-विदेशी कुत्तों के लिए लाइसेंस अनिवार्य!
– सितंबर तक लागू होगा नियम
हावड़ा । अब से, अगर कोई व्यक्ति घर में विदेशी या संकर नस्ल का कुत्ता पालता है, तो उसे लाइसेंस लेना होगा। हावड़ा नगर निगम एक नया नियम लागू कर रहा है। जानकारी के अनुसार, हावड़ा नगर निगम सितंबर की शुरुआत से लाइसेंस जारी करेगा। इसके लिए पालतू जानवर के मालिक का आधार कार्ड और विदेशी या संकर नस्ल के कुत्ते का टीकाकरण प्रमाणपत्र ज़रूरी होगा। हावड़ा नगर निगम ने पालतू जानवरों के लिए लाइसेंस अनिवार्य कर दिया है। इसके लिए नगर पालिका की वेबसाइट पर आवेदन करना होगा। लाइसेंस 150 रुपये सालाना जमा करके प्राप्त किया जा सकता है। हावड़ा के मुख्य नगर निगम प्रशासक सुजय चक्रवर्ती ने कहा, “कोलकाता नगर निगम के बाद, इस बार हावड़ा नगर निगम क्षेत्र में यह प्रणाली शुरू की जा रही है। लाइसेंस को हर साल नवीनीकृत करना होगा। विदेशी और संकर कुत्तों को घर पर रखने के लिए लाइसेंस प्राप्त करना अनिवार्य किया जा रहा है।” उन्होंने यह भी कहा, “अब से विदेशी पक्षियों को रखने के लिए भी लाइसेंस जारी करने की ऐसी व्यवस्था शुरू की जाएगी।” नगर निगम सूत्रों के अनुसार, अगर कोई लाइसेंस प्राप्त नहीं करता है, तो उसे पहले जागरूक किया जाएगा। अगर वह काम नहीं करता है, तो संबंधित पालतू मालिक के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। शहरवासियों के हित में पालतू कुत्तों के लिए नगर निगम का लाइसेंस अनिवार्य किया जा रहा है। पता चला है कि साथ ही, हावड़ा नगर निगम शहर के आवारा कुत्तों की नसबंदी के लिए एक संगठन की मदद से काम भी शुरू कर रही है।
हावड़ा वाले सावधान, कुत्ते पालें नस्लें जान के
पहली बार पूर्णत: अपशिष्ट मुक्त रही अमरनाथ यात्रा
– पर्यावरण-संरक्षण में स्थापित किए कई रिकार्ड
नयी दिल्ली। जम्मू कश्मीर में इस साल की श्री अमरनाथ यात्रा सफाई, प्लास्टिक-मुक्त व्यवस्था और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में ऐतिहासिक रही। इस बार यात्रा में करीब 4 लाख श्रद्धालुओं ने भगवान शिव के पवित्र गुफा मंदिर के दर्शन किए। इस यात्रा को पहली बार पूरी तरह से पूर्णत: अपशिष्ट रहित (जीरो वेस्ट) बनाया गया। स्थानीय प्रशासन ने यात्रा को गंदगी रहित बनाने के लिए वैज्ञानिक तरीके से कचरा प्रबंधन किया । यात्रा के दौरान हर दिन करीब 11.67 मीट्रिक टन कचरा पैदा हुआ, लेकिन सारे कचरे का शत प्रतिशत निस्तारण किया गया। गीला कचरा खाद बनाने के लिए भेजा गया और सूखा कचरा रिसाइक्लिंग यूनिट तक पहुंचाया गया। प्रशासन ने 1,016 जगह कूड़ेदान लगाए। हरे रंग के डिब्बे, गीले और नीले, सूखे कचरे के लिए। 65 गाड़ियों ने नियमित रूप से कचरा उठाया। सफाई के लिए 1300 से ज्यादा सफाईकर्मी दिन-रात तैनात रहे। प्लास्टिक पर भी सख्त रोक लगाई गई। एकल-उपयोग प्लास्टिक (एसयूपी) पूरी तरह बंद कर दिया गया। लंगर वालों ने भी इसका इस्तेमाल बंद किया। यात्रियों को 15,000 से ज्यादा जूट और कपड़े के थैले बांटे गए। “प्लास्टिक लाओ, थैला ले जाओ” और “बिन इट, विन इट” जैसे कार्यक्रमों से लोगों को प्लास्टिक के नुकसान और सही तरीके से कचरा फेंकने के बारे में जानकारी दी गई। पूरे यात्रा मार्ग पर 1600 से ज्यादा मोबाइल शौचालय लगाए गए, जिनकी सफाई हर दिन दो बार की गई। हर शौचालय पर क्यूआर कोड लगा था जिससे यात्री तुरंत अपनी प्रतिक्रिया दे सकें। करीब 20 हजार यात्रियों ने फीडबैक दिया, जिससे सेवाओं को बेहतर करने में मदद मिली। गंदे पानी और मल को उठाने के लिए 39 डी-स्लजिंग वाहन लगाए गए और सारा मल प्रोसेस किया गया।
