Thursday, April 23, 2026
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इंटरनेट पर लोकप्रिय हो रही हिन्दी, हर साल जुड़ रहे 94 फीसदी उपभोक्ता

43.63% लोग देश में हिन्दी भाषा बोलते हैं
मंत्री और अधिकारी ही नहीं करते हैं हिन्दी भाषा का प्रयोग

नयी दिल्ली : सर्वे एजेंसी स्टैटिस्टा ने साल 2018 में अपनी रिपोर्ट में कहा था कि इंटरनेट की दुनिया में अंग्रेजी का दबदबा है। अंग्रेजी भाषा में 10 मिलियन वेबसाइट्स हैं और 53 प्रतिशत लोग पूरी दुनिया में इंटरनेट पर अंग्रेजी का इस्तेमाल करते हैं। इंटरनेट पर पूरी दुनिया में चाइनीज की उपस्थिति सिर्फ 16 फीसदी है जबकि चाइनीज बोलने वालों की संख्या 1.3 बिलियन है लेकिन स्टैटिस्टा का दावा अब गलत साबित होते दिख रहा है। एक बात तो आप भी जानते हैं कि दुनिया की कोई भी भाषा मातृभाषा की जगह नहीं ले सकती है और यही हालत हिन्दी के साथ भी है। यदि आप भी हिन्दी भाषी हैं तो आपको बता दें कि आपकी हिन्दी इंटरनेट पर काफी तेजी से आगे बढ़ रही है। इंटरनेट पर हिन्दी की लोकप्रियता का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि इंटरनेट पर हिन्दी पढ़ने वालों की संख्या हर साल 94 फीसदी बढ़ रही है। गूगल-केपीएमजी रिसर्च, सेंसस इंडिया और आईआरएस की सर्वे रिपोर्ट को मानें तो साल 2021 में हिन्दी में इंटरनेट उपयोग करने वाले अंग्रेजी में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों से अधिक हो जाएंगे। एक अनुमान के मुताबिक 20.1 करोड़ लोग हिन्दी का उपयोग करने लगेंगे। गूगल के अनुसार हिन्दी में सामग्री पढ़ने वाले हर वर्ष 94% बढ़ रहे हैं, जबकि अंग्रेजी में 17% है। अमेजन इंडिया ने हाल ही में अपना एप हिन्दी में लॉन्च किया है। ओएलएक्स, क्विकर जैसे प्लेटफॉर्म पहले ही हिन्दी में उपलब्ध हैं। स्नैपडील भी हिन्दी में आ चुका है। 2021 तक 8.1 करोड़ लोग डिजिटल पेमेंट के लिए हिन्दी का उपयोग करने लगेंगे। जबकि 2016 में यह संख्या 2.2 करोड़ थी। सरकारी कामकाज के लिए 2016 तक 2.4 करोड़ लोग हिन्दी का इस्तेमाल करते थे जो 2021 में 9.4 करोड़ हो जाएंगे। 2016 में डिजिटल माध्यम में हिन्दी समाचार पढ़ने वालों की संख्या 5.5 करोड़ थी। जो 2021 में बढ़कर 14.4 करोड़ होने का अनुमान है।

हाल ही में राजभाषा विभाग के सचिव ने कहा है कि मंत्रियों और विभागों की ओर से मिलने वाले पत्रों में सिर्फ 10 से 20 प्रतिशत ही हिन्दी में होते हैं। हालांकि अधिकांश मंत्री दावा करते हैं कि वे 50 से 60 प्रतिशत पत्र-व्यवहार हिन्दी में करते हैं। बता दें कि 2001 में देश में हिन्दी 13बोलने वालों की संख्या 43.63 फीसदी यानी करीब 42 करोड़ थी, वहीं 2011 में यह संख्या 52 करोड़ हो गयी।

वैज्ञानिक उत्पन्न कर रहे  डेंगू-प्रतिरोधी मच्छर, हुआ 9 देशों में परीक्षण 

डेढ़ लाख संक्रमित मच्छरों को छोड़ा
दक्षिण-पूर्व एशिया में डेंगू से 1800 लोग मारे गए- डब्ल्यूएचओ

