माँ और बच्चों के इसी खास प्यार-मोहब्बत भरे रिश्ते से जुड़ा है ‘मदर्स डे’। जाहिर है जब रिश्ता इतना खास है तो इस रिश्ते का सैलिब्रेशन भी खास होना चाहिए। बच्चों के साथ माँ के इस रिश्ते को एक खास सैलिब्रेशन कर नई पहचान दी एक अमेरिकी नागरिक ऐना जार्विस ने जिन्होंने पहली बार अपनी माँ के सम्मान में ‘मदर्स डे’ का आयोजन 1908 में वर्जीनिया, अमेरिका में किया। ऐना ने हालांकि खुद कभी शादी नहीं की और उनकी कोई संतान भी नहीं थी लेकिन इस चलन की शुरुआत ऐना ने अपनी माँ की याद से की थी। ऐना की माँ की मृत्यु 1905 में हुई थी, वह एक समाज सेविका थीं। ऐना की माँ अक्सर अपनी पुत्री से अपनी यह इच्छा जाहिर किया करती थीं कि एक दिन सारी दुनिया की माओं का सम्मान होना चाहिए और उन्हें समाज में उनके योगदान के लिए सराहा जाना चाहिए। 1905 में माँ की मृत्यु होने पर ऐना ने तय किया कि वह उनकी यह इच्छा जरूर पूरी करेंगी। प्रारंभ में ऐना ने अपनी माँ के लिए चर्च में फूल भेजने शुरू किए फिर एक टीम तैयार कर उसके साथ उन्होंने सरकार से इस दिन को सरकारी छुट्टी का दिन और आधिकारिक रूप से ‘मदर्स डे’ के नाम से घोषित किए जाने की माँग की। ऐना और उनके सहयोगियों की माँग पर 1914 में अमेरिका के अट्ठाईसवें राष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने मई माह के दूसरे रविवार का दिन मदर्स डे के रूप में मनाये जाने की घोषणा की। अमेरिका में ‘मदर्स डे’ की शुरूआत के बाद दूसरे देशों में भी इसे अपना लिया गया, हालांकि कई देशों में इसे अलग तारीखों में भी मनाया जाता है पर आमतौर पर ‘मदर्स डे’ मार्च या मई माह में ही मनाया जाता है। भारत में भी ‘मदर्स डे’ मई माह के दूसरे रविवार(संडे) को मनाया जाता है। ‘मदर्स डे’ की शुरूआत आधिकारिक रूप से भले ही 19 वीं शताब्दी में अमेरिका से हुई हो पर कहा यह भी जाता है कि इस खास दिन का सैलिब्रशन सदियों पूर्व भी किसी न किसी रूप में होता रहा है। इंग्लैंड में 17वीं शताब्दी में एक खास दिन माँ के सम्मान में आयोजित किया जाता था। इस दिन चर्च में प्रार्थना के बाद बच्चे अपने घर फूल या उपहार लेकर जाते थे। प्राचीन ग्रीक और रोमन इतिहास में भी इस दिन को मनाए जाने के प्रमाण मिलते हैं, इस दिन को मनाने के पीछे उनके धार्मिक कारण जुड़े थे।
महाराणा प्रताप भारतीय इतिहास में वीरता और राष्ट्रीय स्वाभिमान के पर्याय हैं। वे एक कठिन और उथल-पुथल भरे कालखण्ड में पैदा हुए थे, जब मुगलों की सत्ता समूचे भारत पर छाई हुई थी और मुगल सम्राट अकबर अपनी विशिष्ट कार्य शैली के कारण ‘महान’ कहा जा सकता है। लेकिन महाराणा प्रताप उसकी ‘महानता’ के पीछे छिपी उसकी साम्राज्यवादी आकांक्षा के विरुद्ध थे, इसलिए उन्होंने उसकी अधीनता स्वीकार नहीं की। परिणामस्वरूप अकबर उसके विरुद्ध युद्ध में उतरा। इस प्रक्रिया में महाराणा प्रताप ने जिस वीरता, स्वाभिमान और त्यागमय जीवन को वरण किया, उसी ने उन्हें एक महान लोकनायक और वीर पुरुष के रूप में सदा-सदा के लिए भारतीय इतिहास में प्रतिष्ठित कर दिया है। महाकवि निराला ने प्रताप के इसी प्रेरक चरित्र को तथात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है। मुख्य रूप से यह पुस्तक किशोर पाठकों को ध्यान में रखकर लिखी गयी है, लेकिन इसकी प्रांजल भाषा-शैली और तथ्यपरकता इसे एक महापुरुष की ऐतिहासिक जीवनी का महत्त्व प्रदान कर देती है।
राजसिंहासन
मुसलमानों के शासनकाल में जिन वीरों ने अपने सर्वस्व का बलिदान करके अपनी जाति, धर्म, देश और स्वतंत्रता की रक्षा की, उनमें अधिक संख्या राजपूत वीरों की ही देख पड़ती है, जैसे मुसलमानों की दुर्दम शक्ति का प्रतिरोध करने कि लिए उन वीर राजपूतों की शक्ति-रेखा विधाता ने खींची हो। दैव के काल्पनिक क्रम के भीतर जितनी मात्रा में बहिजंगत को सत्य का प्रकाश मिलता है, उतनी ही मात्रा में आध्यात्मिक गौरव की उज्ज्वलता भी प्रस्फुटित होकर हमारी मानस-दृष्टि को आश्चर्यचकित और स्तब्ध कर देती है।
स्वतंत्रता की सिंहवाहिनी के इंगित मात्र से देश के बचे हुए राजपूत-कुल-तिलक-वीरों की आत्माहुति, जलती हुई चिताग्नि में अगणित राजपूत कुल-ललनाओं द्वारा उज्ज्वल सतीत्व रत्न की रक्षा तथा लगातार कई शताब्दियों तक ऐसे ही रक्तोष्ण शौर्य के प्रात्यहिक उदाहरण, इन सजीवमूर्ति सत्य घटनाओं के अनुशीलन से वर्तमान काल की शिरश्चरणविहान, जल्पना मूर्तियाँ भारत के अशान्त आकाश में तत्काल विलीन हो जाती हैं और उस जगह वह चिरन्तन सत्यमूर्ति ही आकर प्रतिष्ठित होती है। तब हमें मालूम हो जाता है कि जातीय जीवन में साँस किस जगह चल रही है। वास्तव में उन वीरों के अमर आदर्श की जड़ भारतीय आत्माओं के इतने गहन प्रदेश तक पहुँची हुई है कि वहाँ उस जातीय वृक्ष को उन्मूलित कर, इच्छानुसार किसी दूसरे पौधे की जड़ जमाना बिल्कुल असंभव, अदूरदर्शिता की ही परिचायक कहलाती है।
