Wednesday, April 22, 2026
खबर एवं विज्ञापन हेतु सम्पर्क करें - [email protected]
Home Blog Page 611

स्वस्थ जीवन का आवश्यक आधार है योग

 शारीरिक, मानसिक और आध्‍यात्मिक अभ्‍यास के समूह को ही योग कहा जाता है। इसके अंतर्गत श्‍वसन व्‍यायाम, ध्‍यान और अलग-अलग प्रकार के आसन किए जाते हैं। नियमित रूप से योग का अभ्‍यास करने से मानसिक और शारीरिक रूप से कई लाभ मिलते है। योग शब्‍द की उत्‍पत्ति संस्‍कृत भाषा के युज शब्‍द से हुई है, जिसका अर्थ जोड़। तन और मन का जोड़ ही योग है। शारीरिक, मानसिक और आध्‍यात्मिक अभ्‍यास के समूह को ही योग कहा जाता है। इसके अंतर्गत श्‍वसन व्‍यायाम, ध्‍यान और अलग-अलग प्रकार के आसन किए जाते हैं। नियमित रूप से योग का अभ्‍यास करने से मानसिक और शारीरिक रूप से कई लाभ मिलते हैं, जिन्‍हें साइंस सही मानता है। इस लेख के माध्‍यम में हम आपको 10 ऐसे फायदे बता रहे हैं जिसे वैज्ञानिकों ने भी अपनी मंजूरी दी है।

प्रहलाद चुन्नीलाल वैद्य : वह भारतीय गणितज्ञ, जिन्होंने आइंस्टाइन के सिद्धांत का किया सरलीकरण

प्रसिद्ध भारतीय भौतिक विज्ञानी, गणितज्ञ और शिक्षाविद प्रहलाद चुन्नीलाल वैद्य का गणित के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण योगदान है। सापेक्षता के सामान्य सिद्धांत में योगदान के लिए उन्हें खासतौर पर याद किया जाता है। आइंस्टीन का गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत पेचीदा गणितीय समीकरणों के रूप में व्यक्त होता है। इन समीकरणों को हल करना काफी कठिन था। प्रहलाद चुन्नीलाल वैद्य ने इस समीकरण को हल करने की कोशिश की और उसमें वह काफी सफल रहे। उन्होंने आइंस्टीन के सापेक्षता सिद्धांत का सरलीकरण ​करने में अहम योगदान दिया। आज उनके द्वारा विकसित विधि ‘वैद्य मेट्रिक’ के नाम से प्रसिद्ध है। इस विधि में उन्होंने विकिरण उत्सर्जित करने वाले किसी तारे के गुरुत्वाकर्षण के सन्दर्भ में आइंस्टीन के समीकरणों को हल किया। उनके इस कार्य ने आइंस्टीन के सिद्धांत को समझने में मदद दी।

प्रहलाद चुन्नीलाल वैद्य का जन्म 23 मई, 1918 को गुजरात के जूनागढ़ जिले के शाहपुर में हुआ था और उनकी प्रारंभिक शिक्षा भावनगर में संपन्न हुई। गणित में विशेष रुचि होने के कारण उन्होंने बम्बई विश्वविद्यालय से अनुप्रयुक्त गणित में विशेषज्ञता के साथ एम.एस.सी. की डिग्री प्राप्त की। वैद्य अपने समय के प्रसिद्ध भौतिकविद और शिक्षाविद विष्णु वासुदेव नार्लीकर से बहुत प्रभावित थे।
उस दौर में विष्णु वासुदेव नार्लीकर के साथ कार्य करने वाले शोधार्थियों के समूह की पहचान सापेक्षता केन्द्र के रूप में विख्यात हो चुकी थी। वैद्य भी उनके दिशा-निर्देश में इस क्षेत्र में शोधकार्य करना चाहते थे। इसलिए वैद्य बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय गए। वहां उन्होंने श्री विष्णु वासुदेव नार्लीकर के दिशा-निर्देशन में सापेक्षता सिद्धांत पर शोधकार्य शुरू कर दिया तथा ‘वैद्य सॉल्यूशन’ प्रस्तुत किया। इस सिद्धान्त की प्रासंगिकता को मान्यता साठ के दशक में मिली, जब खगोल-विज्ञानियों ने ऊर्जा के घने, मगर शक्तिशाली उत्सर्जकों की खोज की। जैसे ही सापेक्षतावादी खगोल भौतिकी को मान्यता मिली, वैसे ही ‘वैद्य सॉल्यूशन’ को सहज ही अपना स्थान हासिल हो गया और विज्ञान के क्षेत्र में वैद्य को ख्याति मिली। वैद्य एक मशहूर गणितज्ञ होने के साथ ही एक शिक्षाविद भी थे। वह चाहते थे कि गणित बच्चों के लिए सुगम व रुचिकर बने। इसके लिए उन्होंने अनेक प्रयास किए। उनका मानना था कि गणित सिखाना शायद कठिन है, मगर गणित सीखना कठिन नहीं है क्योंकि यह हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रहा है। उन्होंने गुजराती तथा अंग्रेजी में विज्ञान और गणित की कई प्रसिद्ध पुस्तकों का लेखन किया, जैसे, ‘अखिल ब्राह्मांडमैन’, जिसका अर्थ है सम्पूर्ण ब्रह्मांड में, तथा ‘व्हाट इज मॉडर्न मैथमेटिक्स’।
वर्ष 1947 तक उन्होंने सूरत, राजकोट, मुम्बई आदि जगहों पर गणित के शिक्षक के रूप में कार्य किया। इस दौरान उन्होंने अपनी शिक्षा भी जारी रखी। वर्ष 1948 में उन्होंने बम्बई विश्वविद्यालय से अपनी पी.एच.डी. पूरी कर ली। अपना रिसर्च कार्य उन्होंने नव स्थापित टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान से किया। यहीं उनकी मुलाकात प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. होमी जहांगीर भाभा से हुई थी। कुछ समय बाद मुम्बई छोड़कर वह अपने गृह राज्य गुजरात लौट आए। वर्ष 1948 में उन्होंने बल्लभनगर के विट्ठल महाविद्यालय में कुछ समय तक शिक्षण कार्य किया। फिर वह गुजरात विश्वविद्यालय में गणित के प्रोफेसर नियुक्त हुए। वैद्य ने अपना पूरा जीवन एक समर्पित शिक्षक के रूप में बिताया। वह हमेशा खुद को एक गणित शिक्षक कहे जाने पर गर्वान्वित महसूस करते थे। प्रशासनिक प्रतिबद्धताओं के बावजूद वह विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए समय निकाल ही लेते थे।
वर्ष 1971 में उन्हें गुजरात लोकसेवा आयोग का सभापति नियुक्त किया गया। फिर वर्ष 1977-78 के बीच वह केन्द्रीय लोकसेवा आयोग के भी सदस्य रहे। 1978-80 के दौरान वह गुजरात विश्वविद्यालय के उपकुलपति रहे। वैद्य ने गुजरात गणितीय सोसायटी के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। विक्रम साराभाई कम्यूनिटी साइंस सेंटर के विकास में भी उनका अहम योगदान था। इंडियन एसोसिएशन फॉर जनरल रिलेटिविटी ऐंड ग्रेविटेशन (आईएजीआरजी) की स्थापना में भी वैद्य ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। वर्ष 1969 में स्थापित इस संस्था के संस्थापक अध्यक्ष सर विष्णु वासुदेव नार्लीकर थे। उन्हें स्वतंत्रता के बाद भारत में गांधीवादी दर्शन के अनुयायी के रूप में जाना जाता है। वैद्य, गांधीजी के विचारों से प्रेरित होकर आजादी के आन्दोलन में भी शामिल रहे। उन्होंने गांधीवादी विचारों को अपनाते हुए खादी का कुर्ता और टोपी को धारण किया। उपकुलपति के पद पर रहते हुए भी सरकारी कार का उपयोग करने से मना कर दिया और विश्वविद्यालय आने-जाने के लिए साइकिल का ही उपयोग करते रहे। 12 मार्च, 2010 को 91 वर्ष की आयु में प्रहलाद चुन्नीलाल वैद्य का निधन हो गया। प्रहलाद चुन्नीलाल वैद्य के योगदान को देखते हुए विज्ञान संचार के लिए समर्पित संस्था विज्ञान प्रसार द्वारा उन पर एक वृत्तचित्र का भी निर्माण किया गया है।