हनोई : वैज्ञानिकों का एक समूह मच्छर जनित बीमारियों में से एक डेंगू से निपटने इस साल दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों फिलीपींस, वियतनाम, मलेशिया, म्यांमार और कंबोडिया में डेंगू के काके लिए डेंगू-प्रतिरोधी मच्छर पैदा करने के लिए शोध कर रहे हैं। उम्मीद जताई जा रही है कि इस बीमारी से अब निपटा जा सकेगा। इसके लिए 9 देशों में परीक्षण भी किया गया है, जिसके अच्छे परिणाम सामने आए हैं। मच्छर जैसी बीमारियों से निपटने के लिए वैज्ञानिक वर्ल्ड मॉस्क्विटो प्रोग्राम (डब्ल्यूएमपी) के तहत काम कर रहे हैं। नर और मादा एडीज (डेंगू फैलाने वाले) मच्छरों को जंगल में छोड़े जाने से पहले रोग प्रतिरोधी बैक्टीरिया वोल्बाचिया से संक्रमित किया जाता है। कुछ ही हफ्तों में बेबी मच्छर वोल्बाचिया बैक्टीरिया के साथ जन्म लेते हैं, जो रोग प्रतिरोधक के रूप में काम करता है। इससे न केवल डेंगू, बल्कि जाइका, चिकनगुनिया और पीले बुखार जैसी बीमारियों से बचा जा सकेगा।
पहली बार उत्तरी ऑस्ट्रेलिया में इसका परीक्षण किया गया। वियतनाम में डब्ल्यूएमपी के प्रोजेक्ट कोऑर्डिनेटर, गुएन बिन्ह गुयेन ने बताया कि वोल्बाचिया बैक्टीरिया वाले मच्छरों को छोड़ने के बाद डेंगू के मामलों में कमी देखी गई। गुएन की टीम ने दक्षिणी वियतनाम के डेंगू पीड़ित जिले विन्ह लुओंग में करीब डेढ़ लाख वोल्बाचिया-संक्रमित मच्छरों को छोड़ा। विन्ह लुओंग में डेंगू के मामले में 86% की कमी आई। इस खोज को लेकर एक महिला ने कहा कि यह मेरे लिए राहत की खबर है। 2016 में मेरे दो बच्चों को डेंगू हुआ था। अब मैं 70 से 80% तक सुरक्षित महसूस करती हूं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल दक्षिण-पूर्व एशिया से डेंगू के करीब 6 लाख 70 हजार मामले सामने आए। इसमें 1800 लोग मारे गए। विशेषज्ञों का कहना है कि इस साल स्थिति बेहद खराब थी। डेंगू का एक मुख्य कारण गर्म तापमान है। दुनियाभर में जुलाई काफी गर्म रहा। लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन के सहायक प्रोफेसर राचेल लोवे के मुताबिक, गर्म मौसम डेंगू के लिए उपयुक्त होता है। वैज्ञानिकों ने 1920 में वोल्बाचिया बैक्टीरिया को हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के ड्रेनेज सिस्टम में रहने वाले मच्छरों से खोजा था। सिंगापुर और मलेशिया में अभी केवल नर मच्छरों पर वोल्बाचिया बैक्टीरिया का प्रयोग किया जा रहा है।

