्रेरणा लेकर 18 पेटेंट लेेने वाले पहले भारतीय युवा बने अजिंक्य कोत्तावार

वांगचुक से प्रेरणा लेकर 18 पेटेंट लेेने वाले पहले भारतीय युवा बने अजिंक्य कोत्तावार की कहानी

नागपुर : मेरा जन्म नागपुर में हुआ, लेकिन मेरा मूल गांव महाराष्ट्र के यवतमाल जिले का पाटनबोरी है। पिता रवींद्र पाटनबोरी में एक सीमेंट फैक्ट्री में काम करते थे। मां स्कूल में पढ़ाती थीं, इन दोनों की इतनी आय थी कि बस घर चल जाता था। मेरी नौवीं तक की पढ़ाई पाटनबोरी में हुई। आगे की पढ़ाई के लिए मैं यवतमाल आ गया, लेकिन स्कूल में मन नहीं लगता था। फिल्म थ्री-इडियट्स से मशहूर हुए सोनम वांगचुक का वायरस मेरे अंदर घुसा हुआ था। मैं भी कोई आविष्कार करना चाहता था। माता-पिता को पता चला तो उन्होंने डांटा कि पहले ग्रेजुएशन कर लो, फिर जो चाहो करना। अच्छे अंक लाओगे तो नौकरी भी अच्छी मिलेगी।

12वीं के बाद मैकेनिकल इंजीनियरिंग में प्रवेश लिया तो मेरी दबी हुई प्रतिभा को पंख लगना शुरू हो गए। 2013 में सेकंड ईयर में 21 वर्ष का था तब मैंने ‘ए वेरीएबल वॉल्यूम पिस्टन सिलेंडर असेंबली’ यंत्र बनाया। इसे किसी गाड़ी में फिट करने पर वह अलग-अलग सीसी में बदल सकती थी। आविष्कार लेकर मैंने एक बड़ी भारतीय कार निर्माता कंपनी से संपर्क किया तो उन्होंने तारीफ करते हुए कहा कि कमर्शियली यह अफोर्डेबल नहीं है। 2013 में आगे की पढ़ाई के लिए मैं एनआईटी सिलचर गया। मैं पास के गांवों में ग्रामीणों से मिलकर उनकी परेशानियां समझता था। मैं चाहता था कि उनकी परेशानी दूर करने के लिए कोई प्रयोग करूं। वहां मैंने चाय की पत्ती से बायोडीजल बनाया, लेकिन कॉलेज प्रशासन को यह नागवार गुजरा। कॉलेज ने कहा कि यहां यह सब नहीं कर सकते तो मैंने कॉलेज ही छोड़ दिया। वैसे भी किताबों व डिग्री में मेरी रुचि नहीं थी। इसी वर्ष मैंने नया प्रयोग किया, जिसमें किसी कार को डीजल व पेट्रोल दोनों से चला सकते थे। पेटेंट कराकर जब महिन्द्रा कंपनी को बताया तो उन्होंने इस्टीमेट बनाकर बताया कि यह तकनीक काफी महंगी पड़ेगी। यदि गाड़ी मार्केट में नहीं चली तो? 2015 में जब इंजीनियरिंग कर चुका था तब मैंने वॉटर फिल्टर बनाया। हमारे गांव में नदी है, लेकिन वॉटर सप्लाय सिस्टम नहीं होने से बर्तनों में पानी लाना पड़ता था।

मैंने 200 लीटर के एक ड्रम में फिल्टर लगाकर उसे पहिए वाली गाड़ी पर फिट कर दिया। नदी का पानी घर लाते समय रास्ते में ड्रम घूमता था, जिससे पानी घर आते-आते फिल्टर हो जाता था। यह इतना फिल्टर हो जाता है कि पीने योग्य हो जाए। ग्रामीण इससे बहुत खुश हुए। देश में निर्मित बैटरी वाली कार एक बार चार्ज करने पर 120 किमी चलती है। मैंने हाईब्रिड तकनीक का इस्तेमाल कर साबित किया कि बैटरी खत्म होने के बाद वही कार दो लीटर फ्यूल में 160 किमी और चलेगी। यानी बैटरी और दो लीटर फ्यूल में 280 किमी। मेरा इन्वेंशन जुड़ने के बाद गाड़ी अब फ्यूल व बैटरी से 300 किमी चलती है। कार कंपनी को मेरा पेटेन्ट पसंद आया। मैं उनके साथ इस पर काम कर रहा हूं। इस बीच 12 आविष्कारों का पेटेंट अपने नाम कराकर 2016 में सोनम वांगचुक से मिलने लद्दाख गया। उन्होंने कहा अपने क्षेत्र में अपने लोगों के बीच काम करो, उन्हें तुुम्हारी जरूरत होगी। 26 की उम्र में 18 अाविष्कारों के अंतरराष्ट्रीय पेटेंट मेरे नाम हैं। इस उम्र में मैं यह उपलब्धि हासिल करने वाला पहला भारतीय हूं। इसके बाद मैं यवतमाल जिले के स्कूल-कॉलेजों में ग्राउंड पर बच्चों से विचार साझा करने लगा। यह बात शिक्षण संस्थानों को पता चली तो वे प्रभावित हुए। शिक्षण संस्थानों ने मुझे इजाजत दी तो मैंने अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों की टीम बनाई और बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया। यवतमाल में ही करीब 22 हजार विद्यार्थियों को मैं पढ़ा चुका था। अप्रैल 2019 तक सभी जगह के 52 हजार विद्यार्थियों को मैंने पढ़ाया है। मैंने इसकी कभी कोई फीस नहीं ली।

