Sunday, July 5, 2026
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आपातकाल से जुड़ीं हैं ये 10 बड़ी बातें

आज से 44 साल पहले इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगाया था। 25 जून, 1975 को लगा आपातकाल 21 महीनों तक यानी 21 मार्च, 1977 तक देश पर थोपा गया। 25 जून और 26 जून की मध्य रात्रि में तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के हस्ताक्षर करने के साथ ही देश में पहला आपातकाल लागू हो गया था। अगली सुबह समूचे देश ने रेडियो पर इंदिरा की आवाज में संदेश सुना था, ‘भाइयो और बहनो, राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है। इससे आतंकित होने का कोई कारण नहीं है।’ आइये आज आपातकाल से जुड़ी 10 बड़ी बातें जानते हैं… 

नेताओं की गिरफ्तरियां आपातकाल की घोषणा के साथ ही सभी नागरिकों के मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए थे। अभिव्यक्ति का अधिकार ही नहीं, लोगों के पास जीवन का अधिकार भी नहीं रह गया था। 25 जून की रात से ही देश में विपक्ष के नेताओं की गिरफ्तारियों का दौर शुरू हो गया था। जयप्रकाश नारायण, लालकृष्ण आडवाणी, अटल बिहारी वाजपेयी, जॉर्ज फर्नाडीस आदि बड़े नेताओं को जेल में डाल दिया गया था। जेलों में जगह नहीं बची थी। आपातकाल के बाद प्रशासन और पुलिस के द्वारा भारी उत्पीड़न की कहानियां सामने आई थीं। प्रेस पर भी सेंसरशिप लगा दी गई थी। हर अखबार में सेंसर अधिकारी बैठा दिया गया, उसकी अनुमति के बाद ही कोई समाचार छप सकता था। सरकार विरोधी समाचार छापने पर गिरफ्तारी हो सकती थी। यह सब तब थम सका, जब 23 जनवरी, 1977 को मार्च महीने में चुनाव की घोषणा हो गई।

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पृष्ठभूमि लालबहादुर शास्त्री की मौत के बाद देश की प्रधानमंत्री बनीं इंदिरा गांधी का कुछ कारणों से न्यायपालिका से टकराव शुरू हो गया था। यही टकराव आपातकाल की पृष्ठभूमि बना था। आपातकाल के लिए 27 फरवरी, 1967 को आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने बड़ी पृष्ठभूमि तैयार की। एक मामले में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सुब्बाराव के नेतृत्व वाली एक खंडपीठ ने सात बनाम छह जजों के बहुतम से से सुनाए गए फैसले में यह कहा था कि संसद में दो तिहाई बहुमत के साथ भी किसी संविधान संशोधन के जरिये मूलभूत अधिकारों के प्रावधान को न तो खत्म किया जा सकता है और न ही इन्हें सीमित किया जा सकता है।

प्रमुख कारण 1971 के चुनाव में इंदिरा गांधी ने अपनी पार्टी को जबर्दस्त जीत दिलाई थी और खुद भी बड़े मार्जिन से जीती थीं। खुद इंदिरा गांधी की जीत पर सवाल उठाते हुए उनके चुनावी प्रतिद्वंद्वी राजनारायण ने 1971 में अदालत का दरवाजा खटखटाया था। संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर इंदिरा गांधी के सामने रायबरेली लोकसभा सीट पर चुनाव लड़ने वाले राजनारायण ने अपनी याचिका में आरोप लगाया था कि इंदिरा गांधी ने चुनाव जीतने के लिए गलत तरीकों का इस्तेमाल किया है। मामले की सुनवाई हुई और इंदिरा गांधी के चुनाव को निरस्त कर दिया गया। इस फैसले से आक्रोशित होकर ही इंदिरा गांधी ने इमर्जेंसी लगाने का फैसला लिया।

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आपातकाल की घोषणा इस फैसले से इंदिरा गांधी इतना क्रोधित हो गई थीं कि अगले दिन ही उन्होंने बिना कैबिनेट की औपचारिक बैठक के आपातकाल लगाने की अनुशंसा राष्ट्रपति से कर डाली, जिस पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने 25 जून और 26 जून की मध्य रात्रि में ही अपने हस्ताक्षर कर डाले और इस तरह देश में पहला आपातकाल लागू हो गया।

इमर्जेंसी में हर कदम पर संजय के साथ थीं मेनका इंदिरा गांधी के प्राइवेट सेक्रेटरी रहे दिवंगत आर.के. धवन ने कहा था कि सोनिया और राजीव गांधी के मन में इमर्जेंसी को लेकर किसी तरह का संदेह या पछतावा नहीं था। और तो और, मेनका गांधी को इमर्जेंसी से जुड़ी सारी बातें पता थीं और वह हर कदम पर पति संजय गांधी के साथ थीं। वह मासूम या अनजान होने का दावा नहीं कर सकतीं। दिवंगत आर.के.धवन ने यह खुलासा एक न्यूज चैनल को दिए गए इंटरव्यू में किया था।