प्राथमिक शिक्षक के एक आविष्कार से बचीं हैदराबाद की 9 झीलें

हैदराबाद :  आंध्र प्रदेश का पोचमपल्ली गाँव साड़ियों के लिए काफ़ी प्रसिद्ध है। यहाँ से सिर्फ़ 1 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है मुक्तापुर गाँव। मछली पकड़ना इस गाँव के लोगों का मुख्य पेशा है। स्थानीय तालाबों से यहाँ के मछुआरे मछलियाँ पकड़कर बेचते हैं और अपना घर चलाते हैं लेकिन इन तालाबों में बरसात के मौसम में उग आने वाले खर-पतवार से यहाँ के मछुआरे काफी परेशान थे। ये खर-पतवार इतनी तेजी से बढ़ते कि दो-तीन दिन में ही पूरे तालाब को ढक लेते थे। इसके चलते मछलियों तक न तो सूर्य की रोशनी पहुँच पाती और न ही उन्हें पर्याप्त ऑक्सीजन मिल पाती। खर-पतवार हटाने के लिए इन मछुआरों को साल के 3 महीने लगातार तालाब की साफ़-सफाई करनी पड़ती।
गाँव के लगभग 100 आदमी हर दिन 150 एकड़ के तालाब की सफाई के लिए जाते और इस वजह से उनके रोज़मर्रा के दूसरे सभी काम रह जाते। यदि यह काम मज़दूर लगवाकर करवाया जाता तो कम से कम 3 लाख रुपये का खर्च होता। खर-पतवार निकालते समय गंदे पानी में जाने की वजह से गाँव के लोगों को कभी सांप काट लेते तो कभी उन्हें त्वचा से संबंधित बीमारियाँ हो जातीं। यह सिलसिला साल 2012 तक चला और फिर गाँव के ही एक मछुआरे ने खर-पतवार को हटाने के लिए एक मशीन बना दी। इसी गाँव के रहने वाले गोदासु नरसिम्हा मछुआरा होने के साथ-साथ एक प्राथमिक स्कूल में शिक्षक भी थे। तालाब साफ़ करने के लिए अक्सर उन्हें स्कूल से छुट्टियाँ लेनी पड़ती थीं और इस वजह से उन्हें स्कूल से नोटिस मिला कि अगर उन्होंने ज़्यादा छुट्टी ली तो उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ेगी। नरसिम्हा ने कहा, “मेरे परिवार में मैं, मेरी पत्नी और दो बच्चे हैं। स्कूल से जो भी तनख्वाह मिलती, कम से कम उससे थोड़ी तो मदद हो जाती। मछलियाँ बेचने से कोई ख़ास कमाई नहीं हो रही थी, क्योंकि मछलियों की तादाद खर-पतवार के कारण कम हो गई थी। तब मुझे लगा कि इस समस्या का कोई स्थाई समाधान ढूँढना पड़ेगा।”
उन्होंने एक ऐसी मशीन का प्रोटोटाइप तैयार किया, जिससे खर-पतवार को न सिर्फ़ बाहर निकाला जा सकता था, बल्कि उसे छोटे-छोटे टुकड़ों में काटा भी जा सकता था, ताकि वह दोबारा न उग आए। एक मछुआरे का इस तरह मशीन बना देना शायद आश्चर्य की बात लगे, लेकिन नरसिम्हा की रुचि शुरू से ही आविष्कार में थी। सिर्फ़ 9 साल की उम्र में अपने माता-पिता को खो देने वाले नरसिम्हा को उनके बड़े भाई ने पाला। उनका भाई उनसे छह साल बड़ा था। उसे पिता की जगह पी.डब्ल्यू.डी. विभाग में चौकीदार की नौकरी मिल गई थी। नरसिम्हा हमेशा से ही पढ़ाई में तेज थे और साथ ही उन्हें मशीनों से खेलने का बहुत शौक था। जो भी उन्हें जरा-सी देर में कोई मशीन खोलकर ठीक करते हुए देखता, वह यही कहता कि तुम बड़े होकर मैकेनिकल इंजीनियरिंग करना।
इसलिए नरसिम्हा ने अपने भाई से कहा कि वो उन्हें प्राइवेट स्कूल-कॉलेज में पढ़ाए। पर इस बात की तरफ उनके भाई ने कोई ध्यान नहीं दिया। इसलिए वे अपने एक रिश्तेदार के यहाँ रहने लगे। वहाँ वे उनके घर का काम करते थे और बदले में जो भी पैसे मिलते, उससे अपने स्कूल की फीस भरते।
10वीं कक्षा के बाद उन्होंने डिप्लोमा करने का फ़ैसला किया और टेस्ट भी क्लियर कर लिया। सबने उन्हें मैकेनिकल इंजीनियरिंग करने के लिए ही कहा। पर सरकारी कॉलेज में उन्हें सिविल इंजीनियरिंग में दाखिला मिला और प्राइवेट से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में दाखिला लेने में उनके भाई ने उनका साथ नहीं दिया।
डिप्लोमा के पहले साल में ही दिलचस्पी नहीं होने के कारण उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और अपने गाँव में ही रहकर छोटा-मोटा काम करने लगे। उन्होंने गाँव के ही प्राइमरी स्कूल में बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया। उनकी शादी करवाने के बाद उनके भाई अपने परिवार के साथ हैदराबाद चले गए और नरसिम्हा गाँव में ही रह गए। जैसे-तैसे वे अपना गुज़ारा कर रहे थे। पर जब तालाब से उनकी आय का ज़रिया खत्म होने लगा, तो उनके भीतर जो एक इनोवेटर छिपा बैठा था, वह सामने आ गया। मशीन का प्रोटोटाइप तो तैयार था, लेकिन मशीन बनाने के लिए उन्हें पैसों की ज़रूरत थी।