हम जिस समय का इतिहास लिख रहे हैं, उस समय भारत के सम्राट् ‘दिल्लीश्वरो वा जगदीश्वरो वा’ मुगल बादशाह अकबर थे। इनके पहले दिल्ली के सिंहासन पर जितने मुसलमान सम्राट् बैठे थे, उनकी नीति हिन्दुओं के प्रति खासकर वीर राजपूतों के प्रति मुसलमान-स्वभाव के अनुकूल, प्रत्यक्ष विरोध करने वाली थी, परन्तु सूक्ष्मदर्शिता अकबर ने उस नीति को ग्रहण नहीं किया। साम्राज्य-विस्तार की लालसा अकबर में उन लोगों की अपेक्षा बहुत बढ़ी-चढ़ी थी, परन्तु ये उन लोगों की तरह दुश्मन को दबाकर न मारते थे, इनकी नीति थी मिलाकर शत्रु को अपने वशीभूत करना। इस नीति के बल पर इनको सफलता भी खूब मिली। प्राय: सम्पूर्ण राजपूताना इनके अधीन हो गया। उस समय जिस महावीर पुरुष ने अकबर का सामना किया, हिन्दुओं की कीर्ति-पताका मुगलों के हाथ नहीं जाने दी, आज हम उसी लोकोज्ज्वल-चरित्र महावीर महाराणा प्रतापसिंह की कीर्ति-गाथा अपने पाठकों को भेट करते हैं ।
उस समय भारत वर्ष में जितने मानवीय क्षत्रियवंश थे, उनमें ‘सिसोदिया वंश’ विशेष सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था, आज भी इस वंश की इज्जत वैसी ही की जाती है। इस वंश में किसी प्रकार के कलंक की कालिमा नहीं लग पायी। मुसलमानों ने छाया-स्पर्श से भी इस वंशवालों को घृणा थी और वे अन्त तक दूध के धोये ही बने रहे।
महाराणा प्रतापसिंह के पिता उदयसिंह अपनी छोटी रानी को और-और रानियों से ज्यादा प्यार करते थे। इसका फल यह हुआ कि उन्हें संतुष्ट करने के लिए मृत्यु के समय उदयसिंह ने उन्हीं के लड़के को राजगद्दी दी। उनका नाम जगमल था। उदयसिंह का यह कार्य नीति के खिलाफ हुआ। क्योंकि राजगद्दी के हकदार प्रतापसिंह थे। ये जगमल से बड़े थे। उदयसिंह के इस कार्य की प्रजाजनों में बड़ी समालोचना हो चली और भीतर-ही-भीतर वे लोग इस अनीति की निन्दा करने लगे। वास्तव में प्रेम के वशीभूत होकर, दायित्वपूर्ण उत्तराधिकारी-क्रम पर महाराणा उदयसिंह का इस तरह स्वेच्छाचार करना, राज-पद्धति के बिलकुल विपरीत हुआ था।
यह जहर फैलता गया। धार्मिक विचारों से तो राज्य के अधिकारी प्रतापसिंह ठहरते ही थे, इसके अलावा प्रजाजनों का प्रेम भी उनके ऊपर बहुत ही गहरा था। प्रतापसिंह का दिल लुभा लेनेवाला अकृत्रिम बर्ताव, प्रजाजनों को समदृष्टि से देखना, अपने को प्यारी प्रजा का सेवक समझना, देश और धर्म के नाम पर अपने सर्वस्व का त्याग, इस तरह के और भी अनेक सद्गुण उनमें थे। जगमल के राजगद्दी पाने पर और सभी लोगों को क्लेश हुआ, परन्तु दृढ़व्रत प्रताप के चेहरे पर शिकन भी न पड़ी। वे पूर्ववत् ही प्रसन्न रहते और जैसे स्नेह की दृष्टि से जगमल को पहले देखते थे, वैसे ही अब भी देखते।
महाराणा उदयसिंह का कार्य जिन राजपूत-सरदारों को खटकता था, उनमें झालवाड़ के महाजन और चन्दावत कृष्णजी प्रमुख थे। प्रताप झालावाड़ महाराज के भानजे थे। अपने भानजे को अपने प्राप्य अधिकार से वंचित होते देखकर झालावाड़-नरेश से न रहा गया। उन्होंने कृष्णजी के साथ अन्यान्य सरदारों को एकत्र कर सलाह की और फिर राज्य की प्रजा का रुख देखा। कुमार प्रतापसिंह को उनका उचित अधिकार देने के लिए सब लोग उतावले हो गये और सबने महाराणा उदयसिंह की दुर्बलता की निन्दा की। राज्य के सामन्त सदस्यों और प्रजा-समष्टि की राय के अनुसार प्रतापसिंह को गद्दीनशीन करने की तैयारियाँ भीतर-ही-भीतर होने लगीं। जगमल का पक्षपात करने वाले इने-गिने लोग ही थे।
इधर जिस मुहुर्त से राज्य का शासन भार जगमल के हाथ में आया, उसी मुहुर्त से उसे राजमद का भयंकर नशा हो गया। वह सीधे पैर ही न रखता था। स्वभाव का उद्दण्ड, राजनीति में अनजान, लोगों के स्वभाव से अपरिचित, लड़ाई के नाम से घबड़ाने वाला महामूर्ख जगमल सभासदों को संतुष्ट न कर सकता था। उसके रूखे और अमानुषिक बर्ताव से सब लोग तंग आ गये। उसने भी शासन की बागडोर अपने हाथ में पाते ही अनियंत्रण का घोड़ा तेजी से बढ़ाया। फल यह हुआ कि अपने सवार को लेकर घोड़ा कुराह चलने लगा, काँटों और झाड़ियों में अड़ने लगा। जगमल की स्वतंत्रता ने घोर अत्याचार का रूप धारण किया। उससे सभासद सरदार-राजपूतों के दिलों में सख्त चोट लगी। कुछ एक ने तो घबड़ाकर राज्य में ही रहना छोड़ दिया।
