लखनऊ : किसी ने सच कहा है अपने पर विश्वास हो तो परेशानियां भी खुद ब खुद आपसे दूर चली जाती हैं। एक तरफ जहां करोना महामारी के चलते प्रवासी मजदूरों को रोजगार छोड़ अपने गांव वापस आना पड़ा। फिर नए सिरे से रोजगार की तलाश करना एक कठिन परिश्रम से कम नहीं है। लेकिन बांदा के कुछ प्रवासी मजदूर आपदा को अवसर में बदलते हुए भगीरथ बन गए और उनके प्रयासों से सूखी नदी में भी पानी आ गया। घर में रहकर काम करने की ठान ली और उस काम को अंजाम देने के लिए सूखी जमीन पर पानी तक ला दिया और अब नए सिरे से भविष्य को तैयार करने में यह सभी प्रवासी मजदूर जुट गए हैं।
बताते चलें कि बांदा के महानगरों से लौटे प्रवासी मजदूरों नें अपने श्रमदान से सूख चुकी नदी में जलधारा निकाल कर भगीरथ सा प्रयास कर इतिहास रच दिया। अब यही नदी उनका पालन हार बनेगी।
लॉकडाउन में दिल्ली, महाराष्ट्र, गुजरात से भीषण झंझावातों को झेलते 53 मजदूर बांदा जिले की नरैनी तहसील के अपने गांव भावंरपुर वापस आ गए। बदहाली के दौर में भी इनके हौसलें परास्त नहीं थे। इसी के परिणाम स्वरूप इन सभी ने गांव में ही रह कर श्रम करने की ठान ली ताकि पेट की ज्वाला और परिवार पालने हेतु परदेश जाने की नौबत न आए।
25 दिनों तक आपसी विमर्श के बाद इन्होने बीड़ा उठाया की एक दशक से गांव की सूखी पड़ी घरार नदी पर यदि श्रम दान करें तो शायद नदी के जल स्रोत फिर निकल आए। गांव में सूखे पड़े खेतों को बटाई पर लेकर जीवन को नए सिरे से शुरू करें। इसके लिए उन्होंने बातचीत को आगे बढ़ाते हुए बड़े खेतिहर से बातचीत की।
इस पर गांव के खेतिहर भी खेत देने के लिए तैयार हो गए। किस्मत बदलने की इसी आशा पर 7 जून को प्रवासी श्रमिकों की एक बैठक घरार नदी किनारे हुई। महिला मजदूर सबिता उनके पति महेश, रानी पत्नी राम सजीवन, चंदा पत्नी रति राम, ललिता पत्नी नत्थू प्रसाद, बृजरानी पत्नी नन्हू, सियाप्यारी पत्नी महेशुरा, शांति पत्नी कैथी, आशा पत्नी श्री विशाल, रंची पत्नी रामकृपाल, चंपा पत्नी छुट्टो, पुनीता पत्नी राजकुमार, रूकिया पत्नी गोपी, राजाबाई पत्नी रामलाल शामिल हुए।
सबने एक मत से निर्णय लिया कि हमे रोजी रोटी के लिए परदेश नहीं जाना। अपने गांव में कमाये खाएंगे। फिर क्या था सर्वसम्मति से घरार नदी में 8 जून से श्रम दान शुरू कर दिया। 10 मीटर चौड़ी तथा एक किलोमीटर लंबी नदी से झाड़- झंखाड़ और मलवा निकालना शुरू किया।
3 दिन में मलबा हटते ही नदी के जल स्रोत फूट निकले। 24 घंटे में तीन-चार फुट पानी भर गया।मजदूरों खुशी से झूम उठे। भावंरपुर के सभी लोग इस जतन से मगन हो गए। आसपास के गांव के लोग भी इस सफलता को सुन मौके पर पहुंचने लगे। ग्रामीणों की भीड़ आने लगी।
बुंदेलखंड की सैकड़ों वर्ष पुरानी परंपरा जीवित हो उठी। सभी गांव से आए हुए लोग अपने साथ आटा-दाल, सब्जी आदि लेकर के खाना बनाने का समान लेकर आए। श्रम दानियों के साथ श्रम दान कर नदी किनारे सुबह और शाम सामूहिक रसोई बननी लगी। सभी लोग सह भोज करते हैं।
इस दौरान गांव-गांव की कीर्तन मंडलियां मनोरंजन करती हैं। घरार नदी में ये श्रम दान का सिलसिला पिछले दस दिन से लगातार चल रहा है और आगे भी चलता रहेगा। जिसकी ग्राम भावंरपुर के बड़े किसानों ने इन सभी 53 प्रवासी श्रमिकों को 1-1 बीघा जमीन फ्री देने की तथा 1-1 बीघा जमीन बटाई पे देने की घोषणा की है।