धवन ने यह भी कहा था कि इंदिरा गांधी जबरन नसबंदी और तुर्कमान गेट पर बुलडोजर चलवाने जैसी इमर्जेंसी की ज्यादतियों से अनजान थीं। इन सबके लिए केवल संजय ही जिम्मेदार थे। इंदिरा को तो यह भी नहीं पता था कि संजय अपने मारुति प्रॉजेक्ट के लिए जमीन का अधिग्रहण कर रहे थे। धवन के मुताबिक इस प्रॉजेक्ट में उन्होंने ही संजय की मदद की थी, और इसमें कुछ भी गलत नहीं था।

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बंगाल के सीएम एस.एस.राय ने दी थी आपातकाल लगाने की सलाह धवन ने बताया था कि पश्चिम बंगाल के तत्कालीन सीएम एसएस राय ने जनवरी 1975 में ही इंदिरा गांधी को आपातकाल लगाने की सलाह दी थी। इमर्जेंसी की योजना तो काफी पहले से ही बन गई थी। धवन ने बताया था कि तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद को आपातकाल लागू करने के लिए उद्घोषणा पर हस्ताक्षर करने में कोई आपत्ति नहीं थी। वह तो इसके लिए तुरंत तैयार हो गए थे। धवन ने यह भी बताया था कि किस तरह आपातकाल के दौरान मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाकर उन्हें निर्देश दिया गया था कि आरएसएस के उन सदस्यों और विपक्ष के नेताओं की लिस्ट तैयार कर ली जाए, जिन्हें अरेस्ट किया जाना है। इसी तरह की तैयारियां दिल्ली में भी की गई थीं।

इस्तीफा देने को तैयार थीं इंदिरा 
धवन ने कहा था कि आपातकाल इंदिरा के राजनीतिक करियर को बचाने के लिए नहीं लागू किया गया था, बल्कि वह तो खुद ही इस्तीफा देने को तैयार थीं। जब इंदिरा ने जून 1975 में अपना चुनाव रद्द किए जाने का इलाहाबाद उच्च न्यायालय का आदेश सुना था तो उनकी पहली प्रतिक्रिया इस्तीफे की थी और उन्होंने अपना त्यागपत्र लिखवाया था। उन्होंने कहा था कि वह त्यागपत्र टाइप किया गया लेकिन उस पर हस्ताक्षर कभी नहीं किए गए। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगी उनसे मिलने आए और सबने जोर दिया कि उन्हें इस्तीफा नहीं देना चाहिए।

आईबी की रिपोर्ट और 1977 का चुनाव धवन ने कहा था कि इंदिरा ने 1977 के चुनाव इसलिए करवाए थे, क्योंकि आईबी ने उनको बताया था कि वह 340 सीटें जीतेंगी। उनके प्रधान सचिव पीएन धर ने उन्हें यह रिपोर्ट दी थी, जिस पर उन्होंने भरोसा कर लिया था। लेकिन, उन चुनावों में मिली करारी हार के बावजूद भी वह दुखी नहीं थीं। धवन ने कहा था, ‘इंदिरा रात का भोजन कर रही थीं तभी मैंने उन्हें बताया कि वह हार गई हैं। उनके चेहरे पर राहत का भाव था। उनके चेहरे पर कोई दुख या शिकन नहीं थी। उन्होंने कहा था भगवान का शुक्र है, मेरे पास अपने लिए समय होगा।’ धवन ने दावा किया था कि इतिहास इंदिरा के साथ न्याय नहीं कर रहा है और नेता अपने स्वार्थ के चलते उन्हें बदनाम करते हैं। वह राष्ट्रवादी थीं और अपने देश के लोगों से उन्हें बहुत प्यार था।

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इमर्जेंसी के दौरान इंदिरा के घर में था अमेरिकी जासूस
विकिलीक्स पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के घर में 1975 से 1977 के दौरान एक अमेरिकी भेदिया था, जो उनके हर पॉलिटिकल मूव की खबर अमेरिका को दे रहा था। यह खुलासा विकिलीक्स ने कुछ साल पहले अमेरिकी केबल्स के हवाले से किया था। विकिलीक्स के मुताबिक, इमर्जेंसी के दौरान पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के घर में मौजूद इस भेदिए की उनके हर राजनीतिक कदम पर नजर थी। वह सारी जानकारी अमेरिकी दूतावास को मुहैया करा रहा था। केबल्स में इस भेदिए के नाम का खुलासा नहीं किया गया है।  26 जून 1975 को इंदिरा गांधी के देश में इमर्जेंसी घोषित करने के एक दिन बाद अमेरिकी दूतावास के केबल में कहा गया था कि इस फैसले पर वह अपने बेटे संजय गांधी और सेक्रेटरी आरके धवन के प्रभाव में थीं। केबल में लिखा था, ‘पीएम के घर में मौजूद ‘करीबी’ ने यह कन्फर्म किया है कि दोनों किसी भी तरह इंदिरा गांधी को सत्ता में बनाए रखना चाहते थे।’ यहां दोनों का मतलब संजय गांधी और धवन से है।
आपातकाल और पीएम मोदी 
आपातकाल के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अहम भूमिका निभाई थी। आपातकाल के दौरान प्रेस की स्वतंत्रता छीनी जा चुकी थी। कई पत्रकारों को मीसा और डीआईआर के तहत गिरफ्तार कर लिया गया था। सरकार की कोशिश थी कि लोगों तक सही जानकारी नहीं पहुंचे। उस कठिन समय में नरेंद्र मोदी और आरएसएस के कुछ प्रचारकों ने सूचना के प्रचार-प्रसार की जिम्मेदारी उठा ली। इसके लिए उन्होंने अनोखा तरीका अपनाया। संविधान, कानून, कांग्रेस सरकार की ज्यादतियों के बारे में जानकारी देने वाले साहित्य गुजरात से दूसरे राज्यों के लिए जाने वाली ट्रेनों में रखे गए। यह एक जोखिम भरा काम था क्योंकि रेलवे पुलिस बल को संदिग्ध लोगों को गोली मारने का निर्देश दिया गया था। लेकिन नरेंद्र मोदी और अन्य प्रचारकों द्वारा इस्तेमाल की गई तकनीक कारगर रही।