“ग्रीन प्लेज” अभियान में 70 हजार से ज्यादा श्रद्धालुओं ने हिस्सा लिया और सफाई की शपथ ली। सेल्फी बूथ, प्रतिज्ञा दीवारें और स्वच्छता किट ने लोगों को जुड़ने के लिए प्रेरित किया। जिम्मेदार यात्रियों को सम्मानित भी किया गया।
मेडिकल प्रवेशिका परीक्षा पर बेमियादी रोक
-बीडीएस और एमडीएस प्रवेश प्रक्रिया बाधित
– स्वास्थ्य विभाग ने जारी की नोटिस
कोलकाता । एमडीएस और बीडीएस की प्रवेश प्रक्रिया अनिश्चित काल के लिए बंद कर दी गई है। स्वास्थ्य विभाग ने सोमवार को एक नोटिस जारी किया। नतीजतन, नेट पास करने वाले छात्रों का भविष्य अस्थायी अनिश्चितता का सामना कर रहा है। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, कानूनी जटिलताओं के कारण प्रवेश प्रक्रिया बंद कर दी गई है। स्वास्थ्य विभाग ने कहा कि यह अगली सूचना तक लागू रहेगी। छात्र संगठन की राज्य चिकित्सा इकाई के संयोजक शम्स मुसाफिर ने इस मामले पर कड़ा विरोध जताया है। एक बयान में उन्होंने कहा कि कानूनी जटिलताओं के बहाने स्वास्थ्य विभाग द्वारा लिया गया निर्णय बिल्कुल अवांछनीय है। उन्होंने यह भी कहा कि चिकित्सा या चिकित्सा विज्ञान जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में प्रवेश प्रक्रिया को स्थगित करने का मतलब छात्रों के अध्ययन के समय को कम करना है, जिसका बाद में न केवल मेडिकल छात्रों की शिक्षा, बल्कि समग्र स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर भी असर पड़ेगा। परिणामस्वरूप, चिकित्सा सेवाएं बाधित हो सकती हैं। उनकी मांग है कि कानूनी जटिलताओं को दूर करके सभी छात्रों की प्रवेश प्रक्रिया तुरंत शुरू की जाए। कक्षाएं भी शुरू की जानी चाहिए। अन्यथा, उन्होंने भविष्य में राज्य भर में एक बड़े आंदोलन की चेतावनी दी है।
रद्द ही रहेगी 26 हजार शिक्षकों की नियुक्ति
-सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया फरमान
नयी दिल्ली/ कोलकाता । सुप्रीम कोर्ट ने 26,000 एसएससी नौकरियों को रद्द करने के खिलाफ दायर सभी पुनर्विचार याचिकाओं को खारिज कर दिया है। राज्य और एसएससी की पुनर्विचार याचिकाएँ भी खारिज कर दी गई हैं। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय कुमार और सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भर्ती परीक्षा की वास्तविक ओएमआर शीट उपलब्ध नहीं हैं। सीबीआई और बग कमेटी की जाँच के आधार पर यह स्पष्ट है कि इसमें भ्रष्टाचार हुआ है। राज्य सरकार, स्कूल सेवा आयोग, बेरोजगारों समेत विभिन्न पक्षों ने 26,000 नौकरियों को रद्द करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की है। 5 अगस्त को सुनवाई पूरी हुई। सुनवाई जजों के चैंबर में हुई। दो जजों की बेंच ने कहा कि कोर्ट में सुनवाई की कोई ज़रूरत नहीं है। उन्होंने पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी। गत 3 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने भर्ती प्रक्रिया में भ्रष्टाचार और कई अनियमितताओं के आरोपों के चलते एसएससी की 26,000 (वास्तव में 25,735) भर्तियाँ रद्द कर दी थीं। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति संजय कुमार की पीठ ने अनियमितताओं के आरोपों पर 2016 का पूरा पैनल रद्द कर दिया था। शीर्ष अदालत ने कहा था कि सटीक जानकारी के अभाव में पात्र और अपात्र का निर्धारण करना संभव नहीं है। इसलिए, पूरा पैनल रद्द कर दिया गया है। एसएससी नए सिरे से भर्ती प्रक्रिया शुरू करेगा। दागी या चिन्हित अपात्रों का वेतन वापस करना होगा। लगभग एक महीने बाद, एसएससी और राज्य ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की।
अश्वत्थामा की तपोभूमि कहलाता है देवरिया का यह मंदिर
देवरिया। उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले से करीब 35 किलोमीटर दूर ‘मझौली राज’ में स्थित दीर्घेश्वर नाथ मंदिर महाभारत काल से जुड़ी एक अनूठी मान्यता का केंद्र बन गया है। श्रद्धालु जटाशंकर दुबे ने बताया, “यह मंदिर अश्वत्थामा की तपोभूमि के रूप में प्रसिद्ध है। मान्यता है कि वे आज भी यहां पूजा करने आते हैं। सावन में हर सोमवार को एक से डेढ़ लाख लोग यहां दर्शन करते हैं।”
एक अन्य श्रद्धालु ने कहा कि यह पौराणिक मंदिर है, जहां भगवान शिव ने अश्वत्थामा को दर्शन दिए थे। यहां स्थित पार्वती सरोवर में स्नान करने से त्वचा रोगों का निदान होता है ऐसी मान्यता है। वहीं मंदिर के महंत जगन्नाथ दास जी महाराज ने आईएएनएस के साथ खास बातचीत में बताया कि मंदिर परिसर में स्थित पार्वती सरोवर में सफेद कमल के फूल खिलते हैं, जिन्हें अश्वत्थामा सहस्त्रार्चन पूजा के लिए उपयोग करते थे। उन्होंने कहा, “यह मंदिर प्राचीन और पवित्र है। यहां भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। सावन में लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए यहां आते हैं।” महंत के अनुसार, यह मंदिर केवल धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक महत्व का भी प्रतीक है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) ने करीब चार दशक पहले यहां खुदाई की थी, जिसमें द्वापर युग की मूर्तियां, मृदभांड और प्राचीन सिक्के मिले थे। इन खोजों ने मंदिर की प्राचीनता की पुष्टि की। मंदिर का जीर्णोद्धार मझौली राज परिवार द्वारा कराया गया था, जिसमें तत्कालीन महारानी श्याम सुंदरी कुंवरी ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। बाद में बांसुरी बाबा, टेंगरी दास और ब्रह्मलीन बंगाली बाबा जैसे संतों ने मंदिर के विकास में अहम भूमिका निभाई। स्थानीय लोगों का विश्वास है कि महाभारत के योद्धा अश्वत्थामा को यहीं भगवान शिव ने दीर्घायु होने का वरदान दिया था, जिसके कारण इस मंदिर का नाम “दीर्घेश्वर नाथ मंदिर” पड़ा। यह मंदिर श्रद्धालुओं के लिए आस्था और इतिहास का अनूठा संगम है। मंदिर की सबसे रोचक बात यह है कि हर सुबह जब मंदिर के कपाट खोले जाते हैं, तो शिवलिंग पर पहले से ही बेलपत्र और फूल चढ़े मिलते हैं। स्थानीय लोग मानते हैं कि यह पूजा आज भी स्वयं अश्वत्थामा तीसरे पहर यहां आकर करते हैं।
कोलकाता की टकसाल से निकला था एक रुपये का पहला सिक्का