मजदूरों का कहना है कि घरार नदी में पानी आ जाने के कारण वे अब मिली हुई जमीन पर पहले धान लगाएंगे। धान की फसल लेने के बाद गेहूं की फसल करेंगे। इसके अलावा वे बकरी पालन तथा मजदूरों के लिए अन्न बैंक भी बनाएंगे। इसके माध्यम से अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत करेंगे कि उन्हें रोजी-रोटी के लिए पलायन को मजबूर न होना पड़े।
प्रवासी मजदूर बन गए ‘भगीरथ’ और सूखी नदी में आ गया पानी
भारत-चीन विवाद: बिहार रेजिमेंट की बहादुरी के और भी कई क़िस्से हैं
15/16 जून की उस सर्द रात में पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में तक़रीबन 14,000 फ़ुट ऊंचाई पर हुई चीनी और भारतीय सेना की भिड़ंत में मारे जाने वालों में अधिकतर भारतीय फ़ौजी बिहार रेजिमेंट के थे।
वहाँ, गलवान घाटी में, तैनात टुकड़ी के कमांडिंग अफ़सर कर्नल बी संतोष बाबू का, जिनको उनके साथी फ़ौजियों और अधिकारियों ने नर्म-ज़बान और सादगी पंसद बताया है, ताल्लुक़ भी इसी रेजीमेंट से था। ‘एक कुशल लीडर’ बताए जानेवाले कर्नल संतोष की सोमवार को हुई भिड़ंत में मौत हो गई थी।
हालांकि बिहार रेजिमेंट की स्थापना साल 1941 में हुई थी लेकिन भारतीय सेना की वेबसाइट पर इसके संबंध में लिखते हुए ‘बंगाल नेटिव इंफ़ैंटरी’ का ज़िक्र किया गया है, जो ईस्ट इंडिया कंपनी के समय में बनाई गई थी। इंफ़ैंटरी का शाब्दिक अर्थ पैदल सेना है। 1857 विद्रोह के मशहूर सिपाही मंगल पांडेय बंगाल नैटिव इंफ़ैंटरी से थे।
भारत की आज़ादी की पहली लड़ाई बताए जाने वाले, 1857 के विद्रोह में इस रेजिमेंट के सिपाहियों के बड़े पैमाने पर शामिल होने के ‘संभावित और सामने मौजूद ख़तरों को भांपते हुए ब्रितानियों ने बिहार बटालियन के सभी अट्ठारह यूनिट्स को समाप्त कर दिया और ये सुनिश्चित किया कि बिहारियों की फ़ौज में भर्ती न की जाए। ये रोक दूसरे विश्व युद्ध के समय ही समाप्त हो पाई।
अपने पहले अवतार – बंगाल नेटिव इंफ़ैंट्री में ब्रितानियों की तरफ़ से बंगाल के नवाब और मराठाओं के ख़िलाफ़ लड़नेवाली फ़ौज ने 1941 के बाद से बर्मा (अब म्यांमार), मलाया (मलय प्रायदीप के कुछ मुल्क और सिंगापुर जो ब्रिटिश क़ब्ज़े में थे) से लेकर 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध और 1999 के करगिल जंग में हिस्सा लिया है, जब पाकिस्तानी सेना लद्दाख के करगिल क्षेत्र में घुस आई थी।
भारत ने उस घुसपैठ को ख़त्म करने और अपने इलाक़े को वापस लेने के लिए जो ऑपरेशन विजय शुरू किया था उसमें बड़ी संख्या में इस रेजिमेंट के सिपाही और अधिकारी शामिल थे।
करगिल के बटालिक सेक्टर में जुलाई के शुरुआती दिनों में हुई भीषण जंग के बाद भारतीय फ़ौज ने फ़तह हासिल की, भारतीय फ़ौज ‘1 बिहार रेजीमेंट को जुबार और थारू पहाड़ियों पर हुई विजय का श्रेय’ देती है।
बिहार के राजकीय चिह्न को भारत के राजकीय चिह्न के तौर पर अपनाया
बटालिक की जीत के लिए प्रशस्ति पत्र से लेकर भारत के उपद्रवग्रस्त क्षेत्रों के ऑपरेशनों में हिस्सा लेने और उसे बेहतर तरीक़े से निभाने के लिए वीर चक्र और अशोक चक्र जैसे मेडल हासिल कर चुकी बिहार रेजिमेंट के कई कार्यों जैसे बांग्लादेश की आज़ादी के समय हुए अखौरा के युद्ध के लिए आज भी याद किया जाता है।
