कोलकाता : सुप्रसिद्ध समाजसेवी, अर्थविद और लेखक नंदलाल का विगत सोमवार को निधन हो गया। वे पिछले एक महीने से मस्तिष्क आघात से पीड़ित थे और कोलकाता के एक नर्सिंग होम में भर्ती थे। उन्होंने सोमवार को रात 9 बजे अपनी अंतिम सांस ली। नंदलाल शाह भारतीय भाषा परिषद के मंत्री थे और इस संस्था को पिछले कई दशकों को अपनी महत्वपूर्ण सेवाएँ प्रदान कर रहे थे। उनका संबंध परिषद के अलावा कोलकाता की कई साहित्यिक और सामाजिक संस्थाओं से था।
नंदलाल शाह ने समय समय पर विश्व आर्थिक स्थितियों पर महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ लिखी थीं। वे जीवन भर सामाजिक रूप से सक्रिय थे। उनके निधन शोक व्यक्त करते हुए भारतीय भाषा परिषद की अध्यक्ष डॉ.कुसुम खेमानी ने कहा कि नंदलाल जी से उनका पारिवारिक संबंध था। वे बड़े सहृदय और चिंतनशील थे। उनके निधन से परिषद की ही नहीं कोलकाता के सांस्कृतिक जगत की एक अपूरणीय क्षति हुई है।
नंदलाल शाह की स्मृति में एक श्रद्धांजलि सभा गत 27 जून को हुई। भारतीय भाषा परिषद, भारतीय संस्कृति संसद, राजस्थानी प्रचारिणी सभा, अभिनव भारती, बड़ाबजार कुमारसभा पुस्तकालय, पश्चिम बंगाल प्रांतीय मारवाड़ी सम्मेलन, संस्कृति सौरभ, मारवाड़ी युवा मंच, झुंझुनू प्रगति संघ, बंगीय हिंदी परिषद, जन संसार, डायलॉग सोसायटी, सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन, अपनी भाषा, लिटिल थेस्पियन,राजस्थान परिषद, साहित्यिकी, नीलांबर, नवज्योति हावड़ा, सदीनामा तथा अन्य कई संस्थाओं ने श्रद्धा सुमन अर्पित किये।
सुप्रसिद्ध समाजसेवी और अर्थविद नंदलाल शाह का निधन
हिन्दी विश्वविद्यालय कोलकाता केंद्र में प्रवेश परीक्षा 29-30 जून को
कोलकाता : महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा में नए सत्र के लिए विभिन्न विषयों में एम.फिल., पी-एच.डी. तथा बी-एड, एम.एड. में प्रवेश के लिए सॉल्ट लेक, सेक्टर- तीन स्थित केंद्र भवन ऐकतान परिसर में 29-30 जून को लिखित परीक्षा आयोजित की जा रही है। इसके अतिरिक्त वर्धा, इलाहाबाद एवं दिल्ली में भी इसके परीक्षा केंद्र बनाए गए हैं। कोलकाता केंद्र में हिंदी साहित्य, जनसंचार, मानवविज्ञान, शिक्षाशास्त्र, समाज कार्य, बौद्ध अध्ययन, दलित एवं जनजाति अध्ययन, गांधी एवं शांति अध्ययन, फिल्म एवं नाटक, अनुवाद प्रौद्योगिकी तथा बी.एड.-एम.एड. के लिए यह परीक्षा दोनों दिन दो-दो सत्रों में सम्पन्न होगी। कोलकाता केंद्र के प्रभारी डॉ. सुनील कुमार ‘सुमन’ ने बताया कि कुल मिलाकर एक सौ तेरह विद्यार्थी इस लिखित प्रवेश परीक्षा में भाग ले रहे हैं। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रजनीश कुमार शुक्ल के निर्देशन-मार्गदर्शन में निष्पक्ष एवं पारदर्शी प्रवेश प्रक्रिया अपनाई जा रही है। दोनों दिन पूरी परीक्षा की वीडियो रिकॉर्डिंग कराई जाएगी। डॉ सुनील ने बताया कि कोलकाता केंद्र में चलने वाले पाठ्यक्रम एमए हिंदी साहित्य एवं अनुवाद में डिप्लोमा के लिए जुलाई प्रथम सप्ताह में प्रवेश की प्रक्रिया सम्पन्न की जाएगी।
युद्ध के खिलाफ खड़ा वाइल्ड एक्सपेरिमेंट नाटक

पिछले दिनों प्रोसेनियम आर्ट सेंटर की नयी नाट्य प्रस्तुति (WILD EXPERIMENT )’वाइल्ड एक्सपेरिमेंट ‘ नाटक का लगातार तीन दिनों तक (7’8’ और 9 जून को ) प्रोसेनियम आर्ट सेंटर में नाम प्रस्तुत किया गया।जिस कहानी का मंचन हुआ उस कहानी को लोग एक झूठी कहानी मानते है । दरअसल “द रशियन स्लीप एक्सपेरिमेंट ” इंटरनेट पर वायरल हुई कहानी थी जिसे ‘आँरेज सोड़ा’नाम के एक युजर ने Creepyasta.wikia.com पर पोस्ट किया था। हालाँकि यह ऑरेंज सोडा कौन है?इस बारे में आजतक पता नहीं चल सका।गुमनाम रूप से लिखी गयी इस छोटी सी कहानी ने फिल्म मीडिया के कलाकारों को प्रेरित किया और उसके परिणाम स्वरूप कई लघु फिल्में और एक उपन्यास का प्रकाशन हुआ जो काफी चर्चित रहा।यह नाटक ताकि वायरल कहानी प्रेरित होकर टी.जे.स्मीथ ने लिखी और फिल्म निर्देशित किया उसी पर फिल्म पर आधारित नाटक है।