दिव्यांग वैज्ञानिक ने स्मार्ट छड़ी बनाई, बोलकर बताती है रास्ता

एक बार चार्ज होने पर 5 घंटे तक काम करती है 

तुर्की के दिव्यांग वैज्ञानिक कुर्सत सेलन ने आंखों की रोशनी खो चुके लोगों के लिए स्मार्ट छड़ी डिजाइन की है। मॉडर्न तकनीक से लैस यह छड़ी दिव्यांगों को बोलकर रास्ता बताती है। इसे वीवॉक नाम दिया गया है। यह छड़ी रास्ते में आने वाली दुकानों और इमारतों के बारे में भी जानकारी देती है। इसमें कई एडवांस्ड सेंसर लगे हैं, जो रास्ते में किसी भी तरह की बाधा आने पर यूजर को अलर्ट करते हैं। सेलन यंग गुरू अकादमी के को-फाउंडर है। स्मार्ट तकनीक से लैस वीवॉक दिव्यांगों को आसपास के चीजों के बारे में बोलकर बताती है। यह बिल्ट-इन स्पीकर, स्मार्टफोन इंटिग्रेशन सिस्टम के अलावा कई तरह के सेंसर से लैस है, जो बाधा होने पर यूजर को अलर्ट करते हैं। वीवॉक डिवाइस में एक इलेक्ट्रॉनिक हैंडल लगा है। यह अल्ट्रासॉनिक सेंसर की मदद से पैर से सीने तक आने वाली किसी भी तरह की बाधा को पहचान लेता है और हैंडल में वाइब्रेशन कर यूजर को अलर्ट करता है। यूजर इसे स्मार्टफोन से कनेक्ट कर सकते हैं। यह गूगल मैप और वॉयस असिस्टेंट फीचर को सपोर्ट करती है। इसमें लगे बिल्ट-इन स्पीकर यूजर को रास्ते में आने वाले दुकानों और इमारतों के बारे में बोलकर बतातें हैं, जिसे वह देख नहीं सकते।

वीवॉक ओपन प्लेटफार्म तकनीक पर आधारित है, यानी इसे किसी भी थर्ड पार्टी ऐप के जरिए स्मार्टफोन से कनेक्ट किया जा सकता है। इसकी नेवीगेशन क्षमता को और बेहतर बनाने के लिए इसे राइडिंग ऐप और ट्रांपोर्टेशन सर्विस से जोड़ने पर भी विचार किया जा रहा है। यह एंड्रॉयड और आईओएस दोनों तरह के डिवाइस के साथ काम करेगा है। इसमें यूएसबी इन्पुट है, जिसकी मदद से इसे चार्ज किया जा सकता है। फुल चार्ज होने पर इसे 5 घंटे तक इस्तेमाल किया जा सकता है। इसकी कीमत लगभग 35 हजार रुपए है।

संगीत के माध्यम से यहाँ 108 साल से सिखायी जा रही है हिन्दी

मसूरी : गाना गाकर हिंदी सिखाने वाला यह देश का सबसे पुराना और अनोखा भाषा स्कूल है।  करीब 108 साल पुराना। यहाँ हर साल 200 विदेशी हिन्दी सीखने आते हैं. वैसे तो इस स्कूल में हिन्दी के अलावा पंजाबी, उर्दू, संस्कृत और गढ़वाली भाषा भी सिखाई जाती है लेकिन 80-90% हिंदी सीखने वाले ही होते हैं। फिलहाल यहाँ 17 शिक्षक हैं. ये स्कूल एक अलग ही संसार है, जहाँ विदेशी हिंदी, उर्दू, संस्कृत सीखने आते हैं और तीन सप्ताह से तीन महीने तक यहाँ गुजारते हैं.

किसने बनवाया
शुरुआत में यह स्कूल अंग्रेजों ने मिशनरीज के लिए बनवाया था। अंग्रेजों के जाने के बाद भी कई साल तक सिर्फ मिशनरीज को ही दाखिला दिया जाता था। अब इस स्कूल का संचालन एक बोर्ड करता है. यहां आने वालों में शोधकर्ता, दूतावास में काम करने वाले कर्मचारी, राजदूत और फिल्मी सितारे होते हैं। दाखिला लेने वालों की उम्र 18 से लेकर 90 साल तक है. सबसे ज्यादा हिंदी सीखने वाले अमेरिका से होते हैं.