“ऐसे में, हमारे गाँव के सरपंच और बाकी लोगों ने मदद किया। उन्होंने 20, 000 रुपए इकट्ठा करके दिए। सबसे ज़्यादा साथ मुझे मेरी पत्नी का मिला। दिन भर हम लोग तालाब की साफ़-सफाई में हाथ बंटाते और छोटे-मोटे काम करते। रात में वो मशीन बनाने में मेरी मदद करती। उन्होंने सबसे पहले ‘कटिंग मशीन’ बनाई, जिसकी मदद से वे चाहते थे कि तालाब में ही खर-पतवार को काटा जा सके। लेकिन यह मशीन तालाब के बाहर ही कामयाब थी। पानी में इसके ब्लेड काम नहीं कर पा रहे थे। ऐसे में, उन्होंने तय किया कि एक और मशीन बनानी होगी जो खर-पतवार को बाहर भी निकाले। लेकिन फिर वही पैसों की समस्या आ खड़ी हुई।
इस बार तो गाँव के लोगों ने भी उनका सहयोग करने से मना कर दिया, क्योंकि उन्हें लगा कि उनका पैसा बर्बाद हुआ है। ऐसे में, उन्होंने इधर-उधर से पैसे इकट्ठे करने की कोशिश की और आखिरकार उनके एक रिश्तेदार ने उन्हें 30,000 रुपये का कर्ज दिया। इससे उन्होंने लिफ्टिंग मशीन तैयार की। वह बताते हैं, “मशीन तो तैयार थी और कामयाब भी, पर इसको अंतिम रूप देने के लिए 10, 000 रुपये की और ज़रूरत थी। इसके लिए मैं आस-पास के गाँवों में गया और वहाँ के लोगों को बताया कि अगर वे कुछ पैसे दें तो मैं उनके गाँव के तालाब भी साफ़ कर दूंगा। पूरे इलाके में यह समस्या थी। इस तरह मैंने 10, 000 रुपये का जुगाड़ कर लिया।”
60, 000 रुपए की लागत से उन्होंने यह मशीन बनाई जो कामयाब रही। उन्होंने अपने गाँव के साथ-साथ दूसरे गाँवों के तालाबों को भी साफ़ किया। उनके बारे में जब स्थानीय अखबार में खबर आई, तो ‘पल्ले सृजना’ नामक एक संगठन ने उनसे संपर्क किया। यह संगठन नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन की ही एक इकाई है, जो ग्रामीण और ज़मीनी स्तर पर होने वाले इनोवेशन को सपोर्ट करती है।
मशीन की मदद से तालाब को साफ़ किया गया
‘पल्ले सृजना’ की मदद से नरसिम्हा को अपना यह आविष्कार राष्ट्रीय मंच पर दिखाने का मौका मिला। इसके बाद, हैदराबाद नगर निगम ने उन्हें हैदराबाद के कई तालाब और झीलों की साफ़-सफाई का कार्यभार सौंपा। आर.के पुरम लेक, तौलीचौकी का तालाब सहित उन्होंने अब तक लगभग 8-9 झीलों की सफाई की है।
इसके अलावा, उनका पुनरुद्धार कार्य भी चलता रहा। उनके और उनकी मशीन के बारे में पढ़कर और भी कई लोगों ने उनसे संपर्क किया और मदद मांगी। नरसिम्हा ने बताया, “अब तक मैंने ओडिशा के एक पॉवर प्लांट के लिए मशीन बनाई है और किसानों के लिए कई मशीनें बनाई हैं। खर-पतवार हटाने की अपनी पहली मशीन में भी मैंने बहुत से बदलाव किए हैं। अब एक अच्छी क्वालिटी की मशीन की कुल लागत लगभग 30 लाख रुपए है। अगर इस तरह की मशीन आप विदेशी बाज़ारों से खरीदें तो लागत कम से कम 1 करोड़ रुपए पड़ेगी। नरसिम्हा और उनकी मशीन के बारे में यूट्यूब चैनल पर देखकर केन्या के जल, पर्यावरण एवं सिंचाई मंत्री सलमों ओरिम्बा ने भी उन्हें खर-पतवार हटाने की 10 मशीन बनाने का ऑर्डर दिया है। ओरिम्बो ने भारतीय प्रशासन से संपर्क किया और फिर अपने कुछ अधिकारियों के साथ भारत आकर नरसिम्हा की मशीन का जायजा लिया।
मशीन देखने के लिए ख़ास तौर पर केन्या के अधिकारी आये
नरसिम्हा ने कहा, “उनके मुताबिक, केन्या में भी लोग यह परेशानी झेल रहे हैं और इसलिए वे चाहते हैं कि मैं उन लोगों के लिए भी इस तरह की मशीन तैयार करूँ। मुझसे मशीन बनवाने की वजह है कम लागत। अगर वे यही मशीन बाहर से लेंगे तो उन्हें करोड़ों रुपए खर्च करने पड़ेंगे।अपने इन कार्यों के लिए नरसिम्हा को भारत सरकार और राज्य सरकार से काफ़ी सराहना मिली है। साल 2015 में उनकी मशीन को राष्ट्रपति भवन में लगी प्रदर्शनी में दिखाया गया था। उन्हें नेशनल इनोवेशन अवॉर्ड से भी नवाज़ा गया है।
उन्हें पुणे, चेन्नई और विशाखापट्टनम से भी मशीन बनाने के ऑर्डर मिले हैं। केन्या के प्रोजेक्ट के लिए वे जुलाई में वहां जाएंगे और वहाँ के तालाबों और झीलों का निरीक्षण करेंगे, ताकि उसी हिसाब से मशीन बना सकें।
अपनी इस सफलता का श्रेय वे अपने गाँववालों, अपनी पत्नी-बच्चे और पल्ले सृजना को देते हैं, जिन्होंने हर संभव तरीके से उनका साथ दिया। उनका कहना है कि वे आगे भी इसी तरह लोगों की समस्याओं को दूर करने के लिए मशीन बनाते रहना चाहते हैं। उनका सपना है कि वे गाँव में ही एक वर्कशॉप स्थापित करें।

