Wednesday, April 22, 2026
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युवराज ने अन्तरराष्ट्रीय क्रिकेट को कहा अलविदा, कहा अब आगे बढ़ने का समय

मुम्बई : कैंसर पर विजय हासिल करने के आठ साल बाद भावुक युवराज सिंह ने सोमवार को उतार चढ़ाव से भरे अपने करियर को अलविदा कहने की घोषणा की जिसमें उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि भारत की 2011 की विश्व कप जीत में अहम योगदान रहा। प्रतिभा के धनी इस करिश्माई खिलाड़ी को सीमित ओवरों की क्रिकेट का दिग्गज माना जाता रहा है लेकिन उन्होंने इस टीस के साथ संन्यास लिया कि वह टेस्ट मैचों में अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पाये।
बायें हाथ के इस बल्लेबाज ने हालांकि संन्यास लेने से पहले कई बार परिस्थितियों को अपने पक्ष में मोड़ने के प्रयास किये। इस 37 वर्षीय क्रिकेटर ने यहां संवाददाता सम्मेलन में कहा, ‘‘मैंने 25 साल 22 गज की पिच के आसपास बिताने और लगभग 17 साल अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेलने के बाद आगे बढ़ने का फैसला किया है। क्रिकेट ने मुझे सब कुछ दिया और यही वजह है कि मैं आज यहां पर हूं।’’ उन्होंने कहा, ‘‘मैं बहुत भाग्यशाली रहा कि मैंने भारत की तरफ से 400 मैच खेले। जब मैंने खेलना शुरू किया था तब मैं इस बारे में सोच भी नहीं सकता था। ’’
इस आक्रामक बल्लेबाज ने कहा कि वह अब ‘जीवन का लुत्फ’ उठाना चाहता है और बीसीसीआई से स्वीकृति मिलने पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न टी20 लीग में फ्रीलांस खिलाड़ी के रूप में खेलना चाहता है। लेकिन अब वह इंडियन प्रीमियर लीग में नहीं खेलेंगे। युवराज ने भारत की तरफ से 40 टेस्ट, 304 वनडे और 58 टी20 अंतरराष्ट्रीय मैच खेले। उन्होंने टेस्ट मैचों में 1900 और वनडे में 8701 रन बनाये। उन्हें वनडे में सबसे अधिक सफलता मिली। टी20 अंतरराष्ट्रीय में उनके नाम पर 1177 रन दर्ज हैं। उन्होंने कहा, ‘‘यह इस खेल के साथ एक तरह से प्रेम और नफरत जैसा रिश्ता रहा। मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकता कि वास्तव में यह मेरे लिये कितना मायने रखता है। इस खेल ने मुझे लड़ना सिखाया। मैंने जितनी सफलताएं अर्जित की उससे अधिक बार मुझे नाकामी मिली पर मैंने कभी हार नहीं मानी।’’ बायें हाथ के इस बल्लेबाज ने अपने करियर के तीन महत्वपूर्ण क्षणों में विश्व कप 2011 की जीत और मैन आफ द सीरीज बनना, टी20 विश्व कप 2007 में इंग्लैंड के खिलाफ एक ओवर में छह छक्के जड़ना और पाकिस्तान के खिलाफ लाहौर में 2004 में पहले टेस्ट शतक को शामिल किया।
विश्व कप 2011 के बाद कैंसर से जूझना उनके लिये सबसे बड़ी लड़ाई थी। उन्होंने कहा, ‘‘मैं इस बीमारी से हार मानने वाला नहीं था। ’इसके बाद हालांकि उनकी फार्म अच्छी नहीं रही। उन्होंने भारत की तरफ से आखिरी मैच जून 2017 में वेस्टइंडीज के खिलाफ वनडे के रूप में खेला था। उन्होंने अपना अंतिम टेस्ट मैच 2012 में खेला था।
इस साल आईपीएल में वह मुंबई इंडियन्स की तरफ से खेले लेकिन उन्हें अधिक मौके नहीं मिले। दक्षिण अफ्रीका में 2007 में खेले गये विश्व कप में उनकी उपलब्धि का कोई सानी नहीं है। उन्होंने किंग्समीड में स्टुअर्ट ब्राड के एक ओवर में छह छक्के लगाये थे जिसे क्रिकेट प्रेमी कभी भूल नहीं पाएंगे। इंग्लैंड के खिलाफ इस प्रदर्शन के दौरान उन्होंने केवल 12 गेंदों पर अर्धशतक पूरा किया जो कि एक रिकार्ड है।
युवराज वनडे में मध्यक्रम के मुख्य बल्लेबाज बन गये थे और इस बीच उन्होंने अपनी गेंदबाजी से भी प्रभावित किया। उन्होंने विश्व कप 2011 में अपनी आलराउंड क्षमता का शानदार नमूना पेश किया तथा 300 से अधिक रन बनाने के अलावा 15 विकेट भी लिये। इस दौरान उन्हें चार मैचों में मैन आफ द मैच और बाद में मैन आफ द टूर्नामेंट चुना गया। युवराज ने कहा, ‘‘विश्व कप 2011 को जीतना, मैन आफ द सीरीज बनना, चार मैन आफ द मैच हासिल करना सब सपने जैसा था जिसके बाद कैंसर से पीड़ित होने के कारण मुझे कड़वी वास्तविकता से रू ब रू होना पड़ा। ’’ उन्होंने कहा, ‘‘यह सब तेजी से घटित हुआ और तब हुआ जब मैं अपने करियर के चरम पर था। मैं अपने परिवार और दोस्तों से मिले सहयोग को शब्दों में बयां नहीं कर सकता जो मेरे लिये उस समय मजबूत स्तंभ की तरह थे। बीसीसीआई और बीसीसीआई के तत्कालीन अध्यक्ष एन श्रीनिवासन ने भी मेरे उपचार के दौरान सहयोग किया। ’ युवराज ने सौरव गांगुली और महेंद्र सिंह धोनी को अपना पसंदीदा कप्तान बताया तथा अपने करियर में जिन गेंदबाजों को खेलने में उन्हें मुश्किल हुई उनमें श्रीलंका के मुथैया मुरलीधरन और आस्ट्रेलिया के ग्लेन मैकग्रा का नाम गिनाया।

प्रख्यात नाटककार-अभिनेता गिरीश कर्नाड का निधन

बेंगलुरु :  प्रख्यात नाटककार, अभिनेता, निर्देशक एवं ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित गिरीश कर्नाड का लंबी बीमारी के बाद सोमवार को उनके आवास पर निधन हो गया। साहित्य, रंगमंच एवं सिनेमा जगत पर अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले कर्नाड 81 वर्ष के थे।
अपने विचारों को खुल कर प्रकट करने को लेकर निशाने पर रहे बहुआयामी व्यक्तित्व और बहुमुखी प्रतिभा के धनी कर्नाड के परिवार में पत्नी सरस्वती, बेटे रघु कर्नाड (पत्रकार एवं लेखक) और बेटी राधा हैं। रघु ने बताया कि उनके पिता फेफड़ों से संबंधित बीमारी से पीड़ित थे। रघु ने यहां संवाददाताओं को बताया, ‘‘उनका निधन आज सुबह किसी वक्त हुआ और हमें इसकी जानकारी सुबह करीब साढ़े आठ बजे हुई। जैसा कि आप सब को पता है कि वह कुछ समय से बीमार चल रहे थे। उन्हें फेफड़े संबंधी बीमारी थी-जिससे अंतत: उनकी मौत हुई।’’
उन्होंने कहा, “मैं उनके सभी प्रशंसकों का शुक्रगुजार हूं और हमें उम्मीद है कि उनकी याद कर्नाटक के हर व्यक्ति के जहन में लंबे वक्त तक रहेगी। पद्मश्री एवं पद्म भूषण से सम्मानित कर्नाड मौजूदा युग के सबसे महत्त्वपूर्ण साहित्यकारों में से एक थे जिन्होंने अपनी मातृभाषा कन्नड़ में अपनी मौलिक कृतियों से भारतीय साहित्य को समृद्ध किया था। उन्होंने कई नाटक एवं फिल्में लिखीं, उनमें अभिनय किया और निर्देशन किया जिन्हें आलोचकों की खूब वाहवाही मिली। उनके नाटक ‘‘नागमंडल’’, ‘‘ययाति’’ और ‘‘तुगलक’’ ने उन्हें काफी ख्याति दिलाई जिनका कन्नड़ से अंग्रेजी एवं अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद किया गया।
कर्नाड हिंदी एवं कन्नड़ सिनेमा में एक प्रसिद्ध चेहरा थे। उन्होंने ‘‘संस्कार”, “निशांत”, “मंथन” जैसी समानांतर फिल्मों से लेकर “टाइगर जिंदा है” और “शिवाय” जैसी व्यावसायिक फिल्मों में अपने अभिनय का जादू बिखेरा। कर्नाड का अंतिम संस्कार शहर के ‘कलपली विद्युत शवदाहगृह’ में दोपहर में किया गया। कर्नाड की इच्छाओं का ध्यान रखते हुए उनके परिवार ने अंतिम संस्कार के दौरान किसी भी धार्मिक परंपरा का पालन नहीं करने या राजकीय सम्मान स्वीकार नहीं करने का निर्णय किया।

