Thursday, April 23, 2026
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मुस्लिम भाईयों ने ‘अंकल’ का हिंदू रीति-रिवाज से किया दाह संस्कार

 अमरेली : गुजरात से मानवता की मिसाल वाला अनोखा उदाहरण देखने को मिला है। राज्य के अमरेली जिले के सवरकुंडला शहर में तीन मुस्लिम भाईयों ने अपने पापा के ब्राह्मण दोस्त की मौत पर उनका पूरे हिंदू रीति-रिवाज के साथ दाह संस्कार किया। जैसा कि वह चाहते थे।
इन मुस्लिम भाईयों के अंकल का नाम भानुशंकर पांड्या था और उनका कोई परिवार नहीं था। वह कई सालों से मुस्लिम परिवार के साथ रह रहे थे। उनका दाह संस्कार करने वाले मुस्लिम भाईयों का नाम अबु, नजीर और जुबैर कुरैशी हैं। उनका परिवार काफी रूढ़िवादी है और वह दिहाड़ी मजदूरी करते हैं। वह दिन में पाँच बार नमाज पढ़ते हैं और आज तक कभी रमजान का उपवास नहीं छोड़ा है। पांड्या की मौत के बाद उनका दाह संस्कार करने के लिए शनिवार को उन्हें धोती पहनने और जनेऊ धारण करने के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। जुबैर ने कहा, ‘जब भानुश्कर अकंल मृत शय्या पर थे तो हमने उनके लिए हिंदू परिवार से गंगा जल मांगा। हमने अपने पड़ोसियों को बताया कि हम ब्राह्मण परिवार के अनुसार उनका अंतिम संस्कार करना चाहते हैं। हमें बताया गया कि अर्थी उठाने के लिए जनेऊ धारण करना जरूरी होता है। हम इसके लिए राजी हो गए।’
नसीर के बेटे अरमान ने चिता को अग्नि दी। नसीर ने कहा, ‘हम 12वें दिन अरमान का सिंर मुंडवाएंगे क्योंकि हिंदू इस रिवाज को मानते हैं।’ इन भाईयों के पिता का नाम भिखू कुरैशी था। उनकी और पांड्या का मुलाकात 40 साल पहले तब हुई थी जब वह मजदूर थे। कुरैशी की तीन साल पहले मौत हो गई। जिससे पांड्या टूट गए थे। अबु ने कहा, ‘पांड्या अकंल का परिवार नहीं था। इसलिए जब कई साल पहले उनका पैर टूटा तो हमारे पिता ने उन्हें हमारे साथ रहने को कहा। वह हमारे परिवार का हिस्सा बन गए। नसीर ने कहा, ‘हमारे बच्चे उन्हें दादा कहकर बुलाते थे और हमारी पत्नियां उनके पैर छूकर आशीर्वाद लेती थीं। अंकल पूरे दिल से ईद का त्योहार मनाते थे। वह बच्चों के लिए कभी तोहफे लाना नहीं भूलते थे।’ जब तक भानुशंकर जिंदा रहे कुरैशी के परिवार ने उनके लिए हमेशा शाकाहारी खाना बनाया। अमरेली जिले के ब्रह्म समाज के उपाध्यक्ष पराग त्रिवेदी ने कहा, ‘हिंदू रीति-रिवाजों से भानुशंकर का  अंतिम संस्कार करने से अबु, नसीर और जुबेर ने सांप्रदायिक सौहार्द की एक मिसाल कायम की है।’