सामाजिक, राजनैतिक सुझ बूझ वाले कलात्मक विषयों वाले नाटकों की तलाश सिर्फ हिंदी में ही नहीं बल्कि पूरे भारतीय रंगमंच को जरूरत है ।ऐसा सकंट महसूस किया जाता रहा है।अगर हिन्दी में नाटक है भी तो उन नाट्य संस्थाओं तक नहीं पहुँच रहे हैं और पहुँच भी रहे हैं तो उस नाटककार और निर्देशकों के बीच कोई संवाद नही बन पाता जो जरूरी है । अज़ुम रिज़वी द्वारा इस तरह की कहानी खोज निकालना और उसे अनुदित कर मंचस्थ करना एक प्रसंशनीय काम है, यह नाटक उसी कमी को जरूर पूरा करता है।
“राक्षस वास्तव में एक बहुत ही वास्तविक ,मानवीय स्थान से आते है,
जो मानव पर जहरीले प्रयोग कर ताकतवर और प्रशंसनीय बन जाते हैं।”
कहानी 1940 दशक के अंत में सोवियत संघ में एक सैन्य मंजूरी के बाद एक प्रकार की रासायनिक गैस को लेकर मानव पर वैज्ञानिक प्रयोग किया गया था। उसी वैज्ञानिक प्रयोगात्मक विषय से अवगत कराते हुए यह नाटक उत्तेजित करता है ।
नाटक की कहानी कुछ यूं है कि एक वैज्ञानिक शोधकर्ता द्वारा तीन राजनैतिक कैदियों को एक सील बंद गैस चेम्बर में एक सैन्य अस्त्र के परीक्षण लिए रखा गया । शर्तानुसार अनुसार उन्हें एक प्रकार की गैस में छोड़ा जायेगा जो उन्हें सोने नहीं देगा और उन्हें तीस दिनों तक जाग कर रहना होगा। उसी शर्तानुसार अनुसार प्रयोग के बाद उन्हें हमेशा के लिए स्वतंत्र कर दिया जायेगा यदि वे इस प्रयोग को पूरा करते हैं।गैस चेम्बर में उन कैदियों की बातचीत को इलेक्ट्रानिक रुप से माँनिटर किया गया क्योंकि उस समय सर्किट कैमरा नहीं हुआ करता था।उनके व्यवहार को गुप्त रूप से पाँच इंच मोटी ग्लास जो पोरथोल आकार की खिड़की है उसी के माध्यम देखा जा रहा ।
प्रारम्भिक दिनों के दौरान देखा जा रहा कि कैदी सामान्य रूप से व्यवहार करते है,एक दूसरे से बातचीत करते हैं और फुसफुसा रहे हैं।कुछ दिनों बाद सभी ने असमान्य व्यवहार करना शुरू कर दिया। उनकी बातचीत अपना एक गहरा पक्ष लेती है। कुछ दिन बाद वे परिस्थितियों के बारे शिकायत करना शुरू करते हैं और गम्भीर व्यामोह (आसक्ति )प्रदर्शित करना शुरू कर देते हैं। उसके बाद अनियंत्रित रुप से चीखना शुरु कर देते है। एक दूसरे पर हमला करते,कुछ दिनों बाद अपना ही मांस खाना शुरू कर देते है। बारह दिनों के बाद जब,शोधकर्ता कैदियों को निर्देश देता है कि अब उन्हें मुक्त कर दिया जा रहा है लेकिन शोधकर्ता को आश्चर्य तब होता है कि एक कैदी कहता है ,हम अब मुक्त नहीं होना चाहतें ।लेकिन गैस प्रयोग चलता रहता है उसी दौरान ही वे मर जाते और मारे जाते हैं।
नाटक में कहानी यही है।लेकिन ऐसा भी माना जाता है कि इस कहानी की घटना और पात्र काल्पनिक नहीं बल्कि वास्तविक थे।
यह कहानी1940-45 द्वितीय महा विश्व युद्ध के समय की है।
जोसेफ स्टालिन से हिटलर हार चुके थे ,स्टालिन सोवियत संघ का प्रतिनिधित्व करते हुए और शक्तिशाली बने थे। उस काल में रूस दिनरात प्रगति कर रहा था और शस्त्र बनाने के होड़ में लगा था ।रूस किसी भी आने वाले युध्द के लिए हर हाल में लड़ने के लिए तैयार रहना चाहता था शायद इसलिए गैस 76आईए का परीक्षण करना चाह रहा था ।
हिटलर के कुछ नाजियों को गिरफ्तार कर लिया गया था।जिन्हें दस साल की कठोर श्रम सजा सुनाई गयी थी। संघ द्वारा इन राजनैतिक कैदियों को जिन्हें राज्य का दुश्मन समझा गया था ।उन्हीं में से पांच कैदियों को चुन जाता है (ताकि नाटक में तीन पात्र दिखाये गये है।),उन्ही पाँच सिपाहियों के साथ साइबेरिया की जगंलों में संघ के द्वारा अनुमोदित एक वैज्ञानिकों के दल ने उन कैदियों को एक प्रकार की रासायनिक गैस के बीच रख गुप्त और अनैतिक रूप से मानव वैज्ञानिक एक्सपेरिमेंटल किया था लेकिन इस जधन्य वैज्ञानिक प्रयोग की जिम्मेदारी रशियन सरकार ने आजतक नहीं स्वीकार किया इसलिए आज भी इस कहानी का सच रहस्य बना हुआ है।