 (तस्वीरें व आलेख – साभार नवभारत टाइम्स)

14 साल के छात्र ने खेत में दौड़ाया सौर ऊर्जा से चलने वाली ट्रेन का मॉडल

नागौर (राजस्थान) :  राजस्थान के नागौर के प्यावां गांव में रहने वाले 14 साल के सुनील ने अपने खेत में सौर ऊर्जा से चलने वाली ट्रेन का मॉडल बनाया है। सौर ऊर्जा से संचालित इस ट्रैक पर रेलवे फाटक, शंटिंग और सिग्नल के साथ प्लेटफार्म भी बना है। सुनील के इस मॉडल को देखकर रेलवे के अधिकारी भी हैरान हैं। सुनील को रेलवे के अधिकारियों ने खास अनुमति के साथ जोधपुर-दिल्ली सराय रोहिला के इंजन में लोको पायलट के साथ सफर भी कराया है। 8वीं में पढ़ने वाले सुनील ने बताया कि यह ट्रैक 60 फीट लंबा है। इसे बेकार सामान से चार माह में तैयार किया है।

भारतीय और क्षेत्रीय परिधानों में ही मिलेगी डिग्री, यूजीसी ने 750 विश्वविद्यालयों को दिया निर्देश

नयी दिल्ली : दीक्षांत समारोह में अब खादी से तैयार भारतीय और क्षेत्रीय पहचान को दर्शाते परिधान ड्रेस कोड के रूप में नजर आएंगे। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने देश के सभी 750 विश्वविद्यालयों को इस बाबत पत्र लिखा है। निर्देश दिए कि दीक्षांत समारोह में हैंडलूम फैब्रिक से तैयार भारतीय और क्षेत्रीय परिधानों में छात्रों को डिग्री दी जाए। इस संबंध में विवि से रिपोर्ट भी मांगी गई है।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के सचिव प्रो. रजनीश जैन की ओर से केन्द्रीय, राज्य, निजी विश्वविद्यालयों समेत डीम्ड-टू-बी यूनिवर्सिटी के कुलपतियों को पत्र लिखा गया है, जिसमें कुलपतियों से दीक्षांत समारोह में नए नियमों के तहत नए डिजाइन व फैब्रिक के परिधान पहनकर डिग्री देने का निर्देश दिया है।
प्रो. जैन के मुताबिक, दीक्षांत समारोह में वर्षों से गाउन और टोपी पहनकर डिग्री दी जाती रही है, लेकिन अब समय बदल चुका है इसलिए कुलपतियों को भारतीय व क्षेत्रीय संस्कृति के तहत परिधान चुनने को कहा गया है। यह परिधान खादी या हैंडलूम फैब्रिक से तैयार होने चाहिए। यह वस्त्र हर मौसम के लिए उपयुक्त रहते हैं।
देश के सभी 750 विश्वविद्यालयों में यदि हैंडलूम निर्मित भारतीय व क्षेत्रीय संस्कृति को दर्शाते परिधान पहने जाते हैं तो दुनिया में भारतीय संस्कृति खुद-ब-खुद प्रसारित होगी। साथ ही, हैंडलूम फैब्रिक की भी बाजार में माँग बढ़ेगी तो छोटे कारीगरों को रोजगार मिलेगा।
केन्द्रीय मंत्री की मंजूरी के बाद माँगे थे सुझाव
गौरतलब है कि 15 सितम्बर 2017 को पूर्व मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावडेकर की अध्यक्षता में दीक्षांत समारोह में भारतीय परिधान में आयोजित करने पर बैठक हुई थी। केन्द्रीय मंत्री की मंजूरी के बाद मंत्रालय ने आम लोगों, छात्रों, शिक्षाविदें व राज्यों से सुझाव मांगे थे। इसी के आधार पर एक परिधान के बजाय सभी राज्यों की संस्कृति पर आधारित परिधानों को प्रमोट करने का फैसला लिया गया था।
पंजाब में सूट-सलवार, पहाड़ों में पारम्परिक पोशाक
सभी राज्यों के उच्च शिक्षण संस्थान अपने राज्य की वेशभूषा को दर्शाते हैंडलूम फैब्रिक से निर्मित परिधान दीक्षांत समारोह में ड्रेस कोड बना सकेंगे। कश्मीर में कश्मीरी ड्रेस, पंजाब में सलवार-सूट, हरियाणा में हरियाणवी ड्रेस, उत्तराखंड व हिमाचल प्रदेश में पहाड़ों में पहने जाने वाली पारंपरिक ड्रेस, नार्थ-ईस्ट व पश्चिम, दक्षिण समेत अन्य राज्य अपनी संस्कृति को दर्शाती पोशाक पहनेंगे।