विज्ञान और अंतर्ज्ञान

राखी राय हल्दर

प्राचीन काल में अध्यात्म, प्रकृति, विज्ञान की अवधारणाओं में भेद नहीं था। मनुष्य को सृष्टि के अंग के रूप में देखा जाता था। आत्मा, प्राण, प्रकृति और मनुष्य के संबंध के स्वरूप जैसे गंभीर विषयों पर उस युग में मनन चिंतन हुआ। अंतर्ज्ञान को खास महत्व दिया गया। अंतर्ज्ञान से पैदा होने वाली चेतना के ठीक विपरीत थी विवेक प्रधान चेतना। विवेक प्रधान ज्ञान किसी घटना, प्रक्रिया या वस्तु पर निर्भर होती है। इसलिए बौद्ध उसे निर्भरशील ज्ञान का दर्जा देते हैं और अंतर्ज्ञान को पूर्ण ज्ञान का दर्जा। उपनिषद में इस पूर्ण ज्ञान की व्याख्या कुछ इस प्रकार मिलती है: “वह जो शब्दहीन, स्पर्शहीन, निराकार, अंतहीन, स्वादहीन, शाश्वत गंधहीन है। जिसका कोई आदि या अंत नहीं, जो महान से भी उच्च है, उसे जानने से मृत्यु के मुँह से बचा जा सकता है। ऐसे अनुभव से प्राप्त ज्ञान पूर्ण है।” (कठोपनिषद 3.15)
पृथकीकरण, विभाजन, तुलना, तौलना, वर्गीकरण करना बुद्धि और तर्क पर आधारित चेतना के प्रमुख लक्षण हैं। यह चेतना सत्य को अलग-लग कटघरों में बाँटकर विश्व की प्रकृति को समझने की कोशिश करती है। विज्ञान इसी चेतना की उपज है। दुनिया में असंख्य आकार की वस्तुएँ, संरचनाएँ और प्रक्रियाएँ मौजूद हैं। इन सबके लिए अलग-अलग वर्ग निर्धारित करना असंभव है। ऐसे में बुद्धि इनमें से जो अधिक प्रासंगिक और स्पष्ट है उन्हें चुनकर क्रम में रखने, अवधारणाएँ रचने और उनके लिए चिन्ह निर्धारित करने का काम करती है। इस प्रकार विवेक प्रधान ज्ञान प्रकृति के खास लक्षणों या प्रक्रियाओँ के चुनाव पर ही आधारित होता है। इसलिए इस ज्ञान से पैदा होने वाले हर शब्द की अपनी सीमाएँ हैं पदार्थ विज्ञानी वर्नर हाईजेनवर्ग पदार्थ विज्ञान के शब्दों के संबंध में कहते हैं, ‘शब्द और अवधारणाएँ जितनी स्पष्ट दिखाई देती हैं उनका प्रयोग क्षेत्र उतना ही सीमित होता है।”
दरअसल अंतर्ज्ञान से पैदा होने वाली आत्मचेतना प्रकृति की हकीकत को सीधे अंतर्दृष्टि के जरिए महसूस करती है। जबकि पदार्थ विज्ञान प्रयोग के जरिए प्राकृतिक प्रक्रियाओं का निरीक्षण करके प्रकृति की हकीकत को समझता है। देखने की सीमाएँ यहाँ ज्ञान की सीमाएँ बन जाती हैं। इस तरह विज्ञान सत्य को संपूर्ण रूप से नहीं बल्कि उसके अंश को ही पकड़ पाता है। मसलन, न्यूटन के क्लासिकल मैकानिक्स को ही देखा जा सकता है। इस मॉडल में वायु की प्रतिरोध शक्ति ‘फ्रिक्सन’ के