राज्य में इस तरह के उपद्रव देखकर स्वदेश के सहृदय भक्त प्रताप से न रहा गया। एक दिन वे जगमल के पास गये और बड़े स्नेहपूर्ण शब्दों में समझाते हुए कहा, ‘‘जगमल, ईश्वर की इच्छा से आज तुम विशाल जन समूह के शासक हो। लाखों मनुष्यों के भाग्य-विधाता हो। परन्तु तुम्हें स्मरण रखना चाहिए, अधिकार के माने ये नहीं हैं-कि स्वेच्छाचार किया जाय, निरपराध मनुष्यों से तुम अपनी शक्ति की थाह लो। देखो तो सही, तुम्हारे अनेक सभासद राज्य छोड़कर चले जा रहे हैं। क्या अत्याचार करके अपनी प्रजा को सन्तुष्ट करोगे ? तुम्हें अपना स्वभाव बदलना चाहिए। समय बड़ा नाजुक है। अगर तुम नहीं सुधरे तो तुम्हारा और तुम्हारे राज्य का भविष्यफल बड़ा विषमय होगा।’’
पुस्तक का आवरण
प्रताप की संवेदनासूचक उक्तियों से मदान्ध जगमल होश में नहीं आया, बल्कि उसने इसे अपनी राजसी शान के खिलाफ अपमान समझा। कड़ककर उसने कहा, ‘‘तुम मेरे बड़े भाई हो सही, परन्तु तुम्हें स्मरण रहे कि तुम्हें मुझे उपदेश देने का कोई अधिकार नहीं हैं। तुम मेरी आज्ञा के अनुचर हो। मैं नादान नहीं हूँ और न किसी बनिये के घर से उठाकर लाया हुआ, महाराणा उदयसिंह का गोद लिया लड़का ही हूँ। राजा-महाराजओं के यहाँ का बर्ताव उनके कार्य मुझे न सिखलाओ, पिताजी ने कुछ समझकर ही मुझे राजगद्दी दी है।’’
प्रताप- ‘‘जगमल।’’
जगमल- ‘‘प्रताप, तुम महाराणा की शान के खिलाफ पेश आये हो। तुम्हें मैं इसका यथोचित दण्ड दूँगा। तुम आज ही मेरे राज्य की सीमा से बाहर हो जाने का प्रबंध करो।’’
एक प्रकार के सम्मान के ज्ञान के प्रताप की आँखों को बरबस झुका दिया। वे चुपचाप वहाँ से चल दिये। उस समय इधर-उधर से कुछ नौकर प्रताप और जगमल की बातों को कान लगाये सुन रहे थे। जगमल की कठोर दण्डाज्ञा को सुनकर सब चौंक उठे। यह सबको बुरा लगा। वे आपस में जगमल की नीचता की समालोचना करने लगे। धीरे-धीरे फैलती हुई बात सरदारों के कानों तक पहुँची। उधर प्रताप ने किसी दूसरे से कुछ भी न कहा जैसे कुछ हुआ ही न हो। परन्तु उनकी मुखाकृति उत्तरोत्तर गंभीर होती चली गया, जैसे प्रभात के सूर्य-रश्मि पर मेघों की छाया आ पड़ी हो। प्रताप अपने अशवागार में गये और घोड़े को कसने की आज्ञा दी। इधर सरदारों को जगमल की नुष्ठुर आज्ञा का हाल मालूम होते ही सबके-सब प्रताप को खोजने लगे। प्रताप नगर को पारकर कुछ दूर चले गये थे। उस एकान्त स्थान में चन्दावत कृष्ण ने प्रताप को पीछे से पुकारा, प्रताप ने भी घोड़े को रोक लिया। बहुत समझाने पर चन्दावत कृष्ण के साथ वे लौटे।
प्राय: सभी सरदार जगमल से नाराज थे, प्रताप के लौटने पर चन्दावत कृष्ण ने जगमल की नीचता का प्रमाण पेश करते हुए उसे राज्य-संचालन करने के आयोग्य ठहरा, गद्दी से उतार उस पवित्र सिंहासन पर सिसोदिया-कुल-सूर्य, पावन चरित्र महाराणा प्रतापसिंह को बैठाया और उनकी अधीनता में रहकर राज्य का संचालन और अपनी जाति, धर्म और देश की रक्षा करने की प्रतिज्ञा की। सब सरदारों ने एक स्वर से महाराणा प्रतापसिंह की जय घोषणा की। महाराणा प्रतापसिंह के शासन-भार ग्रहण करने का संवाद पा राज्य की समस्त प्रजा को हर्ष हुआ। सब लोग अपने नवीन महाराणा को अनेक प्रकार की भेंटे देते हुए अपने हृदय की निश्चल सेवा की सूचना देने लगे। महाराणा प्रताप के राजसिंहासन पर बैठते ही मानो राज्य के शरीर में एक नवीन जीवन का संचार हो गया, चारों ओर सजीव स्फूर्ति का कलरव होने लगा।
कविवर रवीन्द्र नाथ टैगोर के गीतों में मनुष्य के सुख- दुख, व्यथा – वेदना, आशा – आकांक्षा, आनंद – विषाद, अनुभूति – उपलब्धि आदि विभिन्न प्रकार के भाव मिलते हैं। उनके गीतों में भाषा, भाव, स्वर और छंद का मनोरम सम्मिलन और कला, रूप और रस की आनंद धारा है। प्रेम रस से सिंचित, विरह के स्वर में डूबा, आनंद का प्रकाश उड़ेलती, पूजा का नैवेद्य रूप और प्रकृति के विभिन्न रूपों का चित्रण उनके काव्य में मूर्त रूप ले लेता है। इसके अतिरिक्त दमन करने वाले को सावधान कर दुर्बल और शोषित वर्ग को उससे लड़ने का साहस प्रदान करने का आह्वान किया है। कविगुरू के गीत मनुष्य को एक अतीन्द्रिय उपलब्धि की ओर ले जाते हैं। उनकी यह असाधारण प्रतिभा केवल बंगाल के संगीत को ही एक नया युग प्रदान नहीं करते अपितु इन गीतों के शब्द, स्वर – माधुर्य, भाव-गांभीर्य और भाषा का प्रयोग समग्र भारतीय भाषा भाषी लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