केरल में बन रहा है देश का पहला डिजिटल गार्डन, पेड़ों पर हैं क्यूआर कोड

तिरुअनंतपुरम : देश का पहला डिजिटल गार्डन केरल में बन रहा है। राजभवन स्थित 21 एकड़ के क्षेत्र में फैले कनककुन्नु गार्डन में जितने भी पेड़ हैं, सभी को क्यूआर कोड दिया जा रहा है। स्मार्टफोन के जरिए पेड़ों पर लगे क्यूआर कोड को स्कैन कर उसकी पूरी जानकारी हासिल की जा सकती है। जैसे पेड़ों की प्रजाति, उम्र, बॉटेनिकल नाम, प्रचलित नाम, पेड़ों पर फूल खिलने का मौसम, फल आने का मौसम, चिकित्सा और अन्य इस्तेमाल से जुड़ी जानकारी पलभर में हासिल हो जाएगी। गार्डन में पेड़ों की 126 प्रजातियां हैं, जिन्हें डिजिटल फार्मेट में किया गया है। इस गार्डन को विकसित करने में केरल विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग के डॉ. ए. गंगाप्रसाद और अखिलेश नायर ने मुख्य रूप से योगदान दिया है। कनककुन्नु गार्डन में हजारों पेड़ हैं, लेकिन फिलहाल 600 पेड़ों पर ही क्विक रिस्पांस यानी क्यूआर कोड लगाए हैं। शेष पर कोडिंग का काम जारी है।
गार्डन में आए पोस्ट ग्रेजुएट बॉटनी के छात्र अखिलेश एसवी नायर का कहना है, “मैंने अब तक 50 से ज्यादा पेड़ों की जानकारी मोबाइल के जरिए इकट्ठा कर ली है। क्लासरूम या प्रयोगशाला से बेहतर है कि हम प्रकृति के बीच आएं और सालों पुराने पेड़ों के बारे में जानें। आमतौर पर पेड़ को देखकर यह अंदाजा नहीं लगाया जा सकता कि उसकी उम्र कितनी है या फिर उस पर किस मौसम में फल या फूल आते हैं लेकिन इस क्यूआर कोड से हमें मिनटों में ही सारी जानकारी मिल जाती है।”
अमेरिका और जापान जैसे देशों में पेड़ों पर क्यूआर कोड या माइक्रो चिप अनिवार्य रूप से लगाई जाती है। एक अन्य छात्र सजी वर्गीस का कहना है, “क्यूआर कोड की वजह से रोजाना सैर करने वालों के साथ-साथ पर्यटकों में भी पेड़ों के प्रति जागरुकता बढ़ी है।”
दिल्ली के लुटियंस जोन स्थित लोधी गार्डन के पेड़ों पर क्यूआर कोड सबसे पहले लगाए गए थे। मकसद था लोगों को सालों पुराने पेड़ों के बारे में जानकारी मिले। यहां करीब 100 से ज्यादा पेड़ों पर कोडिंग की गई है,जिन पेड़ों पर क्यूआर कोड लगाए गए हैं, उनमें से कई पेड़ों की उम्र सौ साल से अधिक है। गार्डन में कई औषधीय गुणों वाले पौधे भी हैं।