प्रभाव की उपेक्षा की गई है। बावजूद इसके यह मॉडल लंबे समय तक प्रकृति की प्रक्रिया को जानने के सबसे बेहतरीन सिद्धांत के रूप में विज्ञान के जगत पर छाया रहा। विद्युत और चुम्बकीय प्रक्रिया के लिए इस मॉडल में कोई जगह नहीं थी क्योंकि तब ये प्रक्रियाएँ आविष्कृत नहीं हुई थीं। इनके आविष्कार ने यह साबित किया कि न्यूटन का सिद्धांत अधूरा है। जिस वस्तु में भारी संख्या में परमाणु हैं और जिनकी गति आलोक गति से कम है उन पर यह सिद्धांत चल सकता है पर जिनकी गति आलोक गति से ज्यादा है वहाँ क्वांटम सिद्धांत से ही काम लेना पड़ेगा। अफसोस की बात यह है कि विद्यालय स्तर से लेकर महाविद्यालय स्तर तक क्वांटम सिद्धांत को पाठ्यक्रम में आवश्यक जगह नहीं मिल पाई है। इसके अभाव में प्रकृति के संबंध में विद्यार्थियों का ज्ञान भी अधूरा होगा।
गणित भी अवधारणाओं और चिह्नों की व्यवस्था के जरिए सत्य का मानचित्र तैयार करने की कोशिश करता है। दरअसल गणितज्ञ सत्य से संबंधित सूचनाओं को चिह्नों का रूप देकर फॉर्मूलों में अटाता है। और फिर इन्हें बोधगम्य बनाने के लिए पन्नों पर पन्ना लिखता है। गौर से देखें तो फॉर्मूलों में सत्य को चिह्नों का रूप देकर उन्हें भाववाचक बनाया जाता है। इसे बुद्धिजीवी तो समझ लेता है लेकिन सत्य को बाँधकर, काटकर फॉर्मूलों के कैप्सूल में भरने की वजह से वह यथार्थ जगत और जन साधारण से कट जाता है। दरअसल गणित की भाषा हमें उस मुकाम तक ले गई है जहाँ सत्य को अभिव्यक्त करने वाले चिह्नों को समझना दुरूह हो गया है। यही कारण है कि उन्हें व्याख्यायित करने के लिए आज शब्दों की जरूरत पड़ रही है। अलग-अलग ढंग से इनकी व्याख्याएँ हो रही हैं और ये व्याख्याएँ संकेतों को अवधारणाओं की व्याख्या के जरिए डीकोड करके सत्य का एहसास दिलाने वाली दृष्टि पैदा करने की कोशिश में लगी हैं। इस दृष्टि में फ़ॉर्मूलों जैसी सटीकता नहीं होती। गणित की ऐसी व्याख्या दर्शनशास्त्र के मॉडलों के समान ही सत्य की छवि आंकती है। यही वह बिन्दु है जहाँ विज्ञान और दर्शन के मॉडल एक ही जमीन पर खड़े दिखाई देते हैं।
पिछले हजार वर्षों में बौद्धिक ज्ञान के विस्तार और मानवता के स्खलन ने इस बात को प्रमाणित कर दिया है कि अंतर्ज्ञान के बगैर मानवता का पाठ पढ़ाना मुश्किल है। अंतर्ज्ञान हासिल करना दरअसल चेतना की असमान्य अवस्था में बुद्धि से परे जाकर सत्य का अनुभव हासिल करना है। बुद्धि के संदेह, तर्क जैसे हथियार लड़ने भिड़ने की जमीन