कर्नाटक के मंत्रियों – डी के शिवकुमार, आर वी देशपांडे और बी जयश्री एवं सुरेश हेबलिकर समेत फिल्म एवं रंगमंच की कई हस्तियों ने श्रद्धांजलि दी। परिवार ने उन्हें श्रद्धांजलि देने की चाह रखने वाले उनके प्रशंसकों एवं पदाधिकारियों से सीधे श्मशान घाट आने को कहा था क्योंकि वह अंतिम संस्कार को निजी रखना चाहते थे।
मुख्यमंत्री कार्यालय ने कर्नाड के सम्मान में सोमवार को छुट्टी घोषित करते हुए एक बयान में तीन दिवसीय राजकीय शोक की भी घोषणा की। सीएमओ ने घोषणा की कि कर्नाड को राजकीय सम्मान दिया जाएगा जो पूर्व में ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त करने वालों को दिया जाता रहा है। हालांकि, कर्नाड एवं उनके परिवार की इच्छाओं का सम्मान करते हुए राजकीय सम्मान नहीं दिया गया।
राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद एवं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कर्नाड के निधन पर शोक प्रकट किया और कहा कि उन्हें उनके काम के लिए उन्हें आने वाले कई वर्षों तक याद किया जाएगा। कोविंद ने कहा कि कर्नाड के निधन से भारत की सांस्कृतिक दुनिया गरीब हो गई।
मोदी ने कहा कि कर्नाड को सभी माध्यमों के जरिए अपना बहुमुखी अभिनय दिखाने के लिए याद किया जाएगा।
कर्नाड के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कर्नाटक के मुख्यमंत्री एच डी कुमारस्वामी ने कहा कि हमने एक सांस्कृतिक दूत खो दिया। कर्नाड का जन्म 1938 में महाराष्ट्र में डॉ रघुनाथ कर्नाड और कृष्णबाई के घर हुआ था। बाद में उनका परिवार कर्नाटक के सिरसी एवं धारवाड़ आकर बस गए थे जहां उनका आगे का जीवन बीता और परिवार के नाट्य कला के प्रति झुकाव ने साहित्यिक जगत में उनके भविष्य की नींव रखी। महाराष्ट्र में नेताओं ने पार्टी विचारधारा से ऊपर उठते हुए कर्नाड को श्रद्धांजलि दी। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने ट्वीट किया, “प्रख्यात अभिनेता, लेखक एवं ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित गिरीश कर्नाड के निधन के साथ ही हमने भारतीय सिनेमा खासकर रंगमंच की एक महान हस्ती को खो दिया। वह मराठी रंगमंच से भी जुड़े हुए थे। मेरी विनम्र श्रद्धांजलि..उनके परिवार, दोस्तों एवं प्रशंसकों के प्रति गहरी संवेदनाएं।”
राकांपा अध्यक्ष शरद पवार ने कहा कि कर्नाड के निधन की खबर दुखी करने वाली है। कांग्रेस की महाराष्ट्र इकाई के प्रमुख अशोक चव्हाण ने कहा कि कर्नाड एक संवेदनशील कलाकार थे जो सामाजिक मुद्दों के प्रति जागरुक थे। शिवसेना ने भी उन्हें श्रद्घांजलि दी। पार्टी के प्रवक्ता मनीषा कायंदे ने साहित्य के क्षेत्र में एक अलग पहचान स्थापित करने के लिए कर्नाड की प्रशंसा की। वह ‘नव्या’ साहित्य अभियान का हिस्सा भी रहे। उनके नाटक ‘‘नागमंडल’’, ‘‘ययाति’’ और ‘‘तुगलक’’ ने उन्हें काफी ख्याति दिलाई। फिल्मों की बात करें तो ‘संस्कार’ एवं ‘वामशा वृक्ष’ काफी लोकप्रिय रहीं।
कर्नाड सलमान खान की ‘‘टाइगर जिंदा है’’ और अजय देवगन अभिनीत ‘‘शिवाय’’ जैसी व्यावसायिक फिल्मों में भी दिखाई दिए। उन्होंने मालगुडी डेज में स्वामी के पिता और इंद्रधनुष में अप्पू के पिता का किरदार निभाया था। उन्होंने दूरदर्शन के प्रसिद्ध विज्ञान कार्यक्रम “टर्निंग प्वाइंट” को भी प्रस्तुत किया था। राजनीतिक कथनों में निर्भीकता दर्शाने वाले और अपने विचारों से समझौता न करने वाले कर्नाड रंगमंच की उन 600 हस्तियों में शुमार थे जिन्होंने लोकसभा चुनाव से पहले ‘‘भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टियों को सत्ता से बाहर करने की लोगों से की गई अपील वाले पत्र पर हस्ताक्षर किए थे।’उन्होंने नोबेल पुरस्कार विजेता वी एस नायपॉल के भारत के मुस्लिमों पर विवादित विचारों की आलोचना की थी। कर्नाटक सरकार के टीपू जयंती मनाने के निर्णय के बाद उत्पन्न विवाद पर कर्नाड ने कहा था कि 18वीं सदी के शासक अगर मुस्लिम की जगह हिंदू होते तो उन्हें भी छत्रपति शिवाजी की तरह सम्मान मिलता। कर्नाड की इस पर खासी आलोचना हुई थी। गौरी लंकेश हत्याकांड की जांच करने वाले विशेष जांच दल के अनुसार वह उस दक्षिणपंथी समूह के भी निशाने पर थे जिसने पत्रकार की कथित रूप से हत्या की थी।

तोक्यो ओलंपिक के बाद संन्यास लेना चाहती हैं मेरीकाम

नयी दिल्ली  : छह बार की विश्व चैम्पियन एमसी मेरीकाम ने गुरूवार को कहा कि उनकी योजना तोक्यो ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतने के बाद संन्यास लेने की है। भारतीय मुक्केबाजी में 18 साल के लंबे करियर के दौरान छत्तीस वर्षीय मेरीकाम ने छह विश्व चैम्पियनशिप जीती हैं और एक ओलंपिक कांस्य पदक हासिल किया है। इसके अलावा पांच एशियाई चैम्पियनशिप भी अपने नाम कर चुकी हैं। वह राज्य सभा सदस्य भी हैं। मेरीकाम ने कोलगेट द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम के मौके पर कहा, ‘‘2020 के बाद मैं संन्यास लेना चाहती हूं। इसलिये मेरा मुख्य लक्ष्य भारत के लिये स्वर्ण पदक जीतना है। मैं सचमुच स्वर्ण पदक जीतना चाहती हूँ। ’ उन्होंने कहा, ‘‘मैं हमेशा अपने देश को पदक दिलाने के लिये अपना सर्वश्रेष्ठ कोशिश करती  हूँ। मैं ओलंपिक क्वालीफायर और विश्व चैम्पियनशिप के लिये अपनी तैयारियां शुरू करूंगी। मैं इस बार स्वर्ण पदक जीतना चाहती हूँ। ’’
अगले साल होने वाले ओलंपिक से पहले मुक्केबाजी जगत को काफी परेशानियों से जूझना पड़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने अंतरराष्ट्रीय मुक्केबाजी संघ (एआईबीए) को तोक्यो ओलंपिक में स्पर्धओं की मेजबानी से रोक दिया है। आईओसी ने घोषणा की कि वह अगले साल जनवरी और मई के बीच में ओलंपिक क्वालीफायर के लिये नया कैलेंडर तैयार करेगा और यह शायद वजन वर्गों पर भी दोबारा विचार कर सकता है। भारतीय मुक्केबाज दुविधा में फंसे हैं लेकिन मेरीकाम को लगता है कि अगर क्वालीफायर अगले साल कराये जाते हैं तो यह उनके लिये फायदेमंद होगा।