(साभार – द बेटर इंडिया)

एस. जयशंकर बने विदेश मंत्री तो गृह मंत्रालय शाह हुए अमित,टीम पीएम मोदी की झलक

नयी दिल्‍ली : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में एनडीए-2 सरकार का गठन हो चुका है। गत गुरुवार को हुए शपथ ग्रहण समारोह में देश-दुनिया की गणमान्‍य हस्तियों ने शिरकत की। पीएम मोदी के साथ कई कैबिनेट मंत्रियों ने भी गुरुवार को राष्ट्रपति भवन के प्रांगण में आयोजित इस शपथ ग्रहण समारोह में करीब 8000 मेहमान शामिल हुए। सरकार गठन के अगले दिन शुक्रवार को मंत्रियों के बीच विभागों का बंटवारा भी कर दिया गया, जिसके अनुसार, पहली बार मोदी सरकार में शामिल हुए अमित शाह को देश के गृह मंत्रालय की जिम्‍मेदारी सौंपी गई है।कार्यों के बंटवारे के अनुसार, पिछली सरकार में गृह मंत्रालय की जिम्‍मेदारी संभालने वाले राजनाथ सिंह को रक्षा मंत्रालय की जिम्‍मेदारी दी गई है। एनडीए-1 सरकार में रक्षा मंत्रालय की जिम्‍मेदारी संभालने वालीं निर्मला सीतारमण को इस बार वित्‍त मंत्रालय की जिम्‍मेदारी दी गई है। उनके पास कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय का भी प्रभार है।

कैबिनेट मंत्री और उनका प्रभार

  • अमित शाह (गृह मंत्री)
  • राजनाथ सिंह( रक्षा मंत्री)
  • निर्मला सीतारमण( वित्त मंत्री)
  • सुब्रहमण्यम जयशंकर( विदेश मंत्री)
  • नितिन गडकरी ( रोड, ट्रांसपोर्ट मंत्री)
  • डीवी सदानंद गौड़ा ( केमिकल और फर्टिलाइजर  मंत्री)
  • रामविलास पासवान ( कंज्यूमर अफेयर)
  • नरेंद्र सिंह तोमर (कृषि मंत्री)
  • रवि शंकर प्रसाद( लॉ जस्टिस, टेलीकॉम मंत्री)
  • हरसिमरत कौर बादल( फूड प्रॉसेसिंग मंत्री)
  • थावरचंद गहलोत(  सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण मंत्री)
  • रमेश पोखरियाल निशंक( मानव संसाधन विकास मंत्री)
  • अर्जुन मुंडा (ट्राइबल अफेयर्स)
  • स्मृति ईरानी (महिला एवं बाल विकास और कपड़ा)
  • डॉ. हर्षवर्धन ( स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री, अर्थ साइंस)
  • प्रकाश जावडेकर (पर्यावरण, वन मंत्री, सूचना और प्रसारण मंत्री)
  • पीयूष गोयल( रेल और वाणिज्य मंत्री)
  • धर्मेंद्र प्रधान( पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, स्टील मंत्रालय)
  • मुख्तार अब्बास नकवी( अल्पसंख्यक मंत्रालय)
  • प्रह्लाद जोशी( संसदीय कार्यंमंत्री, कोयला और खान)
  • महेंद्र नाथ पांडे( कौशल विकास मंत्री)
  • अरविंद सावंत(भारी उद्योग और पब्लिक इंटरप्राइज)
  • गिरिराज सिंह( एनिमल हस्बैंड्री, डेयरी और फिशरीज)
  • गजेंद्र सिंह शेखावत( जलशक्ति मंत्रालय)