तैयार करते हैं। लेकिन अंतर्ज्ञान के अभाव में लड़ने भिड़ने के हथियारों के जरिए ही बचना संभव है, यह भी अकाट्य सत्य है। बौद्धिक चेतना को ही आधुनिक युग में उत्कृष्ट चेतना का दर्जा दिया जाता है। अगर यही चेतना उत्कृष्ट होती तो बुद्धिजीवियों में अलग-अलग किस्म के मानसिक विकार न मिलते। दरअसल चेतना के कई प्रकार हैं। इस संदर्भ में विलियम जेम्स अपनी पुस्तक ‘द वेराइटीज ऑफ रिलीजियस एक्सपीरियेन्सेस में कहते हैं –
“हमारी तथाकथित साधारण जगत चेतना, बुद्धि सम्पन्न चेतना केवल एक तरह की चेतना है। जबकि उससे अलग परदे के पीछे चेतना के अलग-अलग शक्तिशाली रूप मौजूद हैं।” अंतर्ज्ञान शक्तिशाली चेतना की ही उपज है।
अतंर्ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र में भी खास भूमिका निभाता है। विज्ञान में शोध के क्षेत्र में बुद्धि के प्रयोग का प्रश्न तब तक नहीं आता जब तक वैज्ञानिक का अंतर्ज्ञान इसे इस क्षेत्र में बुद्धि के प्रयोग की अतंर्दृष्टि नहीं देता। यही सृजनात्मकता की जमीन है। इस अंतर्दृष्टि की यह खासियत है कि यह एकाएक जगती है। कलम कागज लेकर बुद्धि पर दबाव डालने वाले हालात में यह पैदा नहीं होती। बल्कि ध्यान केन्द्रित बौद्धिक गतिविधि के बाद आराम के पलों में यह अतंर्ज्ञान स्वत: स्फुरित होता है। जैसे बादलों को चीरकर सूरज निकलता है। ठीक उसी तरह जिस तरह न्यूटन को गिरते हुए सेव को देखकर पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति पर सोचने की दृष्टि मिली थी। इसे पाने का आनंद दुगना होता है। पदार्थ विज्ञान की सबसे बड़ी सीमा यह है कि उपर्युक्त अंतर्ज्ञान से प्रेरित दृष्टि का यहाँ तब तक कोई महत्व नहीं जब तक उसे गणित की भाषा में प्रमाणित करके शब्दों में उसका विश्लेषण न किया जा सके। अत: विवेक जब तक अनुभूत सत्य के होने का प्रमाण नहीं जुटा पाता तब तक विज्ञान उस सत्य को अपने इलाके में प्रवेश करने नहीं देती। इस न्याय से देखें तो बुद्धि को अंतर्ज्ञान की अनुगामिनी मानना चाहिए। लेकिन आधुनिक समाज में बौद्धिक चेतना और विज्ञान का ऐसा बवंडर खड़ा कर दिया गया है कि अंतर्ज्ञान का मुद्दा पीछे चला गया। मनुष्य अपनी आत्मशक्ति से ही पहचाना जाता है। आत्म तत्व से अभिन्न रूप से जुड़े अंतर्ज्ञान के न जग पाने के कारण ही आज का मनुष्य मानसिक स्तर की विकृतियों का शिकार होकर कष्ट भोग रहा है। इस लिहाज से देखें तो अंतर्ज्ञान के विकास की शिक्षा इस युग की बहुत बड़ी माँग है।