स्वच्छ हवा चाहिए तो घर में लगाइए पौधे और रहिए स्वस्थ

भारत दुनिया के सबसे प्रदूषित देशों में से एक है। प्रदूषित हवा संबंधी बीमारियों की वजह से यहां एक साल में करीब 12 लाख लोग असमय मर जाते हैं। स्टेट ग्लोबल एयर 2019 की रिपोर्ट के मुताबिक प्रदूषित हवा की वजह से वैश्विक स्तर पर आयु औसतन 1 साल 8 महीने कम हो गई। हवा में प्रदूषण पार्टिकल्स की अधिकता है। ऐसे में फेफड़ों का कैंसर, शुगर, हार्ट अटैक व स्ट्रोक जैसी बीमारियां बढ़ती जा रही हैं। लोग इलेक्ट्रॉनिक एयर प्यूरिफायर इस्तेमाल कर शुद्ध हवा लेने की कोशिश करते हैं लेकिन जरूरत पेड़ों की है, जो अपने आप में नैचुरल प्यूरिफायर हैं। हमारे पर्यावरण में कुछ ऐसे इनडोर पौधे भी मौजूद हैं, जो किसी एयर प्यूरिफायर से कम नहीं, खुद नासा ने इस बात को माना है –
एरेका पाम: गर्मी-सर्दी हर मौसम बर्दाश्त कर लेता है। यह बहुत तेजी से बढ़ता है। इस वजह से आक्सीजन भी ज्यादा देता है और हवा भी ज्यादा फिल्टर करता है। यह कार्बन डाईऑक्साइड को ऑक्सीजन में बदलता है।
जैड-जैड प्लांटः मैदानी इलाकों के मौसम के लिए उपयुक्त पौधा है। इस पौधे की टहनी को किसी दूसरे गमले में लगा देने से उसमें पौधा तैयार हो जाता है। यह घर की हवा से टोल्यूनि व जाइलीन को खत्म करता है और आक्सीजन लेवल बढ़ता है। हवा से एयरबोर्न बैक्टीरिया भी खत्म करता है।
मनी प्लांटः यह मिट्टी और पानी दोनों जगह पैदा हो सकता है। इसकी खासियत यह है कि इसकी डंठल भी लगा दें तो यह जड़ पकड़ लेता है। यह हवा से फोर्मलडीहाइड को भी दूर करने में मदद करता है।
एग्लोनिमा प्लांटः यह कई रंग में आता है। आक्सीजन तो छोड़ता है। साथ साथ हवा से फॉर्मलडिहाइड, कॉर्बन मोनोअॉक्साइड और बेंजीन को अपने अंदर समाहित कर लेता है।
सिंगोनियम प्लांटः यह प्लांट सफेद पत्तों से लेकर लाल, पीला, ग्रीन आदि रंगों में आता है। यह डेकोरेशन के साथ-साथ एक एंटी पोल्यूटेंट का काम करता है। घर के अंदर की हवा से प्रदूषण कम करता है। यह पौधा हवा से बेंजीन, फॉर्मलडिहाइड को कम करता है। यह वायु जनित रोगाणुओं को घटा कर वातावरण में नमी बढ़ाता है।
सान्सेवीरिया प्लांटः यह पौधा हर वातावरण में रह सकता है। यह कॉर्बन मोनोऑक्साइड, बेंजीन, एक्सलीन, फॉर्मलडिहाइड, ट्राईक्लोरोइथीलीन को कम करता है।
नासा ने रिसर्च के बाद की पुष्टि
अमेरिका की नेशनल ऐरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (नासा) के शोधकर्ता बीसी वोलवर्टन ने इनडोर प्लांट पर 10 साल तक रिसर्च की। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि ये पौधे न केवल हवा की गुणवत्ता में सुधार करते हैं बल्कि जहरीले कणों को भी खत्म करते हैं। इसके अलावा हल्के स्तर के जहरीले कणों को खत्म कर हवा को साफ करते हैं।
मानसिक तनाव होता है कम: रिसर्च
2015 में कोरिया के शोधकर्ताओं द्वारा किया गया शोध बताता है कि इनडोर प्लांट मानसिक तनाव कम करता है। इसके साथ-साथ वर्क प्लेस पर होने वाले तनाव को भी कम करता है। आंखों को देखने में अच्छे लगते हैं और मस्तिष्क पर सकारात्मक प्रभाव डालते हैं।
स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर 2019 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में स्वास्थ्य संबंधी मौत का तीसरा सबसे बड़ा कारण वायु प्रदूषण है। 2017 में भारत में 12 लाख लोगों की असमय मौत वायु प्रदूषण की वजह से हुई। जबकि चीन में प्रदूषण से मरने वालों की संख्या 14 लाख था। प्रदूषण की वजह से एशिया में बच्चों की औसत उम्र 30 महीने कम हो गई है जबकि यह लेवल विश्व स्तर पर 20 महीने का है।

(साभार – दैनिक भास्कर)

माता-पिता को बच्चों की पढ़ाई के लिए निकालना चाहिए अधिक समय: सर्वेक्षण

नयी दिल्ली : नए शैक्षणिक सत्र के साथ पूरे भारत में छात्र-छात्राएं अपनी नई कक्षाओं और पाठ्यक्रम सामग्री पर चर्चा कर रहे हैं। एकेडेमिक्स के संबंध में माता-पिता के सपोर्ट का महत्व समझने के लिए दुनिया की सबसे बड़ी ऑनलाइन पीयर-टू-पीयर एकेडेमिक लर्निंग कम्युनिटी ब्रेनली ने हाल ही में अपने भारतीय यूजर्स के बीच एक सर्वेक्षण किया। इस सर्वेक्षण में टियर-2 और टियर-3 शहरों से 2,500 से अधिक छात्र-छात्राओं ने सक्रिय भागीदारी की। इससे इस विषय पर कुछ नई और महत्वपूर्ण बातें सामने आई हैं। सर्वेक्षण में पता चलता है कि माता-पिता अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए सक्रियता से अपना समय और प्रयास लगाते हैं लेकिन बच्चों ने महसूस किया कि उन्हें कंसेप्ट्स बेहतर ढंग से समझाए जाने की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए लगभग 50% माता-पिता अपने बच्चों के साथ हर दिन दो घंटे से अधिक समय बिताते हैं, ताकि उन्हें अध्ययन में मदद कर सके। यह महसूस किया गया कि उन्हें और अधिक समय देना चाहिए। इसके अलावा इन बच्चों में से 50% ने स्वीकार किया कि उनके माता-पिता को उनके विषयों और पाठ्यक्रमों के बारे में पर्याप्त ज्ञान व विशेषज्ञता है, लेकिन वे चाहेंगे कि उनके माता-पिता इन विषयों के बारे में और जानें ताकि वे उनकी बेहतर मदद कर सकें। सकारात्मक पहलू यह है कि आधे से अधिक बच्चों (55%) ने इस बात को लेकर अपने माता-पिता की तारीफ की कि वे उन्हें सवाल पूछने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। उन्हें कोई भी संदेह होने पर वे बेझिझक अपने माता-पिता से सवाल पूछ सकते हैं। इन विषयों में गणित सबसे ऊपर है। करीब 40% बच्चों ने अपने माता-पिता से गणित के प्रश्न हल करने में मदद मांगी। इसके बाद भाषा से जुड़े विषय 24% के साथ दूसरे स्थान पर, जबकि 19% के साथ विज्ञान तीसरा विषय रहा। बच्चों ने बताया कि उनकी मां उन्हें सबसे अधिक मदद करती हैं। यह भी देखा गया कि करीब 48% माता-पिता पाठ्यपुस्तकों और नोट्स पर भरोसा करते हैं, जबकि उनमें से लगभग 24% अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए ब्रेनली जैसी ऑनलाइन लर्निंग साइट्स से मदद लेते हैं।

90 साल की उम्र में जताई अपने पैसे कमाने की चाह, आज हाथों-हाथ बिकती है इनकी बर्फियां!