स्कूल में रिकॉर्डिंग की खास व्यवस्था
हिंदी सिखाने के लिए स्कूल में रिकॉर्डिंग की खास व्यवस्था है। छात्र इसी रिकॉर्डिंग से सीखते हैं. दरअसल हम भाषा जितनी ज्यादा सुनते हैं, उतनी ही जल्दी सीखते भी हैं। आम स्कूल पहले लिखना-पढ़ना सिखाते हैं, लेकिन यहां पहले बोलना, फिर व्याकरण और फिर लिखना सिखाया जाता है. यही नहीं, शिक्षकों ऐसे तरीके ईजाद करने की कोशिश करते हैं, जिससे सीखना उबाऊ न हो। हर दिन 4 घंटे पढ़ाई होती है. हर घंटे की फीस 385 से 653 रुपये तक है।

50 हजार का बिल देख पंचायत खुद ही बिजली बनाने लगी, अब इसे बेचकर 19 लाख कमा रही

ओड़नथुरई : कोयम्बटूर से 40 किमी दूर ओड़नथुरई पंचायत के आत्मनिर्भर बनने की कहानी अनोखी है। यहां के 11 गाँवों में हरेक घर पक्का है। छत पर सोलर पैनल लगे हैं। कन्क्रीट से बनी सड़कें हैं। हर 100 मीटर पर पीने के पानी की व्यवस्था है और हर घर में शौचालय भी है। ओड़नथुरई ग्राम पंचायत न सिर्फ अपनी जरूरत की बिजली खुद बनाती है, बल्कि उसे तमिलनाडु इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड (टीएनईबी) को बेचती भी है। इससे सालाना 19 लाख रुपए की कमाई होती है। ऐसा करने वाली यह देश की एकमात्र पंचायत है। सभी घरों में बिजली मुफ्त है। इन्हीं खूबियों के कारण विश्व बैंक के विशेषज्ञ, देशभर के सरकारी अफसर और 43 देशों के छात्र गांव देखने आ चुके हैं। बदलाव की यह कहानी 23 साल पहले शुरू हुई थी। तब छोटी-छोटी झोपड़ियों वाले गांव गरीबी और असुविधाओं में फंसे थे।
आर. षणमुगम इस बदलाव के प्रणेता
1996 में ग्राम प्रमुख रहे आर. षणमुगम इस बदलाव के प्रणेता बने। वे बताते हैं- ‘उस वक्त हर महीने पंचायत का बिजली बिल 2000 रुपए आता था। अगले एक साल में पंचायत में कुएं बनवाए, स्ट्रीट लाइट लगवाई, तो यह बिल 50 हजार रुपए पहुंच गया, जिसने चिंता बढ़ा दी। इस बीच, पता चला कि बायोगैस प्लांट से बिजली बन सकती है। तब बड़ौदा जाकर इसकी ट्रेनिंग ली। 2003 में पहला गैस प्लांट लगवाया। नतीजतन बिजली बिल आधा रह गया। फिर दो गांवों में सौर ऊर्जा से चलने वाली स्ट्रीट लाइट्स लगवाईं।’ 2006 में षणमुगम को पवनचक्की लगाने का विचार आया, लेकिन पंचायत के पास सिर्फ 40 लाख रुपए का रिजर्व फंड था, जबकि पवनचक्की टरबाइन 1.55 करोड़ रुपए की थी। षणमुगम ने पंचायत के नाम पर बैंक से लोन लेकर ओड़नथुरई से 110 किमी दूर 350 किलोवॉट की पवनचक्की लगवाई। इसकी मदद से पूरा गांव बिजली के मामले में आत्मनिर्भर हो गया, लेकिन पंचायत के शेष 10 गांवों केे लोग अब भी राज्य बिजली बोर्ड पर निर्भर थे। तब षणमुगम ने एकीकृत सौर और पवन ऊर्जा प्रणाली अपनाई। हर घर की छत पर सोलर पैनल लगाए गए। घरों में दिन में बिजली सोलर पैनल से मिलती है और रात में पवनचक्की से। बैंक से लिया लोन पंचायत ने 7 साल में चुका दिया। अब सालाना 7 लाख यूनिट बिजली बन रही है। जरूरत 4.5 लाख यूनिट में पूरी हो जाती है। बची 2.5 लाख यूनिट टीएनईबी को 3 रुपए प्रति यूनिट पर बेच दी जाती है। बिजली में आत्मनिर्भर होने पर गांव की तरक्की के और रास्ते भी खुल गए हैं।
बिजली बनाने से अंधेरा दूर, जीवन भी रोशन
आज पंचायत बिजली बिक्री से लगभग 19 लाख रु. सालाना कमाती है। यह राशि 11 गांवों के विकास में खर्च होती है। राज्य सरकार की सोलर पावर्ड ग्रीन हाउस स्कीम के तहत 950 घर बनाए गए हैं। ढाई-ढाई लाख रुपए की लागत से ये घर 300 वर्ग फीट क्षेत्र में बने हैं।
(साभार – दैनिक भास्कर)