टूरिस्ट गाइड रऊफ ने जान देकर बचाई पाँच पर्यटकों की जान

श्रीनगर :  पहलगाम में पांच लोगों को बचाने के लिए अपनी जान गंवाने वाले 32 वर्षीय पर्यटक गाइड रऊफ अहमद डार दुुनिया को असली कश्मीरियत का मतलब सिखा गए। शुक्रवार शाम अनंतनाग जिले के प्रसिद्ध पहलगाम रिसॉर्ट में नौका पर सवार पांच पर्यटक लिद्दर नदी में गिर गए। इन्हें बचाने के लिए डार अपनी जान की परवाह किए बिना नदी में कूद गए। बचाव कार्य में उन्होंने पर्यटकों को तो बचा लिया पर तेज बहाव में खुद की जान गंवा दी। अधिकारियों के मुताबिकदक्षिण कश्मीर जिले में मावुरा के समीप राफ्टिंग पॉइंट पर अचानक हवाओं के तेज झोंके से पर्यटक  लिद्दर नदी में जा गिरे। नौका में तीन पर्यटक स्थानीय और पश्चिम बंगाल एक जोड़ा सवार था।
अधिकारियों ने प्रत्यक्षदर्शियों के हवाले से बताया, ‘डार गाइड के रूप में पश्चिम बंगाल के जोड़े के साथ थे। नौका पलटते ही डार ने बिना देरी किए फौरन बचाव कार्य शुरू कर दिया और उन्हें बचा लिया लेकिन खुद तेज बहाव में बह गए।’ जानकारी मिलने पर बचाव कार्य शुरू हुआ और  शनिवार सुबह भवानी पुल के पास पर्यटक गाइड का शव मिला, जिसे परिवार को सौंप दिया गया।

बने सच्ची कश्मीरियत का प्रतीक

राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने अहमद डार को ‘रीयल लाइफ हीरो’ बताया और उनके परिवार को पांच लाख रुपये वित्तीय सहायता की घोषणा की है। राज्य उपायुक्त खालिद जहांगीर ने कहा कि डार ने सही मायनों में कश्मीरियत का प्रदर्शन किया, जो प्यार और भाईचारा सिखाती है।

उन्होंने डार के लिए बहादुरी पुरस्कार की सिफारिश की है। वहीं मुख्य सचिव बीवीआर सुब्रमण्यम के निर्देश पर चार लाख रुपये के बहादुरी पुरस्कार की स्वीकति दी गई है। उधर, पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी डार की बहादुरी की तारीफ कर उन्हें सलाम किया। भाजपा राज्य महासचिव अशोक कौल ने भी दुख जाहिर किया। प्रदेश कांग्रेस मुखिया जी ए मीर ने भी डार को सच्ची कश्मीरियत का प्रतीक बताया। पश्चिम बंगाल के पर्यटक जोड़े मनीष कुमार सराफ और श्वेता सराफ ने डार का शुक्रिया अदा करते हुए कहा कि वे हमें दूसरी जिंदगी दे गए।

सभी ने डार की बहादुरी को किया सलाम

राज्य के पर्यटन प्रभारी और राज्यपाल सत्यपाल मलिक के सलाहकार खुर्शीद गनई ने डार की मौत पर दुख जताया। उन्होंने कहा कि अपनी जान की परवाह किए बगैर डार ने लिद्दर नदी की तेज लहरों में पांच लोगों को डूबने से बचाया। यह किसी व्यक्ति का सर्वोच्च बलिदान है। पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने शोक जताते हुए कहा कि इस बहादुर व्यक्ति डार को मेरा सलाम। उन्होंने पलटी हुई नौका से पर्यटकों को बचाया लेकिन अपनी जान गंवा दी। अल्लाह उन्हें जन्नत में आला मुकाम दे। प्रदेश कांग्रेस प्रमुख जीए मीर ने डार को सच्ची कश्मीरियत का प्रतीक बताया। भाजपा के प्रदेश महासचिव (संगठन) अशोक कौल ने डार की मौत पर दुख जताया और उसके परिवार के प्रति संवेदनाएं व्यक्त कीं। कौल ने राज्यपाल प्रशासन से डार के परिवार को हरसंभव सहायता मुहैया कराने की अपील की। पूर्व मंत्री और पीपुल्स कांफ्रेंस के अध्यक्ष सज्जाद गनी लोन ने भी डार को श्रद्धांजलि दी। कश्मीर के डिवीजनल कमिश्नर बशीर खान ने भी शोक जताते हुए आश्रित परिवार के लिए तत्काल राहत के रूप में दो लाख की घोषणा की।

राज्यपाल ने रऊफ की बहादुरी को किया सलाम
राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने टूरिस्ट गाइड रऊफ अहमद डार की बहादुरी को सलाम किया। उन्होंने कहा कि रऊफ वास्तविक जीवन में नायक साबित हुआ। दूसरों के जीवन को बचाने के लिए अपने जीवन का बलिदान दे दिया। राज्यपाल ने दिवंगत आत्मा की शांति और दुख की घड़ी में शोक संतप्त परिवार की शांति के लिए कामना की है। उन्होंने रऊफ के परिवार के लिए पांच लाख रुपये की वित्तीय सहायता देने की घोषणा की। मुख्य सचिव बीवीआर सुब्रह्मण्यम के निर्देश पर डार के परिजनों को अनुग्रह राशि दी गई है

निर्मला सीतारमण: 50 साल बाद किसी महिला के हाथ में वित्त मंत्रालय की कमान

नयी दिल्ली :   भाजपा की कद्दावर नेता निर्मला सीतारमण को मोदी सरकार में वित्त मंत्रालय दिया गया है। इसी के साथ वह देश की दूसरी महिला वित्त मंत्री बन गई हैं। गुरुवार को शपथ लेने बाद शुक्रवार को उन्हें वित्त मंत्रालय की कमान सौंपी गई। वित्त मंत्रालय के साथ निर्मला को कॉरपोरेट मामलों का मंत्री भी बनाया गया है। इससे पहले देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी 1970 से 1971 तक एक साल के लिए देश की वित्त मंत्री थीं। निर्मला को पिछली सरकार में रक्षा मंंत्री और उससे पहले कॉरपोरेट कार्य का मंत्री बनाया गया था। साल 2006 में वह भाजपा का हिस्सा बनीं और तभी से पार्टी से जुड़ी हुई हैं।  निर्मला को वित्त मंत्रालय सौंपने के पीछे एक बड़ी वजह है। उन्होंने अपनी स्नातक और मास्टर की पढ़ाई अर्थशास्त्र में की है। मास्टर्स की डिग्री जेएनयू से ली है। जेएनयू से ही उन्होंने एम फिल की पढ़ाई की। उनके पति पी. प्रभाकर भी आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू के सूचना सलाहकार रहे थे।  मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में निर्मला सीतारमण रक्षा मंत्री थीं। तब भी निर्मला दूसरी ऐसी महिला रहीं, जिन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बाद रक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाली थी। पिछली सरकार में रक्षा मंत्री के तौर पर निर्मला ने अच्छा काम किया था। इस बार उन्हें वित्त मंत्रालय का कार्यभार सौंपा गया।  साल 2010 से लेकर 2014 तक निर्मला भाजपा की प्रवक्ता भी रहीं। 2016 से कर्नाटक से वो राज्यसभा की सदस्य थीं और साल 2014 से 2016 तक आंध्र प्रदेश से राज्यसभा की सदस्य रहीं।