नं. 2, देशबन्धु नगर
पो. – सोदपुर,
कोलकाता – 700110
दूरभाष – 9231622659

खाने का मूड नहीं है…

चित्र – उत्कर्ष जायसवाल, पूर्वान्चल विद्यामंदिर, कक्षा – 5

स्त्री सशक्तिकरण के लिए एकमात्र शिक्षा ही विकल्प : स्पर्शिता गर्ग

कोलकाता : भवानीपुर एडुकेशन सोसायटी कॉलेज की विमेन्स सेल और पॉलिटिकल साइंस की इंटरनल कम्प्लेंट कमेटी के तत्वावधान में राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया गया जिसका विषय “पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री सशक्तीकरण” के विभिन्न पहलुओं पर आधारित रहा। भवानीपुर कॉलेज की टीआईसी डॉ. सुचंद्रा चक्रवर्ती ने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का उद्धाटन किया ।विशिष्ट अतिथियों में स्पर्शिता गर्ग (प्रथम श्रेणी ज्यूडिशियल सर्विसेज मजिस्ट्रेट, असम, सोंतिपुर, तेजपुर, असम) एवं सुष्मिता बसु (सलाहकार, फैमिली, काउंसिलिंग स्टडीज़,EMLHIRST, इंस्टीट्यूट ऑफ कम्युनिटी स्टडीज़, शांतिनिकेतन) ने भी उद्घाटन सत्र में भाग लिया। प्रथम सत्र की अध्यक्षता करते हुए मजिस्ट्रेट श्रीमती स्पर्शिता गर्ग ने “स्त्री सशक्तिकरण में शिक्षा की भूमिका” विषय पर प्रकाश डाला। उन्होंने अपने अनुभवों, रोजमर्रा जीवन में स्त्रियों की स्थितियां, कानूनी और कोर्ट से संबंधित पक्षों और समस्याओं के विषय पर विस्तार चर्चा की। निष्कर्ष में बताया कि महिलाओं का सशक्तीकरण बिना शिक्षा के असंख्य है। शिक्षित स्त्रियों को अपने अस्तित्व और अधिकारों के लिए कानूनी जानकारी की भी बहुत आवश्यक है। शिक्षा ही वह मूल मंत्र है जो स्त्रियों के सशक्तिकरण के लिए एकमात्र विकल्प है। सेमिनार के द्वितीय सत्र में अध्यक्षता की श्रीमती सुष्मिता बसु ने। फैमिली काउंसिलिंग सेंटर से जुड़ी बासु ने स्त्रियों के रोजमर्रा संघर्ष को रेखांकित करते हुए उनकी समस्याओं और विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की। विषय “महिलाओं के विकास की राह में आई बाधाएँ” के विभिन्न पहलुओं पर आधारित जमीनी स्तर पर महिलाओं की सुरक्षा, समस्याओं के बारे में जानकारी दी और कहा कि सरकार द्वारा दी गई कानूनी सहायता और उसे प्राप्त करने के तरीकों को भी जानना आवश्यक है। पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री के विकास के लिये अभी भी बहुत सी बाधाएं हैं जो उनकी स्वतंत्रता में बाधक हैं। बिना अच्छी सोच और विचारों के स्त्री को समुचित स्थान प्राप्त नहीं हो सकेगा। स्वागत भाषण में डॉ. सुचंद्रा चक्रवर्ती ने माया एंगलू की उक्ति से वक्तव्य की शुरुआत करते हुए कहा कि भारतीय परिप्रेक्ष्य में पितृसत्तात्मक समाज में आज भी स्त्रियां अपने अधिकारों के लिए लड़ रही हैं। समय के अनुसार समाज की सोच में बदलाव आ रहा है, स्त्रियां अभी भी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं। अधिक संख्या में विद्यार्थियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और इस सेमिनार में 160 से अधिक रजिस्ट्रेशन कराये गये। स्त्री विमर्श में शिक्षक – शिक्षिकाओं की भागीदारी रही। गार्गी गुंइया सेमिनार संयोजन में सक्रिय सहयोगी रहीं। डॉ देवजानी गांगुली ने धन्यवाद ज्ञापन दिया। इस कार्यक्रम की जानकारी डॉ. वसुंधरा मिश्र ने दी।

भारतीय भाषाओं के सहयोग से ही आगे बढ़ सकती है हिन्दी’

कोलकाता : राष्ट्रीय पुस्तकालय, कोलकाता में हाल ही में हिन्दी पखवाड़ा आयोजित किया गया। इसके समापन समारोह के अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित पश्चिम बंगाल पुलिस के महानिदेशक मृत्युन्जय कुमार सिंह उपस्थित थे। समारोह में विचार रखते हुए उन्होंने हिन्दी और भारतीय भाषाओं, विशेषकर बांग्ला के साथ हिन्दी के सम्बन्धों को सामने रखा। उन्होंने कहा कि एक भाषा को जानने का मतलब यह नहीं है कि दूसरी भाषा को नकारा जाये। हिन्दी की दुर्गति का कारण तत्सम शब्दों की अत्याधिक बहुलता है जिससे भाषा कठिन हो जाती है। सारी भाषाओं के सहयोग से हिन्दी आगे बढ़ सकती है। कार्यक्रम की अध्यक्षता राष्ट्रीय पुस्तकालय के विशेष कार्य अधिकारी डॉ. के. के. कोच्चुकोशी ने की। स्वागत भाषण हिन्दी कक्ष प्रभारी सुनील कुमार ने दिया। संचालन राष्ट्रीय पुस्तकालय के वरिष्ठ अधिकारी विनोद कुमार यादव ने किया। इस अवसर पर हिन्दी पखवाड़ा के दौरान आयोजित विभिन्न प्रतियोगिताओं के विजयी प्रतिभागियों को सम्मानित भी किया गया।