कविगुरू की संगीत संपदा सभी वर्गों के लिए है। यह यौवन का भोज्य और बुढ़ापे का साथी है। उनके गीतों में प्रायः अढा़ई हजार गीतों में 67 प्रकार के उद्भिदों और फूलों का उल्लेख 687बार हुआ। उनके काव्य में 108 प्रकार के पेड़ पौधों के विषय में वर्णन आया है। सभी प्रकार के सुंदर, सुगंधित, बहारी फूलों का तो प्रयोग किया ही गया है साथ ही अवहेलित और ग्राम्य फूलों जैसे कचालू सहजन, वन मल्लिका, सरसों, ताड़, दूब आदि को भी नहीं छोड़ा है। मधुमंजरी, नीलमणि, हिमझूरी, ताराभरा, हर सिंगार आदि के नामकरण कविगुरू ने किए हैं।
“तुमि आमाय डेकेछिले छूटिर निमंत्रणे” (प्रेम – 288)
ये बहुत ही परिचित गीत है जिसके साथ मनुष्य का आत्मिक संबंध मिलता है। इसी गीत के अंतरे में है – – –
“चाइलो रवि शेष चाओवा तार कनकचांपार वने” कवि कनकचांपा से बहुत परिचित हैं कि दिन के अवसान की व्याख्या के समय उनकी लेखनी से इस तरह की पंक्तियों निकली। पेड़ – पौधों को रवींद्र नाथ ने आत्मा और हृदय से जोड़ा। कनकचांपा का पेड़ ऊंचे कद और प्रशस्त पत्तों से युक्त है जिनमें सूर्य किरणों की रश्मियां बहुत देर तक रह जाती है जो इसी पेड़ विशेष पेड़ के लिए ही संभव है। वि
जीवंत और मानवीय गुणों से सम्पन्न उद्भिद और वनस्पतियों पर कवि ने अपनी लेखनी खूब चलाई है।
कवि का पुष्प प्रेम का जन्म निश्चित ही उनका बाल्यकाल ही रहा है किंतु जब उन्होंने शिक्षायतन शांतिनिकेतन का निर्माण किया तो फूलों के प्रति उनके अगाध प्रेम का पता चलता है।
रवींद्र नाथ की पुत्रवधु प्रतिमा देवी ने कवि के पुष्प प्रेम की आंतरिक झलक को उजागर किया है। उन्होंने लिखा है, “उत्तरायण के पेड़ – पौधे उन्हें अत्यंत प्रिय थे। सेमल का पेड़ (कोणार्क के सामने) किस तरह बढेगा, कौन सी खाद देनी होगी, उसमें कौनसी लता लगाने से उसका सौंदर्य बढेगा, इन विषयों पर उनकी सतर्क दृष्टि सदैव परिलक्षित होती थी। कोणार्क के पीछे की जमीन में कंटिकारी एवं विविध प्रकार के कांटों के पौधों को लगाया गया। – – – – फूलों के नये नये नामकरण किए गए। कुछ तो कोपाई नदी के किनारे लगे हैं, कई फूलों की उनकी अच्छी सुगंध, अच्छे वर्ण के कारण लगवाते, कहते – – ये ये फूल ले आओ। शांतिनिकेतन में लगाए गए। एक जंगली फूल शायद कोपाई से लाया गया था उसका नाम दिया “वन पुलक”। उसे “उदीचि” गृह के पास लगाया गया – अभी भी वह वहाँ है। (रवीन्द्र नाथेर पुष्प प्रीति, प्रवासी, माघ 1363)
श्री देवी प्रसन्न चट्टोपाध्याय ने लिखा है कि सन् 1901 में गुरुदेव रवीन्द्र नाथ अपनी पत्नी और पुत्र के साथ शांतिनिकेतन चले गए। शालविथि, माधवी कुंज आदि का निर्माण किया। (शांतिनिकेतन, उत्तरायण, माघ 1395)
प्रसिद्ध पुष्प वैज्ञानिक डॉ देवी प्रसाद मुखोपाध्याय ने बांग्ला भाषा में” रवींद्र संगीते प्रयुक्त उद्भिद औ फूल” में रवीन्द्र नाथ के गीतों में प्रयुक्त फूलों और पेड़ – पौधों पर साहित्यिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से चर्चा की है।प्रस्तुत पुस्तक का हिंदी अनुवाद मैंने डॉ देवी प्रसाद मुखोपाध्याय के निर्देशन में किया जिसे बाउलमन कोलकाता प्रकाशन ने ” रवींद्र संगीत में प्रयुक्त उद्भिद और फूल” शीर्षक से प्रकाशित किया।इस पुस्तक में रवीन्द्र नाथ द्वारा प्रयुक्त लगभग 120 फूलों और पेड़ – पौधों के रंगीन चित्र भी दिए गए हैं।
रवीन्द्र नाथ का पुष्प प्रेम वास्तव में उनकी सचेतनता का प्रकृष्ट प्रमाण है। वे बहुत ही सहज होकर लिखते हैं – – ऐ मालती लता दोले पियाल तरूर कोले पूब हावाते अर्थात पूर्वी हवा से पियाशाल पेड़ की गोद में मालती की लता हिलडुल रही है। फूलों के साथ उनकी घनिष्ठता, उनकी उपमाएं, चित्र आदि जिस तरह से मिलते हैं वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। कदंब उनके लिए वर्षा कालीन अंधकार में रौद्र दिनों की स्मृति, केवड़ा निषेध के बेड़े में घिरा अमृत स्पर्श, कामना की प्रतिरूप अशोक मंजरी, जूही फूल के हृदय में युगों युगों की वेदना का भार बनकर ही चित्रित हुआ है।
हम साधारण मनुष्य हैं – – हमें तो स्वयं से भी प्रेम करना नहीं आता – – – विश्व प्रकृति से प्रेम करना तो बहुत दूर की बात है। फिर भी प्रकृति जिसके पास इस रूप में निकट आ गयी हो उसके लिए जीवन में प्राप्ति और अप्राप्ति का विषय बहुत ही तुच्छ हो जाता है। बड़े होने के साथ साथ कई संघर्षों से पाला पड़ता है परंतु इस प्रकार का अपरिमेय और निश्छल प्रेम हम कहां प्राप्त कर सकते हैं। रवींद्र नाथ के गीत संगीत की दुनिया वास्तव में सोने की छड़ी छू जाने जैसी ही हैं। रवीन्द्र जयंती पर कविवर को प्रेम अभिव्यक्ति के कुछ शब्दार्पण अर्पित करती हूँ।रवीन्द्र नाथ को उनकी समग्रता में जानने और समझने के लिए दूसरा जन्म भी कम है , बहुत ही कठिन साध्य है।