तालिबानी डर को ताक पर रखा, अफगानिस्तान में सुर साध रही लड़कियाँ

काबुल : अफगानिस्तान में तालिबानी डर को ताक पर रखकर लड़कियाँ संगीत के सुर साध रही हैं।  यहाँ महिलाओं ने पहला ऑर्केस्ट्रा ‘जोहरा’ बनाया है। इसे दुनियाभर में शोहरत मिल रही है। हाल ही में ग्रुप की 30 लड़कियों ने लंदन जाकर प्रस्तुति दी। जरीफा अबीदा इस ऑर्केस्ट्रा ग्रुप की संयोजक हैं।। जरीफा बताती हैं, संगीत को समाज पाप मानता है, दुनिया घूमने पर मायने पता चले। हमारे समाज की लड़कियों के लिए संगीत पाप से कम नहीं समझा जाता है। कश्मीर की महिला बैंड के सदस्यों को भी मैं यही कहना चाहती हूं कि लोगों की बातों पर ध्यान मत दीजिए। अपने सपनों को सच में तब्दील करने के लिए मेहनत करें।
तालिबानी जिंदा जला देंते हैं
अफगानिस्तान एक ऐसा देश जहां औरतें जो संगीतकार, कलाकार या कंडक्टर हैं, उन्हें तालिबानी सड़कों पर जिंदा जला देते हैं या फिर पत्थरों से मार-मार कर हत्या कर देते हैं। मुझे हर रोज यह डर सताता था कि घर वाले मेरा स्कूल जाना बंद करवाकर मेरी शादी न करवा दें। 2014 में मैंने संगीत स्कूल एएनआईएम में दाखिला लिया। इस बारे में परिवार को भी नहीं बताया। हमारे यहां संगीत सीखने वाली लड़कियों से लोग बेहतर सुलूक नहीं करते हैं।
2015 में जोहरा ऑर्केस्ट्रा बनाया
एक बार समर प्रोग्राम के लिए अमेरिका के येल यूनिवर्सिटी गई, तब लगा कि देश के बाहर संगीतकारों के प्रति लोगों की सोच और रवैया बेहद अलग है। भले ही वह महिला क्यों न हों। तब अहसास हुआ कि अफगानिस्तान में एक लड़की के संगीत सीखने के बाहरी दुनिया में क्या मायने हैं। 2015 में मैंने जोहरा ऑर्केस्ट्रा बनाया। एक साल बाद साथी नेगिन खापोल्वॉक के साथ इसके संचालन का मौका मिला।

स्प्रिंटर दुती चंद चाहती हैं बायोपिक में कंगना निभाएं उनका किरदार

मुम्बई : देश की पहली एलजीबीटी एथलीट दुतीचंद ने कहा है कि कंगना रनोत उनकी बायोपिक के लिए सही चयन होंगी। वे चाहती हैं कि उनकी बायोपिक में उनका रोल निभाने वाला भी उनकी तरह साहसी ही हो।
बॉम्बे टाइम्स को दिए एक साक्षात्कार में दुतीचंद ने कहा कि उनके पास कई फिल्मकार आ रहे हैं जो उनकी बायोपिक के अधिकार लेना चाहते हैं। इनमें अनिल कपूर और राकेश ओमप्रकाश मेहरा जैसे बड़े नाम भी शामिल हैं। जब उनसे यह पूछा गया कि बायोपिक में किसे अपना रोल करते देखना चाहती हैं तो उन्होंने कहा – मुझे लगता है मेरी कहानी पर्दे पर कंगना रनोत ही सबसे बेहतर ढंग से निभा सकती हैं। जब कंगना से दुतीचंद की बायोपिक के बारे में सवाल किया गया तो उनका कहना था कि ये दुतीचंद का बड़प्पन है। मैं यह जानकर बेहद खुश हूं कि उन्हें लगता है मैं उनका रोल निभाने के काबिल हूं। वे साहसी हैं और उन्होंने अपनी निजी और पेशेवर जिन्दगी में भी कई तरह के मानदंड स्थापित किए हैं।
अप्रैल 2019 में दुतीचंद ने सार्वजनिक रूप से अपने समलैंगिक होने की बात स्वीकार की थी। दुती ने बताया था कि वे अपने गृहनगर चाका गोपालपुर (ओडिशा) में एक लड़की के साथ रिश्ते में हैं। दुती ने एशियन गेम्स 2018 में दो सिल्वर मेडल जीते थे। वे 100 मीटर और 200 मीटर के फाइनल में दूसरे स्थान पर रही थीं। दुती पर 2014 ग्लास्गो राष्ट्रमंडल खेलों से पहले जेंडर विवाद के कारण एक साल का प्रतिबंध लगा था। वे टूर्नामेंट में हिस्सा नहीं ले सकी थीं। दुती का टेस्टोस्टोरेन (हार्मोन) बढ़ जाता था, इससे उन पर पुरुष होने के आरोप लगे थे। उनकी अपील पर लुसाने (स्विट्जरलैंड) स्थित खेल मध्यस्थता अदालत ने इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ एथलेटिक्स फेडरेशन (आईएएएफ) के फैसले को पलट दिया था। इसके बाद दुती 2016 रियो ओलिंपिक में हिस्सा ले सकी थीं।