कोलकाता। आज के डिजिटल युग में जब हम महज एक क्लिक में यूपीआई से पेमेंट कर देते हैं, तो शायद ही कोई सोचता हो कि कभी भारत में लेन-देन पूरी तरह सिक्कों और नोटों पर टिका था। लेकिन, क्या आपको पता है कि भारत में पहला ‘एक रुपये का सिक्का’ कब बना था? यह कहानी है 19 अगस्त 1757 की, जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने कोलकाता की टकसाल में पहला एक रुपये का सिक्का जारी किया था। साल 1757 भारतीय इतिहास का निर्णायक मोड़ था। इसी साल प्लासी का युद्ध हुआ, जिसमें ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला को हराकर बंगाल पर अपनी पकड़ बना ली। इसके बाद कंपनी ने नवाब से एक संधि की, जिसके तहत उन्हें सिक्के ढालने का अधिकार मिल गया, और उसी अधिकार का इस्तेमाल करते हुए 19 अगस्त को पहली बार भारत में एक रुपये का सिक्का सामने आया। इस सिक्के पर ब्रिटिश सम्राट विलियम 4 की तस्वीर छपी। बाद में, 1857 की क्रांति के बाद जब भारत का शासन ईस्ट इंडिया कंपनी से छिनकर ब्रिटिश क्राउन के हाथों में गया, तब सिक्कों पर ब्रिटिश मोनार्क की छवि छपने लगी। इस तरह सिक्के न सिर्फ लेन-देन का जरिया बने, बल्कि सत्ता और ताकत का प्रतीक भी। हालांकि, ईस्ट इंडिया कंपनी इससे पहले भी सूरत, बॉम्बे और अहमदाबाद में टकसालें स्थापित कर चुकी थी। लेकिन, एक रुपये का पहला सिक्का विशेष रूप से कोलकाता की टकसाल से ही ढाला गया और फिर इसे बंगाल के मुगल प्रांत में चलाया गया। 1914 से 1918 के बीच, यानी पहले विश्व युद्ध के दौरान, चांदी की भारी कमी हुई। तब सिक्कों की जगह कागज के नोट लाए गए। फिर भी, कंपनी के सिक्के 1950 तक भारत में चलते रहे।
भारत जब 1947 में आजाद हुआ, तब भी ये ही सिक्के चलन में थे। लेकिन 1950 में स्वतंत्र भारत का पहला सिक्का जारी हुआ, जिस पर अशोक स्तंभ के सिंह शीर्ष की छवि थी। आज की पीढ़ी शायद ‘आना’ शब्द से अनजान हो, लेकिन आजादी के शुरुआती दशकों में ‘आना सिस्टम’ प्रचलित था। 1 रुपये में 16 आना और 1 आना में 4 पैसे होते थे। यानी उस दौर में आधा आना, 2 आना और 4 आना जैसे सिक्के खूब चलते थे।
क्रांतिपथ के वीर साधक चाफेकर बंधु
एक मां की तीन संतानें जो हंसते-हंसते चढ़ गईं फांसी
स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में चाफेकर बंधुओं के रूप में पहली बार ऐसा हुआ था जब एक ही मां की तीन संतानें हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर चढ़ गईं। छत्रपति शिवाजी महाराज के पराक्रम का संदेश देने तथा गणेश उत्सव में राष्ट्रभक्ति के श्लोक गाने वाले इन वीरोंं का स्वतंत्रता संग्राम में योगदान अतळ्ल्य था। विवेक मिश्रा का आलेख –
आजादी के योद्धा चाफेकर बंधु स्वाधीनता संग्राम में अपना स्थान रखते हैं । ये हैं दामोदर हरि चाफेकर, बालकृष्ण हरि चाफेकर एवं वासुदेव हरि चाफेकर। पुणे के ग्राम चिंचवड के प्रसिद्ध कीर्तनकार हरिपंत चाफेकर के घर जन्मे चाफेकर बंधुओं ने लोकमान्य तिलक की प्रेरणा से अपने साथी युवकों के साथ मिलकर वर्ष 1894 में हिंदू धर्म रक्षिणी सभा की स्थापना की। इस सभा का प्रारंभ शिवाजी श्लोक व गणपति श्लोक से होता था।