फैशन को दें थोड़ा ऑर्गेनिक टच

फैशन ऐसा होना चाहिए जिसमें कुदरत से प्यार छलके। पर्यावरण संरक्षण की बात होती है तो गो ग्रीन की बात चलती है तो हर चीज हरे रंग से रंग दी जाती है मगर यह पर्यावरण के अनुकूल नहीं है। जरा सोचिए क्या जब केमिकल नहीं होते थे तो चीजें कम खूबसूरत होती थीं…नहीं..प्रकृति को साथ लेकर भी फैशन को शानदार बनाया जा सकता है। मसलन, रंग से लेकर फैब्रिक तक ऑर्गेनिक हो तो थोड़ी सी कोशिश से हम और आप पर्यावरण को सुरक्षित बना सकते हैं –
जिस तरह ऑर्गेनिक फूड लोगों की जिंदगी का हिस्सा बनता जा रहा है, उसी तरह फैशन में भी ऑर्गेनिक का जलवा छाने लगा है। कम केमिकल्स और प्राकृतिक रंगों के इस्तेमाल से बने फैब्रिक में कई नए प्रयोग किए जा रहे हैं।
ऑर्गेनिक या सस्टेनेबल फैशन में कार्बनिक कॉटन, बैंबू फैब्रिक और हाथ से बुनी खादी का उपयोग किया जाता है। इसमें रंग भी प्राकृतिक तत्वों से निकाले जाते हैं। इस तरह के फैब्रिक त्वचा के लिए अच्छे होते हैं क्योंकि इनसे स्किन एलर्जी की संभावना नहीं रहती। खासतौर पर गर्मियों में तो यह फैब्रिक बहुत अनुकूल रहता है। गहरे रासायनिक रंगों और केमिकल ट्रीटमेंट का चलन अब कम हो गया है। इसकी जगह हैंडमेड कॉटन।  बाँस की छाल से बने इको फ्रेड्ली कपड़े फैशन को नया आयाम दे रहे हैं। इसके लाभ देख कर लोग अब ऑर्गेनिक व इको फ्रेंड्ली कपड़ों की माँग कर रहे हैं। कुछ लोग इसे फैशन स्टेटमेंट की तरह देख रहे हैं तो कुछ जागरूकता का नतीजा मानते हैं। कई देसी-विदेशी ब्रैंड्स ऑर्गेनिक की राह पर चल पड़े हैं। सेहत और पर्यावरण को देखते हुए इस फैशन से रीजनल क्राफ्ट को फिर से जीवित कर पाने की उम्मीद जग रही है।
अब टेक्सटाइल और फैशन डिजाइनर डाइंग में होने वाले केमिकल्स के प्रयोग से बचना चाहते हैं। समस्या का समाधान यही है कि ऑर्गेनिक रंगों का अधिकाधिक इस्तेमाल किया जाए। हर्बल तत्वों से बुने गए कपड़े शहरी लोगों के लिए नई चीज हैं जिसे लोग तेजी से अपनाने लगे हैं।
हल्दी से पीला, टमाटर से लाल, शलजम से बैंगनी, इंडिगो से नीला रंग..ऐसे कई उपाय हैं कि अब रंगों को भी पर्यावरण अनुकूल बनाया जा सकता है।
चूंकि ऑर्गेनिक फैब्रिक महँगा होता है इसलिए बड़ी आबादी तक इसकी पहुँच भी मुश्किल होती है। ऑर्गेनिक रंग या प्रिंट्स भारतीय संस्कृति में लंबे समय से चलन में हैं। मैं इसे उपयोग में लाने को उत्सुक हूँ। यह फैब्रिक मुलायम और आरामदेह होता है। लोगों की प्राथमिकता में यह शामिल हो सके, इसके लिए अभी कुछ और प्रयास करने होंगे।