भारत-बांग्लादेश की सीमा के पास मौजूद अखौरा में आज भी वागा-अटारी की तरह फ़्लैग सेरेमनी होती है जिसमें बीएसएफ़ और बॉर्डर गार्ड्स बांग्लादेश शामिल होते हैं।
साल 2008 के मुंबई हमले में हमलावरों की गोलियों का शिकार हुए संदीप उन्नीकृष्णन, जो बिहार रेजिमेंट से संबंधित रह चुके थे, इस टुकड़ी की बहादुरी की कहानियों को लोगों की ज़बान और दिल में ज़िंदा रखा है।
और भी कहानियां हैं, 15 सिंतबर, 1941 में तैयार की गई इस रेजिमेंट की, जिसके कमांडिग अफ़सर कैप्टन हबीबुल्लाह ख़ान खटक थे, वो बाद में पाकितानी फ़ौज में मेजर जनरल रहे।
बिहार के गर्वरन सर थॉमस रदरफ़ोर्ड जब साल 1945 में शिलांग के दौरे में बिहार रेजिमेंट के चिह्न से इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने कर्नल हबीबुल्लाह ख़ान खटक (तरक्क़ी के बाद) से बिहार सूबे के राजकीय चिह्न के तौर पर इसके इस्तेमाल की इजाज़त माँगी।
मई 1945 में बिहार हुकूमत ने एक राजपत्रित अधिसूचना जारी कर कर्नल एम हबीबुल्ला और समस्त प्रथम बिहार बटालियन का शुक्रिया अदा किया और तीन सिरों वाले अशोक सिंह को बिहार के राजकीय चिह्न के तौर पर अपनाया गया। आज़ादी के बाद इसी तीन सिरों वाले सिंह को भारत के राजकीय चिह्न के तौर पर अपनाया गया है।
(साभार – बीबीसी हिन्दी)
ये है गलवान घाटी की कहानी
गुलाम रसूल गलवान ने गलवान घाटी की खोज की थी, अंग्रेजों ने उन्हीं के नाम पर इस घाटी का नाम रखा था। उनके पोते का कहना है कि 1962 में भी चीन ने घाटी पर कब्जा करने की कोशिश की थी। लद्दाख की गलवान घाटी, जहां एलएसी पर भारत और चीन के बीच तनाव बढ़ा है, उसका गलवान परिवार के साथ संबंध गहरा और भावनात्मक है। इस घाटी का नाम एक स्थानीय एक्सप्लोरर गुलाम रसूल गलवान के नाम पर रखा गया था। वास्तविक नियंत्रण रेखा पर मौजूदा स्थिति के बारे में बात करते हुए उनके पोते मोहम्मद अमीन गलवान ने कहा कि वे उन जवानों को सलाम करते हैं जिन्होंने चीनी सैनिकों के साथ लड़ते हुए जीवन का बलिदान दिया। मोहम्मद गलवान कहते हैं कि युद्ध विनाश लाता है, आशा है कि एलएसी पर विवाद शांति से हल हो जाएगा।
परिवार के साथ घाटी के गहरे संबंध को याद करते हुए उन्होंने बताया कि उनके दादा पहले इंसान थे, जो इस गलवान घाटी में ट्रैकिंग करते हुए अक्साई चिन क्षेत्र में पहुंचे थे। उन्होंने 1895 में अंग्रेजों के साथ इस घाटी में ट्रैकिंग की थी। मोहम्मद गलवान के मुताबिक अक्साई चिन जाने के दौरान रास्ते में मौसम खराब हो गया और ब्रिटिश टीम को बचाना मुश्किल हो गया और मौत उनकी आंखों के सामने थी।
हालांकि फिर रसूल गलवान ने टीम को मंजिल तक पहुंचाया। उनके इस काम से ब्रिटिश काफी खुश हुए और उन्होंने उनसे पुरस्कार मांगने के लिए कहा, फिर उन्होंने कहा कि मुझे कुछ नहीं चाहिए। बस इस नाले का नामकरण मेरे नाम पर कर दिया जाए।
मोहम्मद गलवान कहते हैं कि यह पहली बार नहीं है, जब चीन ने इस पर कब्जा करने की कोशिश की है, बल्कि अतीत में ऐसे प्रयास भारतीय सैनिकों द्वारा निरस्त किए गए थे। उनके मुताबिक कि चीन की नजर 1962 से घाटी पर थी, लेकिन हमारे सैनिकों ने उन्हें खदेड़ दिया। अब फिर वे ऐसा करने की कोशिश कर रहे हैं, दुर्भाग्य से हमारे कुछ जवान शहीद हो गए, हम उन्हें सलाम करते हैं।
गलवान के पोते कहते हैं कि एलएसी में विवाद अच्छा संकेत नहीं है और सबसे अच्छी बात यह होगी कि मुद्दों को शांति से हल किया जाए।