महाराजा मनीन्द्रचन्द्र कॉलेज में हिन्दी दिवस पर नवजागरण पर चर्चा

कोलकाता : महाराजा मनीन्द्रचन्द्र कॉलेज के हिन्दी विभाग द्वारा हाल ही में हिन्दी दिवस समारोह आयोजित किया गया। इस अवसर पर नवजागरण विषय पर एक संगोष्ठी आयोजित की गयी जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में पूर्व सांसद तथा कलकत्ता विश्वविद्यालय की हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. चन्द्रकला पाण्डेय उपस्थित थीं। संगोष्ठी में कलकत्ता विश्वविद्यालय के वनस्पति विभाग के प्रोफेसर डॉ. शान्तनु पाल, रवीन्द्र भारती विश्वविद्यालय के बांग्ला विभाग के प्रोफेसर सुरंजन दे, बांग्ला विभाग की अध्यापिका डॉ दीपानिता भट्टाचार्य, खिदिरपुर कॉलेज के हिन्दी विभाग की अध्यापिका महमूदा ख़नम ने विचार रखे। कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्ज्वलन से हुई। स्वागत भाषण कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ मंटूराम सामंत ने दिया। स्नातक के सभी छात्र-छात्राओं द्वारा रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम व काव्य आवृत्ति की गयी साथ ही सुमिता चट्टोराज की किताब नवजागरण का लोकार्पण चन्द्रकला पांडेय ने किया। हिन्दी में अच्छे अंक लाने के लिए राजेश सिंह, मुस्कान,तुलसी,रानी को विभाग की ओर से सम्मानित किया गया। कार्यक्रम का संचालन विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ सुमिता चट्टोराज ने किया। धन्यवाद विभाग के अतिथि प्रवक्ता धर्मेंद्र दास ने दिया। इस कार्यक्रम को सफल बनाने में विभाग के सभी विधार्थीयों का अवदान रहा विशेषकर राजेश सिंह, मुस्कान शर्मा,निशा शाह,सूरज शर्मा।

कविता और कहानी का अभिनयात्मक पाठ में दिखी युवाओं की प्रतिभा

कोलकाता :  लिटिल थेस्पियन एवं भारतीय भाषा परिषद के संयुक्त आयोजन में कहानी और कविता का अभिनयात्मक पाठ किया गया। इसमें ममता कालिया की कहानी ‘ बोलने वाली औरत ‘ कहानी की प्रस्तुति सुमित गोस्वामी, आर्यान्का पवार और जूही कुमारी करण ने दी I ममता कालिया की ‘ लड़के ‘ कहानी का अभिनयात्मक पाठ सुमित गोस्वामी, तन्मय सिंह, इम्तियाज़ आलम और अर्जुन बोस ने किया I कहानीकार उदय प्रकाश की कहानी “ डिबिया ” की प्रस्तुति प्रियंका पवार, नाज़ आलम और सदानन्द रजक ने दी I कहानी नेलकटर (कहानीकार – उदय प्रकाश) की प्रस्तुति राहुल कुमार भट्टाचार्य, अन्नपूर्णा वर्मा और अरशद सादिक ने दी I कविता पाठ में प्रताप सहगल की कविताएँ के साथ अंधेरे में घटना (इम्तियाज़ आलम), अंधेरे का तर्क (अन्नपूर्णा वर्मा), अंधेरे से लड़ाई (तन्मय सिंह), अंधेरे के सामने (आर्यान्का पवार), अंधेरे में सूत्रधार (अर्जुन बोस), अंधेरे का अर्थ (नाज़ आलम), अंधेरे में देखना (राहुल कुमार भट्टाचार्य) कुछ समझा आपने (सुमित गोस्वामी) सुनो अखबार (एक): सदानन्द रजक, सुनो अखबार (दो): प्रियंका पवार, सुनो अखबार (चार): अरशद सादिक, सुनो अखबार (पांच): जूही कुमारी करण ने पाठ किया I
भारतीय भाषा परिषद एवं लिटिल थेस्पियन द्वारा कहानी और कविता के अभिनयात्मक दक्षता का त्रैमासिक सर्टिफिकेट कोर्स संचालित किया जाता है I जिसकी कक्षा प्रति शनिवार लिटिल थेस्पियन की निर्देशक श्रीमती उमा झुनझुनवाला की निगरानी में होती है| गत 8 सितम्बर 2019 को सातवाँ सत्र के प्रशिक्षार्थियों द्वारा कहानी और कविता की अंतिम प्रस्तुति दी गयी। इस अवसर पर लिटिल थेस्पियन की सह संस्थापक व निदेशक उमा झुनझुनवाला ने कहा कि सिर्फ कविता-कहानी सिखाना मेरा मकसद नहीं है I कहीं कुछ इंसान हमारे बीच में बचा रहे वह आग जलाने के लिए मैं यह कर रही हूं I हमारे अंदर इंसान भी जीता है और इतिहास भी जीता है I इस प्रस्तुति के निर्णायक श्री दिनेश वडेरा रंगमंच निर्देशक और रावेल पुष्प (रंगमंच समीक्षक) थो