लड़कियों का फुटबॉल खेलना बैन था, तो लड़का बनकर खेलती थीं सिसी

ब्राजीलिया :  अगर आप दुनिया जीतना चाहते हैं तो आपको विद्रोही बनना पड़ेगा। यह बात ब्राजील की सिसलीडे डो अमोर लीमा (सिसी- 52 साल) पर पूरी तरह से लागू होती है। ब्राजील में लड़कियों के फुटबॉल खेलने पर बैन था। इसके बावजूद लड़कों के साथ फुटबॉल खेलती थीं। इसके लिए उन्हें अपनी लड़की होने की पहचान छिपानी भी पड़ती थीं। फुटबॉल खेलने के लिए सिसी ने कई बार माँ से मार खाई लेकिन फुटबॉल खेलना नहीं छोड़ा। 1979 में ब्राजील ने लड़कियों के फुटबॉल खेलने पर से प्रतिबंध हटा दिया। इसके बाद सिसी राष्ट्रीय टीम में चुनी गईं और 10 नम्बर जर्सी पहनने वाली पहली महिला बनीं।
‘मैं सबको गलत साबित करना चाहती थी’
सिसी जब लड़कों के साथ फुटबॉल खेलती थीं तो उनकी माँ कान पकड़कर मारते हुए उन्हें घर ले जाती थीं। माँ को लगता था कि ब्राजील में लड़कियों के फुटबॉल खेलने का कोई भविष्य नहीं है। सिसी के मुताबिक- मुझे तभी लगता था कि दुनिया को गलत साबित करना है। ब्राजील में 1941 में महिला फुटबॉल मशहूर होने लगी थी। लेकिन तभी सरकार ने पुरुषों के खेल समझे जाने वाले रग्बी, वॉटर पोलो और फुटबॉल के लड़कियों के खेलने पर पाबंदी लगा दी। सिसी के मुताबिक- लड़कों ने मुझे अपने साथ फुटबॉल खिलाना शुरू कर दिया था। हालांकि कई बार मुझे लड़कों की तरह दिखना पड़ता था, क्योंकि मैं अच्छी तरह से जानती थी कि देश में लड़कियों के फुटबॉल खेलने की मनाही है। मेरे पिता भाई को प्रोफेशनल फुटबॉलर बनाना चाहते थे और मैं उन्हें अपना खेल दिखाना चाहती थी।
1979 में महिलावादी आन्दोलनों के चलते लड़कियों के फुटबॉल खेलने से प्रतिबंध हटा दिया गया। लेकिन कुछ नियम बनाए रखे मसलन उनके मैच का समय कम होगा और महिलाओं को खेल के दौरान पूरा शरीर ढंकना होगा। मैच के बाद वे पुरुषों की तरह आपस में जर्सियां नहीं बदल सकेंगी। तब तक सिसी के पिता को भी उसके फुटबॉल टैलेंट का पता लग चुका था। मां के डर के बावजूद उन्होंने 14 साल की सिसी को फीरा द संताना की टीम में खेलने जाने की अनुमति दे दी। सिसी के मुताबिक- पापा ने कहा कि जब इस लड़की को भगवान ने ही फुटबॉल का तोहफा दिया है तो हम उसे कैसे रोक सकते हैं।
3 साल बाद सिसी को एक नामी क्लब सल्वाडोर और इसके बाद ब्राजील की नई नेशनल टीम में खेलने का मौका मिल गया। सिसी की उम्र उस वक्त 17 साल थी, लिहाजा उन्हें खेलने के लिए माता-पिता के दस्तखत कराकर लाने को कहा गया। सिसी बताती हैं- उस वक्त पिता किसी काम से शहर से बाहर गए थे। मैंने मां से पिता के नकली साइन बनाने को कहा क्योंकि मैं वापस नहीं लौटना चाहती थी। 1988 में फीफा ने चीन में महिलाओं के लिए पहला इन्विटेशनल टूर्नामेंट कराया। यहां सिसी क्वीन ऑफ ब्राजीलियन फुटबॉल के नाम से मशहूर हो गईं। डेब्यू मैच से पहले उन्हें 10 नंबर की जर्सी दी गई। 10 नंबर की जर्सी की शुरुआत पेले से हुई थी। यह जर्सी पहनने वाली सिसी पहली महिला बनीं। सिसी के मुताबिक- जब मैंने जर्सी पहनी तो बच्चों की तरह रोई।
सिसी ने अपना पहला गोल चीन में यूरोप चैम्पियन नॉर्वे के खिलाफ दागा। 1999 के महिला वर्ल्ड कप में वे सबसे ज्यादा गोल करने वाली खिलाड़ी बनीं। यहीं पर उन्होंने महिला वर्ल्ड कप के इतिहास का सबसे बेहतरीन गोल (35 मीटर की दूरी से फ्री किक) भी दागा। हालांकि टूर्नामेंट में ब्राजील तीसरे नंबर पर रहा। पिछले 20 से सिसी कैलिफोर्निया में रह रही हैं। वे यहां 2 हजार लड़कियों को फुटबॉल सिखा रही हैं। सिसी मजाकिया अंदाज में कहती हैं- मुझे फुटबॉल की लत है। मुझे फुटबॉल से प्यार है। मैंने एक खिलाड़ी के रूप में देश, फुटबॉल को काफी कुछ दिया। अब कोच बनकर लड़कियों को सिखा रही हूं। पिछले साल अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की बेटी चेल्सी की किताब- 13 महिलाएं जिन्होंने दुनिया बदली- में सिसी भी शामिल हैं।