रंगमंच कर्मियों की मदद के लिए आगे आए अनुपम खेर, नीना गुप्ता समेत कई सितारे
नयी दिल्ली : कोरोना वायरस महामारी के कारण कई लोगों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। ऐसे में कई बॉलीवुड सेलेब्स लोगों की मदद के लिए आगे आए हैं। रंगमंच से सिनेमा में आए देश के तमाम प्रसिद्ध कलाकारों ने भी बंद पड़ी नाट्यशालाओं से परेशान रंगकर्मियों के लिए एक बड़ा अभियान शुरू किया है।
इस अभियान के तहत अनुपम खेर, नीना गुप्ता, राकेश बेदी, मकरंद देशपांडे, दिव्या दत्ता, आहना कुमरा और शिखा तल्सानिया जैसी रंगमंच की जानी-मानी हस्तियां एक साथ आई हैं और रंगकर्मियों के लिए मदद जुटाने निकली हैं।
इस अभियान के बारे में अभिनेता अनुपम खेर ने कहा, ‘जब मुझे इस अभियान का हिस्सा बनने का मौका मिला तो मैंने इसके लिए तुरंत हां कह दी। रंगमंच के साथ मेरा गहरा और व्यक्तिगत जुड़ाव रहा है।
उन्होंने कहा, तकनीशियनों और सपोर्ट स्टाफ की मदद और मौजूदगी के बिना कोई भी नाटक पूर्ण नहीं होता है। उनका अस्तित्व रंगमंच समुदाय के लिए बहुत जरूरी है। मैं सभी से उदारतापूर्वक उनके लिए दान करने का अनुरोध करूंगा।
वहीं, इस अभियान से जुड़ी अभिनेत्री नीना गुप्ता ने कहा, इस कठिन समय में अपनी आजीविका के लिए संघर्ष कर रहे रंगमंच की दुनिया के सहयोगियों की मदद करने के लिए मैं खुद को भाग्यशाली मानती हूं। नाट्यशालाओं के दोबारा खुलने की अनिश्चितता की वजह से बहुत सारे लोग चिंतित हैं और असहाय महसूस कर रहे हैं।
इस समुदाय की मदद करने के लिए इस दिशा में अद्भुत पहल के लिए मैं इससे जुड़े लोगों की तारीफ करना चाहूंगी। इस पहल के माध्यम से हम देश के लोगों तक पहुंचना चाहते हैं और उनसे दान करने का आग्रह करते हैं।
बता दें कि इन सितारों ने लोगों से थिएटर कम्युनिटी को दान देने की अपील की है। ये सितारें एक कैंपेन वीडियो में नजर आए हैं जहां वे सपोर्ट स्टाफ और तकनीशियनों की अहमियत के बारे में बात करते हैं और उन्हें थिएटर का अटूट अंग बताते हैं।
वहीं अभिनेता और गीतकार अमितोष नागपाल ने इंडस्ट्री की भावना को व्यक्त करने के लिए एक कविता लिखी है। यह कैंपेन वीडियो टाटा स्काई थियेटर, एयरटेल स्पॉटलाइट, डिश टीवी और डी2एच रंगमंच एक्टिव पर दिखाया जाएगा।
युद्ध, युद्ध, युद्ध

युद्ध युद्ध युद्ध
धर्म युद्ध रंग युध्द जाति युद्ध
भाषा युद्ध नस्ल युद्ध लिंग युद्ध
संस्कृति संस्कारों का युद्ध
खून हत्या करने का युद्ध
चुनाव का युद्ध
छीना झपटी और नृशंसता का युद्ध
लोभ ईर्ष्या द्वेष का युद्ध
काले गोरे पीले का युद्ध
संवेदना के कुचलने का युद्ध
बरसों से दबी चिनगारी के बदलाव का युद्ध
स्त्री पुरुष का युद्ध
परिवार में भाई बहनों का युद्ध
राजकुमारी के लिए युद्ध
सत्ता और देश का युद्ध
पानी का युद्ध
लोकतंत्र और तानाशाही का युद्ध
प्रेम भी अछूता नहीं
सारे युद्ध प्रेम की जड़ों में निहित हैं
पूरी पृथ्वी में युद्ध
सत चित आनंद की तपस्या का युद्ध
सहज नहीं है सुख पाना
महासुख की गोद से जन्म लेता युद्ध
महाआनंद प्राप्त करने का एकमात्र हथियार युद्ध
समाप्त होने वाली पृथ्वी के भीतर का युद्ध
हिमालय के विशाल दंभ का युद्ध
लड़ रही हैं मनुष्यों की इंद्रियां
लोभ मोह माया महत्वाकांक्षा का युद्ध
फंसा हुआ मनुष्य तृष्णा के जाल में
श्वासों के युद्ध को भूल चुका है इंसान