बेटियों को बढ़ावा देने के लिए एंड संस की जगह शुरू की फादर-डॉटर्स एंड कम्पनी

ग्वालियर : जिले में 1000 बेटों के अनुपात में 849 बेटियां हैं। यह लिंगानुपात प्रदेश के औसत लिंगानुपात 918 से कम है। इन गंभीर हालातों के बीच सिटी सेंटर में कारोबार करने वाले उजाला गुप्ता का एक प्रयास सुकून देने वाला है। उन्होंने कंपनियां बनाने की सामान्य अवधारणा एंड संस और एंड ब्रदर्स से बाहर निकलकर अपनी फर्म का नाम फादर डॉटर्स एंड कम्पनी रखा है। हर महीने लगभग 25 से 30 लाख रुपये का कारोबार करने वाले गुप्ता इसी नाम से डिपार्टमेंटल स्टोर्स की चेन शुरू करने की योजना रखते हैं। इनके कर्मचारियों में भी महिलाओं की संख्या ज्यादा है। कारोबारी उजाला गुप्ता ने फर्म फादर डॉटर्स एंड कम्पनी फर्म 3 साल पहले शुरू की थी। इससे पहले इनके पिता की कंपनी एमडी एंड संस थी। उजाला, 4 भाई हैं। इस आधार पर ही फर्म का नाम रखा गया था। इसके बाद सभी भाइयों ने अपना-अपना कारोबार बढ़ाना शुरू किया तो उन्होंने कैलाश विहार सिटी सेंटर में दो मंजिला डिपार्टमेंटल स्टोर शुरू किया। गुप्ता कहते हैं कि उनकी 3 बेटियां हैं। खुशी कक्षा 11वीं, परिज्ञा 9वीं और ऊर्जा गुप्ता कक्षा 2 में पढ़ती है। बड़ी बेटी अब काम में भी हाथ बंटाने लगी हैं। श्री गुप्ता ने खुद कक्षा 11 तक ही पढ़ाई की है, लेकिन वह अपनी बेटियों को उच्च शिक्षा दिलवाएंगे। कारोबार भी बेटियों को ही संभालना है। कलेक्टर अनुराग चौधरी ने भी इस दुकान को अपने फेसबुक पेज पर शेयर किया है। इसमें कलेक्टर ने लिखा है ग्वालियर बदल रहा है, हमेशा एंड ब्रदर्स और एंड संस ही देखा था। अब फादर डॉटर्स एंड कंपनी।

बप्पा की दुर्दशा न हो, इसलिए नहर-तालाब से मूर्तियां निकालकर करते हैं पुनर्विसर्जन