चंडीगढ़ :  93 साल की हरभजन कौर अपने हाथों से बनाई बेसन बर्फी जब चंडीगढ़ के साप्‍ताहिक ऑर्गेनिक मार्केट में भेजती हैं तो मिठास का वो ज़ायका हाथों-हाथ बिक जाता है। बमुश्किल तीन साल पहले उन्‍होंने बर्फी बेचकर अपनी जिंदगी की ‘पहली कमाई’ की थी और उससे हासिल खुशियों ने उन्‍हें रसोई के रास्‍ते सुख की एक अनदेखी, अनजानी डगर पर डाल दिया। हरभजन कौर अमृतसर के नज़दीक तरन-तारन में जन्‍मी थी। फिर शादी के बाद अमृतसर, लुधियाना रही और करीब दस साल पहले पति की मौत के बाद वे कुछ समय से अपनी बेटी के साथ चंडीगढ़ में रहने लगी। एक रोज़ बेटी ने यों ही उनके दिल की थाह लेनी चाही और पूछ लिया – ”कोई मलाल तो नहीं न है आपको, कोई चाहत तो बाकी नहीं, कहीं आने-जाने या कुछ करने-देखने की इच्‍छा बाकी हो तो बताओ। जैसे वे इस सवाल का इंतज़ार ही कर रही थी। ”बस, एक ही मलाल है … मैंने इतनी लंबी उम्र गुज़ार दी और एक पैसा भी नहीं कमाया। माँ का मन टटोलने के बाद इस बेटी ने अगला सवाल दागा – ”आप क्या कर सकती हो, कैसे कमाना चाहोगी वो पहला रुपय्या?”
इस सवाल का जवाब नब्‍बे बरस की मां ने जो दिया उसे दोहराते हुए बेटी का गला आज भी भर आता है। आंखों में उतर आए सैलाब को किसी तरह संभालते हुए वह बताती हैं कि माँ ने उस रोज़ अपना ‘बिज़नेस प्‍लान’ बताया – ”मैं बेसन की बर्फी बना सकती हूँ। घर में धीमी आंच पर भुने बेसन की मेरे हाथ की बर्फी को कोई तो ख़रीददार मिल ही जाएगा …. ”
नज़दीकी सैक्‍टर 18 के ऑर्गेनिक बाज़ार से परिवार वालों ने संपर्क साधा और वहां से मिला 5 किलो बेसन बर्फी का पहला ऑर्डर। बर्फी तो हाथों-हाथ बिक गई और हरभजन ने अपनी उस बेशकीमती पहली कमाई को मुट्ठी में महसूस करते हुए बस इतना ही कहा था – ”अपने कमाए पैसे की बात ही कुछ और होती है।” फिर उस कमाई को उन्‍होंने अपनी तीनों बेटियों में बराबर बांट दिया।
घरवालों ने सोचा माँ को तसल्ली हो गई होगी। लेकिन वो तो अब अपने इस ‘हुनर‘ को आगे बढ़ाने की इच्छा पाल बैठी थी। देखते-देखते मुहल्ले-पड़ोस, परिचितों तक बर्फी की शोहरत पहुंचने लगी और हरभजन कौर ‘ऑर्डर’ पर अपने घर की रसोई में और कई चीज़ें भी बनाने लगी। बादाम का शरबत, लौकी की आइसक्रीम, टमाटर चटनी, दाल का हलवा, अचार वगैरह भी अब इस जुनूनी माँ की ऑर्डर लिस्‍ट के रास्‍ते सप्‍लाई होने लगे। हालांकि ऑर्डर पूरा करने की रफ्तार धीमी होती है, मगर जब ज़ायके में भरा हो अद्भुत स्‍वाद तो हर कोई इंतज़ार की लाइन में लगने को तैयार हो जाता है। वे खुद जुटती हैं अपने ऑर्डर निभाने। घर में काम के लिए आने वाली सहायिका या बेटियों-नातिन को कुछ भी छूने या हाथ बंटाने की भी छूट नहीं होती। मेवे-मगज बीनने, छांटने, धोने-सुखाने से लेकर खर्रामा-खर्रामा आंच पर स्‍वाद और सुगंध की कीमियागिरी चलती रहती है। जिस बेसन बर्फी के दम पर हरभजन ने इस पकी उम्र में यह निराला सफर शुरू किया है उसे बनाना उन्‍होंने अपने पिता से सीखा था, यानी करीब सौ साल पुरानी रेसिपी का स्‍वाद आज भी जिंदा है। अपनी कुछ रेसिपी वे अपने शैफ नाती को सौंप चुकी है, जो अपने रेस्‍टॉरेंट में पंजाब की इस खान-पीन विरासत को हमेशा के लिए सुरक्षित कर चुका है।
इस बीच, चंडीगढ़ की बेसन बर्फी वाली हरभरजन कौर के कद्रदान शहर में बढ़ने लगे हैं। शहर में रहने वाली एक आरजे खुश्‍बू, जो हर हफ्ते ऑर्गेनिक बाज़ार से अपनी किचन के लिए ख़रीददारी करती हैं, पिछली दफा बर्फी खरीदने के बाद बोली ”सब्जियों, फलों, दालों, शहद और तेल के साथ-साथ इस बार बर्फी लेकर जाते हुए मुझे अहसास हुआ है उस जज्‍़बे, जुनून, उस दीवानगी और गरमाइश का, जो इन तमाम उत्‍पादों में समायी होती है। और बर्फी का तो क्‍या कहना, सीधे दादी-माँ का खज़ाना है।”हरभजन कौर की नातिन को नानी के जुनून पर इतना फख्र है कि उसने बाकायदा ‘हरभजन’ ब्रांड नाम उनके व्‍यंजनों को सुझाया है और एक खूबसूरत-सी टैगलाइन भी सोच ली है – ”बचपन की याद आ जाए।”
अब जब नानी बढ़ चली हों ‘ऑन्‍ट्रप्रेन्‍योरशिप’ की राह पर, तो नातिन भी कहां पीछे रहने वाली है। जल्‍द उसकी शादी है और वो खास मेहमानों को हलवाई की मिठाई नहीं बल्कि नानी के हाथ की बर्फी देने की ठान चुकी है। और उनकी रसोई से उठती महक बता रही है कि नानी अपनी लाडली की इस फरमाइश को पूरा करने में जुट चुकी हैं। उन्हें कुछ साबित भी नहीं करना। वे तो उन छोटी-छोटी इच्छाओं को पूरा करने की दास्तान हैं जो अक्सर हमारे सीनों में कहीं अटकी रह जाती हैं।
उनकी कहानी पकी उम्र में स्वाभिमान, आत्मसम्मान और अनंत ख़ुशियों को हासिल करने की तरकीब सिखाती है। हरभजन कौर की इस कहानी को जानने-सुनने के बाद कुछ लोगों ने ऐसा ही कुछ अपने पेरेंट्स के लिए भी करने की इच्‍छा जतायी है। उन्‍हें लगता है यह उस उम्र में बुजुर्गों को सशक्‍त और समर्थ बनाने का एक तरीका हो सकता है जब वे खाली रहते-रहते कभी खुद से ही नाराज़ हो जाते हैं तो कभी चिड़चिड़े बन जाते हैं, या और कुछ नहीं तो अपनी बीमारियों को ही जीने लगते हैं। लेकिन इस तरह उन्‍हें ‘एम्‍पावर्ड’ बनाकर समाज के लिए उपयोगी बने रहने की भावना से भरा जा सकता है।

(साभार – द बेटर इंडिया)

सरलीकृत शिक्षा ने किया बेड़ा गर्क, फारसी पढ़कर तेल बेचना गलत नहीं

अपराजिता फीचर डेस्क
इन दिनों बेरोजगारी की खूब चर्चा है जो आँकड़ों के मुताबिक सबसे ऊँचे स्तर पर जा पहुँची है मगर सच तो यह है कि बेरोजगारी का मामला शिक्षा और हमारी सोच को बदले बगैर सुलझने वाला नहीं है। हमने शिक्षा को सरल बनाने के नाम पर न सिर्फ शिक्षा का बेड़ा गर्क किया है बल्कि बच्चों को ही ऐसा पंगु बना दिया है कि वे जब युवा बनते हैं तो जीवन की चुनौतियों का सामना कर ही नहीं पाते हैं।
हम हर बार यहकहा जाता है कि शिक्षा का आधार योग्यता, जानकारी और मेधा होती है मगर इन दिनों हर चीज का आधार अंक हैं। इसी आधार पर दाखिला होता है और इसी आधार पर मिलती है नौकरी। नतीजा यह है आज शिक्षा का आधार ज्ञान या जानकारी प्राप्त करना नहीं बल्कि येन – केन प्रकारेण नौकरी के लिए अंकों का जुगाड़ करना है। अंकों को लेकर प्रतिस्पर्द्धा का आलम यह है कि अपने बोर्ड की सफलता का प्रतिशत अधिक से अधिक दिखाने के लिए बोर्ड सबसे अधिक जोर किसी तरह पास प्रतिशत बढ़ाने में लगाते हैं। नतीजा यह है कि 90 या 97 प्रतिशत परिणाम होता तो है मगर जब बात योग्यता की होती है तो सारे सितारे खो जाते हैं। हर साल मेधातालिका में टॉपर्स के नम्बर बढ़ते हैं मगर वे कितने कुशल हैं, जीवन की आने वाली चुनौतियों का सामना करने में कितने सक्षम हैं, व्यावहारिक तौर पर अपनी सूचना और जानकारी को जीवन में किस कदर उतार पाते हैं, ये ऐसे यक्ष प्रश्न हैं जिनसे भागने की कोशिश ही करते हुए तमाम बड़े दिग्गजों को देखा गया है। स्थिति यह है कि साहित्य जैसे विषय में शत – प्रतिशत अंक आ रहे हैं मगर यह कितना समीचीन है, यह सोचने की जरूरत है। नेशनल स्टेटिस्टिक्स ऑफिस (एनएसओ) की ओर से हाल ही में जारी आंकड़ें बताते हैं कि साल 2017-18 में शिक्षित पुरूषों में बेरोजगारी निरक्षर पुरूषों की तुलना में कई गुना ज्यादा थी. साल 2017-18 में जहां 2.1 फीसदी निरक्षर पुरूष बेरोजगार थे, वहीं माध्यमिक स्कूल पास पुरूष में ये दर 9.1 फीसदी रही। ट्यूशन पर निर्भरता चिन्ता का एक बड़ा कारण है। आप किसी भी बोर्ड के अव्वल विद्यार्थी से पूछ लीजिए, वह अपनी सफलता का श्रेय अपने ट्यूशन या कोचिंग शिक्षक को देना नहीं भूलता। यह जमीनी धरातल पर हमारी स्कूली शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है। हाल ही में किये गये शिक्षा सम्बन्धी एक वैश्विक सर्वे में भारत के बच्‍चों को लेकर एक चौंकाने वाली जानकारी सामने आयी है। इसमें बताया गया है कि दुनिया में सबसे ज्यादा ट्यूशन भारत के बच्चे पढ़ते हैं. भारत में 74 फीसदी बच्चे ट्यूशन पढ़ते हैं। इनमें अधिकांश गणित विषय में सहायता लेते हैं। इतनी बड़ी संख्या में बच्चों का ट्यूशन पढ़ना चिंताजनक है मगर आज दिक्कत यह है कि बच्चों के लिए अगर यह बैसाखी बन गया है तो अभिभावकों के लिए भी स्टेटस सिम्बल ही है। यह सर्वे कैंब्रिज विश्वविद्यालय की सहयोगी संस्था द्वारा कराया गया है।सर्वेक्षण में दुनियाभर के 20 हजार शिक्षकों और विद्यार्थियों से सवाल पूछे गये। इसमें से 4400 शिक्षक और 3800 छात्र भारत के थे।इसके जरिये यह पता लगाने की कोशिश की गयी कि दुनियाभर के स्कूली बच्चों और शिक्षकों की प्राथमिकताएं क्या है? भारत में कॅरियर के मामले में इंजीनियरिंग और मेडिकल सबसे लोकप्रिय क्षेत्र हैं।