लेकिन इस सत्य घटना को पुरी दुनिया में “रशियन स्लीप एक्सपेरिमेंट”के नाम से जानती है। यह भयानक क्रूर अमानवीय प्रयोगों में से एक था। यह पूरी दुनिया में अपनी भयावहता के लिए जितना प्रसिद्ध है उतना ही मानव समाज के लिए कलंकित है ।
कहानी के भीतर छिपे आतंक के हर पल भयावह है ,क्योंकि इस नाटक की यात्रा काफी गहन है साथ ही गहराई से वास्तविक विचार प्रकट होने देता है। दुनिया में होने वाले राजनैतिक अत्याचार, हत्या ,रक्तपात, युध्द के लिए मानव हथियारों इस्तेमाल, इन सबके लिए दुनिया के तमाम राज्य और राष्ट्र ही जिम्मेदार है । यह बात इस कहानी में बड़ी तीव्रता से यह व्यंजित होता है। साथ ही यह नाटक परमाणु, रासायनिक और जैविक हथियारों का इस्तेमाल न हो इसकी पैरवी करता है।
अज़ूम रिज़वी के निर्देशन में खेले गये इस नाटक का चुनाव और अनुवाद ही उन्हें मजबूत बना देता है। हालांकि अनुवाद कुछ शाब्दिक जरूर हो गये हैं। इस नाटक की कथा वस्तु के अनुसार हर पात्र मानसिक और दैहिक रूप से कष्ट भोग रहा है इसलिए आंतरिक और दैहिक यत्रंणा की अभिनय शैली को माध्यम द्वारा उजागर करने की जरूरत है। हालांकि नाटक की कथा वस्तु में इतनी मजबूत है कि नाटक उतना प्रभावित नहीं होता है।अभिनेताओं में अरविंद प्रेमचंद ,आनंद चतुर्वेदी, बलराम कुडंलिया और शरभ चटर्जी ने जरूर कोशिश किया है। प्रकाश योजना पर ध्यान देने की जरूरत है। सेट और पार्श्व संगीत प्रोसेनियम जैसे अतंरंग मंच के लिए बिल्कुल ठीक है । पूरी टीम इसके लिए बधाई की पात्र है।
(लेखक वरिष्ठ रंगकर्मी हैं)
बजाज डॉमिनार : आर्कटिक से अंटार्कटिक तक की पहले पोलर ओडिसी की पहली सफल भारतीय बाइक
खास बातें – किसी भी भारतीय मोटरसाइकिल द्वारा दुनिया की पहली पोलर ओडिसी: आर्कटिक क्षेत्र में टुकटॉयक्टुक से अंटार्कटिक तक की यात्रा को किसी ब्रेकडाउन के बिना सफलतापूर्वक पूरा किया बजाज डॉमिनार पर तीन भारतीय राइडरों ने 99 दिनों की इस यात्रा में 3 महाद्वीपों के 15 देशों से गुजरते हुए 51,000 किमी (औसतन 515 किमी प्रतिदिन) का सफ़र तय किया। इस ओडिसी के दौरान 4 सबसे दुर्गम सड़कों और 3 प्रमुख अक्षांशों को पार किया गया
पोलर ओडिसी — अर्थात आर्कटिक से अंटार्कटिक तक की यात्रा में जीत हासिल करने वाली पहली भारतीय मोटरसाइकिल बनकर बजाज डॉमिनार ने एक बार फिर से इतिहास रचा है। 99 दिवसीय इस यात्रा के दौरान डॉमिनार पोलर ओडिसी ने पूरे उत्तर और दक्षिण अमेरिका को कवर किया, जिसकी शुरुआत आर्कटिक क्षेत्र में टुकटॉयक्टुक के ऐंगकरेज से हुई और फिर नीचे की ओर आगे बढ़ते हुए दुनिया के अंतिम छोर के तौर पर अर्जेंटीना के उशुआइया तक के सभी रास्तों को कवर किया तथा अंटार्कटिक तक पहुंचे! डॉमिनार पोलर ओडिसी किसी ब्रेकडाउन के बिना पूर्ण हुई, साथ ही इस यात्रा को विभिन्न प्रकार के इलाकों, जलवायु एवं परिस्थितियों का सामना करते हुए किसी प्रकार के समर्पित सर्विस सपोर्ट अथवा बैक-अप टीम के बगैर ही पूरा किया गया। बेहद थका देने वाली इस दुष्कर यात्रा में 3 महाद्वीपों– अर्थात उत्तरी अमेरिका, दक्षिण अमेरिका एवं अंटार्कटिक तथा 15 देशों को कवर किया गया:
कनाडा, अमेरिका, मैक्सिको, ग्वाटेमाला, होंडुरास, अल सल्वाडोर, निकारागुआ, कोस्टा रिका, पनामा, कोलंबिया, इक्वेडोर, पेरू, बोलीविया, चिली और अर्जेंटीना। राइडरों और मशीनों ने परिस्थितियों को अनुकूल बनाने के लिए बेहद ख़राब मौसम का सामना किया, जिसमें शामिल हैं – पूरे अलास्का में भारी बर्फबारी, बारिश तथा कीचड़ और ढीली बजरी, पाइक्स पीक, कोलोराडो की चोटियों पर बर्फ़ीला तूफ़ान, बाजा कैलिफोर्निया, मेक्सिको की पगडंडियां एवं कच्ची सड़क, अंटार्कटिक में – 22 °C से लेकर धरती के सबसे गर्म स्थान डेथ वैली, अमेरिका में +54 °C तक के तापमान का सामना
दुनिया की कुछ बेहद ख़तरनाक सड़कों में शामिल कुछ रास्तों पर डॉमिनार राइडरों ने विजय हासिल की:
- जेम्स डाल्टन हाईवे – आर्कटिक क्षेत्र, अमेरिका