बोझ : साइबा पदम की शॉर्ट फिल्म

साइबा पद्म मूलत: पत्रकार हैं। एंकर हैं और साथ ही शॉर्ट फिल्में भी बनाती हैं। आप भी देखिए उनकी ताजा पंजाबी फिल्म बोझ..

भवानीपुर कॉलेज में ” खय्याम के बहाने” गीत ग़ज़ल और कविताओं की धूम

कोलकाता  : भवानीपुर एडूकेशन सोसायटी कॉलेज की आधुनिक लाइब्रेरी में विद्यार्थियों ने खय्याम के बहाने गीत ग़ज़ल और कविताएं पढ़ी। 19 अगस्त 2019 को बॉलीवुड के मशहूर पद्मभूषण से नवाजे संगीत रचनाकार खय्याम की याद में उनके गीतों और गजलों को गाकर विद्यार्थियों ने श्रद्धांजलि अर्पित की।”कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है”, ” इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं” , “ऐ दिले नादान” , “दिल चीज क्या है आप मेरी जान लिजिए” ,” मैं पल दो पल का शायर हूँ” ,” फिर छिड़ी रात फूलों की” , “मीठी मीठी प्यारी-प्यारी” , “जिंदगी जब भी तेरी बज्म में लाती हैं हमें ये जमीं चाँद सी बेहतर नज़र आती है हमें “जैसे प्रसिद्ध गीतों की प्रस्तुति विद्यार्थियों और शिक्षक – शिक्षिकाओं द्वारा की गई।
मोहम्मद ज़हुर खय्याम ने 250 से अधिक लोकप्रिय गीतों, गजलों और नग़मो की संगीत रचना की। चार दशकों से बॉलीवुड फिल्मों में म्युजिक कम्पोजर रहे खय्याम ने अपने कॅरियर की शुरुआत 1948 में हीर – रांझा फिल्म में शर्मा नाम से संगीत देकर किया। पत्नी जगजीत कौर भी गायिका हैं।1953 फुटपाथ फिल्म से खय्याम नाम से प्रसिद्ध हुए और फिर उमराव जान, थोड़ी सी बेवफाई, रजिया सुल्तान, नूरी, बाजार जैसी लोकप्रिय फिल्मों के संगीत को लोकप्रियता मिली। सर्वश्रेष्ठ संगीतकार, राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, फिल्म फेयर लाइफ एचीवमेंट पुरस्कार और 2011 में पद्म भूषण आदि अनेक पुरस्कारों से सम्मानित खय्याम जी ने अपने जीवन के चालीस दशकों से अधिक समय फिल्मों के संगीत रचना में दिए। भवानीपुर कॉलेज की लाइब्रेरी में सौरभ गोस्वामी ने “वो सुबह कभी तो आएगी” से कार्यक्रम की शुरुआत की। आकाश, आनंद सागर सोनी, मोहम्मद तारीक, अनिमेष, रितेश राय, एमा माइती रेना फरहीन चयनिका, पॉलोमी, मेधा दे, ऐशानी घोष दस्तिदार, चिराग, हृद्दीमन दास, शिनजिनी भादुड़ी, ताबीश और अंजलि दूबे ने खय्याम के बहाने कार्यक्रम में विभिन्न लोकप्रिय गीत, कविता और गजल गाए। डॉ रेखा नारिवाल, डॉ वसुंधरा मिश्र और सौरभ गोस्वामी ने खय्याम के गीत गाए। डीन प्रो. दिलीप शाह और प्रो. मीनाक्षी चतुर्वेदी, डॉ. वसुंधरा मिश्र ने इस कार्यक्रम की परिकल्पना की। संयोजन श्याम, सम्राट और अंजलि ने किया। कार्यक्रम में साठ से अधिक विद्यार्थियों की उपस्थिति रही।इस अवसर पर प्रो दिलीप शाह ने पुस्तकालय का अधिक उपयोग करने वाले विद्यार्थी को प्रमाणपत्र हौसला बढ़ाया।  यह जानकारी दी डॉ. वसुंधरा मिश्र द्वारा प्रेषित प्रेस विज्ञप्ति से मिली।