भारत में 16 फीसदी छात्र और सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनना चाहते हैं और 8 फीसदी वैज्ञानिक।भाषाओं के मामले में भारतीय छात्रों की पहली पसन्द अंग्रेजी है। 84.7 फीसदी छात्र अंग्रेजी पढ़ना चाहते हैं।गणित और विज्ञान पर भारतीय छात्रों का ज्यादा जोर है। 78 फीसदी छात्रों की गणित पढ़ने में दिलचस्पी है। उसके बाद भौतिक विज्ञान 73.1 और रसायन विज्ञान 71.8 फीसदी का नंबर आता है, जबकि 47.8 फीसदी बच्‍चे कंप्‍यूटर साइंस पढ़ना चाहते हैं। अब यह सोचने वाली बात है कि क्या यह सम्भव है कि जरा भी गलती शिक्षकों को न मिले..यह सरलीकरण शिक्षा व्यवस्था को कहाँ ले जाकर छोड़ेगा..। निजी स्कूलों में वर्क एडुकेशन के नाम पर जो सिखाया जाता है, उसमें से अधिकतर तो बच्चे बाजार से खरीदते हैं, कई बार बच्चों की जगह अभिभावक ये सारे सामान बनाते हैं…सवाल यह है कि बच्चे ने क्या सीखा..कई बार यह भी शिकायत मिलती है कि शिक्षिका सीधे वह सामान बनाकर लाने को कह देती है…बच्चा न बना पाया तो अभिभावक बना देते हैं। आजकल तो बच्चों के प्रोजेक्ट पूरे करना भी एक व्यवसाय बन गया है..इस स्थिति में बच्चे क्या सीखेंगे? आज लगभग हर स्कूल समग्र शिक्षा की बात करता है, बैग का वजन बढ़ रहा है, अंक भी बढ़ रहे हैं मगर उतनी ही तेजी से बच्चों की दुनिया सिमट रही है। अधिकतर हिन्दी माध्यम स्कूलों में तो खेल के मैदान ही नहीं हैं..शारीरिक गतिविधि की कोई जगह नहीं है और जिन स्कूलों में हैं, उन स्कूलों के बच्चों के पास तो फुरसत ही नहीं है। पहले हम नोट्स लिखा करते थे तो इसी क्रम में न सिर्फ लिखावट सुधरती थी, लिखने की गति तेज होती थी बल्कि वह पाठ हमें थोड़ा -बहुत याद भी हो जाया करता था। आज जेरॉक्स कल्चर ने शिक्षा को ही जेरॉक्स बनाकर छोड़ दिया है। पहले बाजार में जब किसी प्रोजेक्ट से जुड़ी तस्वीर नहीं मिलती थी तो हम बाकायदा हाथ से बनाते थे, नतीजा यह हुआ कि थोड़ी – बहुत चित्रकला भी आ गयी थी, आज सीधे प्रिंट का जमाना है। यह न सिर्फ खर्चीला है बल्कि बच्चों की प्रतिभा को कुन्द कर कर रहा है। बच्चे बोलना नहीं सीख पा रहे, बहुत से बच्चों में अंक कम होने के कारण आत्महीनता भी आ रही है और द्वेष भी पनप रहा है। सिर्फ और सिर्फ अच्छे अंक पाने वाले बच्चों का प्रतिशत तो कम है तो जो बच्चे अंक अच्छे नहीं ला पाये…वह कहाँ जाए..? एक समय था जब परीक्षा पद्धति सख्त थी। शिक्षकों से डाँट भी पड़ती थी। बुरा लगता था मगर कभी इस बात को दिल पर नहीं लिया क्योंकि हमें यही सिखाया गया था कि शिक्षक ने अगर डाँटा है तो कुछ सोच – समझकर किया होगा..आज स्थिति यह है कि खुद अभिभावक प्रदर्शन करने लगते हैं। बच्चा क्या सीखेगा और वह शिक्षकों का आदर ही क्यों करेगा..? कॉलेजों में शिक्षकों से जिस तरह की बदसलूकी हो जाती है..वह इसी का परिणाम है।

पहले की तुलना में देखा जाए तो आज के बच्चे ज्यादा अवसादग्रस्त और हार मानने वाले हैं। अब सुना जा रहा है कि उच्च माध्यमिक की परीक्षा में उत्तर पुस्तिकाओं की परम्परा भी खत्म करने का प्रस्ताव है। प्रश्नपत्र में सीमित जगह में उत्तर लिखने होंगे। अगर प्रश्न का एक हिस्सा ऐसा होता…तब समझा जा सकता था मगर पूरे प्रश्नपत्र का संक्षिप्त कर देना तो बच्चों की बौद्धिकता और व्याख्या व लेखन शिक्षण प्रणाली पर कुठाराघात से अधिक कुछ नहीं है। हिन्दी माध्यम स्कूलों के बच्चों को अनूदित किताबों के सहारे छोड़ दिया गया है….नोट्स लिखा देने भर से शिक्षक गंगा नहा ले रहे हैं, पाठ्यक्रम भी समाप्त हो रहा है, बच्चे पास हो रहे हैं और दाखिला भी ले रहे हैं मगर इन सब के बीच जो शब्द गायब है, वह सीख पाना ही है। शिक्षा के जरिये अब न आचरण आ रहा न चरित्र, न मानवीय मूल्य, न नागरिक संस्कार, न राष्ट्रीय दायित्व एवं कर्तव्य बोध और न ही अधिकारों के प्रति चेतना। आज प्रत्येक वर्ग में शिक्षा के गिरते स्तर को लेकर चिंता जताई जा रही है। शिक्षा के गिरते स्तर पर लंबी-लंबी बहसे होती है। और अंत में उसके लिए शिक्षक को दोषी करार दिया जाता है। जो शिक्षक स्वयं उस शिक्षा का उत्पादन है और जहाँ तक संभव हो रहा है मूल्यों, आदर्शों व सामाजिक उत्तर दायित्व के बोध को छात्रों में बनाये रखने का प्रयत्न कर रहा है, तमाम राजनीतिक दबावों के बावजूद। बच्चों को पढ़ाने-लिखाने के साथ-साथ जनगणना, आर्थिक गणना, बालगणना, पशुगणना, पल्स पोलियो से लेकर मतदाता सूची तैयार करना, मतगणना करना और चुनाव ड्यूटी तक तमाम राष्ट्रीय कार्यक्रमों को पूरी कुशलता से करने वाला शिक्षक इतना अकर्मण्य और अयोग्य कैसे हो सकता है? पाठ्यक्रम आधा कर दिया गया, हिन्दी साहित्य का इतिहास आधा पढ़ाया जा रहा है, भाषा विज्ञान को समेट दिया गया…प्राचीन इतिहास को गायब कर दिया गया..अब किस तरह की पीढ़ी तैयार कर रहे हैं, हम. ये हमें सोचना चाहिए। द टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर बताती है कि पुरुषों की तुलना में शहरी बेरोजगार महिलाओं की संख्या और ज्यादा रही। रिपोर्ट बताती है कि 0.8 फीसदी शहरी अशिक्षित महिलाएं बेरोजगार थीं जबकि उच्च शिक्षा या उच्च माध्यमिक स्कूल पास महिलाओं में ये दर 20 फीसदी तक रही।  एनएसओ की ओर से आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) जारी किया गया था। सर्वेक्षण में श्रम बल में बेरोगाजार लोगों की संख्या के संबंध में जानकारी दी गई है। सर्वेक्षण के मुताबिक माध्यमिक और उच्च माध्यमिक शिक्षा या इससे ज्यादा शिक्षा प्राप्त शहरी महिलाओं में बेरोजगारी दर चार फीसदी तक बढ़ी है।

एनएसओ ने स्पष्ट किया है साल 2017-18 के आँकड़ों की गणना के लिए अलग तरीकों का इस्तेमाल किया गया है, ऐसे में इनकी तुलना पहले के आंकड़ों से नहीं की जानी चाहिए। एनएसओ चेतावनीको ध्यान में रखा भी जाए तो तमाम तथ्य बताते हैं कि बीते समय में शिक्षा के स्तर के साथ बेरोजगारी दर भी बढ़ी है। इसके साथ ही सांख्यिकी मंत्रालय की ओर से जारी आँकड़ों में बताया गया है कि वित्त वर्ष 2017-18 में देश में बेरोजगारी दर बढ़कर 6.1 प्रतिशत हो गयी। अगर साहित्य से सम्बन्धी शिक्षा और उससे जुड़े रोजगार पर बात की जाये तब भी सवाल वहीं हैं। साहित्य चाहे किसी भी भाषा का हो, अँग्रेजी हो, हिन्दी हो या बांग्ला हो, उसमें शॉर्ट कट के लिए कोई जगह नहीं होती, वह व्याख्या की माँग करता है। हर बच्चा पढ़कर प्रतियोगी परीक्षा में नहीं जाता, फिर इन विषयों में कट टू कट मार्क्स या संक्षिप्त उत्तर की व्यवस्था भर से कैसे काम चल सकता है। किसी तरह पास करवाने की व्यवस्था में वर्तनी से लेकर वाक्य में अशुद्धियों की भी छूट दी जा रही है। अगर विषय साहित्य से अलग हुआ तब तो जैसे वर्तनी और वाक्य की बात करना ही गुनाह हो जाता है। जरा सोचिए, ऐसे छात्र जब शिक्षक बनेंगे तो वे बच्चों को कैसी शिक्षा देंगे? आईसीएसई में 98.54 प्रतिशत और आईएससी में 96 प्रतिशत परिणाम रहा और आईएससी में तो जो टॉपर रहे, उनको शत प्रतिशत अंक मिले… आईएससी में कोलकाता के देवन कुमार अग्रवाल (साइंस) और बेंगलुरू की विभा स्वामिनाथन (मानवशास्त्र) के 100-100 फीसदी अंक आए हैं। भारतीय बच्चे गणित में भी रट्‌टा मार रहे हैं। चार अंकों तक के जोड़-घटाव तो वो 95 फीसदी तक सही कर लेते हैं, पर लाभ-हानि के प्रश्न हल करने में सटीकता 55 फीसदी ही है। सीबीएसई और आईसीएसई के विद्यार्थियों पर क्विज नेक्स्ट एप के एक सर्वे में यह बात सामने आई है।