- द डेम्पस्टर हाईवे – आर्कटिक क्षेत्र, कनाडा
- अटाकामा रेगिस्तान का पैन-अमेरिकी हिस्सा, चिली
- बोलीविया का द डेथ रोड
पोलर ओडिसी की चुनौती को 3 बेहद उत्साही राइडरों, अर्थात दीपक कामथ, अविनाश पी. एस., और दीपक गुप्ता ने पूरा किया। दीपक कामथ पिछले 30 वर्षों से राइडिंग कर रहे हैं और वह डॉमिनार पोलर ओडिसी के टीम लीडर थे। अविनाश पी. एस. पेशे से एक मैकेनिकल इंजीनियर हैं, साथ ही वह बेहद उत्साही मोटरसाइकिल राइडर एवं फोटोग्राफर हैं। दीपक गुप्ता, ग्रुप ऑफ दिल्ली सुपर बाइकर्स (GODS) के सक्रिय सदस्य हैं।
डॉमिनार पोलर ओडिसी के सफलतापूर्वक समापन के अवसर पर अपने विचार व्यक्त करते हुए बजाज ऑटो लिमिटेड के उपाध्यक्ष (मार्केटिंग – एमसी), नारायण सुन्दररमन ने कहा, “डॉमिनार पोलर ओडिसी दरअसल व्यक्ति एवं मशीन की प्रभावशाली साझेदारी का प्रतीक है। इस सफलता के लिए दीपक कामथ, अविनाश पीएस और दीपक गुप्ता बधाई के पात्र हैं। डॉमिनार का बिना किसी ख़राबी के 99 दिनों से अधिक समय तक लाजवाब प्रदर्शन, इसकी उच्चस्तरीय निर्माण गुणवत्ता एवं लंबी यात्राओं की असाधारण क्षमता की पुष्टि करता है। किसी भी बड़े पुर्जे में बदलाव या सहायता दल की मौजूदगी के बिना, सामानों के साथ डॉमिनार पर कुछ बेहद दुर्गम इलाकों तथा परिस्थितियों का सामना करते हुए 51,000 किमी की यात्रा तय करना वास्तव में अत्यंत उत्कृष्ट उपलब्धि है।”
सोशल मीडिया पर दी जाने वाली धौंस के खिलाफ अनन्या पांडे की मुहिम
मुम्बई : अदाकारा अनन्या पांडे ने सोशल मीडिया पर दिये जाने वाले धौंस के खिलाफ ‘सो पॉजिटिव’ नाम के एक खास अभियान की ‘वर्ल्ड सोशल मीडिया डे’ पर शुरुआत की है। उनकी इस पहल का उद्देश्य सोशल मीडिया पर दी जाने वाली धौंस के खिलाफ जागरूकता फैलाना और इसके पीड़ितों को इससे निपटने के उपायों की जानकारी देना है। उन्होंने इसकी घोषणा अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर की है। अनन्या (20) ने बॉलीवुड में अपने करियर की शुरुआत ‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर 2’ से की है।
अपर्णा ने फतह की सबसे ऊँची चोटी, सात शिखरों पर तिरंगा फहराने वाली पहली आईपीएस बनीं
लखनऊ : भारत-तिब्बत सीमा पुलिस बल (आईटीबीपी) देहरादून में तैनात यूपी कॉडर की आईपीएस अपर्णा कुमार ने दुनिया की सातवीं सबसे ऊंची चोटी भी फतह कर ली है। शनिवार को अपर्णा ने 20310 फुट ऊंचे दुनिया के सातवें सबसे ऊंचे शिखर अलास्का के माउंट डेनाली पर तिरंगा और यूपी पुलिस का झंडा फहराया। दुनिया की सात चोटियों पर पहुंचने वाली अपर्णा कुमार देश की पहली अधिकारी हैं। सिविल सर्वेंट के किसी सदस्य ने अब तक यह कारनामा नहीं किया था। संयुक्त राज्य अमेरिका के अलास्का स्थित माउंट डेनाली की चोटी पर अपर्णा ने शनिवार को सुबह आठ बज कर दस मिनट पर कदम रखा। माउंट डेनाली अमेरिका का सबसे ऊंचा पर्वत है। इस चोटी को वह तीसरे प्रयास में फतह कर सकीं। माइनस 40 डिग्री तापमान में 250 किमी प्रति घंटा की रफ्तार से चलने वाली हवा को चीरते हुए वह अनुमानित समय से लगभग 10 दिन पहले ही पहुँच गयीं। इससे पहले 2017 और 2018 में मौसम खराब होने के कारण उन्हें वापस लौटना पड़ा था। यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस उपलब्धि के लिए अपर्णा कुमार को बधाई दी है। अपर्णा का अगला लक्ष्य उत्तरी ध्रुव पर तिरंगा फहराने का है। इसके लिए वह अप्रैल 2020 में सफर शुरू करेंगी। मूल रूप से कर्नाटक के शिमांगो की रहने वाली अपर्णा कुमार यूपी कॉडर में 2002 बैच की आईपीएस अधिकारी हैं। अपर्णा इससे पहले दुनिया की शीर्ष छह चोटियों को भी फतह कर चुकी हैं। इसमें एशिया का माउंट एवरेस्ट, अफ्रीका के तनजानिया का माउंट किलिमंजारो, यूरोप की एलब्रस, इंडोनेशिया की कांर्सटेंज पिरामिड, अंटार्किटा की विनसन मैसिफ और दक्षिण अमेरिका की माउंट एंकोकागुआ को फतह कर चुकी हैं।