मथुरा : समर्थ चतुर्वेदी द्वारा शुरू किया गया स्टार्टअप मैत्रेय इंक कलाकारों को मुफ़्त में अपने डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर आने और अपने उत्पाद बेचने का मौक़ा देता है। इसके लिए कंपनी कलाकारों से मात्र 2 प्रतिशत कमीशन चार्ज करती है। मैत्रेय के ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर 700 से ज़्यादा नायाब उत्पाद और 2000 से अधिक कलाकृतियाँ मौजूद हैं। दशकों से भारतीय कलाकारों और चित्रकारों के साथ अपनी कला को आर्थिक रूप से भुनाने की चुनौती रही है। जो एजेंसियां और आर्ट डीलर्स उनके उत्पाद बाज़ार तक पहुंचाते हैं, वे कलाकारों से भारी कमीशन चार्ज करते हैं और उनका शोषण करते हैं। इतना ही नहीं, कई बार ये बिचौलिए नवीन उत्पादों को भी ऐंटीक या प्राचीन बताकर ग्राहकों को ठगते हैं और कलाकारों का श्रेय और हक़ उनको नहीं मिल पाता। समर्थ चतुर्वेदी ने इस परिदृश्य को बदलने के उद्देश्य के साथ मैत्रेय नाम से अपने स्टार्टअप की शुरुआत की। समर्थ, योर स्टोरी के ब्रैंड्स ऑफ़ इंडिया 2019 कार्यक्रम के विजेता हैं। 28 वर्षीय समर्थ की परवरिश मथुरा में हुई और उनके पिता भी कलाकारों और चित्रकारों के साथ काम करते थे। उन्होंने पाया कि उनके पिता कलाकारों को उनकी कला की सही क़ीमत दिलाने में मदद करते थे। समर्थ का फ़ैमिली बिज़नेस भी इस बाज़ार से ही जुड़ा था और उनका परिवार पत्थर, तांबे और टेराकोटा से बने उत्पादों को बनाते थे और उन्हें सीधे म्यूज़ियम्स (संग्रहालयों) या प्राइवेट कलेक्टर्स को बेचते थे। इस तरह के बिज़नेस मॉडल से बिचौलियों की भूमिका समाप्त हो जाती थी और कलाकारों को फ़ायदा होता था। समर्थ के पारिवारिक व्यवसाय को बड़ा नुकसान पहुंचने लगा और उन्हें यह बिज़नेस बंद करना पड़ा। इसके बाद समर्थ ने फ़ैसला लिया के वह अपनी मार्केटिंग की नौकरी छोड़कर, अपने फ़ैमिली बिज़नेस को फिर से खड़ा करने का प्रयास करेंगे। वह कहते हैं, “मुझे अभी तक याद है कि मेरे पिता काफ़ी तनाव में थे, जब उन्हें बिज़नेस बंद करना पड़ा। इस दौरान ही मुझे लगा कि अपने इकनॉमिक्स, बिज़नेस डिवेलपमेंट, रिसर्च और डिजिटल मार्केटिंग के स्किल्स और अनुभव का इस्तेमाल करके अपने फ़ैमिली बिज़नेस को फिर से स्थापित कर सकता हूं।”
इस उद्देश्य के साथ ही, 2010 में उन्होंने मैत्रेय इंक की शुरुआत की और देशभर के 145 चित्रकारों और 70 मूर्तिकारों को अपने स्टार्टअप से जोड़ा। अपने पिता बिरेंद्र नाथ चतुर्वेदी की मदद से उन्होंने 700 से अधिक नायाब मूर्तियों और 2000 कलात्मक उत्पादों का कलेक्शन तैयार किया। समर्थ और उनके पिता ने बिना किसी बाहरी निवेश की मदद के यह कलेक्शन तैयार किया। समर्थ कहते हैं कि उन्होंने बाहरी निवेश के लिए इसलिए कोशिश नहीं की क्योंकि यह मार्केट अभी उतना तैयार नहीं था और बड़े निवेशकों को इसमें ख़ास आकर्षण भी नहीं था। उन्होंने बताया कि इसके विपरीत अंतरराष्ट्रीय बिज़नेस समर्थ के पास आते रहते हैं और उनके काम से जुड़ने की इच्छा ज़ाहिर करते हैं।
अपने बिज़नेस मॉडल के बारे में जानकारी देते हुए समर्थ बताते हैं कि उनके स्टार्टअप ने कलाकारों को बिना किसी फ़ीस के अपने ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर आने का मौक़ा दिया और अधिक से अधिक कलाकारों तक पहुंचने के लिए उन्होंने सरकार की मदद ली। फ़िलहाल मैत्रेय के पास 35 लोगों की टीम है और हाल ही में, कंपनी को चीन और थाइलैंड से 5 करोड़ रुपए का ऑर्डर मिला है। समर्थ ने बताया कि एक समय पर उनकी कंपनी का 36 करोड़ रुपए सालाना टर्नओवर था, लेकिन किसी वजह से उन्हें अचानक काम बंद करना पड़ा, लेकिन अब धीरे-धीरे कंपनी का काम फिर से लय में आ रहा था और फ़िलहाल उनका सालाना टर्नओवर 1.4 करोड़ रुपए तक है।