अप्रैल 2019 में 70 शहरों के कक्षा 6 से 10 तक के 7,500 बच्चों पर यह सर्वे हुआ और इनसे जुटाए 1 लाख 20 हजार आँकड़ों को जाँचा। रिपोर्ट कहती है कि बच्चों में रट्‌टा मारने की आदत बढ़ रही है। क्विज नेक्स्ट के फाउंडर गुरु प्रसाद होरा ने भास्कर को बताया कि प्रश्न में की-वर्ड मिलने पर ही बच्चे सही जवाब दे पा रहे हैं। प्रश्न तार्किक हो तो समस्या और बढ़ जाती है।
सर्वे में की-वर्ड आधारित सवालों की सटीकता 86% रही। बिना की-वर्ड आधारित प्रश्नों को हल करने की सटीकता 63% रही। मार्च में दुनिया की सबसे बड़ी लर्निंग कम्युनिटी ब्रेनली ने मेट्रो शहरों के 5 हजार बच्चों पर सर्वे किया था। इसके अनुसार 55% विद्यार्थी गणित और विज्ञान की परीक्षा को लेकर चिंतित थे।  अब रही बात भाषा की, जिस पर कोहराम मचा है तो यह सही है कि पाँचवीं तक मातृभाषा में शिक्षा का पक्ष और तर्क, दोनों समझा जा सकता है मगर हिन्दी पढ़ने और सीखने में अहिन्दीभाषियों को क्या परेशानी हो सकती है। हिन्दी सिर्फ राजभाषा नहीं बल्कि देश को जोड़ने वाली सम्पर्क भाषा है और रोजगार की भाषा भी है। अँग्रेजी अब भी अमीरों की भाषा ही है और दूसरे स्थान पर ही है।

लोक फाउंडेशन और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने मिलकर सर्वे किया है। जिसकी जांच सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी ने की है। सर्वे के मुताबिक, भारत में अंग्रेजी बोलने वाला वर्ग धनी और शिक्षित है साथ ही ज्यादातर अगड़ी जाति का है। भूगोलीय स्थिति के आधार पर जारी आंकड़ों के अनुसार, देश में अंग्रेजी बोलने वालों का आंकड़ा कम हो सकता है। भारत में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा हिंदी ही है
सर्वे के मुताबिकअंग्रेजी बोलने वालों का सम्बंध धर्म और जाति से भी है। अंग्रेजी बोलने वालों में 15 फीसदी से अधिक लोग क्रिश्चियन, 6 फीसदी हिंदू और 4 फीसदी मुस्लिम हैं। अगड़ी जाति के लोग दूसरी जातियों के मुकाबले तीन गुना अधिक अंग्रेजी बोलते हैं। इनमें पुरुषों की संख्या ज्यादा है। बुजुर्गों के मुकाबले कम उम्र के लोग अंग्रेजी का अधिक इस्तेमाल करते हैं। हिन्दी के बाद देश में सबसे ज्यादा अंग्रेजी बोली जाती है। हिंदी भाषा में 50 से अधिक बोलियां जैसे भोजपुरी भी शामिल हैं जिसे 5 करोड़ लोग बोलते हैं। 52.8 करोड़ भारतीयों के लिए पहली और दूसरी भाषा हिंदी है।  सर्वे के अनुसार, 6 फीसदी लोगों ने कहा कि वे अंग्रेजी बोल सकते हैं। सामने आए नतीजे कहते हैं, अंग्रेजी अभी भी शहरी भाषा मानी जाती है। ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले मात्र 3 फीसदी लोग बोले कि वे अंग्रेजी बोल सकते हैं वहीं शहरी क्षेत्र में ये आँकड़ा 12 फीसदी है।
41 फीसदी अमीर वर्ग के लोग ही अंग्रेजी बोलते हैं वहीं गरीब तबके का मात्र 2 फीसदी ही ऐसा कर पाता है। अंग्रेजी बोलने वालों में ज्यादातर शिक्षित वर्ग है और ये ऐसे लोग हैं जो ग्रेजुएट हैं।

अंग्रेजी अलग-अलग भाषाई क्षेत्र के लोगों को संवाद स्थापित करने के लिए पुल की तरह काम करती है। दक्षिण के मुकाबले दक्षिण-पूर्व के राज्यों में अंग्रेजी अधिक बोली जाती है। दिल्ली और हरियाणा जैसे राज्यों के धनी और गोवा-मेघालय के क्रिश्चियन लोग इस भाषा का अधिक इस्तेमाल करते हैं। असम सबसे बड़ा अपवाद है, यहाँ कम आय और सीमित क्रिश्चियन लोगों की संख्या होने के बाद भी अंग्रेजी का अधिक प्रयोग किया जाता है। देश में दो भाषा बोलने वाले 37.5 फीसदी और तीन भाषा वाले 11 फीसदी लोग हैं। हिंदी के साथ दूसरी भाषा बोलने वालों में मराठी और गुजराती शामिल हैं। जनगणना 2011 के मुताबिक, 2 लाख 56 लोगों की पहली, 8.3 करोड़ लोगों की दूसरी और 4.6 करोड़ भारतीयों की तीसरी भाषा भी अंग्रेजी है। यहां दूसरी भाषा से मतलब ऐसे लोगों से है जो अन्य भाषा भी जानते हैं, लेकिन प्रमुखता से अंग्रेजी या हिंदी का प्रयोग करते हैं। जाहिर सी बात है कि जो हालात हैं, उसमें रोजगार और शिक्षा को एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। देखा गया है कि अव्वल अंक पाने वाले जो पढ़ते हैं, वह उद्योग जगत या किसी भी क्षेत्र में व्यावहारिक तौर पर लागू करना मुश्किल है। युवाओं के पास प्लान बी न होना और सबका एक ही पेशे के पीछे भागना न सिर्फ अभाव का कारण है बल्कि मनचाही नौकरी न मिले तो वह अवसाद का कारण है। दरअसल, वक्त आ गया है कि पढ़े फारसी बेचे तेल की उक्ति को पलटा जाये…क्योंकि तेल भी हमारी दैनन्दिन जरूरत है। यहाँ फारसी को अगर अकादमिक शिक्षा से जोड़ा जाए और तेल को रोजगारपरक शिक्षा माना जाए और इसे छोटे – छोटे से स्तर पर ले जाया जाए, तब ही समाधान निकलेगा। सरकार क्या किसी के लिए सम्भव नहीं है कि हर एक को नौकरी मिले तो फिर हम उपलब्ध संसाधनों को विकसित कर अपनी आय का जरिया क्यों नहीं बना सकते? जो कर रहे हैं, वह बेहतर और उन्नत तरीके से करें, डिग्री हासिल करने के लिए अपने हाथ का हुनर छोड़ना जरूरी तो नहीं, बल्कि आप अपने ज्ञान से उसे और बेहतर बना सकते हैं। आप मूर्तियाँ, ताले, गलीचे, दरी, बर्तन से लेकर खेती और घर बनाने जैसे अनगिनत क्षेत्रों में काम कर सकते हैं। इस तरह आप न सिर्फ खुद आत्मनिर्भर होंगे..बल्कि रोजगार सृजन में सहायक भी होंगे। एमबीए पास अगर नल ठीक करने, बागवानी की एजेन्सी खोले तो क्या बुरा है। स्नातक की पढ़ाई के बाद अगर आप हाइजीनिक तरीके से गोलगप्पे बेचते हैं तो इसमें कोई बुराई नहीं, वह धीरे – धीरे आपका अपना एक कैफे बन सकता है। दरअसल, मानसिक जड़ता को तोड़े बगैर किसी भी समस्या का समाधान निकलना सम्भव नहीं है इसलिए फारसी पढ़कर भी तेल बेचने में ही फायदा है।

जरूरतमंदों की मदद और सद्भाव का पैगाम देती है ईद

ईद-उल-फितर को मीठी ईद के रूप में भी जाना जाता है। हिज़री कैलेंडर के अनुसार दसवें महीने यानी शव्वाल के पहले दिन ये त्योहार दुनिया भर में मनाया जाता है। इस्लामी कैलेंडर में ये महीना चांद देखने के साथ शुरू होता है। जब तक चांद नहीं दिखे तब तक रमजान का महीना खत्म नहीं माना जाता। इस तरह रमजान के आखिरी दिन चांद दिख जाने पर अगले दिन ईद मनाई जाती है। ऐसा भी माना जाता है कि इस दिन हजरत मुहम्मद मक्का शहर से मदीना के लिए निकले थे।