उनमें राष्ट्रप्रेम की एक अद्भुत ज्वाला थी, जिसमें तपकर वीर क्रांतिकारियों ने अपने पराक्रम को दर्शाते हुए इस प्रकार कहा था- ‘शिवाजी की कहानी दोहराने मात्र से स्वाधीनता प्राप्त नहीं हो सकती। आवश्यकता इस बात की है कि शिवाजी और बाजीराव की तरह तीव्र गति के साथ कार्य किए जाएं। हमें राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम के युद्ध क्षेत्र में जीवन का खतरा उठाना होगा।’ इसी प्रकार उनके गणपति श्लोक भी देश के युवकों एवं किशोरों को स्वातंत्र्य की खातिर बलिदान होने की प्रेरणा देते थे। ऐसे ही एक श्लोक में कहा गया था- ‘गौ और धर्म की रक्षा के लिए उठ खड़े हो। गुलामी की जिंदगी से शर्मिंदा हो। नपुंसक की तरह धरती का बोझ मत बनो।’ वर्ष 1897 में पुणे में प्लेग महामारी विकराल रूप धारण कर रही थी। महामारी से मुक्ति के लिए जब अंग्रेज अधिकारियों ने कोई खास प्रयास नहीं किया, तो इस स्थिति को देखते हुए तिलक जी के परामर्श से तीनों भाइयों ने क्रांति का मार्ग चुन लिया। साथ ही संकल्प किया कि वे प्लेग कमिश्नर वाल्टर चाल्र्स रैंड और एक अन्य अधिकारी अयस्र्ट का वध करके ही दम लेंगे। 22 जून, 1897 को महारानी विक्टोरिया का 60वां जन्मदिन हीरक जयंती के रूप में पुणे के गवर्नमेंट हाउस में मनाया जाना था। सूचना थी कि अंग्रेज अधिकारी रैंड और अयस्र्ट भी इस आयोजन में सम्मिलित होंगे। इस अवसर का लाभ उठाकर दामोदर हरि चाफेकर एवं बालकृष्ण हरि चाफेकर के साथ उनके मित्र विनायक रानाडे वहां पहुंचे। दामोदर हरि चाफेकर ने कमिश्नर रैंड की बग्घी पर चढ़कर उसे गोली मार दी व बालकृष्ण हरि चाफेकर ने अयस्र्ट को गोलियों से छलनी कर दिया।
जिस भी भारतीय ने यह खबर सुनी उसकी छाती गर्व से चौड़ी हो गई। तब अंग्रेज अधीक्षक ब्रुइन ने ऐलान किया कि जो भी व्यक्ति इन फरार लोगों की सूचना देगा उसे 20 हजार रुपए इनाम मिलेगा। चाफेकर बंधुओं के ही सहयोगी रहे द्रविड़ बंधु (गणेश शंकर एवं रामचंद्र) ने इनाम के लालच में उनका पता ब्रुइन को बता दिया। तत्पश्चात बड़े भाई दामोदर हरि को पकड़ लिया गया, किंतु बालकृष्ण हरि को पकड़ न सके। जिला सत्र न्यायाधीश ने दामोदर हरि को फांसी की सजा सुनाई।
फांसी से पूर्व लोकमान्य तिलक दामोदर हरि से मिले एवं उन्हें गीता की प्रति भेंट की। 18 अप्रैल, 1898 को वही गीता हाथ में लेकर भारतमाता का वीर सपूत फांसी के फंदे पर हंसते-हंसते बलिदान हो गया। तमाम हथकंडों के बाद भी जब पुलिस बालकृष्ण को पकड़ न पाई तो बौखलाए अंग्रेज उनके निरपराध सगे-संबंधियों को परेशान करने लगे। इससे आहत होकर उन्होंने स्वयं गिरफ्तारी दे दी। इस बीच सबसे छोटे भाई वासुदेव हरि चाफेकर ने सहयोगियों के साथ मिलकर 8 फरवरी, 1899 को द्रविड़ बंधुओं को मौत के घाट उतार दिया था। जिसके बाद वासुदेव चाफेकर को उसी वर्ष 8 मई और बालकृष्ण चाफेकर को 12 मई को यरवदा जेल में फांसी दे दी गई।
धन्य है ऐसी मां – भारतीय इतिहास में पहली बार एक ही माता की तीन-तीन संतानों ने वंदे मातरम का जयघोष करते हुए अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। जब भगिनी निवेदिता चाफेकर बंधुओं की मां दुर्गाबाई चाफेकर को सांत्वना देने गई तो मां ने निवेदिता से कहा, ‘इसमें शोक कैसा? मेरे बेटे तो दुखियों-पीड़ितों की रक्षा में बलिदान हो गए और इसलिए फांसी चढ़े कि देश का भला हो। बेटी! तुम दुख मत करो, तुम्हारे दुख करने से तो इन हुतात्माओं का निरादर होगा।’ धन्य हैं ऐसी मां जिन्होंने चाफेकर बंधुओं जैसे वीर सपूतों को जन्म दिया!