पर्यावरण के अनुकूल बने घरों की जरूरत

ग्रीन होम न केवल पर्यावरण अनुकूल होते हैं, बल्कि ये आज के समय की माँग भी हैं। स्वास्थ्य कारणों के चलते लोग अब इस तरह के घरों को तरजीह दे रहे हैं। शुरुआत में ये घर महंगे लग सकते हैं, लेकिन लंबे समय में इनमें रहने का बड़ा फायदा मिलता है। ग्रीन होम बिजली के बिल में 20-30 फीसदी की बचत कराने में मदद करता है। यह केवल उदाहरण है. इसके अलावा भी आपको कर्इ तरह के फायदे मिलते हैं –
1. बिजली की बचत ग्रीन होम में रहते हुए खरीदारों को कई तरह के फायदे मिलते हैं। इसमें सबसे महत्वपूर्ण है बिजली की बचत। ज्यादा खपत के चलते गर्मियों में अक्सर बिजली और पानी का बिल बढ़ जाता है। ग्रीन होम का निर्माण इस तरह से किया जाता है कि उन्हें प्राकृतिक रोशनी और हवा मिले। बिजली की मांग को कम करने के लिए इनमें सोलर पैनल का इस्तेमाल किया जाता है। इससे बिजली का बिल कम करने में मदद मिलती है।
2. पानी की बचत बढ़ते प्रदूषण और आबादी ने पानी के स्रोतों पर दबाव डाला है। कई शहरों में पानी की पहले से ही किल्लत है इसलिए इसे बचाना महत्वपूर्ण है। वॉटर हार्वेस्टिंग जैसे तरीके पानी की लागत को 30 से 50 फीसदी तक कम कर सकते हैं। ग्रीन होम न केवल पानी की लागत को घटाता है बल्कि इस सीमित प्राकृतिक संसाधन को बचाने में भी मदद करता है। बेंगलुरु के वैज्ञानिक एआर शिवकुमार अपने घर में पाइप्ड वाटर सप्लार्इ का इस्तेमाल नहीं करते हैं। वह कहते हैं कि किसी भी शहर के संसाधन सीमित हैं। इन्हें संभालकर खर्च करने की जरूरत है।
3. अच्छी आबोहवा घर में अच्छी आबोहवा का आनंद लेने के लिए महत्वपूर्ण है कि उसे इस तरह बनाया गया हो कि उसमें हवा आने-जाने का रास्ता कहीं बाधित नहीं होता हो। घर में पौधे हवा को साफ करते हैं इसलिए पौधे जरूर लगे होने चाहिए। शेड्स का इस्तेमाल कर गर्मी के थपेड़ों को रोका जा सकता है। सोलर चिमनी और एग्ज्हौस्ट फैन भी हवा की गुणवत्ता को बढ़ा देते हैं। शिवकुमार कहते हैं कि आप प्रकृति के जितना करीब जाते हैं। वह भी आपके पास उतना ही करीब आती है। पर्यावरण अनुकूल विकल्पों को अपनाना हम सबके फायदे में है।
4. प्राकृतिक रोशनी घर में प्राकृतिक रोशनी आने का सबसे बड़ा रास्ता हैं खिड़कियां। आपको घर की खिड़कियां चौबीस घंटे बंद करके नहीं रखनी चाहिए। अलबत्ता इनके रास्ते सूरज की रोशनी घर में आने देनी चाहिए। अपने ड्रॉइंग रूम और बेडरूम में अधिकतम प्राकृतिक रोशनी आने का रास्ता खोलने के लिए आप प्राकृतिक पेंट और हल्के रंगों का इस्तेमाल कर सकते हैं। फिर रोशनी के लिए इलेक्ट्रिक अप्लायंस पर आपकी निर्भरता कम हो जाएगी।
5. स्वस्थ जीवनशैली में मददगार जब सेहत का सवाल आता है तो जरूरी है कि घर में साफ हवा आती-जाती हो। वह प्रदूषण फैलाने वाले कैमिकल से मुक्त हो. ग्रीन होम में आपको स्वस्थ जीवनशैली को बनाए रखने में मदद मिलती है। पौधों और सौर ऊर्जा से घर के अंदर का वातावरण शुद्ध रहता है।
6. अच्छी रीसेल वैल्यू भी मिलती है। ग्रीन होम केवल पर्यावरण अनुकूल ही नहीं होते हैं बल्कि ये ज्यादा आकर्षक भी होते हैं। संभावित खरीदार को ये ज्यादा लुभाते हैं। कारण है कि ये कर्इ तरह के खर्चों को बचाते हैं। अगर ग्रीन होम अच्छी तरह से मेनटेन है तो उसकी रीसेल वैल्यू बढ़ जाती है।

(साभार – इकोनॉमिक टाइम्स)