सजायाफ्ता कैदी बना योग गुरु, दूसरों को सिखा रहा योग

लखनऊ :  हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा पा चुके कैदी कृष्णानंद द्विवेदी ने अपना पश्चाताप नये तरीके से किया। वह अवसाद में रहे तो योग करना शुरू किया। फायदा पहुंचा तो अब दूसरे कैदियों को योग सिखाना शुरू कर दिया। दूसरे कैदियों ने भी योग सीख कर तनाव दूर करना शुरू कर दिया। अब जेल के अधिकतर कैदियों की दिनचर्या में योग शामिल है और कृष्णानंद अब योग गुरू के नाम से जेल में चर्चा का केन्द्र हैं। यही नहीं 21 जून को विश्व योग दिवस पर कृष्णानंद के नेतृत्व में जेल के अंदर 3000 बंदी योग कर रहे हैं। वर्ष 2014 से लखनऊ की जिला जेल में बंद उन्नाव के कृष्णानंद पर हत्या समेत आधा दर्जन मामले दर्ज हैं। कृष्णानंद को आजीवन कारावास की सजा हो चुकी है। वह 13 साल सात महीने की सजा काट चुके हैं। कृष्णानंद बताते हैं कि कारावास ने उनके जीवन में अंधेरा कर दिया था। कुछ दिन बीतने के बाद जेल के माहौल का कृष्णानंद की सेहत पर शारीरिक और मानसिक दोनों तौर पर असर हुआ। वह अवसाद में चले गए। कृष्णानंद ने इस दौरान नियमित बैरक में योग शुरू किया। कृष्णानंद का कहना है कि योग के जरिये उन्हें दूसरों की मदद करने और खुद को सुधारने का मौका मिला।
जिला जेल के वरिष्ठ अधीक्षक प्रेमनाथ पाण्डेय बताते हैं कि जेल में नियमित योग का मकसद कैदियों के तन मन को शांत रखना है। योग की वजह से जेल के बहुत से नशेड़ी प्रवृत्ति के कैदियों में सुधार हुआ है। गांजा, चरस, तंबाकू, बीड़ी, सिगरेट समेत दूसरे नशे के लती कैदियों को योग और काउंसलिंग की मदद से लत छुड़वाने का प्रयास किया जा रहा है।
(साभार -हिन्दुस्तान)

इसलिए 21 जून को मनाया जाता है योग दिवस

भारत समेत दुनिया के कई देशों में 21 जून को अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाता है। पहली बार अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस 21 जून 2015 को मनाया गया था। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 11 दिसम्बर 2014 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सिफारिश पर 21 जून को योग दिवस के रूप में घोषित किया था। इस दौरान 193 देशों में से 175 देशों ने बिना किसी वोटिंग के इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। यूएन ने योग की महत्ता को स्वीकारते हुए माना कि ‘योग मानव स्वास्थ्य व कल्याण की दिशा में एक संपूर्ण नजरिया है।’
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 14 सिंतबर 2014 को पहली बार पेश किया गया यह प्रस्ताव तीन महीने से भी कम समय में यूएन की महासभा में पास हो गया था। संयुक्त राष्ट्र की महासभा में किसी भी प्रस्ताव को इतनी बड़ी संख्या में मिला समर्थन अपने आप में एक रिकॉर्ड बन गया। इससे पहले किसी भी प्रस्ताव को इतने बड़े पैमाने पर इतने देशों का समर्थन नहीं मिला था। कई आध्यात्मिक नेताओं ने भी पीएम मोदी की इस सिफारिश का समर्थन किया था।
इस मसौदे को सबसे पहले भारत के स्थायी प्रतिनिधि अशोक मुखर्जी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में पेश किया और 177 देशों ने इस प्रस्ताव को सह-प्रायोजित किया। 21 जून को अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस बनाए जाने के पीछे वजह है कि इस दिन ग्रीष्म संक्रांति होती है। खास बात यह है कि आम दिनों के मुकाबले 21 जून को सूरज की किरणें ज्यादा देर तक धरती पर रहती है जिसके कारण दिन बड़ा होता है। योग में इस घटना को संक्रमण काल कहते हैं। संक्रमण काल में योग करने से शरीर को बहुत फायदा मिलता है। इसलिए अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस 21 जून को मनाया जाता है।
क्यों जरूरी है योग – योग एक शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक अभ्यास है जो व्यक्ति को शांति, आत्मविश्वास और साहस प्रदान करता है। योग के माध्यम से हम कई गतिविधियों को बेहतर तरीके से कर पाते हैं। ‘योग’ शब्द संस्कृत से लिया गया है जिसका अर्थ है शामिल होना या एकजुट होना। योग के महत्व को समझते हुए आज पूरी दुनिया अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मना रही है, पर क्या आप जानते हैं 21 जून को ही अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस क्यों मनाया जाता है। आइए जानते हैं ऐसे ही सवालों के जवाब और इस दिन से जुड़े कुछ रोचक तथ्य जिनके बारे में अब तक शायद ही आपने कभी कुछ सुना हो।
योग शब्द का शाब्दिक अर्थ जुड़ना या मिलना होता है लेकिन यह बहुत विस्तृत विज्ञान है क्योंकि इसके सभी कर्म और क्रियाएं मनुष्य को शारीरिक और आत्मिक रूप से पूर्ण योगी बनाती है। वेदांत के अनुसार, “आत्मा का परमात्मा से पूर्ण रूप से मिलन होना ही योग कहलाता है।”
क्या है योग का इतिहास – योगिक कथाओं के अनुसार योग का पहला प्रसार शिव द्वारा उनके 7 शिष्यों के बीच किया गया। कहते हैं कि इन 7 ऋषियों को ग्रीष्म संक्रांति के बाद आने वाली पहली पूर्णिमा के दिन योग की दीक्षा दी गई थी, जिसे शिव के अवतरण के तौर पर भी मनाते हैं। इस दौर को दक्षिणायन के नाम से जाना जाता है। इस दौरान आध्यात्मिक साधना करने वाले लोगों को प्रकृति की तरफ से स्वत: सहयोग मिलता है।
21 जून को ही क्यों मनाया जाता है ‘अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस’
कई लोगों के मन में यह सवाल जरूर उठता है कि आखिर 21 जून को ही योग दिवस के रूप में क्यों मनाया जाता है। इसके पीछे की वजह भी काफी खास है। इस दिन उत्तरी गोलार्द्ध का सबसे लंबा दिन है, जिसे कुछ लोग ग्रीष्म संक्रांति भी कहकर बुलाते हैं। भारतीय परंपरा के अनुसार ग्रीष्म संक्रांति के बाद सूर्य दक्षिणायन हो जाता है। कहा जाता है कि सूर्य के दक्षिणायन का समय आध्यात्मिक सिद्धियां प्राप्त करने में बहुत लाभकारी होता है इसी वजह से 21 जून को ‘अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस’ के रूप में मनाते हैं।
भारत के नाम दर्ज हैं रिकॉर्ड – संयुक्त महासभा की मंजूरी के बाद 21 जून 2015 को पहला ‘अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस’ मनाया गया। उस वक्त पीएम मोदी के नेतृत्व में करीब 35 हजार से अधिक लोगों और 84 देशों के प्रतिनिधियों ने दिल्ली के राजपथ पर योग के 21 आसन किए थे। इस खास आयोजन ने दो गिनीज रिकॉर्ड बनाए थे। पहला रिकॉर्ड 35,985 लोगों के साथ योग करना और दूसरा रिकॉर्ड 84 देशों के लोगों द्वारा इस समारोह में हिस्सा लेना रहा।