नहीं रहे वरिष्ठ अभिनेता अच्युत पोतदार
मुम्बई । हिंदी सिनेमा के वेटरन एक्टर अच्युत पोतदार का 91 साल की उम्र में निधन हो गया है। उनकी मौत की खबर सामने आने के बाद इंडस्ट्री में शोक की लहर छा गई है। शानदार एक्टिंग करियर में 125 से ज्यादा मूवीज से फैंस का मनोरंजन करने वाले अच्युत को सबसे अधिक फेम सुपरस्टार आमिर खान की ब्लॉकबस्टर फिल्म 3 इडियट्स में प्रोफेसर की भूमिका निभाने से मिला था। आइए उनके बारे में थोड़ा और विस्तार से जानते हैं। किसी भी वरिष्ठ कलाकार का निधन हमेशा से सिनेमा जगत के लिए एक बड़ी क्षति माना जाता है। अच्युत पोतदार के मामले में भी ये कथन सही बैठता है। लंबे समय तक बतौर दिग्गज अभिनेता फिल्मी जगत में अपनी धाक जमाने वाले अच्युत अब हमारे बीच नहीं रहे हैं। इस बात की आधिकारिक जानकारी मराठी टीवी चैनल स्टार प्रवाह की तरफ से इंस्टाग्राम पोस्ट के जरिए दी गई है। बडे़ पर्दे के अलावा वह छोटे पर्दे के भी एक उम्दा एक्टर थे। अच्युत पोतदार के बारे में हम आपको बता दे ंकि लंबे समय तक उन्होंने भारतीय सेना में सेवाएं दी थीं। इसके अलावा वह इंडियन ऑयल कंपनी में भी काफी समय तक कार्यरत रहे। 80 के दशक में उन्होंने अभिनय की दुनिया की तरफ रूख किया। इसके बाद टीवी से उनको ब्रेक मिला और 4 दशक तक वह लगातार काम करते रहे। मूल रूप से वह एक मराठी एक्टर थे और वहां उन्होंने कई फिल्में और टीवी शो किए। बॉलीवुड में भी अच्युत पोतदार का कद काफी ऊंचा रहा है और दमदार अभिनेता के तौर पर जिस तरह से उन्होंने आमिर खान की 3 इडियट्स में प्रोफेसर की भूमिका को अदा किया था, उसे कोई कभी नहीं भूल पाएगा। अच्युत का जाना वाकई सिनेमा जगत के लिए एक बड़ा झटका है। अपने बेहतरीन एक्टिंग करियर में अच्युत पोतदार ने करीब 125 से अधिक फिल्मों में काम किया था। जिनमें हिंदी और मराठी सहित अन्य भाषाओं की फिल्में भी शामिल रहीं। उनकी पॉपुलर मूवीज के बारे में जिक्र किया जाए तो उसमें अर्ध सत्य, तेजाब, दिलवाले, वास्तव, परिणीता, लगे रहो मुन्ना भाई, दबंग और 3 इडियट्स जैसी कई लोकप्रिय फिल्में शामिल रहीं।
मानसिक थकान से जूझ रहे हैं हमारे 80 प्रतिशत चिकित्सक व स्वास्थ्यकर्मी
सुषमा त्रिपाठी
सर्वेक्षण के मुख्य निष्कर्ष
83 प्रतिशत डॉक्टर मानसिक या भावनात्मक थकान की शिकायत
87 प्रतिशत महिला व 77 प्रतिशत पुरुष डॉक्टरों को मानसिक थकान ,
50 प्रतिशत सप्ताह में 60 घंटे से अधिक काम करते हैं
15 प्रतिशत 80 घंटे से अधिक काम करते हैं
कोलकाता । स्वास्थ्य और शिक्षा किसी भी देश की प्रगति का आधार हैं। अस्पतालों में नर्स को सिस्टर और पुरुष नर्स को ब्रदर कहा जाता है यानि वे हमारे रक्षक हैं। जब आप हाथ- पैर हिला भी नहीं सकते तब यही ब्रदर और सिस्टर आपकी जीवनरेखा बन जाते हैं। कई बार तो ऐसा लगा कि ये डॉक्टर, नर्स ब्रदर – सिस्टर से कहीं अधिक माता – पिता जैसी देखभाल करते हैं। दिल्ली का निर्भया कांड याद है…? निर्भया डॉक्टर बनना चाहती थी और अभया एक जूनियर डॉक्टर थी। घंटों की शिफ्ट के बाद वह आराम करने गयी थी जब उसके साथ दरिंदगी की गयी। खबरें कुछ और कहती हैं और सच्चाई कुछ और दिखती है। हम अपने स्वास्थ्य को लेकर लापरवाह रहते हैं और अस्पतालों में जाकर चमत्कार की उम्मीद करते हैं। हम भूल जाते हैं कि वह भी हमारी तरह इंसान हैं, उनकी जिंदगी है, दिक्कतें हैं। गौर कीजिएगा कि आप और हम गुस्से में किस तरीके से उन लोगों के साथ किस अभद्रता के साथ पेश आते हैं जो हमारी मदद करते हैं। बेहतर नतीजों के लिए एक सुरक्षित परिवेश जरूरी है पर आंकड़े कुछ और कहते हैं।
राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस सर्वेक्षण से पता चलता है कि 80 प्रतिशत से ज़्यादा डॉक्टर मानसिक थकावट की शिकायत करते हैं, जिसमें छोटे शहरों भारत के आधे डॉक्टर हफ़्ते में 60 घंटे से ज़्यादा काम कर रहे हैं—जो राष्ट्रीय औसत से कहीं ज़्यादा है—फिर भी लगभग 43 प्रतिशत का कहना है कि उन्हें कमतर आंका जाता है। ये निष्कर्ष राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस के उपलक्ष्य में जारी किए गए देश भर के 10,000 से ज़्यादा स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों पर किए गए अपनी तरह के पहले सर्वेक्षण से सामने आए हैं। एक प्रमुख मेडिकल ब्रांड, कन्या की रिपोर्ट एक चिंताजनक प्रवृत्ति को उजागर करती है: मानसिक थकान का बढ़ता स्तर, सुरक्षा संबंधी चिंताएँ और काम का अत्यधिक बोझ, जो चिकित्सा पेशेवरों—विशेषकर युवा और महिला डॉक्टरों—को उनकी सीमाओं से परे धकेल रहा है। 25-34 वर्ष की आयु के डॉक्टर सबसे ज़्यादा प्रभावित हैं। वे न केवल सबसे लंबे समय तक काम करती हैं, बल्कि सबसे ज़्यादा पछतावे का स्तर भी बताती हैं। 70 प्रतिशत डॉक्टरों का कहना है कि उन्हें चिकित्सा पेशे के लिए किए गए व्यक्तिगत त्यागों पर पछतावा है। 35 वर्ष की आयु के बाद यह स्तर काफ़ी कम हो जाता है, जो शुरुआती करियर में बर्नआउट को एक प्रमुख चिंता का विषय बताता है। महिला डॉक्टरों को अक्सर शौचालय की स्वच्छता और अपने कपड़े बदलने व आराम करने के स्थानों में सुरक्षा की कमी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। वह आगे कहती हैं, “यह खासकर सरकारी मेडिकल कॉलेजों में सच है, जहाँ महिला डॉक्टरों को बुनियादी सुविधाएँ भी नहीं दी जातीं।”तीन में से एक डॉक्टर को अपने या परिवार के लिए प्रतिदिन 60 मिनट से भी कम समय मिलता है। छोटे शहरों के 85 प्रतिशत डॉक्टर थकान की, 43 प्रतिशत कम वेतन और कम मूल्यांकन महसूस करते हैं। दस में से सात चिकित्सा पेशेवरों का कहना है कि वे कार्यस्थल पर सुरक्षित महसूस नहीं करते। 70 प्रतिशत महिला डॉक्टर काम पर असुरक्षित महसूस करती हैं। टियर 2 और 3 शहरों की 72 प्रतिशत महिला डॉक्टर असुरक्षित महसूस करती हैं—महानगरों की तुलना में 10 प्रतिशत ज़्यादा। 75 प्रतिशत को चिकित्सक बनने का है।83 प्रतिशत डॉक्टर मानसिक या भावनात्मक थकान की तो 87 प्रतिशत महिला व 77 प्रतिशत पुरुष डॉक्टरों को मानसिक थकान होती है। 50 प्रतिशत चिकित्सक सप्ताह में 60 घंटे से अधिक काम करते हैं और 15 प्रतिशत 80 घंटे से अधिक काम करते हैं। अक्सर, एक महिला डॉक्टर की वैवाहिक स्थिति उसके काम के मूल्यांकन को प्रभावित करती है, न कि उसके साल भर के प्रयासों और कड़ी मेहनत को मान्यता देती है। इस क्षेत्र के कई लोग मानते हैं कि एक महिला डॉक्टर, चाहे उसकी वास्तविक योग्यताएँ कितनी भी हों, एक कुशल सर्जन नहीं हो सकती। यहाँ तक कि डीन और वरिष्ठ डॉक्टर भी महिला छात्रों को स्त्री रोग जैसे विशेषज्ञताओं की ओर आकर्षित करते हैं, और उन्हें सर्जरी या अन्य पुरुष-प्रधान विशेषज्ञताओं को अपनाने से हतोत्साहित करते हैं।” इसके अलावा, महिला डॉक्टरों को अक्सर शौचालय की स्वच्छता और अपने कपड़े बदलने व आराम करने के स्थानों में सुरक्षा की कमी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। वह आगे कहती हैं, “यह खासकर सरकारी मेडिकल कॉलेजों में सच है, जहाँ महिला डॉक्टरों को बुनियादी सुविधाएँ भी नहीं दी जातीं।”