बंगीय हिन्दी परिषद में भारतेन्दु जयन्ती और हिन्दी दिवस का आयोजन

कोलकाता :  बंगीय हिंदी परिषद् ने नवजागरण दिवस के रूप में भारतेन्दु जयन्ती और हिन्दी दिवस का आयोजन किया ।गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए हिन्दी के सुप्रसिद्ध विद्वान डॉ0 प्रियंकर पालीवाल ने कहा कि भारतेंदु का विजन बहुत व्यापक था।वे बंगला नवजागरणकर्मियों से बहुत गहराई से जुड़े थे। मुख्य अतिथि डॉ0 राजीव कुमार रावत ने कहा कि हिन्दी को हमें अपने स्वाभिमान की भाषा बनाना होगा और हमें अपने बच्चों को उसपर गर्व करना सिखाना होगा।मुख्य वक्ता डॉ0 रंजीत सिन्हा ने कहा कि 35 वर्ष की अल्पायु में भारतेन्दु ने हिन्दी को तमाम आधुनिक गद्य विधाओं से सम्पन्न किया। बंगीय हिन्दी परिषद् के संयुक्त सचिव डॉ0 कुमार संकल्प ने कहा कि भारतेन्दु ने हिन्दी को हर तरह से न केवल समृद्ध किया बल्कि उसे भारतवासियों के स्वाभिमान से भी जोड़ने का प्रयास किया।आज के नौजवानों को उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए कि कैसे उन्होंने अल्पायु में देश और देशभाषा को संवारा। गौरतलब है कि भारतेन्दु जयन्ती को नवजागरण दिवस के रूप में मनाने की परम्परा बंगीय हिन्दी परिषद् ने 2016 में शुरू की थी जो देश में एक नई पहल है। गोष्ठी में कलकत्ते के मैथिलीशरण गुप्त कहे जाने वाले योगेंद्र शुक्ल ‘सुमन’, प्रो0 ललित झा ,जीवन सिंह, नंदलाल रोशनी, काली प्रसाद जायसवाल,गजेंद्र नाहटा,मो0 चांद, रामनारायण झा,सुदेष्णा चक्रबर्ती,प्रियंका यादव, काजल सिंह, रजनी गुप्ता, दिव्या प्रसाद,भानु पांडेय,विकास अत्रि,अनूप यादव,अनिल उपाध्याय, श्रीमोहन तिवारी, डॉ0 कमल कुमार आदि ने अपनी कविताओं का पाठ किया।कवि रमाकांत सिन्हा ने अपनी कविता से सभा का धन्यवाद ज्ञापन किया।