2018 में मैंने अपने ‘ज्ञान फाउंडेशन’ की स्थापना की। पांचवीं से 10वीं कक्षा तक का पाठ्यक्रम मॉडल बनाया ताकि बच्चे पढ़कर नहीं, देख व प्रयोग कर विषय में पारंगत हो सकें। शिक्षा के सरलीकरण के लिए मैंने 4 हजार से अधिक प्रोजेक्ट बनाए। गणित को सरल बनाने के लिए 500 मॉडल बनाए, जिनसे 2500 कॉन्सेप्ट सीख सकते हैं। विज्ञान, भूगोल और इतिहास के भी प्रोजेक्ट बनाए, इसमें खेल-खेल में पढ़ा गया बच्चे कभी नहीं भूलते। फाउंडेशन के माध्यम से हम स्कूलों में वर्कशॉप चलाते हैं। मैंने दिसंबर 2018 में यवतमाल में एक्टिविटी सेंटर शुरू किया। राज्य में ऐसे 12 सेंटर शुरू करना चाहता हूं। यहां काम करने वाले स्वयंसेवकों को प्रशिक्षण दे रहा हूं। ये स्वयंसेवक गांव-खेड़े में बच्चों को सिखाएंगे। चूंकि फैकल्टी और अन्य कार्य के लिए पैसा चाहिए, इसलिए आने वाले बच्चों से मैं बहुत नॉमिनल फीस लेता हूं। जो नहीं दे सकते, उनके लिए माफ है। मेरा इरादा इसे देशभर में फैलाना है।

एडवांस सोलर सिस्टम पर काम कर रहा हूं। प्रयोग सफल रहा तो सामान्य पेनल से 30% अधिक एफिशियंसी मिल सकती है। ऑटोमेटिक क्लिनिंग सिस्टम से आउटपुट बढ़ जाएगा। एजुकेशन सिस्टम- 4000 प्रयोग ज्यादातर स्कूलों में इस्तेमाल हो रहे हैं। 70 किमी से अधिक माइलेज देने वाली फोर व्हीलर मैंने बनाई। इस पर महिन्द्रा के साथ काम कर रहा हूं। 150 किमी प्रतिलीटर से ज्यादा एवरेज देने वाली टू व्हीलर बनाई। पोर्टेबल मोबाइल चार्जर, जो व्हीकल पर चलते समय हवा से चार्ज करता है। वॉटर हार्वेस्टर, इसके कारण सूख चुके बोरिंग गर्मी में भी पानी दे रहे हैं। व्हीकल ट्रैकिंग एंड एक्सीडेंटल सिस्टम से चोरी गई गाड़ी पकड़ सकते हैं। साथ ही दुर्घटना होने पर रिश्तेदारों को सूचना के साथ लोकेशन मिलत जाती है।

(साभार – दैनिक भास्कर)

जब घोड़ी पर निकली दुल्हन

बसोली (बूंदी) : गुढ़ाबांध पंचायत के गांव रामी की झोपड़ियां में रविवार को दलित समाज की एक बेटी सुनीता रैगर की घोड़ी पर ठाठ-बाट से बिंदौरी निकाली गई। समाज व गांव में किसी तरह के विरोध की आशंका के चलते परिवार ने हिंडौली एसडीएम से पुलिस सुरक्षा की मांग की थी। इस पर हिंडौली प्रशासन, दबलाना व बसौली पुलिस जाब्ता तैनात रहा। गाँव के रैगर समाज में पहली बार किसी बेटी को घोड़ी पर बिठाकर बिंदौरी निकाली गई है। सुबह 7.30 से 9 बजे तक बिंदौरी निकाली गई। सुनीता के पिता भागचंद रेगर, गांव के पंच-पटेल हीरालाल का कहना था कि गांव में पीढ़ियों से ऐसा नहीं हुआ कि किसी बेटी को घोड़ी पर बिठाकर बिंदौरी निकाली गई हो। यह बेड़ी अब टूट गई है।

कान फिल्म फेस्टिवल में पहली बार नागपुरी फिल्म फुलमनिया और लाेहरदगा की स्क्रीनिंग 

राँची :  नागपुरी फिल्म फुलमनिया और लोहरदगा की स्क्रीनिंग 15 मई को कान फिल्म फेस्टिवल में हुई। इससे पहले लोहरदगा के रहने वाले लाल विजय की पहली शॉर्ट फिल्म “दी साइलेंट स्टेचू’2016 में कान फिल्म फेस्टिवल में शामिल की गई थी।

फुलमनिया फिल्म के निर्माता लाल विजय शाहदेव मुंबई बेस्ड झारखंड के युवा फिल्मकार हैं। झारखंड फिल्म फेस्टिवल के स्वागत समिति का अध्यक्ष होने के बावजूद उन्होंने पैसे लेकर अवॉर्ड बांटने का आराेप लगाते हुए फेस्टिवल का बहिष्कार किया था। अब उसे कान में मौका मिल रहा है। दाेनाें फिल्माें के निर्माता-निर्देशक लाल विजय 13 मई काे फ्रांस पहुंचेंगे।

डायन प्रथा की क्रूरता को दिखाती है फुलमनिया
फुलमनिया में झारखंड की डायन बिसाही प्रथा काे दिखाया गया है। इसमें महिलाओं के शाेषण और बांझपन के दर्द काे भी इसमें प्रमुखता से पेश किया गया है। रांची की काेमल सिंह मुख्य भूमिका में है। लोहरदगा बेरोजगार युवकों के नक्सली बनने की कहानी पर आधारित है। 20 साल का लड़का मनु सेना में जाना चाहता है, लेकिन एक एजेंट के चक्कर मे फंसकर नक्सली बन जाता है। शर्त होती है कि नक्सली बनकर समर्पण करने के बाद सरकार की पॉलिसी के मुताबिक नौकरी पक्की। लेकिन उसके साथ ऐसा कुछ नहीं होता।