सूरत : गणपति बप्पा का अपमान न हो, इसलिए शहर के 150 युवाओं का ग्रुप नहर, तालाब से मूर्तियां निकालकर उन्हें समुद्र में विसर्जित करता है। ये युवा दो दिन में 2500 मूर्तियां निकालकर उनका ससम्मान समुद्र में विसर्जन कर चुके हैं। इस प्रक्रिया में जो खर्च होता है वह ये युवा अपनी जेब से करते हैं। यह ग्रुप पिछले दो साल से यह काम कर रहा है। उनका उद्देश्य लोगों में धर्म के प्रति जागरूकता लाने का है। इनका मानना है कि लोग गणपति बप्पा की मूर्ति का विसर्जन करते समय धर्म और आस्था का खयाल रखें। शनिवार को युवाओं ने डिंडोली और खरवासा में अलग-अलग जगहों से गणेश प्रतिमाओं को जमा किया और उन्हें ट्रक से ले जाकर समुद्र में विसर्जित किया। नहरों-तालाबों व अन्य जगहों से गणेश प्रतिमाओं को जमाकर समुद्र विसर्जित करने का काम 2 वर्ष पहले शुरू किया था। ग्रुप के मुताबिक अब तक 5 हजार से ज्यादा मूर्तियों का विसर्जन समुद्र कर चुके हैं। इन युवाओं का कहना है कि हमें अपनी बात किसी को समझाने के लिए करके दिखाना ही सबसे अच्छा माध्यम है, इसलिए हमारा यह काम जारी रहेगा।

नौकरी माँगने पहुंचे 12 दिव्यांग, डीएम ने कलेक्ट्रेट परिसर में ही खुलवा दिया ‘कैफे एबल’ 

थूथुकुडी : तमिलनाडु के थूथुकुडी जिला परिसर में खुले ‘कैफे एबल’ से 12 दिव्यांगों को रोजगार मिला है। दरअसल, पिछले दिनों 12 दिव्यांग कलेक्टर संदीप नंदूरी के पास नौकरी माँगने पहुंचे थे। दिव्यांगों से बातचीत के दौरान डीएम उनसे प्रभावित हुए और उन्हें कलेक्ट्रेट परिसर में ही कैफे खुलवाने का प्रस्ताव दिया और वे मान गए। सभी दिव्यांग आराम से काम कर सकें, इसलिए उन्हें 45 दिन की होटल मैनेजमेंट की ट्रेनिंग भी दिलवाई गई। अब यहां 12 दिव्यांग काम कर रहे हैं। इनमें से 11 लोकोमोटर दिव्यांग हैं।

उनके पैर चलने-फिरने की हालत में नहीं हैं जबकि एक सदस्य को सुनाई नहीं देता। अब डीएम संदीप नंदूरी अक्सर यहीं अपनी मीटिंग करते हैं। साथ ही खाना भी खाते हैं। डीएम संदीप नंदूरी बताते हैं- ‘मुझे अक्सर दिव्यांगों से नौकरियों के लिए याचिकाएं मिलती थीं, लेकिन सभी को सरकारी नौकरी देना संभव नहीं है। इसलिए हमने एक कैफे खोलने के विचार के साथ उन्हें अपना उद्यम चलाने में सक्षम बनाने का फैसला किया। कैफे की एक दिन की कमाई 10 हजार रु. है। कैफे की कमाई बैंक में जमा होती है। यहीं से दिव्यांगों को वेतन दिया जाता है।