भारत में सबसे ज्यादा हो रही है रेबीज से मौतें
नयी दिल्ली । हाल के दिनों में देश की सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार ने राजधानी में बढ़ रहे आवारा कुत्तों के आतंक पर चिंता जाहिर की थी। इस मामले को सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान में लिया था। बता दें कि दिल्ली-एनसीआर की सड़कों से आवारा कुत्तों को हटाने की मांग पर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट की तीन न्यायाधीशों की पीठ ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। इन सब के बीच आइए आपको बताते हैं कि भारत के अलावा और कौन से देश हैं, जो आवारा कुत्तों के आतंक से परेशान हैं। किस देश में सबसे अधिक रेबीज के कारण जा रही जान? बता दें कि साल 2024 में एक रिपोर्ट सामने आई, जिसमें, जिसमें पता चला कि किस देश के कितने लोग प्रतिवर्ष रेबीज के शिकार हो रहे हैं और अपनी जान गंवा रहे हैं। आईएचएमई द्वारा पिछले साल जारी इन आंकड़ों में बताया गया कि साल 2021 में रेबीज से सबसे अधिक मौतें भारत में हुईं। रेबीज के कारण 4023 लोगों ने अपनी जान गंवा दी। इसके बाद इथियोपिया का नंबर आता है, जहां पर 1043 लोगों की रेबीज संक्रमण के कारण जान गई। वहीं, तीसरे नंबर पर नाइजीरिया है जहां पर 909 लोगों की जान गई है। इसके बाद पाकिस्तान 614, चीन 604, नेपाल 479 और फिलीपिंस 250 के आंकड़ों के साथ क्रमशः चौथे, पांचवें, छठे और सातवें स्थान पर है। कांग्रेस नेता शशि थरूर ने आवारा कुत्तों के प्रबंधन के लिए निर्धारित धनराशि के उपयोग पर पुनर्विचार करने का आह्वान किया है, तथा सुझाव दिया है कि इसे नगर पालिकाओं के बजाय सीधे विश्वसनीय पशु कल्याण संगठनों को दिया जाना चाहिए। एक्स पर एक पोस्ट में थरूर ने कहा कि चुनौती संसाधनों की कमी नहीं है, बल्कि स्थानीय निकायों की नसबंदी और आश्रय के प्रयासों को करने में अनिच्छा या असमर्थता है तब भी जब उन्हें आवश्यक धनराशि प्राप्त होती है। उन्होंने कहा कि इस तरह के आवंटन अक्सर खर्च ही नहीं होते या जहाँ उनकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है, वहाँ इस्तेमाल नहीं किए जाते। इसके बजाय, उन्होंने प्रस्ताव दिया कि यह धन उन गैर-सरकारी संगठनों और पशु कल्याण समूहों को दिया जाए जिनका आश्रय स्थल चलाने और पशु जन्म नियंत्रण (एबीसी) कार्यक्रम लागू करने का सिद्ध रिकॉर्ड हो। उनका तर्क था कि वे बेहतर परिणाम देने की स्थिति में हैं। थरूर ने सार्वजनिक सुरक्षा और कुत्तों के साथ मानवीय व्यवहार के बीच संतुलन बनाने के महत्व पर ज़ोर दिया और सुप्रीम कोर्ट के हालिया हस्तक्षेप को नगर निगम की निष्क्रियता पर समझ में आने वाली खीझ का नतीजा बताया। उनकी यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट द्वारा 11 अगस्त को कुत्तों के काटने की घटनाओं में वृद्धि को बेहद गंभीर स्थिति बताते हुए और दिल्ली-एनसीआर में सभी आवारा कुत्तों को जल्द से जल्द स्थायी रूप से स्थानांतरित करने के आदेश देने के बाद आई है। न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने दिल्ली के अधिकारियों को छह से आठ हफ़्तों के भीतर लगभग 5,000 कुत्तों के लिए आश्रय स्थल बनाने का भी निर्देश दिया, जिनका चरणबद्ध तरीके से विस्तार किया जाएगा। अदालत ने चेतावनी दी कि पुनर्वास अभियान में किसी भी तरह की बाधा डालने पर व्यक्तियों या संगठनों के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही हो सकती है।