मार्केट की स्थिति के बारे में बात करते हुए समर्थ बताते हैं, “ज़्यादातर डीलर्स कलाकारों से उनके उत्पादों को प्रदर्शित करने के लिए बहुत अधिक फ़ीस लेते हैं और उत्पाद की बिक्री होने पर 70 प्रतिशत तक हिस्सा कलाकारों को मिल पाता है। जबकि अगर डीलर्स मुफ़्त में कलाकारों को अपने प्लेटफ़ॉर्म पर उत्पाद प्रदर्शित करने देते हैं तो बिके हुए माल का 60 प्रतिशत तक हिस्सा वे ख़ुद रख लेते हैं। इन डीलर्स और एजेंसियों से इतर मैत्रेय कलाकारों को मुफ़्त में अपने उत्पाद ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर प्रदर्शित करने की छूट देता है और माल की बिक्री होने पर सिर्फ़ 2 प्रतिशत तक ही कमीशन चार्ज करता है और 98 प्रतिशत हिस्सा कलाकारों को जाता है।” मैत्रेय न सिर्फ़ कलात्मक उत्पादों की बिक्री करता है, बल्कि कला के संरक्षण की दिशा में भी काम करता है। मैत्रेय ने साइंस और आर्ट्स के बारे में पढ़ाने के लिए एक शिक्षण संस्थान भी शुरू किया है। मैत्रेय की कोशिश है कि मथुरा स्कूल ऑफ़ आर्ट्स को रीक्रिएट किया जाए। कंपनी इस तरह से ऐतिहासिक विरासतों और लुप्त होती कलाओं को बचाने के लिए तरह-तरह के प्रयास करती रहती है।
समर्थ कहते हैं, “वह चाहते हैं कि नज़रअंदाज़ करने की वजह से पूरी तरह से ख़त्म हो चुकीं ऐतिहासिक कलाओं को फिर से मुख्यधारा में लाया जाए। हम कला को उनके सही कद्रदानों तक पहुंचाना चाहते हैं। हम जल्द ही बाहरी निवेश के लिए प्रयास शुरू करेंगे और अपने बिज़नेस को तेज़ी के आगे ले जाने की कोशिश करेंगे।
ओमाहा (अमेरिका) : अमेरिका के विख्यात निवेशक वारेन बफे ने शनिवार को कहा कि वित्तीय निवेश के मामलें में महिलाओं की भूमिका और ऊंची होनी चाहिए। अरबपति बुफे ने आमाहा में अपनी कंपनी बर्कशायर हैथवे की सालाना बैठक के दौरान महिला निवेशकों के अलग से आयोजित एक कार्यक्रम में बोल रहे थे। इस कार्यक्रम में उनकी उपस्थिति अप्रत्याशित रही।
वैरिएंट पर्सपेक्टिव (भिन्न परिप्रेक्ष्य) नाम से इस बैठक का आयोजन अमेरिका में वित्तीय क्षेत्र में काम करने वाली कुछ महिला पेशेवरों ने किया था। इसका उद्येश्य निवेश के कामलों में महिलाओं को और बड़ा स्थान दिलाना है। बफे ने इस लक्ष्य के बारे में टिप्पणी की, ‘ बहुत लम्बे समय से इसकी प्रतीक्षा है।’’ उन्होंने कहा,
‘ जब कोई बाहर से मुझे निवेश के किसी सुझाव को लेकर बात करता है तो मैं यह नहीं पूछता कि वह पुरुष है या स्त्री, (क्यों कि) इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।’ बफे ने कहा, ‘ प्रतिभूति यह नहीं जानती कि उसका मालिक कौन है। वैरियंट पर्सपेक्टिव के अनुसार अमेरिका में केवल तीन प्रतिशत निवेश कोष ही महिलाओं के स्वामित्व में हैं। एक निवेश कोष चला रहीं महिला लॉरा रिटेनहाउस ने कहा, ‘ यह हैरानी की बात है कि अमेरिका में 60 प्रतिशत सम्पत्ति महिलाओं के हाथ में है पर वे देश में एक ऐसी महिला नहीं ढूंढ पातीं जो उनके निवेश कोष का प्रबंध कर सके।’
नयी दिल्ली : वायु की गुणवत्ता खराब होने तथा शहरीकरण की रफ्तार बढ़ने से देश में प्रदूषण रोधी मास्क की माँग बढ़ रही है। उद्योग मंडल एसोचैम ने एक रिपोर्ट में कहा कि भारत में प्रदूषण से बचाने वाले मास्क का बाजार 2023 तक बढ़कर 1.68 करोड़ डॉलर यानी 118 करोड़ रुपये पर पहुंच जाएगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत का प्रदूषण रोधी मास्क का बाजार 2023 तक 1.68 करोड़ डॉलर होगा जो 2017 में 61.6 लाख डॉलर या करीब 43 करोड़ रुपये का था। एसोचैम का कहना है कि वायु में भारत के उत्तरी इलाकों में प्रदूषकों के उच्चस्तर की वजह से प्रदूषण रोधी मास्क की मांग बढ़ रही है। इसके अलावा स्वास्थ्य सेवा पर प्रति व्यक्ति खर्च बढ़ने और जागरूकता बढ़ने की वजह से देश में प्रदूषण रोधी मास्क की मांग आगामी वर्षों में बढ़ेगी।
संयुक्त राष्ट्र : पाकिस्तान में सक्रिय जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर को आखिरकार बुधवार को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने वैश्विक आतंकवादी घोषित कर दिया। अजहर का आतंकवादी समूह 2000 में अस्तित्व में आया था। उसने भारत में पुलवामा आतंकवादी हमले सहित कई आतंकवादी हमलों की जिम्मेदारी ली है। जम्मू-कश्मीर के पुलवामा जिले में 14 फरवरी को सीआरपीएफ के काफिले पर किए हमले की जिम्मेदारी भी जैश ने ली थी, जिसमें 40 जवान शहीद हो गए थे।
अजहर से जुड़े मुख्य घटनाक्रम इस प्रकार हैं:-
2009: भारत ने अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने के लिए एक प्रस्ताव पेश किया, जिससे उसके विश्व में कहीं भी यात्रा करने पर प्रतिबंध लग जाता, उसकी संपत्ति पर रोक लग जाती और उस पर हथियार संबंधी पांबदी भी लागू होती। लेकिन चीन ने इस कदम को रोक लगा दी।
2016: भारत ने एक बार फिर पी3 (अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस) के समर्थन के साथ संयुक्त राष्ट्र की 1267 प्रतिबंध समिति में अजहर पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव पेश किया।