क्यों मनाई जाती है ईद

मक्का से मोहम्मद पैगंबर के प्रवास के बाद पवित्र शहर मदीना में ईद-उल-फितर का उत्सव शुरू हुआ। माना जाता है कि पैगम्बर हजरत मुहम्मद ने बद्र की लड़ाई में जीत हासिल की थी। इस जीत की खुशी में सबका मुंह मीठा करवाया गया था, इसी दिन को मीठी ईद या ईद-उल-फितर के रुप में मनाया जाता है। काज़ी डॉ सैय्यद उरूज अहमद ने बताया, इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार हिजरी संवत 2 यानी 624 ईस्वी में पहली बार (करीब 1400 साल पहले) ईद-उल-फितर मनाया गया था। पैगम्बर हजरत मुहम्मद ने बताया है कि उत्सव मनाने के लिए अल्लाह ने कुरान में पहले से ही 2 सबसे पवित्र दिन बताए हैं। जिन्हें ईद-उल-फितर और ईद-उल-जुहा कहा गया है। इस प्रकार ईद मनाने की परंपरा अस्तित्व में आई।

सद्भाव और मदद का पैगाम देता है ये त्योहार

ईद का त्योहार सबको साथ लेकर चलने का संदेश देता है। ईद पर हर मुसलमान चाहे वो आर्थिक रुप से संपन्न हो या न हो, सभी एकसाथ नमाज पढ़ते हैं और एक दूसरे को गले लगाते हैं। इस्लाम में चैरिटी ईद का एक महत्वपूर्ण पहलू है। हर मुसलमान को धन, भोजन और कपड़े के रूप में कुछ न कुछ दान करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। कुरान में ज़कात अल-फ़ित्र को अनिवार्य बताया गया है। जकात यानी दान को हर मुसलमान का फर्ज कहा गया है। ये गरीबों को दिए जाने वाला दान है। परंपरागत रूप से इसे रमजान के अंत में और लोगों को ईद की नमाज पर जाने से पहले दिया जाता है। मुस्लिम अपनी संपत्ति को पवित्र करने के रूप में अपनी सालाना बचत का एक हिस्सा गरीब या जरूरतमंदों को कर के रूप में देते हैं। विश्व के कुछ मुस्लिम देशों में ज़कात स्वैच्छिक है, वहीं अन्य देशों में यह अनिवार्य है।

परंपरा के अनुसार कैसे मनाई जाती है ईद

ईद की शुरुआत सुबह दिन की पहली प्रार्थना के साथ होती है। जिसे सलात अल-फ़ज़्र भी कहा जाता है। इसके बाद पूरा परिवार कुछ मीठा खाता है। वैसे ईद पर खजूर खाने की परंपरा है। फिर नए कपड़ों में सजकर लोग ईदगाह या एक बड़े खुले स्थान पर जाते हैं, जहां पूरा समुदाय एक साथ ईद की नमाज़ अदा करता है। प्रार्थना के बाद, ईद की बधाईयां दी जाती है। उस समय ईद-मुबारक कहा जाता है। ये एक दूसरे के प्यार और आपसी भाईचारे को दर्शाता है।

ईद-उल-फितर के मौके पर एक खास दावत तैयार की जाती है। जिसमें खासतौर से मीठा खाना  शामिल होता है। इसलिए इसे भारत और कुछ दक्षिण एशियाई देशों में मीठी ईद भी कहा जाता है। ईद-उल-फितर पर खासतौर से सेवइयां यानी गेहूं के नूडल्स को दूध के साथ उबालकर बनाया जाता है और इसे सूखे मेवों और फलों के साथ परोसा जाता है।

पानी में घिरे हुए लोग

केदारनाथ सिंह

पानी में घिरे हुए लोग
प्रार्थना नहीं करते
वे पूरे विश्वास से देखते हैं पानी को
और एक दिन
बिना किसी सूचना के
खच्चर बैल या भैंस की पीठ पर
घर-असबाब लादकर
चल देते हैं कहीं और

यह कितना अद्भुत है
कि बाढ़ चाहे जितनी भयानक हो
उन्हें पानी में थोड़ी-सी जगह ज़रूर मिल जाती है
थोड़ी-सी धूप
थोड़ा-सा आसमान
फिर वे गाड़ देते हैं खम्भे
तान देते हैं बोरे
उलझा देते हैं मूंज की रस्सियां और टाट
पानी में घिरे हुए लोग
अपने साथ ले आते हैं पुआल की गंध
वे ले आते हैं आम की गुठलियां
खाली टिन
भुने हुए चने
वे ले आते हैं चिलम और आग

फिर बह जाते हैं उनके मवेशी
उनकी पूजा की घंटी बह जाती है
बह जाती है महावीर जी की आदमकद मूर्ति
घरों की कच्ची दीवारें
दीवारों पर बने हुए हाथी-घोड़े
फूल-पत्ते
पाट-पटोरे
सब बह जाते हैं
मगर पानी में घिरे हुए लोग
शिकायत नहीं करते
वे हर कीमत पर अपनी चिलम के छेद में
कहीं न कहीं बचा रखते हैं
थोड़ी-सी आग

फिर डूब जाता है सूरज
कहीं से आती हैं
पानी पर तैरती हुई
लोगों के बोलने की तेज आवाजें
कहीं से उठता है धुआं
पेड़ों पर मंडराता हुआ
और पानी में घिरे हुए लोग
हो जाते हैं बेचैन

वे जला देते हैं
एक टुटही लालटेन
टांग देते हैं किसी ऊंचे बांस पर
ताकि उनके होने की खबर
पानी के पार तक पहुंचती रहे

फिर उस मद्धिम रोशनी में
पानी की आंखों में
आंखें डाले हुए
वे रात-भर खड़े रहते हैं
पानी के सामने
पानी की तरफ
पानी के खिलाफ

सिर्फ उनके अंदर
अरार की तरह
हर बार कुछ टूटता है
हर बार पानी में कुछ गिरता है
छपाक……..छपाक……

भाषाओं का परिर्वतन 

बालकृष्ण भट्ट 

यह एक सामान्य सिद्धांत है कि किसी भाषा पर प्रभुत्व होना या उससे अच्छी तरह परिचित हो जाना तभी लोग मानते हैं जब सीखने वाला उसी भाषा में सीख सके अर्थात चित्तवृत्ति उसके मनन करने के विषयों की उसी भाषा के रंग से ग्रहण करे। इसके मानने में किसको इनकार होगा कि हर एक भाषा के ढंग निराले ही हैं। दो भाषा व्याकरण की रीति पर कुछ मिलती भी हो परंतु वे चीजें जिनकी मुहाविरे कहते हैं कभी नहीं मिल सकते और यही मुहाविरे ही हर भाषा की जान है। हिंदी और अंगरेजी ही को लीजिए इन दो भाषाओं में थोड़ा-थोड़ा कहीं-कहीं व्याकरण के नियमों का तो भेद हई है। किंतु बड़ा भारी अंतर मुहाविरों की निराली चाल का है। जहाँ कहीं इन मुहाविरों की कोई गलती सुनने में आती हैं तो वह कान से चट खटक जाती है। यह लोग कदापि न समझै कि मुहाविरे अंगरेजी ही में हैं और जब उन पर आक्षेप होता हैं तो ‘राधा बाजार अंगरेजी’ या ‘बाबुओं की अंगरेजी’ इत्यादि शब्द तजआ निंदा की राह से कहे जाते हैं। जब तक किसी भाषा में जान है अर्थात रोजमर्रे के काम में उसे लोग वर्तते हैं और पुष्ट रीति पर उसके स्थिति बनी रहती है तब तक नये-नये मुहाविरे नित्य गले में बनते ही जायेंगे।

सृष्टि के चेतन पदार्थों का जो नियम है कि वे कभी एक सा नहीं रहते वरन दिन प्रतिदिन परिवर्तन की सान पर चढ़ते ही जाते हैं। यह नियम भाषा के संबंध में पूरी रीति पर लगता है। क्योंकि कुछ ऐसा मालूम होता है कि रुधिर और अस्थि मनुष्य के शरीर से उतना निकट संबंध नहीं रखते जितना उनकी भाषा रखती है। और इसी कारण बड़े से बड़े पंडित के आगे कोई अशुद्ध संस्कृत शब्द बोलिए तो वह इतना न खटकेगा जितना एक सामान्य से सामान्य बेमुहाविरे हिंदी शब्द कान को चोट पहुँचावेगा। क्योंकि संस्कृत अब बोल चाल की भाषा न रह गई। विचार कर देखिए तो जो हिंदी हम आजकल बोलते हैं वह पहले क्या थी और अब क्या है। अब फारसी उर्दू शब्द उसमें मिलते जाते हैं क्योंकि जब आपके बड़े-बड़े प्रामाणिक हिंदी कवियों ने फारसी अरबी के शब्द ग्रहण किए तो हमारे और आपके निकाले वे सब जो हमारी भाषा के नस-नस में अंतःप्रविष्ठ में हो रहे हैं क्योंकर निकाल सकते हैं। बल्कि, विरुद्धता दिखलाना वैसा ही है जैसा किसी वेगगामिनी नदी के प्रवाह को अकेले एक हाथ से रोककर उलट देने का प्रयत्न करना है। जिस तरह ये शब्द सर्वसाधारण अपनी भाषा में प्रचलित कर लेते हैं या जिस तरह के शब्द अपने नित्य के बोल चाल से लोग निकालकर फेंक देते हैं और उस पर आप को कुछ भी अधिकार नहीं है। आप मनुष्यों की भाषा तभी बदल सकते हैं जब जुलू या हबशी की जात का कोई आदमी इन देशों में पैदा कर सकैं या इससे भी बढ़कर कोई दूसरा प्राकृतिक अनर्थ जो सर्वथा प्रकृति विरुद्ध हो कर सकैं। क्योंकि यह कैसे संभव है कि प्रबल कालचक्र अपनी निशानी सब चीजों पर न छोड़ जाय। मुसलमानों के अत्याचार का फल जैसा हम अपनी रीति-रसम सामाजिक व्यवहार अपनी और अपने यहाँ की स्त्रियाँ की दशा सब में पाते हैं तब यह क्यों कर हो सकता है कि मुगलों की भाषा का असर हमारी भाषा में न हो।