अंतःकरण में विराजना उसे सीखा ही नहीं
संसार के नियमों को भूल युद्धरत मनुष्य
प्रेम के विशुद्ध भाव से युद्ध सिर्फ युद्ध
स्थूल में फंस सूक्ष्मता से दूर
मनुष्य का पैदा होते ही जीवन से युद्ध
मुश्किल है इस मिथ्या युद्ध से निकलना
शांतिपूर्ण एकांत में घुटता है दम दुनिया का
डर को डर से दूर करता है युद्ध
फिर भी लोग लगे हैं झूठे द्वंद्व को अपनाने में
पूरी दुनिया को मुट्ठी में भर लेने को
कभी नहीं कभी नहीं कभी नहीं
होगा खत्म ये युद्ध युद्ध युद्ध
विवेकानंद केंद्र कन्याकुमारी में ऑनलाइन योग दिवस
कोलकाता : विवेकानंद केंद्र कन्याकुमारी, पश्चिम बंग प्रान्त, एकनाथ विभाग (कोलकाता) द्वारा वैश्विक महामारी कोविड-१९ के दौर में मनुष्य की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, मानसिक तनाव दूर करने तथा तन, मन स्वस्थ रखने हेतु ऑनलाइन योग सत्र (मुफ्त) का आयोजन किया गया। यह १० से २१ जून २०२० तक प्रतिदिन सुबह ६:३० – ७:३० तक गूगल मीट पर चला। प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं मुख्य रूप से अरिजीत दास, शुभांकर दे, सनातन महाकूड़, श्यामसुंदर जयसवाल, अनुनिका शर्मा, पूर्वाली सरकार, शुभांगी उपाध्याय द्वारा व्यायाम, सूर्य नमस्कार, आसन, प्राणायाम, ध्यान सिखाया गया। पूरे सत्र के संचालन सुब्रत मंडल ने किया।
अन्तिम दिन अर्थात २१ जून को कॉमन योगा प्रोटोकॉल का पालन करते हुए अंतरराष्ट्रीय योग दिवस भी मनाया गया। इसके साथ ही पूर्व निर्धारित ५००८ सूर्य नमस्कार का लक्ष्य भी लिया गया। राज्य के विभिन्न स्थानों से ३६५ लोगों ने सहभागिता निभाई और निर्धारित लक्ष्य से कई गुना अधिक १०,०८४ सूर्य नमस्कार किया गया। इस दौरान पद्मश्री निवेदिता भिड़े (उपाध्यक्ष, विवेकानन्द केन्द्र) के व्याख्यान योग – एक जीवन पद्धति का भी प्रसारण किया गया
स्वर्गीय परमेश्वरन जी की याद में…

मूल रचना : डॉ. एम.लक्ष्मी कुमारी
हिंदी अनुवाद: शुभांगी उपाध्याय
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वित: |
सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकार: कर्ता सात्त्विक उच्यते ||
यह श्लोक जो स्मृति मंडपम में स्वर्गीय एकनाथजी की समाधि पर अंकित है, वह माननीय परमेश्वरन जी के जीवन पर भी प्रतिध्वनित होता है।
१९८० के दशक में, जब माननीय परमेश्वरन जी दीन दयाल संस्थान, नई दिल्ली के निदेशक थे तब से मेरा उनके साथ परिचय हुआ। तत्पश्चात, विवेकानंद केंद्र में मुझे बड़े भाई के समान ही उनका स्नेह प्राप्त होता रहा। वे मुझसे दस वर्ष ज्येष्ठ थे, किन्तु प्रेम और आदरपूर्वक वे सदैव मुझे “दीदी” कहकर ही पुकारते थे। विवेकानंद केंद्र के लिए यह बड़े ही सौभाग्य की बात है कि माननीय परमेश्वरन जी १९९५ से केंद्र के अध्यक्ष रहे और साथ ही युवा भारती तथा अन्य केंद्र प्रकाशन के संपादक भी।
स्वामी विवेकानंद ने जिस प्रकार दिसंबर १८९२ में भारत को देखा था, ठीक उसी प्रकार एक बार पुनः इस भूमि के छोर से भारत को देखने का एक दुर्लभ और अनूठा प्रयास आरम्भ हुआ, किन्तु एक सूक्ष्म अंतर के साथ, अब वहां स्वतंत्र भारत के शानदार भाग्यारोहण के दो महान स्थल – विवेकानंद शिला स्मारक और प्रतिष्ठित विवेकानंद केंद्र की स्थापना हो चुकी थी। विवेकानंद शिला स्मारक न केवल हमारे राष्ट्र अपितु पूरे विश्व को स्वामी विवेकानंद के महान दृष्टिकोण के प्रति आकर्षित करता है। उस दृष्टि की व्यावहारिक अभिव्यक्ति के लिए और बाद में महान देशभक्त और प्रचारक श्री एकनाथ रानाडे द्वारा निरूपित आध्यात्म प्रेरित सेवा संगठन विवेकानंद केंद्र की स्थापना, हमारे देश के विवेकशील युवाओं के लिए की गई जो अपनी मातृभूमि और समाज की सेवा के लिए खुद को समर्पित करना चाहते हैं।