बच्चों की आर्थिक जरूरतों के लिए जरूरी है तैयार रहना

माता-पिता बनना परम आनंद है, हालांकि यह अक्सर अतिरिक्त जिम्मेदारियों के साथ आता है। इन कर्तव्यों के बीच वित्तीय चुनौतियां आपकी समस्याओं को बढ़ा सकती हैं। इसके लिए, आपको स्पष्ट वित्तीय लक्ष्य बनाने होंगे और वित्तीय विशेषज्ञ की मदद से इसे हासिल करना होगा।
यह आपको आने वाली संभाव्य चुनौतियों के लिए मानसिक रूप से सचेत करता है, और आप इसके लिए व्यापक तैयारी कर पाते हैं। यह एक मात-पिता के रूप मे आपका आत्म-विश्वास बढ़ाता है और आप एक बच्चे को दुनिया मे लाने के लिए स्वयं को तैयार कर पाते हैं। यह आपको वित्तीय रूप से मजबूत बनाता है, और आपकी वित्तीय चिंताओं को कम करता है। इसकी वजह से आपकी अनावश्यक चिंताएँ कम होती हैं और आप बच्चे कि देखभाल पर पूरा ध्यान लगा पाते हैं। यह आपके खर्चों और आय के बीच नियंत्रण स्थापित करता है और आप अपनी आय का सही प्रबंधन कर पाते हैं।
आप अपनी योजना को तीन हिस्सों मे विभाजित कर सकते हैं। पहला, शिशु के जन्म के पहले। दूसरा, जन्म के बाद के दो साल और तीसरा, आगे के भविष्य के लिए। अपनी योजना को तीन हिस्सों मे बाँटना आपको बेहतर तरीके से तैयार होने मे मदद करता है। शिशु के जन्म के पहले
शिशु के जन्म के पहले की देखभाल सीधे तौर पर माँ से संबंधित है। माँ का ख्याल रखना बहुत महत्वपूर्ण है ताकि वह एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दे पाए। बच्चा जितना स्वस्थ होगा, आप उतने ही चिंतामुक्त रहेंगे। माँ की सभी आहार संबंधी आवश्यकताएँ पूरी करें, जरूरी आयरन या प्रोटीन पूरक देते रहना आवश्यक है। जन्म के बाद के दो साल यह अवधि सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहाँ आपको बहुत सारी चीजों का प्रबंधन करना होता है। बच्चे के दुनिया मे आने के बाद जिन खर्चों का सामना करना पड़ता है, उसमें प्रमुख हैं:
बच्चे का आहार : पहले छह महीने के लिए बच्चा पूर्णतः माँ के दूध पर ही निर्भर होता है। उसके बाद उसे अन्य आहार-संबंधी पूरक दिए जाते हैं। यदि किसी कारणवश माँ स्तनपान कराने मे सक्षम नहीं हो पाती है, तो कृत्रिम पूरक काफी ख़र्चीले हो सकते हैं।
डायपर : डायपर एक बच्चे की मूलभूत आवश्यकता है। बच्चे को संक्रमण से बचाने के लिए नियमित अंतराल पर डायपर बदलना जरूरी है। बढ़ते बच्चे के साथ डायपर का साइज़ और कीमत दोनों बढ़ते हैं।
कपड़े : जैसे-जैसे बच्चा बढ़ता है, उसके लिए ढेरों नए कपड़े की आवश्यकता होती है।
खिलौने: बच्चे को व्यस्त रखने के लिए और उसकी सक्रियता बढ़ाने के लिए खिलौने बहुत महत्वपूर्ण हैं।
जरूरी वस्तुएं: समय के साथ कुछ वस्तुओं की मांग उत्पन्न होती है। उदाहरण के तौर पर जब खाना छोर कर खिलाना हो तो ब्लेंडर की आवश्यकता हो सकती है।
फर्नीचर : आधुनिक समय मे बच्चे को ध्यान मे रखते हुए बनाए गए फ़र्निचर मौजूद हैं। यदि आप महंगे फ़र्निचर न भी खरीदें तो झूला इत्यादि खरीदने की आवश्यकता हो सकती है।
आया या नर्स: बच्चे और स्वयं के देखभाल के लिए आया या नर्स की आवश्यकता हो सकती है।
टीकाकरण : सम्पूर्ण टीकाकरण आवश्यक है। यह पहले महीने से लेकर 10-12 साल तक देने वाले टीके हो सकते हैं। सामान्यतया पहले दो साल के अंदर सभी प्रमुख टीके दिए जाते हैं।
डॉक्टर की फीस: बच्चे के स्वास्थ्य जांच के लिए आपको बार-बार डॉक्टर के पास जाना पड़ सकता है।
बच्चे की जन्मदिन पार्टी : बच्चे का आना खुशी लेकर आता है और लोग यह खुशी बाँटना चाहते हैं। यह पार्टी जन्म के तुरंत बाद या एक पहले जन्मदिवस पर हो सकती है। यह एक खर्चीला समारोह हो सकता है।यदि आगे के भविष्य को ध्यान मे रख जाए, तो इसमें स्कूल और पढ़ाई से संबंधित खर्चे शामिल हैं। आधुनिक समय मे शिक्षा सस्ती नहीं रह गई है। आप जितना खर्च कर सकते हैं, उस अनुसार विकल्प मौजूद हैं। इसके अलावा यदि आप बच्चे को खेल-कूद या या अन्य रचनात्मक गतिविधियों मे डालते हैं, तो उसमें मे भी अतिरिक्त खर्च होता है। यदि आप बच्चे को उच्च शिक्षा को भी ध्यान मे रखते हुए योजना बना रहे हैं तो, आने वाले 18 -20 सालों में होने वाले खर्चों के प्रति भी सावधान रहना आवश्यक है।
आप कुछ वित्तीय लक्ष्य निर्धारित कीजिए। इन लक्ष्यों को लघु अवधि योजनाओं और लम्बी अवधि वाली योजनाओं में बाँटिए। बच्चे का टीकाकरण, बर्थडे पार्टी इत्यादि शॉर्ट टर्म गोल्स हो सकते हैं और उच्च शिक्षा, बच्चे का विवाह आदि लॉन्ग टर्म गोल्स।
लघु अवधि योजनाओं  के लिए आपको ऐसे निवेश करने होंगे जो जल्द परिणाम दे जबकि लम्बी अवधि वाली योजनाओं के लिए आपको लंबे समय के निवेश के बारे मे सोचना होगा। लॉन्ग टर्म गोल्स एक शिशु बीमा पॉलिसी लेना फायदेमंद है, जबकि शॉर्ट टर्म गोल्स के लिए फिक्स्ड डिपॉजिट्स, छोटे निवेश या लोन इत्यादि के बारे मे विचार किया जा सकता है।
लक्ष्य निर्धारित करना महत्वपूर्ण है। यदि आपका लक्ष्य स्पष्ट नहीं है तो आप किसी आर्थिक सलाहकार से मिल सकते हैं। वो आपको उपलब्ध विकल्पों के बारे मे बता सकते हैं और आप अपनी सुविधानुसार अपने विकल्पों का चयन कर सकते हैं।
(साभार – दैनिक भास्कर)

स्तनपान कक्ष पाने वाला देश का पहला स्मारक बनेगा ताजमहल

आगरा : ताजमहल देश का पहला स्मारक होगा, जहाँ महिलाओं को स्तनपान कराने के लिए ब्रेस्टफीडिंग रूम बनाए जाएंगे। इसके अलावा आगरा के किला और फतेहपुर सीकरी में भी ऐसी ही सुविधा दी जाएगी। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के अधिकारी वसंत कुमार स्वर्णकार ने बताया कि सीढ़ियों के नीचे छिपकर स्तनपान कराती महिला को देखकर यह ख्याल आया है। स्वर्णकार के मुताबिक, बेबी फीडिंग रूम उन लाखों मांओं के लिए मददगार साबित होंगे, जो बच्चों को यहां लेकर आती हैं। स्तनपान कराना हर मां का अधिकार है। मेरा मानना है कि उनके लिए उचित व्यवस्था होनी चाहिए। मैं उनके लिए कुछ करना चाहता हूं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के मुताबिक, भारत में 36 हजार से अधिक स्मारकों में से ताजमहल पहला ऐसा है, जहां इस तरह की सुविधा दी जाएगी। वसंत कुमार का कहना है कि दुनिया के दूसरे स्मारक भी प्रेरणा लेंगे और ब्रेस्टफीडिंग रूम बनाएंगे। पिछले साल बेस्टफीडिंग से जुड़ा एक मामला कोलकाता में सामने आया था। पूर्वी कोलकाता के एक मॉल में बच्चे को स्तनपान कराने के लिए मां को टॉयलेट में ले जाने को कहा गया था। शिकायत के बाद भी सुनवाई नहीं हुई थी। नतीजन महिला ने उस मॉल के सामने धरना दिया था।