2017: पी3 देशों ने भी ऐसा ही एक प्रस्ताव पेश किया। लेकिन सुरक्षा परिषद में वीटो प्राप्त चीन ने फिर इस प्रस्ताव को पारित नहीं होने दिया।
27 फरवरी 2019: अमेरिका, ब्रिटेन फ्रांस ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने के लिए एक नया प्रस्ताव पेश किया।
13 मार्च 2019: जैश प्रमुख को काली सूची में डालने के प्रयास को एक बार फिर चीन ने पूरा नहीं होने दिया। अजहर को एक वैश्विक आतंकवादी घोषित कराने का पिछले 10 वर्ष में यह चौथा प्रयास था।
28 मार्च 2019: अमेरिका ने फ्रांस और ब्रिटेन के समर्थन से पाकिस्तान में सक्रिय आतंकवादी समूह के प्रमुख को काली सूची में डालने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सीधे एक मसौदा प्रस्ताव पेश किया।
3 अप्रैल 2019: अमेरिका की जैश प्रमुख को वैश्विक आतंकवादी घोषित कराने के लिए ‘‘मौजूद सभी साधनों’’ का इस्तेमाल करने की धमकी पर चीन ने कहा कि वॉशिंगटन मामले को उलझा रहा है और यह दक्षिण एशिया में शांति एवं स्थिरता के लिए सही नहीं है।
30 अप्रैल 2019: चीन ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने की प्रक्रिया में ‘‘कुछ प्रगति’’ हुई है और उसे उम्मीद है कि यह विवादस्पद मुद्दा ‘‘ठीक तरह से हल’’ होगा ।
1 मई 2019: चीन के अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस के प्रस्ताव पर से रोक हटाने के बाद 1267 प्रतिबंध समिति ने अजहर को एक वैश्विक आतंकवादी घोषित कर दिया।
आम चुनावों के दौरान खादी के कुर्ता-पायजामा, अंगोछा, गमछा की माँग काफी बढ़ी है। यही वजह है कि मार्च में समाप्त वित्त वर्ष 2018-19 के दौरान खादी का कारोबार इससे पिछले वर्ष के मुकाबले करीब 29 फीसदी की जोरदार वृद्वि के साथ 3,215 करोड़ रूपये के रिकार्ड स्तर पर पहुंच गया।
खादी ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी) के चेयरमैन विनय कुमार सक्सेना ने बातचीत में यह जानकारी देते हुए कहा कि पिछले 5 साल की यदि बात की जाये तो 2013-14 के बाद खादी के कारोबार में चार गुना वृद्वि दर्ज की गयी है। वर्ष 2013-14 में खादी का कारोबार 811 करोड़ रूपये रहा था जो कि 2018-19 में समाप्त वित्त वर्ष में 3,215 करोड़ रूपये पर पहुंच गया।
सक्सेना ने कहा कि बीते वित वर्ष में आम चुनावों को देखते हुए खादी के कपड़ों की मांग अच्छी रही है। उन्होंने कहा कि गर्मी का मौसम होने की वजह से नेताओं और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को धूप और गर्मी में काम करना पड़ता है। गर्मी के मौसम में खादी का कपड़ा ज्यादा पहना जाता है। यह धूप और गर्मी में आरामदायक होता है। स्वास्थ्य के लिहाज से भी खादी के कपड़े अनुकूल और फायदेमंद बताए गए हैं।
केवीआईसी के चेयरमैन ने कहा कि दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, उत्तर प्रदेश और बिहार समेत देश के तमाम राज्यों में खादी के कपड़ों और खासतौर से सिले सिलाए कपड़ों की माँग तेजी से बढ़ी है। उन्होंने कहा कि बीते वर्ष के दौरान खादी की बिक्री में 40 प्रतिशत हिस्सा कपड़े का रहा है जबकि 60 फीसदी बिक्री सिले सिलाए कपड़ों की हुई है। देश के दूरदराज गांवों में कारीगरों द्वारा तैयार खादी का कुर्ता पायजामा, जैकेट, अंगोछा, गमछा, महिलाओं के लिए सूट सलवार, धोती साड़ी की लगातार माँग बनी हुई है।
उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश में केवीआईसी के एक हजार से अधिक और बिहार में 400 से अधिक बिक्री केन्द्र हैं। बीते वर्ष इन केन्द्रों पर खादी के कपड़ों की अच्छी मांग रही है। देश भर में आयोग के कुल मिलाकर 8,060 बिक्री केन्द्र हैं।
सक्सेना कहते हैं कि यदि 2004 से 2014 की बात की जाए तो इस दौरान खादी के बिक्री कारोबार में करीब सात फीसदी की ही वृद्वि दर्ज की गई जबकि पिछले पांच साल के दौरान यह वृद्वि दहाई अंक से भी ऊपर चली गई थी।
आजकल नई-नई कारें बाजार में आ चुकी हैं जिनमे कई अच्छे फीचर्स देखने को मिलते हैं। लेकिन इतने सारे फीचर्स होने के बाद भी अक्सर यह समझ नहीं आता की कौन से फीचर्स सबसे ज्यादा काम के हैं। ऐसे में अगर आप एक नई कार खरीदने की सोच रहे हैं तो यहां हम आपको कुछ ऐसे जरूरी फीचर्स के बारे में बता रहे है जो आपकी नई कार में होने चाइये। आइये जानते हैं…
हमारे हिसाब से हर कार में रिवर्स पार्किंग कैमरा होना चाइये, क्योकिं अक्सर गाड़ी पार्क करते समय पीछे का अंदाजा नहीं होता जिससे कई बार गाड़ी टकरा जाती है और नुकसान पहुंच जाता है। ऐसे में रिवर्स पार्किंग कैमरे और सेंसर की मदद से ड्राइवर को वार्निंग मिल जाती है।