चेन्नई: पानी के हाहाकार के बीच ‘इंद्र’ की मिसाल
चेन्नई : पानी के संकट से जूझ रहे चेन्नई में हर कोई प्यास बुझाने के लिए पैसा और समय दोनों खर्च कर रहा है। शहर के दक्षिणी हिस्से का हाल और बुरा है लेकिन शहर में एक व्यक्ति ऐसा है जो चेन्नई में पानी के नल का कनेक्शन लेने से लगातार इनकार करता रहा है। 69 साल के एस इंद्र कुमार बड़े गर्व से कहते हैं कि उन्हें जल बोर्ड की ओर से कनेक्शन लेने की कई बार अपील की गयी। उत्तरपूर्वी मानसून में देरी के कारण शहर के दक्षिणी हिस्से के सभी जलाशय सूख चुके हैं। इस समय लोग चेन्नई मेट्रोवॉटर बोर्ड के पानी के टैंकरों पर निर्भर हैं, जिनकी बुकिंग या वेटिंग तीन तीन सप्ताह तक जा रही है। इसका फायदा उठाते हुए 40 डिग्री सेल्सियस तापमान के बीच निजी टैंकर खूब पैसा बना रहे हैं लेकिन इंद्र कुमार के पास पानी का भण्डार है। सात महीने बाद हुई बारिश में इंद्र कुमार ने इतना पानी इकट्ठा कर लिया है कि लोगों को हैरत हो सकती है।
इंद्र कुमार कहते हैं, “पिछले दो दिनों में तीन सेंटीमीटर तक बारिश हुई है। मैंने 18,000 लीटर पानी इकट्ठा करने में सफलता पाई। चेन्नई पानी संकट का सामना कर रहा है, मैं नहीं। “उनके अनुसार, “बारिश का पूरा पानी बेकार चला जाता है लेकिन मेरे घर में ऐसा नहीं होता। यहाँ हम बारिश की हर बूंद इकट्ठा करते हैं।” क्रोमपेट में स्थित बाहर से पुराने फ़ैशन के बने अपने दोमंज़िले मकान को वो पर्यावरण सुलभ घर बताते हैं। वॉटर हार्वेस्टिंग के उनके अनूठे प्रयास के लिए उनकी ख्याति ‘इको वॉरियर’ के रूप में है। साल 1986 में उन्होंने अपना घर बनवाया था, उसके 12 साल बाद उन्हें पहली बार चुनौती का सामना करना पड़ा था। कुएं का जो पानी मीठा था उसका स्वाद बदल गया। वो कहते हैं, “मैंने तुरन्त रेन वॉटर हार्वेस्टिंग शुरू कर दी और छह महीने में ही पानी की गुणवत्ता में सुधार दिखाई देने लगा। “उन्होंने अपने बच्चों से कहा कि वो अपने स्कूल प्रिंसिपल को सूचना दें कि सुबह की प्रार्थना सभा के समय वो अपने अनुभव साझा करना चाहते हैं। उस दिन वो स्कूल गए और अपना अनुभव साझा कर सीधे अपने काम पर चले गए। इंद्र कुमार बताते हैं, “जब मैं शाम को घर पहुंचा तो मैंने दो अध्यापकों को अपने घर पर इन्तज़ार करते हुए पाया। वो चाहते थे कि मैं उनके घर जाऊँ और उनके कुएं के बारे में अपनी राय बताऊँ। जब पहुँचा तो मैंने वहाँ सतह पर सफ़ेद पदार्थ को तैरते हुए देखा। उन्होंने बताया कि यही पदार्थ छत की टंकी में भी है। “वो कहते हैं, “असल में पुमाल, पल्लवरम, क्रोमपीट इलाक़े में टेरनरी बहुत हैं और ये पदार्थ उनका ही प्रदूषण था। उस दिन मैंने इसे अपना पेशा बनाने का फैसला कर लिया। मैंने तय किया कि मैं हर दिन इसका प्रचार करूँगा और दो लोगों को इसके लिए मनाने की कोशिश करूँगा। साल 1998 से 2000 के बीच 1,000 से अधिक घर रेन वॉटर हार्वेस्टिंग से लैस हो गए। उनके रेन वॉटर हार्वेस्टिंग प्रोजेक्ट में घर के पास की ढलान का भी कुछ योगदान है जो उनके घर से 50 मीटर की दूरी से ही शुरू होती है। उनके घर के सामने पानी बहकर एक नाली में जाता है। वो बताते हैं, “नाली से होते हुए बारिश का पानी समन्दर में चला जाता है। इस पानी को रोकने के लिए मैंने घर के ठीक सामने एक गढ्ढा बनाया। “इंद्र कुमार कहते हैं, “हमने इस जगह को खोदा और इसमें रेत डाल दी। इसने ज़मीन के अंदर पानी के स्तर को बढ़ने में मदद की। ” इसके अलावा उन्होंने अपने घर की छत पर एक छोटा सा वॉटर टैंक बनवाया है जो बारिश के समय भर जाता है। इकट्टा हुआ पानी भी रेत से छनने की प्रक्रिया से होकर गुजरता है। इसमें एक देसी पौधा सारसापरिल्ला या ननारी तैरता है। वो कहते हैं, “ननारी पानी को शुद्ध करता है।”ये पानी कुएं में गिरने से पहले बिल्कुल ऊपर एक दूसरे फ़िल्टर से होकर गुजरता है। इंद्र कुमार कहते हैं, “मैं इस कुएं का पानी पीता हूँ। इसमें सभी मिनरल्स होते हैं और इसी पानी को मैं पीने के लिए इस्तेमाल करता हूँ। “लेकिन ‘इको वॉरियर’ के इस घर में पर्यावरण के अनुकूल अन्य चीजें भी मौजूद हैं। छत बिल्कुल खाली नहीं, बल्कि हरी भरी है। यहाँ दवाई के गुण वाले पौधे जैसे लेमन ग्रास, तुलसी आदि लगाए गए हैं। वो कहते हैं, “अगर आप इनका सेवन करें तो आपको डॉक्टर के पास नहीं जाना पड़ेगा। इन पौधों से ऑक्सीजन भी मिलती है जिससे सेहत अच्छी बनी रहती है।”