पेरू में बच्चों के लिए बनाया लकड़ी का लैपटॉप

15 साल चलेगा, ढांचा भी बदला जा सकेगा

पेरू की वावालैपटॉप टेक्नोलॉजी कम्पनी ने नई और सस्ती तकनीक से बना लकड़ी का लैपटॉप लॉन्च किया है। यह काफी सस्ता है और आसानी से इसकी मरम्मत की जा सकेगी। इसे वावालैपटॉप नाम दिया गया है। कम्पनी का दावा है कि इसे 15 से 20 साल तक इस्तेमाल किया जा सकेगा। वावालौपटॉप पेरू के दूरदराज इलाकों में रहने वाले लोगों और बच्चों के लिए तैयार किया गया है।यह वजन में भी काफी हल्का है।
2015 में इसका सिर्फ प्रोटोटाइप पेश किया गया था लेकिन 2019 में 2.0 वर्जन के साथ इसे लकड़ी के साथ बनाया गया। मुफ्त लाइनेक्स ऑपरेटिंग सिस्टम से संचालित होने वाले इस वावालैपटॉप को हाल ही में बाजार में उतारा गया।
यह पेरू के उन लोगों के लिए तैयार किया गया है, जो शहरों से दूर रहते हैं इसलिए इसकी कीमत काफी कम रखी गई है। इसकी कीमत 17 हजार रुपए रखी गई है। हालांकि, भारत में इसे बेचा जाएगा या नहीं, इस बात की जानकारी कंपनी ने नहीं दी। कम्प्यूटर और मार्केटिंग एक्सपर्ट्स ने मिलकर एसबीसी (एकल बोर्ड कम्प्यूटर) बनाया और इसे लकड़ी के केस में फिट किया है। इसकी मरम्मत भी आसानी से की जा सकेगी और अगर कोई इसकी बॉडी में कोई बदलाव करना चाहे तो वो भी आसानी से संभव है।
कम्प्यूटर इंजीनियर और वावालैपटॉप टेक्नोलॉजी के मैनेजर जेवियर क्रास्को के मुताबिक, ‘‘हमें ये महसूस हुआ कि लोगों को कुछ नया देने की बजाए उन्हें पुराना लौटाया जाए। इसलिए एकल बोर्ड कम्प्यूटर का इस्तेमाल कर पहला लैपटॉप बनाया।’’
क्रास्को ने बताया कि ‘हमने खासतौर पर बच्चों को ध्यान में रखकर इसे डिजाइन किया है। तीसरी और चौथी क्लास के बच्चे हर वक्त अपने साथ रख सकते हैं और जब ये बच्चे बड़ी क्लास में जाएं तो इसे 3.0 और 4.0 वर्जन के साथ अपग्रेड कर सकते हैं। लकड़ी से बने होने कारण यह प्रकृति और मानव इंद्रियों को काफी कम नुकसान पहुंचाएगा। क्रास्को फिलहाल इसे पेरू से बाहर लॉन्च करने पर विचार नहीं कर रहे हैं। इसे सौर और रेग्युलर (बिजली) दोनों ही तरीकों से चार्ज किया जा सकेगा। इसकी बॉडी को जब चाहे बदला जा सकेगा यानी आप जब एक डिजाइन से बोर हो जाएं तो बड़ी आसानी से इसकी बॉडी बदल सकते हैं और ये लगातार 15 सालों तक साथ दे सकता है।

अमेरिका में भारतवंशी दम्पति ने मेडिकल कॉलेज को दिए 1775 करोड़ रुपये

फ्लोरिडा : भारतवंशी चिकित्सक दम्पति किरन सी पटेल व पल्लवी पटेल ने बड़ा दान दिया है। पटेल दम्पति ने के फ्लोरिडा प्रांत में तैयार मेडिकल कॉलेज को 25 करोड़ डॉलर यानी 1775 करोड़ रुपये का दान दिया है। किसी भारतवंशी द्वारा अमेरिका में दिया गया यह अब तक का सबसे बड़ा दान है। नोवा साउथ ईस्टर्न यूनिवर्सिटी (एनएसयू) के तंपा बे स्थित नए मेडिकल कॉलेज का उद्घाटन डॉक्टर दम्पति के हाथों हुआ। जांबिया में जन्मे व भारत में पढ़ाई करने वाले डॉक्टर किरन पटेल ह्रदय रोग विशेषज्ञ हैं। जबकि पत्नी डॉक्टर पल्लवी पटेल बाल रोग विशेषज्ञ हैं। नया मेडिकल कॉलेज तीन लाख वर्ग फीट के क्षेत्र में बनाया गया है, जो एनएसयू के चार अन्य कॉलेजों का सेटेलाइट केंद्र भी रहेगा। इनमें दम्पति के नाम पर बने डॉक्टर पल्लवी पटेल कॉलेज ऑफ हेल्थकेयर साइंसेज और डॉक्टर किरन सी पटेल कॉलेज ऑफ ओस्टियोपैथिक मेडिसिन शामिल हैं। उद्घाटन के होना निराला है। लोगों की जिंदगी में परिवर्तन लाने को सक्षम होना मेरे लिए एक सम्मान की बात है।’ नए कॉलेज में ओस्टियोपैथिक मेडिसिन की पढ़ाई शुरू हो चुकी है।