स्वामी विवेकानंद और महर्षि अरबिंदो की तरह ही परमेश्वरन जी भी उस अस्तित्व की एकता में दृढ़ विश्वास रखते थे जो ब्रह्मांड में व्याप्त है, जिसे हम अपनी इंद्रियों, मन और बुद्धि से अनुभव कर पाते हैं। वह एक गहरी वास्तविकता है जिसका बाह्य रूप से दिखाई देना केवल आंशिक अभिव्यक्ति और एक महत्वपूर्ण प्रतीक मात्र है। हमारी महान मातृभूमि के प्रति उनकी धारणा को मैं स्वयं उनके ही शब्दों में उद्धृत करती हूँ: “हम मानते हैं कि राष्ट्र एक आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक है। यह पैदा होता है, इसे बनाया नहीं जाता। यह एक जैविक, जीवित, बढ़ती, गतिशील इकाई है, पश्चिम के विपरीत जहां एक राष्ट्र को सामाजिक, आर्थिक या राजनीतिक कारकों का उत्पाद माना जाता है। हिंदू राष्ट्र अंध ऐतिहासिक ताकतों के संगम के आधार पर विविध लोगों का केंद्र नहीं है। पिघलने वाले बर्तन की आधुनिक अवधारणा यहां लागू नहीं होती, जिसमें समुदायों को एक ही पूरे में अथवा एक ही मोज़ेक में पिघलाया जाता है और विभिन्न लोग यांत्रिक रूप से सह-अस्तित्व में होते हैं। यहां राष्ट्र एक दिव्य बीज से उत्पन्न एक जैविक है जो अंकुरित होता है और शाखाओं को बाहर निकालता है एवं रंगीन फूलों के साथ अपने पत्ते फैलाता है।”

उन्होंने अपने व्यक्तिगत जीवन में त्याग और सेवा के आदर्श, जो स्वामी विवेकानंद को बहुत प्रिय थे, को बहुत गहराई से आत्मसात किया था। यह सर्वविदित है कि माननीय परमेश्वरन जी सर्वोत्कृष्ट राष्ट्रवादी हैं वेद हमारे राष्ट्र का वर्णन मानवता के कल्याण को ध्यान में रखने वाले महान ऋषियों द्वारा किए गए तप के परिणाम के रूप में करते हैं। एक राष्ट्र धीरे-धीरे विकास की प्राकृतिक प्रक्रिया में परिवार और समुदाय से ऊपर उठकर अंत में केवल एक ही परिवार के रूप में पूरे विश्व को गले लगाने में सक्षम हो जाता है। यह “कुटुम्ब” ही है जो एक विश्व परिवार में विकसित होता है। इसका आधार एक से अनेक बनने की आध्यात्मिक अवधारणा है। उस उच्च आध्यात्मिक आदर्श के बिना किसी भी प्रकार का कौशल अथवा यांत्रिक संस्थान की इमारत “एक दुनिया” या राष्ट्रों का परिवार” नहीं हो सकती। उनके लेखन से पता चलता है कि जिन्होंने देश के लिए अपना सर्वस्व बलिदान किया है। उनके लेखन ने स्वामी विवेकानंद के “बनो और बनाओ” आदर्श को अपनाया और इसी कारणवश उनकी रचनाएं भविष्य में एक शानदार भारत के निर्माण हेतु सेवा और त्याग की मृदु भावना को जागृत करने में सक्षम है।