आलोचक नामवर सिंह पर केंद्रित मुक्तांचल के नए अंक का लोकार्पण

हावड़ा : मुक्तांचल और हावड़ा की संस्था विद्यार्थी मंच के तत्वावधान में प्रसिद्ध आलोचक ‘नामवर सिंह’ को याद करते हुए हिंदी आलोचना पर चर्चा एवं काव्य पाठ का आयोजन किया गया। इस मौके पर नामवर सिंह के रचना संसार पर केंद्रित मुक्तांचल के अंक का लोकार्पण भी किया गया। इस अवसर पर पत्रिका की संपादक डॉ. मीरा सिन्हा ने नामवर जी को श्रद्धाजंलि अर्पित करते हुए कहा कि साहित्य में आलोचना का सही अर्थ निंदा करना नहीं बल्कि उन रेशों को ढूंढ निकालना हैं जिसमें रचनाकार के मूल्य बसे होते हैं। विमल वर्मा ने कहा कि नामवर जी के लेखन में देशकाल की तात्विकता का संक्रमण आलोकित होता है। कथाकार विमलेश्वर द्विवेदी ने कहा कि नामवर जी ने नए लेखकों की रचनाओं की आलोचना करते हुए उन्हें साहित्य जगत में प्रतिष्ठित किया है।  आलोचक परशुराम ने कहा कि नामवर जी ने रचना और आलोचना को संवाद का एक माध्यम बनाया है। प्रो. मधुलता गुप्ता ने कहा कि नामवर जी ने बेबाकी से किसी भी रचना की आलोचना की इसी वजह से आज उनकी प्रासंगिकता वैसे ही बनी हुई है। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विश्वभारती विश्वविद्यालय की प्रो. मंजूरानी सिंह ने कहा कि साहित्यकार के पास शब्द योजना नहीं शब्द चेतना होनी चाहिए क्योंकि युग से हटकर किसी भी रचना की आलोचना नहीं हो सकती है। इस अवसर पर प्रसिद्ध गायक अजय राय ने कविताओं पर संगीतबद्ध प्रस्तुति की। दूसरे सत्र में आयोजित कवि सम्मेलन में वरिष्ठ कवि लखवीर सिंह निर्दोष, राज्यवर्द्धन समेत अन्य कवियों ने कविता पाठ किया। कार्यक्रम का सफल संचालन करते हुए प्रो. शुभ्रा उपाध्याय ने किया। इस मौके पर कई अन्य गण्यमान्य अतिथि उपस्थित थे। धन्यवाद ज्ञापन देते हुए कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रो. रामप्रवेश रजक ने कहा कि नामवर जी को याद करना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करना है।