सोचिये कि जिस हिंदी को हम बोलते हैं वह कितने हजार वर्ष से घिसते-घिसते करोड़ों टक्करें खाकर और न जानिये कौन-कौन सी मुसीबतें झेलकर न मालूम किसका-किसका जमाना देख भाल आज हमारे बोल-चाल के काम में आ रही है। यदि प्रकृति को भी हिंदी ही मान लीजिये तो देखिये कि आजकल की हिंदी से और चाँद और पृथ्वीराज के समय की हिंदी से और चाँद के समय की हिंदी से और कालिदास के समय की हिंदी से काल में कितना अंतर है क्योंकि कालिदास भवभूति प्रभृति कवियों के समय में भी संस्कृत जैसी उनके नाटकों में पाई जाती है केवल विद्धानों ही की मंडली में बोली जाती थी और वे लोग भी कवित्व शक्ति के प्रकाशक गाझिन शास्त्रार्थ के बाद घर जाते रहे होंगे तो नौकरों या लड़के बालों या स्त्रियों से (या सृष्टिसृष्टुराध्या) के जोड़ की बड़े धूम-धाम की संस्कृत न बोलते रहे होंगे। जैसा वेद की संस्कृत का व्याकरण भास बाल्मीकि तथा कालिदास आदि कवियों की संस्कृत के व्याकरण से कुछ पृथक है वैसा ही नाटक की प्राकृतों का व्याकरण चंद आदि की प्राकृतों से विभिन्न है अर्थात जो एक समय के विद्धानों की साधु भाषा थी वही किसी पूर्व समय के बेपढ़े-लिखे लोगों की भाषा रही और उस अदल-बदल में एक बात सदा ध्यान देने लायक है कि भाषा का परिवर्तन शब्दों पर इतना निर्भर नहीं जितना उसके व्याकरण संबंधी विषयों पर या मुहाविरों के अदल-बदल होने पर अर्थात नये शब्दों की भरती होने से कुछ डर की बात नहीं है बल्कि पढ़े-लिखे लोग या सर्वसाधारण उन शब्दों को अपना कर मान लें तो भाषा भी पुष्ट हो जायगी।

फारसी में देखिये तो यही हाल है अंगरेजी में देखिये तो यही हाल है। पृथ्वी की और भाषाओं में यही नियम पाया जाता है कि दूसरी भाषा के शब्द बेधड़क अपना कर लेते हैं। जैसा कोई किसी लड़के को गोद ले वैसा ही वह शब्द उसी भाषा का होकर रह जाता है। एक दूसरी विचित्र बात यह भी है एक भाषा का शब्द जब दूसरी भाषा में जाता है तो बहुधा अपने शुद्ध रूप में कभी नहीं रहता और जब ऐसा अशुद्ध शब्द भी दूसरी किसी भाषा में अच्छी तरह मिल जाता है तो उसके शुद्ध करने का प्रयत्न भी व्यर्थ ही है क्योंकि बोलने वालों के मन या जबान पर जो एक बार चढ़ गया वह कभी नहीं निकल सकता।

भाषाओं के इतिहास में आप हिंदी की दशा देखा यह मत समझ लीजिये कि भाषा की सूरत बदलने के लिए विदेशी भाषा के साथ टक्कर खाना जरूरी बात है। ऐसा ख्याल करना भूल है कि अगर विदेशियों की भाषा के साथ यह भाषा टक्कर न खाये होती तो शुद्ध रीति पर बनी रहती। क्योंकि वेद की संस्कृत को नाटक और काव्यों की संस्कृति में किसने उतार दिया। या संस्कृत को प्राकृतों के रूप में किसी विदेशी भाषा के साथ टक्कर खाने ने बदल दिया। और फिर भाषा की बाहरी आकृति पर विदेशियों का कुछ असर पहुँच सकता है पर उसके भीतरी नियमों को तिलभर भी खसकाना किसी के सामर्थ्य में नहीं है। हमने ऊपर कहा कि भाषा भी संसार को इतर चैतन्य सृष्टि का नियम मानती है। इस तरह जैसा पीटने से गदहा घोड़ा नहीं हो सकता। उसी तरह बाहर वालों का संपर्क भी कुछ बहुत हानिकारक नहीं हो सकता और फिर भाषा के संबंध में (हानि) शब्द का पूरा-पूरा तात्पर्य तय करना बड़ा कठिन है क्योंकि परिवर्तन के बीज तो भाषा में आप ही आप भरे हैं। क्यों संस्कृत से प्राकृत हुई और प्राकृतों से वर्तमान हिंदी। हम लोगों का केवल इतना ही कर्तव्य है कि देखते जायँ कि क्या-क्या अदल-बदल हुआ है। अभेद्य दुर्ग सदृश पाणिनि के व्याकरण के आगे हिंदी का व्याकरण छोटी सी फूस की झोपड़ी है। ये तो प्रकट है कि अब हमें उतने बड़े व्याकरण की आवश्यकता न रह गई। एक वह समय था कि अनेक जंजालों से भरे हुए पाणिनि कात्यायन पंतजलि के सूत्र वार्तिक भाष्य में एक मात्रा का भी हेर फेर हो जाने पर एक बड़ी भारी इमारत को ढहाकर फिर से खड़ी करना था और इसी का परिणाम यह हुआ कि हमारे यहाँ का व्याकरण ऐसा झंझट से भरा हुआ शास्त्र हो गया जैसा पृथ्वी के किसी कोने में न हुआ होगा। सच पूछिये तो दो गाड़ी के बोझ की पुस्तकें शेखर मंजूषा कैयट बड़े-बड़े जगड़ जाल जो रच गये उनमें और है क्या। सिवा इसके कि कीचड़ में पाँव फिर धोओ एक बड़े यत्न और प्रयास से। एक बने बनाये सुंदर और मनोहर महल को तोड़-फोड़ छिन्न-भिन्न कर पीछे पछताय फिर उसी को बनाया है। इन्हीं विफल चेष्टाओं में व्याकरण इतना बड़ा शास्त्र हो गया जिसमें नवीन और प्राचीनों का झगड़ा पढ़ते-पढ़ते उमर की उमर बीत जाती है कोरे के कोरे मूर्ख रह जाते हैं। ऐसी सरल भाषा हिंदी में इस सब खटपट का अब कुछ काम ही न रह गया पर क्यों ऐसा हुआ यह तो आदमी तभी तैकर रखेगा। जब और भी सैकड़ों हजारों (क्यों) का उत्तर दे सकेगा जैसा क्यों मनुष्य संसार में पैदा होता है? क्यों फिर यहाँ से चला जाता है? इत्यादि, इत्यादि। अब यह प्रश्न उसके संबंध में और उठता है कि यदि भाषा की धारा ऐसे अपरिवर्तनीय इतने जोर-शोर के साथ बह रही कि उसमें चूँ भी नहीं कर सकते तो किसी समय के अच्छे-अच्छे लेखकों का क्या दबाव या अंतर उस पर होता है। इस प्रश्न का उत्तर सहज में मिल सकता है। पुरानी हिंदी को ही लीजिये पुराने ठेठ हिंदी शब्दों को कोई अच्छी तरह सोच-विचार कर लिखने वाला फिर से निज कर समाज में प्रचलित कर सकता है। अपनी निज की भाषा के कामकाजी शब्दों को मर जाने का मृतक प्राय हो जाने से बचाना अच्छे लेखकों का काम है। बाहरी भाषाओं के शब्दों को अपना-सा कर डालना जिसमें भाषा दिन-प्रतिदिन अमीर होती जाय यह भी एक बड़ा काम है और सबसे बड़ा काम है अपने भाषा के विषयों को दूना-चौगुना करते जाना अर्थात जो-जो विषय भाषा में पहले कम थे उनको जिलो देना और जो विषय कभी थे ही नहीं उनको बाहर से लाय भरती करना। इस सबका असर यह होगा कि भाषा की नमन शक्ति बहुत बढ़ जायगी अर्थात जिस तरह के विषय पहले उससे बाहर समझे जाते थे वे जल्द उसकी पहुँच के भीतर आ जायेंगे। हमारे देखते ही देखते अंगरेजी मेमों ने हिंदुस्तानी गहनों का पहिनना आरंभ कर दिया जैसा सोने की चूड़ियाँ जड़ाऊ करें आदि। इसी तरह यदि हम अपनी मातृभाषा को अंगरेजी भाषा के आभूषण से आभूषित करें तो क्या क्षति है। ऐसे प्रश्नों की मीमांसा में अभी अनेक पूर्व पक्ष और उत्तर पक्ष रह गये हैं उनका विचार हम दूसरे अंक में करैंगे। आगे के अंक में ग्रामीण शब्दों के गुण प्रकट किए जायेंगे।