उनका लेखन और वक्तव्य विज्ञान तथा आध्यात्मिकता का एक स्वादिष्ट मिश्रण प्रदान करते हैं। उनमें से कई रचनाएं शिक्षा, राजनीति या पारिस्थिति विज्ञान पर रची गयी हैं परंतु विशिष्ट भारतीय दृष्टिकोणानुसार उसका मूल, आध्यात्मिक जागरूकता पर ही केंद्रित है। उनके अनुसार गीता एक व्यापक विश्व-दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। वह आध्यात्मिकता और भौतिकवाद की दोहरी जरूरतों को संतुलित करती है। गीता का कर्मयोग उन असंख्य विकृतियों के लिए रामबाण इलाज है, जिनका सामना हम अपने प्रतिदिन के कार्य में करते हैं। वे हमें अपनी दिन-प्रतिदिन की समस्याओं को गीताचार्य रूपी मीनार से देखने का आग्रह करते हुए कहते हैं की यह सब मूर्खतापूर्ण बातें है और हमें हमारे बहुमूल्य मानसिक और बौद्धिक संकायों को इसमें बर्बाद नहीं करना चाहिए। यह दृष्टि विशेष रूप से युवाओं को पैसा बनाने और नशे की लत के सांसारिक विकर्षणों की खोज पर केंद्रित है। स्वामीजी की ही भांति परमेश्वरन जी भी देश की रुग्ण शिक्षा व्यवस्था, समाज, अर्थशास्त्र, धर्म, हिंदुत्व, नारीवाद आदि विषयों पर अपनी चिंता व्यक्त की है।
हिन्दू धर्म द्वारा अपने अनुयायियों को प्रदत्त ईष्ट देवता की अवधारणा और उनके पूजन-अर्चन की स्वतंत्रता के बारे में वे अक्सर लिखा करते थे। ईश्वर का माँ के रूप में पूजन-अर्चन करने से हिंदू धर्म को अतिबृहत बल प्राप्त हुआ। इसका सीधा प्रभाव नारीत्व के उत्थान पर पड़ा, जिसकी अन्य धर्मावलंबी कल्पना भी नहीं कर सकते। उन्होंने इस ओर भी ध्यान आकर्षित किया कि कैसे इस उत्थान के पश्चात भी यहां की महिलाओं को विदेशी संस्कृतियों के आक्रमणों के कारण, सदियों से असुरक्षा का अनुभव होता रहा, और उनके नारीत्व को घोर अपमान झेलना पड़ा, जिससे उन्हें आज भी मुक्ति नहीं मिल पाई है। अपने जैसे अन्य सामर्थ्यवान राष्ट्रवादियों की तरह ही, माननीय परमेश्वरनजी भी युवाओं को जगा देने वाले आह्वान देने में कभी भी असफल नहीं हुए, उन्होंने कहा कि युवा उस भव्य भारतीय आदर्श पर खरा उतरे, जिसका दृष्टिपात स्वामी विवेकानंद, महर्षि अरबिंदो और अन्य महापुरुषों ने किया। उन्होंने युवाओं से राष्ट्र और समाज सेवा तथा भारत माता को एक बार पुनः जगद्गुरु के पद पर सिंहासनारूढ़ करने हेतु स्वयं को समर्पित करने का आग्रह किया।
अपने मजबूत इरादों और दृढ़ विश्वास के बावजूद भी वे अपने तथाकथित वैचारिक दुश्मनों सहित अन्य लोगों के साथ भी विनम्रतापूर्वक व्यवहार ही रखते थे। यही कारण है कि वे ‘अजातशत्रु’ थे, कोई उनका दुश्मन नहीं था। श्री रामकृष्ण, शारदा माँ और स्वामीजी जैसे महान शिक्षकों के प्रति समर्पण भाव ने उनके व्यक्तित्व की कोमलता को बढ़ा दिया था। हम दोनों ने ही श्रीरामकृष्ण मठ से दीक्षा ली थी, और यही स्वर्णिम सूत्र हमें एक असामान्य भाई-बहन के रिश्ते में बांधता था। यह सूत्र सदा मेरी प्रेरणा का स्रोत रहेगा क्योंकि मैं उसके बारे में बार-बार सोचती रहती हूँ।
पाठ – सूखा बरगद
शिक्षण डॉ. वसुन्धरा मिश्र द्वारा। उपन्यास और कहानी के अंतर्गत उपन्यास :”सूखा बरगद “-मंजूर एहतेशाम द्वारा लिखित। विषय – – सूखा बरगद और मुस्लिम मध्यवर्गीय समाज इस विडियो में मध्यवर्गीय मुस्लिम समुदाय के विभिन्न पहलुओं और दृष्टिकोणों को उनके पात्रों द्वारा समझने का प्रयास किया गया है। परंपरागत और आधुनिक शिक्षित मुस्लिम किस प्रकार सोचते हैं, इस उपन्यास में मंजूर एहतेशाम ने बहुत ही सुंदर ढंग से वर्णित किया है।
भारत सेवाश्रम संघ, अम्फान पीड़ितों को वितरित की राहत सामग्री