इंद्र कुमार उन लोगों से सहमत नहीं है जो मानते हैं कि बेकार जाने वाला पानी, पानी का स्रोत नहीं हो सकता है।
“अगर आप पूछें कि पानी के स्रोत क्या हैं, तो वो कहेंगे बादल, बारिश, पिघलती बर्फ़ आदि। वो कभी नहीं कहेंगे बेकार पानी। मैं इस बेकार पानी को रिसाइकिल करता हूं और किचन के सारे पानी को पौधों में इस्तेमाल करता हूँ। “वो कहते हैं, “मैं टॉयलेट के लिए केमिकल नहीं इस्तेमाल करता। मैं बैक्टीरिया का भी इस्तेमाल करता हूँ। मेरा टॉयलेट उतना सुंदर नहीं है लेकिन साफ़ ज़रूर है। सिर्फ़ टॉयलेट फ्लश में ही लोग 50 लीटर पानी खर्च कर देते हैं, इतने पानी से नारियल का एक पेड़ बचाया जा सकता है। “इंद्र कुमार घर के पीछे बगीचे की सारी पत्तियों का इस्तेमाल खाद बनाने में करते हैं। इससे वो 200 किलोग्राम आर्गेनिक खाद बनाते हैं, जिसे वो बहुत सस्ती दरों पर बेचते हैं। जहाँ इंद्र कुमार एक घर में वॉटर हार्वेस्टिंग और वेस्ट मैनेजमेंट की मिसाल खड़ी की है, वहीं बहुमंजिला इमारत में रहने वाले एमबी निर्मल ने भी लोगों के सामने एक उदाहरण पेश किया है। निर्मल इमारत की 12वें मंजिल पर रहते हैं और उनकी दोनों बालकनी और बैठक में 17,00 पौधे लगे हुए हैं। निर्मल एक एनजीओ एक्नोरा इंटरनेशनल के प्रेसिडेंट हैं, वो कहते हैं, “कोयम्बेडू बस स्टैंड के पास चेन्नई का ये हिस्सा सबसे प्रदूषित है। पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड मेरे अपार्टमेंट में प्रदूषण का स्तर मापने आया था। उन्हें प्रदूषण बिल्कुल नहीं मिला, ये पौधों के कारण था.” लेकिन रेन वॉटर हार्वेस्टिंग और सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट में कितना खर्च आता है? इंद्र कुमार कहते हैं, “ये खर्च की बात नहीं है। ये भविष्य का निवेश है। उसी तरह जैसे आप अपने पेंशन फ़ंड, जीवन बीमा आदि में निवेश करते हैं।
(साभार – बीबीसी हिन्दी)
नुसरत जहाँ ने दिया फतवे का जवाब, शेयर की बिंदी और कलीरे वाली तस्वीरें
कोलकाता : तृणमूल सांसद नुसरत बीते दिनों शादी के बाद संसद में शपथ लेने पहुँची थी। इस दौरान वो भारतीय अवतार में दिखीं। सिंदूर, मेंहदी, मंगलसूत्र और हाथों में चूड़ा पहनकर जब खूबसूरत नुसरत संसद पहुँचीं तो लोग उन्हें बस देखते ही रह गए। उनकी तस्वीरें खूब वायरल हुई थीं। वहीं कुछ ही दिन बाद नुसरत जहां के पहनावे और ऐसे अवतार को लेकर उनके खिलाफ फतवा जारी कर दिया गया। नुसरत ने इस फतवे पर अपना बयान देते हुए कहा था कि मैं मुस्लिम ही रहूँगी और मुझे क्या पहनना है मैं उस पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहूँगी। विश्वास कपड़ों से कहीं बढ़कर है।
वहीं अब नुसरत ने कुछ अलग तरह से ही इस विवाद पर जवाब दिया है। उन्होंने इंस्टाग्राम एकाउंट पर अपनी शादी की कुछ बेहद खूबसूरत तस्वीरें शेयर की हैं। इन तस्वीरों में नुसरत न सिर्फ दुल्हन के जोड़े में सजी-धजी दिख रही हैं बल्कि वो कलीरा खनकाती हुई भी नजर आ रही हैं। उन्होंने इन तस्वीरों के कैप्शन में लिखा हर लड़की का सपना होता है कि वह अपने खास दिन पर लाल रंग की के परिधान पहने। मैं अपने परिवार और दोस्तों को शुक्रिया कहना चाहती हूँ जो मेरे साथ हर पल रहे।
नुसरत इन तस्वीरों में बेहद खूबसूरत नजर आ रही हैं। वहीं उनकी ये अनदेखी वेडिंग फोटोज सोशल मीडिया पर खूब वायरल भी हो रही हैं। इन तस्वीरों पर कई लोग उन्हें सपोर्ट कर रहे हैं वहीं कुछ लोगों ने उनके खिलाफ निगेटिव कमेंट्स भी किए हैं।