रात में ड्राइविंग करते समय IRVM काफी उपयोगी साबित होता है। प्लेन मिरर में पीछे से आ रही गाड़ियों की लाइट का रिफ्लेक्शन बहुत ज्यादा होता है, जिससे ड्राइवर को परेशानी होती है। जबकि IRVM में यह रिफ्लेक्शन कम हो जाता है। एंट्री लेवल कारों में IRVM नहीं मिलते ऐसे में आप बाजार से इसे लगवा सकते हैं।
आजकल लोग मोबाइल फोन का इस्तेमाल हर वक़्त करते नज़र आते हैं। जिसकी वजह से फोन की बैटरी जल्दी खत्म हो जाती है। ऐसे में एक नई कार में भी यूएसबी चार्जिंग पॉइंट होना बहुत जरूरी है। एंट्री लेवल कारों में अभी भी यह सुविधा नहीं मिलती, आप चार्जिंग पॉइंट पॉइंट बाद में भी लगवा सकते हैं।
हांलाकि यह फीचर महंगी कारों में ही देखने को मिलता है लेकिन एंट्री लेवल मॉडल में फिर भी इसकी कमी देखने को मिलती है। ऑटोमैटिक क्लाइमेट कंट्रोल की मदद से आप अपनी गाड़ी के अन्दर का तापमान अपने आप कंट्रोल होता है।
सुनने में आपको जरूर अटपटा लगे लेकिन यह सच है की रोल्स रोयस और स्कोडा जैसे लग्जरी ब्रांड्स अपनी सभी कारों में एक छाता जरूर देती हैं और इसे रखने के लिए भी एक खास जगह कार में बनाई जाती है, दरअसल बारिश के दिनों में छाता काफी काम आता है। बारिश में आप छाते की मदद से आसानी से कार से बाहर निकल सकते हैं।
जो लोग छोटे बच्चों के साथ ज्यादा ट्रैवल करता है उन्हें कार में ISOFIX Mounts जरूर रखना चाइये। यह कार की पिछली सीट पर लगा होता है जिसमें आप बच्चे को बैठा सकते हैं। सुरक्षा के लिहाज से बच्चों को फ्रंट सीट पर नहीं बैठाने की सलाह दी जाती है। ISOFIX Mounts में बैठा बच्चा हादसे के समय सुरक्षित रहता है। (साभार – अमर उजाला)
नयी दिल्ली : ओडिशा में चक्रवाती तूफान ‘फानी’ 193 किमी प्रति घंटे की रफ्तार आया. हवा इतनी तेज थी कि कई बड़े पेड़ जड़ों से उखड़ गए. बसें पलट गईं. घरों के दरवाजे और खिड़कियां टूट गयीं। कई जगहों पर टेलीफोन और बिजली के खंबे ढह गए. लेकिन अच्छी बात ये थी कि करीब 11.5 लाख लोगों को सुरक्षित बचाया गया। ऐसा सिर्फ इसलिए हो पाया क्योंकि भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो के उपग्रहों ने पहले ही चेतावनी दे दी थी. ये हर 15 मिनट पर ग्राउंड स्टेशन को नई जानकारी दे रहे थे। तूफान फानी को 43 सालों का सबसे खतरनाक तूफान बताया जा रहा है. इसके कारण अब तक 16 लोगों की मौत हो चुकी है। मरने वाले 16 लोगों में से मयूरभंज से चार, व पुरी, भुवनेश्वर और जाजपुर में तीन-तीन एवं क्योंझर, नयागढ़ और केंद्र पाड़ा में एक -एक व्यक्ति शामिल हैं।
इसरो की चेतावनी और पूर्वानुमान की वजह से ओडिशा के करीब 10,000 गांवों और 52 शहरी इलाकों में लोगों को सुरक्षित बचाया जा सका. 5000 से ज्यादा शेल्टर होम तैयार किए गए। इसरो ने इस काम के लिए 5 सैटेलाइट यानी उपग्रह तैनात किए थे। इसरो की Insat-3D, Insat-3DR, Scatsat-1, Oceansat-2 और मेघा ट्रॉपिक्स उपग्रहों ने लगातार ओडिशा पर नजर रखी. इन्होंने अगर समय पर तूफान की पहचान न की होती तो शायद स्थिति बिगड़ जाती।
इसरो के उपग्रह हर 15 मिनट में दे रहे थे तूफान की नयी जानकारी
करीब 7 दिन पहले ही मौसम वैज्ञानिकों ने दक्षिणी हिंद महासागर में निम्न दबाव के चलते चक्रवाती तूफान आने की चेतावनी दी थी। इसरो के 5 उपग्रह लगातार इस पर नजर रख रहे थे. ये हर 15 मिनट पर ग्राउंड स्टेशन को नई जानकारी दे रहे थे। सुरक्षित स्थानों की जानकारी मिलते रहने से लोगों को प्रभावित इलाकों से निकालने में मदद मिली। मौसम विभाग ने बताया कि फानी के केंद्र से 1,000 किमी के दायरे में बादल छाए थे, लेकिन बारिश वाले बादल सिर्फ 100 से 200 किमी के रेंज तक थे. बाकी बादल करीब 11 हजार फीट की ऊंचाई पर थे। INSAT सीरीज के उपग्रहों से पहले जो जानकारी मिली, उस पर बारीक नजर रखने के लिए Scatsat-1 को तैनात किया गया. उससे चक्रवाती तूफान के केंद्र पर नजर रखी गयी, फिर Oceansat-2 के जरिए समुद्री सतह, हवा की गति और तूफान के दिशा के बारे में जानकारी मिलती रही। अमेरिका के द न्यूयॉर्क टाइम्स ने फानी तूफान को लेकर भारत और इसरो की तारीफ की है। उसने लिखा है कि इसरो की चेतावनी के बाद भारत सरकार ने अच्छी योजना बनायी। लोगों को को सुरक्षित रहने के लिए 26 लाख मैसेज भेजे गए। 43,000 वॉलेंटियर्स पहले से ही तैनात थे। करीब 1,000 आपातकालीन कर्मचारियों तैनात थे। द वॉशिंगटन पोस्ट ने कहा कि इसरो और सरकार की सर्तकता के कारण बड़ी तबाही छोटी हो गई।