कोलकाता : अम्फान चक्रवात से पीड़ित ग्रामीण मजदूरों को उत्तर 24 परगना, बाबुरमहल ग्राम पंचायत के राजनगर गाँव में भारत सेवाश्रम संघ, बालीगंज की ओर से राहत सामग्री वितरण का आयोजन किया गया। राजनगर ग्रामीण का ज्यादातर क्षेत्र अम्फान चक्रवात से प्रभावित रहा। राजनगर गाँव के 45 घरों को जो अम्फान चक्रवात से बुरी तरह प्रभावित रहे, उनको राहत सामग्री पहुँचाने का जिम्मा भारत सेवाश्रम संघ ने उठाया। जिसमें उन्होंने ग्रामीणों को 500 ग्राम दाल, 2 किलो चावल, बिस्किट के पैकेट, सुथोल लोशन और प्लास्टिक की तिरपाल आदि सामग्री का वितरण किया। भारत सेवाश्रम संघ के कार्यकर्ताओं में हरिसदन शिकारी, सुदिन शिकारी, सुखेन शिकारी, सौरिश हालदार और अरित्रा गायेन आदि लोगों ने इस मौके पर ग्रामीणों को राहत सामग्री वितरित करके साथ ही उनका हौसला बढाया।
भवानीपुर कॉलेज में ऑनलाइन डिजिटल मार्केटिंग और ई-लर्निंग कोर्स आरम्भ
कोलकाता : भवानीपुर एडूकेशन सोसायटी कॉलेज ने विद्यार्थियों के लिए कोविद 19 के इस कठिन समय में शिक्षा में अवरोध न हो इसलिए डिजिटल मार्केटिंग और ई-लर्निग के कोर्स की शुरुआत की है। एक महीने के इन कोर्सेज को डिजिटल मार्केटिंग विशेषज्ञ कॉलेज की फैकल्टी चंद्रेयी बागची, ई-लर्निंग विशाल दवे और अश्विनी बजाज के निर्देशन में पढा़या जाएगा। माइक्रो सॉफ्ट ऑफिस एम एस वर्ल्ड, एक्सेल, पावर प्वाइंट, गूगल संबंधित यू-ट्यूब, गूगल ड्राइव, फार्म, शीट्स आदि विषयों की पूरी शिक्षा दी जा रही है। इसी तरह विद्यार्थियों के लिए एक बेव कार्यक्रम का आयोजन तेरह जून को अॉन-लाइन किया गया जिसका विषय एक्सप्लोरिंग दी प्रॉस एंड कॉन्स अॉफ स्टडिंग अब्राड पोस्ट पेन्डेमिक रहा।आज विदेशी विश्वविद्यालयों में भी परीक्षा और रिजल्ट बहुत पीछे हो गए हैं। भारतीय विद्यार्थीयों को विदेशों में दाखिले सहज हो सकते हैं। इसको ध्यान में रखते हुए ही भवानीपुर कॉलेज ने कोविद 19 के बाद विदेशों में पढ़ने वालों विद्यार्थियों के लिए अवसर प्रदान किया है।
विदेशों में शिक्षा प्राप्त करने के लिए विद्यार्थियों के लिए कई विकल्प बताए गए। विदेशी विश्वविद्यालयों में कोरोना महामारी को देखते हुए भारत विद्यार्थियों को कई तरह की छूट प्राप्त करने के मार्ग खुले हैं। कॉलेज के डीन प्रो दिलीप शाह ने अपने स्वागत भाषण में कहा कि विश्व के कठिन हालतों को देखते हुए यूके के विश्वविद्यालय में दाखिले में एक वर्ष पहले तक के एप्लिकेशन लेगें। विदेशों के कई विश्वविद्यालयों में सितंबर सेशन में लेने वाले एडमिशन अब जनवरी में लेगें।यहां तक कि आईईएलटीएस स्कोर में छूट दी जा रही है साथ ही विद्यार्थियों के काम और इंटर्नशिप के अनुभवों के आधार पर भी विदेशी विश्वविद्यालयों में छूट दी जा रही है। विशेषकर भारतीय विद्यार्थियों के लिए बेहतर शैक्षणिक परिवेश और उच्च स्तरीय शिक्षा प्राप्त करने में किसी प्रकार की परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ेगा । यूके विश्वविद्यालयों ने अपने यहाँ चीनी विद्यार्थियों के दाखिले लेने बंद कर दिए हैं । इसका लाभ भारतीय और अन्य देशों के विद्यार्थियों को अधिक से अधिक लाभ मिलेगा। कॉलेज के डीन प्रो दिलीप शाह, प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी, दिव्या जी ने अपने-अपने विचारों से अवगत कराया। विद्यार्थियों ने प्रश्नोत्तर सेशन में अपनी जिज्ञासाओं के उत्तर प्राप्त किये। तृतीय श्रेणी के विद्यार्थी मृगांक ने सेशन की संपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला।डॉ. वसुंधरा मिश्र ने इस कार्यक्रम की जानकारी दी।