इससे पहले नुसरत ने ट्वीट कर कहा था कि मैं सम्मिलित भारत का प्रतिनिधित्व करती हूँ जो कि जाति और धर्म के सारे बन्धनों से कहीं आगे है। जितना हो सकता है मैं सभी धर्मों का सम्मान करती हूँ। मैं मुस्लिम ही रहूँगी और मुझे क्या पहनना है मैं उस पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहूँगी। विश्वास कपड़ों से कहीं बढ़कर है। हर धर्म की अमूल्य शिक्षाओं को मानने में कोई हर्ज़ नहीं है। नुसरत
इस ट्वीट के साथ नुसरत ने लिखा- किसी भी धर्म के कट्टर लोगों द्वारा की गई टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया देना केवल घृणा और हिंसा को जन्म देता है, और इतिहास इस बात की गवाही देता है। नुसरत के इस ट्वीट को सांसद और उनकी दोस्त मिमी चक्रवर्ती ने रीट्वीट करके लिखा है कि हम भारतीय हैं और सिर्फ यही हमारी पहचान है। भारतीय होने पर गर्व है और रहेगा।
बता दें, नुसरत ने निखिल के साथ 19 जून को शादी की थी। नुसरत और निखिल ने हिंदू रीति के साथ-साथ क्रिश्चियन वेडिंग भी की।
समाज में इंटीरियर डिजाइनरों के प्रति जागरुकता नहीं है
कौशल दुग्गड़ पेशे से इंटीरियर डिजाइनर हैं जो कि हमेशा से उनका जुनून रहा। आरम्भ से ही घर सजाने और शानदार लुक देने में उनकी दिलचस्पी रही। द कन्क्रीट अफेयर्स के नाम से उनकी कम्पनी है और वे बीएनआई के सदस्य भी हैं। इसके साथ ही इनको फोटोग्राफी भी अच्छी लगती है। इंटीरियर डिजाइनर कौशल दुग्गड़ से अपराजिता की बातचीत के प्रमुख अंश मुलाकात में –
बचपन से ही इंटीरियर डिजाइनर बनना चाहता था
बचपन से ही मैं इंटीरियर डिजाइनर बनना चाहता था मगर यह मैं बहुत बाद में समझा जब मैं श्रमिकों और कॉन्टैक्टरों को सुबह से शाम तक काम करते देखा करता था। तब लगा कि मुझे यही क्षेत्र चुनना है।
परिवार का साथ मिला
मेरे परिवार का साथ मुझे मिला। शायद यही वजह है कि मैंने यह क्षेत्र चुना। मैं इस पृष्ठभूमि से नहीं था मगर उनको मेरे चयन और पेशे में पूरा विश्वास था।
जीवनशैली के अनुसार डिजाइन देता हूँ
इस शहर में कई इंटीरियर डिजाइनर हैं। परिवार और दोस्तों के बीच, मेरा सपना है कि ऐसी भव्य डिजाइन दूँ जो उनकी जीवनशैली से मेल खाए। ऐसी डिजाइन जो उनके जीवन स्तर को परिभाषित करे।
संवाद की कमी बड़ी समस्या है
क्लाइंट और डिजाइनरों के बीच कई बार पेशेवर अन्दाज की कमी होती है। ऐसी ही दिक्कत डिजाइनरों और वेंडर्स, श्रमिक के बीच भी आती है। क्लाइंट की अभिरुचि, पारदर्शिता का अभाव और कई बार डिजाइनरों का शोषण भी बड़ी समस्या है।
समाज में इंटीरियर डिजाइनरों के प्रति जागरुकता नहीं है
मुझे लगता है कि समाज में इंटीरियर डिजाइनरों के प्रति जागरुकता का अभाव है। मेरा दृढ़ विश्वास है कि हर व्यक्ति के पास अपने सपनों का घर होना चाहिए जो इस तरीके से डिजाइन किया गया हो कि वह उनकी अभिरुचि को पूरा करे न कि डिजाइनरों और श्रमिकों की। ऐसे कई प्रोफेशनल हैं जो क्लाइंट से उनको मिली आजादी का दुरुपयोग करते हैं। उम्मीद है कि इस पेशे को भी वही सम्मान मिले जिसका वह अधिकारी है। किसी भी इंटीरियर डिजाइनिंग परियोजना के लिए पर्याप्त नियम होने चाहिए।
समाज को बाँटने वाली हर चाल का मुकाबला हम और आप ही करेंगे
अभिनेत्री जायरा वसीम ने फिल्म उद्योग को अलविदा कह दिया है। अभिनय छोड़ना कोई बड़ी बात नहीं है मगर जो कारण उन्होंने बताए हैं, वे काफी परेशान करने वाले हैं। सीक्रेट सुपरस्टार जैसी फिल्म से अपना लोहा मनवाने वाली जायरा की उम्र अधिक नहीं है मगर उनमें सम्भावनाएँ बहुत हैं। एकमात्र धर्म क्या उस उर्जा का क्षरण कर सकता है? ऐसा माना जा रहा है कि उन पर कट्टरपंथियों का दबाव रहा और बहुत ज्यादा रहा। इस वजह से ही उन्होंने यह फैसला लिया। यह एक खतरनाक संकेत इसलिए है क्योंकि जायरा के इस फैसले को ढाल बनाकर अब दूसरी लड़कियों पर प्रहार किये जा सकते हैं।
दरअसल, धर्म और परिवार का काम है कि वह बच्चों को खड़ा करे। किसी भी व्यक्ति को मजबूती दे मगर कोई अपने जीवन को किस तरह से जीना चाहता है, वह आगे क्या करना चाहता है, इसका फैसला धर्म के नाम पर न तो हो सकता है और न होने देना चाहिए। ये बहुत हैरत की बात है कि जिन बन्धनों को बड़ी मुश्किल से तोड़ा गया था, उनको लड़कियाँ खुद पर लाद रही हैं। उड़ते खुले काले बाल बुरके या घूँघट के नीचे जा रहे हैं, उनकी आजाद सोच कैद हो रही है, यह परेशान करने वाला है। हम कह सकते हैं कि यह उनका निजी फैसला है मगर उनके फैसले के साथ खड़े होने वाले लोग रहें मगर लड़कियों के साथ अक्सर ऐसा नहीं हो पाता। उनके साथ कई बार वह ही नहीं खड़े होते जिन पर उनको सबसे ज्यादा भरोसा होता है। मुमकिन है कि ऐसा ही कुछ जायरा के साथ भी हुआ हो या फिर उन्होंने खुद को ही बाँधना शुरू कर दिया है।
जायरा ने अपनी पोस्ट में बताया कि 5 साल पहले उनके बॉलीवुड में कदम रखने के फैसले ने किस तरह उनकी जिन्दगी को बदल दिया लेकिन जायरा को लगता है कि अभिनेत्री बनने की वजह से वो अपने धर्म इस्लाम से दूर होती जा रही हैं। जायरा के पोस्ट में उनका दर्द साफ झलक रहा है। उन्होंने अपने पोस्ट के जरिए बताया कि पाँच सालों से वो किस तरह अपनी आत्मा से लड़ रही हैं। एक कामयाब पहचान मिलने के बाद वो खुश हैं. लेकिन ये वो पहचान नहीं है जो वो अपनी जिंदगी से चाहती हैं और इस बात का उन्हें एहसास हो गया है। जायरा ने अपनी पोस्ट में साफ-साफ शब्दों में बताया कि लम्बे वक्त से उन्हें ऐसा लग रहा है कि वो कुछ और ही बनने की जद्दोजहद कर रही हैं. लेकिन उन्हें एहसास हो गया है कि उनकी नयी जीवनशैली, प्रसिद्धि और संस्कृति में वो खुद को फिट तो कर सकती हैं, लेकिन वो इस प्लेटफॉर्म के लिए नहीं बनी हैं। जायरा को लगता है कि फिल्म इंड्स्ट्री से जुड़ने पर वो अपने धर्म इस्लाम से दूर होती जा रही हैं लेकिन वो बीते कुछ समय से खुद को समझाने की कोशिश कर रही थीं कि वो जो कर रही हैं वो सब सही है. लेकिन उन्हें आखिरकार समझ आ गया है कि इस्लाम की बताई राह पर चलने में वो एक बार नहीं बल्कि 100 बार असफल रहीं हैं। जायरा ने यह भी बताया कि वो अपनी छोटी सी जिंदगी में इतनी लंबी लड़ाई नहीं लड़ पा रही हैं और वो बहुत सोच समझकर बॉलीवुड को अलविदा कहने का फैसला ले रही हैं. जायरा के इस फैसले से बॉलीवुड हस्तियों समेत उनके फैंन्स को बड़ा झटका लगा है। जाहिर है कि उनके इस फैसले से बॉलीवुड को गहरा झटका लगा है।
आज धर्म हर चीज को परिचालित कर रहा है। ऐसा नहीं होने देना चाहिए। धर्म के नाम पर हम किसी की जान लेने की इजाजत नहीं दे सकते और न ही उसे इजाजत दे सकते हैं कि उसके आधार पर हमारी जिन्दगी के फैसले हों। कहीं न कहीं आपको फैसला लेना पड़ता है। दूसरी तरफ इस सर्कींण मानसिकता के खिलाफ खड़ी नुसरत जहाँ हैं जो अपने खिलाफ जारी फतवों का न सिर्फ जवाब दे रही हैं बल्कि एक नयी मिसाल खड़ी कर रही हैं। नुसरत के खिलाफ भी फतवे जारी किये गये क्योंकि उन्होंने एक हिन्दू से विवाह किया और बाकायदा साड़ी, बिन्दी व सिन्दूर तक लगाया…मगर इसके खिलाफ नुसरत जिस तरह खड़ी हुईं और जिस तरह आलोचकों को जवाब दिया..भारतीयता को सामने रखा..उनकी यह स्वतन्त्र सोच एक उम्मीद तो जगाती है। अगर हम किसी नारेबाजी से खुद को उद्वेलित होने देते हैं या धर्म को खुद पर हावी होने देते हैं या किसी धर्म विशेष के चश्मे में खुद को बाँधना शुरू करते हैं तो दरअसल, वह हमारी हार ही होती है। जय श्री राम के नारे से किसी को उकसाना और यह सुनकर अपना आपा खो बैठना, दोनों ही आपके मानसिक दिवालियेपन का प्रतीक हैं। तुष्टीकरण की नीति भी कुछ ऐसी ही समाज में दरार डालने वाली है मगर उनसे जनता के रूप में खुद को कैसे बचाना है, यह नेता नहीं देखेंगे बल्कि हमें ही देखना होगा। एक समाज की रक्षा का भार कोई सरकार या राजनीतिक पार्टी नहीं उठाने जा रही, इसके लिए आम जनता को ही खड़ा होना होगा। समाज को बाँटने वाली हर चाल का मुकाबला हम और आप ही करेंगे।




